बांग्लादेश निर्माण (Bangladesh in Making - Essay in Hindi) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: - वैसे तो पूरे विश्व में हमले होत रहते है पूर्व में पाकिस्तान ने भी पूर्वी पाकिस्तान में मार्च 1971 में हमला बोल दिया। पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) के लोग युद्ध की विभीषिका से बचने के लिए भारत की सीमा में घुसपैठ करने लगे। एक करोड़ से ज्यादा शरणार्थी अक्टूबर तक भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में घुस आए थे और हजारों लोगों का आना जारी रहा। इस घुसपैठ से भारत पर बोझ पढ़ने लगा था। इंदिरा गांधी ने अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन से मुलाकात की, लेकिन उसने इस दिशा में कुछ कार्रवाई करने की बजाए पाकिस्तान को हरसंभव मदद की शह देते गए। मजबूरीवश भारत को मोर्चा लेना पड़ा और सिर्फ 13 दिनों में ही पाक पर फतह पाने में सफलता हासिल की।

कारण: - 25 मार्च 1971, मुजीबर रहमान-अवामी लीग के नेता, जिनकी पार्टी को दिसंबर 1970 के नेशनल एसेंबली के चुनावों में स्पष्ट बहुमत मिला था- को मार्शल मिर्लिट्री प्रशासक ने ढाका में गिरफ्तार कर लिया। अगले ही दिन, 26 मार्च को अवामी लीग और पूर्वी पाकिस्तान बुद्धिजीवी तबके ने इकट्‌ठे होकर पाकस्तािन से आजादी और अलग बांग्लादेश बनाने की घोषणा की। 1947 में पाकिस्तान बनने के वक्त से ही पश्चिमी पाकिस्तानियों का वहां की राजनीति पर प्रभाव रहा। ऐसे में जब मुजीबर को 313 सीटों वाली नेशनल एसेंबली में से 169 सींटे मिलीं तो उन्हें नागवारा लगा। फिर क्या था पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी हिस्से में बंगालियों का दमन करने के लिए सैन्य धावा बोल दिया। संघर्ष शुरू हुआ। आजादी की लड़ाई लड़ी गई । करीब 9 महीनों तक खूनी संघर्ष चला। लाखों मारें गए। नेशनल एसेंबली के लिए चुने गए नए सदस्यों की गिरफ्तारी और उनकी मौत के साथ सिलसिला शुरू हुआ। बुद्धिजीवियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्रों, उद्योगपतियों और अन्य पेशेवरों पर पूरे पूर्वी इलाके में जुल्म ढहाए गए। करीब एक करोड़ लोगों ने भारत में शरण ली। सैन्य तानाशाह याहया खान के आदेश पर पाकिस्तानी जनरल का लक्ष्य था वहां मौजूद आबादी को डराना और कुचलना। मुजीबर को पश्चिमी पाकिस्तान की जेल में डाल दिया गया। जिस कदर नरसंहार हो रहा था। लोग भारत के असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और मिजोरम जैसे सीमाई राज्यों में शरण ले रहे थे, उसके चलते भारत को मजबूर होकर इस गृहयुद्ध में कूदना पड़ा। भारत पर दबाव बढ़ रहा था क्योंकि वह स्वयं ही इन सीमा राज्यों में अपने नागरिकों की खाद्य एवं अन्य जऱूरतें पूरी नहीं कर पा रहा था। पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे इस नरसंहार, दुष्कर्म, डकैती, जेलबंदी की सच्चाई दुनिया के सामने थी लेकिन वैश्विक ताकतों ने कोई खास उत्साह नहीं दिखाया। तमाम इस्लामिक मुल्क तो खुले तौर पर याहया खान के समर्थन में आ खड़े हुए थे।

आयरन लैडी: - भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दबाव में थी। उन्हें मालूम था कि अगर भारत इस युद्ध में कूदा तो उसे आर्थिक और कूटनीतिक परिणाम भुगतने होंगे। पर इंदिरा ने संकल्प कर लिया था। सभी राजनीतिक दल उनके साथ खड़े हुए। और भारत ने कदम आगे बढ़ाए। देशवासियों ने भी सरकार का बखूबी साथ निभाया। सीमापार से आ रहे शरणार्थियों का न सिर्फ रोटी, कपड़ा दिया बल्कि उन्हें रहने को छत भी दी। भारतीय सेना आगे बढ़ी दोनों के बीच आमना-सामना हुआ। आखिर 16 दिसबंर 1971 का वह दिन जब पाकिस्तान के पूर्वी बंगाल प्रांत के मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर ले. जनरल नियाजी ने एक लाख सैनिको के साथ ढाका में भारतीय आर्मी कमांडर ले. जनरल अरोड़ा के समक्ष समर्पण किया। बांग्लादेश जंग में विजय के बाद इंदिरा गांधी एशिया की आयरन लेडी के तौर पर उभरकर सामने आई।

निक्सन व किसिंजर: - बांग्लादेश की इस लड़ाई से दुनियाभर के नेताओं के कई सच उजागर हुए। इसमें सबसे पक्षतापूर्ण और निराश करने वाला रवैया तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर का रहा। जो यूएस स्टेट डिपार्टमेंट, एजेंसियों द्धारा दस्तावेंजों के विविर्गीकरण (डिक्सालिफिकेशन) से सामने आया। कई टेप रिकार्डिंग के जरिए उस वक्त बांग्लादेश में हो रहे जुल्म पर अमरीकी रवैये का खुलासा हुआ। इस लड़ाई में वे अपने हितों को कैसे आगे बढ़ा रहे थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि अमरीका राष्ट्रपति निक्सन ने इंदिरा गांधी के लिए अभद्र भाषा तक का इस्तेमाल किया था।

भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पाकिस्तानी सेना की बांग्लादेश में घुसपैठ को लेकर चिंतित थीं। यही कारण है कि वह अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन से मिलने 5 नवंबर 1971 को वाशिंगठन पहुंच गईं। निक्सन से मिलकर इंदिरा ने पूर्वी पाकिस्तान में लगातार चल रहे युद्ध से भारत की बढ़ रही मुसीबतों से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि लगभग एक करोड़ शरणार्थी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में घुस आए हैं और प्रतिदिन हजारों व्यक्ति सीमा पार कर भारत में घुस आ रहे हैं। निक्सन ने इंदिरा की बातें अनमनें ढंग से सुनीं। इंदिरा से मुलाकात के बाद इसकी समीक्षा बैठक में निक्सन और किसिंजर ने इंदिरा के लिए अंग्रेजी में अपशब्दों का इस्तेमाल किया।

रणनीतिकार और इंदिरा गांधी के प्रमुख सचिव पी. एन. हक्सर से किसिंजर ने मुलाकात की और कहा कि युद्ध किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं होगा। 4 दिसंबर 1971 को भारत पर पाकिस्तान के आक्रमण के बाद किसिंजर ने निक्सन से मुलाकात कर कहा कि हमला तो भारतीयों ने किया है। उन्होंने यह भी कहा कि पाक को अमरीका ने सैन्य सामान की आपूर्ति पूरी तरह से बंद कर दी है और यही कारण है कि भारत आकाश और समुद्र के रास्ते काबू पाने में कामयाब रहा।

रूस: - किसिंजर ने संयुक्त राष्ट्रसंघ कार्यालय में राष्ट्रपति निक्सन के इशारे पर चीनी राजदूत से गुप्त मुलाकात की। दोनों की यह मुलाकात अक्टूबर 1971 में हुई थी। इस बैठक में किसिंजर ने चीनी राजदूत को यह सलाह दी थी कि वह अपनी सेना को चीन-भारत सीमा की ओर बढ़ने को कहे। 10 दिसंबर को किसिंजर और निक्सन की बातचीत में किसिंजर उन्हें यह सूचना दे रहे हैं कि जॉर्डन की 4 युद्धक विमान पाकिस्तान भेजा जा चुका है। साउदी अरब और तुर्की से 22 युद्धक विमान भेजने के बारे में बातचीत हो रही है। अमरीका ने अपना 7 वां बेड़ा बंगाल की खाड़ी में ला खड़ा कर दिया। इस युद्ध में सोवियत रुस ने भारत का साथ दिया था।

कहानी: - पूर्वी पाकिस्तान जिसे अब बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है, वहां पाकिस्तान ने अमरीका की शह पाकर 11 महीने तक जमकर कत्लेआम मचाया। इस बर्बर खेल में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल याहया खान को अमरीका ने मोहरे की तरह इस्तेमाल में लाया। अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन और विदेश मंत्री किसिजंर ने याहया के जरिए चीन के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को पनपाने की कोशिश की। इस युद्ध में भारत को मजबूरी में खुद को झोंकना पड़ा। समझते हैं कि क्या थी इस जंग के पीछे की कहानी और कौन थे किरदार?

शुरूआत: - 25 मार्च 1971 को पाक सेना ने बंगाल में नरसंहार की शुरूआत कर दी। अमरीका के विदेश मंत्री किसिंजर ने अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन से मुलाकात करके यह सूचना दी कि पाक सेना ने बंगाल में घुसपैठ कर लिया हैं। किसिंजर ने यह भी बताया है कि अमरीकी दूतावास का यह विचार है कि पाकिस्तानी सेना बंगाल में लंबी अवधि तक कार्रवाई करेगी। हालांकि, इस मुलाकात में निक्सन से उसने पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह और राष्ट्रपति जनरल याहया खान से कत्ले आम को रोकने पर विचार करने को कहा, लेकिन निक्सन ने इस बारे में कुछ भी विचार करने से मना कर दिया। किसिंजर ने भविष्य में निक्सन से दोबारा विचार करने को कभी नहीं कहा। बंगाल में पाक सेना के घुसपैठ को निक्सन द्वारा समर्थन देने की नीति का अमरीकी जनता ने विरोध किया। वहां की मीडिया ने भी राष्ट्रपति की जमकर आलोचना की। लेकिन, इसके बावजूद निक्सन और किसिंजर अपनी मंशा को अंजाम देने में लगे रहे। वे पाकिस्तानी सेना को बम और बारूद की आपूर्ति कराने में जुटे रहे। निक्सन असल में जनरल याहया खान को माध्यम बनाकर चीन के साथ संवाद शुरू करना चाहते थे। 1971 की जुलाई में किसिंजर पहले भारत और फिर पाकिस्तान की संक्षिप्त यात्रा पर पहुंचे। इसके बाद वे वाक वायु सेना के जहाज से चीन भी गए थे।

प्रलय: - अमरीका के राष्ट्रपति निक्सन ने पाकिस्तान को मदद पहुंचाने के लिए गृह मंत्रालय, सीआईए और बांग्लादेश स्थित कार्यवाहक काउंसिल जनरल की सलाह को नजरअंदाज किया। उन्होंने इस दरियादली के लिए अपने देश के कानून की सीमाएं बार-बार लांघी। काउंसिल जनरल ने बांग्लादेश में हो रहे नसंहार को 20 वीं सदी का सबसे बड़ी प्रलय बताया और कहा कि इससे उबरने में बांग्लादेश को चार दशक का समय कम से कम लगेगा। पाक के किसी सेना अधिकारी पर इस बर्बरता के लिए मुकदमा नहीं चलाया गया।

चनौती: -चुनौतियां कम नहीं थीं। अमरीका ने चाल चली। सातवां बेड़ा तैनात किया। डराने की कोशिश हुई पर हमारी सेना ने परवाह नहीं की। मानेकशॉ के नेतृत्व में सेना हरवक्त हर लड़ाई के लिए तैयार थी। उस दौर में मानेकशॉ का ध्यान इसी पर रहता था कि हमें हरवक्त लड़ाई के लिए तैयार रहना है। हमारी सेना ने उम्दा ढंग से लड़ाई लड़ी। रणनीति अच्छी रही। हालांकि सैन्य खामियां थीं। पर हमने सामरिक परिस्थिति का फायदा उठाया।

इंदिरा गांधी व मानेकशॉ: - फील्ड मार्शल जनरल मानेकशॉ के अनुसार 1971 की लड़ाई हमारा बहुत अच्छा ऑपरेशन था। 71 हजार सैनिकों को बंदी बनाया। एक अलग राष्ट्र का निर्माण कराया। यह ऐतिहासिक अवसर था। इंदिरा गांधी और मानेकशॉ गजब के लीडर साबित हुए। अटल बिहारी वाजपेयी कहते भी थे कि लोग इतिहास बनाते हैं, उन्होंने (इंदिरा) नया भूगोल ही बदल दिया। 1971 में हम झुके नहीं। हम लड़ाई में गए और एक बहुत बड़ा जोखिम लिया। इंदिरा गांधी ने सेना से सलाह मशविरा किया। मानेकशॉ ने वक्त मांगा। सेना ने तैयारी की और मोर्चा संभाला। दरअसल, 1971 जैसी परिस्थितियों में राजनीतिक नेतृत्व को समझना होता है कि जब वह कोई आदेश देता है तो वह वास्तविक हो। राजनीतिक नेतृत्व को भी सैन्य समझ होनी चाहिए। 1962 में हमसे यहीं भूल हुई थी। सैन्यबलों को तो हमेशा युद्ध की परिस्थिति के लिए तैयार रहना होता है। जितनी भी तकनीकी और रणनीतिक क्षमता है उसके साथ दुरुस्त रहना होता है।

’सैम बहादुर’ (मानेकशॉ) ने 1971 में अपना नाम साकार किया। बतौर कमांडर उन्होंने अपना साहस साबित किया। वे करिश्माई सैन्य नेतृत्व के धनी थे। इंदिरा से उनका सामंजस्य अच्छा हो तो फिर 1971 जैसा कमाल होता है।

उपसंहार: - वर्ष 1971 की लड़ाई में जाना हमारे लिए एक कठिन पर बहुत साहसिक कदम था। ऐसे निर्णय के लिए राजनीतिक नेतृत्व में एक राय और उसका दृढ़ संकल्पित होना बहुत जरूरी होता है। साथ ही सेना की तैयारी बहुत मायने रखती है। हम भाग्यशाली थे कि इन दोनों ही मोर्चो पर हम खरे उतरे। इंदिरा गांधी का संकल्प और फील्ड मार्शल जनरल मानेकशॉ के अदम्य साहस से हमें विजय मिली।

- Published/Last Modified on: January 22, 2016