बिल गेट्‌स (Bill Gates - Essay in Hindi) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: - प्रतिस्पर्धा के दौर में सभी उत्पाद समूह अपने बाजारों का निर्माण करती हैं, और उत्पाद विशेष के संगठन इसके लिए सरकार के सामने अपना पक्ष और मांगें भी रखते हैं। लेकिन, उत्पाद विशेष की समूह यदि इस मामले में सरकार की नीतियां बनवाने लग जाएं तो इसे अनैतिक ही कहा जाता है। इसी तरह के कामकाज के संदेह के आधार पर बिल एंड मेलिंडा गेट्‌स फाउंडेशन (नींव) को सरकार ने निगरानी की सूची में रखा है। समझा जाता हैं कि दुनिया को रोगमुक्त कराने के लिए सेवा और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने वाला यह नींव भारत में बहुराष्ट्रीय फार्मा समूह के बाजार की जीत तैयार कर रहा है।

बिल गेट्‌स: - दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति बिल गेट्‌स और उनकी पत्नी के नाम से एक संस्था दुनिया में दानवीरता की मिसाल के तौर पर पहचानी जाती है जिसका नाम है ’बिल एंड मेंलिंडा गेट्‌स फाउंडेशन। यह संस्था कई वर्षों से दुनिया को रोगमुक्त कराने के नाम पर भारत सहित कई देशों के टीकाकरण कार्यक्रमों में दान देने का काम करता रहा है। लेकिन, हाल ही में आई एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट (विवरण) ने दावा किया है कि ’बिल एंड मेंलिंडा गेट्‌स फाउंडेशन’ संस्था ने बहुराष्ट्रीय दवा समूह के फायदे के लिए सरकारी नीतियों को प्रभावित करने का काम कर रही है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने हाल ही में ’बिल एंड मेंलिंडा गेट्‌स फाउंडेशन’ के कार्य-कलापों पर नजर रखने के लिए उसे ’निगरानी सूची’ में रखा है। गौरतलब है कि इससे पहले सरकार ने गुजरात की तीस्ता सीतलवाड़ की गैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) को आर्थिक सहायता देने के लिए अमरीका की फोर्ड फाउंडेशन (नींव) संस्था को निगरानी सूची में रखने का फैसला किया था।

फाउंडेशन (नींव): - किसी भी विदेशी एजेंसी को भारतीय कानून के मुताबिक गृह मंत्रालय में ’फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट’ (एफसीआरए) के तहत पंजीकरण करवाना होता है लेकिन हैरानी का विषय यह है कि यह फाउंडेशन इस अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत नहीं है। गौरतलब है कि मोदी सरकार बनने के बाद एफसीआरए के अंतर्गत पंजीकृत विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले 15000 विदेशी संगठनों के अनुमति पत्र रद्द कर गए दिये थे। लेकिन ’बिल एंड मेंलिंडा गेट्‌स फाउंडेशन’ पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी क्योंकि यह उस अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत ही नहीं था। वास्तव में यह संस्था ’फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट’ (फेमा) के तहत एक लाईजन कार्यालय यानी संपर्क कार्यालय के तौर पर काम करता है और इसलिए एफसीआरए के प्रावधानों से बचा रहा। ’फेमा’ के अंतर्गत किसी लाइजनिंग कार्यालय को काम करने की अनुमति देने का काम रिजर्व बैंक करता है लेकिन उसका नियमन और नियंत्रण करने का रिजर्व बैंक के पास कोई प्रावधान ही नहीं है।

निगरानी: - ’ग्लोबल जस्टिस नाउ’ नाम की इंग्लैंड से सचांलित एक संस्था की हालिया रिपोर्ट (जिसके आधार पर भारत सरकार ने ’बिल एंड मेंलिंडा गेट्‌स फाउंडेशन’ को निगरानी सूची पर रखा है), में कहा गया है कि फाउंडेशन अपने प्रभाव का प्रयोग कर खासतौर पर कृषि और दवा क्षेत्र में लगी बड़ी बहुराष्ट्रीय समूह के हित में नीतियां बनवाने के लिए संलग्न है। सार्वजनिक निजी साझेदारी को बढ़ावा देते हुए, यह फाउंडेशन (नींव) बड़ी दवा समूहों की भूमिका को औचित्य प्रदान कर रही है।

प्रकल्प: - ’बिल एंड मेंलिंडा गेट्‌स फाउंडेशन’ के मुख्य प्रकल्प हैं। जाक निम्नलिखित हैं-

  • ग्लोबल फंड टू फाइट एड्‌स
  • ट्‌यूबर क्लोसिस एंड मलेरिया
  • ग्लोबल एलांयस फॉर वेक्सीन एंड इम्युनाइजेशन जिनके बोर्ड में ’ इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ फार्मास्युटिकल मैन्युफैक्चरर्स’ की सदस्य कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हैं। प्रस्तुत प्रमुख कंपनिया, ग्लैक्सों स्मिथक्लाइन, मर्क नोवर्टिस, फाइजर आदि हैं।

टीके: -उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षो में हेपेटाइटस-बी, एच-1 बी, पोलियों के टीके समेंत बड़ी संख्या में नए टीकों को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया गया, जिन पर हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। पेंटावेलेंट नाम के एक नए टीके में पूर्व में प्रचलित डी. टी. पी त्रय के साथ अब दो और टीके हेपेटाइस-बी और एच-1 बी शामिल करते हुए नया राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम बनाया गया है। कहा जा रहा है कि नए टीकाकरण कार्यक्रम को देश में वैज्ञानिक अध्ययनों और ’नेशनल टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑफ इंडिया’ की सिफारिशों पर लागू किया गया है। गौरतलब है कि इस टीकाकरण को शुरू करवाने के लिए ’बिल एंड मेंलिंडा गेट्‌स फाउंडेशन’ ने प्रारंभ में वित्तीय सहयोग किया और अब राष्ट्रीय टीकाकरण में ये दोनों शामिल हो जाने के बाद इसका सारा भार भारत सरकार पर आ गया है।

भार: - गौरतलब है कि हर साल 2 करोड़ 50 लाख नवजात शिशुओं को ये टीके लगाए जाते हैं, जिन पर प्रति शिशु 525 रुपए खर्च हो रहे हैं। इससे पहले डीपीटी टीकाकरण में सरकार के मात्र 5 रुपए ही खर्च होते थे। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल और लैंसेट नाम के प्रतिष्ठित शोध ग्रंथों में प्रकाशित शोध पत्रों में यह दावा किया गया है कि हेपेटाइटिस- बी की भारत में दुष्प्रभाव की प्रवृति अत्यंत कम है और उसकी लागत को देखते हुए इस राष्ट्रीय टीकाकरण में शामिल किया जाना सही नहीं है। इंडियन पिडयाट्रिक्स नाम के मेडिकल जर्नल में हाल ही प्रकाशित एक शोध पत्र में यह कहा गया है कि हेपेटाइस-बी के संक्रमण के संदर्भ में यह टीका निष्प्रभावी है। फाउंडेशन और टीका बाजार के बीच संबंध इस बात से पता चलता है कि ’ग्लोबल अलायंस फॉर वेक्सीन एंड इम्युनाइजेशन’ जिसका वित्तीय पोषण फाउंडेशन करती है, ने देश में पेटावेलेंट नाम की टीके को शामिल करने के लिए 1650 लाख डॉलर की सहायता देना स्वीकार किया है और उसके द्वारा अगले पांच सालों के लिए 145 रुपए प्रति टीका दर से अनुदान दिया जाएगा और उसके बाद सारी लागत भारत सरकार को उठानी होगी।

प्रभावित: - हैरानी का विषय है कि एक ओर भारत सरकार का गृह मंत्रालय गेट्‌स फाउंडेशन देश की स्वास्थ्य नीतियों को निरंतर प्रभावित कर रही है। 11 मार्च 2016 को भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरों द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार ’बिल एंड मेंलिंडा गेट्‌स फाउंडेशन’ की सह अध्यक्ष भारत सरकार के स्वास्थ मंत्री से मिली और सरकार के टीकाकरण सहित अन्य कार्यक्रमों की प्रशंसा की ओर स्वास्थ्य मंत्री ने भी भारत सरकार के स्वास्थ्य क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों में मदद करने के लिए फाउंडेशन द्वारा किए गए कार्यो की प्रशंसा की। इस बैठक के कुछ ही दिनों बाद स्वास्थ्य मंत्री ने नए टीकाकरण कार्यक्रमों की घोषणा भी की है। गौरतलब है कि जिस टीकाकरण कार्यक्रम को भारत सरकार चला रही है, उसके बारे में सिफारिश ’नेशनल टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप ऑन इम्युनाइजेशन’ द्वारा की जाती है। प्रस्तुत समूह में ’गेट्‌स फाउंडेशन’ का दबदबा है और प्रस्तुत समूह पर सूचना के अधिकार के नियम लागू नहीं होते है।

उपसंहार: -कुल मिलाकर देश में टीकाकरण कार्यक्रम पर गेट्‌स फाउंडेशन हावी है और गेट्‌स फाउंडेशन की कार्य पद्धति में सभी बड़ी फार्मा समूह सीधे तौर पर संलग्न हैं अर्थात गेट्‌स फाउंडेशन से जुड़े हुए है। जाहिर है कि हमारे देश का टीकाकरण कार्यक्रम सरकार द्वारा कम और समूहों द्वारा अधिक संचालित हो रहा है। इस बाबत जिन वैज्ञानिक अध्ययनों की बात की जा रही है, उनके लिए धन प्रस्तुत समूहों द्वारा ही दिया जा रहा है। ऐसे में देश में कौन से टीके नहीं होने चाहिए और कौन से टीके होने चाहिए, यह देश की आवश्यकताओं के प्रभाव से ही निर्धारित हो रहा हैं।

- Published/Last Modified on: April 19, 2016