काला धन (Black Money Circulation in India - Measures to Curb - in Hindi) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना:- काला धन, जिसे अंग्रेजी में ’ब्लेक मनी’ कहा जाता है, ऐसा धन होता है, जो व्यावहरिक रूप से आयकर विभाग की नजर से छुपा हुआ होता है। इस धन का लेखा-जोखा सरकारी आँकड़ों में कहीं नहीं होता है। यह बड़े-बड़े व्यापारियों, राजनेताओं, अधिकारियों, माफियाओं एवं हवाला कारोबारियों का अघोषित धन होता है। काला धन किसी भी अर्थव्यवस्था के विकास में बाधक होता है, क्योंकि यह एक समान्तर अर्थव्यवस्था को जन्म देने में पूर्णत: सक्षम होता है। अपनी जिस आय पर कोई व्यक्ति समुचित आयकर का भुगतान नहीं करता है, उतना धन व्यक्ति का काला धन हो जाता है।

जनता:- ेसा लगता है कि काला धन भारतीय राजनीति का एक स्थायी चेहरा बन गया है। सरकारें बदल जाती हैं पर काले धन के मुददे पर उनका रूख वही रहता है। जांच कर रहे हैं। कानून बदलने की जरूरत है। यह बहुत जटिल मुददा है। यह सब जवाब सनते-सुनते जनता इसकी आदि हो चुकी है। अब जनता इस मुददे पर केवल वादे ही नहीं वरन ठोस कार्यवाई चाहती है। जबकि काले धन का मुददा एक बार फिर सुर्खियों में है। सरकार से जनता की इतनी अपेक्षा तो है ही कि वह भारतीय राजनीति के चेहरे से इस कालिख को मिटाने की दिशा में एक स्पष्ट कार्य योजना पेश करे।

समस्या:- इस तरह, काला धन वैध एवं अवैध दोनों प्रकार के आय स्त्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है। चूँकि आय के अधिकांश वैध स्त्रोत राज्य को ज्ञात होते हैं, अत: उन पर आयकर ले लिया जाता है, किन्तु अवैध रूत्रोतों से अर्जित आय का लेखा-जोखा रख पाना एवं उस पर कर लगाना सम्भव नहीं होता है। इसलिए काले धन का मुख्य स्त्रोत अवैध आय के स्त्रोत ही होते हैं। इस आय को छुपाने के लिए लोग ऐसे देशों का रूख करते हैं, जहाँ आय कर मुक्त हो। सिंगापुर, मॉरशिस, जर्मनी सहित स्विट्जरलैंड आदि ऐसे ही देशों के उदाहरण हैं। स्विस बैंकों में जब जब भारतीयों द्धारा काला धन छुपाये जाता हैे तब तब भर्त्सना होती रहती है। ’घर वापसी’ का मुददा सरकार की प्राथमिकता में आ गया है और काला धन वापसी तथा भ्रष्टाचार मिटाना उनकी प्राथमिकता में कहीं नहीं दिखाई दे रहा है। अगर सरकार जरा भी काले धन की समस्या के प्रति गंभीर होती तो वह कम से कम देश में काले धन की रोकथाम के लिए कुछ प्रयास करती। पर ऐसा नहीं हो रहा है। काला धन देश मेंं हो या विदेश में हमेंशा देश के लिए हानिकारक होता है। इसके अलावा देश काला धन हो तो मंहगाई बढ़ती है। देश का काला धन विदेश में जमा हो तो देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर प्रभावित होती है।

अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत के संदर्भ में काले धन से संबंधित एक रिर्पोट तैयार की है, जिसमें कहा गया है कि भारत में काले धन की समस्या देश एवं देश के बाहर की गैर कानूनी गतिविधयों का परिणाम है। एशिया की उभरती आर्थिक ताकत के रूप में भारत अहम् है लेकिन उसे काले धन के कारण देश के भीतर एवं बाहर गैर कानूनी गतिविधयों, मादक पदार्थों के कारोबार, संगठित अपराध, मानव तस्करी, नकली धन एवं अवैध धन वसुली जैसे कई प्रकार के आर्थिक एवं राजनीतिक खतरों का सामना करना पड़ेगा। विदेश में खाते:-इण्टरनेशनल ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) की रिर्पोट के अनुसार कुल 2699 खाते भारत से संबंधित है। इनमें 25 हजार करोड़ से अधिक की राशि जमा है। एक पूर्व बैंककर्मी से प्राप्त इस सूची में विश्वभर के लोगों के एक लाख से अधिक खातों की जानकारी थी। इनमें से अलग-अलग देशों से संबंधित खाते छांटे गए। कुल 203 देशों के नागरिकों के खाते पाए गए हैं।

गोपनीयता:- स्विस बैंकों में गोपनीयता-

1. अकाउण्ट खोलना- खाताधारक के नाम खाता खुलवाया जा सकता है।

  • खाताधारक की जगह किसी ऑफशोर कम्पनी का नाम हो सकता है।
  • खाताधारक को किसी निश्चत नम्बर की पहचान दी जा सकती है।

2. खाता प्रबन्धन - बैंक सीधे खाताधारक के पते पर पत्र-व्यवहार कर सकता है।

  • सभी पत्र बैंक में ही रखे जाते हैं। घर नहीं भेजे जाते।
  • खाताधारक सीधे मैनेजर से सम्पर्क में रह सकता है या फिर किसी प्रोक्सी के माध्यम से।

3. खाते तक पहुंच- खाताधारक अपने घर से खाते को ऑपरेट कर सकता है।

  • खाताधारक स्विट्जरलैण्ड जाकर बैंक से पैसा निकाल सकता है।
  • बैंककर्मी खाताधारक की जानकारी नहीं जुटा सकता क्योंकि खाते के साथ व्यक्तिगत जानकारी नहीं होती।

समाधान:- उक्त बातों के मद्देनजर देश के काले धन को सामने लाने के लिए अब तक सरकार द्धारा कई प्रयास किए गए हैं। देश की स्वतन्त्रता के साथ ही आयकर जाँच आयोग का गठन किया गया है। इसके लिए विमुद्रीकरण की नीति को व्यवहार में लाना लाभप्रद हो सकता है। विमुद्रीकारण का अर्थ है रूपये का पुनर्मुद्रण। जब अर्थव्यवस्था में काला धन बढ़ जाता है, तो इसे दूर करने के लिए सरकार द्धारा विमुद्रीकरण की नीति अपनाई जाती है। इसमें पुरानी मुद्रा के स्थान पर नई मुद्रा को प्रचलन में लाया जाता है। परिणामस्वरूप जिसके पास काला धन होता है, वह उसके बदले नई मुद्रा लेने का साहस नहीं कर पाता एवं काला धन स्वंय नष्ट हो जाता है। देश की स्वतन्त्रता के साथ ही आयकर जाँच आयोग का गठन किया गया, जिसकीे जाँच के फलस्वरूप र 48 करोड़ के काले धन का पता चला, जिसमें से र 30 करोड़ की कर वसूली संभव हो पाई। सन् 1951 में सरकार ने स्वैच्छिक प्रकृटीकरण योजना के द्धारा र 70.2 करोड़ के काले धन का पता लगाया, जिसमें से र 10.89 करोड़ की कर वसुली संभव हो पाई। इसी प्रकार सन् 1963 से लेकर सन् 1968 तक विभिन्न प्रकार की सरकारी योजनाओं के जरिए काले धन का पता लगाने का प्रयास किया गया, जिसमें आंशिक ही सफलता मिली। सन् 1997 में भी स्वैच्छिक आय प्रकृटीकरण योजना के तहत देश में स्थित र 33000 करोड़ के काले धन का पता लगाया था, जिसमें से र 10100 करोड़ की कर वसूली संभव हो पाई थी। सन् 1998 में रिसर्जेण्ट इण्डिया बॉण्ड के द्धारा र 400 करोड़ एकत्रित किए गए। संयुक्त राज्य अमेरिका अपने अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर काले धन को अपने देश में वापस लाने में सफल हुआ है। यदि भारत सरकार भी चाहे तो स्विस बैंक में जमा भारतीयों के काले धन को वापस ला सकती है। इस काले धन से देश की प्रगति की दर में काफी वृद्धि संभव है।

किन्तु राजनीतिक कारणों से सरकार ऐसा करने में अपने आप को असमर्थ बता रही है। इसका कारण यह भी है कि लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के शीर्षस्थ नेताओं के पास अकूत काला धन है। काले धन के साथ ऐसे अनेक सफेदपोश जुड़े हुए हैं, जिनके नाम यदि उजागर हो गए, तो सरकार के अस्थिर होने का खतरा है साथ ही जनता का विश्वास भी इन तथाकथित सफेदपोंशों के प्रति कमजोर होगा।

हाल ही में विदेशों में काले धन से जुड़े खातों की जानकारी सार्वजनिक नहीं करने को लेकर उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र सरकार को फटकार लगाई है। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यह केवल टैक्स चोरी का मामला नहीं है, बल्कि यह देश के साथ लूट का मामला भी है, इसलिए भारत सरकार को चाहिए कि वह काले धन से संबंधित विदेशी बैंक खातों को सार्वजनिक करे। हाल ही में जर्मनी ने उन पचास ऐसे लोगों की सूची भारत सरकार को सौंपी है जिनका काला धन वहाँ जमा है।

केन्द्रीय सूचना आयोग ने हाल में एक आदेश में कहा कि प्रवर्तन निदेशालय से देश यह जान सकता है कि इस तरह का कुल कितना धन है, जिसकी वह जाँच के तरीकों एवं इसके विभिन्न पक्षों का खुलासा नहीं करने की छूट होगी। भारत समेत दुनिया के कई देशों का काला धन स्विस बैंकों में जमा है। लगभग पूरी दुनिया की आलोचना के बाद स्विस बैंकों ने अब अपने नियमों में परिवर्तन करने का फैसला किया है। अब इनमें उन्ही परिसम्पतियों को रखा जाएगा। जिसका टैक्स चुका दिया गया हो। ऐसा काला धन जो विदेशी बैंकों में जमा है अथवा जो विदेशी कारोबारों में लगा है, उसके आँकड़े तो सही-सही मिल सकते हैं, किन्तु जिन लोगों के पास ये घर , जमीन, बैंक लॉकर्स या तिजोरियों में बन्द पड़ा है, उसका अनुमान लगाना बेहद मुश्किल है। उच्चतम न्यायालय से मिली फटकार के बाद केन्द्र सरकार काले धन की समस्या के समाधान के लिए 5 सूत्रीय कार्यक्रम पर कार्य कर रही है, जिसमें विभिन्न देशों के साथ दोहरा कराधान संधि प्रमुख है।

जिस तरह से उम्मीदवार के ऊपर चुनाव खर्च की सीमा होती है उसी तरह से राजनीतिक दलों के चुनाव खर्च की सीमा भी निश्चत की जानी चाहिए। कालेधन को समाप्त करने और भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए यह कदम यही है। सरकार को कम से कम ’पार्टिसिपेटरी नोट’ के माध्यम में भारत के स्टॉक मार्केट में निवेश करने पर पाबंदी लगा देना चाहिए। इसके माध्यम से भारत में काला धन वापस लाने का रास्ता मिल जाएगा। देश में निवेश करने वाले को अपना नाम, पता बताना जरूरी होगा इससे ’टैक्स हैवन्स’ देशों में पंजीकृत कंपनीयों का नाम-पता भी हमें अपने आप मिल जाएगा। ऐसा हाने पर हमारी अर्थव्यवस्था में काले धन के निवेश का बड़ा जरिया तो अपने आप ही बंद हो जाएगा। इसके साथ ही अभी हाल ही में सन् 2015 के आम बजट में वित मंत्री अरूण जेटली ने काले धन को लेकर बड़ा कदम उठाया है जिसमें अब अगर काला धन पकड़ा जाता है तो 7 से 10 साल कैद भी होगी। साथ में वेल्थ टैक्स को खत्म कर अच्छा काम किया है।

कानून:- विदेशी खातों में नजर रखने के लिए सरकार को अनिवार्य रूप से यह कानुन बनाना चाहिए कि जिन भी भारतीयों के विदेश में खाते हैं उनको इस बात की जानकारी सरकार को देनी होगी, अन्यथा उनके खिलाफ कानुनी कार्यवाही होगी। अगर ऐसा कानुन बन जाए तो सरकार अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन के तहत बैंकों से यह कह सकती है कि हमारे पास इन लोगों के बैंक खाते होने की जानकारी है। इन लोगों के अतिरिक्त जिन भी भारतीयों के खाते आपके बैंक में हैं वे सब अवैध हैं और गैर कानूनी हैं। इस तरह से विदेशी बैंक सभी भारतीय खाताधारकों के नाम बताने के लिए मजबूर हो जाएंगे।

सरकार की ओर से हालांकि जांच की शुरूआत कर दी गई है। पर जांच में और तेजी लानी होगी। सरकार के सामने नामों का खुलासा हुआ है और अब सरकार का काम यह है कि वह जल्द से जल्द बताए कि कितने खाते वैध और कितने अवैध हैं?

विचार:- नवनीत गुर्जर- आप एक लेखक है जो डीबी डिजिटल के नेशनल एडिटर हैं। इनके अनुसार कहा जाता है- हिंदुस्तान में हर काम तन, मन व धन से किया जाता है। बाते काले धन की जाए तो हम सबने देखा है-इस मामले में सरकार कोई भी हो, उसका तन ही उजला दिखता है। मन काला ही लगता है। धन तो है ही काला। क्या काग्रेस, क्या भाजपा। पहले कहा काला धन भारत आ गया तो हर घर पर सोने का छप्पर हो जाएगा! टब पता चला है कि जो 727 नाम सरकार ने कोर्ट को सौंपे हैं उनमें आधे एनआरआई हैं। यानी उन पर हमारा आयकर कानून लागू नहीं होता। अब बचे 313 या 314 खाते जो हेिदुस्तानियों के हैं, इनमें भी पता चला है कि किसी खाते में 18 करोड़ हैं तो किसी में 25 करोड़। आखिर यह काला धन एक परछाई की तरह है। काला धन भी किसी काया का मोहताज है। जब तक खाताधारक लिखकर नहीं देता कि यह पैसा हिंदुस्तानी सरकार को सौप दिया जाए बैंक पैसा नहीं देगा।

सबसे ज्यादा काला धन प्रॉपटी और सोना खरीदने में इस्तेमाल होता है। आखिर सोने की खरीदी चेक के जरिए अनिवार्य क्यों नहीं कर दी जाती? क्यों प्रॉपटी की असल कीमत और रजिस्ट्री कीमत में इतना ज्यादा फर्क होता है? और रजिस्ट्री कीमत के अलावा जो नकद पैसा चुकाया जाता है, वो आता कहां से है? अगर रजिस्ट्री कीमत औश्र असल कीमत बराबर हो जाए तो शायद प्रॉपटी की आसमान छूती कीमतें भी नीचे आ जाएगी और अपने घर के मोहताज कई लोगों का सपना पूरा हो जाएगा।

उपसंहार:- यदि आपराधिक प्रवृति के लोगों को कहीं भी निर्वाचित न किया जाए, तो भी काले धन को काफी हद तक बाहर लाया जा सकता है। इसके साथ-साथ काले धन पर नियन्त्रण के लिए करो की वसुली भी सही ढंग से की जा सकेगी। एक अनुमान के अनसार कर बचाने के लिए लगभग र 71 लाख करोड़ रूपये विभिन्न विदेशी बैंको में जमा हैं। यह राशि भारत के जी.डी.पी. (सकल घरेलू उत्पाद) से भी अधिक है। इतने धन से भारत का रक्षा बजट लगभग 49 गुना बढ़ सकता है एवं मनरेगा के लिए आने वाले लगभग 117 सालों का खर्च निकल सकता है। इसलिए देश की प्रगति एवं जनता के कल्याण के लिए काले धन को बाहर लाना अत्यन्त आवश्यक है।

- Published/Last Modified on: July 23, 2015