ब्रिटेन में जनतम संग्रह का कारण भाग-2 (Cause of the Collection in the Britain Part - 2 in Hindi ) (Download PDF)

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प्रस्तावना:- ब्रिटिश मतदाताओं ने ईयू से बाहर होने का फैसला सुनाकार सरकार, यूरोपीय संघ और बाजार को जोरदार झटका दिया है। जनमत संग्रह के बाद ब्रिटेन सीधे-सीधे दो भागों में विभाजित हो गया हैं। 1975 में ब्रिटेन की तस्वीर इससे एकदम उलट थीं। उस समय इंग्लैंड के केवल 31.5 प्रतिशत ईयू के खिलाफ थे। वेल्स के 52 प्रतिशत मत इस बार ईयू को छोड़ने के पक्ष में हैं, जो 1975 में मात्र 35 प्रतिशत ही थे। 40 वर्षों में इंग्लैंड और वेल्स के रुख में काफी बड़ा बदलाव आया है। ब्रेग्जिट से ईयू तक के टूटने का खतरा है। ईयू नहीं तो कम से कम ईए (यूरोपीए क्षेत्र) और यूरों को तो खतरा हो ही जाएगा। ब्रेग्जिट से वैश्विक संकट मंडराता दिख रहा है, जो कि 1990 के बाद से एक आंदोलन बन गया था। आज अर्थ से अधिक आव्रजन का मुद्दा वैश्वीकरण के लिए नुकसानदायक साबित होगा। ब्रेग्जिट दुनिया को पहली चेतावनी हैं … .

प्रमुख कारण जर्मनी:-

  • द्धितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के देशों में राष्ट्रीयता की तीव्र बयार बह रही थी। ऐसे हालात में 1950 के दशक की शुरुआत में यूरोपीय संघ का गठन हुआ। तब से लेकर अब तक का सफर इस संगठन के लिए बहुत आसान नहीं रहा है। जहां तक ब्रिटेन का सवाल है तो, वहां इस यूरोपीय संघ परियोजना को लेकर बेचैनी भी उतनी ही पुरानी थी जितना कि यह संगठन है। लेकिन, अब ब्रसेल्स के शक्तिशाली स्तर के बाद से अन्य 27 देशों में भी असंतोष बढ़ने लगा है। खासतौर पर ग्रीस और पुर्तगाल पर अप्रवास संबंधी भारी-भरकम नीतियां लादने के बाद से इसमें और बढ़ोतरी हुई है। ऐसा संदेश भी जाने लगा कि यूरोपीय संघ को जर्मनी नियंत्रित करने लगा हैं जो उनके कानूनों और संप्रभुता को समाप्त कर रहा है लेकिन, इस जनमत संग्रह का व्यापक अर्थ यदि समझे तो यह समझ में नहीं आता कि अगर ब्रिटेन यूरोप के साथ नहीं तो यह क्या है? जर्मनी के बढ़ते जा रहे दबदबे से घबराया हुआ था ब्रिटेन इसलिए वहां जनमत संग्रह हुआ था।

अन्य कारण:-

  • यद्यपि ईयू को हां या ना कहना केवल आर्थिक संघ या आर्थिक मुद्दों का प्रश्न था पर एक वास्तविक मसला आव्रजन का भी था जो आर्थिक दृष्टिकोण से अधिक व्यापक है। जाने माने डिजीटल (गणित) मीडिया (संचार माध्यम) , वॉक्स मीडिया के अनुसार जनमत संग्रह में सात अहम कारणों को शामिल किया गया।
  • ईयू से ब्रिटेन की अखंडता को खतरा है।
  • यह यूके पर अनावयश्यक नियमों का भार लाद रहा हैं।
  • ईयू केवल व्यापारिक हित साधे रहता हैं।
  • मूलभूत सुधारों पर ध्यान नहीं है।
  • ईयू अच्छा है पर यूरो किसी मुसीबत से कम नहीं है।
  • ईयू बड़ी संख्या में आव्रजन की अनुमति देता हैं।
  • ईयू से बाहर ब्रिटेन एक समानुपातिक तौर पर ही आव्रजन की अनुमति देता हैं।

देखने में भले ही प्रस्तुत सातों तर्क अलग-अलग दिखे पर ये कहीं न कहीं ब्रितानियों की संवदेनशीलता से जुड़े हुए हैं।

वॉक्स मीडिया (संचार माध्यम) :-

  • के अनुसार 2015 में ब्रिटेन में 333,000 नए लोग समाहित हो गए। वॉक्स के अनुसार अमरीका और अन्य देशों की तरह अब ब्रिटेन में भी आव्रजन राजनीतिक मुद्द बन गया है। राजनीतिक दलों ने आव्रजन के खिलाफ यह कहते हुए अभियान छेड़ रखा है कि दक्षिण पंर्वी यूरोप से यहां आकर बसे आव्रजकों के कारण ब्रिटिश कामगारों के वेतन में भारी कटौती हुई है। कुछ मतदाताओं को इन अप्रवासी आव्रजकों के देश की सीमित सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग करने पर भी आपत्ति है।

राज्यपाल:-

  • जनमत संग्रह से ठीक पहले इंग्लैंड के बैंक गर्वनर मार्क कार्ने ने कहा था कि ‘ब्रेग्जिट हमारी वित्तीय स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा है।’ जनमत संग्रह के तुरंत बाद कार्ने का कहा सही साबित हुआ। ब्रिटेन को वित्तीय समस्याओं का समाना करना पड़ा। बाजार आज हिले तो कल संभल जाएंगे। पर ब्रेग्जिट के झटके से उबरने में यूरोप और दुनिया को समय लगेगा। ब्रेग्जिट से ईयू तक के टूटने का खतरा है। यदि ट्रंप अमरीका में चनाव जीतते हैं और जापान सैन्यकरण का संविधान संशोधन पारित कर देता है तो भारत एकमात्र ऐसा देश होगा, जिसकी भूमिका दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण होगी। तब दुनिया के देश वर्तमान वैश्वीकरण दर्शन और अमरीका व यूरोप द्वारा थोपी गई जीवनशैली को चुनौती देते नजर आएंगे।

ग्रेग्जिट:-

  • इससे पहले फरवरी 2012 में अर्थशास्त्रियों के दो समूहों ने ग्रीस के यूरोपीय संघ से बाहर होने की संभावना के लिए ‘ग्रेग्जिट’ शब्द का इस्तेमाल किया था।

साझी मुद्रा:-

  • यूरोपीय संघ 28 देशों का समूह है। यूरोपीय क्षेत्र (ईए) इस संघ का उपसंघ है। ईयू के ही 28 देशों में से 19 इसके सदस्य हैं। इन देशों की मुद्रा यूरो हैं। ब्रिटेन समेत 9 देशों की मुद्रा अलग हैं।

ब्रिटेन की विशेषताएं निम्न हैं-

  • व्यापारिक क्षेत्र:- दुनिया के आयात निर्यात का 16 फीसदी व्यापार यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच होता आया है। अमरीका को पीछे छोड़ते हुए यह विश्व का सबसे बड़ा व्यापारिक क्षेत्र बन चुका है। खुद ब्रिटेन का बड़ा निर्यात यूरोपीय संघ के देशों से होता हैं।
  • नोबल पुरस्कार:- 2012 में ईयू को यूरोप में शांति, लोकतंत्र व मानवाधिकार के लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था। दशकों संघर्ष के बाद ईयू का मौजूदा स्वरूप 1992 में अस्तित्व में आया हैं।
  • योगदान:- ब्रिटेन ने ईयू के गठन के समय 19 अरब डॉलर का योगदान दिया था। ब्रेग्जिट के पक्षधर कहते हैं कि यह पैसा वापस ब्रिटेन को मिले। ब्रेग्जिट पर फोकस करते समय किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।

दूसरी बार जनमत संग्रह:-

  • सभा दल के शासन में ब्रिटेन ने 1973 में ईयू की सदस्यता ली। पर 1974 के संसदीय चुनाव के बाद जीती मजदूर दल ने इस बात पर जनमत संग्रह का वादा किया कि ब्रिटेन ईयू का सदस्य रहेगा या नहीं। 1975 के जनमत संग्रह में 67 फीसदी ब्रितानियों ने ईयू में बने रहने के पक्ष में मतदान किया। सवाल यह है कि जब 1975 में ही ब्रिटेन ने ईयू में बने रहने का फैसला कर लिया था तो 2016 में यह नया जनमत संग्रह कराने की जरूरत क्यों पड़ी? इस बार सभा दल ने जनमत संग्रह कराने का वादा किया था। वर्ष 2013 में सभा दल के प्रधानमंत्री डेविड कैमरान ने इस मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने का समर्थन किया और कहा था कि अगर 2015 के चुनावों में दल सत्ता में आती है तो वर्ष 2017 से पहले देश में इस पर मतदान कराया जाएगा।

भविष्य:-

  • ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ छोड़ना तय कर लिया है तो अब, संघ छोड़ने पर मत करने वालों के दावे कसौटी पर होंगे। इस देश में अचनाक सब कुछ अच्छा हो जाएगा और संभावनाएं जताने वालों की बातें हकीकत में तब्दील हो जाएगी। शायद किसी को नहीं पता की भविष्य में क्या लिखा हुआ है। क्योंकि अब तक इस जनमत संग्रह के परिणाम से आशा से अधिक निराशा ही हाथ लगी हैं। खास तौर से यूरोपीय संघ से अलग होकर ब्रिटेन का भारत के साथ संबंध किस तरह से आगे बढेंगा। इस पर विचार होना अभी बाकी हैं।

औपचारिकता:-

  • डेविड कैमरन का कहना हैं कि ′ उन्होंने सरकार के कामकाज को 2010 नजदीकी से देख रहे थे, उनके लिए केवल तार्किक परिणति की तरह जैसा ही है। जनमत संग्रह के मतदान पत्र पर ′ छोड़े देन या लीव ′ का विकल्प दोहरे अर्थ के समान था। यह तो केवल उन लोगों के लिए झटका था जो ′ रिमेन ′ यानी यूरोपीय संघ के साथ रहने के पक्ष में मत को केवल मुहर लगने की औपचारिकता भर मानकर चल रहे थे।

राष्ट्रीय स्तर:-

  • अब राष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चता की स्थिति जरूर है। यूरोपीय संघ का समर्थक स्कॉटलैंड अगले जनमत संग्रह में ब्रिटेन से अलग होने का फैसला करेगा? क्या अब उत्तरी आयरलैंड और आयरलैंड गणराज्य के साथ स्कॉटलैंड और इंग्लैंड के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमाएं होगी? यूरोपीय संघ परियोजना के भविष्य पर भी संदेह के बादल गहराने लगे हैं। सदस्य देशों को राजनीतिक और आर्थिक गठजोड़ हकीकत में सदस्य देशों में पसंद नहीं किया जा रहा हैं। उदाहरण के तौर पर ग्रीस व पुर्तगाल पर ब्रसेल्स द्वारा लगाए गई आर्थिक पाबंदियां किसी को पंसद नहीं है। वहीं दूसरी ओर, यूरोपीय संघ के कुछ सदस्य देशों में तो ब्रिटेन की तरह ही जनमत संग्रह की बातें भी होने लगी हैं। यूरापीय संसद के लिए 73 सदस्य चुने जाते हें। यूरोपीय संघ के इतिहास से ही इस राजनीतिक-आर्थिक गठजोड़ में ब्रिटेन इतना उलझकर रह गया था कि जनता का सारा ध्यान इसी पर लगा रहता था। इसलिए इस जनमत संग्रह का शुक्रिया करना चाहिए, जिसमें जनता के द्वारा फैसला होता हैं।

विभाजन:-

  • ब्रिटेन के मत विभाजन के अलावा उसका भौगोलिक विभाजन भी चिंतत करने वाला है। एक ओर जहां इंग्लैंड और वेल्स ईयू के विरोध में थे वही दूसरी आरे स्कॉटलैंड और आयरलैंड उसके पक्ष में थे। ब्रिटेन का यह भौगोलिक विभाजन इसके राजनीतिक विभाजन की जोखिम पैदा करता है।

बंंटा देश:-

  • यूरोपीय संघ में रहने और न रहने को लेकर देश दो हिस्सों में बंट गया है। जिसका अंजाम लेबर पार्टी के सांसद जो कॉक्स की हत्या के तौर पर देखने को मिला। इस मुद्दे पर मतदान के तनावपूर्ण माहौल से देश के संस्थानों, राजनीतिक दल, परिवार आदि सभी दो हिस्सों में बंट गये हैं। इस जनमत संग्रह के नतीजे का सूक्ष्मता से आकलन करें तो दो तस्वीरें सामने हैं।
  • एक तो अंतरराष्ट्रीय स्तर फेले ब्रिटेन के ऐतिहासिक साम्राज्य की है, जो दर्शाती हे कि वह खुद का क्या भविष्य देखता है?
  • दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर वित्तीय और औद्योगिक क्षेत्र में इस फेसले के असर की।

लंदन:-

  • विश्व में लंदन को वित्त जगत की राजधानी माना जाता है तो इस स्थिति को बनाए रखना उसके लिए बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा ब्रिटेन का 45 फीसदी निर्यात यूरोपीय संघ के देशों को होता हैं। नए देशों के साथ नए सबंधोंं की परिस्थिति में वस्तुओं के कर मुक्त परिवहन की अनुमति लंबे समय नहीं चलेगी, जो अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर डालेगी।

भारत:-

  • जहां तक नई दिल्ली से संबंधों का प्रश्न है तो भारत के यूरोपीय संघ से नजदीकी रिश्तों में समस्याएं जरूर आएंगी। भारत की 800 से अधिक जनमसूहों ब्रिटेन में रहकर यूरोपीय संघ में कारोबार करती रही हैं। इनमें से कईयों ने अन्य यूरोपीय देशों की राजधाानियों में जाने के संकेत दिए हैं। यूरोपीय संघ छोड़ने के पक्षधरों का दावा रहा है कि अलग होने के बाद ब्रिटेन के साथ भारत के संबंध और अधिक प्रागाढ़ होंगे। इन लोगों का यह वादा भी रहा है कि भारत और अन्य राष्ट्रमंडल देशों के लोगों के लिए बेहतर वीजा नियम बनाए जा सकेंगे।

कहावत:-

  • वर्तमान हालात में 16वीं सदी के जॉन डन की उस कहावत की तरफ ध्यान खींचा है जिसमें वे कहा करते थे, ‘नो मैन इज एन आईलैंड’ यानी अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता है। व्यक्ति परस्पर किसी न किसी पर निर्भर होता ही हैं। अब लोगों को ब्रिटेन के पीछे ग्रेट लिखने में हिचकिचाहट होगी क्योंकि जनमत संग्रह ने इसे वैश्वीकरण के दौर में ‘नन्हा इंग्लैंड’ बना दिया है।

उपसंहार:-

  • एतिहासिक तौर पर ब्रिटेन यूरोप में भौगालिक मानचित्र भर ही नहीं है बल्कि वह पश्चिम का मुख है, उसका विचार और उसका दर्शन है। वह यूरोप में विशिष्ट गौर वर्णी नस्लीय सम्राज्य का केंद्र है। इस जनमत संग्रह के गूढ़ अर्थो का समझना बेहद जरूरी है। यदि इसके परिणाम का अर्थ निकाले तो हम समझ पाएंगे। ब्रिटेन द्वारा यूरोपीय संघ छोड़ने के विकल्प का चुनाव करने के व्यापक असर होंगे। यह फैसला न केवल यूरोपीय संघ परियोजना के लिए बल्कि 1945 दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पश्चिम के उदारवादी सिद्धांतों के लिए भी नई चुनौती पेश करने वाला हैं। अब इस जनमत संग्रह के बाद ओर क्या-क्या फायदे व नुकसान होंगे यह तो आने वाला वक्त ही बतायेंगा।

- Published/Last Modified on: July 6, 2016

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