म्ांत्रियो की मौत व बीमारी के विषय में रहस्य और विवाद (Download PDF)

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प्रस्तावना:- कालजयी उपन्यास ’चंद्रकांता संतति’ की पटकथा के समान सियासी दांव-पेचों में रहस्य और रोमांच परत-दर-परत उलझता जाता है। नेताओं के रोग व मौत को छिपाने तथा उजागर करने के पीछे एक पूरी कवायद होती है। इतिहास गवाह है कि बड़े नेता की मौत से किसी को फायदा तो किसी को नुकसान होता है। हाल ही में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की मौत पर भी कई सवाल उठ रहे हैं। वैसे सवाल जो पूर्व में भी देश के बड़े नेताओं की मौत के बाद उठे चुके थे। भारत ही नहीं दुनिया भर में बड़े नेताओं की मौत से जुड़े कई ऐसे राज़ होते हैं जो उनके साथ ही दफन हो जाते हैं।

राजनीति:- राजनीति और युद्ध दोनों ही लगभग समान रूप से दिलचस्प होती हैं। लेकिन ये दिलचस्प होने के साथ-साथ घातक भी साबित होती है। मेरा अनुभव है कि युद्ध में तो आप एक बार ही मारे जाते हैं, लेकिन राजनीति में आपको एक बार नहीं कई-कई बार मरना पड़ता है। इसलिए राजनीति युद्ध से भी ज्यादा खतरनाक होती है।

                                                                                                                                                   विंस्टन चर्चिल, पूर्व प्रधानमंत्री, ब्रिटेन

बीमारी:-

  • भारतीय राजनीति में कई नेताओं की असमय मौत और बीमारी को लेकर कोहरा छाया रहता है। इन मौतो पर चर्चाओं का दौर चलता रहता है, लेकिन इनके कारणों पर राजनीतिक दल और नौकरशाही ज्यादातर चुप्पी ही साधे रहती है। कई नेताओं की मौत आज भी पहेली ही बनी हुई है। एक सिरा मिलता है तो दूसरा नदाराद हो जाता है।
  • जे. जयललिता:- क्षत्रापों की कतार में समकालीन भारतीय राजनीति में बड़े कद जयललिता के बारे में कहा जाता है कि उन्हें पूर्व में भी धीमा जहर देकर मारने का षडयंत्र रचा गया था। अभिनेत्री गौतमी ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जयललिता की बीमारी और मौत के बारे में विस्तृत जांच की मांग उठाई है।
  • जयललिता का जन्म 24.02.1848 हुआ था और मृत्यु 5.12.2016 हुई। जे. जयललिता 75 दिन अस्पताल में रही। उनको बुखार और निर्जलीकरण की शिकायत थी। फिर करीब दस दिन बाद फेफड़ों में संक्रमण की बात कही गई। श्वसन रोग की भी बात सामने आई। कहा जाता है कि जे. जयललिता मधुमेह से ग्रस्त थी। उसकी भी आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं की गई। ब्रिटेन के डॉ. रिचर्ड बीले ने एम्स और अपोलो के विशेषज्ञों के साथ मिलकर उनका इलाज किया था। निधन से कुछ दिन पहले अपोलो अस्पताल के चेयरमैन (सभापति) डॉ. प्रताप सी. रेड्‌डी ने जया को पूरी तरह स्वस्थ और घर लौटने लायक बताया था। इस बीच 4 दिसंबर को उनको दिल का दौरा पड़ा और अगले दिन मृत्यु हो गई। उनके समर्थकों को जिंदगी भर इस बात का मलाल रहेगा कि वे इन 75 दिनों में जयललिता की जीवित झलक नहीं देख पाए। सोशल मीडिया (समास संचार माध्यम) में इस दौरान कई बार इलाजरत जयललिता की फर्जी तस्वीरें जारी हुई तो कई दफा उनको मृत घोषित कर दिया गया था। बीच-बीच में अपोलो अस्पताल बुलेटिन जारी कर वेंटीलेटर पर होने की बात कहता। जनता भी दबी आवाज में कुछ ऐसे ही संदेहास्पद सवाल उठा रही है। उनकी राय है कि अब तो अपोलो अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज जारी किए जा सकते हैं। सरकार ऐसा क्यों नहीं कर रही? तिरुन्नलवेली के एक युवक ने आरटीआई में अस्पताल में जया के इलाज के निधन को लेकर की गई घोषणाओं समेत दो दर्जन सवाल के जवाब मांगे हैं। अपोलो के चिकित्सकों ने दो पूर्व इलाजरत जयललिता के साथ बिताएं पलों के अनुभव बांटे।

भारत देश के अन्य मंत्री:-

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की सेहत को लेकर भी कयासबाजियों का दौर चलता रहता है। जनता केवल सरकार या संबंधित राजनीतिक पार्टियों (दलो) की ओर से जारी होने वाले मेडिकल (चिकित्सा शास्त्र संबंधित) बुलेटिनों पर ही निर्भर रहती है।

अटलबिहारी वाजपेयी- पूर्व प्रधानमंत्री पिछले कुछ वर्षों से सार्वजनिक जीवन से दूर हैं। वर्ष 2009 में उन्हें स्ट्रोक (आघात/पक्षाघात) आया था। उसके बाद से ही वाजपेयी नई दिल्ली के कृष्णामेनन मार्ग स्थित अपने बंगले में ही समय गुजार रहे हैं। वर्ष 2014 में वाजपेयी से मिलने वाले पत्रकार अक्षय मुकुल का कहना है कि स्ट्रोक के बाद से पूर्व प्रधानमंत्री शारीरिक रूप से अक्षम हो गए हैं। पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ही उनके नियमित मिलने वालों में हैं। मार्च, 2015 में वाजपेयी को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भारत रत्न से सम्मानित किया था। तब भी सरकार की ओर से जारी आधिकारिक फोटो में वाजपेयी का चेहरा पूरी तरह से नहीं दिखाई पड़ रहा था।

सोनिया गांधी-वर्ष 2011 में अमरीका में सोनिया गांधी की सर्जरी (शल्य चिकित्सक) के बारे में नहीं बताया गया कि उन्हें क्या बीमारी थी अथवा उनकी अमरीका के किस शहर में सर्जरी की गई थी। वर्ष 2013 में सोनिया पुन: अमरीका में उपचार के लिए गईं। पार्टी (दल) ने इसे रूटीन चेकअप (नियमित जाँच) बताया था। 26 अगस्त, 2011 में भी सोनिया संसद सत्र के दौरान अस्वस्थ हो गई थीं। हाल ही में उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान उनका कंधा भी फ्रेक्चर हो गया था। 29 नवंबर को भी उन्हें वायरल के कारण नई दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।

कलिखो पुल:- जन्म 20.7.1969 व मृत्यु 9.8.2016 को हुई। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री कलिखों पुल ने फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अरुणाचल प्रदेश में उस दौरान जबरदस्त सियासी उथलपुथल चल रह थी। सुप्रीम कोर्ट (उच्च न्यायालय) ने घटना से एक महीने पहले ही कलिखो पुल को पद से हटा कर पूर्ववर्ती नबाम तुकी को पद संभालने के आदेश दिए थे। प्रारंभिंक रिपोर्ट (विवरण) के अनुसार कलिखो पुल ने कोई सुसाइड (आत्महत्या) नोट (लिख देना) भी नहीं छोड़ा था। बाद में पुलिस ने सुसाइड नोट मिलने के बारे में बताया लेकिन इसकी डिटेल (विस्तार) नहीं बताई।

वाईएसआर रेड्‌डी- जन्म 8.7.1949 व मृत्यु 2.9.2009 को हुई। आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्‌डी का बेल 430 हेलीकॉप्टर 2 सितंबर, 2009 को बेगमपेट एयर ट्रेफिक कंट्रोल (हवाई, श्रेष्ठ, नियंत्रण) से ओझल हो गया था। उनका हेलीकॉप्टर नालामाला के जंगलों में मिला। रेड्‌डी की मौत में नक्सल हाथ होने की आशंका जताई गई जांच में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने इन सभी को खारिज कर दिया। जांच में सामने आया कि हेलीकॉप्टर का ऑयल प्रेशर (तेल दबाव) कम हो गया था। लेकिन एयर ट्रैफिक कंट्रोल के पास हेलीकॉप्टर के पायलट ने ऐसा कोई इमरजेंसी (आपातकालीन) संदेश नहीं दिया था।

विदेशी मंत्री:-

देश ही नहीं विदेश में भी कुछ नेता है जिनकी असमय मौत की गुत्थी नहीं सुलझ पाई है जो निम्न हैं-

  • अब्राहम लिंकन:- इनका जन्म 12.2.1809 को हुआ व मृत्यु 15.4.1865 हुई। 14 अप्रेल 1865 में अमरीका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को वॉशिंगटन के ’फोर्ड थिएटर’ (रंगशाला) में हमलावर जॉन विल्किस बूथ ने गोली मार दी। अगले दिन लिंकन की मौत हो गई। बूथ को 12 दिन बाद अमरीकी सैनिकों ने वर्जीनिया में एक मुठभेड़ में मार गिराया। लेकिन लिंकन की हत्या का राज आज तक बना है।
  • एडोल्फ हिटलर- जन्म 20.4.1889 को हुआ व मृत्यु 30.4.1945 को हुई। जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर की दव्तीय विश्व युद्ध के दौरान मौत को लेकर आज भी रहस्य बना हुआ है। सोवियत सेनाओं से खुद को घिरा पाकर हिटलर ने खुद को गोली मार ली थी। कुछ के अनुसार हिटलर ने सानाइड का कैप्सूल खा लिया था। खोपड़ी और बेड़े से ही हिटलर की पहचान हो पाई थी।
  • जिया उल-हक- जन्म 12.8.1924 को हुआ व मृत्यु 17.8.1988 को हुई। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल लिया-उल-हक का विमान इस्लामाबाद लौटते समय क्रैश (चकनाचूर) हो गया। जिया समेत अन्य उच्चाधिकारियों की मौत हो गई। अमरीकी जांच अधिकारियों ने हादसे का कारण तकनीकी खामी बताया जबकि पाक जांचकर्ताओं ने विमान की केबल काटना पाया था। जिया के बेटे ने भी सैन्य अफसरों पर शक जताया था।
  • प्रोफाइल (पार्श्वदृश्य):- जिन हाई (उच्च स्तर पर) प्रोफाइल शख्सियतों के मरने के बाद उनकी मौत को लेकर जो किस्से और कहानियां प्रचारित होती हैं, उनके पीछे किसी न किसी का मकसद अपना हित साधना होता है। भारत में खासतौर पर जिन भी राजनेताओं, मसलन, सुभाष चंद्र बोस या दीनदयाल उपाध्याय की मौत रहस्य बन गई या बना दी गई, उनके नाम का इस्तेमाल राजनीति साधने के लिए होता रहा है। कुछ नेता जैसे प्रियरंजन दास मुंशी, जॉर्ज फर्नांडीज़ और अटल बिहारी वाजपेयी केवल मशीन के कारण जिंदा हैं, उनकी भी वास्तविकता नहीं बताई जाती। पर एक बात तो तय है कि उन्हीं नेताओं अभिनेताओं या अन्य लोकप्रिय किरदारों की अचानक मौत के पीछे साजिश की कहानियां प्रचारित होती है, जो जनमानस को बहुत अजीज होते है। या फिर किसी बड़े शख्स पर कोई गंभीर इल्जाम है और ऐसी स्थिति में उनका निधन हो जाता है तो ऐसे प्रश्न उठते हैं। ये केवल हमारे देश में ही नहीं है। अमरीका में जब जॉन एफ कैनेडी का निधन हुआ तो एक लंबे समय तक कमीशन (आयोग) जांच के लिए बैठा। पर आज तक उस कमीशन के दावे पर बहुसंख्यक अमरीकी लोग यकीन नहीं करते हैं। भारत में जहां तक सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमयी निधन का सवाल है तो हैरानी की बात यह है कि बंगाल को छोड़कर अन्य राज्यों में यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं है। हालांकि उनकी मौत को लेकर जितनी कहानियां गढ़ी गई या तथ्य रखे गए।
  • राजनेता:- हमारे देश में राजनेता इसलिए भी अपनी बीमारी का खुलासा नहीं करते क्योंकि उन्हें अपनी पार्टीं (दल) और विरासत के नुकसान का डर रहता है। सोनिया गांधी जब अमरीका के एक अस्पताल में इलाज के लिए जाती हैं तो उनकी बीमारी का खुलासा नहीं किया जाता। हाल ही में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को किडनी (गुरदा) फेल होने पर अस्पताल भर्ती कराया गया। हमें यह अचानक हुई बीमारी लगती है पर वे काफी समय से इस समस्या से गुजर रहे होते हैं।
  • मत बैंक:- राजनीतिक दल मत बैक को कायम रखने के लिए भी ऐसा करते हैं। समर्थकों को भरोसा रहता है कि उनके नेता सक्रिय हैं और स्वस्थ हैं। इसके पीछे वजह परिवारवाद और संरक्षणवाद की राजनीति है। राजीव गांधी का जिस बस धमाके में निधन हुआ, उसके बारे में कहा जाता है कि सुरक्षा में चूूक जानबूझकर की गई थी। यानी इन नेताओं के बारे में कभी स्पष्ट स्थिति राजनीति में नहीं बताई जाती है बल्कि उसका जब-तक लाभ ही उठाया जाता है।
  • राजनेताओं की मौत की कहानियों को दोहराया जाता रहा है। यह प्रवृत्ति भारत में बन गई है। अहम बात यह है कि चाहे राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार, लोगों को शक रहता है कि वे सुभाष चंद्र बोस जैसे मामलों मेे सच न बताएंगे और न ही सामने आने देंगे।

                                                                                                                           प्रो. कमल मित्र चिनॉय, राजनीतिक विश्लेषक

उपसंहार:-आखिर कब तक इस तरह मंत्रियो की मौत व बीमारी के बारे मेें जनता से छुपाया जाएगा? क्योंकि जनता को पूरा हक है कि उनके दव्ारा चुने गए मंत्री स्वस्थ हैं या नहीं, इसके अलावा मंत्रियों के मौत का सही कारण सबको बताना चाहिए, पर ऐसा होता नहीं है क्योंकि सब लोगों को चाहे मंत्री हो या कोई ओर सबको अपने फायदे व नुकसान के बारे चिंता रहती हैं।

- Published/Last Modified on: January 10, 2017

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