खोज (Discovery - in Hindi) (Download PDF)

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जीरो की खोज: -हम सभी जानते हैं कि ’जीरो’ की खोज भारत ने की थी। अब इस पर पश्चिम ने भी मुहर लगा दी है। जीरो के इस्तेमाल के बारे में पहली बार कार्बन डेटिंग के जरिए पता लगाया गया है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने एक भारतीय किताब में दर्ज कार्बन डेटिंग से साबित किया है कि तीसरी या चौथी सदी की शुरुआत में ही इसकी खोज हो गई थी। इतिहासकारों को मानना था कि भारत जीरो का इस्तेमाल 5वीं सदी से शरू हुआ था।

बखशाली प्रतिलिपियों में यह रिकॉर्ड (प्रमाण) दर्ज है कि जीरो का उस दौर में बखूबी इस्तेमाल होता था। यह प्रतिलिपि 1881 में पेशावर में बखशाली गांव के पास मिली, जो 1902 से बोडलियन लाइब्रेरी (पुस्तकालय) ऑफ (के) ऑक्सफोर्ड (एक प्रकार का जूता) में रखी गई थी। यह साक्ष्य लंदन साइंस (विज्ञान) म्यूजियम (संग्रहालय) में चार अक्टूबर को ’प्रकाशित भारत: 5000 साल का विज्ञान’ आयोजन में प्रदर्शित होगा।

अंटार्कटिका: - भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानियों को एक बड़ी कामयाबी मिली है। उन्होंने अंटार्कटिका के दक्षिण गोलार्द्ध में पेंग्वन (एक प्रकार का समुद्री बगुला) (एडली) के करीब 800 घोंसलो वाली एक नई ब्रीडिंग (अभिजाति) कॉलोनी (बस्ती) का पता लगाया है। हालांकि इस खोज में चीन व रूस के वैज्ञानिक भी लगे हुए थे, लेकिन इसका पता लगाने में वे नाकाम रहे।

वैज्ञानिकों का आनुमान है कि दुनियाभर में बढ़ते ग्लोबल (विश्वव्यापी) वार्मिंग (गरमाहट) के प्रभाव के चलते पेंग्विन अपने स्थान में बदलाव कर रहे हैं। इसके अलावा एक साथ तेज बर्फबारी होने से पक्षियों के 20 प्रतिशत अंडे भी खराब होते जा रहे हैं। इसे भी जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा प्रभाव माना जा रहा है।

अंटार्कटिका के दक्षिणी गोलाद्ध में स्थित लारसिमान हिल्स (पर्वत) और शिरमाकर ओयसिस में भारतीय रिसर्च (अनुसंसाधन) स्टेशन (स्थान) मौजूद हैं। यहां भारतीय वन्य जीव संस्थान के जीवन विज्ञानी स्नो (हिमपात) पेट्रल (तूफानी पितरेल), स्टॉर्म (आंधी) पेट्रल (तूफानी पितरेल), साउथ (दक्षिण) पोलर (ध्रुवीय) सकुआ और पेंग्विन एडली पर काम कर रहे हैं। इस क्षेत्र में चीन और रूस ने भी अपना रिसर्च (अनुसंसाधन) स्टेशन (स्थान) बना रखा है। उनके सर्वे में अभी तक पेंग्विन एडली की यह नई कॉलोनी की रिपोर्ट (विवरण) दर्ज नहीं हुई।

अंटार्कटिका में शोध कार्य में भारतीय वन्य जीवन संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शिव कुमार और अनंत पांडये लगे हैं। अनंत पांडेय बताते हैं कि उन्होंने 2008 से 2016 तक पक्षियों के कई डेटा (आंकड़ा) एकत्र किए। हालांकि वह यह भी कहते हैं कि उन्हें अभी और डेटा एकत्र करना होगा। उन्होंने कहा कि खोजबीन के दौरान ये बात सामने आई कि जलवायु परविर्तन होने से एक साथ बर्फबारी की घटनाएं बढ़ रही है। इसी के चलते स्नो पेट्रल के 20 प्रतिशत बच्चे मर चुके हैं।

दिमाग का बड़ा राज: - एक अध्ययन के जरिए में अमरीकी शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क विकास के अज्ञात स्रोत की खोज की है, जिससे तंत्रिका तंत्र के निर्माण को लेकर नई जानकारी मिली है। इससे भविष्य में मस्तिष्क के विकास को लेकर अभी तक स्थापित तंत्रिका विज्ञान की धारणाएं बदलने की संभावनाएं हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्लिया नामक जिस कोशिका को अभी तक दिमाग के विकास में गौण माना जाता रहा है, उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। नए शोध से यह स्पष्ट हो गया है कि तंत्रिका तंत्रों का विकास ग्लिया के तालमेल से ही संभव है।

ग्लिया - ग्लिया एक गैर तंत्रिका कोशिका का समूह है, जिससे मस्तिष्क के आधे से अधिक हिस्सों का निर्माण होता है। बावजूद इसके अभी तक सही संदर्भों मेें इसे समझा नहीं जा सका है। अभी तक निष्क्रिय कोशिका मानकर जीव विज्ञान इसकी उपेक्षा करता रहा है। लेकिन नए अध्ययन में मिली जानकारी से इस पर एक नई बहस पैदा हो गई है।

क्या है ग्लिया- ग्लिया एक जैविकीय प्रणाली है, जो तंत्रिका ऊतकों के आवश्यक तत्वों खासकर दिमाग, रीढ़ की हड्‌डी और अन्य कोशिकाओं के बीच तालमेल बनाए रखने में मददगार होता है।

फ्रूट फ्लाई (फल मक्षिका) सिस्टम (प्रबंध) -इस खोज के बाद वैज्ञानिकों ने ग्लिया की अहमियत को गहराई से समझने के लिए फ्रूट फ्लाई के विजुअल (दृश्य) सिस्टम (व्यवस्था) की जांच की। इस जांच में पता चला कि यह एक मिनी (छोटा) सर्किट (परिधि) की तरह का होता हैं, जिससे संपूर्ण विजुअल सिस्टम की गतिविधियों और प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी मिलने के साथ इससे पहचान का भी पता चलता है।

ग्लिया की उपेक्षा-न्यूरो (स्नायु विज्ञान) बायोलॉजिस्टों (जीवविज्ञानी) का कहना है कि अभी तक तंत्रिका कोशिकाओं के निर्माण पर ही शोधकर्ताओं व वैज्ञानिकों का ध्यान केन्द्रित रहा है। उसी के अनुरूप दिमाग के विकास की धारणाएं गढ़ी गई है। अभी तक मान्यता यह है कि तंत्रिका कोशिकाओं से एक ऐसे नेटवर्क (जाल पर कार्य) का निर्माण होता है, जिससे सूचनाओं की प्रक्रियाएं निर्धारित होती है। जबकि नए शोध में मस्तिष्क के सेल्युलर (कोशिकामय) मेकअप में जिस तरह से ग्लिया की अहमियत उभरकर सामने आई है कि उससे स्थापित धारणाओं के उलट मस्तिष्क निर्माण में उसकी भूमिका अहम होने के संकेत मिले हैं।

चौकाना वाले तथ्य- ग्लिया की भूमिका को लेकर मिली जानकारी को ब्यूरोबायोलॉजिस्ट (कार्यालय जीव विज्ञानी) दिलचस्प मानते हैं। क्योंकि नए शोध से यह स्पष्ट हो गया है कि तंत्रिका तंत्रों का विकास ग्लिया के तालमेल से ही संभव है। इस प्रक्रिया मेें रेटिना के माध्यम से दिमाग को लाइन (रेखा) मिलती है, जो कोशिकाओं के निर्माण में सहायक साबित होती है। बाद में वही कोशिकाएं तंत्रिका कोशिका के रूप में उभरकर सामने आती है।

कोशिका-दरअसल मस्तिष्क में दो वृहद कोशिकाएं होती हैंं एक तंत्रिका या न्यूरोंस तो दूसरा ग्लिया। इनमें से ग्लिया एक गैर तंत्रिका कोशिकाओं की संग्रह है। अभी तक इसकी पहचान न्यूरोबायोलॉजिस्ट के बीच में निष्क्रिय कोशिका के रूप में होती रही है। लेकिन नए शोध से पता चला है कि मस्तिष्क कोशिकाओं के निर्माण में उसकी भूमिका अहम है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि दिमाग के विकास में नए सिरे से सोचने पर विचार हो रहा है, ताकि मस्तिष्क विकास की संपूर्ण प्रक्रियाओं को समझना संभव हो सके।

समझना-न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के शोधकर्ता विलईवान फर्नाडिंस का कहना है कि अब तंत्रिका केन्द्रित सभी अवधारणाओं पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। क्योंकि मस्तिष्क के विकास में समय, पहचान और तंत्रिका कोशिका के जन्म के बीच के तालमेल को समझना मौलिक प्रश्नों में से एक है, जिसे मस्तिष्क निर्माण में ग्लिया को अहमियत देकर ही बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।

सूर्य की किरण: - रिसर्चर (खोजकर्ता) मानते हैं कि यह सिनापेट एस्टर पेड़-पौधों का सनस्क्रीन है, जो उन्हें हानिकारक सूर्य की किरणों से बचाता है। सूर्य से निकलने वाली हानिकारक किरणें हर जीवन-जंतु को नुकसान पहुंचाता हैं, चूंकि पेड़-पौधे भी सजीव होते हैं, इस लिहाज से उन पर भी इसका असर पड़ना चाहिए, लेकिन नहीं पड़ता है। क्यों, आइए बताते हैं।

हाल ही में हुए नए शोध में वैज्ञानिकों के हाथ चौंकाने वाले तथ्य लगे हैं। इससे यह पता चला कि आखिर क्यों पेड़-पौधों पर धूप का कोई असर नहीं होता। वैज्ञानिकों का मानना है कि अल्ट्रवायलेट (पराबेंगनी) किरणें जीवन-जंतुओं की तरह पेड़-पौधें पर भी अपना असर डालती हैं। वे पौधों के डीएनए को भी नुकसान पहुंचा पाने में सक्षम है और पौधों के विकास में भी बाधा डाल सकती हैं। लेकिन इसके बावजूद इन किरणों का पेड़-पौधों पर कोई असर नहीं पड़ता। तो फिर इसका कोई न कोई कारण तो जरूर होगा। पडर्यू यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) में रसायनज्ञ टिमोथी सीवियर और उनकी टीम (समूह) ने हाल ही में इस कारण का खुलासा किया है। उन्होंने पाया कि पौधों में एक विशेष प्रकार का अणु पाया जाता है, जिन्हें सिनापेट एस्टर कहा जाता है। ये अणु पौधे में ऐसे अल्ट्रवायलेट किरणों को पत्तियों की गहराई तक जाने से रोकते हैं, जो उनका विकास रोक सकता है। इस प्रक्रिया को समझने के लिए रिसर्च (खोज) टीम ने अणुओं को गैसीय अवस्था में बदला और उन पर अल्ट्रवायलेट (पराबेंगनी) लाइट (रोशनी) का इस्तेमाल किया। इस तरह उन्होंने पाया कि सिनापेट एस्टर यूवीजी स्पेक्ट्रम (तरंग) में हर तरंगदैर्ध्य पर विकिरण को भिगोने में सक्षम हैं।

रासायनिक कोटिंग (परत) -पौधों की पत्तियों पर रासायनिक यौगिकों की एक कोटिंग भी होती है। यह सभी वनस्पति की पत्तियों पर होने के बावजूद दिखाई नहीं देती। क्योंकि यह काफी पतली होती है। यह भी एक कारण है, जिसकी वजह से हानिकारक किरणे पेड़-पौधों को नुकसान नहीं पहुंचा पाती।

नया पौधा खोज: - पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता स्थित बोटेनिकल सर्वे ऑफ (का) इंडिया (भारत) (बीएसआई) वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में नित नए-नए प्रयोग करता रहता है। हाल ही में उसने ’यूफोर्विएसी’ स्पेसीज (जाति) के एक नए औषधीय पौधे की खोज की है। इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इसका नमूना बीएसआई के तहत आने वाले सेंट्रल (केन्द्र) नेशनल (राष्ट्रीय) हरबेरियम (सीएनएच) हावड़ा में सहेज कर रखा गया है। सीएनएच बीएसआई के तहत आता है। इससे जुड़े शोधपरक लेख का अंश न्यूजीलैंड से पब्लिश (प्रकाशित करना) हाेेने वाले ’फाइटोटेक्सा’ जर्नल में इसी महीने प्रकाशित किया गया है। अब इस पर शोध चल रहा है कि इस पौधे के क्या फायदे हैं। दवा के लिहाज से यह कितना उपयोगी है।

इस पौधे का नाम देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के सम्मान में उनके नाम पर ’ड्रायपिटिस कलामी’ रखा गया है। भारत में ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी वैज्ञानिक खोज का नामकरण मिसाइलमेन (प्रक्षेपास्त्र पुरूष) के नाम पर हुआ है। अगर वैश्विक स्तर पर बात करें तो इससे कुछ महीने पहले अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी (शाखा) नासा के वैज्ञानिकों ने एक जीवाणु की खोज की थी। उसका ’सोलीबैकिलस कलामी’ रखा है।

इस पौधे की खोज बीएसआई के वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. गोपाल कृष्ण, के. कार्तिकेयन, विल्सन एरिसडेसॉन और तापस चक्रवर्ती की टीम (समूह) ने की है। डॉ. कृष्ण ने बताया कि इस पौधे के रासायनिक घटक एवं औषधीय जानकारी के लिए आगे भी शोध करने की जरूरत है। हमें बक्सा राष्ट्रीय उद्यान व जालदापारा राष्ट्रीय उद्यान में वनस्पतियों की सूची बनाते वक्त उप-उष्णकटिबंधीय नम अर्थ-सदाबहार वनों की एक गीली जगह से ’ड्रायपिटिस’ के कुछ नमूने मिले। नमूनों के आलोचनात्मक परीक्षण और उससे जुड़े दस्तावेजों के अध्ययन से पता चला कि इस प्रजाति की खोज अब तक नहीं हुई थी।

- Published/Last Modified on: October 3, 2017

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