चुनावी वादे (Election Promises - Essay in Hindi)

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प्रस्तावना: -देश के राजनीतिक दलों में चुनावी वादे करते समय मुफ्त योजनाओं का प्रलोभन देने का दौर चल सकता है। ये रंगीन टीवी, लेपटॉप, मकान, मिक्सी, बिजली-पानी और यहां तक कि मंगलसूत्र तक मुफ्त देने के वादे कर डालते हैं। उत्तर प्रदेश हो या दिल्ली हो या फिर बिहार, सबकी कहानी एक जैसी है। ताजा उदाहरण तमिलनाडु का है, जहां मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने शपथ के साथ ही प्रदेश में शराब की दुकाने बंद करवाने और किसानों के ऋण माफ करने की घोषणा समेत पांच वादे पूरे करने की शुरुआत की। यह सियासी सूत्र भले ही चुनावी लिहाज से हिट हो लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसी घोषणाओं से राज्य बजट के घाटे की भरपाई कैसे होगी?

चुनाव जीतना: - राजनीतिक दल यह समझने लगे हैं कि सत्ता में चुनाव जीतना और बार-बार जीतते रहना ही सिर्फ उनका काम रह गया है। वे यह भूल गए हैं कि सत्ता में रहने पर उनको शासन भी करना होता है। चुनाव भी सिर्फ इसलिए कराए जाते हैं ताकि मतदाता यह तय कर सके कि शासन कौन करेगा? लेकिन यह शासन ही होना चाहिए ’कुशासन’ नहीं। मुफ्त पानी-बिजली, रंगीन टीवी, लेपटॉप, फ्रिज व यहां तक कि मोबाइल भी दिए जाएंगे तो सही मायने में राजस्व वसुली के कई माध्यम बंद हो जाएंगे। शराबबंदी का फैसला किसी भी लोककल्याणकारी सरकार का फर्ज होना चाहिए लेकिन सरकारों को यह भी सोचना होगा कि राजस्व का बड़ा जरिया बंद होता है तो इसकी भरपाई कैसे होगी? किसानों की कर्ज माफी की घोषणा भी एक तरह से आम काश्तकार के हित में हो सकती है लेकिन गरीब और अमीर काश्तकार दोनों को इसका फायदा क्यों? लेकिन, राजनीतिक दलों का ऐसी घोषणाएं करने का शगल इसिलए भी हो गया है ताकि वे अगला चुनाव भी जीत सकें। कल्याणकारी सरकार की परिभाषा स्वीकार्य हों दरअसल पूरी शासन प्रक्रिया ही बहुत पेचीदगी भरी है। इसमें सिर्फ चुनाव जीत कर सत्ता हासिल करना ही किसी राजनीतिक दल का मकसद नहीं हो सकता। यानी यही उसका अंतिम पड़ाव नहीं है। मकसद यही होना चाहिए कि पांच साल तक अपने कामकाज से वह जनता के दिल में किस तरह से जगह बनाने में कामयाब हो पाते हैं? मतदाता किसी राजनीतिक दल अथवा राजनेता को इसलिए मत देकर नहीं जिताते कि वे अच्छे लगते हैं बल्कि इसलिए जिताते हैं ताकि वे सुशासन दे सकें। जनता ही सबसे बड़ी अदालत है जो समय आने पर भरमाने वाले राजनेताओं को उनका ’रास्ता’ दिखा देती है।

विकास व घोषणाएं: - आम तौर हमारे यहां मतदाता नकारात्मक मतदान करता है। यानी जो उसको पसंद नहीं उसके खिलाफ मतदान करता है। बहुत कम राजनीतिक दल ऐसे होते हैं। जिनको 50 फीसदी से अधिक मत हासिल होते होंगे। कई बार तो वे जितने मत हासिल करते हैं, उनसे ज्यादा तो उनके खिलाफ होते हैं। लोकलुभावन घोषणाएं राजनीतिक दलों के लिए एक बार मुफीद हो सकती हैं पर ये धरातल पर नहीं आ पाई तो जनता सबक सिखाने में भी पीछे नहीं रहती। सत्ता में बैठे दलों व नेताओं से अपेक्षा रहती है कि वे विकास से जुड़े मुद्दों पर काम करें। सड़क, पानी, बिजली, रोजगार व चिकित्सा तथा शिक्षा जैसे मुद्दों पर काम करने के लिए बड़ी धनराशि की जरूरत होती है। मुफ्तखोरी वाली घोषणाओं पर अमल को प्राथमिकता दी गई तो समग्र विकास की उम्मीदें कम रह जाएंगी। कितने भी मुफ्त समान देें दे व कितनी भी योजनाओं को फायदा उठा लें लेकिन उसकी भरपाई परोक्ष करारोपण से होती है। इसका अहसास मुल्यवर्धित कर, बिक्री कर व अन्य उपकर लगते समय मतदाता को होता ही नहीं है। अतंत: महंगाई का सामना उसी जनता को करना पड़ता है जिसके लिए ये लोकलुभावन घोषणाएं पूरी की जाती हैं।

मत: - निर्वाचित आयोग ने राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई तो मिलीजुली राय सामने आई। कुछ दलों ने घोषणा पत्रों के संबंध में आयोग की ओर से दिशा-निर्देश जारी करने का समर्थन किया। वहीं कुछ का कहना था कि बेहतर लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था में मतदाताओं को ऐसे प्रस्ताव देना और वायदे करना उनका अधिकार है।

संभव: - निर्वाचित आयोग का कहना था कि वह सैद्धांतिक रूप से सहमत है कि घोषणा पत्र तैयार करना राजनीतिक दलों का अधिकार है। परंतु स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन के संचालन और सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को एक समान अवसर देने के लिए कुछे एक वायदों और प्रस्तावों के अवांछित प्रभावों को अनदेखा नहीं किया सकता है।

निर्देश: -निम्न हैं-

  • चुनाव घोषणा पत्र में कल्याण संबंधी उपायों के वायदों पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती। फिर भी राजनीतिक दलों को ऐसे वायदे करने से बचना चाहिए जो मतदाताओं पर मताधिकार के प्रयोग में कोई अनुचित प्रभाव डालें।
  • सबको एक समान अवसर प्रदान करने तथा वायदों की विश्वसनीयता के लिए यह अपेक्षा की जाती है कि घोषणा पत्रों में वायदों के मूल आधार पर भी विचार किया जाए। राजनीतिक दलों को इस प्रयोजन के लिए वित्तीय अपेक्षाओं को पूरे करने के साधनों का भी व्यापक उल्लेख करना चाहिए।
  • राजनीतिक दलों व प्रत्याशियों को मतदाताओं का विश्वास ऐसे वायदों पर मांगा जाना चाहिए जिनको पूरा करना संभव हो सके।

खास बिंदू: - अंग्रजी में ’गोल मैनेजमेंट’ नाम से पढ़ाए जाने वाले पाठ में पांच बिन्दू हैं, हर बिन्दू के पहले अंग्रेजी अक्षर को लेकर एक शब्द ’स्मार्ट (एसएमएआरटी) बनता है। प्रबंध विशेषज्ञों के मुताबिक किसी आदर्श घोषणा पत्र के प्रमुख बिन्दु हो सकते हैं।

Ø एस- स्पेसिफिक, यानी विशिष्ट

Ø एम- मेज़रेबल, यानी जिसका आकलन किया जा सके।

Ø ए- अचीवेबल, यानी जो हासिल किया जा सकता हो

Ø आर- रिलाएबल, यानी जो विश्वसनीय हो।

Ø टी- टाइम बाउंड, यानी समयबद्ध

लाचार: - सुप्रीम न्यायालय ने चुनाव आयोग से आदर्श आचार संहिता में राजनीतिक दलों के चुनावी वादों की वजह और इन्हें पूरा करने के माध्यम को शामिल को कहा था। इन्हें शामिल भी किया पर ये सुझावात्मक ही है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि चुनाव आयोग राजनीतिक दलों का पंजीयन ही कर सकता है, उसे रद्द नहीं। तमिलनाडु में आयोग जे. जयललिता और एम. के करुणानिधि को प्रलोभन युक्त चुनावी वादों के लिए केवल निर्देश ही दे सकी थी।

सुशासन: - जब तक राजनीतिक दल खुद को सिर्फ चुनाव जीतने वाली ’कंपनी’ (जनसमूह) समझेगे वे ऐसे प्रलोभन जनता को देते रहेंगे। जनता का विश्वास हासिल करना और उनको सुशासन देने का दायित्व राजनीतिक दल भूलने लगे हैं। उनका तो एक ही लक्ष्य होता है, जैसे-तैसे मतदाताओं को डरा-धमकाकर, प्रलोभन देकर और लोकलुभावन वादे कर सत्ता में आ जाएं वादे पूरा करने में सरकारी खजाना खाली हो, यह सब बात नेता नहीं जानते। क्योंकि सरकारी खजाना जनता की कमाई काटकर ही भरा जाता हैं।

वादे महत्वपूर्ण: - वर्तमान भारतीय राजनीति में लोकलुभावन वादे बहुत ही महत्वपूर्ण होते जा रहे है। देश के राजनेता ऐसा मानते हैं कि चुनाव जीतने और सत्ता हासिल करने के लिए आम जनता को लुभाने वाले वादे बहुत ही जरूरी हो गए हैं। एक समय था जब राजनेता चुनाव से पूर्व जो लोकनुभावन वादे करते थे, चुनाव जीतने के बाद उन वादों को भूल जाते थे कई बार तो उन्हें इन वादों के बारे में याद दिलाया जाता था लेकिन वे उन्हें इसे टाल जाया करते थे। लेकिन, अब स्थितियों में बदलाव देखने को मिल रहा है। नेता अपने लोकलुभावन वादों को पूरा तो करने की कोशिश करते हुए दिखाई देते हैं और इस मामले में वे इस हद तक आगे बढ़ जाते हैं कि उन्हें राज्य की अर्थव्यवस्था की बर्बाद करने से कोई परहेज भी नहीं होता। जो राजनीति कर रहे हैं, वे सत्ता में रहकर काम करने की महत्ता को समझते हैं लेकिन ऐसा भी नहीं है। कि सत्ता से बाहर बैठे राजनेता जनता के लिए कुछ नहीं करते। वे अपने तरीके से योगदान देते रहेते हैं।

कीमत: - कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि सत्ता में रहने वाले अपने कामों से जनता को प्रभावित नहीं कर पाते। लेकिन, जब चुनाव नजदीक आते है तो वे अपने लिए सकरात्मक धारणा बनाने के उद्देश्य से लोकलुभावन घोषणाओं को कहते है। इस बात से कोई संदेह नहीं कि समाज में इस बुराई को मिटाने की बात से बहुत से मतदाता उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं। राजनेता यह नहीं सोचते कि शराब के इस्तेमाल को रोकने के उद्देश्य से उस पर सरकार कर लगाती है और इससे भारी-भरकम राजस्व की प्राप्ति होती है। यह राजस्व सरकार की आय का बड़ा स्त्रोत होता है जो जन कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करने में इस्तेमाल होता है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि कोई राजनीतिक दल शराबंदी लागू करने की बात करके आम जनता को राहत पहुंचाने का इरादा रखता है लेकिन इस घोषणा से पहले वह संभावित राजस्व में कमी की भरपाई कैसे करेगा, इसकी जानकारी नहीं देता। लेकिन जब भी ऐसी घोषण की जाती है, वह राज्य का वित्तीय घाटा ही बढ़ता है। कोई भी रजनीतिक दल इस घाटे की भरपाई कैसे करेगा, इस बारे में कोई योजना नहीं बताता?

घोषणा पत्र: - यह है कि सारी घोषणाएं जनता के विकास के लिए नहीं बल्कि मत हासिल करने के उद्देश्य से ही होती हैं। किसी भी राजनीतिक दल को अपना घोषणा पत्र इस तरह से बनाना चाहिए जिससे उसकी जनता का विकास करने की मंंशा का पता लगे। दलों के घोषणा पत्र का राजनीतिक और वित्तीय मूल्यांकन किया जना चाहिए। चुनाव आयोग को परखना चाहिए कि घोषणा पत्र में किए गए वादों की गंभीरता कितनी है? वे राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले न हो। घोषणा पत्र में स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि जो वदे किए जा रहे हैं, उन्हें पूरा कैसे किया जाएगा? क्या वे राजनीतिक और आर्थिक तौर पर पूरे किए जा सकते हैं, राजकोषीय उत्तदायित्व व बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम) राजकोषीय शाटे को कम करने का प्रावधान करता है, ऐसे में चुनाव आयोग को यह देखना चाहिए कि दलों नेताओं के लोकनुभावन वादे इस अधिनियम के प्रावधान का उल्लंघन करने वाले नहीं हो।

उपसंहार: - प्रस्तुत सब बातों से यही पता पड़ता है कि नेता लोग चुनाव जितने के लिए क्या-क्या करते हैं जिनमें जनता को फायदा कम व नुकसान अधिक होता हैं। इसलिए हर नेता को कोई भी घोषणा करने से पहले कई बार सोचना चाहिए कि वह जनता के लिए जो वादे कर रही उसे वह पूर कर पाएगी जो वह कह रही हैं।

- Published/Last Modified on: June 10, 2016