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पांच राज्यों के चुनाव परिणाम घोषित (Election Result Declared for 5 States Essay in Hindi) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: - पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव नतीजो में राजनीतिक दलों के लिए ’कहीं खुशी तो कहीं गम’ लेकर आए हैं। दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा को असम की जीत से संजीवनी मिली है, वहीं एक के बाद एक हार झेल रही कांग्रेस को एक ओर झटका लगा है। इन चुनाव में असम और केरल उसके हाथ से निकल गए। पश्चिम बंगाल में ममता दीदी की धमाकेदार वापसी और तमिलनाडु में जयललिता के फिर सत्ता में आगमन ने राजनीतिक पंडितों को चौंकाया है।

Table of election Data of five states

Table of election Data of five states

पांच प्रमुख राज्यों के चुनाव का आंकड़ा

1 पश्चिम बंगाल 294 बहुमत का आंकड़ा 148

तृणमूल 211/27

44.9 प्रतिशत मत

सीपीएम +

76/26

37.9 प्रतिशत मत

भाजपा 3/3

10.2 प्रतिशत मत

अन्य 4

7.0 प्रतिशत मत

मुख्यमंत्री ममता राज्य के 72 प्रतिशत सीटों पर रहीं। पिछली बार से 10 प्रतिशत ज्यादा, भाजपा 35 सीटों पर दूसरें नंबर पर।

2 असम 126 बहुमत का आंकड़ा 64

भाजपा +

86/59

41.5 प्रतिशत मत

कांग्रेस

26/52

31.0 प्रतिशत मत

अन्य 14

27.5 प्रतिशत मत

सर्वानंद सोनोवाल 5 साल पहले भाजपा में शामिल हुए और पूर्ण बहुमत दिला दिया।

3 तमिलनाडु 232 बहुमत का आंकड़ा 117

अन्नाद्रमुक/एडीएम के 134/16

40.8 प्रतिशत मत

द्रमुक+ 97/69

38.0 प्रतिशत मत

कांग्रेस 08/3

अन्य 1

21.2 प्रतिशत मत

32 साल का राजनैतिक इतिहास बदला। जयललिता को लेकर एग्जिट पोल गलत साबित हुए। लगातार दुसरी बार जीती।

4 केरल 140 बहुमत का आंकड़ा 71

लेफ्ट+

83/19

34.6 प्रतिशत मत

कांग्रेस+

47/23

35.1 प्रतिशत मत

भाजपा 1/1

10.5 प्रतिशत मत

अन्य 9

19.8 प्रतिशत मत

93 साल के अच्युतानंदन ने चुनाव प्रचार के दौरान 13 दिन में 63 रैलियां की। हर दिन औसतन 200 किमी की यात्रा की। छठीवीं बार जीत हासिल की।

5 पुडुचेरी सींटे 30 82 प्रतिशत पड़े

कांग्रेस 17

एनआर कांग्रेस 8

एडीएमके 4

डीएमके 2

अन्य 5

कांग्रेस को खुशी देने वाला एकमात्र राज्य। एडीएमके के कन्नण 2, 225 मतो से लक्ष्मीनारायन से हारे।

परिणाम निम्न हैं-

  • देश की 84 प्रतिशत आबादी अब कांग्रेस मुक्त
  • भाजपा का 13 राज्यों (4 एनडीए) में शासन, यहां देश की 43.1 प्रतिशत आबादी।
  • कांग्रेस 8 राज्यों में (1यूपीए) यहां आबादी का 15.58 प्रतिशत हिस्सा।
  • अन्य के पास 10 राज्य (2यूटी) और 41.16 प्रतिशत आबादी में शासन
  • अब 2017 में 7 राज्यों में चुनाव हैं, आगे भाजपा-कांग्रेस के पास 3 - 3 राज्य हैं।

जीत के कारण- प. ं बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट के गठजोड़ से समीकरणों की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित होगा। बिहार नमूना हर जगह लागू नहीं हो सकता है। कमजोर तबके और युवाओं को लुभाने की योजनाएं काम आई। असम में सोनोवाल ने गहन जनसंपर्क से कमाल दिखाया। केरल में लगातार एक माह तक प्रचार की भीषण मशक्कत के दौरान अच्युतानंदन ने जो ऊर्जा व दृढ़ता दिखाई व बुजुर्ग की परंपरागत परिभाषा के दायरे में नहीं आता। जयललिता ने तमिलनाडु की तीन दशकों की पंरपरा तोड़ी है। जिस इलाके में भाषण दिया, वहीं की योजना का वादा कर दिया। यूं भी इन पांच राज्यों के चुनाव ने भाजपा की छवि चमका दी है। भारत के हर प्रांत और जिले को जोड़े रखने वाली तीन ताकते हैं। फौज, नौकरशाही और कांग्रेस दल। दल जनता को जोड़े रखती है। इस चुनाव ने कांग्रेस की कमर तोड़ दी हैं। जिस मार्क्सवादी दल और द्रमुक ने उसके साथ गठबंधन किया था, वह उन्हें भी ले डूबी। क्या भाजपा ही अब कांग्रेस बनने की कोशिश करेगी? देश पर सफलतापूर्वक राज करना भी क्या किसी विचारधारा से कम हैं?

पांच राज्यों में महिला सीएम (मुख्यमंत्री): - देश में पांच राज्यों में वर्तमान महिला सीएम हैं। इनमें जम्मू कश्मीर में महबूबा मुफ्ती, गुजरात में आनंदी बेन, पं. बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में जयललिता और राजस्थान में वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री हैं। 5, 434 दिन तक सीएम रहने का रिकार्ड (प्रमाण) दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित के नाम हैं जानकी रामचंद्रन सबसे कम 23 दिन की मुख्यमंत्री रहीं।

अपेक्षा: - हमारे लोकतंत्र की यह खासियत है कि बिना किसी आरक्षण व्यवस्था के महिलाएं राज्यों में मुख्यमंत्री बनी हैं। सवाल किसी प्रदेश में मुख्यमंत्री का महिला व पुरुष होने का नहीं है। सबसे बड़ी बात यह की महिला मुख्यमंत्री से यह अपेक्षा की जाती है वे कम से कम महिला कल्याण से जुड़े काम की तरफ तो खास ध्यान देंगी ही। लेकिन जिन राज्यों में महिला मुख्यमंत्री हैं वहां देखेंगे तो सभी राज्यों में महिलाओं से जुड़े कई विषयों पर काम नहीं हुआ है। आखिर किसी प्रदेश में मख्यमंत्री होने का फायदा महिलाओं का क्यों नहीं मिल पा रहा है। जहां तक इस पद में पहुचने का कारण कुछ अपने दम पर पहुंची है तो कुछ उनको विरासत में मिला है। अगर मुख्यमंत्री के रूप में कोई महिला आती हैं तो उससे महिलाओं के वर्ग को अपेक्षा भी ज्यादा होती हैं।

चुनाव परिणाम: - केंद्र शासित प्रदेश पुड्‌डुचेरी को छोड़कर कांग्रेस के लिए चार राज्यों के चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए बहुत अच्छे नहीं रहे। 2014 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस जिस बुरी तरह से हारी, ऐसा लगा है कि वह उस झटके से पूरी तरह उबर नहीं पा रही है। लोकसभा चुनाव के बाद दो साल के दौरान उससे अपेक्षा थी कि वह संभल जाएगी, उसमें कुछ बदलाव देखने को मिलेंगे और उसके प्रदर्शन में सुधार आएगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

कांग्रेस असम और केरल में सत्ता में थी। असम में तो वह तीन बार लगातार चुनी जा रही थी। ऐसे में इस बार उसके सत्ता से बाहर होने के संकेत मिल रहे थे। केरल में भी असम की तरह ही सत्ता परिवर्तन ही लहर रही है। लेकिन अंतर यह है कि वहां कांग्रेस के मत भाजपा की ओर खिसक गए। इस कारण कांग्रेस और उसके गठबंधन का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में मिले मतों के प्रदर्शन के आधार पर तमिलनाडु के बारे में तुलना करें तो उसका प्रदर्शन काफी बेहतर रहा है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने वाम मोर्चे के साथ जाने का जो फैसला किया था, वह बेहद अजीब रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों की पार्टियां कांग्रेस और लेफ्ट के प्रदर्शन में लगातार गिरावट आ रही है। ऐसे में उनके गठबंधन से किसी का भला नहीं होने वाला था।

भाजपा व कांग्रेस: - पूर्वोत्तर के असम में कांग्रेस के 15 साल के शासन का अंत हो गया है। भाजपा ने बेहतर राजनीतिक रणनीति के साथ दांव खेला हैं। चुनावी नतीजों से देश के सामने एक बात स्पष्ट हो गई है कि कांग्रेस जिस तेजी से सिमट रही है भाजपा उतनी ही तेजी से आगे बढ़ रही है। कांग्रेस ने जहां असम और केरल को गंवा दिया है, वहीं भाजपा ने इन दोनों राज्यों में वजूद साबित कर दिया है। असम में तीन राजस्थानी चूरू के अशोक कुमार, झुंझुनूं के अशोक सिंघल और बीकानेर के अमर चंद जैन भाजपा से विधायक बने है। वे लंबे समय से असम में रहकर व्यापार कर रहे थे। कांग्रेस की हालत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बंगाल और तमिलनाडु में तो उसके सहयोगी भी चुनाव हार गए। भाजपा-कांग्रेस के बाद ममता-जया की ताकत देखिए दोनों महिलाओं ने अपने बूते सारे विरोधियों को पस्त कर दिया है।

Table of election Data of Assam

Table of election Data of Assam

असम में किसे कितने वोट मिले

पार्टी

मत मिले

पिछला चुनाव

भाजपा

49 लाख 29 प्रतिशत

15 लाख 11 प्रतिशत

कांग्रेस

52 लाख 31 प्रतिशत

54 लाख 39 प्रतिशत

यूडीएफ

22 लाख 13 प्रतिशत

17 लाख 12 प्रतिशत

भाजपा सीएम पद के दावेदार सोनोवाल 18, 923 वोट से जीते और बइरूददीन अजमल, अध्यक्ष यूडीएफ पबन घाटोवार, पूर्व केंद्रीय मंत्री, गौतम रॉय, 15, 084 वोट से हारे और प्रफुल्ल महंत, 53, 168 वोट से जीते, तरुण गोगोई, 62, 025 वोट से जीते, अतुल बोरा, 62, 926 मत से जीते।

Table of election Data of West Bengal

Table of election Data of West Bengal

पश्चिम बंगाल में किसे कितने वोट

पार्टी

वोट मिले

पिछला चुनाव

तृणमूल

2.4 करोड़ 45 प्रतिशत

1.8 करोड़ 39 प्रतिशत

सीपीएम

01 करोड़ 19 प्रतिशत

1.4 करोड़ 30 प्रतिशत

कांग्रेस

67 लाख 12 प्रतिशत

43 लाख 09 प्रतिशत

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 25, 301 मतों से जीतीं। चंद्र कुमार बोस 39, 221 मत से हारे लॉकेट चटर्जी 53, 881 मत से हारी, रूपा गांगुली 30, 501 मत से हारी। वैशाली 52, 702 मतों से जीती, सुब्रत मुखर्जी 70, 083 मतों से जीते, शुजीत चक्रवर्ती 86, 873 मतो से जीते।

Table of election Data of Tamil Nadu

Table of election Data of Tamil Nadu

तमिलनाडु में किसे कितने वोट मिले

पार्टी

वोट मिले

पिछला चुनाव

एडीएमके

1.7 करोड़ 40 प्रतिशत

1.4 करोड़ 38 प्रतिशत

डीएमके

1.3 करोड़ 31 प्रतिशत

82 लाख 22 प्रतिशत

कांग्रेस

27 लाख 6.4 प्रतिशत

34 लाख 9.3 प्रतिशत

डीएमके के सकरापाणि 1, 21, 715 मतो से जीते।

Table of election Data of Tamil Kerala

Table of election Data of Tamil Kerala

केरल में किसे कितने वोट

पार्टी

वोट मिले

पिछला चुनाव

सीपीएम

53 लाख 26 प्रतिशत

49 लाख 28 प्रतिशत

कांग्रेस

47 लाख 23 प्रतिशत

46 लाख 26 प्रतिशत

भाजपा

21 लाख 10 प्रतिशत

10 लाख 06 प्रतिशत

भाजपा की ओर से उतरे श्रीसंत 11, 710 मतो से हारे।

कांग्रेस: - 5 राज्यों के जनावों में कांग्रेेस का प्रदर्शन निश्चित रूप से खराब रहा है। यूं कहना चाहिए कि इन चुनावों में कांग्रेस की जितनी बुरी हालत हुई वह कभी नहीं हुई। लेकिन राजनीति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। हम याद करें जब सोनियां गांधी ने 1998 में कांग्रेस का नेतृव्य संभाला तब वह सिर्फ पांच राज्यों में सत्ता में थी और 2004 तक 14 - 15 प्रदेशों में उसकी सरकार रही। समस्या कांग्रेस में बने दो पावर सेंटर (ताकत केंद्र) की है। सोनिया गांधी सेवानिवृति की बात कर रही है और राहुल गांधी को अध्यक्ष की कमान सौंपने की चर्चा शुरू हो गई हैं। असम में कांग्रेस की हार के बड़े कारणों में यह भी है कि उसने समय रहते गठबंधन की तरफ ध्यान नहीं दिया। यदि यह गठबंधन होता तो कांग्रेस की स्थिति में सुधार तो हो ही सकता था। देखा जाए तो वाम दलों का साथ लेना कांग्रेस के लिए भारी रहा। खास तौर से राहुल गांधी और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भटटाचार्य की मंच पर साझा की गई तस्वीरें जारी होने से कांग्रेस कार्यकताओं का मनोबल कमजोर हुआ। 2008 में न्यक्लियर समझौते को लेकर हुए झगड़े के बाद वाम नेतृव्य की कभी कांग्रेस से सुलह नहीं हुई थी। जब भी राष्ट्रीय स्तर की राजनीति के लिए रणनीति तय की जाएगी ममता बनर्जी उसका साथ देने के लिए शायद ही कभी सरलता से तैयार हो पाएगी। रणनीतिक के तौर पर दीर्घकालीन राजनीति के संदर्भ में कांग्रेस का वाममोर्चे से हाथ मिलाने का फैस्ला बेहद खतरानाक व अजीब था। जंहा तक कांग्रेस मुक्त भारत के नारे की बात है तो इसका एक अर्थ केवल चुनावी राजनीति होता है। दूसरा अर्थ यह जिस तरह की नीतिगत सोच और विचारधारा के साथ भाजपा आगे बढ़ रही है, उसके लिए इस शब्द का प्रयोग किया जा सकता हैं।

कांग्रेस को दीर्घकालीन सोचना होगा। उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे बड़े राज्यों को छोड़कर इनके बाद होने वाले गुजरात चुनाव पर सारा ध्यान लगाना होगा। वहां पर वही भाजपा को सीधी टक्कर दें सकती है। इसके लिए उसे अभी से तैयारी करनी होगी। जहां तक कांग्रेस में नेतृव्य परिवर्तन का सवाल है तो अब कांग्रेस इस मामले में काफी देर कर चुकी है। अगला लोकसभा चुनाव 2019 में होना है उसके लिए आधा समय तो बीत ही चुका है उसके लिए बेहतर यही होगा कि वह युवा और अनुभवी नेताओं को तैयार करें।

अभी कांग्रेस संगठन के जो हालात हैं उसमें कांग्रेसजन चाहते हुए भी सोनिया व राहुल गांधी से अलग नहीं हो सकते है। उसके पास इनके अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। यदि इनमें से किसी ने पद छोड़ने की पेशकश भी की तो मान-मनोबल का दौर शुरू हो जाएगा ओर भी ज्यादा हुआ तो प्रियंका गांधी का राजनीति में लाने की मांग उठने लगेगी। रही बात भाजपा के कागेंस मुक्त भारत की तो हार-जीत होना बड़ी बात नहीं और इतनी बड़ी पार्टी समाप्त तब ही हो पाएगी जब उसमें जीतने की इच्छाशक्ति ही खत्म होने लग जाए।

को सिरें से राष्ट्रीय पार्टी में स्थापित करने के लिए पार्टी में शीर्ष नेतृव्य पर उठ रहे सवालों के जवाब जल्द खोजने होंगे। कांग्रेस जिस भी राज्य में नाकाम हुई है, वहां उसने ऐसे राजनीतिक दल या गठबंधन को स्थान दिया है, जो भाजपा का अधिक नहीं तो उसके जितना ही कट्‌टर विरोधी है। नीतीश कुमार को अहसास हो गया होगा कि उनकी बढ़ते थम गई है। अब धर्मनिरपेक्ष ताकतों के लिए ममता बनर्जी एकजूट होने का अधिक सशक्त केंद्र बन गई हैं। यदि अगले साल केजरीवाल पंजाब में अच्छा प्रदर्शन करें तो 2019 के आम चुनाव में भाजपा को दो गठबंधन चुनौती दे सकते हैं।

भाजपा: - 15 साल से लगातार शासन कर रही कांग्रेस की तरूण गोगोई सरकार को हरा कर पहली बार अपने बूते पर सरकार बनने से निश्चित ही मोदी के सीने का एक और मैडल (सम्मान) बढ़ाने वाला है। साथ ही यह बिहार विधानसभा चुनाव की ताजा हार के जख्मों को भी भरने वाला है भाजपा की इस नीति से असम में 1980 के दशक की शुरुआत के छात्र आंदोलन की याद आती है। सही मायने में भाजपा ने आल असम छात्र संगठन (आसू) के स्थानीय बनाम बाहरी के मुद्दे को ही छीना है। नतीजा यह हुआ कि असम गण परिषद ने जिन मुद्दों पर सरकार बनाई उन्हीं के समर्थन में भाजपा की सहयोगी दल के रूप में साथ आना पड़ा।

भाजपा की इस जीत के कई मायने हैं। यहां भाजपा लंबे समय से घुसपैठियों को बाहर करने का मुद्दा बनाए हुए थी। इससे मतो का ध्रुवीकरण हुआ जो भाजपा को बढ़त दिलाने में कामयाब रहा। भाजपा की इस रणनीति ने कांग्रेस की असम में तो हालत खराब की है लेकिन दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस को इस हालत में खड़ा कर दिया कि वह हिन्दुवादी ताकतों के खिलाफ किसी भी गठबंधन का नेतृव्य करने की स्थिति में नहीं रही। वहीं पश्चिम बंगाल में भाजपा ने जो भी मत हासिल किए उनसे एक तरह से ममता की मदद ही हुई है। भविष्य में होने वाले चुनावों में दो प्रमुख दल ही आमने-सामने नहीं रहेगी बल्कि उसे भी गठबंधन राजनीति का हिस्सा बनना ही होगा। आने वाले चुनावों में भी भाजपा का एक ही मकसद रहने वाला है। वह है हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की भावनाएं उभार कर मत बटोरना। उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रीय दलों के प्रभाव वाले प्रदेश में उसको दूसरी तरह की रणनीति अपनानी होगी। जरूरत पड़ने पर सत्ता व संगठन स्तर पर भी फेरबदल करना होगा। असम के नतीजों के बाद यह तो तय है कि कुछ बदलाव होगा। इस बादलाव की जानकारी केवल मोदी जी के पास है। इसमें संदेह नहीं है कि भाजपा का कद इन चुनाव नतीजों के बाद बढ़ा ही है। इससे मोदी और अमित शाह की जोड़ी ओर सशक्त होगी।

भाजपा में संगठनात्मक तौर पर शक्ति का केंद्रीयकरण लंबे समय चला तो उसके लिए खतरनाक साबित होगा। मोदी के आगे रमनसिंह, शिवराज सिंह जैसे नेता कमजोर दिखाई पड़ते हैं। इससे दूसरी पंक्ति के नेतृव्य को मौका नहीं मिल रहा है।

सबक: - पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की रिकार्ड (प्रमाण) तोड़ वापसी और तमिलनाडु में जयललिता का इतिहास रचना भारतीय लोकतंत्र की खूबी का परिचायक माना जा सकता है। ठीक वैस ही जैस असम मे 15 साल पुरानी कांग्रेस की जगह भाजपा का सत्ता में आना और केरल में तीन दशक अदला-बदली की राजनीति का जारी रहना है। पांच राज्यों के चुनावी नतीजों का देश की राजनीति पर असर भी पड़ेगा ओर नए राजनीतिक समीकरण भी बनेंगे। लेकिन चुनावी नतीजों ने देश के सामने कुछ सवाल व कुछ सबक भी खड़े कर दिये है। जिसमें से सबक निम्न हैं-

  • पहला और सबसे महत्वपूर्ण सबक ये कि राजनीति में जीत और हार स्थाई अंग नहीं हैं।
  • भाजपा और कांग्रेस ही नहीं, देश के तमाम प्रादेशिक दलों के लिए भी इन नतीजों में सबक छिपा है।
  • एक जीत से न तो घमंड करना चाहिए और न ही एक हार से हताश होना चाहिए।
  • असम में जीतने के बाद भाजपा भले ही उत्साह हो लेकिन इस जीत को उसे विनम्रता से स्वीकार करना चाहिए।
  • भाजपा का लक्ष्य भले इस देश को ’कांग्रेस मुक्त’ कराना हो लेकिन क्या ऐसा होने से सभी समस्याओं का समाधान निकल आएगा?
  • नतीजों से निकलने वाला सबसे बड़ सबक यही है कि राजनीतिक दल मतदाताओं की अपेक्षाओं का सम्मान करें।

अब सवाल निम्न हैं-

चुनाव में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा रह भी गया या नहीं। पं. बंगाल के चुनावी नतीजे इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहां शारधा कांड ने पूरे देश को हिला दिया था। भ्रष्टाचार के इसी मुद्दे को बंगाल ने सिरे से नकार दिया है। बल्कि ममता को पिछली बार से भी अधिक समर्थन मिला है वहीं तमिलनाडु में भ्रष्ट्राचार के आरोपो से घिरी जयललिता ने सत्ता में वापसी कर नया इतिहास रच डाला। यानी मतदाताओं की नजर में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा रह ही नहीं गया है।

Table of ruling party in states

Table of ruling party in states

कहां पर किसकी सरकार

एनडीए

यूपीए

अन्य

आंधप्रदेश

हिमाचल प्रदेश

उड़ीसा

बीजद

अरुणाचल प्रदेश

कर्नाटक

सिक्कम

एसडीएफ

असम

मणिपुर

तेलंगाना

टीआरएस

छत्तीसगढ़

मिजोरम

त्रिपुरा

माकपा

गुजरात

मेघालय

उत्तरप्रदेश

सपा

हरियाणा

उत्तराखंड

पश्चिम बंगाल

टीएमसी

जम्मू-कश्मीर

तमिलनाडु

अन्नाद्रमुक

झारखंड

केरल

एलडीएफ

मध्यप्रदेश

बिहार

जदयू, राजद

महाराष्ट्र

नागालैंड

पंजाब

राजस्थान

गठबंधन: - की राजनीति 25 वर्षों से चल ही रही है। भले ही केंद्र में मोदी के नेतृव्य में बनी सरकार को फिलहाल गठबंधन की जरूरत हो लेकिन गठबंधन की राजनीति समाप्त नहीं हुई है। पंजाब, जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र में भाजपा को सत्ता के लिए गंठबंधन करना पड़ा है। अब राष्ट्रीय स्तर की राजनीति का स्वरूप राज्य स्तर की राजनीति तय करने वाली है। हमें समझना होगी कि हर राज्य में राजनीति की एक अपनी चाल होती है।

पंजाब: - में स्वाभाविक तौर पर कांग्रेस के लिए अवसर था लेकिन एक तो वहां पर उसके अंदरूनी झगड़े हैं और दूसरी बात यह कि आम आदमी दल ने पैर जमाने शुरू कर दिए हैं इसलिए वहां भी उसके लिए मुश्किलें खड़ी होने वाली हैं। हालांकि अभी से कहना जल्दबाजी होगी कि वह क्या कदम उठाएगी पर उसके लिए गठबंधन की राजनीति फिलहाल मजबूरी है।

मोदी: - मोदी को विकल्प न होने का फायदा मिलेगा। ऐसे सबूत नहीं हैं कि राहुल गांधी में मोदी को अखिल भारतीय नेता के रूप में चुनौती देने की काबिलियत या इच्छा है। मोदी के खिलाफ ’सघीय’ विकल्प की एकमात्र उम्मीद 1990 के दशक में संयुक्त मोर्चा जैसे प्रयोग में है, लेकिन इसे भी अमल में लाना कठिन है। मोदी अपने राजनीतिक साथियों में सम्मान की जगह भय ही अधिक पैदा करते हैंं प्रभावी सरकार चलानी हो तो टकराव नहीं आमसहमति निर्मित करने की जरूररत है।

असर: - भाजपा की राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्वीकार्यता में और इजाफा होगा। इन चुनावों की जीत से कार्यकर्ताओं में और उत्साह का संचार होगा।

उपसंहार: - हार-जीत चुनावी सिक्के के दो पहलु हो सकते है। लेकिन पांच राज्यों के चुनावी परिणाम से मिलने वाले सबक और इनसे उठने वाले सवालों पर गंभीर चिंतन और मंथन की जरूरत है। इसलिए नहीं कि एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोपों की झड़ी लगाई जा सके बल्कि इसलिए के लोकतंत्र के मायने सिर्फ हार और जीत नहीं हो सकते है। राजनीति में कई बार हारकर भी जीता जाता है। और कभी-कभी जीत जाने के बाद भी हार ही महसूस होती है।

- Published on: June 29, 2016