चीन में चुनाव (Election in China - in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना: - चीन ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी विचारधारा को कम्यूनिस्ट पार्टी (साम्यवादी दल) के संविधान का हिस्सा बना दिया है। संविधान में शी को चीन के पहले कम्युनिस्ट नेता और संस्थापक माओत्से तुंग के बराबर दर्जा दिया गया है। अब जिनपिंग खुद को माओ जैसे नेता बनाने में सक्षम होंगे, यानी तब तक नेता बने रहेंगे। आधुनिक कम्युनिस्ट चीन के संस्थापक माओ त्सेतुंग के साथ संविधान में एक नए दौर के लिए चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद के बारे में शी जिनपिंग के विचार को शामिल किया गया है।

कम्युनिस्ट पार्टी: - कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस के आखिर में यह फैसला लिया गया। ताजा कदम से पता चलता है कि 2012 में सत्ता संभालने वाले शी ने कितनी तेजी से चीन की सत्ता पर अपनी पकड़ को मजबूत की है। इससे पहले भी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के अपने विचार रहे हैं, लेकिन माओत्से तुंग के अलावा किसी के भी विचार को पार्टी संविधान में थॉट के रूप में जगह नहीं दी गई थी।

चीन की सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने हफ्ते भर चले सम्मेलन के बाद राष्ट्रपति शी जिनफिंग (64) के पांच साल के दूसरे कार्यकाल को मंजूरी दे दी है। ऐसे कई नेताओं को भी नियुक्त किया गया है, जिन्हें शी का समर्थन हासिल है। कम्युनिस्ट पार्टी (साम्यवादी दल) ऑफ (के) चाइना के पदक्रम में शी और प्रधानमंत्री ली केकियांग क्रमश: पहले और दूसरे नंबर पर हैं। अब दोनों ही 5 साल तक शीर्ष नेतृत्व पर बने रहेंगे।

तीन पड़ाव: - पार्टी (दल) ने इस नए युग को आधुनिक चीन का तीसरा चैप्टर (अध्याय) करार दिया है।

  • पहला चरण चेयरमैन (अध्यक्ष) माओ का था जिन्होंने गृह युद्ध में फंसे चीन को निकलने के लिए लोगों को एकजुट किया था।
  • दूसरा चरण देंग जियाओपिंग का रहा जिनके शासनकाल में चीन पूंजीवाद की तरफ बढ़ा। उन्होंने चीन को आर्थिक रूप से ताकतवर बनाया।
  • अब तीसरा युग शी जिनपिंग का शुरू हुआ है। उन्होंने चीन को अमेरिका के बाद दूसरा सुपर (भव्य) पॉवर (ताकत) के तौर पर खड़ा किया है। भ्रष्टाचार के विरोध में लड़ाई शुरू की अब शी का नाम पार्टी संविधान में शामिल किया गया है, जिसके बाद से उन्हें कोई चुनौती नहीं दे पाएगा।

अब स्कूल (विद्यालय) के बच्चे, कॉलेज (महाविद्यालय) स्टूडेंट (विद्यार्थी), सरकारी कर्मचारी, नौ करोड़ कम्युनिस्ट पार्टी (साम्यवादी दल) के सदस्यों के साथ शी जिनपिंग थॉट पढ़ेंगे। चीन में शी जिनपिंग थॉट के साथ ही नए तेवर में चीनी समाजवादी युग शुरू हो गया है।

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (साम्यवादी दल) ऑफ चाइना (सीपीसी) ने 19वीं कांग्रेस में राष्ट्रपति शी जिनपिंग की विचारधारा को संविधान में शामिल कर लिया। उन्हें चीन के पहले कम्युनिस्ट पार्टी (साम्यवादी दल) व राष्ट्रपिता कहे जाने वाले माओत्से तुंग के बराबर दर्जा दिया गया है। यानी वो मौजूदा समय में चीन के सबसे शक्तिशाली नेता बन गए हैं। कांग्रेस में सीपीसी के सभी 2287 सदस्यों ने संविधान में ’शी जिनपिंग थॉट’ को शामिल करने के पक्ष में मतदान किया। विरोध में एक भी मत नहीं पड़ा। इस थॉट पर चीन में नीतियां भी बनेंगी। सीपीसी ने इस नए युग को आधुनिक चीन का तीसरा चैप्टर (अध्याय) बताया है। जिनपिंग को दूसरा कार्यकाल मिलना तय है। इसकी औपचारिक घोषणा होगी।

नंबर (संख्या) दो- चीन में ’शी जिनपिंग थॉट’ से पहले दो नेताओं के विचार को सीपीसी ने सविंधान में शामिल किया था। इनमें पहला नाम माओत्से तुंग है। माओ क्वॉट को पार्टी (दल) ने उनके जिंदा रहने तक ही संविधान में जगह दी थी। दूसरा नाम देंग जियाओपिंग का है।

शी थॉट में 14 सिद्धांत- ’शी जिनपिंग थॉट’ कम्युनिस्ट पार्टी (साम्यवादी दल) की विचारधारा जैसी ही है। इसके आधार पर ही जिनपिंग ने 5 साल तक शासन किया है। इसमें 14 सिद्धांत हैं। जिसमें 4 खास बातें निम्न हैं-

  • देश में पूर्ण और बड़े सुधार की पहल और नए विकासशील विचारों को अपनाना।
  • मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्यपूर्ण जीवन का वायदा। पर्यावरण संरक्षण, ताकि देश की ऊर्जा जरूरतों को नवीकरणीय ऊर्जा द्वारा पूरा किया जा सके।
  • पीपल्स आर्मी पर कम्युनिस्ट पार्टी (साम्यवादी दल) के पूर्ण अधिकार पर जोर। मकसद, चीन के आधुनिक इतिहास में बड़ा बदलाव लाना। वरिष्ठ मिलिट्री (सैन्य) अधिकारियों से बाचचीत ।
  • एक देश, दो सिस्टम (प्रबंध) की महत्ता पर जोद देना। इसके माध्यम से हांगकांग और ताइवान के लोगों को अपनी मातृभूमि चीन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

संविधान: -सीपीसी कांग्रेस के संशोधित संविधान की दो बड़ी बातें-

  • शी जिनपिंग थॉट चीनी समाजवाद के नए युग की शुरूआत है। इसके नए तत्व पार्टी को नए कदम उठाने में गाइड (दिशा निर्देश/मार्गदर्शन) के तौर पर काम आएंगी।
  • पार्टी देश में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को तेज और बड़े पैमाने पर चलाएगी। कांग्रेस में सीपीसी सदस्यों ने इसकी शपथ भी ली।

मायने: - शी जिनपिंग अब चीन के सबसे ताकतवर व्यक्ति बन गए हैं। अब प्रतिदव्ंदव्ी भी उन्हें बिना कम्युनिस्ट पार्टी (साम्यवादी दल) के नियमों का हवाला दिए चुनौती नहीं दे सकते हैं।

विचार: - ’शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन पड़ोसियों के खिलाफ काफी आक्रामक हुआ है। खासकर, समंदर में। वियतनाम, जापान, फिलीपींस, ताइवान आदि देशों के साथ उसके विवाद बढ़े है। कई जगहों पर चीन ने बल प्रयोग भी किया। उनकी सीमा विस्तारवादी नीति बहुत खतरनाक है। जिनपिंग अब अति कट्‌टर राष्ट्रवाद को और आगे बढ़ाएंगे। उनका मानना है कि वह दुनिया में आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे आगे थे, हैं और रहेंगे। उनका मुकाबला सिर्फ अमेरिका से है। शी उससे भी आगे भी निकलना चाहते हैं। भारत के सामने शी का कट्‌टर राष्ट्रवाद बड़ी चुनौती है। क्योंकि चीन पड़ोसियों की चिंताओं और आकांक्षाओं के बारे में नहीं सोचता है। वह सिर्फ दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनना चाहता है। हालांकि डोकलाम विवाद के बाद भारत की छवि दुनिया में बदली है। क्योंकि अभी तक चीन से इतनी आसानी से कोई नहीं निपट सका था। पर वे इसका बदला जरूर लेंगे, भूलेंगे नहीं। वन (एक) बेल्ट (पटटा), वन (एक) रोड (सड़क) इन्हें फंसाएगा, क्योंकि चीन ने सहयोगी देशों को पैसा दे रखा है। वे वापस नहीं कर पाएंगे यह श्रीलंका के हम्बनटोटा में देखने को मिला। चीन और भारत के बीच सहयोग और मतभेद चलता रहेगा। भारत को इनके साथ सोच-समझकर व्यवहार करना चाहिए। शी ने चीन को बढ़ाने के लिए विदेशी पूंजी निवेश का भी प्रयोग किया है। हालांकि, इन्होंने देंग जियाओपिंग की नीतियों को ही आगे बढ़ाया है।

जी पार्थसारथी, विदेशी मामलों के विशेषज्ञ

भारत-चीन संबंध: -

  • सीपीसी के एजेंडे (कार्यसूची) से लगता है कि हिन्द महासागर में उसका असर बढ़ेगा। चीन की सप्लाई (आपूर्ति) लाइन (रेखा) इसी रास्ते है। भारत यहां चीनी नौसेना की मौजूदगी पर एतराज जता चुका है।
  • चीन की वन (एक) बेल्ट (पट्‌टा), वन (एक) रोड़ (सड़क) परियोजना में नेपाल, मालदीव, पाकिस्तान, श्रीलंका की भागीदार हैं। चीन के साथ इन देशों की साझेदारी बढ़ी है। भारत इसके लिए क्या रणनीति बनाता है, यह बड़ी चुनौती है।
  • कश्मीर, अरुणाचल और डोकलाम में सीमा विवाद और कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग जैेसे मुद्दों पर चीन सख्त रुख दिखा सकता है।
  • भारत कुल आयात का 16 प्रतिशत सामान चीन से आता है। यह आयात 4.11 लाख करोड़ रू. है। निर्यात 68 हजार करोड़ रू. का है। यानी निर्यात के मुकाबले 6 गुना ज्यादा आयात है।

वर्ल्ड मीडिया (विश्व संचार माध्यम) : -

  • बीबीसी-शी ने सत्ता में आने के बाद ही पूर्ववर्ती नेताओं के उलट विचार पेश किए। यही वजह है कि अब माओं के बाद वह दूसरे बड़े नेता हैं।
  • न्यूयॉर्क टाइम्स- शी जिनपिंग चीन के सबसे शक्तिशाली नेता हैं। उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? इसके लिए चीन की जनता को इंतजार करना होगा।
  • द गार्डियन-शी जिनपिंग के ताकतवर होने से उनके विरोधियों का सफाया हो गया है। इससे चीन के संविधान संशोधन का रास्ता भी खुल गया है।
  • द असाही शिंबुन-चीन में जिनपिंग के वफादार ही उनका गीत गाकर जश्न मना रहे हैं। इसमें लोगों को जबरन शामिल किया जा रहा है।

ताकतवर टीम: -कम्युनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (दल) ऑफ (के) चाइना की 19वीं कांग्रेस को समाप्त हो गई। इतिहास में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी के मौजूदा चेयरमैन (अध्यक्ष) के उत्तराधिकार का ऐलान नहीं किया गया है। चीन के राष्ट्रपति और पार्टी के चेयरमैन शी जिनपिंग ने परंपरा को तोड़ते हुए देश की सबसे शक्तिशाली 7 सदस्यीय स्टैडिंग (स्थायित्व) कमेटी (समिति) की घोषणा की है। इसमें एक भी युवा चेहरा नहीं है। सभी की उम्र 60 साल से ज्यादा है। पार्टी में आधिकारिक रिटायरमेंट (सेवानिवृत्ति) की उम्र 68 साल है। इससे पहले कांग्रेस के अंतिम दिन राष्ट्रपति शी जिनपिंग का कार्यकाल और 5 साल बढ़ाए जाने पर मुहर लगी। वहीं, 7 सदस्यीय स्थाई समिति में 5 नए सदस्य चुने गए है। इनमें 64 वर्षीय शी के अलावा 62 वर्षीय प्रधानमंत्री ली केकियांग ही ऐसे सदस्य हैं जो आगे भी बने रहेंगे। केकियांग पार्टी में जिनपिंग के बाद नंबर दो हैं। इसके अलावा 25 सदस्यीय पोलित ब्यूरो (सरकारी विभाग) टीम (दल) का भी चयन किया गया है। सदस्यों की घोषणा बीजिंग के ग्रेट (बहुत बड़ा) हॉल (भवन) में हुई। सीपीसी के सेंट्रल (केन्द्रीय) कमेटी (समिति) में 200 सदस्य हैं।

ये चीन के 7 सबसे शक्तिशाली नेता-

Image of 7 Most Powerful Leader of China

Image of 7 Most Powerful Leader of China

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शी युग की शुरुआत: -

  • चीन में आर्थिक प्रबंधन की आशंका खारिज, चीनी विशेषताओं वाले ’नए युग’ का समाजवाद जारी रहेगा। परन्तु एक ही व्यक्ति के पास अधिक ताकत के खतेर भी हैं।
  • 18 अक्टूबर को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पंचवर्षीय कांग्रेस की शुरुआत के पहले देश के सुरक्षा अधिकारियों ने निगरानी जरूरत से ज्यादा बढ़ा दी। विदेशियों के तिब्बत जाने पर रोक लगा दी गई, जबकि वह बीजिंग से 1000 से ज्यादा किमी दूर है, लेकिन पार्टी को डर था पृथकतावादी का अकेला बैनर भी बीजिंग के आयोजन को किरकिरा कर देगा।
  • शी के उद्घाटन भाषण को आम सहमति का नतीजा बताया गया, लेकिन इस बार भाषण पर वक्ता यानी शी की व्यक्तिगत छाप थी। शी फॉर्मूले (शूत्र) जैसी शैली पर चिपके रहे और घिसे-पिटे जुमले दोहराते रहे। लेकिन, इसमें महत्वपूर्ण फर्क भी था जैसे एक सेक्शन (वर्ग) का उबाऊ-सा शीर्षक था, ’चीनी विशेषताओं के साथ ’नए युग’ के लिए समाजवाद पर विचार’।
  • सबसे महत्वपूर्ण तो उनका यह इशारा था कि अधिक आक्रामक विदेश नीति में कोई बदलाव नहीं होगा। 2012 में हुई पिछल कांग्रेस में हू ने कहा था कि सेना का काम ’सूचना के इस युग में स्थानीय युद्ध जीतना है।’ शी ने इसमें से ’स्थानीय’ शब्द हटा दिया। ताइवान पर उनकी भाषा और कड़ी थी। हू ने ताइवानी स्वतंत्रता का विरोध करने की बात कही थी तो शी ने इसे नष्ट करने की धमकी दी है। शी के कहने पर पार्टी ने सरकारी उपक्रमों पर पकड़ बनानी शुरू कर दी है और निजी कंपनियों (संगठन) पर भी प्रभाव चाहते हैं। पार्टी (दल) ने आंत्रप्रेन्योर्स से देशभक्त होने को कहा है। ऐसा लग सकता है कि शी निजी कंपनियों की नकेल कस रहे हैं पर ऐसा है नहीं। नियामकों ने सबसे ज्यादा अधिग्रहण में लगी चार कंपनियों को अतिरिक्त जांच के लिए चुना। बीमा कंपनी अनबाग, उड्‌डयन व पर्यटन कंपनी (संगठन) एचएनए, प्रॉपर्टी (संपत्ति) डेवलपर (विकसित करने वाला) वांडा और औद्योगिक समूह फोसून। नतीजा यह हुआ कि विदेश में निवेश की उनकी जो आपाधापी चल रही थी वह इस साल एकदम नीचे आ गई। वांडा ने कई होटल (सराय) असेट बेच दी।। अनबांग संस्थापक जेल में हैंं लेकिन यह आंत्रप्रेन्योर पर हमला नहीं है। चीन के सर्वाधिक धनी 2, 130 लोगों की सूची में पिछले साल सिर्फ पांच लोग कानून के उल्लंघन के आरोपी बने। इसके विपरीत कम्युनिस्ट पार्टी की 205 सदस्यीय केन्द्रीय समिति के 10 फीसदी सदस्य 5 वर्षो में शी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की बलि चढ़ गए।
  • एक चिंता तकनीकी सेक्टर पर कड़े नियंत्रण की थी। वॉलस्ट्रीट जर्नल ने रिपोर्ट (विवरण) छापी थी कि इंटरनेट रेग्युलेटर (नियंत्रक) सोशल (सामाजिक) मीडिया (संचार माध्यम) की दिग्गज कंपनियों में 1 फीसदी शेयर लेंगे जिसमें अलीबाबा की यूट्‌यूब जैसी कंपनी योउकू और ट्‌िवटर जैसी वेइबो शामिल है। लेकिन, इन पर पहले ही काफी नियंत्रण है। कोई पार्टी को नाराज नहीं कर सकती या सुरक्षा एजेंसियों (शाखओं) के डेटा (आंकड़ा) मांगने पर इनकार नही कर सकती। फिर वे पहले ही पार्टी को खुश करने वाले प्रोडक्ट (उत्पाद) बेच रहे हैं। टेनसेंट ने वीचैट के लिए एक एप बनाया है, जिसमें मोबाइल की स्क्रीन (पर्दा) को ’थपथपा कर शी के भाषण को सराहना देने’ की स्पर्धा की जा सकती है। कुछ कंपनियां (संगठन) यूजर (उपयोगकर्ता) पर निगाह रखने की तकनीक लाई हैं, जो अधिकारयाेिं को नागरिकों की नब्ज जानने में मददगार होगी।
  • यह धारणा कि शी इनोवेशन (नवाचार) का दम घोंट रहे हैं यह फलते-फूलते उद्योग से सही साबित नहीं होता। केवल अमेरिका में ही चीन से ज्यादा मूल्यवान स्टार्टअप (उद्धाटन) हैं। मीडिया (संचार माध्यम) ने पार्टी (दल) के इन निर्देशों पर फोकस (ध्यान) किया कि आंत्रप्रेन्योर को देशभक्त होना चाहिए, लेकिन ज्यादातर इसका अर्थ यही लगाया गया कि सरकार उनकी कैसे मदद कर सकती है। चाइना फाइनेंशियल (वित्तीय) रिफॉर्म (सुधार) इंस्टीट्‌यूट (संस्थान) के अध्यक्ष गैरी लिड कहते हैं कि असली संदेश तो यह है कि आंत्रप्रेन्योर अर्थव्यवस्था के लिए बहुत जरूरी हैं।
  • कम्युनिस्ट पार्टी के इस अधिवेशन में एक पल को ऐसा लगा कि चीन माओवादी आर्थिक प्रबंधन की ओर तो नहीं लौट रहा है। कांग्रेस के दौरान एक महिला अधिकरी ने शी जिनपिंग से कहा कि इसके गांव की डिस्टिलरी (मद्यशाला) ’बाइजीउ’ (स्थानीय मदिरा) की बोतल 99 युआन (15 डॉलर) में बेचती है। माओ के बाद सबसे प्रभावशाली चीनी नेता नेता शी ने कहा यह कुछ महंगी लगती है। महिला अधिकारी ने धन्यवाद दिया और कहा कि वे उनके मार्गदर्शन का पालन करेंगे। लेकिन, शी ने उस महिला अधिकारी को रूकने का इशारा किया और शरारती मुस्कान के साथ कहा, ’यह बाजार का फैसला है। कीमत को घटाकर सिर्फ इसलिए 30 युआन मत कर देना कि मैंने कहा है।’ श्रोताओं को इससे राहत मिली के कीमतें तय करने का शी का कोई इरादा नहीं है और वहां जोर का ठहाका लगा। रसहीन अधिवेशन में यह हल्का-फुल्का क्षण बहुत कुछ कह गया। शी चाहे सही कहते हों, लेकिन एक ही व्यक्ति के हाथ में बहुत अधिक ताकत होने का खतरनाक असर हो सकता है। बाइजिड पर शी की टिप्पणी के कुछ दिन बाद उस डिस्टिलरी ने घोषणा की कि वह नए ब्लेंड (मिश्रण) की बातल 30 युनान में बेचेगी।
  • ओबोर: - चीन में हाल ही संपन्न चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के 19वें सम्मेलन के दौरान वहां के संविधान में वन बेल्ट वन रोड (ओबोर) को शामिल करने का प्रस्तावन स्वीकृत किया गया। चीन खरबों डॉलर की इस राजनीतिक परियोजना से भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है कि वह भी इसमें शामिल हो। भारत ने इसमें भाग लेने से स्पष्ट तौर पर इनकार कर दिया है। इससे भारत के सुरक्षा में सेंध लग सकती है। यह भी उल्लेखनीय है कि ओबोर से भारत को कोई फायदा तो होगा नहीं बल्कि यह चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक (अर्थशास्त्र) कॉरिडोर (गलियारा) (सीपीईसी) को इस प्रकार प्रभावित करेगा कि उससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था व सुरक्षा तो मजबूत होगी लेकिन भारत के हितों पर कुठराघात होगा। चीन के सीपीसी सम्मेलन में लाए गए प्रस्ताव के समर्थन में हो सकता है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत को छोटा फायदा या लालच दिखा कर ओबोर स्वीकार करने के लिए मनाने की कोशिश करें। सीपीईसी को लेकर दिखाए जा रहे उत्साह के बीच (हालांकि इसे गेम चेंजर (खेल परिवर्तन) माना जा रहा है) पाकिस्तान में भी ऐसी भावनांए प्रबल हो रही हैं, ’कहीं ऐसा न हो कि पाकिस्तान चीन की काल्पनिक कॉलोनी (बस्ती) बनकर रह जाए और कर्ज के बोझ तले दब जाए।’ ऐसे में भारत कभी नहीं चाहेगा कि उसकी भी ऐसी स्थिति हो। ओबोर अपनाने के पीछे चीन का उद्देश्य युद्ध के बाद दोबारा उठ खड़े हुए यूरोप के ’मार्शल (सेनापति) प्लान’ (योजना) के चीनी संस्करण को दुनिया भर में फैलाना मात्र नहीं है बल्कि इसके जरिये वह एशिया, अफ्रीका और यूरोप में व्यापार व वाणिज्य बढ़ाने की जमीन तलाश कर रहा है। सीपीईसी एक प्रकार से ओबोर का ’दिखावटी नमूना’ कहा जा सकता है। भारत के लिए इसकी उपयोगिता संदिग्ध ही है। केवल इसलिए नहीं कि यह भारत के उस महत्वपूर्ण हिस्से से गुजरता है जिस पर पाकिस्तान अपना हक जताता रहा है बल्कि इसकी एक वजह यह भी है कि भारत अगर ओबोर स्वीकार कर भी लेता तो पाकिस्तान भारत को अफगानिस्तान अथवा उत्तर-पश्चिम के अपने किसी भी प्रान्त की धरती का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देता। जाहिर है हमें किसी भी ऐसे भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि ओबोर के जरिये भारत, पाक के आगे तक जाने वाले जमीनी रास्ते का इस्तेमाल कर सकेगा। इसके कारणों के बारे में बात करना बेमानी है।
  • रुग्ण मानसिकता वाला पाकिस्तान सैन्य शासन के तहत प्रतिबद्ध है कि वह भारत के साथ मित्रवत नहीं रहेगा। पाकिस्तान केवल कश्मीर को लेकर ही भारत के साथ असहज नहीं है बल्कि वह अफगानिस्तान के साथ भारतीय व्यापार के लिए अपनी जमीन से होकर जाने वाला रास्ता भी भारत के लिए खोलने को तैयार नहीं है। इस संबंध में ना तो वह अमरीका की सुन रहा है और ना किसी और की। जब अमरीका ही पाकिस्तान को उन दिनों में भारत को रास्ता देने के लिए राजी नहीं कर सकता जब भारत-पाकि के संबंध थोड़े बहुत शांतिपूर्ण थे तो इस बात की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि चीन अब पाकिस्तान को भारत को रास्ता देने के मामले पर पुनर्विचार करने के लिए सहमत करे। वह भी विशेषतौर पर तब, जबकि दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हैं। एक दौर जरूर ऐसा था जब पाकिस्तान, भारत के साथ जमीनी संपर्क के लिए तैयार था। ईरान और भारत के बीच एक गैस पाइपलाइन परियोजना के लिए पाक भारत को अपनी धरती का इस्तेमाल करने देने पर सहमत हो गया था लेकिन अमरीका की आपत्ति के बाद यह गैस पाइपलाइन परियोजना ठंडे बस्ते में पड़ गई। मध्य एशिया और उसके आगे के क्षेत्र के लिए जमीनी रास्ता उपलब्ध करवाने वाली ओबोर परियोजना निश्चित रूप से भारत के लिए प्रलोभन है लेकिन अपनी जमीन का इस्तेमाल ना करने देने की पाक हठधर्मिता के चलते भारत के लिए इसे नकार देना ही मुनासिब है। सीपीईसी के मुताबिक चीन इस परियोजना के तहत पाकिस्तान में 50 खरब डॉलर (मुद्रा) का निवेश करेगा, जिससे पाक में आधारभूत ढांचा सुधरेगा। इससे चीन से पाकिस्तान को भेजे जा रहे सैन्य हथियारों की भारी आपूर्ति को अधिक बढ़ावा मिलेंगा। चीन का उद्देश्य पश्चिमी देशों की आंख की किरकरी बन चुके व आर्थिक बदहाली से जूझ रहे पाकिस्तान को आर्थक व सैन्य मोर्चे पर भारत के समकक्ष ला खड़ा करना है। चीन और पाकिस्तान के बीच मिलीभगत जगजाहिर है कि चीन भारत में निरंतर आईएसआई समर्थित आतंक फैलाने में पाक की सहायता कर रहा है। जो लोग भारत को ओबोर अपनाने की वकालत कर रहे हैं, उनका मानना है कि बिना इसके भारत क्षेत्र में अलग-थलग पड़ जाएगा। इसी साल मई में चीन में आयोजित उच्च स्तरीय ओबोर सम्मेलन में पड़ोसी देशों ने इस संबंध में चुप्पी साधे रखी। खैर, अमरीका और जापान ने ओबोर का पूर्णत: समर्थन नहीं किया। अगर भारतीय कूटनीति का फोकस (ध्यान) केवल वार्ता के बजाय व्यापक होता तो क्षेत्रीय सड़क संपर्क बढ़ाने के लिए भारत अधिक प्रयास कर चुका होता और व्यापार भी काफी समृद्ध हो चुका होता। ईरान में जारी चाबहार परियोजना सीपीईसी को टक्कर दे सकती है। परन्तु क्षेत्र में भारत का किसी भी मुद्दे पर अलग होना दुनिया के लिए मायने रखता है और ओबोर के बगैर भी भारत विकास पथ पर अग्रसर रहेगा, रूकेगा नहीं।

अतुल कौशिश, वरिष्ठ पत्रकार, तीन दशक की पत्रकारिता का अनुभव, नई दिल्ली में मीडिया (संचार माध्यम) शिक्षण से जुड़े

उपसंहार: - शी की इस जीत के बाद देखना यह होगा कि अब वो अपनी ताकत को जनता व देश के लिए किस प्रकार प्रयोग करेंगे?

- Published/Last Modified on: November 7, 2017

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