ईपीएफ (कर्मचारी भविष्य निधि योजना) (Employee Provident Fund - EPF - Essay in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना: - भविष्य निधि की पूरी राशि निकालने पर रोक संबंधी अधिसूचना कर्मचारी संगठनों के भारी विरोध को देखते हुए आखिरकार वापस ले ली गई। इससे पूर्व 2016 - 17 के बजट प्रस्तावों में भविष्य निधि निवेश से रुपए निकालने पर करारौपण की कोशिश की गई थी लेकिन इसका भी भारी विरोध हुआ तो वित्तमंत्री अरुण चेटली को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। सवाल यह उठता है कि सरकार आखिकार चाहती क्या हैं? सरकार अकसर भविष्य निधि के धन से छेड़छाड करने की कोशिश में ही क्यों लगी रहती हैं? भविष्य निधि खाते से पूरा पैसा निकालने पर रोक का फैसला कर्मचारियों को रास क्यों नहीं आ रहा था? या फिर, इस मामले में कर्मचारी संगठनों के विरोध का उद्देश्य कर्मचारियों का हित कम और राजनीतिक अधिक हो। क्या सरकार पुराने नियमों के मुताबिक कर्मचारियों के भविष्य का बेहतर प्रबंधन कर सकेगा?

विरोध: - कर्मचारियों के भारी विरोध के चलते भारत सरकार ने एक बार पीएफ की निकासी पर अंकुश लगाने वाली अधिसूचना को वापस ले लिया है। भारत सरकार के श्रम मंत्रालय ने 10 फरवरी 2016 से प्रभावी, पीएफ की पूरी राशि निकालने के कर्मचारी के अधिकार को सीमित करने वाली अधिसूचना में कहा था कि अब कर्मचारी पूरी पीएफ राशि को सेवानिवृत्ति आयु (58 वर्ष) प्राप्त करने से पहले नहीं निकाल सकेंगे। पूर्व में यह प्रावधान था कि 60 दिन की बेरोजगारी के बाद कर्मचारी अपनी और नियोक्ता दोनों दव्ारा जमा राशि और उस पर ब्याज को भी निकाल सकता था। फरवरी में जारी अधिसूचना के अनुसार कर्मचारी केवल स्वयं दव्ारा प्रदत्त राशि और उस पर ब्याज को ही रोजगार की समाप्ति पर निकाल सकता था। यानी जब तक वह सेवानिवृत्ति आयु तक नहीं पहुंचता रोजगार समाप्त होने पर वह ईपीएफ का सदस्य बना रहेगा। इसके साथ ही सेवानिवृत्ति की आयु 55 से बढ़ाकर 58 वर्ष कर दी गई है। कर्मचारी पहले पूरी राशि का 90 प्रतिशत तक 54 वर्ष की आयु होने पर निकाल सकता था लेकिन नए नियम के अनुसार वह पूरी राशि 58 वर्ष पूरे होने पर ही निकाल सकता है।

पीएफ: - नये नियमों का कर्मचारी वर्ग दव्ारा भारी विरोध हुआ क्योंकि इसके प्रभावी होने से बेरोजगार होने के बावजूद वे अपनी ही राशि नहीं निकाल पाते। गौरतलब है कि यह अधिसूचना श्रम मंत्रालय की थी इसके पूर्व, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कराधान की दृष्टि से भी बजट 2016 - 17 में पीएफ के साथ छेड़़छाड की थी। इससे पहले तमाम प्रकार के पीएफ और उन पर अर्जित ब्याज कर से मुक्त था। बजट में प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय पेंशन योजना की तर्ज पर अब पीएफ से 40 प्रतिशत से अधिक की निकासी पर कर देना पड़ेगा। यह सही है कि जो लोग नौकरी नहीं करते और पीएफ के सदस्य नहीं हैं, वे बैंको में अपनी जमा राशियों को कभी भी निकाल सकते है लेकिन उन्हें एक निश्चित मात्रा से अधिक ब्याज मिलने पर कर देना पड़ता है। कर्मचारी वर्ग चूंकि भविष्य निधि में पैसा जमा करता है, उसे पारंपरिक रूप से कर से छूट मिली हुई है। करीब 10 सालों से अधिक समय से राष्ट्रीय पेंशन योजना के नाम पर एक नई प्रकार की निधि का निर्माण हुआ है, जिसमें कोई भी व्यक्ति राशि जमा कर भविष्य में पेंशन को पा सकता है। लेकिन इस पेंशन पर कर लगेगा।

कर और जमापूंजी: - सरकार की कोशिश है कि राष्ट्रीय पेंशन योजना की तर्ज पर देश में सब लोग पेंशन निवेश में ही पैसा लगाए और भविष्य में पेंशन प्राप्त करें। इसी आधार पर वित्तमंत्री ने बजट में यह प्रावधान किया कि राष्ट्रीय पेंशन योजना में जमा राशि की 40 प्रतिशत निकासी तक कर में छूट हैं, इसी तर्ज पर ईपीएफ समेत पुरानी सभी भविष्य निधियों पर भी उसी तर्ज 40 प्रतिशत तक की निकासी पर ही कर में छूट मिलेगी। इसका व्यापक विरोध हुआ और सरकार को स्पष्टीकरण के माध्यम से इसे वापस लेना पड़ा और कहा गया कि शेष 60 प्रतिशत की निकासी पर कर, केवल अप्रेल 2016 के बाद अर्जित ब्याज पर ही देना पड़ेगा। कम आमदनी पाने वाले लोगों की भविष्य निधियों की निकासी पर अंकुश लगाने वाले कानून सही नहीं ठहराये जा सकते। सरकार को समझना होगा कि बहुसंख्यक गरीब कर्मचारियों की बचतों पर अंकुश लगाकर उन पर कर बढ़ाकार राशि जुटाना सही कदम नहीं है। बड़ी-बड़ी जनसमूहों विभिन्न सरकारी छूटों का लाभ उठाकर लाखों करोड़ रुपए डकार जाती हैं और सरकार उन पर अभी तक कोई प्रभावी अंकुश नहीं लगा पाई। भविष्य निधियों पर अंकुश नैतिक दुष्टि से सही नहीं कहा जा सकता है। गरीब और मध्यम आर्य वर्ग की जमापूंजी को लेकर बार-बार छेड़छाड ठीक नहीं कही जा सकती है।

नियम: -10 साल तक लगातार काम करने के बाद ही कर्मचारी भविष्य निधि खाताधारक पेंशन का हकदार हो पाता है। यद्यपि कर्मचारी संगठनों के विरोध के मद्देनजर फेसले के रोल बैक से कुछ घंटे पहले सरकार ने ईपीएफ निकासी के नए नियमों पर अमल 31 जुलाई तक के लिए टालने का ऐलान किया। यानी नौकरी छोड़ने तथा 58 वर्ष से ईपीएफ को निकालने पर रोक अब पहली मई के बजाय एक अगस्त से लागू होनी थी। यही नहीं नए नियमों में ढील भी दे दी, मगर इससे बात नहीं बनी।

नए नियमों के तहत बीच में ही नौकरी छोड़ने वाले कर्मचारियों को केवल भविष्य निधि में अपना योगदान व ब्याज निकालने की छूट दी गई थी। नियोक्ता दव्ारा दिए गए अंशदान को भी निकालने के लिए सेवानिवृत्ति आयु को 55 से 58 वर्ष कर दिया गया था। यहीं नहीं, 90 फीसदी ईपीएफ निकासी के लिए आवश्यक न्यूनतम आयु को भी 54 से बढ़कर 57 वर्ष कर दिया गया।

योजना: - 10 फरवरी को ईपीएफओ ने कर्मचारी भविष्य निधि से धन निकासी के नियमों में पहली मई से बदलाव का ऐलान किया था। इसके तहत बीच में नौकरी छोड़ने वाले कर्मचारियों के 58 वर्ष की आयु से पहले पीएफ का पूरा पैसा निकालने पर पाबंदी लगा दी गई। यह पाबंदी उनका भविष्य निधि खाता चालू रखने के उद्देश्य से थी।

कारण: - भले ही बंडारू दत्तात्रेय ने हिंसक प्रदर्शनों के दबाव की बात नहीं कहीं, मगर असली कारण तो यही था। बेंगलुरु में पीएफ के नए नियमों के खिलाफ गारमेंट इंडस्ट्री (कपड़े का उद्योग) के कामगारों का प्रदर्शन उग्र हो गया। हजारों कर्मचारियों के सड़क पर उतरने से केंद्र सरकार पीएफ निकास से जुड़े नए नियम रद्द करने पर मजबूर हो गई। कर्मचारियों ने इसके खिलाफ ऑनलाइन (खुली हुई रेखा) अभियान भी रखा था।

पहले निकासी पर रोक लगाने का निर्णय भी संगठनों की राय लेकर किया गया था। अब मजदूर संगठन फैसला वापस लेने के लिए अनुरोध कर रही हैं। इसलिए हमने फैसला वापस ले लिया।

बडांरू दत्तात्रेय

कटौती: - 10 कर्मचार भविष्य निधि में कर्मचारी के मूल वेतन की 12 फीसदी राशि की कटौती की जाती है और इतना ही हिस्सा उसके नियोक्ता की ओर से उसके भविष्य निधि खाते में जमा किया जाता है। अगर किसी कर्मचारी की मासिक तनख्वाह 15 हजार रुपए से कम हैं तो कर्मचारी के हिस्से से करीब 30 फीसदी ईपीएफ में अनिवार्य रूप से जाता है और बाकी 8.33 फीसदी रकम कर्मचारी की पेंशन योजना (ईपीएस) में जाती है। कर्मचारियों की भविष्य निधि को कर्मचारी भविष्य निधि संगठन संचालित करता है।

तरीका: - पीएफ निकासी पर कर लगाने की बात सरकार की समावेशी विकास की योजना पर भी सवाल खड़ा करती है। कुछ विश्लेषकों को मानना है कि अगर सरकार को यह प्रावधान लागू ही करना था तो पीएफ निकासी पर कर को एक निश्चित सीमा से ऊपर की आमदनी वाले लोगों पर लागू करना चाहिए था। इससे मध्यमवर्ग और कम वेतन वाले लोगों में रोष नहीं होता।

नए बदलाव: -

  • बच्चो की शादी- पहले बच्चों की शादी के लिए पीएफ का 50 फीसदी हिस्सा ही निकालने की छूट, अब पूरा पैसा निकालने का प्रस्ताव।
  • गंभीर बीमारी- पहले भी थी छूट, अब खुद या परािवार के सदस्य को टीबी, कैंसर, दिल के ऑपरेशन, लकवा जैसी गंभी बीमारी होने पर पूरा पैसा निकालने का प्रस्ताव।
  • बच्चों की शिक्षा- बच्चों की शिक्षा के लिए पैस निकालने का नहीं था प्रावधान, अब मेडिकल, इंजीनियरिंग आदि के लिए पूरा पैसा निकालने का प्रस्ताव
  • मकान निर्माण- पहले घर बनाने के उद्देश्य से भविष्य निधि का कुछ हिस्सा ही निकाल सकते थे। अब पीएफ का पूरा पैसा निकालने की छूट का प्रस्ताव।

विरोध की शुरूआत: - कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की कर्मचारी पेंशन योजना-95 (ईपीएस) अब तक की सबसे शानदार योजना कही जा सकती है। इसके तहत नियोक्ता अपने कर्मचारी के भविष्य निधि खाते में वेतन के 12 फीसदी का अंशदान करता है। जिसमें 8.33 फीसदी पेंशन निवेश में चला जाता है और 3.67 फीसदी कर्मचारी या उपभोक्ता के खाते में चला जाता है। सरकार की ओर से इस 3.67 फीसदी वाले अंंशदान के हिस्से की राशि की निकासी पर रोक लगाई गई थी।

सरकार की ओर से 10 फरवरी 2016 को जारी अधिसूचना में कहा गया था कि कर्मचारी इस 3.67 फीसदी वाले अंशदान को 58 वर्ष की उम्र तक नहीं निकाल सकेगा। यहीं से असमंजस की स्थिति बनी और कर्मचारी संगठनों की ओर से विरोध शुरू हो गया। कुछ कर्मचारी संगठनों के नेताओं ने पूरे मामले इस तरह से प्रचारित किया कि कर्मचारी भविष्य निधि का पूरा पैसा 58 वर्ष की उम्र तक निकाल नहीं सकता है। इसलिए मामला ओर अधिक बिगड़ गया था।

गलती: - यदि कर्मचारी एक ही जनसमूह में 10 वर्ष तक काम करे तो उसके भविष्य निधि खाते में नियमित रूप से राशि जमा होती रहती है। ऐसे में नियोक्ता के साथ सरकार की ओर से भी 1.66 फीसदी का अंशदान किया जाता हे। लेकिन, निजी क्षेत्र में अकसर यह देखने में आता है कि कर्मचारी एक ही जनसमूह के साथ लंबे समय तक काम नहीं कर पाता। कई बार भविष्य निधि खाता धारक की नौकरी भी छूट जाती है। ऐसे में कर्मचारी अपना धन भविष्य निधि से निकालता है। भविष्य निधि से धन निकालने के बाद वह भविष्य निधि का उपभोक्ता नहीं रह जाता है। न तो खाते में नियोक्ता की ओर से और फिर नही सरकार की ओर से ही उसके खाते में पैसा जमा होता है। इस तरह भविष्य निधि संगठन का उद्देश्य जो कर्मचारी के भविष्य के लिए राशि का बेहतर प्रबंधन करना है, समाप्त होने लगता है। कर्मचारी के एक साथ पैसा निकाल लेने की स्थिति में उसे भविष्य में पेंशन नहीं मिल पाती है। सरकार भविष्य निधि खाता चलाते रहने के पक्ष में थी और इसके लिए 3.67 फीसदी अंशदान की राशि को 58 वर्ष से पूर्व ही निकालने पर रोक लगाई गई। भारतीय मजदूर संघ भी चाहता था कि कर्मचारी की नौकरी छूट जाने की स्थिति में इस 3.67 फीसदी राशि में सही सरकार की ओर से 1.66 फीसदी के अंशदान की राशि ले ली जाए। अन्य अंशदान नियोक्ता की ओर से पेंशन निवेश में जमा कराई गई राशि के ब्याज से नियोक्ता के अंशदान की भरपाई हो। इसके लिए 10 वर्ष वाले प्रावधान को हटाकर जितने वर्ष उसने सेवा दी, उसे भी मान्यता दी जाए। कुल मिलाकर खाता धारक का खाता बना रहे ताकि उसे पेंशन मिले। सरकार की गलती यह रही है कि उसकी ओर से जारी अधिसूचना में उद्देश्य को स्पष्ट नहीं किया गया।

राजनीति: - यहां मजेदार बात यह है कि भविष्य निधि के जिस अंश को रोकने की बात थी, उसका फैसला केबिनेट (मंत्री-परिषद्) स्तर पर नहीं हुआ। हालांकि इस फेसले में श्रम मंत्री की सहमति थी लेकिन यह कमिश्नर (उच्च शासकीय अधिकारी/आयोग का सदस्य/आयुक्त) के स्तर पर लिया जाने वाला नियमित फैसला था। इससे पूर्व बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भविष्य निधि खाते से धन निकालने पर करारोपण का प्रस्ताव किया था लेकिन उसे वापस ले लिया गया। इससे विपक्षी दलों को विरोध का मौका नहीं मिल पाया। अब जिन राज्यों में चुनाव होनें हैंं, उनमें इस मामले को उठाकर विपक्षी दलों दव्ारा लाभ उठाने की कोशिश की जा रही है। वे कर्मचारियों को वास्तविक स्थिति को नहीं बता रहे और उन्हें पूरी राशि को निकाल लेने की बात समझाकर विरोध कर रहे हैं। लेकिन, अब सरकार इस मामले को लेकर अपने कदम खींच लिये हैं।

घोषणा: -वित्तमंत्री अरुण जेटली ने पहले 29 फरवरी को बजट में ईपीएफ यानी कर्मचारी भविष्य निधि से कर्मचारियों के पैसा वापस निकालने की स्थिति में कर लगाने की घोषणा की। फिर उसे वापस लेना पड़ा। ताजा विरोध श्रम मंत्रालय के नए प्रतिबंधों को लेकर था। फिर सरकार को समझना होगा कि हमारे देश में नौकरीपेशा लोग जो पीएफ में पैसा जमा करते हैं, उन्हें लगता है कि यह पैसा आपात स्थिति में सहारे के लिए है। वैसे भी 90 फीसदी से अधिक कामगारों को पीएफ मिलता ही नहीं है। जिन लोगों को पीएफ मिलता हैं, उनमें भी सरकारी विभागों के कर्मचारी ज्यादा है। अब कर्मचारी को अपने वेतन पर पीएफ मिलता है तो जाहिर तौर पर इस पर उसी का हक है। इसलिए जब प्रतिबंधों की घोषणा हुई तो कर्मचारी नाराज हो गए थे। खासतौर पर मध्यमवर्ग नाराज हो गया था। उसकी मेहनत की जमापूंजी सरकार छीनने की कोशिश में लग रही है। इसलिए सरकार ने कहा कि पीएफ से निकालकर पैसा पेंशन निवेश में डाल दें तो कर नहीं देना पड़ेगा पर लोग संतुष्ट नहीं हुए । प्रधानमंत्री को दखल देना पड़ा और घोषणा को वापस लेना पड़ा।

नुकसान: - जितना कर से राजस्व मिलता, उससे अधिक नुकसान सरकार को लोगों की नाराजगी का झेलना पड़ता। अभी राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। वहां कर्मचारियों में नकारात्मक संदेश जाता है। अब बेंगलुरु में मजदूर कामगार संड़क पर निकलकर प्रदर्शन कर रहें हैं तो सरकार को कहना पड़ा कि घोषणा वापस ले रहे हैं। एक ओर सरकार कह रही है कि देश तरक्की कर रहा है पर युवकों को नौकरियां तो नहीं मिल रही हैं। यह सबसे बड़ी आर्थिक समस्या है। निजी क्षेत्र निवेश कर रहा है पर लोगों को नौकरी नहीं मिल रही हे। वह तकनीक में निवेश कर रहा है रोजगारों में नहीं। इसलिए यूपीए सरकार के वक्त नौकरी की समस्या ही रही थी, वही समस्या कमोबेश आज भी है।

नई योजना: - समय से पहले पीएफ खाते से निकासी को कम करने और राज्यों को इसकी पेंशन प्रणाली से जुड़ने के लिए अब नई योजना बनाई गई है। इसके तहत अब एक कर्मचारी का एक ही पीएफ खाता होगा। ईपीएफओ के केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त वीपी जॉय ने कहा कि कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच संवाद की जरूरत है। कर्मचारियों के नौकरी बदलने पर निकासी से जुड़े मसले का समाधान अच्छी सेवा और आसान माध्यम के जरिए किया जाए। नियोक्ताओं और कर्मचारियों को अपने व्यक्तिगत प्रोफाइल (पार्श्व दृश्य) से जुड़ी राशि देखने की सुविधा होनी चाहिए। जॉय ने कहा कि एक मई 2016 से एक कर्मचारी एक पीएफ खाता स्कीम का प्रस्ताव दिया गया है।

ब्याज: - वित्त मंत्रालय ने पीएफ पर मिलने वाला ब्याज वर्ष 2015 - 16 के लिए 8.75 प्रतिशत से घटा कर 8.70 प्रतिशत कर दिया है। इससे कर्मचारी संगठनों ने वित्त मंत्रालय दव्ारा ब्याज दर को घटकार 8.7 प्रतिशत किए जाने के फेसले के विरोध में राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन की घोषणा की थी। वहीं दूसरी ओर केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) के अंशधारकों के जमा पर 8.8 प्रतिशत ब्याज देने का प्रस्ताव या सिफारिश किया था। जिसे सरकार ने नहीं माना था। अब कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीफ) पर केंद्र सरकार ने एक बार फिर पलटी खाई है। कर्मचारी संगठनों के विरोध को देखते हुए वित्त मंत्रालय ने भी ईपीफ पर ब्याज 8.8 फीसदी करने का फैसला किया है। यह पहली बार हुआ जब सरकार ने सीबीटी की सिफारिश नहीं मानी थी। इसलिए यह तीसरा मौका है जब सरकार को वार्षिक बजट मेें ईपीएफ से जुड़े प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा।

उपसंहार: -आज भी लोग सरकार पर निर्भर हैं। पीएफ निकासी पर कर लगाने की बात सरकार की समावेशी विकास की योजना पर भी सवाल खड़ा करती है। सरकार को यह कार्यक्रम बढ़ाना था तो मध्यमवर्ग नौकरीपेशा लोगों को बाहर रखना चाहिए था। यहीं वर्ग भाजपा का बड़ा वोट बैंक है। कुल मिलाकर सरकार ने पीएफ के बारे में कर्मचारीयों को कोई स्पष्टीकरण नहीं किया हैं। इसलिए इस मामले में पूर्ण रूप से स्पष्टीकरण होने से ही मामला ठीक हो सकता हैं। वरना कर्मचारियों में असमंसस्य की स्थिति बनी ही रहेगी। नई योजना के तहत प्रस्तुत प्रस्ताव भेजने से आगे क्या होता हैं? यह तो भविष्य में ही पता पड़ सकेगा।

- Published/Last Modified on: May 13, 2016

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