एफडीआई ई खुदरा (Essay in Hindi - FDI E-Commerce) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: - भारत के तेजी से बढ़ते ऑनलाइन (खुली हुई रेखा) बाजार में विदेशी निवेश खींचने के लिए सरकार ने सन्‌ 2016 अप्रेल माह में 100 फीसदी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) की मंजूरी दे दी है। साथ ही डीआईपीपी ने ई-कॉमर्स (ई- वाणिज्य संबंधी) की परिभाषा स्पष्ट की और मार्केट प्लेस नमूना व इंवेंटरी बेस्ड मॉडल नाम का दायरा भी स्पष्ट किया है। पर सरकार के ये नए नियम भारतीय उपभोक्ताओं के लिए परेशानी का सबब बनकर आए हैं। सरकार ने नए नियमों के तहत ऑनलाइन मिलने वाली भारी छूट पर नकेल कसने का इंतजाम कर लिया है। अब सवाल यह है कि सरकार को कंपनियों दव्ारा छूट देने और उपभोक्ताओं को उनका लाभ लेने से रोकने की क्या जरूरत आन पड़ी हैं?

ई-कामर्स (ई- वाणिज्य) : -भारत में तेजी से बढ़ रहा है। इसके दो पक्ष हैं। एक कहता रहा है कि यह बाजार अच्छा है। वहीं दूसरे का तर्क यह रहा है कि ऑनलाइन बाजार आर्थिक नियम और लेन-देन का उल्लंघन कर रहा है। साथ ही सामान्य रिटेलर्स (खुदरा व्यापारी) को नुकसान पहुंचा रहा है। ऑनलाइनों जनसमूहों दव्ारा फेमा उल्लंधन किया जा रहा है। कहा गया कि बाहर से आने वाले पैसे का हिसाब-किताब सही से नहीं हो पा रहा है। बहरहाल, अब सरकार ने ई-कामर्स में 100 फीसदी एफडीआई कर दिया है। पर यह बाजार से जुड़ने वाले नमूने के लिए ही रखा है। साथ ही साथ बहुत सारे प्रतिबंध भी लगा दिए हैं। इनसे बाहरी निवेशक भी खुश होंगे कि तेजी से बढ़ रहे भारतीय बाजार में प्रवेश मिल जाएगा और भारतीय ऑफलाइन (बंद रेखा) रिटेलर्स (खुदरा व्यापारी) भी खुश हो जाएगा कि छूट को लेकर कुछ प्रतिबंध भी लग जाएंगे।

नुकसान: - अब इससे भारतीय ई-कॉमर्स जनसमूहों को नुकसान हो सकता है। एक ओर उन्हें एफडीआई का नुकसान झेलना होगा और अगर प्रतिबंध बढ़े तो दोहरी मार पड़ेगी। लेकिन ये मसला थोड़ा पेचीदा है। पर इसका बड़ा पक्ष यह है कि भारतीय उपभोक्ता बड़ी तादाद में ऑनलाइन खरीददारी करने लगे है। खासतौर पर युवा वर्ग ने ई-कॉमर्स को खासा बढ़ाया है। अगर इन जनसमूहों पर छूट देने के लिए प्रतिबंध लगाया जाएगा तो जनसमूहों को तो नुकसान होगा ही। साथ ही जो युवा वर्ग इस पर जमकर खरीददारी कर रहा है, उसका भी नुकसान होगा। यानी खरीददार पर असर तो जरूर पड़ेगा साथ ही चीजों की कीमतें भी बढ़ जाएंगी। पहले के मुकाबले अधिक दाम चुकाने पड़ेंगे।

उपभोक्ता: - हालांकि अभी जो प्रतिबंध की बात कही जा रही है, वह बहुत स्पष्ट नहीं है। वैसे ऑनलाइन दुकानदार कोई न कोई रास्ता उपभोक्ताओं को लुभाने का निकाल ही लेंगे क्योंकि उनका व्यापार उसी पर निर्भर है। अब अगर बाहरी ई-कॉमर्स जनसमूहों प्रवेश करेंगी तो वे भी चाहेंगी कि उपभोक्ताओं में पैठ बनाने के लिए छूट दें वरना उनसेे उपभोक्ता कैसे जुड़ेंगे? सरकार ने दोनों काम एक साथ किए हैं। एफडीआई भी आ जाएगी और नियंत्रण भी बढ़ दिया जाएगा। हालांकि ऑनलाइन छूट अधिक मिलती है पर बंदलाइन दुकानदार भी तो सीजन आधारित छूट देते ही हैं। हालांकि भारतीय ई-कॉमर्स जनसमूहों को झटका तो लगेगा और उपभोक्ता के हाथ बड़ी छूट नहीं लगेगी, यह तो स्वीकारना होगा।

विवरण: -निम्न हैं-

  • भारतीय उपभोक्ताओं ने ऑनलाइन बाजार से पिछले साल 11 अरब डॉलर के उत्पाद खरीदे।
  • ऑनलाइन विक्रताओं की बिक्री वर्ष 2020 तक मोर्गन स्टेनले के अनुसार 100 अरब डॉलर तक हो जाएगी।
  • इंटरनेट (अंदर के जाल) का उपयोग 35.4 करोड़ भारतीय कर रहे हैं जबकि चीन में 65 करोड़ आबादी ऑनलाइन है। तेजी से बढ़ते ऑनलाइन जड़ाव ने ही ई-कॉमर्स को बढ़ाया है।
  • जो ऑनलाइन उपभोक्ता 2013 में 02 करोड़ था वह भारत में इस साल 04 करोड़ ऑनलाइन उपभोक्ता हो जाने का अनुमान है।
  • 20 करोड़ उपभोक्ता ऑनलाइन हो जाएंगे अगले तीन साल में 3.8 करोड़ लोग अभी ऑनलाइन लेन-देन करते हैं।

आवश्यक बातें: - निम्न हैं-

  • 100 प्रतिशत एफडीआई- विदेशी निवेशक अब अपने निवेश के जरिए ऑनलाइन जनसमूहों में 100 फीसदी मालिकाना हक पा सकते हें। लेकिन यह सिर्फ उन्हीं जनसमूहों में लागू होगा जो ’मार्केट प्लस मॉडल’ (बाजार से जुड़े नमूने) पर संचालित होती हैं।
  • मार्केट प्लस मॉडल- इसका मतलब जनसमूह दव्ारा खरीदार और विक्रेता के बीच एक आईटी प्लेटफार्म (स्थान) मुहैया कराना और एक मध्यस्थ की भूमिका निभाना होता है। वहीं इंवेंटरी बेस्ड मॉडल (सबसे अच्छा नमूना) में जनसमूह माल व सेवाएं उपभोक्ताआ को खुद बेचती है।
  • नया नियम- नए नियमों के अनुसार मार्केट प्लेस (बाजार से जुड़ा हुआ) आधारित जनसमूह खुद डिस्काउंट (छूट) नहीं दे सकेंगी। केवल विक्रेता, जो उस संबंधित ऑनलाइन जनसमूह के माध्यम माल बेच रहा है, वह उपभोक्ताओं का डिस्काउंट दे सकता है।
  • ग्राहकों को नुकसान- छूट के चलते ऑनलाइन जनसमूहों जिस मात्रा में राजस्व एकत्र कर पा रही थीं, उस पर भी फर्क पड़ेंगा। यानी नय नियमों के तहत ऑनलाइन जनसमूहों अकसर जिस मात्रा में उपभोक्ताओं को छूट प्रस्तावित कर रही थीं, अब वे ग्राहकों को नहीं मिल पाएंगे। जनसमूहों के हाथ बंध जाएंगे। हालांकि जानकार मानते हैं कि जनसमूह कैश बैक (नगद वापसी) एवं अन्य माध्यम से छूट दे सकेंगी। हां छूट खत्म होने से जनसमूहों के राजस्व पर फर्क जरूर पड़ेगा।
  • ऑफलाइन को राहत- ऑफलाइन रिटेलर्स (बंद हुई रेखा के दुकानदार) जो ऑनलाइन जनसमूहों के भारी भरकम डिस्काउंट (छूट) के चलते नुकसान झेल रहे थे, उनके लिए ये नए नियम राहत लेकर आए हैं। उनका मानना है कि अब बाजार में समान प्रतिस्पर्धा हो सकेगी।
  • दोहरे मापदंड- सरकार की इस नई नीति पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि जब ऑफलाइन खुदरा बाजार में एफडीआई को लेकर विरोध के चलते सरकारों को निर्णय बदलने पड़े तो ऑनलाइन में 100 फीसदी एफडीआई क्यों किया गया?
  • भौतिक ढांचा जरूरी- जानकार मानते हैं कि नियामकीय और कराधान की चुनौतियों से जूझ रहे ई-कॉमर्स क्षेत्र को सरकार दव्ारा कारोबार संबंधी प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए। ई-कॉमर्स जनसमूह के कारोबार बढ़ाने के लिए वित्तीय भौतिक ढांचा उपयुक्त बने।

भारत व चीन: - संयुक्त राष्ट्र की एक नवीनतम विवरण के अनुसार दुनिया में भारत ई-कॉमर्स के लिहाज से बेहतर स्थिति में नहीं है। भारत को इंटरनेट उपभोक्ताओं, सुरक्षित सर्वर और क्रेडिट कार्ड की पहुंच के आकलन के आधार पर तैयार 130 देशों की सूची में 83वां स्थान दिया गया है। चीन में करीब एक तिहाई लोग निरंतर ऑनलाइन रहते हैं। जबकि भारत में करीब 5 फीसदी लोग ही नियमित रूप से ऑनलाइन रहते हैं। चूंकि देश के मात्र पांच फीसदी लोगों की ही पहुंच कम्प्यूटर तक है, इसलिए देश के अधिकांश लोग इंटरनेट का इस्तेमाल मोबाइल फोन पर करते हैं। एक ओर जहां देश में मोबाइल जनसमूहों की ब्रॅाडबैंड (जनसमूह विशेष उत्पाद/ट्रेडमार्क) कीमतें किफायती नहीं हैं। वहीं दूसरी ओर देश में ब्रॉडबैंड की पहुंच बहुत कमजोर है। ब्रॉडबैंड की औसत गति के कारण भारत वैश्विक स्तर पर 115वां स्थान रखता है। हमारे देश में इंटरनेट के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए भी इंटरनेट की लागत घाटाया जाना जरूरी है।

देश में ई-कॉमर्स के जैसी चीन सहित कई देशों की जनसमूहों के माल का ढेर बढ़ता जा रहा है। ऐसे में सरकार भारतीय जनसमूहों के ई-बाजार का विस्तार करने में भरपूर मदद करे।

भारत में 5 फीसदी लोग ही नियमित रूप ऑनलाइन रहते हें। क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल भी देश की कुल आबादी के बमुश्किल 1.8 फीसदी लोगों के दव्ारा ही किया जाता है।

केंद्र सरकार: - केंद्र सरकार ने 29 मार्च को ई-कॉमर्स मार्केट प्लेस (बाजार से जुड़ने) में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को इजाजत दे दी। यह अनुमति केवल मार्केट प्लेस में होगी। इसका अर्थ यह है कि जनसमूह खरीददार और विक्रेता को जोड़ने के लिए एक स्थान मुहैया कराएंगी तथा स्वयं की गोदाम व्यवस्था के माध्यम से माल बेचे जाने की स्थिति में एफडीआई की अनुमति नहीं होगी। कहा गया है कि ई-कॉमर्स जनसमूह के मार्केट प्लेस पर होने वाली कुल ब्रिकी में किसी भी एक कारोबारी की 25 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी नहीं होगी। यह भी कहा गया है कि ऑनलाइन मार्केट प्लेस (खुली रेखा में बाजार से जुड़ने) की तरह काम करने वाली ई-कॉमर्स (वाणिज्य संबंधी) जनसमूह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं एवं सेवाओं के बिक्री मूल्य को प्रभावित नहीं करेगी और समान अवसर बरकरार रखेंगी पर अर्थविशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे निर्देश के बावजूद ई-कॉमर्स जनसमूहों को छूट देने से रोका नहीं जा सकता, भारत में विभिन्न प्रकार की छूटों को बाजारी खर्च में दिखाया जाता है। यदि ई-कॉमर्स जनसमूह छूट देना बंद कर दें तो उनकी वृद्धि प्रभावित होगी साथ ही यह भी सुनिश्चित करना मुश्किल होगा कि कोई ई-कॉमर्स जनसमूह किसी तरह से वस्तु एवं सेवाओं के विक्रय मूल्य को प्रभावित कर रही है।

फायदा: - वस्तुत: भारत में बड़े पैमाने पर ई-कॉमर्स की शुरुआत के करीब एक दशक बाद आज यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब चीन की दिग्गज ई-कॉमर्स जनसमूह अलीबाबा भारतीय ई-कॉमर्स बाजार में वर्ष 2016 में सीधे तौर पर उतरने की तैयारी कर रही है। अब तक अंतरराष्ट्रीय जनसमूहों के साथ-साथ भारतीय उद्यमी भी ई-कॉमर्स संबंधी नीतिगत खामियों का फायदा उठाते रहे हैं। ऑनलाइन मार्केट प्लेस प्लेटफॉर्म (खुली रेखा में बाजार से जुड़ने की जगह) की शक्ल में हजारों विक्रताओं को उनके सामान बेचने का मंच मुहैया कराने वाली एमेजोन इंडिया, फ्लिपकार्ट और स्नैपडील नामक जैसी जनसमूहों का दावा है कि वे खुद के गोदामों में माल नहीं रखती इसलिए एफडीआई की अनुमति नहीं होने के बाद भी वे ई-कॉमर्स के कारोबार में बनी रहीं है। देश और दुनिया के अर्थविशेषज्ञों ने सरकार के इस कदम को सकारात्मक बताते हुए कहा है कि इससे देश में विदेशी निवेश आएगा और उपभोक्ताओं का लाभ होगा।

सीएआईटी: - देसी कारोबारी संगठन कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) ने कहा है कि यह वैश्विक खुदरा कारोबारियों को पिछले दरवाजे से प्रवेश देने की कवायद है। इससे बहुब्रांड खुदरा जनसमूह ई-कॉमर्स के माध्यम से भारत में उतर जाएंगी। सीएआईटी का यह भी कहना है कि भारत में 6 करोड़ कारोबारी खुदरा कारोबार में लगे हैं, जिन पर 46 करोड़ लोग निर्भर हैं और ई-कॉमर्स में बाजार से जुड़ होने में स्वत: मंजूरी से 100 फीसदी एफडीआई के कारण उद्योग-कारोबार की चिंताए बढ़ जाएंगी। पर वैश्विक आर्थिक-कारोबार संगठनों का कहना है कि वैश्वीकरण के दौर में ई-कॉमर्स जनसमूहों के बढ़ते हुए कदमों से देश में बढ़ रही ई-कॉमर्स चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए मुस्तैदी से खड़ा होना जरूरी हो गया है।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि अब देश के छोटे और बड़े सभी खुदराकारोबारियों के दव्ारा ई-कॉमर्स के महत्व को समझा भी जा रहा है और वे ई-कॉमर्स की चुनौती का सामना करने की तैयारी कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि 13 जुलाई को देसी किराना दुकानदारों ने ई-कॉमर्स की चुनौती से निपटने के लिए खुदरा कारोबारियों के संगठन कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) ने लाखों छोटे-मझोले और बड़े किराना दुकानदारों के लिए ई-लाला के नाम से अक्टूबर 2015 से राष्ट्रव्यापी पोर्टल (स्थूलकाय) शुरू किया है। यद्यपि दुनिया में ई-कॉमर्स तेजी से बढ़ता जा रहा है, लेकिन भारत में ई-कॉमर्स के बढ़ने की गति बहुत धीमी है। अप्रैल 2015 में वैश्विक सलाहकार सेवा संगठन एटी कियर्नी ने ई-कॉमर्स का वैश्विक परिदृश्य बताने वाली जो सूची प्रकाशित की है, उसमें कहा गया है कि गत वर्ष भारत 3.8 अरब डॉलर के ई-कॉमर्स के साथ बहुत पीछे है। अमरीका 238 अरब डॉलर के ई-कॉमर्स के साथ बहुत आगे है।

तेजी: - चाहे अभी ई-कॉमर्स की दृष्टि से भारत पीछे है, लेकिन भारत में ई-कॉमर्स बढ़ाने के रणनीतिक प्रयासों से ई-कॉमर्स के ऊंचाई पर पहुंचने की व्यापक संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की नई विवरण के अनुसार भारत में वर्ष 2020 तक देश का संगठित खुदरा सेक्टर सात गुना बढ़ते हुए दिखाई दे सकता है। भारत का ई-कॉमर्स बाजार 2020 तक 100 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच जाएगा। निसंदेह दुनिया की तरह भारत में भी ई-कॉमर्स ग्राहकों और विक्रेताओं की सोच को नई दिशा दे रहा है।

उपसंहार: - ई-कॉमर्स (वाणिज्य संबंधी) रोजगार के अवसरों को बढ़ता हुआ देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग बनता जा रहा है। देश के लोग ऑनलाइन खरीददारी के जरिये मोबाइल फोन, किराना सामन, रेडिमेड वस्त्र और अन्य वस्तुओं एवं सेवाओं की खरीद में जोरदार रुचि दिखा रहे हैं। हर दिन करीब पांच लाख ऑनलाइन लेन-देन हो रहे हैं। ई-कॉमर्स के तहत जनसमूह कारोबार के दकियानुसी रास्ते को छोड़कर विनिर्माताओं और थोक कारोबारियों को सीधे ही उपभोक्ताओं से मिला देती है। इससे समय व धन की भी काफी हद तक बचत हो जाती है। इसलिए हमारे देश में भी एफडीआई ई-खुदरा का महत्व बढ़ता जा रहा हैं।

- Published/Last Modified on: May 11, 2016