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सैनिको की पेंशन (Essay in Hindi - One Rank One Pension - OROP) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: - आज हर कोई सरकारी इसलिए चाहता है क्योंकि उसे सरकार के द्वारा दी सुविधाओं लाभ मिल सके पर सरकार हर क्षेत्र में इसका लाभ कर्मचारियों को नहीं दे रही है जैसे पेंशन रूपी सुविधा जो किसी किसी क्षेत्र में सही रूप से नहीं मिल पा रही है जैसे सैनिक कर्मचाारियों की पेंशन इसलिए अब वे अपना हक मांगने को मजबूर हैं। यह बात कई हद तक सही भी है। जब ये सैनिक अपना घर-परिवार छोड़कर 24 घंटे बोर्डर में पहरा देकर हमारे देश व देशवासियों की रक्षा करते है तो सरकार का इतना फर्ज नहीं बनता है कि उनको सरकार की ओर से हर सुविधा व लाभ दिया जाए।

ओआरओपी: - सरकार की ओर से ‘वन रैंक (ओआरओपी) लागू करने की घोषणा के बाद भी पूर्व सैनिकों का जंतर-मंतर पर धरना थमा नहीं है। सरकार के कई प्रस्तावों पर पूर्व सैनिकों में भारी असंतुष्टि है। सबसे अधिक अंसतोष तो इस बात पर है कि सरकार के वन रैंक, वन पैंशन के प्रस्ताव में अभी तक कोई स्पष्टता नहीं है। सरकार ने अपने प्रस्ताव में गैर-जरूरी मुद्दे उठाए हैं और जरूरी मुद्दों पर गंभीरता नहीं दिखाई है। पूर्व सैनिकों को लगता है सरकार अभी भी प्रशासनिक दाव-पेंच से बाज नहीं आ रही।

सांसद व सैनिक : - एक सांसद ने पूर्व सैनिक से प्रश्न किया, आप वन रैंक वन पेंशन की बात करते है। क्या भारत जैसे गरीब देश के लिए यह मांग उचित है? सैनिक ने उत्तर दिया, आप अपनी ज़िंदगी की क्या कीमत लगाते है? सांसद के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। बोले, ज़िंदगी की कीमत मै कैसे लगा सकता हूं? सैनिक ने कहा -मेरी पेंशन आपकी ज़िंदगी का ‘बीमा’ है। ज़िंदगी चाहते है तो दें वरना आपकी मर्जी। सांसद बिना कुछ कहे चले गए। पिछले 42 वर्षों से पूर्व सैनिकों को छलावे में रखकर उन्हें झूठी दिलासाओं और वादों पर टिका रखा है। नेता और प्रशासनिक उच्च अधिकारी उनकी सादगी और विश्वास का मजाक बना रहे है। आम जनता को शायद मालूम हो कि ऐसे कितने नेता और सरकारी अधिकारी हैं जिन्हें वन रैंक वन पेंशन दी जाती है जबकि पूर्व सैनिको को ठगा जाता है। उनके साथ राजनीतिक चाले चली जाती है। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा शातिर दावपेंच खेले जा रहे हैं। प्रधानमंत्री तक अपनी मीठी बोली से उनको गुमराह कर देते है।

  • यहां उन लोगों की सुची है जिन्हें वन रैंक वन पेंशन दी जाती है जो निम्न है-
  • उच्चतम न्यायालय के और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को।
  • सभी कैबिनेट सेक्रेटरी, चीफ सेक्रेटरी, सेक्रेटरी को।
  • सभी सांसदों को।
  • सभी जनरल, लेफ्टिनेंट जनरल को।
  • माननीय उच्चतम न्यायालय ने अब मेजर जनरल के लिए भी यह स्वीकार लिया है।

उल्लेखनीय है कि इन सभी की सेवानिवृति की उम्र 65, 63, 60, और 58 वर्ष है। जबकि सैनिक 35 वर्ष की उम्र में सेवामुक्त हो जाता है। उसे वन रैंक वन पेंशन देने में सरकार को पसीना आ रहा है। आश्चर्य तो यह है कि सांसद और उच्चतम न्यायालय इसे स्वीकृति प्रदान कर चुके हैं रक्षा मंत्री 5 सितम्बर को इसकी घोषणा कर चुके हैं किन्तु इस घोषणा में कितने दांवपेच खेले गए हैं यह आम जनता को पता नहीं है।

दावपेंच: - पूर्व सैनिको की मांग है कि ऐसी सभी बाते जो पहले ही बातचीत में तय हो चुकी है उन्हें प्रशासनिक दावपेंच और राजनीति से दूर रखा जाए, साथ में वन रैंक वन पेंशन का दस्तावेज आने से पूर्व इन कमियों को दूर कर लिया जाए। प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, अन्य राजनेता एवं प्रशासनिक अधिकारी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि इसके दूरगामी परिणाम क्या हाेेंगे? आज हम पूर्व सैनिको की मांग को लेकर जो लापरवाही, अनदेखी और तिरस्कारपूर्ण रवैया अपना रहे हैं यह भविष्य के लिए ठीक नहीं है। सेना के संपर्क में रहे लोगों को भलीभांति ज्ञात होगा कि किस प्रकार श्रीलंका से किन परिस्थितियों में हमें सेना को वापस बुलाना पड़ा था। पूर्व सैनिको को न्याय न देकर हम सेवारत सैनिकों को अनजाने ही सावधान कर रहे है कि भविष्य में उनके साथ भी यही होगा जो आज पूर्व सैनिकों के साथ हो रहा है। प्रजातंत्र की जड़ों को मजबूत रखने के लिए सैनिकों का विश्वास बनाए रखना जरूरी है।

पेंशन की कमी: - भारत में सैन्य कर्मियों की पेंशन दुनिया के अधिकांश सैन्य शक्ति देशों से कम है।

देश सैन्य कर्मियों की पेंशन नागरिक सेवा कर्मियों की पेंशन

अंतिम वेतन के प्रतिशत के अनुसार

  • अमरीका 50 - 75 % 33.75 %
  • जापान 70 % 41 - 58 %
  • जर्मनी 75 % 65 से 70 %
  • फ्रांस 75 % 55 %
  • पाकिस्तान 50 - 75 % 35 - 60 %
  • भारत 37 % 50 %

ब्रिटेन में सभी सैन्य कर्मियो को समान पेंशन है। रिटायरमेंट वर्ष, रैंक से अप्रभावित। नागरिक कर्मियों से 10 प्रतिशत अधिक। यूगोस्लाविया में सैनिकों को अंतिम वेतन का 85 प्रतिशत पेंशन मिलती है।

सैनिकों की कमी : -आज सेना की भर्ती में काफी कमी देखने को मिली है सेना मे 20 प्रतिशत अधिकारी कम हैं और करीब-करीब यही प्रतिशत लड़ाकू पायलट का भी है। योग्य युवा आजकल दूसरी तरफ का रास्ता अपनाने लगे हें। इसलिए की वहां सरकारी लाभ की कमी है। फील्ड मार्शल मानेक शा ने तत्कालिक वेतन आयोग पर ठीक ही टिप्पणी की थी कि दूसरे दर्जे का वेतनमान दूसरे दर्जे के सैनिकों को आकर्षित करता होगा और सेना में दूसरे दर्जे की कोई जगह नहीं होती है। रक्षामंत्री की टिप्पणी कि ‘सौ प्रतिशत मांगे कभी पूरी नहीं होती’ उचित नहीं है। सेना ने 1965, 1971 तथा करगिल के युद्ध में अगर सौ प्रतिशत परिणाम नहीं दिए होते तो आज 65 के युद्ध में विजय की स्वर्ण जयंती न मना रहे होते।

सम्मान: - देश के लिए कितने दुख की बात है कि जिन पूर्व सैनिकों के बलिदान की बदौलत हम आज स्वर्ण जयंती मना रहे हैं उन्होंने राष्ट्रपति के आमंत्रण को स्वीकार नहीं किया। वे अन्य राष्ट्रीय पर्वों का भी बहिष्कार करेंगे। जंतर-मंतर पर अपने धरने पर बैठे पूर्व सैनिक अभूतपूर्व संयम का परिचय दे रहे हैं जबकि उच्चतम न्यायालय के वकीलों ने उन्हें आश्वासन दिया है कि हम आपकी वकालत बिना फीस लिए करेंगे। अमरीका व विश्व के अन्य देशों के नागरिक सैनिकों को हर मदद देने को तैयार है। अमरीका, फ्रांस, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया जैसे प्रजातांत्रिक देश अपने सैनिकों को जागरूक व विश्वासपात्र बनाए रखने के लिए सर्वोतम वेतनमान देते हैं। उनमें किसी प्रकार की हीन भावना का जन्म न हो, इसलिए उन्हें सामाजिक सम्मान और आदर दिया जाता है। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने ठीक ही कहा था कि अगर आप अपने देश के सैनिकों को राष्ट्र के प्रति समर्पित देखना चाहते है तो पूर्व सैनिकों का सम्मान करें तथा उनकी सुविधाओं का ध्यान रखें। महात्मा गांधी ने जनता का विश्वास जीत कर त्याग की भावना को जन्म तब दिया था। मैं प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री एवं वित्त मंत्री का ध्यान उपरोक्त उन सभी श्रेणियों के प्रति आकर्षित करना चाहूंगा। जिन्हें आप ‘वन रैंक, वन पेंशन’ की सुविधा प्रदान कर रहे हैं अगर आज देश आर्थिक संकट से गुजर रहा है तो उपयुक्त सभी की ‘वन रैंक, वन पेंशन’ की सुविधा को समाप्त कर दें। मुझे पूर्ण विश्वास है कि पूर्व सैनिक भी अपनी मांग वापस ले लेंगे।

वीआरएस: - निम्न घोषणा की गई -

  1. घोषणा की गई कि वीआरएस को वन रैंक वन पेंशन नहीं दी जाएगी, जबकि सेना में वीआरएस लागू ही नहीं होता है। सैनिकों को ‘प्रीमेच्योर सेवानिवृति’ दी जाती है जो सेना को हमेशा युवा, शक्तिशाली रखने के लिए और युद्ध में घायल सैनिकों के लिए होती है। उल्लेखनीय है कि सेना में इसका प्रतिशत लगभग 45 के आस-पास है। सैनिकों को दो भागों में बांटकर नेता और प्रशासनिक अधिकारी उनमें भेद डालने का प्रयास कर रहे हैं।
  2. प्रतिवर्ष पेंशन समानीकरण के स्थान पर 5 वर्ष में समानीकरण की घोषणा ‘वन रैंक वन पेंशन’ के स्थान पर ‘वन रैंक 5 पेंशन’ को जन्म देगी, जो कि न्याय की आधारभूत आत्मा का ही समाप्त कर देगी। इससे सैकड़ों वरिष्ठ पूर्व सैनिक तत्काल अवकाश प्राप्त सैनिकों से कम पेंशन पा रहे होंगे।
  3. घोषणा की गई कि एक अधिकारी का कमीशन नियुक्त किया जाएगा जिसे छह माह का समय दिया जाएगा। यह निर्णय को देर से लागू करने की चाल है, साथ ही निर्णय को कमीशन के द्वारा थोपने का प्रयास है। कमीशन की आवश्यकता न होने पर भी पूर्व सैनिक इस बात पर सहमत है कि अगर कमीशन बनाना ही है कि 5 सदस्यों का बनाया जाए। जिसमें तीन पूर्व सैनिक, एक सेवारत सैनिक तथा एक प्रतिनिधि रक्षा मंत्रालय में से हो।
  4. बातचीत के दौरान यह भी तय हुआ था कि आधार वर्ष 2013 - 14 होगा, तात्पर्य यह कि पिछला बकाया 1 अप्रेल 2014 से देय होगा, जिसे न जाने क्यों बदल कर 1 जुलाई 2014 किया गया है, जबकि कभी भी आर्थिक मामलों में वर्ष का मध्य नहीं चुना जाता है।
  5. बातचीत में यह भी तय हुआ कि उच्चतम स्केल और समान सेवा के वर्षों को आधार माना जाएगा किन्तु घोषणा में उच्चतम और निम्नतम का मध्य लेने की बात की गई। इसका परिणाम यह निकलेगा कि सैनिकों की पेंशन बहुत कम हो बहुत कम हो जाएगी। विशेषकर सेना के जवानों और शहीदों की विधवाओं की। इस पर सरकार के प्रस्ताव में कोई चर्चा नहीं हैं।
  6. यह भी तय हुआ कि वन रैंक, पेंशन का मसला स्वतंत्र रहेगा और आने वाले सातवें वेतन आयोग में पूर्व सैनिकों की पेंशन पर भी अन्य श्रेणियों के साथ सामान्य ढंग से विचार किया जाएगा जबकि सरकार सातवें वेतन आयोग में पूर्व सैनिकों पर विचार नहीं करना चाहिए।

खर्चा: - सरकार की ओर से जो भी ‘वन रैंक, वन पेंशन’ का प्रस्ताव आया है, उसमें कुछ भी स्पष्ट नहीं है। उनकी घोषणा में ऐसे बात की गई हैं जिससे सरकार की मंशा पर शक गहरा ही होता है। उदाहरण के लिए सेना में वीआरएस लागू ही नहीं है, तो फिर सरकार के प्रस्ताव में इसका जिक्र क्यों है? बार-बार सरकार की ओर से एक ही तर्क दिया जा रहा है कि प्रतिवर्ष के हिसाब से ‘वन रैंक, पेंशन’ लागू करने में बहुत खर्चा है। कितना खर्चा है? पूछने पर बताया जाता है कि हर साल दस हजार करोड़ से भी ज्यादा है। इसका मतलब साफ है कि सैनिकों के इतने लंबे आंदोलन और सरकार की ओर से घोषणा के बाद भी सरकार के पास आज तक इसका कोई ठीक-ठीक अनुमान भी नहीं है कि ‘वनर रैंक, वन पेंशन’ लागू करने पर कितना खर्चा आएगा। पूर्व सैनिकों द्वारा बार-बार पूछने पर भी सरकार ने आज तक अपना कोई हिसाब न तो देश के सामने पेश किया है और न ही पूर्व सैनिकों को बताया है, लेकिन ‘बहुत खर्चा है, बहुत खर्चा है’ बोल -बोलकर देश के सामने भ्रम जरूर फैलाया जा रहा है। लेकिन सेना मुख्यालय ने सैनिकों की ‘वन रैंक, वन पेंशन’ के खर्च की गणना की है। उसका हिसाब इस प्रकार है। 2015 - 16 में रक्षा मंत्रालय पर पेंशन की लागत 54500 करोड़ होगी। इसमें सिर्फ 33000 करोड़ पेंशन सैन्य कर्मियों पर है, शेष खर्चा रक्षा मंत्रालय के नागरिक सेवा कर्मियों पर है इसलिए अगर सभी सैन्य कर्मियों को ‘वन रैंक, वन पेंशन’ के अंदर लाया जाता है तो इसका आंरम्भिक खर्चा 8300 करोड़ होगा। यह खर्चा सिर्फ एक ही बार होगा। इसके बाद तो हर साल सिर्फ आंशिक बढ़ोतरी होगी उन लोगों की पेंशन में जो कि पहले रिटायर हो चुके हैं, जिससे उनकी पेंशन उनके समान हो सके जो कि उसी वर्ष रिटायर हो रहे हैं। जब आरंम्भिक खर्चा ही 8 हजार करोड़ का है तो प्रतिवर्ष दसों हजार करोड़ से अधिक खर्च का सवाल कहां खड़ा होता है? हमारे अनुमान के अुनसार शुरूआती खर्च के बाद ‘ओआरओपी’ का आरंम्भिक 4 साल का खर्च 200 करोड़ से कम होगा। इसके बाद खर्च न के बराबर है। लेकिन सरकार के पास कोई दूसरा हिसाब हे, तो उसे देश को बताना चाहिए। पूर्व सैनिक जरूर सरकार की बात पर ध्यान देंगे। आखिर पूर्व सैनिक कोई देश-विरोधी नहीं हैं।

उपसंहार: - लेकिन हकीकत यह है कि आज तक 60 साल नौकरी कर सेवा निवृत्त होने वाले चपरासी को बीस-बाइस साल की नौकरी के बाद 35 - 45 वर्ष की उम्र में सेवा निवृत्त होने वाले जवान या उसकी विधवा से ज्यादा पेंशन मिलती है। फिर कोई क्यों जवान बनना चाहेगा। इस प्रश्न पर सरकार और देश की जनता को विचार करना चाहिए। अभी यह लड़ाई आगे कब तक चलती है यह तो आने वाला समय बताएगा पर फिर भी सरकार को हर सरकारी विभाग के बारे सोचना चाहिए ।

- Published on: October 6, 2015