दादरी कांड Essay in Hindi on the Dadri Case (Download PDF)

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प्रस्तावना:- कितने शर्म की बात है कि आजादी के 68 साल बाद भी हम भारतीय नहीं बन पाए? आज भी हम हिंदू-मुस्लिम और सिख-इसाई के दायरे में बंधे हुए हैं। जब हाल ही में अक्टूबर 2015 में दादरी जैसे वीभत्स कांड हुआ तब भी हमें अपमान महसूस नहीं होता। और हमारे राजनेता इन्हें तो जैसे लगता है कि, ये ही स्वर्ण अवसर है। वे सांप्रदायिकता की आग को भड़काते हैं और उसी में अपनी वोटों की फसल को पकाने में लग जाते हैंं। कांग्रेस हो या भाजपा, सपा हो या बसपा या फिर जद (यू) अथवा राजद जैसे कोई पीछे नहीं रहना चाहता। सब ऐसी बयानबाजी करते हैं कि जिससे आग ठंडी पड़ने की बजाय और भड़कती है। इस सारे खेल में सबसे ज्यादा गैर जिम्मेदाराना व्यवहार राजनीतिक दलों के नेतृत्व का नजर आता है, जो खुद तो बातें साधु-संतों जैसी करते हैं लेकिन जब उनके ही दलों के नेता राक्षसों जैसा व्यवहार करते हैं तब वे कार्रवाई करना तो दूर उन्हें रोकने के लिए भी आगे नहीं आते है।

इखलाक:- आने वाले समय में वोटों को बटोरने के लिए इसे गरमाए रखना राजनीतिक दलों के लिए उनके हित में होगा। यह घटना नोएडा के शहर दादरी के बिसहाड़ा गांव में गोमांस खाने के अफवाह पर मुहम्मद इखलाक नामक व्यक्ति को गांव की सारी भीड़ ने उसको पीट-पीट के मार डाला। इस हत्या के मुददे को हमारे राजनीतिक नेताओं ने साहित्यकारों ने ऐसा रूप दे दिया जिससे विदेश में भारत की छवि विकृत हो रही है। देश में तानाशाही माहौल बन गया है। भारत पूरी तरह से सहिष्णु हैं उदारवादी सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ है। इखलाक पर हमले की जब तैयारी हो रही थी तो उनके तीन हिंदू नौ जवान पड़ोसीयों ने 70 मुसलमानों को रातोरात गांव से निकाला। वे रात को 2 बजे तक गांव पार करवाते रहे छोछे-छोटे बच्चों को कंधों में बिठाकर तलाब पार करवाया और उनको सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। इखलाक का छोटा बेटा हमारी (भारत) वायुसेना में काम करता है। सारे देश ने एक स्वर से इखलाक की हत्या की निंदा की।

शौक:- पारंपरिक रूप से ऐसे शोक संताप के अवसर पर मौन रहने की सलाह दी जाती रही है। पर जब संवैधानिक व्यवस्था में सेंध लगा मानवाधिकारों का जघन्य उल्लंघन हो रहा है, मौन कैसे रह सकता है आम नागरिक? ऐसे मामलों में किसी को भी नहीं छोड़ा जा सकता है।

राजनेता:- दादरी में इखलाक की निर्मम हत्या की घटना से यह सवाल नहीं उठता है कि गोहत्या या गोमांस भक्षण की अफवाह भर से उत्तेजित भीड़ ने कानून अपने हाथ में ले उसे वहशियाना हरकत को अंजाम दिया। इससे बड़ी चिंताजनक बात यह है कि लगभग सभी बड़ी राजनैतिक पार्टियों ने इस हादसे को अपने पक्ष में भुनाने का बेहद दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास किया है। सच है कि बिहार में चुनाव आसन्न हैं। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि खुद को धर्मनिरपेक्ष और जनतांत्रिक कहने वाले देश के ये नागरिक आपा खो बैंठे और कानून की धज्जियां उड़ा दें।

आजम:- सबसे विचित्र आचरण तो आजम खान का है जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में गुहार लगाई है कि यह घटना भारत में अल्पसंख्यक मुसलमानों पर कहर ढाने की एक और वारदात है। वे यह भूल गए कि जिस सरकार का शासन इस बदकिस्मत से चल रहा है वह उन्हीं की पार्टी का है। पूर्व में भी ऐसा करते रहे हैं लेकिन इस बार तो हदें पार ही कर दी है। दलगत पक्षधरता की वेदी पर वे देश की छवि की बलि देने को आतुर लगते हैं। संयुक्त राष्ट्र में उनकी अर्जी का जो हश्र होगा सो होगा पर लगता है कि इस घड़ी माहौल बिगाड़ने व सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने में वे निश्चय ही कामयाब हो गए। पर गो वध निषेध या गोमांस पर प्रतिबंध लगाने वाली मोदी सरकार नहीं।

आजम खां का मुकाबला करने में केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा पीछे नहीं रहे। उन्हें यह हादसा केवल एक दुर्घटना लगता है जिस पर किसी का वश नहीं हो सकता था। उन्होंने तो यहां तक कह डाला कि यह किसी पूर्वनियोजित साजिश का रक्त रंजित परिणाम नहीं। जब तक पुलिस की जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक इस तरह का मत प्रकट करना जांच को नाजायज रूप से प्रभावित करने का प्रयास ही समझा जाएगा।

सांप्रदायिकता:- भारतीय राजनीति के चेहरे को सांप्रदायिकता को पूरी तरह से ढंक लिया है। राजनीतिक दलों की विचारधाराएं पूरी तरह से सांप्रदायिकता के ही इर्द-गिर्द घूम रही हैं। कोई भी पार्टी हो वह वोटों के लिए सांप्रदायिकता को ही हथियार बनाती है। हिंदू-मुस्लिम को बांट कर पार्टियां अपनी राजनीतिक रोटियां सेकती हैं। हाल ही में उत्तरप्रदेश सरकार ने दादरी प्रकरण की रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी है। इसमें भी अहम बिंदुओ को शामिल ही नहीं किया गया। यह स्पष्ट सकेंत है कि उत्तरप्रदेश सरकार इस प्रकरण में अपने को पाक-साफ दिखाने की कोशिश में है। सांप्रदायिक के बारे में हाल की भारतीय राजनीति की प्रवृतियों पर नजर डाले तो इसकी शुरुआत 80 के दशक से हुई। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी ने बाबरी मस्जिद और शाहबानो मामले में तुष्टिकरण की नीति को बढ़ावा दिया। इसके बाद रामजन्मभूमि आंदोलन ने जोर पकड़ा और उसके बाद की घटनाएं हम सभी के सामने हैं। स्थिति ये हो गई है कि धर्मनिरपेक्षता का अवमूल्यन हो गया है। इस शब्द के मायने ही बदल गए।

पक्ष-विपक्ष:- इसके पक्ष व विपक्ष कई लोगों ने तर्क दिए है-

  • महज दुर्घटना पर रानीति नहीं होनी चाहिए। यह नियोजित साजिश का परिणाम नहीं है। मृतक के शरीर के घाव यह नहीं दर्शाते कि उत्तेजित भीड़ ने बलवे जैस हालात में इखलाक को मारा। - डॉ. महेश शर्मा, केंद्रीय पर्यटन मंत्री
  • इस तरह के वाकये होते हैं तो सिर्फ बातें नहीं होनी चाहिए। यह हादसा नहीं सुनियोजित हत्या है। यह मांस पर नहीं मजहब के नाम पर हमला है। - असदुद्दीन ओवैसी, आईआईएमआईएम प्रमुख
  • अगर भक्तों की तरह दम है तो बाबरी की तरह पांच सितारा होटलों को गिरा कर देखें जहां गोमांस परोसा जाता है। देश को हिंदू राष्ट्र बनाया जा रहा है, हम संयुक्त राष्ट्र जाएगें। - आजम खान सपा नेता
  • गाय हमारी माता है। हम मां का अपमान सहन नहीं कर सकते है यदि अपमान हुआ तो मार देगें या मर जाएंगे। - साक्षी महाराज सांसद, भाजपा
  • सभ्य लोग गोमांस नहीं खाते और मैं तो कहता हूं कि किसी को भी मांस नहीं खाना चाहिए। मांस खाने वाला गाय और बकरी में भेंद नहीं करता। वैसे गोमांस तो हिंदू भी खाते है। - लालू यादव, राजद प्रमुख
  • लालू प्रसाद यादव ऐसे नेता है जो कि वोट के लिए गोमांस भी खा सकते हैं। इन्हाेेने गोमांस पर बयान देकर करोड़ों लोगों का अपमान किया हैं। - सुशील मोदी, भाजपा नेता
  • इखलाक की हत्या हिंदू ने नहीं कराई। मुसलमान हिंदुओं के घरों से गाय चुराकर उसे काटते हैं। उ. प्र. में जहां कहीं भी दंगा हुआ, उसे आजम खां ने कराया। दादरी की घटना भी आजम खां ने कराई। - साध्वी प्राची, भाजपा नेता

राजनीति और धर्म:- पिछले कुछ समय से धर्म में राजनीति और राजनीति में धर्म के बढ़ते हस्तक्षेप ने सरकारों के समक्ष नया संकट खड़ा कर दिया है। ताजा संकट मांस की बिक्री को लेकर है। जम्मु कश्मीर के हाइकोर्ट के गोमांस की ब्रिकी के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट के दो माह के लिए रोक लगाने से शक विवाद और गहरा हो गया। मांस की ब्रिकी पूरी तरह से सामाजिक पहलू है। इसमें धर्म अथवा राजनीति का हस्तक्षेप बिलकुल नहीं होना चाहिए। हस्तक्षेप का तो केवल एक ही कारण हो सकता है वह है यह है कि वे अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जाने से संकोच नहीं करते है। गोहत्या अपराध है, लेकिन गोमांस भक्षण नहीं। गोमांस खाने की अफवाह के आधार पर किसी मनुष्य की हत्या कर देना कौन-सा धर्म है? यह धर्म नहीं है अधर्म है। यह न्याय नहीं, अन्याय है । गोमांस का क्या, मांस खाने में आजकल विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र भी हानिकारक मानने लगा है।

नैतिकता:- हमारे देश में राजनीति किस ओर जा रही है। नेताओ का किस तरह से नैतिकता का पतन हो रहा है यह हाल ही में नोएडा के बिसहाड़ा और गोहत्या चुनावी मुद्दा बन गया है। इस मुद्दे पूरे देश में बहस चली है सिर्फ नेताओ की नहीं बल्कि बुद्धिजीवियों एवं कई साहित्यकारो ने तो अपने पुरस्कार तक लौटा दिए है। पर क्यों लौटा दिए यह अब तक पता नहीं चल नहीं पाया है। यहां तक इस विषय में मोदी जी ने भी कोई बयान अब तक नहीं दिया है। ओर अगर मोदी जी ने इस विषय में बयान दे भी दिया होता तो क्या जो लोग गोमांस खाते है वे लोग उनके कहने पर गोमांस खाना छोड़ देते और शाकाहारी बन जाते। या फिर जो लोग गोहत्या के बदले मानव-हत्या करने पर उतारू हो जाते हैं, वे अपने आचरण को सुधारने के लिए तैयार हो जाते। नेताओ में तो केवल अब राजबल है नैतिक बल नहीं है। इस नैतिक बल का प्रयोग साधु संत, लेखक, कवि आदि तो कर सकते है पर नेता नहीं। नेताओं के लिए ऐसा करना वैसा ही है जैसे रेत में नाव चलाना होता है।

परिणाम:- हाल की घटनाओं को यदि हम समग्र रूप से देखें तो पाएगें कि ये पिछले दशकों के दौरान सांप्रदायिकता के बीज जो राजनीतिक पार्टियों ने फैलाए हैं वो सामने आ रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो ये संचित दूष्परिणाम हैं। जो कभी मुजफ्फनगर तो कभी दादरी के रूप में हमारे सामने आते हैं। भाजपा के केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद निश्चित रूप से सांप्रदायिक घटनाएं बढ़ी हैं। अन्य पार्टिया भी दूसरी पार्टी को नीचा दिखाने के लिए इस सांप्रदायिकता का सहारा ही लेती है और यह सिलिसिला जारी रहता है। धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत की तो हमारे नेताओं ने अपने ही तरीके से व्याख्या करनी शुरू कर दी है।

कानून:- हमारे मौलिक अधिकार हमारी पूरी स्वतंत्रता के साथ जीने का हक देते है इसलिए बीफ खाना जो दुनियाभर में एक आम मांसहारी खाद्य है इसे राजनीतिक का मुद्ददा नहीं बनाना चाहिए। यह समानता के सिद्धांत के लिए संविधान में दरारे पैदा करती है समुदायों के बीच बैर भाव को देखते हुए नेता इन्हें बुलाने में लगे हुए है। बेसक दादरी घटना तो निंदनीय हैं। कोई भी हिंसक भीड़ यदि कानून हाथ में तो उसकी भत्सृना की जानी चाहिए। चाहे उसने वास्तविक अपराधी के खिलाफ ही क्यों न किया हो। यदि भीड़ किसी चोर या दुष्कर्मी की हत्या करती हैे तो भी कानून को हाथ में लेना गलत है। क्योंकि देश के कानून का पालन तो करना ही होगा।

उपसंहार:- सारे देश ने एक स्वर से इखलाफ की हत्या की निंदा की। यदि गोहत्या अपराध है तो जिस पर भी उसका शक हो, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। गाय को माता का दर्जा इसलिए दिया गया है कि वह एक विशेष पशु है लेकिन इंसान को समझना चाहिए कि पश, पशु ही होता है। और मनुष्य मनुष्य ही होता है। ऐसे मामलों से किसी भी देश या समाज का भला नहीं हो सकता है। अफसोस है कि पहले से बिगड़े हुए इस मुद्दे को हमारे नेताओं और साहित्यकारों ने और भी अधिक पेचीदा बना दिया है। पर अब तक किसी नेता या सरकार की ऐसी हैसियत नहीं है कि वो भारत के लोकतंत्र और सांप्रदायिक सद्भाव के माहौल को बिगाड़ सके।

- Published/Last Modified on: November 18, 2015

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