Essay on Evidence of Water on Mars Planet in Hindi - मंगल पर पानी (Download PDF)

()

Download PDF of This Page (Size: 257.77 K)

प्रस्तावना: - कहते है मानव की इच्छाएं कभी समाप्त नहीं होती है और उसके मन में कोई न कोई इच्छा जरूर रहती है चाहे वह इच्छा कुछ खोजने की है या फिर किसी भ संबंध से हो पर वह रहती हमेशा ही है। इसलिए इस इच्छा से ही साठ साल पहले अंतरिक्ष क्षेत्र में शोध शुरू होने के साथ ही मंगल ग्रह में मानव की रूचि जाग गई थी। इस मानव ने यहां पर अनेक प्रकार खोज की हैं। यहा की अद्भूत बातों को उजागर किया है। पूरे विश्व को इस ग्रह के बारे मे बताया है। इन्हीं में से एक खोज है पानी की जिसने एक छात्र ने इस ग्रह में खोज निकाला हैं। जो इंसान के जीवित रहने के लिए बहुत आवश्यक है।

खोज: - अंतरिक्ष विज्ञान के उस शैशव काल में ही अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने लाल ग्रह पर यान भेजने के प्रयास किए थे। इन यानों द्वारा लिए गए शुरुआती चित्रों में मंगल ग्रह धुंधली-सी लाल गेंद जैसा नज़र आ रहा था। वहां से शुरुआत करके अब हम इस ग्रह के बारे में इतना जानते हैं कि वहां मानव भेजने के बारे में सोचने लगे हैं। मंगल ग्रह के बारे जाने की इस अद्भुत यात्रा में वहां पानी होने की संभावना की खोज महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह जानना ओर भी रोचक है कि इसकी खोज कैसे हुई? उपग्रहों ने कुछ पहाड़ियों के उतार के बार-बार चित्र लिए थे। इन्हें देखने पर पता चला कि पहाड़ियों के ये उतार अलग-अलग मौसम में रंग बदलते हैं। जब गर्मी का मौसम होता है तो ये उतार गहरे रंग के हो जाते हैं और थोड़े ठंडे वातावरण में इनका रंग हल्का पड़ जाता है। एरिजोना यूनिवर्सिटी के बीएएसी के एक छात्र ने सबसे पहले यह फर्क पकड़ा था। वह नासा के उपग्रह मार्स रिकॉनिसिन्स ऑबिटर (एनआरओ) से 2010 में मिले डेटा का अध्ययन कर रहा था।

प्रमाण: - पिछले दो दशकों में भेजे कई अभियानों से यह स्पष्ट था कि मंगल ग्रह पर किसी समय पानी तो था। वहां मौजूद घाटियों, चैनलों और नहरों के उपग्रह से लिए कई चित्र हमने देखे हैं। यह लाखों वर्ष पहले वहां पानी होने के कारण ही बने होगे। हमारे मंगल अभियान और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की नवीनतम खोज तो अब भी मंगल ग्रह पर पानी होने की संभावना बताती है।

नेपाली: - लुजेंद्र ओझा नेपाली मूल का छात्र है, जो 2005 में अमेरिका आ गया था। तब से लेकर लुजेंद्र ने मंगल ग्रह से संबंधित कई शोध-पत्र प्रकाशित किए हैं। वर्तमान में वह जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से पीएचडी कर रहा है। 2010 से 2015 के बीच लुजेंद्र ने नासा से मिले चित्रों का अध्ययन किया। उसने निष्कर्ष निकाला कि पहाड़ियों के उतारों का रंग हायड्रेटेड साल्ट (जलयुक्त लवण) की मौजूदगी के कारण बदलता है। किसी दीपक की बाती की तरह ये लवण नीचे से नमी प्राप्त कर रहे हैं। लुजेंद्र का कहना है कि अब तक लोग जमे हुए पानी यानी बर्फ होने की बात कर रहे थे, लेकिन उसकी स्टडी ने बहते, पानी के सबूत दिए हैं। हालांकि, वैज्ञानिकों को अब तक यह नहीं पता है कि सतह के नीचे मौजूद पानी का स्त्रोत क्या है। क्या यह धरती पर पाए जाने वाले भूमिगत जल के स्त्रोत एक्वीफर (जलयुक्त चट्टाने) हैं? क्या यह ध्रवीय बर्फ के पिघलने का परिणाम है? या वहां कोई अन्य स्त्रोत है। अभी हमें पक्का कुछ भी पता नहीं है।

संभावना: - इस खोज ने वैज्ञानिक समुदाय और पूरी मानवता के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। एक तो यही कि यदि वहां पानी है तो क्या जीवन भी किसी स्वरूप में मौजूद हैं? दूसरा संभावनायुक्त सवाल यह है कि यदि वहां पानी है तो क्या वह मंगल पर मानव जीवन संभव बना सकता है? इन प्रश्नों पर उम्मीद की पूरी गुंजाइश है। गौरतलब है कि जब वैज्ञानिक किसी ग्रह पर जीवन होने की बात करते हैं तो वहां विज्ञान कथाओं में वर्णित प्रगहियों की नहीं, सूक्ष्मजीवी (माइक्रोब) होने की बात करते हैं। किंतु मंगल पर सूक्ष्मजीवीयों को खोज निकालना पेचीदा मामला है। वैज्ञानिको को यह सुनिश्चित करना होगा कि मंगल पर उतरने के लिए भेजे जाने वाले यान मंगल की सतह को प्रदूषित न करें। अन्यथा होगा यह कि इन यानों के जरिये हम धरती के सूक्ष्मजीवी वहां ले जाएं और फिर उन्हें वहां जीवन की मौजूदगी के सबूत के रूप में खोज निकालें। मान लें कि किसी दिन कोई मानव किसी दिन मंगल की सतह पर उतरता है और तो अंतरिक्ष यात्री अपने साथ लाखों-लाख सूक्ष्मजीवी धरती से मंगल तक ले जाएंगे। यही कारण है कि इस मामले में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है। दूसरे सवाल का संबंध पानी होने की स्थिति में मानव के वहां बसने की क्षमता से संबंधित है। कहीं भी रहने के लिए हमें जीवन के तीन आधारभूत तत्वों की जरूरत होती है- पानी, भोजन और आवास (या वायुमंडल) । मानव को यदि मंगल पर जाकर बसना है, तो इन तीनों की जरूरत होगी।

आईएसएस: - यदि वहां मानव बस्ती आकार लेती है तो उसमें स्थानीय स्तर पर खाद्य सामग्री उगाने और जीवत रहने लायक आवास या आश्रय निर्मित करने की क्षमता होनी चाहिए। इन सारे प्रश्नों पर अंतरिक्ष वैज्ञानिक बरसों से विचार कर रहे हैं। 1998 में प्रक्षेपित अंतराष्ट्री अंतरिक्ष केंद्र, अंतरिक्ष की प्रयोगशाला के रूप में काम कर रहा है। यह धरती से 400 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहा है। अंतरिक्ष यात्रियों को वहां लंबे समय तक रहने के लिए भेजा जाता है ताकि इतनी लंबी अवधि में अंतरिक्ष के मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जा सके। आईएसएस में किसी अंतरिक्ष यात्री के रहने की सबसे बड़ी अवधि एक वर्ष है। मंगल जैसे दूर के ग्रहों की यात्रा के लिए इस तरह का अनुभव होना आवश्यक है। आईएसएस में कृत्रिम प्रकाश और उर्वरकों का प्रयोग कर सफलतापूर्वक लेट्यूस उगाया जा चुका है। इससे स्पेस फार्मिंग की संभावना खुली है। आईएसएस में पसीना, आंसू व यूरीन तक पानी की हर बूंद का रिसाइकल किया जाता है यानी बार-बार इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि वहां ताजा पानी का कोई स्त्रोत नहीं है। इसे करने के लिए भी रिसाइकलिंग की अत्यंत उन्नत टेक्नोलॉजी विकसित की गई। इसी तरह यान के वातावरण से ही ऑक्सीजन का दोहन कर अंतरिक्ष यात्रियों का श्वसन के लिए उपलब्ध कराई गई। इस तरह ऑक्सीजन के हर अणु का उपयोग किया जाता है। यह सारा अनुभव व टेक्नोलॉजी का तब इस्तेमाल होगा, जिस दिन आखिरकार मानव के कदम मंगल ग्रह पर पड़ेंगे।

द मार्शियन: - हॉलीवुड की हाल में जारी की गई ‘द मार्शियन’ में इनमें से कई टेक्नोलॉजी दिखाई गई है। नासा ने कहा है कि ये असली टेक्नोलॉजी है, जिस पर वह काम कर रही है। सच तो यह है कि स्पेस एजेंसी ने ‘द मार्शियन’ को बनाने में टेक्नीकल मदद दी है। कुछ लोग दलील देते हैं कि हमें मंगल ग्रह पर अभियान भेजने पर पैसा बर्बाद क्यों करना चाहिए। ऐसा सोचना गलत है कि अंतरिक्ष विकास की कई टेक्नोलॉजी मानव के लिए धरती पर उपयोगी सिद्ध हुई है। मसलन डिजीटन कैमरा ही लें तो इसे मूलत: अंतरिक्ष अभियान के लिए विकसित किया गया था। अंतरिक्ष में पानी के फिर उपयोग और वहां सलाद उगाने की टेक्नोलॉजी जल्दी ही धरती पर भी किसी रूप में उपयोग होने लगेगी।

उपंसहार: - इस तरह अंतरिक्ष अभियानों से हम सब को फायदा है। नई चुनौतियां लेकर नए-नए क्षेत्र में शोध मानव का स्वभाव है और यह खोज का सिलसिला हमेशा व्यक्ति द्वारा आगे चलता ही रहेगा। नई-नई खोज के कारण ही पानी और ऑक्सीजन के बार-बार उपयोग की असाधारण तकनीक भविष्य में हमारे लिए बहुत ही लाभदायक होगी।

- Published/Last Modified on: November 18, 2015

News Snippets (Hindi)

Monthy-updated, fully-solved, large current affairs-2019 question bank(more than 2000 problems): Quickly cover most-important current-affairs questions with pointwise explanations especially designed for IAS, NTA-NET, Bank-PO and other competetive exams.