पांच उच्च समाचार भाग-2 (Five Top - News Part - 2 in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना:- आज हम फिर पूर्व की भांति देश, विदेश की पांच सबसे बड़े समाचार जो वर्ष 2016 में घटित हुए है वो लाए हैं जिसकी जानकारी होना आप के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण हैं। यहां पेश हैं पहले समाचार में अमरीकी राष्ट्रपति की चुनाव प्रक्रिया, दूसरे समाचार में खेल में राजनीति, तीसरा समाचार में नील गायों को मारने को लेकर उठे विवाद, चौथे नंबर समाचार में वियतनाम को ब्रह्योस के साथ और अंत में पांचवे नंबर में एक संगीतप्रेमी की अनूठी कहानी हैं।

1 अमरीकी राष्ट्रपति:-

  • अमरीका राष्ट्रपति के चुनाव के लिए अमरीकी आठ नवंबर को मतदान प्रक्रिया में भाग लेंगे। अमरीका में नामांकन और चुनावी प्रक्रिया थोड़ी जटिल है। प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया राज्यों और डेमोक्रटिक व रिबब्लिकन पार्टियों के बीच अलग-अलग होती है। यह प्रक्रिया ‘आयोवा कॉकस’ (वैधानिक निकाय के सदस्यों की सभा) के साथ चुनावी साल में 1 फरवरी से शुरू हो जाती है। जनता के समर्थन से किसी दल में पंजीकृत व्यक्ति का चुनाव होता है। प्राथमिकता में कॉकस से भिन्न प्रत्याशी के समर्थन का आकलन गुप्त मतदान द्वारा होता है। कुछ प्राथमिकता किसी भी पंजीकृत मतदाता को मतदान की अनुमति है, जबकि अन्य दल में पंजीकृत लोगों को ही मतदान की अनुमति हैं। लगभग 40 फीसदी अमरीकी मतदाता ‘इंडिपेंडेट’ (स्वतंत्रता) के रूप में पंजीकृत हैं, इसलिए वे प्राथमिक में तभी मत कर सकते हैं, जब उनका राज्य खुली प्राथमिक कराता है। हर राज्य के डेलीगेट की संख्या एक प्रक्रिया के माध्यम से निश्चित की जाती है। इसके अलावा कुछ सुपर (असाधारण) डेलीगेट (मतदाता) (डेमोक्रेटिक दल में लगभग 15 व रिपिब्लकन में 7 फीसदी) उच्च श्रेणी के दल अधिकारी होते हैं। सुपर-डेलीगेट किसी विशेष प्रत्याशी के समर्थन के लिए बाध्य नहीं होते हैं। जुलाई में डेमोक्रेट्‌स और रिपब्लिकन राष्ट्रीय सभा (18 से 21 जुलाई को रिपब्लिकंस, 25 से 28 जुलाई को डेमोक्रेट्‌स) का आयोजन करते हैं, जहां डेलीगेट औपचारिक रूप से उन प्रत्याशियों के लिए मतदान करते हैं, जिनके प्रति उन्होंने प्राथमिक/कॉकस प्रक्रियाओं के माध्यम से समर्थन का वादा किया था। सुपर डेलीगेट उन प्रत्याशियों का समर्थन करने के लिए स्वतंत्र होते हैंं जिन्हें वह चुनते हैं। डेलीगेट, जिन्होंने ऐसे उम्मीदवार के समर्थन का वादा किया था, जो अब वह दौड़ से बाहर हो चुका है। ऐसी स्थिति में वह सभा में अपनी पंसद से मत देने के लिए स्वतंत्र होंगे अथवा राज्य यदि अनुमति दे तो वह पहले मतदान के दौरान उस प्रत्याशी के लिए मत देने के लिए प्रतिबद्ध रह सकते हैं।
  • यदि प्रथम मतदान में किसी एक प्रत्याशी को डेलीगेट मतों का स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो दूसरा मतदान आयोजित किया जाता हैं, जिसमें प्रतिबद्ध डेलीगेट के साथ सुपर-डेलीगेट अपनी पसंद के प्रत्याशी को मत देनेे के लिए स्वतंत्र होते हैं। इसके अतिरिक्त मतदान उस समय तक आयोजित किए जाते हैं, जब तक एक प्रत्याशी डेलीगेंटों का पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर लेता। पिछली बार 1952 की सभा में किसी एक दल को दूसरा मतदान करना पड़ा था। राष्ट्रपति प्रत्याशी अपना उपराष्ट्रपति स्वयं चुनते हैं और अपनी पसंद को राष्ट्रीय सभा में स्वीकृत के लिए पेश करते हैं। चुनाव में भाग लेने वाले साथियों में से एक का चयन करते हैं।
  • अमरीकी राष्ट्रपति सीधें लोग नहीं चुनते। उसे इलेक्टोरल (बिजली द्वारा मत) महाविद्यालय चुनते हैं। इलेक्टरो मत प्रति राज्य सीनेटर (प्रति राज्य 2) की संख्या और मकान में प्रतिनिधियों की संख्या (यह राज्य की जनसंख्या पर निर्भर करता है) का योग होता हैं।

क्रेग डिकर, कार्यवाहक लो अफेयर्स अधिकारी, अमरीकी दूतावास

2 खेल की राजनीति-

  • अंजू बॉबी जॉर्ज ने लंबी कूद में राज्य और देश का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व किया और इसलिए जॉर्ज का कर्तव्य है कि देश और अपने राज्य केरल में खिलाड़ियों का प्रदर्शन बेहतर बनाने में सहयोग करें। 6 महीने पहले ही इस काउंसिल (सभा) की सभापति मनोनीत की गई हैं इसलिए जॉर्ज अपने खेल सभा के कुछ साथियों को लेकर केरल के खेल मंत्री ई. पी जयराजन से औपचारिक मुलाकात के लिए गई थी। यूं तो वे देश के युवा और खेल मंत्रालय की ओर से संचालित लक्ष्य ओलंपिक पोडियम (योजना) की सभापति भी हैं और इस नाते उन्हें हवाई यात्रा के साथ पांच सितारा होटल में ठहरने की सुविधा मिली हुई है। उन्हें खेल संबंधी कार्यों के लिए केरल, दिल्ली और बेंगलूरू कई बार आना-जाना पड़ता है। केरल के खेल मंत्री ने हमारी औपचारिक मुलाकात के दौरान जॉर्ज की हवाई यात्रा पर सवाल खड़े किए हैं, हो सकता है कि इस तरह से बातचीत करना विशेष लहजा हो लेकिन जॉर्ज लिए यह आहत करने वाला और काफी अपमानजनक था।
  • उन्होंने तो यहां तक कहा, हमें पिछली राज्य सरकार ने मनोनीति किया था इसलिए हम उस सरकार के नुमाइंदे हैं। बहुत ही अजीब लगा यह सुनकर क्योंकि जॉर्ज का मनोयन राजनीतिक न होकर खेल से जुड़ाव होने के कारण हुआ। यह मनोनयन की प्रक्रिया भी इसलिए अपनाई गई है क्योंकि खेल कांउसिल में पूर्व राजनेता चुनकर आ जाते थे। उन्हें रोकने और खिलाड़ियों को ही इस पद पर लाने के लिए मनोनयन की प्रक्रिया शुरू की गई है। जॉर्ज का कहना है कि यदि “उन्हें मेरा कामकाज ठीक नहीं लगता है तो मुझे हटा दें, लेकिन अपमानजनक आरोप लगाना उचित नहीं का जा सकता है। मेरा परिवार खेलों से जुड़ा रहा है और मेरा भाई खेल सभा में कोच के पद पर नियुक्त है। मुझ पर आरोप लगाया जा रहा है कि उसकी नियुक्ति के लिए मैने अपने पद का दुरुप्रयोग किया जबकि हकीकत यह है कि मेरे भाई की नियुक्ति का आवेदन डेढ़ साल पहले किया गया था और मै तो 6 महीने पहले ही सभा की सभापित के पद पर मनोनीत हुई। सभा की सभापति पद पर रहते हुए मुझे कोई वेतन या परिलब्धियां नहीं मिलती, फिर भी भ्रष्टाचार व अनियमिताओं की बातें समझ से परे हैं।”
  • केरल के खेल मंत्री ई. पी. जयराजन ने मुझे पुरानी सरकार का नुमाइंदा कहा। मैं राजनेता नहीं केवल खिलाड़ी हूं और मेरी नियुक्ति इसलिए हुई।

अंजू बॉबी जॉर्ज, चेयरपर्सन, खेल काउंसिल केरल

3 नील गायों की मौत:-

  • नील गायों को मारने का भारत सरकार का नजरिया बहुत ही अतार्किक, अव्यवहारिक और निर्दयतापूर्ण है। हो सकता है कि नील गाय बिहार में किसानों की फसल चौपट कर जाते हों लेकिन इन्हें मारकर समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता। नील गायों की संख्या नियंत्रित करने के लिए उन्हें गोली मारना उपाय नहीं है। यही उपाय होता हो मानव जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए भी ऐसे ही तर्क दिए जाते। हमें जानवरों की खाद्य श्रृंखला को समझना चाहिए। यदि वह श्रृंखला कहीं से भी बिखरती है, तो उसका असर अन्य जानवरों पर पड़ता है। एक तो हम लोगों ने जंगलों को वन्यजीवों के रहने लायक नहीं छोड़ा है। जानवर आबादी की ओर आने को मजबूर हो रहे हैं। दूसरी बात, हमें अकसर सुनने को मिलता है कि कभी बाघ तो कभी तेंदुए शहरी आबादी में आ रहे हैं। यदि इन जैसे मांसाहारी जानवरों का भोजना उन्हें जंगल में ही मिल जाए तो वे क्यों शहरों की ओर आएंगे। पर्यावरण और पारिस्थितिकी चक्र को बनाए रखने के लिए इन जानवरों का जंगल में रहना बहुत ही जरूरी हैं। हमें प्रकृति के इस नियम को समझना चाहिए कि जितनी तेजी से गोली मारकर नील गायों की संख्या में कमी लाने की कोशिश की जाएगी, उतनी ही तेजी से उनके प्रजनन में बढ़ोतरी होगी। इसका अर्थ है कि समस्या का निदान नहीं होगा। भविष्य में समस्या ओर बढ़ सकती है।
  • सरकार-एक बार राजस्थान सरकार ने सियार और लोमड़ी को वाइल्ड लाइफ एक्ट (जंगली पशु कानून) 1972 की पांचवी अनुसूची में डाल दिया यानी इन्हें विशिष्ट कारणों से मारने पर पाबंदी नहीं थी। लेकिन, जब इनकी संख्या तेजी से कम होने लगी और इनके अस्तित्व को खतरा होने लगा तो इन्हे पांचवी से सीधे पहली सूची में डालना पड़ा। इसी तरह भारत सरकार ने भी 1986 में सियार और लोमड़ी को अनुसूची-2 के भाग दो में स्थानातंरित किया। हमें समझना चाहिए कि सभी जानवरों की प्रकृति में महत्वपूर्ण भूमिका है और उसकी भूमिका को समाप्त नहीं समझा जा सकता है। यदि विशेष जानवरों की संख्या पर नियंत्रण ही करना है तो अन्य उपायों को पहले अपनाया जाना चाहिए। यदि यूं ही नील गायों को मारा जाता रहा तो जल्द ही उनकी अनुसूची को भी परिवर्तित करना पड़ सकता है।

भारत सरकार के आदेश पर बिहार में 200 नील गायों को मार दिया गया। ऐसे आदेशों से पूर्व वन्यजीवों की खाद्य श्रृंखला को समझना होगा। इस श्रृंखला का एक भी जानवर कम होने का असर अन्य वन्यजीवों पर पड़ने लगता है।

वी. के सलवान, सेवानिवृत आईएफएस

  • उपाय-खेती में आते ही नील गायों को रोकने के लिए यदि इनकी संख्या को नियंत्रित करना ही है तो बेहतर होगा कि इनमें नर नील गायों का बधियाकरण किया जाए। इसके अलावा खेतों की सीमा पर हल्के करंट वाली बाड़ लगाई जा सकती है। इससे खेतों की नुकसान पहुंचाने वाले जानवर दूर रहते हैं। इसके अलावा बहुत से उपाय भी आते हैं, जिनके जरिए इन्हें भगाया जा सकता है।
  • अन्य जानवर -देश के विभन्न हिस्सों में नीलगाय के अलावा बंदर, कुत्ते, घोड़े आदि को मारने और इसके पहले भाजपा विधायक की पिटाई से मारे गए घोड़े शक्तिमान की मौत से जिनमें विवादों के कारण भारत में जानवरों से व्यवहार पर नैतिकता का सवाल उठा है। ऐसी घटनाएं आम हो गई हैं। (शक्तिमान की मौत के कुछ दिनों बाद ही दिल्ली में एक युवा पर आवारा कुत्तों को चाकू मारने का आरोप लगा था) ऐसी घटनाएं जानवरों के खिलाफ क्रूरता रोकने वाले कानूनों की खामियां उजागर करती हैं। हमें यह समझ में नहीं आता हैं। कि सदियों से प्राणियों की पूजा तक करने वाली भूमि पर ये घटनाएं कैसे हो रही हैं।
  • देवता-देवता भी अपने विभन्न अवतारों में प्राणियों के रूप में प्रकट हुए हैं, उन्हें अपने कार्यो में सहभागी बनाया हैं और उन्हें पवित्र वाहन का दर्जा दिया है- फिर चाहे गणेश भगवान का वाहन चूहा हो या विष्णु का शेषनाग। यहां तक की हनुमान जी ने तो रावण के खिलाफ श्रीराम के युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बाद भी हाल के दिनों में भारत की पहचान जानवरों से दुर्व्यहार का पर्याय बन गई है।
  • कानून-जानवरों के प्रति क्रूरता के लिए 1960 के कानूनों में 10 से लेकर 50 रुपए तक का मामूली जुर्माना हैं। यह जुर्माना प्राणियों के खिलाफ क्रूरता रोकथाम अधिनियम की धारा 11 के तहत प्राणियों को अनावश्यक तकलीफ देने, लंबे समय तक उन्हें बांधकर रखने, अंग-भंग करने, उनकी हत्या करने या मनोरंजन अथवा खेल के लिए जानवरों का मारने पर यह जुर्माना लगाया जाता हैं। मंहगाई बढ़ने और क्रूरता की बढ़ती घटनाओं के बावजूद पांच दशकों से जुर्माने की राशि बढ़ाकर कानून को कड़ा रूप नहीं दिया गया है। इससे भारत ने प्राणी अधिकारों की रक्षा में नाकामी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुख्याति अर्जित की है। तथा विदेशी जनसमूहों ने हमारे कानून की खामियों को गिनाते हुए भारत में जानवरों पर परीक्षण करने के लिए प्रोत्साहित किया है।
  • संस्थाऐ- 2012 में पर्यावरण और वन मंत्रालय ने जीवन विज्ञान से संबंधित सारे संस्थानों को निर्देश दिए थे कि वे प्राणियों के प्रयोग की पद्धति विकल्प न आजमाए और फिर भी कुछ विश्वविद्यालय अब भी अमानवीय पद्धति पर कायम हैं। पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमलस (पेटा) ने तो आरोप लगाया है कि भारत की शीर्ष शोध संस्थाओं में भी अंतरराष्ट्रीय कानूनी व नैतिक मानदंडों का ख्याल किए बगैर जानवरों पर संदिध प्रयोग किए जाते हैं। वर्ष 2013 में विविसेक्सन यानी शिक्षण के उद्देश्य से जीवित प्राणियों के प्रयोग को विचलित करने वाल घटनाओं के बारे में सुनकर शिक्षण में प्राणियों का प्रयोग यथासंभव बंद करने का अभियान चलाया (मागदर्शक सिद्धांत यही था कि यदि कोई प्रयोग टाला जा सकता है, तो इसे टाला ही जाना चाहिए) था। मुख्य निशाना वे मेडिकल (चिकित्सा शास्त्र) विद्यालय थे जहां जानवरों का प्रयोग बदस्तुर जारी था। 2014 में यूजीसी ने दो साल पहले की तारीख से जानवरों का प्रयोग रोकने की सिफारिश अधिकारिक रूप से जारी की, जबकि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (भारत की चिकत्सा शास्त्र राजदूत) ने प्राणि रहित शिक्षण पद्धतियां अपनाकर फिजियोलॉजी और फार्माकोलॉजी पढ़ाने की पद्धतियों में नियामकों में संशोधन किए।
  • पद्धतियां- प्रशिक्षण की वैकल्पिक पद्धतियां अपनाए जाने से हर साल अनुमानत: 1.90 करोड़ प्राणियों की जान बचेगी। अंडरग्रेजुएट (स्नातक) और पोस्ट ग्रेजुएट (स्नातकोत्तर) स्तर पर जारी प्रयोग तो पूरी तरह टाले जा सकते हैं। 1960 के विपरीत आज ऐसे ढेर सारे तकनीकी विकास हो चुके हैं, जो प्राणियों के साथ मानवीय व्यवहार को सुगम बनाते हैं। कुछ दायित्व कानून निर्माताओं का भी है और हमने पिछले वर्षो में कुछ तरक्की की भी है। 2014 में स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय ने औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन नियमावली, 1945 को संशोधित करने एवं प्रस्ताव के मुताबिक जानवरों पर परीक्षण कर तैयार किए गए सौंदर्य प्रसाधन के आयात पर प्रतिबंध लगाने के लिए अधिसूचना जारी की थी। अंतरराष्ट्रीय मानवीय समाज का अनुमान है कि एक से दो लाख चूहे, खरगोश, गिनी पिग, कुत्ते, बंदर और कुछ अन्य छोटे जानवर सौंदर्य प्रसाधन बनाने के लिए मारे जाते है। यह संख्या ओर भी ज्यादा हो सकती हैं, क्योंकि बहुत से देशों में इसका कोई भरोसेमंद प्रमाण नहीं है।
  • सुझाव-शशि थरूर जी ने सुझाव दिया कि जानवरों पर आजमाए गए अंतिम उत्पाद पर प्रतिबंध लगाएं ताकि सौंदर्य प्रसाधन में शामिल किसी तत्व के जानवर पर परीक्षण को मिली छूट की खामी दूर हो सके। मंत्रालय ने यह बात मानी है कि ‘प्रोडेक्ट (उत्पादन) और इनग्रेडिएंट (तत्व) ’ शब्दों के तकनीकी फर्क का फायदा पाबंदी से बचने में नहीं लेने दिया जाएगा। ऐसा करने वाला भारत एशिया का एकमात्र देश है। अब वह क्रूरता मुक्त सौंदर्य प्रसाधनों का बढ़ावा देने वाले यूरोपीय संघ, नॉर्वे और इजरायल की पंक्ति में आ गया है।
  • प्राणी अधिकार -के लिए काम करने वालों को एक और जीत तब मिली जब प्राणियों पर परीक्षण संबंधी प्रावधान का दायरा साबुन, डिटर्जेट जैसे घरेलू उत्पादों तक बढ़ा दिया गया। इससे ड्रग (दवा) टॉक्जिसिटी जांच के दौरान जानवरों को दर्दनाक व घातक विष परीक्षा से गुजारने पर रोक लगेगी। हालांकि, जानवरों के साथ अन्य प्रकार की क्रूरता भय अथवा असुविधा के नाम पर जारी है। 2015 में संसद में यह मामला उठाया कि केरल में आवारा कुत्तों के संकट के कारण काटे जाने व रोग फेलने के मामले बढ़ते जा रहे हैं कुत्तों के ऐसे हमले लोगों को संकट में डालते हैं, पर्यटन प्रभावित होता है और गरीब तबके को बहुत नुकसान होता हैं, लेकिन इससे उनके प्रति क्रूरता न्यायोचित नहीं ठहरती है। आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के उपायों में प्राणी अधिकारों का ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  • मानवता- उदाहरण के लिए भारतीय प्राणी कल्याण मडंल द्वारा विकसित एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) (जानवरों के जन्म में नियंत्रण) कार्यक्रम के तहत कुत्तों पर निगरानी, उनके टीकारण की कार्यविधि तय की गई हैं, लेकिन यह पैसे की कमी से जूझ रहा है। थरूर जी ने आग्रह किया है कि वह केरल को इसके लिए आर्थिक मदद दे ताकि कुत्तों को मारे जाने की बजाय उनकी आबादी नियंत्रित की जा सके। हमें प्राणी जीवन को सराहने व उसे सम्मान देने के लिए अपनी मानसिकता बदलनी होगी। जानवरों को दुर्व्यवहार से बचाने के लिए कोई एक संस्थान या व्यक्ति काफी नहीं है। मानवीयता के लिए पूरे देश को ही आगे आना होगा। महात्मा गांधी ने कहा था ‘किसी देश की महानता को इस तथ्य से आंका जा सकता है कि वह जानवरों के साथ कैसा व्यवहार करता है।’ इस पैमाने पर खरा उतरने के लिए हमें लंबा रास्ता तय करना है और उसके बाद ही हम अपने को महान कह सकेंगे।

शशि थरूर, विदेश मामलों की संसदीय समिति के चेयरमैन और पूर्व केंद्रीय मंत्री

4 ब्रह्योस मिसाइल:-

  • दुनिया की प्रमुख मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (एमटीसीआर) में शामिल होने के बाद भारत के लिए अपने उच्च प्रौद्योगिकी वाले प्रक्षेपास्त्रों को मित्र देशों को निर्यात करना आसान होगा। यही नहीं उसके दूसरे अप्रसार समूह न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (मांगी गई वस्तु पूर्ति का समूह) (एनएसजी) में शामिल होने की संभावना बढ़ी हैं। वियतनाम को ब्रह्योस तो एक बहाना है, देखा जाए तो भारत रणनीतिक रूप से उन सभी देशों के साथ बेहतर संबंध बनाने में जुटा हुआ है जो किसी न किसी रूप से पाकिस्तान और चीन के खिलाफ हैं। चीन, दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइल ब्रह्योस को अस्थिरता पैदा करने वाले हथियार के तौर पर देखता है। लेकिन अब न केवल वियतनाम बल्कि इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, चिली व ब्राजील सरीखे देश भी ब्रह्योस के खरीददार होंगे यह उम्मीद की जानी चाहिए। पिछले सालों में चीन ने जिस तरह से श्रीलंका, पाकिस्तान और नेपाल में अपने आर्थिक तंत्र का प्रसार किया है, भारत के लिए यह जरूरी हो गया था कि वह खुद को आर्थिक और सामरिक दृष्टि से मजबूत करे। ओएनजीसी के तेल दोहन के प्रयासों में चीन ने ही अवरोध लगा रखा है। इतना ही नहीं वह सड़क मार्ग के जरिए हिन्द महासागर के साथ होते हुए यूरोपीय देशों में अपनी पहुंच बनाने में लगा है। ऐसे में दक्षिण कोरिया, वियतनाम, जापान और मंगोलिया जैसे देशों में भारत अपने मेक इन इंडिया योजना के उत्पादों का बाजार भी तलाशने की संभावनाएं तलाश सकेगा।
  • वियतनाम समेत मित्र देशों से सामरिक और आर्थिक संबंध भारत की बड़ी जरूरत है। इससे भारत के लिए चिंता बनते जा रहे चीन पर दबाव बढ़ेगा।

प्रो. संजय भारद्धाज, जेएनयू, नई दिल्ली

5 संगीत प्रेम:-

  • हर इंसान शाहजहां नहीं होता लेकिन उसकी महबूबा ‘मुमताज’ से कम नहीं होती। अपनी पत्नी को याद कर सारंगी से ऐसे ही सुर छेड़ने में लगे हैं इमाम अली।
  • एक पत्रकार अपनी पत्नी के साथ हारमोनियम ठीक कराने नोएडा के एक संग्रहालय की दुकान पर गये तो एक शख्स को किताब पढ़ते देखा। मैंने कहा चचा। हारमानियम ठीक करानी है तो बोले, दिखाओं हो जाएगी। वो हारमोनियम देखने लगे तो मैंने उत्सुकता से पास रखी एक सारंगी के तार छेड़े। सारंगी से सुर क्या निकले, इमाम अली की आंखों की चमक आ गई। बातों का सिलसिला शुरू हो गया। 54 साल के इमाम अली यूपी के सुल्तानपुर से 25 साल पहले दिल्ली आ गए। पूछा, तो बताया सारंगी अपने मामू से सीखी जो दरबारी कलाकार थे। बचपन में उनके साथ कभी बनारस कि किसी घराना कलाकारों के बीच तो कभी मुजरों में जाने लगे तब से ही सारंगी से दिल लग गया। बनारस में संगीत सीखा और कभी घरानों में तो कभी आकाशवाणी पर कई कार्यक्रम किए। राग यमन सुनाया ‘मोरी गगरी भरन न देत कान्हा’ इमाम अली इसे राग इमन कह रहे थे।
  • मेरी पत्नी ने टोका राग यमन। खुद को दुरुस्त करते हुए इमाम अली के दिल के तार बज उठे बताया क्यों बीतें 15 सालों से कार्यक्रमों में जाना छोड़ दिया। कहने लगे। उनकी पत्नी खूबसुरत गाती थी गजल ठुमरी और खयाल भी । मैं भी सारंगी पर साथ देता फिर महफिल जमती तो रात गुजर जाती। बीमारी में पत्नी चल बसी तो खुद को छोटी सी दुकान में बंद कर लिया। वाद्य यंत्र सुधारते हैं पर सारंगी कई महीनों से नहीं सुधारी। हमने छेड़ा तो इमाम अली एक के बाद एक गाने सुनाने लगे। बोले बेटा तबला सुधारता है और कहीं नौकरी भी करता है। पांच पोतों में किसी को संगीत में कमाई नहीं लगती। लगता है कि उनके साथ ही संगीत और दुकान बंद हो जाएगी अब इन साजों के कद्रदान कहां? लोग इलेक्ट्रनिक (बिजली) साज चाहते है पर इनके सुरों में वह मिठास कहां? सारंगी के सुर गले के सबसे करीब हैं। इसलिए कभी कभार सारंगी बजाकर अपनी मोहब्बत यानी पत्नी को तलाशता हूं। इमाम अली की आंखों में महबूबा को याद करते ही चमक आ जाती है।

संदीप सोनवलकर, वरिष्ठ पत्रकार

उपसंहार:-

  • इस बार भी दुनिया की प्रस्तुत पांच महत्वपूर्ण खबरों को जाना उन्हें समझा। इस तरह से आये दिन पूरी दुनिया में कोई न कोई खबर आती रहती हैं जिसकी जानकरी सबको होनी चाहिए। इसलिए हम उच्च समाचारों के माध्यम से दुनिया की हर घटना को आपके सामने प्रस्तुत करते हैं। ताकि आप किसी भी घटना से बेखबर न रहें अर्थात वंचित न रहें।

- Published/Last Modified on: July 6, 2016

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