ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming Causes and Consequences - Essay in Hindi) (Download PDF)

()

Download PDF of This Page (Size: 287.70 K)

प्रस्तावना: - फ्रांस की राजधानी पेरिस में आज से शुरू हो रहा जलवायु परिवर्तन सम्मेलन होने जा रहा है जिसका लक्ष्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को सीमित कर धरती के तापमान को बढ़ने से रोकने के लिए एक वैश्विक समझौते पर पहुंचना है। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी सहित अमेरिका बराक ओबामा, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन सहित करीब 150 नेता पेरिस पहुंच चुके है। इस सम्मेलन में 190 देशों के नेता होंगे शामिल। इस सम्मेलन में 40, 000 लोगों के हिस्सा लेने की उम्मीद है। क्योंकि दुनियाभर में आज इसी बात का मुद्दा चल रहा है, जिस पर वैश्विक सम्मेलन, समझौते और चर्चाओं के दौर तो खूब हुए हैं पर ठोस परिणाम का अभी तक पता नहीं है। 1979 में जिनेवा में शुरू हुआ ’क्लाइमेट कॉन्फ्रेंस’ का सिलसिला आज पेरिस तक आ पहुंचा है। एक बार फिर 30 नवंबर से 11 दिसंबर तक चलने वाले इस सम्मेलन में ग्लोबिल वॉर्मिंग को 2 डिग्री (से. ) से नीचे रखने के लक्ष्य के साथ जुटेंगे।

अंतरराष्ट्रीय: -ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक अब विश्व उस दौर में है, जब जलवायु परिवर्तन का सामना करना होगा। इससे तो जाहिर है कि यह एक चिंता का विषय बन गया हैं। यह साल 2015 सबसे गर्म साल रहा है पर समस्या यह है कि विकसित देश विकासशील देशों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने का दबाव बनाते हैं तो विकासशील देशों की विकास की मजबूरी आड़े आती हैं। इसलिए यह विरोधाभास सबसे बड़ी चुनौती है।

विकास: - धरती का बढ़ता तापमान दुनिया के सामने गंभीर रूप से चुनौती बनकर सामने आया है लेकिन अब यह समस्या बहुत अधिक हो गई हैं। विकसित देश यूं तो सबसे बड़े औद्योगिक प्रदूषकों में शामिल हैं। लेकिन फिर वे चाहते हैं अविकसित अथवा विकासशील देशों के कार्बन उत्सर्जन में कटौती हो। अर्थात सीधा मतलब है कि औद्योगों में कटौती हो। जो किसी भी हालत में विकासशील देशों में संभव नहीं है। विकसित देशों को कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए अपने औद्योगों में कमी करनी होगी जैसे वे विकासशील देशों के साथ चाहते है। देखा जाए तो इसे रोकना सरकार के बस में भी नहीं हैं। सरकार व समाज का एक बहुत बड़ा समूह विकास की ओर इस तरह आगे बढ़ रहा है कि जिसका अंत बहुत ही निराशाजनक होगा। बढ़े हुए तापक्रम के कारण पूरे मौसम में ही बदलाव आ गया है। ठंडे क्षेत्रों में गर्मी बढ़ी है तो गर्म क्षेत्रों का तापमान कम हुआ है। इन सबके कारण सूखा और बाढ़ जैसे विनाशकारी हालात पैदा हो रहे हैं। जैसे कैदारनाथ त्रासदी को भी जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखा जा रहा है। विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति से भंयकर छेड़छाड़ हो रही है। उद्योगों और खनन गतिविधियों के लिए जंगलों की कटाई हो रही है। नदियों की प्राकृतिक धारा को रोका जा रहा है कई उद्योगों, कारखानों, वाहनों आदि से निकला धुंआ पूरे पर्यावरण को छती पहुंचा रहा है। जमीन में सत्फर जैसे तत्वों की संघनता बढ़ रही है। इसके साथ यह अनाज की गुुणवत्ता को भी खराब करेगी। इसके खतरनाक परिणाम छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिले है।

शोधपत्र: - विकसित देशों में हुए शोधपत्रों में यह दावा किया जाने लगा है कि सघन वनों की कटाई से 20 प्रतिशत तक ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। दक्षिण पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में वर्ष 1980 से वर्ष 2001 तक लगभग 200 किमी के वन क्षेत्र में सघन वनोपज को पूरी तरह संरक्षित कर दिए गए विभिन्न प्रयोगों के बाद स्टीफन नेल एवं केविन वॉल्स ने एक शोध पत्र जारी किया जिसमें उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों के जरिए यह प्रमाणित किया कि वन क्षेत्र बढ़ाकर और ग्रीन हाउसों में गैस उत्सर्जन में कटौती कर ओलावृष्टि को कम किया जा सकता है। नीदरलैंड्‌स के वैज्ञानिकों ने भी यह सिद्ध कर दिया कि ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ते तापमान और ओलावृष्टि का मजबूत संबंध है। इस विकराल सामाजिक-प्राकृतिक समस्या को लेकर प्रयास भी हुए हैं। फसलों को काटने के यंत्र हार्वेस्टर के साथ स्ट्रा-रीपर का उपयोग अनिवार्य कर दिया गया है ताकि खेतों में भूसे का अवशेष ही न रह पाये।

नरवाई: - को जलाना सीआरपीसी की धारा 144 के अंतर्गत गैर कानूनी घोषित कर दिया गया है। नरवाई (धान का भूसा) से कम्पोस्टिग की तकनीक भी किसानों को सिखाई जा रही है। वनों की अवैध एवं अनधिकृत कटाई पर पहले से ही प्रतिबंध है। 10 - 15 साल से अधिक पुराने वाहनो को बंद करने की कवायद भी चल रही है। फिर जनमानस को इस समस्या और इसके दुष्परिणामों से समय रहते अवगत कराना होगा। ऐसा करने पर ही हम अपने आपको और समाज को जलवायु परिवर्तन के खतरों के साथ इसके कुप्रभावों से भी सुरक्षित रख पाएंगे। इसके लिए सभी स्तर पर प्रयासों की जरूरत है।

इंसानी दखल: -यह आकस्मिक जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदा ’भगवान की मर्जी’ से नहीं बल्कि मानवजनित है। जलवायु परिवर्तन की सतत पर्यावरणीय प्रक्रिया में अल-नीनो एवं अन्य प्राकृतिक कारकों के अलावा अधिकांश कारक मानवजन्य कृत्यों के विनाशकारी नतीजे हैंं। हाल ही में नासा की ओर से दिल्ली में व्याप्त खतरनाक वायु प्रदूषण की स्थिति पर अलर्ट जारी कर बताया गया कि कैसे पंजाब और हरियाणा राज्यों के किसानों द्वारा खेतों की नरवाई (धान का भूसा) बड़ी मात्रा में जलाने से ओजोन, कार्बन मोनो-ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड एवं राख के मिश्रित धुएं ने वाहनों के प्रदूषण से पहले से ही त्रस्त दिल्ली शहर चपेट में ले लिया जिससे दमा, त्वचा एवं नेत्ररोगियों का जीना मुहाल हो गया। दरअसल नरवाई जलाने से उत्पन्न प्रभाव का यह त्वरित एवं सतही दुष्परिणाम मात्र है।

तबाही: -वर्ष 2014 में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के बहुत बड़े इलाकों में और लगभग इसी समय वर्ष 2015 में पुन: मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों में अचानक हुई ओलावृष्टि और भारी वर्षा से बड़े भू-भाग में गंभीर जन धन की तबाही हुई। केवल मध्यप्रदेश में ही ओलावृष्टि से 37 जिले भारी वर्षा और 18 जिले ओलावृष्टि से प्रभावित हुए। राज्य के 51 जिलों के 25 हजार 729 गांवो की 30 लाख हेक्टयर क्षेत्र की फसल नष्ट होने का अनुमान लगाया गया है। करीब 29 लाख 84 हजार किसान इस प्राकृतिक आपदा से बुरी तरह प्रभावित हुए। प्राकृतिक आपदा की जीती जागती मिसाल है जापान जो भूकंप, ज्वालामुखी और समुद्री तूफानों की विभीषिका से कई बार बर्बाद होने के बावजूद पुन: दुनिया के सामने अपना अस्तित्व बरकरार रखे हुए है। लेकिन पाकिस्तान में अब भी प्राकृतिक आपदा से निपट नहीं पाया है उसमें 2005 में भूकंप आने के बाद भी अब तक वहां के लोग बेघर ही हैं उनके लिए कोई पुर्नवास अभी तक नहीं बना हैं। क्योंकि पाकिस्तान की सेना में किसी भी प्रकार इस आपदा से निपटने के लिए कोई इच्छाशक्ति नहीं है व न ही कोई दूर दृष्टि है।

खतरा: - वर्ष 2014 की ओलावृष्टि एवं भारी वर्षा से मध्यप्रदेश के 30 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की फसल नष्ट हो गई। इसे बेकार समझ किसानों ने खेतों में ही जला दिया। पहले से ही बड़े पैमाने पर अनियंत्रित व वनों की अवैध कटाई का दंश झेल रहे प्रदेशों में प्रत्येक कृषि उपज की नरवाई को व्यापक सतर पर इसी तरह खेतों में जला दिया जाता है। इससे स्वास्थ्य पर विपरित असर पड़ता है। इसके अलावा राख कणों समेत स्थानीय वातावरण में लाखों किलोग्राम ग्रीन हाउस गैसों एवं अन्य गैसीय पदार्थ इत्यादि उत्पन्न होकर स्थानीय क्षेत्रीय पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित कर देती हैं। यह आकस्मिक जलवायु परिवर्तन का कारण भी बन जाती है। इसी के परिणाम स्वरूप ओलावृष्टि और भारी वर्षा नजर आती है।

असंतुलन का नुकसान: - सरकारे तो अभी विकास के लिए पर्यावरण नियमों को शिथिल करने में लगी है। दरअसल विकास की मौजूदा अवधारणा ही भ्रामक है। क्योंकि क्या केवल औद्योगीकरण, बिजली परियोजनाएं, खनन और शहरीकरण ही से विकास की गांरटी हो। क्या स्वच्छ पर्यावरण और जीवन स्तर में सुधार को विकास की अवधारण के तौर पर नहीं देख सकते है यह तो तय है कि हम आगे आने वाली पीढ़ियों से विकास का दावा नहीं कर सकते हैंं।

प्रभाव: - ये क्षेत्रों के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है, लेकिन असर पूरी पृथ्वी पर होता है।

  • जैव तंत्र बदलाव पृथ्वी के 20 से 30 प्रतिशत जंतु और पौधों पर वर्तमान में लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा।
  • प्रतिकूल मौसम जल्दी-जल्दी मौसम में बदलाव से गर्म हवाओं का चलना, तटीय क्षेत्रों में बाढ़, सूखा पड़ना।
  • कृषि-सेहत पर असर कई देशों में कृषि उत्पादन घटा, बीमारी फेलाने वाले कीटाणुओं का फेलाव हो जाएगा।
  • जलस्तर वृद्धि ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्री जल के तापमान में वृद्धि और बढ़ती अम्लीयता हो गई है।
  • युनीसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 69 करोड़ बच्चे जलवायु परिवर्तन से सीधे प्रभावित है और 53 करोड़ बच्चों को भीषण बाढ़ व तूफान से जुझना पड़ रहा हैे।

प्रयास व परिणाम: - इसमें अलग-अलग राष्ट्रों ने अपने -अपने स्तर पर प्रयास कर परिणाम भी सामने लाए हैं।

  • क्योटों में 1997 में सालाना कॉन्फ्रेंस हुई उसमें 37 विकसित देशों से 2008 - 12 तक कार्बन के उत्सर्जन में कटौती करने की बात कही। कई विकसित देश पीछे हट गए।
  • सीबीडीआर यानी कॉमन बट डिफरेंशिएटेड रिस्पॉल्सिबिलिटीज इसका रियों में निष्कर्ष हुआ कि ग्रीन हाउस उत्सर्जन में अमीर देश ज्यादा दोषी है। तो ऐसे देशों में जुर्माना लगाया जाए।
  • एडीपी डरबन में 2011 में क्योटो प्रोटोकाल की तर्ज पर एक और करार की जुगत निकाली कि पेरिस में 21 वीं सालाना बैठक में यूनएफसीसीसी के देश हस्ताक्षर करेंगे। 2020 से अस्तित्व में आएगा।
  • यूनएफसीसीसी की 2010 में कानूनन बैठक हुई । ग्रीन क्लाइमेट फंड बना। यह तय हुआ कि अमीर देश फंड देंगे। जो गरीब देशों में स्वच्छ ऊर्जा-तकनीक विकसित करने में राशि खर्च होगी।

समाधान: - इनके हर क्षेत्र में समाधान भी निकाले हैंं-

  • ऊर्जा का उत्पादन जीवाश्म ईंधन कोयला, तेल, गैस उत्पादों में कमी कर नवीकरणीय ऊर्जा स्रातों की खोज करना। 35 प्रतिशत विभिन्न क्षेत्रों से होने वाला ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन फीसदी में।
  • औद्योगिक उत्पादन ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम कर औद्योगिक उत्पादन के लिए नए तरीके खोजे जाने होंगे 18 प्रतिशत।
  • यातायात के साधन कम कार्बन उत्सर्जन करने वाले वाहनों का ज्यादा इस्तेमाल, वाहनों का पुल बनाना 14 प्रतिशत।
  • जल का प्रबंधन वेस्ट डिस्पोजल के लिए नए तरीकों का इस्तेमाल, जल को शुद्ध करने के कार्य 3 प्रतिशत है।
  • आवासीय इमारतें वर्तमान इमारतों को और अधिक ऊर्जा संरक्षण अनुकूल बनाना 6 प्रतिशत।
  • कृषि नाइट्रोजन खाद का कम उपयोग मीथेनाइजेशन करें 10 प्रतिशत।
  • गैर वानिकीकरण इस्तेमाल के लिए लकड़ियों को केवल बेहतर प्रबंध वाले जंगलों से काटना।

मोदी जी: - 30 दिसम्बर को पेरिस में इस सम्मेलन का आगाज हुआ। जहां पर 2, 800 सिपाही व सैनिक तैनात हुए थे। पेरिस शहर में 6, 000 सुरक्षाकर्मी भी तैनात थे। इस सम्मेलन मेंं 150 देशों के नेता अभी तक पहुंचे है जिसमें से हमारे भारत देश के प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी भी उपस्थित थे। सम्मेलन शुरू होने से पहले मोदी जी बताया कि वे जलवायु परिवर्तन के सिद्धांत पर अडिग हैं। उन्होंने वहां पर कहा कि ”जलवायु परिवर्तन की समस्या पैदा करने में भारत का योगदान नहीं है। फिर भी वह इसके दुष्परिणाम भुगत रहा है पर अब समय आ गया है कि विकसित देश इस समस्या का हल करने के लिए आगे आए। जिनके पास विकल्प व तकनीक क्षमता है वे अपनी तकनीक और संसाधन गरीब देशों के साथ साझा करें। इससे क्लीन एनर्जी के वैश्कि लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि हम पारंपरिक ऊर्जा को अधिक स्वच्छ बना सकते हैं। हमें अगले दस सालों में नवीकरणीय ऊर्जा पर फोकस करने वाले 30 - 40 लैब और प्रयोगशालाओं का एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क बनाना चाहिए।” इससे पहले उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद सोलर अलायंस लॉन्च किया। उन्होंने इसके लिए भारत की ओर से 200 करोड़ रुपए (3 करोड़ डॉलर) की सहायता का ऐलान किया। उन्होंने गुड़गांव के नेशनल इंस्टीट्‌यूट ऑफ सोलर एनर्जी में इसकी शुरूआत करने की घोषणा भी की।

फ्रांस्वा ओलांद: - फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद का कहना है कि ”संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष और जलवायु परिवर्तन दो बड़ी चुनौतियां हैं। इनका सामना विश्व को करना होगा। पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने और उसे दो डिग्री से नीचे लाने का समझौता पूरी दुनिया के लिए होना चाहिए। इसे दुनिया के सभी देशों के लिए बाध्यकारी बनाया जाना चाहिए। ऐसा होने पर ही सम्मेलन का असली मकसद पूरा हो सकेगा।

उपसंहार: - हमें धरती पर साफ हवा-पानी चाहिए ताकि धरती में हम स्वच्छ जीवन व्यतीत कर सके। ताकि आगे आने वाला हर प्राणी जीवित रह सके। विकास और पर्यावरण के बीच असंतुलन का हमें भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है। इसलिए दोनों में संतुलन बनाना बहुत ही आवश्यक है। अगर यह सतुंलन बिगड़ गया तो इसकी भरपाई भी नहीं कर सकते। केवल चारो ओर तबाई ही दिखाई देगी। सारी दुनिया यह तो मानती है कि जो कुछ भी जीवन शैली में बिगड़ रहा है वह आज की विकास शैली का ही परिणाम है, फिर भी दुनियां अपनी सुविधाओं पर अंकुश लगाने को तैयार नहीं हैं। इसके लिए हर व्यक्ति को आगे आना पड़ेगा एवं स्वच्छ पर्यावरण के लिए बुलंद आवाज़ उठानी पड़ेगी। अधिकारियों से यह कहना पड़ेगा कि हमें ओर विकास नहीं चाहिए हमें केवल जीने के लिए स्वच्छ वातावरण चाहिए।

- Published/Last Modified on: December 16, 2015

News Snippets (Hindi)

Monthy-updated, fully-solved, large current affairs-2019 question bank(more than 2000 problems): Quickly cover most-important current-affairs questions with pointwise explanations especially designed for IAS, NTA-NET, Bank-PO and other competetive exams.