उच्च दस समाचार (High Ten News - in Hindi) (August) (Download PDF)

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मुक्त व्यापार: - पश्चिम देशों ने व्यापार विस्तार करने और विकासशील देशों के संसाधनों का दोहन करने के मकसद से विश्व व्यापार संगठन का गठन कर मुक्त व्यापार के समझौते किए। लेकिन, चीन सहित कई विकासशील देशों ने सस्ती श्रम लागत के दम पर पश्चिमी बाजारों पर कब्जा कर लिया। बढ़ते व्यापार घाटे ने विकसित देशों को चिंतित कर दिया है।

  • दुनिया के व्यापार को संचालित करने के लिए विश्व व्यापार संगठन के नाम पर एक नई संस्था का जन्म हुआ तो उस समय अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने कहा इससे मुक्त व्यापार को बड़ा बल मिलेगा और दुनिया भर के लोग इससे लाभान्वित होंगे। सवाल यह है कि क्या दुनिया में मुक्त व्यापार के इस सिद्धांत की आड़ में इंग्लैंड और दूसरे साम्राज्यवादी देशों ने अन्य मुल्कों पर अपना माल थोपना शुरू कर दिया। जगजाहिर है कि बिना किसी आयात शुल्क के भारत में इंग्लैंड के औद्योगिक उत्पाद आयात होते रहे और उसके चलते भारतीय उद्योग धीरे-धीरे बंद होते गए, इसे राष्ट्रवादी अर्थशास्त्रियों ने ’डी-इंडस्ट्रिलाइजेशन’ (उद्योगीकरण) का नाम दिया। इसका मतलब यह हुआ कि भारत धीरे-धीरे कृषि पर ज्यादा आश्रित हो गया। ऐसा देश जो अपने औद्योगिक उत्पादन के बल पर दुनिया की एक चौथाई जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) पैदा करता था, एक गरीब कृषि प्रधान देश बन गया। हालांकि बाद में अंग्रेज सरकार को भी मानना पड़ा कि मुक्त व्यापार के कारण भारतीय उद्योगों को बचाने के लिए आयात शुल्क लगाने होंगे। ऐसे में कपड़ा, कागज, चीनी आदि वस्तुओं पर आयात शुल्क लगाया गया, जिसके चलते उन उद्योगों का विकास हो सका। ’गैट’ की उरुग्वे दौर की वार्ताओं में अमरीका, यूरोपीय देशों और जापान समेत औद्योगिक राष्ट्रों ने भारत और अन्य विकासशील देशों पर यह दबाव बनाना शुरू किया कि वो ’गैट’ में नए विषयों को शामिल करने के लिए तैयार हों। हालांकि शुरुआती दौर में लगभग सभी विकासशील देशों ने ’गैट’ के विस्तार में असहमति दर्ज की लेकिन अंततोगत्वा वे औद्योगिक राष्ट्रों के दबाव में आकर मान गए और उसके बाद ’गैट’ में हुए समझौतों के कारण डब्ल्यूटीओ का जन्म हुआ और एक नए प्रकार के मुक्त व्यापार क दौर शुरू हो गया। टैरिफ (मूल्य) घटने लगे और टैरिफ गतिरोध समाप्त हो गए।
  • कहा तो यह गया था कि इससे भारतिय कृषि और औद्योगिक विकास को बल मिलेगा लेकिन हुआ इसके विपरीत। डब्ल्यूटियों पर हस्ताक्षर करने से पहले विदेश व्यापार जीडीपी के मात्र 10 प्रतिशत के बराबर था लेकिन 2013 - 14 तक आते आते देश का विदेशी व्यापार घाटा ही जीडीपी के 10 प्रतिशत के आसपास पहुँच गया। इसका अर्थ यह है कि देश को विदेशी मुद्रा की कमी का ही सामना नही करना पड़ा बल्कि मुक्त व्यापार के कारण देश के रोजगार विश्व के अन्य देशें में स्थानांतरित हो गए जीडीपी में औद्योगिक उत्पादन का हिस्सा यथावत 15 प्रतिशत पर बना रहा यानी डब्ल्यूटिओ वास्तव में भारत में बेरोजगारी और औद्योगिक उत्पादन में ठहराव का एक बड़ा कारण बना। दुनिया भर में मुक्त व्यापार के चैंपियन अमरीका ने भारत को डब्ल्यूटियों की शर्ते मनवाने में बड़ी भूमिका निभाई पर अब मुक्त व्यापार के इस जाल में वह खुद फंस गया। धीरे धीरे अमरीका में सस्ती वस्तुओं का आयात शुरू हो गया क्योंकि अमरीका में ओद्योगिक उत्पादन की लागत चीन व अन्य विकासशील मुल्कों में उत्पादन की लागत से कहीं ज्यादा थी। ऐसे में अमरीकी ओद्योगी बंद होने लगे और लोग बेरोजगार। लेकिन तब भी अमरीका में बैठे मुक्त व्यापार के समर्थक उसके लाभ गिनाने में लगे रहे। उनके मुताविक यह सही है कि अमरीका में बैठे कुशल श्रम्रिकों की नौकरी चली गई लेकिन वालमार्ट (प्रथप्रदर्शक) के स्टोरो (दुकान) में सस्ता माल तो आया। चूंकी औद्योगिक क्षेत्र के हास की भरपाई सस्ते माल से हो रही है इसलिए मुक्त व्यापार ही सही रास्ता है। बेरोजगार हुए लोगों को दूसरे कामों में लगाकर अमरीकी अर्थव्यवस्था लाभान्वित होगी।
  • अमरीकी का अधिकांश देश के साथ व्यापार घाटे में चल रहें हैं। डब्ल्यूटीओ बनते समय यह कहा गया था कि अमरीका से मात्र मैक्सिको को ही निर्यात करने में 2 लाख अतिरिक्त नौकरियां जुटेंगी लेकिन अभी मैक्सिको से व्यापार घाटे के कारण 7 लाख नौकरियां समाप्त हुई। इसके बावजूद मुक्त व्यापार के पैरोकार नए नए समझौतों को समर्थन दे रहे थे। एक नया मुक्त व्यापार समझौता दक्षिण कोरिया के साथ 2010 में किया गया, जिसमें यह कहा गया कि अमरीका के निर्यात वहां बढ़ेगे लेकिन बाद के सालों में पता चला कि दक्षिण कोरिया के साथ व्यापार घाटा और भी बढ़ गया। अमरीका के लोग मुक्त व्यापार के नाम से ही अब डरने लगे हैं। मुक्त व्यापार के पैरोकार बराक ओबामा ने बड़ी कोशिश कर 12 देशों के साथ एक बड़ा मुक्त व्यापार समझौता करने की कोशिश की लेकिन वर्तमान राष्ट्रपति ट्रंप ने आते ही उस समझौते को रद्द कर दिया। अब चीन मुक्त व्यापार का चैंपियन (विजेता) हो गया है क्योंकि मुक्त व्यापार के तमाम समझौतों का सबसे ज्यादा फायदा चीन को ही मिला है और वो दुनिया के मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) का बड़ा केन्द बन चुका है। लगभग डेढ़ दशकों से भारत ने कई नए क्षेत्रीय एवं दव्पक्षीय मुक्त व्यापार समझौते किए है। कई सालो से भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता और 16 देशों के बीच ’आरसेप’ नाम का एक अन्य समझौता समेत कई समझौते लंबित है। पूरी दुनिया मुक्त व्यापार के नफा-नुकसानों को तौलते हुए मुक्त व्यापार से मुक्ति के रास्ते खोज रही है, ऐसे में स्वाभाविक ही है कि प्रस्तावित समझौतों के बारे में नए सिरे से विचार करना जरूरी हो गया है।

डॉ. अश्विनी महाजन, आर्थिक मामलों के जानकार, दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन, स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीष्य सह-संयोजक

अमेरिका: - दवा कंपनी (जनसमूह) फाइजर को न्यूमोनिया की वैक्सीन ’प्रिवेनार 13’ के लिए भारत में पेटेंट (सुविधा) अधिकार मिल गया है। भारतीय पेटेंट (सुविधा) ऑफिस (कार्यालय) ने कंपनी (जनसमूह) को 2026 तक यह दवा बेचने का अधिकार दिया है। यानी दूसरी कंपनियां इस दवा का सस्ता जेनरिक वर्जन नहीं बना सकती है। स्वास्थ्य संगठन इस कदम का विरोध कर रहे थे। उनका कहना है कि इससे वह दवा लाखों गरीबों की पहुंच से बाहर हो जाएगी। पिछले साल यूरोपियन यूनियन (संघ) के पेटेंट कार्यालय ने इस वैक्सीन (टीका) पर फाइजर का पेटेंट अधिकार खारिज कर दिया था। दक्षिण कोरिया और अमेरिका में भी इसे चुनौती दी गई है। फाइजर ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है। इसने कहा कि इस वैक्सीन को तैयार करने में उसे ढाई साल लगे थे। इसे 2010 में भारत में लांच (प्रक्षेपण) किया गया था। दुनिया में सबसे ज्यादा न्यूमोनिया पीड़ित भारत में ही हैं। इस बीमारी से दुनियाभर में हर साल करीब 10 लाख बच्चों की मौत होती है।

  • अमेरिका ने पेटेंट कानून सख्त करने के लिए भारत पर दबाव बनाए रखा है। अमेरिकी पेटेंट विभाग ने जून में एक रिपोर्ट (विवरण) में भारत के बौद्धिक अधिकार कानून पर सवाल उठाए थे। इसने भारत को स्थानीय कंपनियों का अनुचित तरीके से पक्ष लेने वाले देशों की सूची में रखा था। जॉन्सन एंड जॉन्सन के बाद फाइजर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दवा कंपनी है। पिछले साल इसका टर्नओवर (कारोबार) 3.4 लाख करोड़ रुपए था।
  • मेडिसिन्स (दवाई) सैन्स (समझ) फ्रंटियर्स (सीमाओं) (एमएसएफ) नाम की चैरिटी (दान पुण्य) संस्था ने पिछले साल फाइजर के पेटेंट आवेदन का विरोध किया था। इसका तर्क था कि पेटेंट अधिकार मिलने से भारत समेत बहुत से विकासशील देश इस दवा के सस्ते वर्जन से वंचित हो जाएंगे। दवा कंपनियों को नया विकल्प तलाशना पड़ेगा, जिसमें समय लग सकता है। एमएसएफ पेटेंट कार्यालय के फैसले को न्यायालय में चुनौती दे सकती है। एमएसएफ एशिया के कोऑर्डिनेटर (समन्वयक) प्रिसं (राजकुमार) मैथ्यू ने कहा, यह फैसला स्वीकार्य नहीं है। जीवन रक्षक वैक्सीन होने के बाद भी हर साल 10 लाख बच्चे न्यूमोनिया से मरते हैं। बहुत से गरीब देशों में सरकारें फाइजर की तय कीमत नहीं दे सकती हैं।
  • ’प्रिवेनार 13’ वैक्सीन बच्चों और व्यस्कों को न्यूमोनिया के 13 तरह के बैक्टेरिया (जीवाणु) से बचाती है। इसका पूरा कोर्स (अवधि) करीब 11, 000 रुपए का पड़ता है। कीमत ज्यादा होने के कारण फाइजर की पहले काफी आलोचना हो चुकी है। इसके बाद नवंबर 2016 में इसने बीमारी के खिलाफ मुहिम चलाने वाले गैर-सरकारी संगठनों के लिए दवा की कीमत कुछ कम कर दी थी।
  • नेशनल (राष्ट्रीय) इम्युनाइजेशन (प्रतिरक्षा) प्रोग्राम (कार्यक्रम) के तहत सरकार ने इसी साल यह वैक्सीन मुफ्त देना शुरू किया था। यह कार्यक्रम कई चरणों में चलाया जा रहा है। ढाई करोड़ लोगों को यह टीका लगाया जाना है। इस साल सिर्फ 21 लाख को यह मुफ्त मिल सकेगा।

कश्मीर: -लापरवाही की यह इंतहा ही कही जाएगी कि हम तब तक आंखे बद करे रहे जब तक कि कोई बाहरी व्यक्ति हमें जगाए नहीं। सरकारी तत्र में बैठे लोगों और राजनेताओं की स्थिति कमोबेश ऐसी ही होती जा रही है। हमारी खुफिया एजेंसियों (संस्था) पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते है। चिंता की बात तो तब होती है जब नेशनल (राष्ट्रीय) इनवेस्टिगेटिंग (जांच कर रही) एजेंसी (संस्था) (एनआईए) जैसी संस्थाएं भी मीडिया (संचार माध्यम) के खुलासे के बाद हरकत में आए। मीडिया ने अपने सीमित संसाधनों से यह खुलासा किया था कि कश्मीर के अलगावादी नेता गैरकानूनी माध्यमों से धन एकत्र कर राष्ट्रविरोधी कार्यों को हवा दे रहे हैं। इस खुलासे के बाद एनआईए ने यह खोज निकाला है कि बीस अलगावादी नेताओं ने दो सौ से अधिक संपत्तियों का निर्माण कर लिया है। देश में विभिन्न स्थानों पर मारे गए छापों में करोड़ो रुपए, सोना व देशविरोधी दस्तावेज बरामद किए गए। यह जानकारी मिली कि इसके लिए हवला के जरिए विदेशों से गैरकानूनी तरीके से आए पैसे का इस्तेमाल किया गया है। ये संपत्तियां अरबो रूपयों की है। खबर तो यह भी है कि एनआईए उन सभी की सूची बना ली है जिन पर कार्रवाई की जाएगी।

  • सवाल यही उठता कि इन अलगाववादियों ने ये संपत्ति कोई एक दिन में तो नहीं बना ली होगी। फिर हमारा खुफिया तंत्र क्यों नहीं जागा? हमारी सतर्कता एजेंसियां (संस्था) क्या कर रहीं थी? यह बात सही है कि एनआईए ने जानकारी मिलने के बाद जांच में काफी चुस्ती दिखाई है। पिछले तीन माह में जो तथ्य सामने आए हैं वह इसी चुस्ती का नतीजा है। लेकिन सबसे बड़ी जरूरत है जांच को अंतिम रूप देने और गुनहगारों को सख्त सजा देने की। खास तौर से ऐसे समय में जब भारतीय सेना कश्मीर को आतंक मुक्त करने के प्रयासों में जुटी है। बुरहान वानी, जाकिर मूसा, एस. अहमद बट जैसे आतंकी सरगनाओं का सफाया हो गया है। लेकिन जब अलगाववादियों की मदद से और आतंकी दस्ते तैयार होने की खबरें आती है तो चिंता स्वाभाविक है। कुल मिलाकर एनआईए 165 मामलों की जांच कर रही है। इनमें स्कूल (विद्यालय), कॉलेज (महाविद्यालय) व अन्य सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने व सेना एवं पुलिस के कामकाज में बाधा डालने के आरोप शामिल हैं। हमें अलगाववादियों की हरकतों पर नजर रखते हुए इन्हें कमजोर करना ही होगा। बड़ी जिम्मेदारी खुफिया एजेंसियों (संस्थाओं) की है। क्योंकि जांच और निगरानी में जरा भी लापरवाही कश्मीर में निर्दोष नागरिकों की जान के लिए खतरा तो बन ही सकती है सेना व पुलिस के जवानों की शहदत की वजह भी बन सकती है।

कौशल मिश्रा, रक्षा विशेषज्ञ, भारतीय सेना में कर्नल रहे मिश्रा लंबे समय तक कश्मीर घाटी में तैनात रहे हैं।

अफगान नीति और अमरीका: - अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अफगानिस्तान के बारे में अपनी नई नीति लागू कर पाए तो अफगानिस्तान ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया की शक्ल बदल जाएगी। इसके पहले तक अमेरिका की हर सरकार ने पाकिस्तान को अपने क्षुद्र स्वार्थों का मोहरा बनाया। पहले सोवियत संघ के खिलाफ और बाद में अफगानिस्तान को काबू में करने के लिए इस्तेमाल किया। अमेरिका ने आंख मूंदकर फौजी-वित्तीय मदद दी और पाकिस्तान उसका इस्तेमाल भारत के विरुद्ध करता रहा। इसलिए पिछले 70 साल में दक्षिण एशिया न तो संपन्न बन सका और न सशक्त। खुद पाकिस्तान उद्दंड राज्य में बदल गया।

  • ट्रंप ऐसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने खुलेआम पाकिस्तान को आतंक का गढ़ कहते हुए साफ-साफ कहा है कि यदि आतंकियों के खिलाफ वह तुरंत कार्रवाई नहीं करेगा तो अमेरिका उसके खिलाफ फौजी और आर्थिक कठोर कदम उठाएगा। यहां हम यह न भूलें कि पिछले 40 साल से कभी मुजाहिदीन, कभी तालिबान, कभी अल-कायदा, कभी इस्लामी राज्य और कभी-कभी स्थानीय अनाम गिरोहों को अमेरिका ने पाकिस्तान के माध्यम से सहायता दी है। यदि ट्रंप ने पाकिस्तान का हुक्का-पानी बंद कर दिया तो इन अराजक तत्वों का दम अपने आप घुट जाएगा। काबुल में अमेरिका के राजदूत रहे जलमई खलीलजाद की राय है कि अमेरिका पाकिस्तान को दी जा रही सारी आर्थिक मदद एकदम बंद कर दे और आतंकी शिविरों पर तुरंत हमला बोल दे। वैसे राष्ट्रपति बनने के पहले ट्रंप ने अफगानिस्तान से एक-एक अमेरिकी फौजी को तुरंत वापस बुलाने की मांग कई बार की थी। अब उन्होंने राष्ट्रपति बनते ही अपनी ही नीतियां उलट दीं। यही काम उन्होंने सऊदी अरब और चीन के बारे में भी किया। उम्मीद है वे अब नई अफगान-नीति पर टिके रहेंगे।
  • ट्रंप की दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को खुलेआम रेखांकित कर कहा कि अफगानिस्तान के पुननिर्माण में भारत सक्रिय भूमिका निभाए। पाकिस्तान के साथ अमेरिका की इतनी तगड़ी सांठगांठ रही है कि वह अफगानिस्तान में भारत का नाम लेना भी ठीक नहीं समझता था, लेकिन भारत को एक खास भूमिका देकर ट्रंप ने पाकिस्तान के घावों पर नमक छिड़क दिया है। पाकिस्तान को इतनी मिर्ची लगी है कि वहां से भारत की दखलंदाजी के विरुद्ध बयान भी आने लगे हैं। भारत ने अफगानिस्तान में 2 अरब डॉलर (अमरीका की मुद्रा) से ज्यादा खर्च कर दिए हैं, लेकिन ट्रंप ने भारत से कहा है कि वह भारत-अमेरिका व्यापार से करोड़ों डॉलर कमाता है, इसलिए वह अफागनिस्तान में अपना पैसा लगाए। ट्रंप ने साथ-साथ यह भी कह दिया कि अब अमेरिका अफगानिस्तान में पैसा नहीं लगाएगा। सिर्फ फौजी कार्रवाई करेगा। ट्रंप से कोई पूछे कि यदि अफगानिस्तान में लोग भूखे मरेंगे तो वे किसी भी सरकार को क्यों चलने देंगे और यदि नौजवान बेरोजगार होंगे तो वे तालिबानी फौज में भर्ती क्यों नहीं होंगे? यह ठीक है कि पिछले 17 साल में अमेरिका वहां 800 अरब डॉलर खर्च कर चुका है, लेकिन इसकी ज्यादातर राशि तो अमेरिकी कंपनियों (संघों) की जेबों में ही चली गई हैं। जो पैसा पाकिस्तान को दिया जा रहा था, वह अब अफगानिस्तान को दे और अमेरिकी पैसे से यदि भारतीय कंपनियां वहां काम करेगी तो अमेरिकी कंपनियों के मुकाबले उनकी सफलता कम से कम चौगुनी होगी।
  • ट्रंप ने ओबामा की नीति उलटते हुए यह ठीक ही कहा कि अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजो की न तो समय-सीमा होगी और न ही संख्या-सीमा होगी। ट्रंप को शायद अभी ठीक से अंदाजा नहीं है कि 8400 अमेरिकी सैनिक तो आटे में नमक के बाराबर भी नहीं है। उनकी संख्या अगर दस गुनी हो जाए तो सारा मामला साल-दो साल में ही ठीक हो सकता है। एक तो पाकिस्तान पर लगाम लगने से आतंकियों की कमर टूट जाएगी और फिर अफगान सेना में घुसे विघ्न संतोषियों से भी छुटकारा मिलेगा। अमेरिका अफगानिस्तान में भारत-पाकिस्तान के साथ मिलकर एक संयुक्त फौजी कमान बनाए, जो यदि ईमानदारी से काम कर सकी तो दक्षिण एशिया का नक्शा ही बदल जाएगा। अफगानिस्तान में थोड़ी स्थिरता बढ़ते ही तालिबान आदि असंतुष्ट तत्वों के साथ सार्थक बातचीत चलाना भी आसान हो जाएगा। यदि ट्रंप ने सावधानी और दूरदर्शिता से काम नहीं लिया तो यह मामला और भी बिगड़ सकता है। रूस और चीन दोनों मिलकर पाकिस्तान की पीठ ठोक सकते हैं। ओबामा से चिढ़ा हुआ ईरान भी उनका साथ दे सकता है। इन राष्ट्रों का तालिबान से इधर संपर्क बढ़ता चला जा रहा है। तालिबान का संपर्क कुछ अरब राष्ट्रों के साथ पहले से है। पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी सऊदी अरब के दरबार में गुहार लगाने रियाद पहुंच गए हैं। अमेरिकी असहयोग कितना भयावाह हो सकता हे, इसका अंदाज सबसे ज्यादा फौज को ही होगा। सेनापति कमर जावेद बाजवा इस्लामाबाद स्थित अमेरिकी राजदूत डेविड हाल में भी मिल आए हैं।
  • ट्रंप प्रशासन को पाकिस्तानी फौज को साफ-साफ बताना होगा कि वह आतंकवाद बर्दाश्त नहीं करेगा, चाहे वह अफगानिस्तान के खिलाफ हो या भारत के खिलाफ। ट्रंप में यदि कूटनीतिक होशयारी हो तो वे चीन में उइगर आतंकवाद और रूस से मध्य एशियाई मुस्लिम राष्ट्रों में चली रही आतंकवाद के बारे में भी बात करेगे। जैसे सीरिसा में रूस और अमेरिका मिलकर आईएसआईएस का मुकाबला कर रहे हैं, वैसा ही कोई अंतरराष्ट्रीय तंत्र दक्षिण एशिया में भी खड़ा किया जाना चाहिए। चीन को भारत को दिया गया महत्व अटपटा लगा है, लेकिन वह अपने लिए भी भूमिका चाह रहा है।
  • अफगानिस्तान में सफल होने के लिए विदेशी शक्तियों को एक बुनियादी बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी। अफगान लोग स्वभाव से ही आजाद लोग है। हर अफगान अपने आप में संप्रभु होता है। कोई विदेशी शासक कितना ही सबल, कितना ही शक्तिशाली, कितना ही क्रूर हो, वह अफगानिस्तान में टिक नहीं सकता। अफगानिस्तान दो बड़े साम्राज्यों की कब्रगाह पहले से ही है-ब्रिटिश और सोवियत। ट्रंप के सलाहकर अमेरिका को उसी खाई में नहीं खिसकाएंगे, जिसमें पहले से दो साम्राज्य दफन हैं।

वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

अमेरिका और पाकिस्तान: - अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब तक के कार्यकाल में राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए सबसे सख्त घोषणा की है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पाकिस्तान ’डबल गेम’ (दोहरा खेल) खेलता है। एक तरफ अमेरिका से आर्थिक मदद लेता है, दूसरी तरफ अमेरिकी संपत्तियों पर हमले का समर्थन करता है। उन्होंने यह भी संकेत दिए कि भारत के साथ मजबूत साझेदारी में अब पाकिस्तान कोई रुकावट नहीं डाल सकेगा, अफगानिस्तान पर उन्हें भारत की नीतियां ज्यादा बेहतर लगी हैं।

  • अफगानिस्तान पर रणनीति बदलने और पाकिस्तान को उस मामले से बेदखल करने के फैसले के नंबर (संख्या) दिए जाए तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सबसे अधिक नंबर के हकदार है। हिंसा से जूझते क्षेत्र की सुरक्षा की खातिर उन्होंने बोल्ड (गहरा) और सबसे बेहतर कदम उठाया है। हालांकि, संभव है कि इसके कारण अमेरिका को क्षेत्र में नफरत की नजरों से देखा जाए। ट्रंप ने इस फैसले की प्रतिक्रिया में हाेेने वाली गतिविधियों की आशंका में सलाहकारों को ’तैयारी पूरी रखने’ के संकेत भी दे दिए हैं।
  • अमेरिका राष्ट्रपति ने अफगानिस्तान को लेकर जो फैसला किया है, उसके कई मायने हैं। उसमें उन्होंने अमेरिकी हितों का पूरा ख्याल रखा है। इसके अतिरिक्त जो भी एजेंसी (संस्था) इसमें जुड़ी है, वे सभी प्रमुखता से फैसले के प्रभावों में शामिल होंगी। राष्ट्रपति ट्रंप ने स्वीकार किया है कि इस क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर उनके विचारों में बदलाव हुआ है और इसी कारण उन्होंने अपने सैनिकों की लगातार वापसी समीक्षा शुरू कर दी है, क्योंकि यह गंभीर मसला है।
  • डोनाल्ड ट्रंप लगातार तीसरे राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने अफगानिस्तान में अमेरिकी उपस्थिति के चलते क्षेत्र की सुरक्षा के साथ-साथ अमेरिकी सुरक्षा हितों के बारे में भी सोचा। इसमें इस्लामिक आतंकियों से पैदा होने वाले खतरे और परमाणु आतंकवाद भी शामिल है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर यह मान लिया है कि अगर अफगानिस्तान को उसके हाल पर छोड़ दिया गया तो अंतरराष्ट्रीय स्तर के आतंकी संगठनों के लिए वह जगह खुद को फिर से उबारने के लिए स्वर्ग बन जाएगी। अफगानिस्तान क्षेत्र को लेकर अमेरिका की नई रणनीति न केवल विस्तृत है, बल्कि उसमें अमेरिकन पॉलिसी (नीति) की प्रगति भी दिखाई देती है। ट्रंप ने सैनिकों की तैनाती में संख्या का जिक्र नहीं किया है, लेकिन स्पष्ट किया है कि अमेरिका बिना किसी समय सीमा को निर्धारित किए वहां सैनिकों की संख्या बढ़ाएगा। जबकि, ओबामा प्रशासन की यह एक त्रुटि थी।
  • ओबामा प्रशासन की एक अन्य गलती सुधारते हुए ट्रंप ने अफगानिस्तान में तैनात कमांडरों (सेनाध्यक्षों) को यह फैसला करने का हक दिया है कि वे जब तक चाहें अफगाननी सेना को प्रशिक्षण दे सकते हैं। इसका फायदा यह होगा कि अफगानी सेना तालिबान और अन्य आतंकी संगठनों से अपने देश की सुरक्षा बेहतर तरीके से कर सकेगी। इसके अतिरिक्त उन्होंने शांति वार्ता की यथार्थवादी स्थिति बनाए रखने की तरफ जोर दिया है जबकि ओबामा प्रशासन ने सुलह-समझौते पर ज्यादा बल दिया था, जिससे अमेरिकी तैनाती प्रभावित हो रही थी। अफगानिस्तान को लेकर अमेरिका की नई रणनीति का मुख्य हिस्सा यह है कि अमेरिका को पाकिस्तान को लेकर नई सोच की जरूरत है। अपने दो पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों (जॉर्ज डब्ल्यू बुश और बराक ओबामा) की तुलना में डोनाल्ड ट्रंप यह अच्छी तरह समझ गए हैं कि पाकिस्तान डबल गेम (दोहरा खेल) खेल रहा है। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह मानने से इंकार कर दिया है कि पाकिस्तान अमेरिका का सहयोगी है। जबकि वे मानते हैं कि पाकिस्तान अमेरिका का सहयोगी होने का ढोंग करता है और बदले में अमेरिका से भारी आर्थिक मदद हासिल करता है। उस राशि का उपयोग वह तालिबान और हक्कानी नेटवर्क (जालतंत्र) के आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाह मुहैया कराने में करता है, जबकि यही आतंकी संगठन अमेरिकी और अफगानी सेना पर हमले करते हैं।
  • अफगानिस्तान-पाकिस्तान को लेकर अमेरिका की रणनीति में बदलाव करने की ट्रंप की घोषणा से पता चलता है कि पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद और सहयोग अब बंद हो सकता है। ट्रंप ने इस बात के संकेत भी दिए हैं कि पाकिस्तान की संवेदनशीलता में जो अंतर दिखाई दिया है, उसके कारण अब वह अमेरिका को भारत के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी करने से नहीं रोक सकता है।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी घोषणा में उद्देश्यों और विचारों पर इन बातों का ध्यान रखा है। वह कि अफगानिस्तान में सैनिकों की तैनाती बढ़ाने से कूटनीतिक स्तर पर मजबूती मिलेगी यानी ट्रंप चाहें तो काबुल में अमेरिकी राजदूत या नाटों कमांडर इन चार्ज की नियुक्त कर सकते हैं, लेकिन सबसे अच्छा कदम राष्ट्रपति का दूत नियुक्त करने वाला होगा। उस दूत का मुख्य कार्य अफगानी नेताओं के साथ काम करने का होगा, जो सुनिश्चिम करेंगे कि वे अपने देश में सुधार और आर्थिक विकास के वादे पूरे करेंगे।

अमरीका व पाकिस्तान- पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देता है यह बात अब अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी मानी है। अमरीका के हालिया तेवरों से उम्मीद बनी है कि यदि वह पाकिस्तान पर दबाव बनाने में कामयाब हो जाता है तो आतंकवाद का दशिण एशिया से सफाया किया जा सकता है। देखना यह है कि वह पाकिस्तावन पर दबाव किस तरह से बना पाएगा।

  • अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आतंक के पोषक पाकिस्तान के प्रति कड़ा रुख अपनाते हुए पिछले दिनों कहा कि पाकिस्तान आतंककारियों व उनकी गतिविधियों के लिए स्वर्ग नहीं हो सकता। ट्रंप का यह बयान अफगानिस्तान में अमरीकी सेना का नेतृत्व कर रहे जनरल निकलसन के इस वक्तत्य के बाद आया कि अफगान तालिबान ने अपनी आतंकी गतिविधियों के लिए क्वेटा और पेशावर को ठिकाना बना रखा है। अमरीका की अफगान नीति में ताजा परिवर्तन मुख्यत: दो पहलुओं को इंगित करता है पहला, दक्षिण एशिया नए रणनीतिक समीकरणों की तरफ बढ़ रहा है। दूसरा, नए आतंकवाद में निकट भविष्य में कमी नहीं आने वाली। गौरतलब है कि पिछले डेढ़ दशक में आतंकवाद से मरने वालों की संख्या में पांच गुना वृद्धि हुई है। ग्लोबल (व्यापक) टेरेरिस्ट (आतंकवादी) रिपोर्ट (विवरण) के अनुसार भारत, इस्लामिक आतंकवाद की दृष्टि से सबसे संवेदनशील देश है। अमरीका के पहले रुख से लगता है कि अब पाकिस्तान अमरीकी सहायता का उसके हितों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं कर सकेगा और अमरीका अफगानिस्तान में भारत की बड़ी भूमिका की मंशा रखता है। अमरीका, अफगान नीति में अब तक पाकिस्तान को ही वरीयता देता आया है। ऐसे में सवाल उठता है कि बदलते वैश्विक रणनीतिक समीकरणों में भारत की क्या भूमिका होगी? उल्लेखनीय है कि भारत, अफगानिस्तान में आधारभूत निर्माण कार्यों जैसे सड़क, पुल, विद्यालय और वहां संसद भवन की इमारत बनाने में पहले से ही सहायता कर रहा है। ट्रंप के इस बयान से स्पष्ट होता है कि अमरीका दक्षिणी ऐशिया में एक विश्वसनीय सहयोगी तलाश रहा है जो उसका आर्थिक व सामरिक बोझ बांट सके।
  • अमरीका अफगानिस्तान में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की मंशा पहले ही जाहिर कर चुका है। अमरीका फिर से अफगानी तालिबान व हक्कानी नेटवर्क (जालतंत्र) पर ड्रोन हमले करना चाहता है जिसमें क्वाटा व पेशावर प्रमुख केन्द्र है। माना जा रहा है कि पाकिस्तान का चीन के प्रति बढ़ता विश्वास और रणनीतिक साझेदारी दक्षिण एशिया में अमरीकी हितों के सीधे चुनौती देता नजर आ रहा है। अत: अमरीका ’दबाव व सहयोग’ की नीति का इस्तेमाल कर पाकिस्तान को सहायता में कटौती की चेतावनी दे रहा है। साथ ही दक्षिण एशिया में बिगड़ते शक्ति संतुलन को भारत के साथ अफगानिस्तान में सुदृढ़ साझेदारी से संतुलित करना चाहता है। वहीं चीन भी अपनी न्यू (नया) सिल्क (रेशक) रोड (सड़क) नीति से भारत व अमरीका के अफगानिस्तान में प्रभाव को कम करने में लगा है। पूर्व में भी अमरीका पाकिस्तान पर कई बार दबाव की नीति इस्तेमाल कर कुछ समय के लिए आर्थिक व सैन्य सहायता भी लंबंति कर चुका हे। शीतयुद्ध काल से ही अमरीका न पाकिस्तान के साथ मिलकर अफगानिस्तान में मुजाहिदीन और जिहादी दस्तों को तत्कालीन सोवियत रूस के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार किया। इन मुजाहिदीनों ने पाकिस्तान की जमीन से बहाबी इस्लाम, धार्मिक कट्टरता व शरिया कानून की वकालत की। शीतयुद्ध की समाप्ति पर ये मुजाहिदीन दस्ते तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, हरकत मुजाहिद्दीन, लश्कर -ए-तयैबा जैसे मुखौटे में सामने आए। अमरीका को इसकी पीड़ा का अहसास 11 सितंबर 2001 को वाशिंगटन और न्यूयार्क में हुए आतंकी हमले से हुआ। वस्तुस्थिति यह है कि पाकिस्तान ने कश्मीर और अफगानिस्तान में अपने राजनीतिक और रणनीतिक हितों की पूर्ति हेतु विघटनकारी तंत्रों का सहयोग किया।
  • भारत और अफगानिस्तान पाक द्वारा प्रायोजित आतंकवाद से वर्षों से जूझ रहे हैं। हैरत की बात है कि अफगानिस्तान में अपने दबदबे को बनाए रखने के लिए पाकिस्तान आतंकवादी गुटों को नियमित समर्थन और सहायता देता रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा बयान पर कट्टरपंथी जमातुल इस्लामिया के मुखिया अमीरुल हक ने कहा कि पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्क और तालिबान के लिए स्वर्ग बना रहेगा। हक के इस बयान का खंडन पाकिस्तान सरकार की ओर से कभी नहीं किया गया। तात्पर्य यह है कि पाकिस्तान का यह गैर जिम्मेदाराना व्यवहार वैश्विक सुरक्षा, स्थिरता और शांति के लिए खतरा बनता जा रहा है। ऐसे में अमरीका यदि पाकिस्तान पर दबाव बनाने में कामयाब हो जाता है तो आतंकवाद का दक्षिण एशिया से सफाया किया जा सकता है। हालांकि, अमरीका अपने समग्र हितों की रक्षा के लिए पाकिस्तान से अपनी साझेदारी तुरन्त खत्म नहीं करेगा। वरन पाकिस्तान को नियंत्रण में रखने के लिए दबावकारी नीतियों और सीमित सहायता के बीच संतुलन बनाए रखेगा। वर्तमान परिस्थितियों में भारत के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह अमरीका की इस नई पहल में सहयोग करे तथा अवसर आने पर अफगान सरकार की सैन्य मदद करे। अमरीका दक्षिण एशिया में भारत को मजबूत कर और उसके अहम साझेदार बनाकर चीन के बढ़ते कदमों पर अंकुश लगाना चाहता है। यह भी देखना होगा कि पाकिस्तान के नीति-नियता अमरीकी राष्ट्रपति के ताजा बयान को किस रूप में लेते हैं? ? अमरीका की विदेश नीति में आया यह परिवर्तन भविष्य में भारत और समूचे दक्षिण एशिया के लिए काफी अहम साबित होने वाला है।

प्रो. संजय भारद्धाज, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में कार्यरत, दक्षिण एशिया से जुड़े मुद्दों पर गहरी पकड़ रखते हैं।

शर्त: -आतंकवाद पर पाकिस्तान को ट्रंप की कड़ी चेतावनी के बाद अमेरिका ने उसे 1630 करोड़ रुपए 25.5 करोड़ डॉलर (अमरीका मुद्रा) की सैन्य सहायता पर भी शर्त लगा दी है। वह यह मदद तभी इस्तेमाल कर सकेगा जब वह अपनी जमीन पर आतंकी संगठनों के खिलाफ असरदार कार्रवाई करेगा।

पिछले हफ्ते ट्रंप ने अफगानिस्तान को लेकर नई रणनीति की घोषणा के समय आतंकवाद को पनाह देने का आरोप लगाते हुए पाकिस्तान पर हमला बोला था। उन्होंने पाकिस्तान को चेतावनी दी थी आतंकियों को पालने-पोसने के बदले उसे बहुत कुछ खोना होगा। ’न्यू यॉर्क टाइम्स’ के मुताबिक ट्रंप प्रशासन ने कांग्रेस को जानकारी दी कि पाकिस्तान को सैन्य सहायता के रूप में 25.5 करोड़ डॉलर वह एक एस्क्रो खाते में रख रहा है जिसका इस्लामाबाद तभी इस्तेमाल कर पाएगा जब वह अपने यहां मौजूद आतंकी नेटवर्कों (जालतंत्रों) पर कार्रवाई करेगा। उसे उन आतंकी समूहों पर भी कार्रवाई करनी होगी जो पड़ोसी अफगानिस्तान में हमले कर रहे हैं। एस्क्रो खाते से पैसा तभी इस्तेमाल किया जा सकेगा जब तय शर्तो को पूरा किया जाएगा।

सैन्य सहायता पर शर्त लगाने की बात ऐसे समय में सामने आई हैं, जब दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। पाकिस्तान ने वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों के साथ तीन उच्च स्तर की बैठकें रद्द कर दी हैं। इसमें पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ का अमेरिकी दौरा भी शामिल है। आसिफ इस दौरे पर अमेरिकी विदेशी मंत्री रैक्स टिलरसन से मुलाकात करने वाले थे।

दक्षिण कोरिया और भारत: - सरकार ने दक्षिण कोरिया के रास्ते सोने के आयात पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। विदेश व्यापार महानिदेशालय की ओर से इस बारे में अधिसूचना जारी कर दी गई है। इसके अनुसार अब दक्षिण कोरिया से गोल्ड (सोना) ज्वैलरी (गहने), सोने के सिक्के या सोने के बिस्कुट समेत किसी भी तरह से सोने का आयात नहीं हो सकेगा। पिछले डेढ़ महीने में इस रास्ते करीब 25 टन सोना आयात हुआ है। चीन के बाद सोने के दूसरे सबसे बड़े उपभोक्ता देश भारत में सोने और चांदी पर 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगता है लेकिन यह शुल्क उन दोनों से आयात करने पर नहीं लगता जिनके साथ मुक्त व्यापार समझौता है। दक्षिण कोरिया के साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता है। इन देशों से आयातित आयात शुल्क मुक्त वस्तुओं पर भारत पहले 12.5 प्रतिशत एक्साइज ड्‌यूटी (उत्पादक शुल्क) लगाता था लेकिन वस्तु एवं सेवा कर के गत एक जुलाई से लागू होने के बाद यह ड्‌यूटी जीएसटी में ही समाहित हो गई और व्यापारी इसी बात का लाभ उठाकर वहां से भारी मात्रा में दोनों कीमती धातुओं का आयात कर रहे थे।

केन्द्र सरकार के दक्षिण कोरिया से सोने और चांदी के आयात पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा और वैश्विक बाजारों में तेजी से स्थानीय सर्राफा बाजार में सोने के भावों में 150 रुपए प्रति दस ग्राम तक की तेजी आ गई। वहीं, चांदी के भाव स्थिर रहे। सोना स्टैंडर्ड इस तेजी के साथ 29, 850 रुपएप्रति दस ग्राम पहुंच गया वहीं सोना जेवराती में 100 रुपए की तेजी रही। विदेशी बाजारों में सप्ताहांत पर सोने और चांदी के भाव में तेजी रही। लंदन और न्यूयॉर्क से मिली जानकारी के अनुसार, सोना हाजिर को 4.5 डॉलर (अमरीका मुद्रा) चढ़कर 1, 296.5 डॉलर प्रति औंसत पर पहुंच गया। दिसंबर का अमेरिकी सोना वायदा तेजी में 1, 291.05 डॉलर प्रति औंस बोला गया। चांदी हाजिर भी बढ़त के साथ 17.03 डॉल प्रति औंस पर पहुंच गई।

भारत और चीन: - डोकलाम को लेकर भारत व चीन के बीच गत तीन माह से जो तनाव का माहौल बन रहा था उसके अब सुलझने के आसार बनते नजर आ रहे हैं। हमारे प्रधानमंत्री मोदी अगले माह ब्रिक्स सम्मेलन के लिए चीन की यात्रा करने वाले हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार दोनों देशों ने अपनी-अपनी सेनाएं वापस लौटाने पर सहमति जताई है। इसके साथ ही डोकलाम से सेनाओं के लौटने की प्रक्रिया शुरू भी हो गई है। दोनों देशों के बीच जब से तनाव का यह माहौल बना है तब से ही विभिन्न स्तरों पर कूटनीतिक वार्ताओं का दौर चल रहा था। भले ही चीन अब तक यह कहता आ रहा हो कि जब तक भारत की सेनाएं डोकलाम से नहीं हटेगी कि तब तक भारत से कोई बातचीत नहीं होगी। चीन अगले माह अपने यहा ब्रिक्स सम्मेलन आयोजित करने वाला है। भारतीय प्रधानमंत्री भी ब्रिक्स में शिरकत करने चीन जाने वाले हैं। ऐसे समय में दोनों देशों की सेनाओं का डोकलाम से हटाने का फैसला काफी अहम माना जा सकता है। सम्मेलन की सफलता के लिए यह जरूरी था कि ब्रिक्स के दो महत्वपूर्ण सदस्य देश तनावमुक्त माहौल में एक साथ बैठ पाएं और सहजता के साथ बातचीत कर सकें। उम्मीद की जानी चाहिए कि सेना हटने के साथ ही दोनों देशों के बीच जारी गतिरोध समाप्त होगा। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अब तक दोनों देश इस मामले को लेकर कठोर रवैया अपनाए हुए थे, ऐसे में एकाएक यह बदलाव आने का कारण क्या है? यह माना जा सकता है कि कोई एक कारक दोनों देशों के बीच सौहार्द का माहौल बनाने के लिए जिम्मेदार नहीं है। बल्कि कई ऐसे कारक हैं जिनको देखते हुए दोनों देशों को सेनाएं हटाना ही उचित लगा।

  • हमें यह समझना होगा कि एशिया में चीन और भारत दोनों ही बड़ी ताकत के रूप में जाने जाते हैं। चीन को अपनी डुबती अर्थव्यवस्था को बचाने और भारतीय बाजारों में चीनी माल की पहुंच को देखते हुए कोई जोखिम उठाना उचित नहीं समझा। यह भी देखना होगा कि भारत के लिए भी युद्ध की परिस्थितियां ऐसे माहौल में उपयुक्त नहीं है। जब उसे पड़ोसी देश पाकिस्तान से भी जंग जैसे हालात का सामना करना पड़ा है। यह बात सही है कि भारत के लिए सीमाओं की सुरक्षा चिंता का विषय है लेकिन अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना चीन के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है। डोकलाम का मुद्दा चीन के राजनीतिक नेतृत्व के लिए भी परेशानी भरा साबित हो रहा था। चीन पर यह आरोप है कि वह अंतरराष्ट्रीय दबाव की अवहेलना कर मनमर्जी चलाता रहा है। साउथ (दक्षिण) चीन विवाद इसका उदाहरण है। लेकिन भारत डोकलाम से एक इंच भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। दोनों देशों द्वारा सेना हटाने का यह फैसला समझदारी भरा कदम कहा जा सकता है क्योंकि तनाव लगातार बढ़ता जा रहा थ और उसका परिणाम अंतत: युद्ध ही होता।
  • वर्तमान परिदृश्य में न तो भारत और न ही चीन युद्ध चाहता है। भारत और चीन सार्क, शंघाई सहयोग संगठन दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के लिए हैं और इन संबंधों को सुरक्षा के मसले पर खत्म करना आसान नहीं। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस मुद्दे पर चीन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता जा रहा था। गौरतलब है कि डोकलाम को लेकर भारत और चीन में सीधा विवाद नहीं है। हां, यह विवाद भूटान और चीन के बीच अवश्य हैं। ऐसे में कूटनीतिक तौर पर यह विचार किया जाना जरूरी था कि भारत अपनी सेना डोकलाम क्यों भेज रहा हैं? हालांकि, भूटान से मैत्री संधि में बंधे होने के कारण भारतीय सेनाओं के डोकलाम पहुंचने में अनुचित कुछ भी नहीं है। हमारी आपत्ति तो चीन द्वारा डोकलाम से होकर सड़क निर्माण को लेकर ही थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत की सेना जिस जगह तैनात थी वह हमारे पड़ोसी देश भूटान का हिस्सा है। वहां चीनी सेना से भारत को कोई नुकसान भी नहीं था। लेकिन भूटान के साथ रिश्तों को देखते हुए भारत ने भी स्पष्ट कर दिया था कि उसके लिए भूटान से मित्रता ज्यादा अहमियत रखती है। मोटे तौर पर इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। और, यह समस्या का हल बातचीत से ही संभव है। दोनों देशों ने अपनी सेनाएं हटाने का निर्णय दव्पक्षीय बातचीत से ही किया हो ऐसा नहीं है। क्षेत्रीय सामरिक संतुलन, वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय दबाव ऐसे कारक है जिसने चीन को पीछे हटने को मजबूर कर दिया। चीन और भारत दोनों ही देश आज दुनिया के बढ़ते बाजार हैं। दोनों ही देश विश्व की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ जाए तो समूचे विश्व की आर्थिक गतिविधियों पर विपरीत असर पड़ना तय है। इसलिए कूटनीतिक तौर पर इस विवाद का शांतिपूर्ण हल निकालने के प्रयास किए गए। अभी दोनों देशों की सेनाओं का डोकलाम से हटने का दौर शुरू हो गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इसके बाद फिर से ऐसे हालात नहीं बनेंगे। यह सवाल बेमानी होगा कि इस विवाद में कौन जीता और कौन हारा? लेकिन इतना तय है कि युद्ध टालने के लिए यह कदम आवश्यक था।
  • भारती और चीन की सेनाएं लंबे समय से डोकलाम में एक -दूसरे के सामने डटी हुई थी। अब जब दोनों देश डोकलाम से सेनाएं हटाने पर सहमत हुए है तो इसे भारत के लिए कूटनीतिक जीत माना जाना चाहिए क्योंकि चीन ने पहले भारत के दोनों देशों की सेनाओं के पीछे हटने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।

डॉ. अतुल भारद्वाज, रक्षा विशेषज्ञ, इंस्टीटयूट (संस्थान) , ऑफ (का) चाइना स्टडीज (अध्ययन) , नई दिल्ली से संबद्ध, कूटनीतिक मामलों के जानकार

डोलाम विवाद का शांतिपूर्ण हल निकलना भारत की कूटनीतिक विजय माना जाएगा। खासकर उन हालात में जब चीन विवाद को युद्ध तक ले जाने पर आमादा था। अपने सरकारी चैनलों (माध्यमों) और अखबारों के माध्यम से भारत पर दबाव बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा था। चीन ने डोकलाम से अपने सैनिक और बुलडोजर हटा लिए हैं। लेकिन चीन से हमें सतर्क रहने की जरूरत है। सामने से लड़ने की बजाय पीठ में छुरा घोपना चीन की पुरानी आदत रही है। पचपन साल पहले ’हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ का नारा देकर चीन ने हमारे साथ धोखा किया था। इन 55 सालों में युद्ध भले न हुआ हो लेकिन संबंध भी मधुर नहीं रहे है। रह-रहकर चीन भारत के साथ घुसपैठ करता रहा और भारत संयमित भाषा में उसे जवाब देता रहा। इस बार भी भारत, चीन के उकसावे में नहीं आया। अमरीका और अनेक यूरोपीय देशों ने भारत के रुख की सराहना की। डोकलाम विवाद पर पाकिस्तान को छोड़कर चीन को किसी का साथ नहीं मिला। कूटनीतिक मोर्चे पर भारत को मिली यह कामयाबी हमारी दशकों पुरानी विदेश नीति की जीत मानी जा सकती है।

चीन का विवाद भारत के साथ ही नहीं है। दक्षिण चीन सागर विवाद में भी चीन अपने पड़ोसियों के साथ उलझा हुआ है। दक्षिणी चीन सागर के रास्ते हर साल होने वाले अरबों डालर के व्यापार पर चीन अपना अधिकार जमाना चाहता है। इसे लेकर चीन का तमाम देशों से टकराव चल रहा है। अमरीका और उसके सहयोगी देश इस मुद्दे पर चीन को घेरने में लगे हैं। चीन हमेशा से विस्तारवादी नीति का समर्थक रहा है। इसका कारण वहां लोकतंत्र ना होना भी माना जा सकता है। एक पार्टी के शासन से चीन में तानाशाही का माहौल है। पिछले कुछ सालों में भारत के साथ चीन का व्यापार बढ़ा है। इलेक्ट्रोनिक (विद्युत) सामान के लिए भारत उसका सबसे बड़ा बाजार है। चीन जानता है कि भारत के साथ युद्ध की दशा में उसे भारतीय बाजार खोना पड़ सकता है। डोकलाम में उसके पीछे हटने का ये भी एक कारण हो सकता है। चीन डोकलाम से पीछे जरूर हटा है लेकिन वह अपनी आदतों से बाज आने वाला नहीं है। भारत को डोकलाम ही नहीं लद्दाख और तिब्बत क्षेत्र में भी चौकन्ना रहना होगा।

कर्पूर चन्द्र कुलिश, संस्थापक राजस्थान पत्रिका

भारत और चीन के आधिकारिक मीडिया (संचार माध्यम) ने घोषणा की कि दोनों देश कूटनीतिक संपर्क में थे, जिसका नतीजा डोकलाम पठार से सैन्य टुकड़ियां हटाने की परस्पर सहमति के रूप में हुआ है। चुंबी घाटी के पूर्वी छोर से लगे भूटान के इस इलाके में चीन की पीपल्स (लोगों) लिबरेशन (मुक्ति) आर्मी (सेना) (पीएलए) ने सड़क बनाने का फैसला किया, क्योंकि वह इसे अपना इलाका बताता है। इससे चीन भारत की डोकलाम चौकी के नजदीक तक रसद पहुंचाने का इंतजाम कर लेता और अति-संवेदनशील सिलीगुड़ी गलियारे को खतरा पहुंचाने की स्थिति में आ जाता। यह हमारे लिए पूर्वोत्तर के राज्यों से संपर्क का महत्वपूर्ण मार्ग है। 72 दिनों का यह अजीब सैन्य टकराव था, इसमें शुरुआत धक्का-मुक्की (और भारत के स्वतंत्रता दिवस पर अलग-अलग जगहों पर पथराव, लाठियों के प्रयोग व मुक्केबाजी) के अलावा सैन्य टुकड़ियां आंखों में आंखे डालकर डटी रहीं।

मामले को पूरा समझने के लिए पृष्ठभूमि के कुछ मुद्दों को समझना होगा। यह टकराव वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के किसी अन्य जगह नहीं था। यह तीसरे देश का इलाका था और भारत ने 2007 में भूटान से समझौता किया था कि एक-दूसरे की सुरक्षा पर खतरा होने पर वे परस्पर मदद करेंगे। पिछले 15 वर्षो या इससे कुछ ज्यादा समय से पीएलए ने धीरे-धीरे घुसपैठ की गतिविधियां बढ़ाई हैं। लद्दाख व अरुणाचल प्रदेश में भी टकराव पैदा हुआ है। लेकिन, किसी में भी चीन के आधिकारिक मीडिया की मदद से इस तरह का विषैला व मनोवैज्ञानिक युद्ध नहीं छेड़ा गया था। दोनों देशों का पीछे हटना परिपक्वता दिखाता है बावजूद इसके कि चीन ने डोकलाम से न हटने की घोषणा कर रखी थी। अगले माह चीन के शियामेन में ब्रिक्स देशों के सम्मेलन के पहले यह सहमति हुई है, जहां चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग मेजबान होंगे और शिखर सम्मेलन में असुविधाजनक स्थिति से बचना भी गतिरोध खत्म होने का कारण है। निचने स्तर पर शायद टकराव चीनी साम्यवादी दल की 19वीं कांग्रेस तक चलता रहेगा, जिसमें शी की भावी शक्ति व दर्जा तय होगा।

पीएलए की चाल काम में नहीं आई और चाहे इसने दो दशकों पहले ’अडरइफॉर्मेशनाइज्ड’ वॉर (युद्ध) की अवधारणा अपनाई हो पर मनोवैज्ञानिक युद्ध का इसका भौंडा तरीका बेअसर रहा। इससे यदि कुछ हुआ है तो जोखिम लेने का भारत का इरादा ही मजबूत हुआ है। भारत के सैन्य स्तर पर कमजोर होने की अपनी अवधारण के कारण चीन को अपेक्षा थी कि भारत जल्दी ही पीछे हट जाएगा, इसलिए उसने भारत के डटे रहने की स्थित के लिए कोई दूसरी योजना नहीं बनाई थी। अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के आदेश को धता-बता कर दक्षिण चीन सागर में रणनीतिक सफलता से उत्साहित चीन ने सोचा था कि यह भारत को भी दबा लेगा। यह सैन्य स्थिति में भारत को शर्मिंदा करके उचित संदेश देना चाहता था। यह संदेश उन देशों के लिए भी होता, जो भारत के साथ रणनीतिक भागीदारी में हैं, खासतौर पर जापान। गतिरोध की अवधि बढ़ने के साथ फायदा भारत के पक्ष में हो गया, जिसमें पीछे हटने के परस्पर समझौते से भारत को मनोवैज्ञानिक फायदा हुआ। प्रतिदव्ंदव्ी यदि अपना रणनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए तो इसे बहुत पुराने समय से ही दूसरे पक्ष की जीत माना जाता रहा है। हालांकि, सावधानी बरतनी होगी कि भारत की जीत का ढोल न पीटा जाएं। ’टकराव में जीत’ सैन्य शब्दावली का सबसे विवादित जुमला है। घुटे हुए कूटनीतिक समूह अथवा सैन्य समूह के लिए भी जीत को संभालना आसान नहीं रहा है, क्योंकि इसके नकरात्मक परिणाम होते हैं, जिन्हे तत्काल पहचानना आसान नहीं होता। इस तरह स्थिति को राजनयिक या सैन्य क्षेत्र का उल्लेख किए बिना ’भारत के लिए फायदेमंद’ बताया जा सकता है। कई इस पर सवाल उठाएंगे और कड़े रुख के हामी विभिन्न कारणों से इसे जीत बताना चाहेंगे। उन्हें खबरदार करने की जरूरत होगी, क्योंकि भारत-चीन टकराव खत्म नहीं हुआ है। इस तरह की हरकतें लद्दाख, बाराहोटी और अरुणाचल प्रदेश में हो सकती हैं।

भारत के रणनीतिक विश्लेषकों को जीत बताने के खेल में नहीं पड़ना चाहिए। बेहतर होगा कि वे सरकार पर यह पक्का करने के लिए दबाव डालें कि सीमा पर बुनियादी ढांचे संबंधी लंबे समय से लंबित और बहुत धीमे बढ़ रहे मामलों को तेजी से आगे बढ़ाया जाए। हथियार और गोला-बारूद की खरीद का भी दबाव बनाना चाहिए, जिसके लिए पर्याप्त वित्तीय आवंटन हाल ही किया गया है। इन महत्वपूर्ण मामलों ’चलता है’ वाला रूख नहीं चलेगा। इससे भी महत्वपूर्ण इस भरोसे में नहीं पड़ना चाहिए कि चुपचाप की गई कूटनीति हमेशा सफल होती हैे। भावी स्थिति में सुविचारित कम्युनिकेशन (संचार) स्ट्रैटजी (कूटनीति) विकसित करने की सख्त जरूरत हो सकती है। यह कैसे किया जाएगा और कौन-सी संस्था या संस्थान में इसकी पेशेवर विशेषज्ञता है इस पर सवालिया निशान है। इस बार चीन ने साइबर वारफेयर (संग्राम/संघर्ष) जैसे साधनों का इस्तेमाल नहीं किया लेकिन कुछ मॉडल (आर्दश) का परीक्षण किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अगली बार यह महत्वपूर्ण क्षेत्र होगा और भारत को सैन्य साइबर और सूचना क्षमता में मिश्रण से इस मामलें में विशेषज्ञता बढ़ानी चाहिए।

डोकलाम गतिरोध के शुरुआत में चीन भारत को अनसुलझे विवाद व गतिरोध से जमीनी सीमा पर उलझाए रखेगी। भारत को समुद्री क्षमता को पुख्ता करने की जरूरत पर जोर देना अतिशयेक्ति नहीं होगी। यह चीन को चिंता में डाल देगा खासतौर पर अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम और दक्षिण कोरिया के साथ सागरीय भागीदारी स्थापित होने के बाद। क्योंकि जो भी हो चीन जमीन से घिर देश है और प्रशांत महासागर में इसकी पहुंच उसे वह फायदा नहीं देती जो यह चाहता है। उसकी निगाह हिंद महासागर पर है। हिंद महासागर में भारत को खास फायदा है और चीन को वहां से ऊर्जा सुरक्षा व्यापार की चिंता है। आखिर में हमें तो यही खुशी होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री ब्रिक्स सम्मेलन में सीमाओं की चिंता के लिए बगैर जा रहे हैं। क्योंकि किसी और दिन लड़ने के लिए बने रहना हमेशा ही अच्छा होता है। यह कितनी जल्दी होगा, यह तो समय ही बताएगा।

सैयद अता हसनैन, लेफ्टि. जन (सेवानिवृत्त), कश्मीर में सेना की 15वीं कोर के पूर्व कमांडर (सेनाध्यक्ष)

उपग्रह-डोकलाम विवाद का तनाव झेलने और फिलहाल उसके निपट जाने के बाद चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर निगरानी रखने के लिए उपग्रहों की मदद लेने का फैसला स्वागत योग्य है। यह इस काम का विस्तार बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, म्यांमार और श्रीलंका जैसे पड़ोसियों के साथ भी कर सकता है, क्योंकि वहां से भी उग्रवाद और तस्करी की समस्याएं देश में प्रवेश करती हैं। भारती की चीन से 3500 किलोमीटर और पाकिस्तान से 2900 किलोमीटर सीमा लगती है और यहीं सर्वाधिक तनाव पैदा होता रहता है। हालांकि पाकिस्तान और चीन से होने वाले तनाव में फर्क है, लेकिन उनमें नजदीकी बढ़ने के साथ इनकी प्रकृति एक जैसी होती जा रही है। उपग्रह प्रक्षेपण मे विशिष्टता विकसित कर चुके भारते के लिए यह काम आसान भी है और दूसरे देशों पर बढ़त देने वाला है। जब यह उपग्रह दिन-रात की तस्वीरें भेजेंगे और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बनाए जा रहे केन्द्र से उनकी निगरानी होगी तो कार्रवाई के लिए पर्याप्त समय लिए जाएगा। तब शायद केन्द्र सरकार और भारतीय सेना को भूटान से सूचना मिलने या चमोली के डीएस से संदेश मिलने का इंतजार नहीं रहेगा। पिछले हफ्ते प्रक्षेपित किए गए कार्टोस्टेट उपग्रह को मिलाकर सैनिक कामों में लगे भारातीय उपग्रहों की संख्या अब 13 हो गई है। यह रिमोट (दूरवर्ती) सेंसिंग (सुदूर संवेदन) उपग्रह धरती के करीब कक्षा में स्थापित किए जाते है और इनकी ऊंचाई 200 से 1200 किलोमीटर तक होती है। इस उपग्रह की विशेषता यह है कि इससे 0.6 मीटर की लंबाई और चौड़ाई वाले इलाके के भीतर होने वाली किसी भी गतिविधि का चित्र लिया जा सकता है। सीमा से मिली तस्वीरों का इस्तेमाल सुरक्षा के साथ ही साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राजनयिक दबाव के लिए भी किया जा सकेगा। अगर कोई देश सैनिक घुसपैठ कर रहा है या कहीं से आतंकी आ रहे हैं तो भारत इस बात को प्रमाण के साथ रख भी सकता है। यह दौर सेनाआके के सीधे युद्ध से हट कर प्रौद्योगिकी युद्ध का है और संभव है कि इस तरह की निगरानी की होड़ इस एशियाई भूभाग में तेज हो। इसलिए इस फैसले का स्वागत करने के साथ यह भी कहना आवश्यक है कि सीमा विवाद सिर्फ उपग्रह की निगरानी से हल नहीं होंगे। उनके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी और जब वह इच्छाशक्ति पैदा होगी तो यह उपग्रह विवाद के बजाय साझी मानवता के लिए काम करेंगे।

लोकपाल: - समाज सेवी अन्ना हजारे छह साल बाद एक बार फिर सरकार से टकराने के मूड (मनोदशा) में हैं। अपने उसी पुराने लोकपाल के मुद्दे पर, जिसे लेकर 2011 में वह तत्कालीन मनोहर सिंह सरकार से टकराए थे। टकराव भी ऐसा था कि सरकार हिल गई थी। दिल्ली से लेकर तमाम राज्यों में लाखों लोग अन्ना के समर्थन में सड़कों पर उतर आए थे। ये अन्ना के आंदोलन का दबाव ही था कि मनमोहन सरकार को संसद में लोकपाल और लोकायुक्त कानून पारित करना पड़ा। तब विपक्ष की भूमिका निभा रही भारतीय जनता पार्टी ने इस अन्ना के आंदोलन के साथ-साथ इस कानून का पुरजोर समर्थन किया था। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के आंदोलन से उपजी लहर पर सवार होकर भाजपा मई 2014 में बहुमत के साथ केन्द्र की सत्ता पर काबिज हुई। जनता को लगा था कि सरकार देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ेगी। अन्ना हजारे ने पिछले सवा तीन साल में केन्द्र सरकार को लोकपाल की नियुक्ति को लेकर अनेक बार स्मरण भी दिलाया। लेकिन बात पत्रों से आगे बढ़ ही नहीं पाई। देश की सर्वोच्च अदालत भी सरकार से इस बारे में जवाब-तलब कर चुकी है। अन्ना की दलील तर्कसंगत है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चुनाव जीतकर आई भाजपा लोकपाल की नियुक्ति कर क्यों नहीं रही? सरकार का तर्क है कि लोकपाल की नियुक्ति करने वाली कमेटी (आयोग) में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ही सदस्य होता है। फिलहाल लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद रिक्त पड़ा है। सो इसकी नियुक्ति नहीं हो पा रही। ये कैसा तर्क है? सरकार चाहे तो नेता प्रतिपक्ष के पद की जगह लोकसभा में विपक्ष के सबसे बड़े दल के नेता को कमेटी (आयोग) में शामिल कर सकती है। इस मुद्दे पर शायद ही कोई विरोध में खड़ा हो। राज्यों में भी लोकायुक्तों की नियुक्ति का मामला अधर में पड़ा है। यहां बात कानून की नहीं इच्छाशक्ति की है। राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के खेल का पर्दाफाश आए दिन होता है। देश में भ्रष्टाचार के बढ़ने का मूल कारण महंगी होती जा रही चुनाव प्रणाली है। लोकपाल की नियुक्ति राजनेताओं और राजनीतिक दलों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकती है। देश की जनता उम्मीद करती है कि अन्ना के आंदोलन से पहले ही केन्द्र सरकार लोकपाल की नियुक्ति की दिशा में आगे बढ़े ताकि भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने में मदद मिल सके।

कर्पूर चन्द्र कुलिश, संस्थापक राजस्थान पत्रिका

भारत और स्विट्‌जरलैंड: -भारत और स्विट्‌जरलैंड ने काला धन, हवाला कारोबार, हथियारों और ड्रग्स की तस्करी पर रोक लगाने के लिए मिलकर काम करने का इरादा जताया है। दोनों देशों ने तय किया है कि आपसी व्यापार और निवेश बढ़ाने के लिए नई निवेश संधि पर बातचीत आगे बढ़ाई जाए।

मोदी और भारत आई स्विट्‌जरलैंड की राष्ट्रपति डोरिस लेथार्ड के बीच यहां हैदराबाद हाउस में दव्पक्षीय शिखर बैठक में यह फैसले हुए। मोदी जी ने बैठक के बाद कहा कि दुनिया के सामने वित्तीय लेनदेन में पारदर्शिता चिंता का विषय है। चाहे वह कालाधन हो, गलत ढंग से कमाया धन हो, हवाला हो या हथियारों और ड्रग्स की तस्करी से संबंधित धन हो। इस वैश्विक अभिशाप से निपटने के लिए स्विट्‌जरलैंड के साथ हमारा सहयोग जारी है।

दोनों देशों ने इस मौके पर रेलवे के क्षेत्र में सहयोग के दो करार भी किए। दोनों नेताओं ने जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में सहयोग करने और व्यावसायिक शिक्षा एंव कौशल विकास के लिए संयुक्त पहल रिकलसोनिक्स को विस्तार देने का भी निर्णय लिया।

- Published/Last Modified on: September 18, 2017

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