सर्वोच्च न्यायालय का मौलिक अधिकार पर ऐतिहासिक फैसला (Historical Decision-in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना: - जीवन का अधिकार हमारा मौलिक हक है। सर्वोच्च न्यायालय ने प्राइवेसी यानी, निजता को इसके बराबर माना है। न्यायालय की 9 जजों की संविधान पीठ ने 63 साल पुराने फैसले को पलटते हुए कहा कि निजता अब हर नागरिक का मौलिक हक है। संविधान पीठ ने पहले 1954 में, फिर 1962 में प्राइवेसी (निजता) को मौलिक हक मानने से मना कर दिया था। न्यायालय ने ये भी साफ किया कि कोई भी मौलिक हक संपूर्ण नहीं है। इस पर रीजनेबल (उचित) रिस्ट्रिक्शंस (प्रतिबंध) (तर्कपूर्ण रोक) लागू रहती है। निजता वाले मामले में भी रहेगी। दरअसल सरकारी योजनाओं को आधार से जोड़ने के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सवाल उठा था कि निजता मौलिक हक है भी या नहीं। अब 5 जजों की बेंच आधार में निजता के उल्लंघन की सुनवाई करेगी। इसकी तारीख तय नहीं हुई है। बेंच के इस मसले पर 6 दिन मैराथन (लंबी दौड़) सुनवाई के बाद दो अगस्त को फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में 21 याचिकाएं लगी थी।

ऐतिहासिक फैसला: -9 जजों ने एकमत से दिया फैसला-चीफ (मुख्य) जस्टिस (न्याय) जेएस खेहर, जस्टिस मनोहर सप्रे, जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस नरीमन, जस्टिस आर के अग्रवाल, जस्टिस एस अब्दुल नजीर, जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़। 1954 के 6 और 1962 के 8 जजों की बेंच का फैसला बदला।

रविशंकर प्रसाद, केन्द्रीय कानून मंत्री

मौलिक अधिकार: - प्राइवेसी को मौलिक अधिकार करार देते हुए सर्वोच्च न्यायालय की संविधान बेंच ने सरकार को जवाब भी दिए। बेंच ने कहा, ’न्यायालय ऐसा कोई संवैधानिक काम नहीं कर रहा, जो संसद को करना चाहिए।’ सरकार की दलील थी कि प्राइवेसी (निजता) को कानूनी मान्यता देना संविधान में बदलाव होगा, जो संसद का काम है। बेंच ने कहा, लोग नहीं चाहते कि उनके स्वास्थ्य, धन और निजी जानकारियों का इस्तेमाल कर कोई नुकसान पहुंचाए। जानकारी तभी देते हें, जब उन्हें लाभ दिखे। खुफिया विभाग भी राष्ट्र रक्षा की शर्त पर जानकारियां ले सकता है।

दलील: - राज्य की कल्याण योजनाओं के हित में प्राइवेसी के अधिकार को छोड़ देना चाहिए। गरीब समाजिक-राजनीतिक अधिकार नहीं, सिर्फ आर्थिक तरक्की ही चाहते हैं। इतिहास में लंबे अरसे से मानवाधिकारों के सबसे खराब उल्लंघन के समर्थन में यही दलील दी जाती रही है।

संविधान: - संविधान जीवन में दखल की सीमा तय करता है। संविधान बेंच ने कहा- निजता जिंदगी का हर पहलू अपने तरीके से तय करने की आजादी देती है। जीवन और निजी स्वतंत्रता का अधिकार अलग नहीं है। जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार संविधान ने नहीं दिए हैं। संविधान तो सिर्फ इन दोनों ही अधिकारों में राज्य के दखल की सीमा तय करता है। प्राइवेसी (निजता) को सरकार के साथ-साथ गैर-सरकारी तत्वों से भी खतरा है।

रक्षा कवच: -सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय पीठ ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार मानकर नागरिकों को रक्षा कवच प्रदान कर दिया है। अदालत ने इस निर्णय में जहां केन्द्र सरकार को झटका दिया है वहीं अपनी उस पुरानी गलती की भरपाई कर ली है, जो उसने आपातकाल में नागरिक अधिकारों को मुअत्तल करके की थी। यह एक ऐतिहासिक फैसला है जो आतंकवाद से युद्ध के बहाने बढ़ते राज्य के हस्तक्षेप और प्रौद्योगिकी के बहाने बढ़ती साइबर घुसपैठ के विरुद्ध लोकतांत्रिक देश के सदस्य को छतरी प्रदान करता है, जिसे अभी खोलना बाकी है। हालांकि इस फैसले में आधार कार्ड को हर प्रकार की आर्थिक गतिविधि से जोड़ने को अनिवार्य किए जाने के विरुद्ध साफतौर पर कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन निजता को मौलिक अधिकार मानकर अदालत ने उस दिशा में संकेत दे दिया है। आधार कार्ड के मसले पर दायर याचिका की सुनवाई अब छोटी पीठ करेगी पर 1962 के खड़क सिंह और 1954 के एमपी शर्मा के मामले में क्रमश: छह और आठ जजों की पीठ के अपने ही फैसले को अदालत ने जिस तरह से पलटा है, उससे लगता है कि पांच और छह दशक पुरानी वह स्थितियां बदल चुकी हैं। आज नागरिकों को अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार दिए जाने की सख्त जरूरत है। आज भारतीय लोकतंत्र जॉर्ज आरवेल के ’एनिमल फार्म’ और ’1984’ जैसे दो उपन्यासों में वर्णित खतरे से जूझ रहा है। वैसे दोनों उपन्यास कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) व्यवस्था के अधिनायकवाद पर लिखे गए थे, कि कौनसी लोकतांत्रिक व्यवस्था भी बुनियादी मूल्यों में बदलाव करके उसी रास्ते पर जा रही है। अगर ’एनिमल फार्म’ यह बताता है कि किस तरह क्रांति या आजादी के दस संदेश आखिर में बदल जाते है तो ’1984’ बताता है कि किस प्रकार बिग ब्रदर (बड़ा भाई) हर नागरिक की निगरानी करता है। इस फैसले के बाद कुछ लोग कह रहे हैं कि अब भ्रष्ट नेताओं के कालेधन पर कार्रवाई हो सकेगी। लेकिन हर मौलिक अधिकार के साथ युक्तिसंगत निबंध हैं। और वह अगर आधार कार्ड के बहाने निजता के अधिकार के साथ भी होता तो कोई हर्ज नहीं। बस यूरोप की तरह होना यह चाहिए कि नागरिकों के क्रियाकिलापों के आंकड़ों को गोपनीय रखा जाए और उन्हें तभी खोला जाए जब राज्य उससे अनुमति ले ले। उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय की छोटी पीठ इस बड़ी पीठ के फैसले की रोशनी में वैसा ही फैला देगी।

कानून: - आज सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसले में प्राइवेसी यानी निजता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन के अधिकार का हिस्सा मानते हुए उसे मूलभूत अधिकार घोषित किया है। यह फैसला कई मायने में महत्वपूर्ण है। अब तक निजता के अधिकार को लेकर उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों में अलग-अलग राय व्यक्त हुई थी। कई फैसलों में निजता के अधिकार को महत्वपूर्ण अधिकार तो माना गया है, लेकिन इसे स्पष्ट रूप से संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार नहीं कहा गया है। अब इसे अनुच्छेद 21 में जीवन का अधिकार माने जाने से निजता के अधिकार का दर्जा मूलभूत अधिकार का हो गया है।

इसके साथ यह तय हो गया है कि जब तक कोई ऐसा न्यायसंगत कानून और प्रक्रिया न हो, जो किसी की निजता में ताक-झांक की इजाजत देती हो तब तक इस अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। मसलन, बिना यह बताए कि भारत की संसद या विधानसभा ने कौन-सा ऐसा कानून पारित किया है, जिसके तहत कोई सरकारी संस्था या पुलिस आदि किसी की निजता में हस्तक्षेप कर सकती, ऐसा कोई दखल संभव नहीं है। कोई निजी संस्थान जैसे बैंक (अधिकोष), मोबाइल (गतिशील) कंपनी (जनसमूह), अस्पताल (चिकित्सालय) आदि को यह इजाजत बिल्कुल नहीं होगी कि वह किसी दूसरी संस्था या व्यक्ति के साथ ऐसी जानकारी साझा कर सके। हालांकि अभी ऐसे कानून नहीं हैं कि निजता के उल्लघंन के मामलों के लिए किसी को जेल जाना पड़े या सजा हो। किन्तु निजता को मौलिक अधिकार माने जाने के बाद कानूनी तौर पर इसके उल्लंघन पर रोक लगाने की मांग की जा सकती है और मुआवजे का दावा भी किया जा सकता है।

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया है कि निजता के अधिकार का जिक्र संविधान में मूलभूत अधिकार के बतौर न होने की वजह से इसे मूलभूत अधिकार नहीं माना जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने तो यहां तक कह दिया कि यह अधिकार सभी मनुष्यों को इसलिए है, क्योंकि वह मनुष्य है और मनुष्य के तौर पर यह उनका नैसर्गिक अधिकार है। किसी भी मनुष्य को उसके नैसर्गिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है। यह नैसर्गिक अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है।

मौजूदा फैसले की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि आधार कार्ड की अनिवार्यता की निजता का उल्लंघन बताने वाले कई मसले अदालत के सामने आए। सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों में भिन्न राय होने के कारण मसले को सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) की नौ जजों की पीठ को भेजना पड़ा। अब नौ जजों की पीठ के फैसले के बाद यह मसला वापस सर्वोच्च न्यायालय की उस पीठ के पास जाएगा जिसे यह तय करना है कि आधार कार्ड के जरिये लोगों की निजी सूचना सरकार के द्वारा इकटठा करना जायज है अथवा नहीं। और यदि जायज भी है तो किस हद तक पुलिस, सेना, बैंक, कर विभाग आदि जैसी सरकारी एजेंसियां (संस्था) इस बायोमेट्रिक (शारीरिक चिन्हों जैसे ऊँगली के निशानों अथवा आँखो की पुतलियों द्वारा व्यक्ति विशेष की पहचान की पदव्ति) निजी जानकारी को हासिल करने अथवा इस्तेमाल करने का हक होगा।

आमतौर पर ये सरकारी एजेंसियां (संस्था) अपराध की रोकथाम या राष्ट्रीय सुरक्षा का अस्पष्ट-सा कारण देकर नागरिकों की निजता के उल्लंघन को जायज बताती रही हैं। राज्यों की पुलिस और केन्द्र में सीबीई और आयकर विभाग को लेकर लगातार यह धारणा और शंका बनी हुई है कि ये संस्थाएं सत्तारूढ़ दल के इशारे पर राजनीतिक विरोधियों को दबाने या मटियामेट करने के लिए भी काफी तत्परता से काम करती हैं। ऐसे में यदि कोई कानून ऐसा बना दिया जाए कि किसी भी तरह की अनैतिक (भले ही वह गैर-कानूनी न हो) या किसी कानून के विरुद्ध कार्रवाई की शंका मात्र पर आधार, क्रेडिट (उधार) कार्ड (पत्रक), मोबाइल (गतिशील) आदि जो सभी आधार से जुड़े होंगे। इन सबकी लगातार जासूसी की इजाजत दे दी जाए तो सरकार से अलग थोड़ी भी राय रखना या सत्तारूढ़ दलों की नीति की आलोचना करना भी मुसीबत का सबब बन जाएगा और लगातार कठिन होता चला जाएगा। ऐसे में जहां यह माना जाता है कि मजबूत विपक्ष या मतभेदों को व्यक्त करने की आजादी लोकतंत्र के स्वस्थ रहने की गारंटी (वचन) है और लोकतंत्र के स्वस्थ रहने को इंगित करता है, वहां मतभिन्नता या विरोध का लगातार निजता के उल्लंघनों के चलते कमजोर पड़ते जाना लोकतांत्रिक और व्यवस्था को नष्ट होने की कगार पर पहुंचा देता है। यह देश को निरंकुश तानाशाही की ओर ले जा सकता है।

यूं देखें तो मनुष्य की निजता का अधिकार किसी व्यक्ति का निजी अधिकार या निजी हानि-लाभ का मामला नहीं है। निजता का अधिकार समाज में विभिन्न मतों, नए विचारों, अभिव्यक्ति की आजादी, स्वस्थ आलोचना, लोकतांत्रिक विमर्श और सामाजिक, राजनीतिक व नैतिक प्रगति की न केवल आवश्यक शर्त है बल्कि जरूरी बुनियाद है।

लेकिन एक बात ध्यान रखना है कि यह फैसला आधार के मसले पर सरकार को कोई तमाचा नहीं है। पीठ के फैसले में कहा है कि, ’सूचनागत निजता, निजता के अधिकार का एक पहलू है।’ यह स्वीकारते हुए सरकार से आग्रह किया गया है कि वह डेटा (आंकड़ा) प्रोटेक्शन (सुरक्षा) की मजबूत व्यवस्था स्थापित करें। उसे व्यक्तियों के हितों और राज्य की जायज चिंताओं के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। ये जायज चिंताए भी फैसले में स्पष्ट हैं- राष्ट्रीय सुरक्षा को संरक्षण, अपराध रोकना व उसकी जांच करना, इनोवेशन (नवोन्मेष) व ज्ञान के प्रसार को प्रोत्साहन देने और सबसे बड़ी बात सामाजिक कल्याण के फायदों को बर्बाद होने से बचाना यानी लाभान्वितों तक पहुंचाना। जजों ने कहा है, ’ये नीतिगत मामलें हैं, जिस पर केन्द्र सरकार को विचार करना है।’

रवीन्द्र गरिया, सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता

बहस: - सीजेआइस जेएस खेहर, जस्टिस डिवाई चन्द्रचूड जस्टिस आरके अग्रवाल और जस्टिस एस अब्दुल नजीर ने कहा, निजता कोई अभिजाज्य विचार नहीं, जो सिर्फ अमीरों के लिए हो। यह सभी वर्गो के लिए है। सरकार को डेटा (आंकड़ा) प्रोटेक्शन (सुरक्षा) पर ऐसा कानून लाना चाहिए, जो आम लोगों व सरकार के हितों के बीच सामंजस्य बैठा सके। सभी जजों के निर्णयों के आधार पर सीजीआई ने कहा, राइट टू प्राइवेसी यानी निजता मौलिक अधिकार है। निजता के अधिकार पर बहस तब तेज हुई जब सरकार ने आधार कार्ड को सरकारी सुविधाओं के लिए जरूरी बनाना शुरू किया।

  1. ऐसा होगा मूल अधिकार-अनुच्छेद 21 में निजता जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा करेगा। संविधान के मूल में मानवीय गरिमा है। जीवन और स्वतत्रंता का अधिकार निजता में ही है।
  2. निजता यह है-आतंरिक संबंध, पारिवारिक मर्यादा, शादी, घर, जीने का तरीका, व्यक्ति की चाहत, जीवनशैली आदि उसकी निजता है। निजता विविधता वाली संस्कृति को संरक्षित करती है।
  3. आपकी मर्जी चलेगी- अगर रेलवे, एयरलाइन (हवाईमार्ग) जैसे रिजर्वेशन (आरक्षित) के लिए निजी जानकारी मांगी जाती है, तो ऐसी स्थिति में आप इनकार कर सकते हैं। निजी जीवन में दखल पर कोर्ट (न्यायालय) जा सकते है।
  4. सार्वजनिक जगह भी- किसी की निजता सार्वजनिक जगह पर खत्म नहीं होती। निजता अंतरिम क्षेत्र से निजी क्षेत्र में और निजी क्षेत्र से सार्वजनिक क्षेत्र तक भिन्न हो सकती है।
  5. क्या सरकार निजी जानकारियां ले सकती है? -डीएन, ब्लड (रक्त), फिंगर (उंगली) प्रिंट (छाप) आदि अपने पास रख सकती है। बशर्ते सरकार विश्वास दिलाए कि डाटा (आंकड़ा) सार्वजनिक नहीं होगा।
  6. अब आधार का क्या- आधार 92 योजनाओं में जरूरी बनाने पर भी सवाल है। इस पर सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) की 5 जजों की बेंच फैसला करेगी।
  7. मोबाइल (गतिशील) लिंक (जोड़ना) जरूरी? -मोबाइल नंबर से आधार लिंक करवाने का मामला 5 जजों की बेंच के फैसले पर तय होगा।

कर्नाटक: -उच्चतम न्यायालय ने ’राइट टू प्रिवेसी’ यानी निजता के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। निजता का अधिकार कुछ तर्कपूर्ण रोक के साथ ही मौलिक अध्कािर है। गौरतलब है कि सरकार द्वारा आधार कार्ड अनिवार्य किए जाने के खिलाफ कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश के एस. पुत्तास्वामी ने सबसे पहली याचिका वर्ष 2012 में दायर की थी। याचिका दायर करते समय उनका कहना था कि आधार परियोजना से नागरिकों के निजता और समानता के मौलिक अधिकार का हनन होता है। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने आधार से जुड़े बीस से ज्यादा मामलों को इस मामले के साथ समावेश कर सुनवाई की। सर्वोच्च न्यायालय में मामला विचारधीन होने के बावजूद आधार परियोजना अपनी गति से आगे बढ़ती रही। वर्ष 2015 में आधार परियोजना में हो रहे विलंब को देखते हुए केन्द्र सरकार ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि संविधान के अनुसार भारत के लोगों को निजता का कोई मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है। साथ ही यह भी कहा कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए नौ जजों की बेंच गठित करने की आवश्यकता होगी। दो साल से अदालत में मामला लंबित होने के बावजूद सरकार ने आधार परियोजना को आगे बढ़ाते हुए अदालत के आदेशों का निंदापूर्वक उल्लंघन किया है। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि आधार को कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने के सरकार के तुगलकी आदेश से लाखों लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा है।

देश में अकेले राजस्थान प्रदेश की बात करे तो यहां राशन प्राप्त करने के गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) के 34 प्रतिशत लोग सिर्फ इसलिए राशन नहीं प्राप्त कर सके कि राशन की दुकानों पर लगाई प्वांइट (बिन्दु) ऑफ (का) सर्विस (सेवा) (पीओएस) मशीनों (यंत्रों) से उनका आधार नहीं जुड़ सका। वहीं दूसरी ओर आधार के अभाव में पेंशन (पूर्वसेवार्थ वृत्ति) के पात्र तीन लाख लोगों को मृत घोषित कर दिया गया। जब इन आंकड़ों को सत्यापित किया गया तो पाया कि 3729 मामलों में से 1315 गलत तरीके से मृत घोषित किए गए थे। और इनकी पेंशन बाद में दोबारा शुरू की गई। उम्मीद की जानी चाहिए कि आज जब इस पर फैसला हो चुका है तो ऐसे मामले अपने परिणाम तक पहुंचेगे। सरकार को जनता के समक्ष निजता के मौलिक अधिकार के उल्लंघन पर जवाब देना ही होगा। आधार परियोजना को भी निजता के अधिकार के उल्लंघन पर परखा जाएगा। इसे एक ऐतिहासिक फैसला माना जाना चाहिए। सिर्फ इसलिए नहीं की इसे नौ विरष्ठ न्यायाधीशों की खंडपीठ ने सुनाया है बल्कि इसलिए कि यह केन्द्र सरकार के उस दावे के खिलाफ है जिसमें उसने निजता को मौलिक अधिकार मानने से साफ इनकार कर दिया था। सरकार का यह दावा इस प्ररिप्रेक्ष्य में भी याद रखा जाना चाहिए कि सरकार नागरिको के किसी मौलिक अधिकार पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती। यह भी देखना होगा कि न्यायालय का यह फैसला केन्द्र सरकार के लिए बड़ा झटका है। इस फैसले का सीधा असर आधार कार्ड और दूसरी सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर होगा। सरकार को लोगों की निजता से जुड़ी जानकारी पर कोई भी कानून बनाते समय न्यायालय द्वारा दिए गए तर्कपूर्ण रोक के मुद्दे को ध्यान में रखना होगा। केन्द्र को सरकार नीतियों पर अब नए सिरे से समीक्षा करनी होगी। आशा की जानी चाहिए कि सरकार अब महसूस करेगी और स्वीकारेगी कि आधार को नागरिकों पर किसी भी सूरत में जबरन नहीं थोपा जाए। हमारा मानना है कि सरकार को आधार कार्ड को अनिवार्य न कर स्वैच्छिक कर देना चाहिए और इसके इस्तेमाल के इच्छुक लोग ही इसका उपयोग करें। इस अहम फैसले के कई हिस्सों को भविष्य में निजता से जुड़े अनेक मामलों में व्याख्या की जाएगी। इस ऐतिहासिक फैसले से साफ हो गया है कि आधार की अनिवार्यता मौलिक अधिकार पर खरा नहीं उतरी। किसी भी व्यक्ति की निजी जानकारी के व्यावसायिक उपयोग और उसकी निगरानी के अनेक निहितार्थ होते हैं। सरकार किसी व्यक्ति के निजी जानकारों के स्वामित्व को लेकर अपना दावा जाहिर नहीं कर सकती और न ही उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन कर सकती।

अरुणा राय सामाजिक कार्यकर्ता, मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित, सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) में निजता मामलें में सह-याचिकाकर्ता

सरकार: -देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में निजता को जीवन के अधिकार जैसा मौलिक अधिकार माना। हालांकि अदालत ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि ये निजता को अधिकार संपूर्ण नहीं हो सकता। मायनें साफ हैं। कोर्ट ने सरकार को निजता पर तर्कपूर्ण रोक लगाने का अधिकार दिया है। यानी सरकार के हर कानून पर नजर रखी जाएगी कि ये तर्कपूर्ण रोक के दायरे में आता है या नहीं। सामाजिक योजनाओं में आधार नंबर की अनिवार्यता के सरकारी फैसले के खिलाफ निजता का मामला अदालती चौखट तक पहुंचा था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि बिना सहमति के किसी भी व्सक्ति की निजी जानकारी लेने का अधिकार सरकार को नहीं है। लंबी सुनवाई हुई। अदालत ने निजता को मौलिक अधिकार में शामिल तो किया लेकिन इसकी व्यापक व्याख्या होनी अभी बाकी है। आधार की अनिवार्यता को लेकर सरकार ने निजता के तर्क को खारिज कर दिया था। अब आधार ही नहीं किसी भी अन्य मामलें में सरकार को यह साबित करना होगा कि वह जो जानकारी जुटा रही है उससे नागरिकों की निजता का उल्लंघन तो नहीं होगा। हालांकि आधार की अनिवार्यता के मामले पर पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ अलग से फैसला करेगी। पिछले दिनो में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दो ऐतिहासिक फैसले ने देश को अनिश्चता से उबारने में मदद की है। पहले तीन तलाक फिर निजता के मामले पर फैसले ले देश के बड़े वर्ग को राहत पहुंचाई है। अदालत ने तो दोनों मामलों पर अपना निर्णय देश के सामने रख दिया। अब सरकार कानून बनाकर दोनों मामलों में आने वाली परेशानियों को दूर करेगी।

अदालत ने अपने फैसले में निजता का मौलिक अधिकार तो मान लिया लेकिन निजता की परिभाषा क्या है? इसे सही तरह से जनता के बीच लाना होगा। ताकि भविष्य में फिर किसी भी दुविधा को लेकर अदालतों में मुकदमों की बाढ़ ना आ जाए। फैसला जनता के लिए है तो उसका लाभ जनता को मिलता नजर भी आना चाहिए।

सुरक्षा: - निजता के अधिकार पर कोर्ट ने कहा, सरकार कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार का डाटा जमा कर रही है, यह भी होना चाहिए कि डाटा (आंकड़ा) सुरक्षित रहे। क्या कोर्ट (न्यायालय) प्राइवेसी (निजता) की व्याख्या कर सकता है? कैटलॉग (सूची) नहीं बना सकते कि किन तत्वों से प्राइवेसी (निजता) बनती है। प्राइवेसी हर मुद्दे में शामिल हैं। प्राइवेसी सूचीबद्ध करने के प्रयासों के विनाशकारी परिणाम होंगे।

सुनवाई के दौरान जजों ने कहा कि अगर कोई पत्नी के साथ बेडरूम में है तो यह प्राइवेसी है। पुलिस बेडरूम में नही घुस सकती। हालांकि अगर हम बच्चों को स्कूल भेजते है तो ये प्राइवेसी के तहत नहीं आता है, क्योंकि यह आटीई का मामला है। बात अधिकार की नहीं, डाटा (आंकड़ा) प्रोटेक्शन (सुरक्षा) बड़ा मुद्दा है।

  1. क्या ये कानून सिर्फ वर्चुअल वर्ल्ड के लिए है? - यह वास्तविक दुनिया में भी आपकी निजता की सुरक्षा करता है। आप अपने घर में कुछ कर रहे हो तो कोई सरकारी या निजी एजेंसी (संस्था) आपकी निजता में दखल नहीं दे सकती। मकान मालिक यह कह कर नहीं घुस सकता कि मुझे कुछ आशंका है।
  2. क्या अपराधियों की जांच में बाधा आएगी? -निजता मौलिक अधिकार जरूर है, लेकिन हर मौलिक अधिकारों के साथ इसका भी अपवाद है और ऐसे मामलों में जरूरी होने पर सरकार इसमें दखल दे सकती हैं। सरकार राष्ट्र हित में या सुरक्षा के लिहाज से सूचना की मांग भी कर सकती है।
  3. क्या यह सरकारी एजेंसियों (संस्थाओं) पर भी लागू होगा? - यह सभी पर बराबर रूप से लागू होगा। चाहे वह विशिष्ट पहचान प्राधिकरण हो, पासपोर्ट (आज्ञापत्र) ऑर्थोरिटी (अधिकार) हो या फिर ई-कॉमर्स (वाणिज्य) की वेबसाईट।

संपूर्ण निजता संभव नहीं। आधार खतरा नहीं है। शरीर पर पूरा अधिकार एक भ्रम है। आधार से नागरिक की आजादी को कोई खतरा नहीं है। यह दावा तब किया जा रहा है, जब पर्सनल (निजी) डोटा (आंकड़ा) अक्सर लीक (उजागर) होता रहा है। इंटरनेट की जमाने में सरकार डेटा सुरक्षा के लिए कड़े उपायों पर सोचे।

4. अटॉर्नी जनरल

सोशल (सामाजिक) मीडिया (संचार माध्यम) : - ने ये निकाला मतलब-1895 में पहली बार आजादी से पहले भी राइट टू प्राइवेसी की वकालत होती रही है। सन्‌ 1895 में भारतीय संविधान बिल में कहा गया था कि घर व्यक्ति की शरणस्थली है। सरकार बिना कानूनी अनुमति के उसे भेद नहीं सकती।

राइट टू प्राइवेसी भी अपने आप में संपूर्ण नहीं है। सरकार को डाटा प्रोटेक्शन के लिए कानून लाने का अधिकार है। सरकार को वाजिब प्रतिबंध लगाने से रोका भी नहीं जा सकता है। क्या केन्द्र के पास आधार के डेटा को प्रोटेक्ट करने के लिए कोई मजबूत मैकेनिज्म (तंत्र) हैं?

कानून की तैयारी: - एएसजी तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया है डेटा प्रोटेक्शन को लेकर सरकार कानून ला रही है और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जज की अध्यक्षता में कमेटी (आयोग) बनाई गई है। सरकार पर नागरिकों की जानकारी को सुरक्षित रखने का दबाव बढ़ा।

उठा सवाल: - सरकारी वेबसाइट्‌स से आधार के डेटा लीक (आंकड़ा उजागर) होते रहे और इसके खिलाफ न तो केस (प्रकरण) हुआ न ही कोई समझ पाया कि करना क्या है।

यह दबाव: - अब आधार या किसी भी तरह का यूजर (उपयोगकर्ता) डेटा (आंकड़ा) लीक (उजागर) हुआ तो सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।

दुुनिया में कहां-कहां: -

  • अमरीका-किसी की निजी जानकारियों को बिना उसकी अनुमति के देश की कोई केंद्रीय एजेंसी (संस्था) हासिल नहीं कर सकती।
  • जापान-2003 में निजी सूचना की सुरक्षा का कानून बना, जिसमें लोगों की जानकारी को सुरक्षित रखना अनिवार्य हैं।
  • स्वीडन-किसी की सूचना जानकारी के बिना इस्तेमाल की जाये और उस पर नजर रखी जाये, तो इसके खिलाफ सुरक्षा मिलेगी।

आत्मविश्वास: - आमजन के मन में भय पैदा हो गया था कि सभी सूचनाएं सरकार के हाथ में चली जाएंगी। कमाई, बैंक (अधिकोष) खाते, मोबाइल (गतिशील) हर गतिविधि पर सरकार की नजर होने से डर पैदा हो गया था। उसे परिप्रेक्ष्य में सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) के निर्णय से आमजन में आत्मविश्वास जागा है कि नौ न्यायाधीश की बैंच ने विस्तृत अनुसंधान कर निर्णय दिया है। निजता का अधिकार जीने का मौलिक अधिकार में शामिल है। इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि निजता का अधािकर संविधान में किसी जगह शामिल नहीं है। कोर्ट ने यह भी नहीं कहा कि निजता को कहीं भी स्वीकार नहीं किया। संविधान पीठ के इस फैसले से यह भावना आएगी कि सरकार को भी सूचना लेनी है तो व्यक्तिगत सुरक्षा का प्रावधान होगा तभी संविधान सम्मत माना जाएगा। रेल टिकट या अन्य कार्य अथवा योजनाओं के लिए आधार जरूरी करने के बारे में सुप्रीम कोर्ट करने के बारे में सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बैंच निर्णय करेगी। मानवाधिकारों की व्याख्या कर कहा, मानवाधिकार कानून व संविधान से भी पहले है। मानव अधिकार कानून से पैदा नहीं हुए, बल्कि कानून मान्यता देता है और संविधान रक्षा की गारंटी (वचन) देता है। सरकार के पास सूचना सुरक्षित रहेगी, आश्वस्त करना होगा। निजी कंपनियां (जनसमूह) डेटा (आंकड़ा) मांग रही है उनके सरकार तक पहुंचने तक बीच में कई चैनल (माध्यम) है, जिन पर निगरानी कठिन है। इस कारण यह देखना होगा कि सरकार किस तरह सुप्रीम कोर्ट को संतुष्ट कर सकेगी। मोबाइल, बैंककर्मी व एयरलाइन्स के द्वारा केवाईसी किया जाता है, उसके लिए काम करने वालों की योग्यता गंभीर रूप से संदेह के दायरे में हे। मोबाइल कंपनी, एयरलाइन्स व निजी कंपनी आधार कार्ड मांग रही है, यह गंभीर विचारणीय विषय है। आधार केवाईसी बैंक खाते या एयरलाइन्स व मोबाइल के लिए दे दिया, उसके बाद किसी ने मोबाइल नंबर बदल लिया तो पूरी प्रक्रिया से फिर से गुजरना होगा। मोबाइल पर ओटीपी आएगा, वह कैसे मिलेगी।

’मानव अधिकार किसी कानून की देन नहीं है, कानून तो इन अधिकारों को पहचान दिलाता है और संविधान उनकी रक्षा करता है’

प्रकाश भाटिया, अध्यक्ष, राजस्थान राज्य मानव अधिकार आयोग (झारखंड के पूर्व मुख्य न्यायाधीश)

सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को मौलिक अधिकार से जोड़कर केन्द्र सरकार द्वारा नागरिकों की निजता के चीर हरण को रोकने का ऐतिहासिक निर्णय सुना दिया। लेकिन सूचना तकनीक के जिस दौर में हम जी रहे हैं उसमें हमारे गल्ली-मोहल्ले व घर तक की इमेज (कल्पना/छवि) एक ही क्लिक में उपलब्ध है। कोई भी हैकर आपके मोबाइल या कंप्यूटर से आपकी निजी जानकारिया को पल भर में चुरा सकता है। साथ ही ग्लोबल तकनीक की इस दुनिया में यह हकीकत के धरातल पर कैसे उतरेगा यह देखना है। हमने यह भी देखा है कि जब पहली बार देश में पैन कार्ड चलन में आया तो लोगों को काफी तकलीफ हुई थी मगर आज सब कुछ सामान्य एवं स्वीकार्य हो चुका है। भ्रष्ट मानसिकता वाले लोगों ने एक ही व्यक्ति के पांच-पांच पैनकार्ड के रूप में अवतरित करके इस पैने हथियार की धार कुंद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक अंतराल के बाद यूपीए सरकार ’आधार कार्ड’ लेकर आई। इस कार्ड को बायोमेट्रिक (शारीरिक चिन्हों जैसे ऊँगली के निशानों अथवा आँखों की पुतलियों द्वारा व्यक्ति विशेष की पहचान की पद्धति) बनाने के लिए सरकार ने जिस पहलू को नजरंदाज किया वो था उपयोकर्ता के आधार कार्ड की उच्चतम स्तर सुरक्षा एवं नागरिक की बायोलॉजिकल (जैविक) सूचनाओं की निजता के ऐसे दौरे में रह रहे हैं जहां संचार का सबसे बड़े माध्यम इंटरनेट और उसी से जुड़ने वाले ईमेल एवं सोशल (सामाजिक) मीडिया (संचार माध्यम) पर न तो किसी एक देश एवं उसके कानून का नियंत्रण है और न ही किसी एक सेवा प्रदाता कंपनी (जनसमूह) का एकाधिकार। हम सब जाने-अनजाने में अपनी सूचना फोकट के ईमेल एवं सोशल मीडिया पर शेयर कर देते हैं। हम निजी सूचनाओं को बाजार में खुल्लम-खुल्ला बेचने वालें के हवाले कर रहे हैं। तब सवाल उठता है कि यदि कुछ गलत होता है तो सरकार एवं सर्वोच्च न्यायालय कहा तक और कब तक नागरिकों की निजता की चौकीदारी करेंगे? पांच साल पहले जीमेल ने अपने फ्री (नि: शुल्क) ईमेल उपयोगकर्ताओं को ये नोटिस (सूचना पत्र) दिया था कि उनकी निजी जानकारियों की जीमेल कोई गांरटी (भरोसा) नहीं देगा और आपको ये स्वीकार करना होगा तभी आपका जीमेल अकाउंट (खाता) आगे चलेगा। तब अमरीका में बड़ा बवाल हुआ और संविधान के इतर अमरीकी सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को मौलिक अधिकार बना कर इसे लागू किया, पर जीमेल आज भी इस निर्णय से परे विज्ञापन की दुनिया को स्पैम (अवांछनीय ई-मेल) मेल अथवा अन्य रूप में उपयोगकर्ताओं की निजी सूचनाएं सार्वजनिक करता है। आज यदि हमारे देश में आधार कार्ड डेटाबेस (सूचना कस समूह) लीक (उजागर) हुआ तो उसके पीछे तीन कारण हो सकते है।

पहला लालच दूसरा लापरवाही और तीसरा सुरक्षा तंत्र के जिम्मेदार व्यक्ति का षडयंत्र। ये तीन कारण दुनिया के किसी भी तंत्र को तबाह कर सकते हैं। निजता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में यह समझना जरूरी है कि ये किसी की हार जीत का मामला न होकर जनता की निजी जिंदगी के अधिकार का मामला है। एक-दूसरे को पंक्चर करने की राजनीतिक प्रवृत्ति दलगत लाभ तो किसी को भी तात्कालिक रूप से दिला सकती है परन्तु देश का हित नहीं कर सकती। अभी मई 2017 में ये खबर आई की 13.5 करोड़ लोगों का आधार कार्ड डाटा लीक हो गया है। इससे पहले 5 मई 2016 को खबर आयी कि आईआरसीटीसी के सर्वर से एक करोड़ लोगों का डाटा लीक हो गया। एक और खबर आई कि कुछ लोग लीक किए गए डाटा से आधार कार्ड की क्लोनिंग (प्रतिरूपण) कर रहे हैं। ये सब बातें पूर्णतया अथवा आंशिक सत्य हो सकती है लेकिन यहां ये समझना जरूरी है कि बिना आग के धुंआ नहीं हो सकता। केन्द्र सरकार ने दावा किया कि डाटा लीक का मामला कुछ थर्ड (तीसरा) पार्टी (दल) कंपनियों एवं राज्य सरकारों के अधीन सर्वर से हुआ। यह तर्क निहायत ही गैर जिम्मेदाराना है। सभी राज्य सरकारें एवं आधार सेवा से जुड़े अन्य सरकारी एवं निजी संस्थान एक सिस्टम (प्रबंध) का हिस्सा है और केंद्र सरकार केन्द्रीय ढांचे की मुख्य जिम्मेदार संस्था। सरकार को ऐसे संवेदनशील डाटा को थर्ड पार्टी को देने से पहले डेटाबेस पर रियल (वास्तविक) टाइम (समय) सर्विलांस (निगरानी) एवं (और) डाटा (आंकड़ा) ऑडिट (लेखा परीक्षा) तथा साइबर फोरेंसिक (अदालती) इंवेस्टिगेशन (जांच) एंड (और) अलर्टस पर भी अपनी पॉलिसी (नीति) व टास्क फोर्स (कार्य दल) बनानी चाहिए। यहां जीनोम क्लोनिंग के खतरे पर भी उचित कदम उठाने की जरूरत है। हालांकि डेटाबेस से जुड़े सुरक्षा विशेषज्ञों का दावा है कि आधार कार्ड डेटाबेस में 256 बिट एन्क्रिप्शन (कूटलेखन) का इस्तेमाल हुबा है जो आज के तकनीकी युग में सर्वाधिक सुरक्षित है। उनका दावा है कि बायोमेट्रिक आईडी पूरी तरीक से सुरक्षित है क्योंकि डुप्लीकेशन (प्रतिलिप) की अवस्था में इसे ओरिजिनल (मूल) से चैक (जांच) किया जा सकता है। अमरीका में भी नागरिक पहचान पत्र की डेटाबेस सुरक्षा एवं अन्य पहलुओं पर कई संशोधन हो चुके हैं तो भारत में भी समय-समय पर इसको और अधिक प्रभावी एवं सुरक्षित बनाने के लिए संशोधित किया जा सकता है। यद्यपि अमरीका में डेटाबेस में बायोमेट्रिक नहीं है। वर्तमान सरकार की आधार कार्ड को हर कार्य के लिए अनिवार्य करने के पीछे ये सोच हो सकती है कि ये ’अलादीन का चिराग’ है जो भ्रष्टाचार को खत्म कर हर भारतीय की मनोकामना पूरी कर देगा। लेकिन, ये भी गलतफहमी ही हो सकती है। आधार की अनिवार्यता को जबरन लादना तब तक लोकतांत्रिक नहीं माना जा सकता जब तक कि देश में शिक्षा का स्तर शतप्रतिशत न हो। जिनके पास पेट भर भोजन का जुगाड़ न हो उनके लिए आधार से लेकर डिजिटल (अंक संबंधित) इंडिया (भारत) का सपना लोकलुभावन तो हो सकता है परन्तु पेट की आग को शांत करने वाली रोटी नहीं।

प्रो. डी. पी. शर्मा, स्वतंत्र टिप्पणीकार, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के सलाहकार और सूचना तकनीक विशेषज्ञ

उपसंहार: - निजता के अधिकार को कानूनी सुरक्षा है या नहीं, यह बहस खत्म हो गई है, लेकिन राज्य को नए कानून बनाकर इस अधिकार को सीमित करने की गुंजाइश अभी बाकी है। देखना यह है कि जब सरकारें किसी कानून की आड़ में निजता के उल्लंघन की कोशिश करेगी और कहेगी कि संविधान उन्हें कानून बनाने की इजाजत देता है तो अदालतें और समाज इस तरह के कानूनों को कितना न्यायसंगत मानेगा या बर्दाश्त करेगा। इस फैसले से साबित होता है कि सरकार द्वारा किसी व्यक्ति के निजी अधिकारों को किसी भी हाल में रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत के इस फैसले ने लंबे समय से चली आ रही दुविधा को समाप्त कर दिया।

- Published/Last Modified on: September 20, 2017

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