भारत और नेपाल (India & Nepal) (Download PDF)

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प्रस्तावना: -नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी 5 दिन की राजकीय यात्रा पर भारत आ रही है। वे नेपाल की पहली महिला राष्ट्रपति हैं और अक्टूबर 2015 में पदभार संभालने के बाद, यह उनकी पहली विदेश यात्रा है। दिल्ली के अलावा वे वाराणसी, गुजरात व उड़ीसा भी जाएगी। इस यात्रा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह यात्रा मई, 2016 में होनी थी पर यह भारत -नेपाल संबंधों में अड़चनों और नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से अचानक रद्द कर दी गई थी। नेपाल की राष्ट्रपति के अलावा वहां के प्रधानमंत्री ने भी भारत और नेपाल के रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए भारत की यात्रा की।

भारत और नेपाल: -

  • पिछले साल नेपाल के नए संविधान को अपनाने के बाद, वहां के मधेसी लोगों ने आंदोलन छेड़ दिया था। उनकी मांगे थीं कि संविधान में संशोधन हो और संघीय सीमाओं को बदला जाए ताकि मधेसियों को सरकार में उचित प्रतिनिधित्व मिले। चूंकि ज्यादातर मधेसी भारतीय मूल के हैं इसलिए नेपाल की तत्कालीन सरकार को आंदोलन के पीछे भारत का हाथ होने का अंदेशा था और, जब आंदोलन के चलते भारत-नेपाल व्यापार ठप हो गया तो ओली ने चीन से हाथ मिलाया और वहां से अन्य वस्तुओं के साथ पेट्रोलियम उत्पादों का भी आयात हुआ तो इस पर भारत की प्रतिक्रिया नाराजगी भरी थी। बाद में जब यूनाइटेड (संयुक्त) नेपालीज कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (राजनीतिक दल) (माओवादी) ने ओली सरकार से समर्थन वापस लिया तो ओली को इस्तीफा देना पड़ा। उसके बाद से भारत-नेपाल संबंधों में बदलाव नजर आ रहा है।
  • जब अगस्त 2016 में पुष्प कमल दहल ’प्रचंड’ ने प्रधानमंत्री का पदभार संभाला तो पहले छह सप्ताह में ही भारत की यात्रा की। जब कई संधियों पर हस्ताक्षर भी हुए। उल्लेखनीय है कि पूर्व में ओली की भारत व चीन यात्राओं को लेकर भारत में एक समय असमंजस खड़ा हो गया था पर पुष्प कमल दहल पदभार ग्रहण करने के छह सप्ताह में ही भारत आए जबकि उनकी पहली चीन यात्रा 8 महीने के बाद हुई। पिछले महीने अंतत: जब वे चीन गए तो वह उनकी राजकीय यात्रा भी नहीं थी। वे पोआओ फोरम (मंच) में भाग लेने के लिए चीन गए थे। उन्होंने बीजिंग में चीन के नेताओं से मुलाकात भी की लेकिन किसी भी संधि पर हस्ताक्षर नहीं हुए। यहां तक कि चीन अब प्रधानमंत्री प्रचंड को उनके भारतीय लगाव को देखते हुए उन्हें संदेह की नजर से देखता है। यही वजह है कि चीन के राष्ट्रपति ने उन्हें आपसी विश्वास बढ़ाने की सलाह दी तो वहां के कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (राजनीतिक दल) के मुखपत्र ’ग्लोबल (विश्वव्यापी) टाइम्स’ (गुणा/वस्तुओं की तुलना करने में प्रयुक्त) ने यहां तक कह दिया कि प्रचंड को भारत की ओर बढ़ते अपने रुझान को लेकर सफाई देने की जरूरत है।
  • के. पी. शर्मा ओली के कार्यकाल के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नेपाल यात्रा अक्टूबर 2016 में होने का निर्णय हुआ था। लेकिन, बदले हुए माहौल में न तो चीन के राष्ट्रपति नेपाल गए और न ही आने के काई संकेत नजर आते हैं। दूसरी ओर, नवंबर 2016 में प्रचंड सरकार ने भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की नेपाल यात्रा का आयोजन किया उल्लेखनीय है कि 2005 - 06 में मुखर्जी भारत के विदेश मंत्री थे और नेपाल में उन्होंने माओवादियों को मुख्यधारा में लाने में अहम भूमिका निभाई थी। बदलते परिप्रेक्ष्य में देखें तो अपने प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में के. पी. शर्मा ओली ने जहां चीन की वन (एक) बेल्ट (पेटी) वन (एक) रोड (सड़क) परियोजनाओं (ओबीओआर) से जुड़ने में बढ़-चढ़कर उत्साह दिखाया और संधि की थी। लेकिन, अब प्रचंड ने इस मामले पर चुप्पी साध ली है। चूंकि भारत ने ओबीओआर में शामिल होने पर विरोध जताया है इसलिए प्रचंड की इस चुप्पी मेंं भी चीनी राजनेता, भारत का हाथ देखते हैं।
  • भारत की ओर बढ़ते रूझान का अर्थ यह नहीं कि नेपाल-चीन के संबंध कमजोर हो गए। आज भी नेपाल में चीन का साला निवेश और रूपए सबसे बड़ा है। वह नेपाल की सेना को प्रशिक्षण तो देता ही है साथ ही युद्ध सामग्री भी मुहैया कराता है। चीन के राष्ट्रपति भले ही नेपाल नहीं गए लेकिन चीन में कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (राजनीतिक दल) की पोलिटब्यूरो (समाजवादी दल के केन्द्रीय निर्वाहक समिति) के कई सदस्य नेपाल आ चुके हैं। इस संदर्भ में नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी की यात्रा में संधियों पर हस्ताक्षर न भी हों पर भारत-नेपाल के बढ़ते तालमेल के कई प्रमाण दिखने की उम्मीद है। पिछले ही सप्ताह ही, प्रचंड की भारत यात्रा के दौरान में दोनों देशों के लिए बने ’ओवरसाइट (असावधानी) मैकेनिज्म’ (यंत्र विद्या) की तीसरी बैठक काठमांडू में हुई। इसमें भारत-नेपाल की विभिन्न परियोजनाओ जिसमें सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क-रेल परियोजनाएं, समन्वित चेकपोस्ट (जांच के बाद), विद्युत वितरण लाइन (रेखा) डालने, बहुआयामी जल विद्युत परियोजनाएं आदि शामिल हैं, की समीक्षा की गई। इसके अलावा भारत की ओर से क्रेडिट (उधार) लाइन (रेखा) देने और विमुद्रीकरण पर समीझा हुई। नेपाली नागरिक 4500 रुपए तक पुराने भारतीय नोटों को बदल सकते हैं हालांकि उन्हें 25 हजार रुपए के वित्त मंत्रालय ने नेपाल राष्ट्र बैंक (अधिकोष) से भारतीय रिजर्व (सुरक्षित रखना) बैंक (अधिकोष) से बात करने और 25 हजार रुपए तक बदलने की सहूलियत देने के लिए कहा है। इन सभी विषयों पर नेपाल की राष्ट्रपति और उनके प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत होगी। उम्मीद है कि उनकी इस यात्रा से दोनों देशों के बीच आपसी समझ बढ़ेगी।

प्रों. स्वर्ण सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार, जेएनयू के सेंटर (केंद्र) फॉर (के लिए) इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) पॉलिटिक्स (राजनीतिक) , ऑर्गेनाइजेशन (संस्था) एंड (और) डिस्आर्मामेंट (निरस्त्रीकरण) विभाग में अध्यापन का लंबा अनुभव।

कहां कहां जाएंगी नेपाल की राष्ट्रपति-

  • भंडारी राजघाट स्थित महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करेंगी, उसके बाद यमूना बायोडाइवर्सिटी (जैव विविधता) पार्क (बगीचा) का दौरा करेंगी।
  • इसके बाद वे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात करेंगी और उनके यहां भोज में शामिल होगी।
  • राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी नेपाल लौटने से पहले गुजरात और ओडिशा का भी दौरा करेंगी।

नेपाल-चीन: -

  • प्रचंड की नई दिल्ली यात्रा से नाराज चीनी सरकार मीडिया (संचार माध्यम) ने चीन के प्रतिकूल जाने को लेकर भारत की आलोचना की और नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ’प्रचंड’ को भारत के इशारे पर दव्पक्षीय संबंधों की अनदेखी करने के लिए खरी खोटी सुनाई।
  • सरकार संचालित ग्लोबल टाइम्स में छपे एक आलेख में चीन को ऐसा महसूस हो रहा है कि उसके साथ नेपाल ने चालबाजी की है जिसने पहले तो भारत से दबाव घटाने के लिए चीन से अपनी नजदीकी बढ़ाई और नई दिल्ली पर अपनी निर्भता से छुटकारा पाने के लिए बीजिंग के साथ कई समझौतो पर हस्ताक्षर किए, लेकिन दबाव कम होने पर बाद में इसने नेपाल-चीन संबंधों को अस्थायी तौर पर टाल दिया।
  • प्रचंड और भारत पर तीखा हमला बोलते हुए अखबार के दो आलेखों में चीन समर्थक पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को हटा कर शासन में बदलाव किए जाने पर चीन के रोष का चिक्र किया गया हैं।
  • एक आलेख में प्रचंड के अपने पिछले शासनकाल के दौरान 2008 में पहले चीन की यात्रा का उनके द्वारा विकल्प चुनने को याद करते हुए कहा गया है, ”प्रचंड अब गुस्से में नहीं हैं जैसा कि उन्होंने कभी बताया था, लेकिन राजनीतिक हित के लिए इसके कहीं अधिक यथार्थवादी निहितार्थ है” इसने कहा है कि भारत यात्रा के दौरान पंचेश्वर परियोजना, भूकंप बाद पुननिर्माण और पूर्व पश्चिम रेलवे कार्यक्रम उच्च स्तरीय बैठकों के एजेंडा (कार्यसूची) में थे, हालांकि ये सब चीन के रेश मार्ग पहल के भी मुख्य विषयों में शामिल थे जिससे नेपाल को फायदा हो सकता है।
  • उन्होंने कहा कि ऐसा लगता कि नेपाल और चीन के बीच संबंध ठहर गया है और चीन नेताओं की नेपाल यात्रा कथित तौर पर टाल दी गई है जो एक अभूतपूर्व स्थिति है।
  • आलेख में कहा गया है कि ऐसा लगता है कि चीन और नेपाल के बीच दव्पक्षीय संबंध अचानक ही नाजुक और संवदेनशील हो गया है, इसमें कहा गया, ”बेशक, चीन ठगा हुआ सा महसूस कर रहा है” इसने कहा है कि चीन-नेपाल संबंध में काठमांडो को ज्यादा फायदा होगा, चीन कुछ नहीं खोयेगा लेकिन नेपाल को इस पर विचार करने की जरूरत है कि कहीं यह अधिक अवसर तो नहीं गंवायेगा।” इसी अखबार में दूसरे आलेख में भारत पर चीन के प्रतिकूल जाने का आरोप लगाया गया है।
  • उन्होंने कहा है ”नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव से चौकन्ना हुआ भारत अब अपना रुख बदलने की कोशिश कर रहा है लेकिन इस तरह के तुच्छ भू राजनैतिक तर्क से किसी को काई फायदा नहीं होगा।”
  • नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड के चीन की इस होने वाली यात्रा से पहले यहां की सरकारी मीडिया ने यह कहते हुए उनकी आलोचना की कि प्रचंड की ’भारत समर्थ’ नीतियों के कारण दोनों देशों के संबंध निचले स्तर’ पर आ गए हैं, सरकारी अखबार ’ग्लोबल टाइम्स’ में प्रकाशित लेख में कहा गया कि कुछ समय तक प्रधानमंत्री और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के प्रमुख प्रचंड का चीन के प्रति दोस्ताना रुख था। लेख में प्रचंड के पहले में चीन से करीबी संबंधो और भारत विरोधी बयानबाजी का जिक्र किया गया। अखबार ने कहा लेकिन पिछले साल अगस्त में दूसरी बार प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद प्रचंड दो बार भारत गए और नवंबर में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का काठमांडों में गर्मजोशी से स्वागत किया।
  • लेख के अनुसार, ’प्रचंड की भारत समर्थक विदेश नीति के कारण चीन-नेपाल के संबंध निचले स्तर पर चले गए ’ चीन समर्थक’ प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की जगह लेने वाले प्रचंड 23 मार्च से चीन का पांच दिन का दौरा शुरू करेंगे और इस दौरान बोआओ फोरम (मंच) फोर (के लिये) एशिया के वार्षिक सम्मेलन में हिस्सा लेंगे।
  • उनके चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से भी मिलने की उम्मीद है। चिनफिंग पिछले साल अपनी दक्षिण एशिया यात्रा के दौरान नेपाल नहीं गए थे, वह साफ तौर पर चीन-नेपाल को रेल से जोड़ने जैसी बहुप्रचारित परियोजनाओं को लेकर प्रगति न होने से नाराज थे। चिनफिंग इसकी बजाए प्रचंड से ब्रिक्स सम्मेलन से इतर गोवा में मिले।
  • विशेषज्ञों अनुसार ओली का प्रधानमंत्री पद से हटना चीन के लिए गहरी निराशा की बात थी और उसे तिब्बत के रास्ते नेपाल को अपने रेल एवं सड़क मार्ग से जोड़ने की तथा भूआवेष्टित देश में अपना प्रभाव का विस्तार करने की योजना को लेकर झटका लगा था। नेपाल अपनी सभी आपूर्तियों के लिए भारत पर निर्भर है।
  • लेख में ओली सरकार के गिरने को लेकर और परियोजनाओं पर आगे ना बढ़ने को लेकर प्रचंड की आलोचना की गई। इसमें कहा गया प्रचंड ने भारत के प्रभाव में आकर ओली सरकार गिराई।

नई दिल्ली: -

  • नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ’प्रचंड’ ने कहा कि उनका देश अपने विकास और अपनी समृद्धि के लिए भारत के साथ एक स्थायी साझेदारी के लिए प्रतिबद्ध है।
  • प्रचंड ने प्रधानमंत्री मोदी जी के साथ एक संयुक्त संवादाता सम्मेलन में कहा कि नेपाल ने सभी क्षेत्रों में भारत के साथ संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाने के ठोस कदम उठाने पर विचारों का आदान-प्रदान किया है।
  • प्रचंड ने कहा कि उन्होंने विभिन्न परियोजनाओं और कार्यक्रमों पर उपयोगी आदान-प्रदान किया है, जिनमें नेपाल और भारत के लोगों के लिए ठोस परिणाम लाने की संभावना है। प्रचंड और मोदी ने हैदराबाद हाउस में दव्पक्षीय बातचीत के बाद मीडिया (संचार माध्यम) को संबोधित किया।
  • प्रचंड ने कहा, ’हम अपने सम्मानित पड़ोसी पहले की नीतियों पर अपने विचारों का आदान-प्रदान किया और इस बात पर सहमत हुए कि हमारी नीतियों में यह सामूहिक शुरुआत विश्वास और खुले संवाद पर आधारित 21वीं सदी के लिए महान और आपस में लाभकारी साझेदारी का नेतृत्व करेगी।
  • प्रचंड ने भारत के साथ नेपाल के मित्रवत संबंधों पर जोड़ देते हुए कहा कि उन्होंने यह दृष्टिकोण जाहिर किया कि भरोसा और विश्वास मजबूत और टिकाऊ मित्रवत संबंधों की अनिवार्य शर्त है और इसे सुनिश्चित करने के लिए हमें अच्छी पड़ोसी भावना के साथ एक-दूसरे की संवेदनाओं और चिंताओं का आदर करना चाहिए।
  • उन्होंने कहा, ’हमने कहा कि हमारे गहरे और विस्तृत रिश्ते के कारण दोनों देशो के बीच एक अर्थपूर्ण साझेदारी विशाल संभावनाओं को खेलने के लिए महत्वपूर्ण है, प्रचंड ने कहा, ’मैंने इस बात को महसूस किया है कि आर्थिक समृद्धि, राजनीतिक बदलाव के बगैर टिकाऊ नहीं बना जा सकता’।
  • नेपाली प्रधानमंत्री ने कहा कि एक शांतिपूर्ण, स्थिर, लोकतांत्रिक और समृद्ध नेपाल अपने पड़ोस में और उससे आगे भी शांति और स्थिरता में योगदान करेगा, उन्होंने कहा कि नेपाल और भारत मित्र हैं और मित्र रहने के लिए बाध्य हैं
  • प्रचंड ने कहा, ’हमारी मित्रता और भाईचारगी साझा संस्कृति और सभ्यतागत संपर्क और संयुक्त राष्ट्र चार्टर (राजपत्र) व पंचशील सिद्धांतों के ऐतिहासिक संबंधों के ठोस बुनिवायद पर खड़ी है’।
  • उन्होंने कहा, ’घनिष्ठ पड़ोसी होने के नाते हमारे भाग्य एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, मैंने प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि हम उनके मजबूत नेतृत्व में भारत की वृद्धि और समृद्धि से कितने प्रेरित है।
  • प्रचंड ने मोदी से कहा कि पिछले वर्ष में एक लोकप्रिय निर्वाचित संविधान सभा द्वारा कानून का निर्माण नेपाल की जनता के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी उन्होंने कहा, ’आपको पता है कि मेरी सरकार ने सभी को राय में लेने के गंभीर प्रयास किए हैं, क्योंकि हम नेपाली सभा के हर वर्ग के हित में संविधान को लागू करने के चरण में प्रवेश कर रहे हैं।
  • प्रचंड के अनुसार, व्यापार, पारगमन और संपर्क अन्य महत्वपूर्ण एजेंडे (कार्यसूची) हैं, जिन पर चर्चा हुई उन्होंने कहा कि बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर नेपाल की चिंता पर भी चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने अतिरिक्त तीन हवाई प्रवेश मार्गो के लिए नेपाल के अनुरोध पर भी चर्चा की।

बिहार: -

  • के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ का मुद्दा नेपाल के प्रधानमंत्री प्रचंड के सामने उठाया और बाढ़ से निपटने एंव पनबिजली को बढ़ावा देेने के लिए जल प्रबंधन की वकालत की।
  • प्रचंड को ”सक्षम” नेता करार देते हुए नीतीश ने उम्मीद जताई कि वह यह सुनिश्चित करने में कामयाब होंगे कि बिहार से सटे नेपाल के इलाकों में मधेसियों का प्रदर्शन या ताजा बवाल न हो। नीतीश ने यहां नेपाली दूतावास में प्रचंड से मुलाकात की प्रचंड हाल ही में दूसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए हैं।
  • प्रचंड से मुलाकात के बाद नीतीश ने पत्रकारों से कहा, ”कई मुद्दे हैं, भारत और नेपाल के संबंध अलग और खास हैं, हमने बिहार की ऐसी नदियों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की, जिनका उद्गम स्थल नेपाल में हैं, मुख्य रूप से उत्तर बिहार की नदियों का उद्गम स्थाल नेपाल में है।”
  • नीतीश ने कहा, ”यहीं सही तरीके से जल प्रबंधन किया जाए तो इससे न केवल बाढ़ से निपटने में मदद मिलेगी, बल्कि पनबिजली और नेपाल की अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा”। मुख्मंत्री ने कहा उन्होंने केंद्र सरकार से भी पटना-काठमांडू की विमान सेवा बहाल करने का अनुरोध किया।

भारत: -

  • नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री प्रचंड चार दिवसीय राजकीय दौरे पर भारत पहुंचे। चार अगस्त को नेपाल का प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद प्रचंड अपने पहले विदेश दौरे पर भारत आए हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने ट्‌वीट कर बताया कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राष्ट्रीय राजधानी में हवाईअड्‌डे पर प्रचंड की अगवानी की। मोदी के आमंत्रण पर प्रचंड पत्नी सीता दहल के साथ भारत दौरे पर आए है। भारत के राजकीय मेहमान नेपाली दंपति राष्ट्रपति भवन में रुकेंगे। प्रचंड मोदी जी से मुलाकात करने के बाद दौरा सपन्न होने से पहले वह राष्ट्रपति मुखर्जी और केंद्रीय मंत्रियों से भी मुलाकात करेंगे। भारत दौरे पर आने से पहले प्रचंड ने कहा था, ’मुझे पूरा विश्वास है कि भारत के इस दौरे से न केवल दोनों देशों के आपसी संबंध पटरी पर लौंटेगे, बल्कि आपसी विश्वास को और मजबूती प्रदान करेंगे।’ इस दौरान दोनों देशों के बीच पनबिजली परियोजाओं सहित कई समझौतों पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। इसके बाद प्रचंड नेपाल में अप्रैल, 2015 में आए भीषण भूकंप के बाद बुनियादी ढांचा विकास में भारत से अधिक सहयोग भी मांग सकते हैं। इसके अलावा प्रचंड भारत में बसे नेपाली समुदाय से भी मुलाकात करेंगे और नई दिल्ली स्थित नेपाली दूतावास में एक स्वागत समारोह में भी हिस्सा लेंगे। प्रचंड केंद्रीय मंत्रियों सुषमा स्वराज, अरूण जेटली और पियूष गोयल से मलाकात करेंगे, जबकि इनके बाद उनकी बैठक गृह मंत्री राजनाथ सिंह से होनी हैं।
  • इस बीच प्रचंड हिमाचल प्रदेश में नाथपा घकरी पनबिजली परियोजना देखेने भी जाएंगे। नेपाल के पूर्व-पश्चिम बिजली रेल के प्रस्ताव के व्यवहारिक अध्ययन, भारत और नेपाल के प्रमुख विरासतों को जोड़ने वाले 80 किमी लंबे बौद्ध परिपथ का निर्माण भी दोनों देशों के बीच एजेंडे (कार्यसूची) में शामिल है। कई दूसरे एजेंडे जैसे भारत के साथ बढ़ते व्यापार घाटे, भारत और नेपाल ऊर्जा के लिए सब (उप) स्टेशन (स्थान) का निर्माण और नेपाल के दक्षिणी मैदान में सड़क निर्माण के लिए दूसरे चरण की सहायता पर भी चर्चा की जाएगी।
  • प्रचंड ने कहा कि वह होने वाली अपनी भारत यात्रा के दौरा किसी विवादित समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, लेकिन वह दोनों देशों के बीच परस्पर विश्वास की ’मजबूत नींव’ रखेंगे। दरअसल, उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के शासन के दौरान मधेशी समुदाय के आंदोलन के चलते दोनों देशों के संबंधों में खटास आ गई थी। ओली से देश की बागडोर 4 अगस्त को दूसरी बार अपने हाथों में संभालने वाले माओवादी प्रमुख ने कहा ने कहा कि वह 15 सिंतबर से शुरू हो रही चार -दिवसीय यात्रा को चुनौतीपूर्ण अवसर के रूप में देखते हैं। उन्होंने संसद के अंतरराष्ट्रीय संबंध एवं श्रम समिति को बताया कि वह इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि भारत यात्रा से संबंध सामान्य होंगे, जिनमें हाल के समय में खटास आ गई थी। साथ ही पारस्परिक विश्वास के लिए मजबूत बुनियाद भी बनेगी।
  • प्रचंड ने कहा ’भूकंप के बाद पुननिर्माण, पनबिजली व्यापार समझौते और पोस्टल (डाक द्वारा) हाईवे (मुख्य मार्ग) के लिए अधिक समर्थन जुटाना दिल्ली में उच्च स्तरीय यात्रा के दौरान उनका मुख्य एजेंडा (कार्यसूची) होगा, बाद में भारत-नेपाल संबंधों पर एक बातचीत में प्रचंड ने कहा कि वह सभी से यह अनुरोध करना चाहेंगे कि उन्हें बतौर नेता ’जोखिम’ लेने दिया जाए।
  • उन्होंने कहा, ’मैं देश में सभी लोगों से अनुरोध करता हूं कि मुझे निर्देशित न किया जाए और हमारे राष्ट्रीय हित के पक्ष में मुझे जोखिम उठाने दिया जाए, ’हालाकि, नेताओ, अर्थशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों ने भी कहा कि भारत के साथ संबंधों में आए खटास को सुधारने की जरूरत है।
  • शीर्ष अर्थशास्त्री विश्वम्भर प्याकुरेल ने कहा कि नेपाल को भारत से कहना चाहिए कि नेपाली उत्पादों को भारत में मुक्त पहुंच दी जाए और गैर-शुल्क बाधाओं के मुद्दों का हल किया जाए। उन्होंने नेपाली प्रधानमंत्री को भारत से और अधिक एफडीआई की मांग करने की भी सलाह दी। नेपाली कांग्रेस के सदस्य बाल बहादुर केसी ने कहा कि विश्वास बहाली का कोई कदम उठाने से पहले भारत और नेपाल को अपने संबंधो के खराब होने के कारणों की पहचान करनी चाहिए। प्रधानमंत्री पद की थपथ लेने के तुरंत बाद प्रचंड ने भारत और चीन के साथ संबंधों में सुधार के लिए देशों में विशेष राजदूत भेजे थे।

खास बातें-

  • नेपाल के उप पीएम बिमलेंद्र निधि ने पीएम मोदी से मुलाकात की।
  • मोदी जी ने नेपाल की नई सरकार को शुभकामनाएं दी।
  • नेपाल के साथ पारंपरिक रिश्तों को और मजबूत करेगा भारत।
  • नेपाली कांग्रेस के नेता उपप्रधानमंत्री बिमलेंद्र निधि ने नेपाल के घटनाक्रम की जानकारी दी, जहां हाल ही में नई सरकार का गठन हुआ है। मोदी जी ने कहा कि भारत और नेपाल के बीच रिश्ते सिर्फ दो सरकारों के बीच नहीं, बल्कि दोनों देशों के लोगों के बीच है और भारत नेपाल के लोगों के साथ दोस्ती और पारिवारिक रिश्तों के इस पारंपरिक बंधन को मजबूत करने के प्रति संकल्पबद्ध हैं।
  • प्रधानमंत्री जी ने यह भी कहा कि भारत भूकंप के बाद पुननिर्माण के प्रयासों में सरकार और नेपाली जनता को समर्थन देने के प्रति पूरी तरह वचनबद्ध है। भारत और नेपाल के बीच रिश्ते पिछले साल तल्ख हुए थे और नेपाल में नई सरकार के गठन के बाद दोनों देश नई शुरुआत करने की उम्मी कर रहे हैं।

नेपाल: -

  • माओवादी प्रमुख प्रचंड ने नेपाल के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। एक दिन पहले ही देश के सांसदों ने प्रचंड को दूसरी बार प्रधानमंत्री पद के लिए चुना था। राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने राष्ट्रपति भवन में सीपीएन-माओवादी सेंट के 61 वर्षीय नेता को पद और गोपनीयता की शपथ दिलायी। शपथ ग्रहण के साथ ही प्रचंड औपचारिक रूप से देश के 39वें प्रधानमंत्री बन गए हैं।
  • प्रचंड ने छह सदस्यीय मंत्रिमंडल का गठन किया है, जिसमें दो उपप्रधानमंत्री शामिल हैं। नए मंत्रिमंडल में उपप्रधानमंत्री माओवादी नेता कृष्ण बहादुर महरा के पास वित्त मंत्रालय, जबकि नेपाली कांग्रेस के नेता उपप्रधानमंत्री बिमलेंद्र निधि के पास गृह मंत्रालय है। राष्ट्रपति भंडारी ने दोनों उपप्रधानमंत्रियों को भी शपथ दिलायी।
  • तीन अन्य मंत्रियों को भी पद की शपथ दिलायी गई। नेपाली कांग्रेस के नेता रमेश लेखक को भौतिक योजना एवं परिवहन, जबकि माओवादी नेताओं दलजीत श्रीपली को युवा एंव खेल तथा गौरी शंकर चौधरी को कृषि मंत्रालय सौंपा गया है।
  • निर्वाचित होने के बाद प्रचंड ने समुदायों के बीच खायी को पाटने का प्रयास करते हुए देश को आर्थिक विकास की दिशा में आगे ले जाने का वादा किया था। प्रचंड दूसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने हैं। पहली बार 2008 - 9 में भी उन्होंने कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री का पद संभाला था।

खास बातें-

  • माओवादी नेता प्रचंड ने मंगलवार को दाखिल किया था नामांकन
  • उनके चुने जाने से नेपाल में राजनैतिक स्थिरता आने की उम्मीद
  • सबसे बड़ी पार्टी नेपाल कांग्रेस और मधेसी पार्टियों ने किया है प्रचंड का समर्थन
  • मओवादी नेता प्रचंड को नेपाल के प्रधानमंत्री के लिये चुन लिय गया। प्रचंड के प्रधानमंत्री चुने जाने से नेपाल में राजनीतिक स्थिरता आएगी।
  • अपने भारत विरोधी रुख के लिए पहचाने जाने वाले प्रचंड को सबसे बड़ी पार्टी नेपाल कांग्रेस का समर्थन मिला। इसके अलावा मधेसी पार्टियों ने भी उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया।

नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देवबा ने सीपीएन-माओवादी सेंटर के प्रमुख प्रचंड की उम्मीदवारी का प्रस्ताव दिया था और माओवादी नेता कृष्ण बहादुर महारा ने इसका समर्थन किया था। यह महत्वपूर्ण घटनाक्रम उस समय हुआ है जब एक दिन पहले नेपाली राष्ट्रपति विद्या भंडारी ने बहुमत वाली सरकार के गठन के लिए सभी राजनीतिक दलों का नए सिरे से आह्वान किया था।

इससे पहले राष्ट्रपति की ओर से सरकार के गठन के लिए दी गई समयसीमा खत्म हो गई थी और प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच कोई सहमति नहीं बन पाई थी, इससे पहले, केपी ओली ने बीते 24 जुलाई को नेपाल के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था जिसके बाद भारत के इस पड़ोसी देश में नया राजनीतिक संकट पैदा हो गया था।

नेपाल की कम्युनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (राजनीतिक दल) (माओवादी सेंटर (केंद्र) ) के अध्यक्ष प्रचंड ने प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पेश की। नेपाल की जनता को अपना नया प्रधानमंत्री चुनने के लिए पूरी तरह से तैयार है। उन्होंने संसदीय सचिवालय में नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा, माओवादी नेता कृष्ण बहादुर महारा और संघीय समाजवादी फोरम (मंच) नेपाल के अध्यक्ष उपेंद्र यादव द्वारा समर्थित अपना उम्मीदवारी दाखिल किया।

हालांकि प्रचंड इस पद के अकेले उम्मीदवार हैं। इससे पहले भी सदन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत मार्कसवादी -लेनिनवादी (सीपीएन-यूएमएल) ने अपना उम्मीदवार पेश करने का ऐलान था, लेकिन बाद में पार्टी ने अपना फैसला बदल लिया। इसी तरह संघीय लोकतांत्रिक मधेसी मोर्चा ने भी प्रचंड के उम्मीदवारी का समर्थन किया। तराई मधेस लोकतांत्रिक पार्टी के नेता सर्वेन्द्र नाथ शुक्ल और सदभावना पार्टी के नेता लक्ष्मण लाल कर्ण ने भी प्रधानमंत्री पद के लिए प्रचंड का समर्थन किया है।

प्रचंड प्रधानमंत्री के रूप में दूसरी बार चुने जाएंगे, वह इससे पहले साल 2008 में प्रधानमंत्री बने थे और प्रमुख सेना अधिकारी रुकमनगुड कुटवाल को हटाने की कोशिश में नाकाम रहने पर अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। जीत के लिए 595 सदस्यों के सदन में प्रचंड को 298 मतों की जरूरत होगी, सदन में तीसरी बड़ी पार्टी ’माओवादी सेंटर’ के पास 82 सीट और समर्थन देने वाली नेपाली कांग्रेस के पास 207 सीटें हैं। नए प्रधानमंत्री के चुनाव के लिए संसदीय सचिवालय से जारी समय सारिणी के मुताबिक, नामांकन दाखिल करने का समय सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक है 4.30 बजे अंतिम सूची शामिल की जाएगी। अगर किसी निर्णायक चुनाव की जरूरत पड़ी तो वह सुबह 11 बजे शुरू होगा।

नेपाल की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी को सभी राजनीतिक दलों का आह्वान किया वे एक सप्ताह के भीतर आम सहमति के आधार नया प्रधानमंत्री चुन लें, ताकि देश में चल रही राजनीतिक अस्थिरता खत्म हो सके।

राष्ट्रपति ने मंत्रिमंडल की सिफारिश के मुताबिक नई सरकार के गठन के लिए संवैधानिक बाधाओं को दूर करने का आदेश भी दिया है। अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान से पहले प्रधानमंत्री केपी ओली ने इस्तीफा दे दिया था। नेपाली राष्ट्रपति ने एक बयान में कहा कि सभी राजनीतिक दल संविधान के अनुच्छेद 298 (2) के तहत एक सप्ताह के भीतर सहमति के आधार पर नई सरकार का गठन करें। इससे पहले उन्होंने कार्यवाहक प्रधानमंत्री एवं सीपीएन-यूएमएल के प्रमुख ओली, नेपाली कांग्रेस के प्रमुख शेर बहादुर और सीपीएन-माओइस्ट सेंटर (केंद्र) के नेता प्रचंड के साथ विचार-विमर्श किया।

खास बाते-

  • पिछले हफ्ते माओवादियों ने गठबंधन सरकार से समर्थन वापस ने लिया।
  • उसके बाद उनकी नौ महीने पुरानी सरकार अल्पमत में आ गई थी।
  • पिछले अक्टूबर में 10 साल में 8वीं सरकार की अगुवाई करते हुए पीएम बने थे

अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग (मतगणना) से पहले ही नेपाल के प्रधानमंत्री पद से केपी ओली के इस्तीफे के बाद देश में राजनीतिक संकट एक बार फिर गहरा गया है। ओली ने अविश्वास प्रस्ताव को देश को ”प्रयोगशाला” में बदलने और नए संविधान को लागू करने में रोड़े अटकाने की ”विदेशी ताकतों” की साजिश करार दिया।

पिछले 10 साल के दौरान बनी नेपाल की आठवीं सरकार की अगुवाई करने के लिए ओली पिछले अक्टूबर में प्रधानमंत्री बने थे। गठबंधन सरकार से माओवादियों द्वारा समर्थन वापस ले लिए जाने के बाद ओली अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रहे थे।

अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग (मतगणना) के लिए तैयार बैठे सांसदों से 64 साल के ओली ने कहा, ”मैंने इस संसद में एक नए प्रधानमंत्री के चुनाव का रास्ता साफ करने का फैसला लिया है और मैंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंप दिया है।”

ओली ने इस्तीफा उस समय दिया जब सत्ता में साझीदार दो अहम पार्टियों (राजनीतिक दलो) मधेसी पीपुल्स (लोग) राइट्‌स (सर्वोत्तम) फोरम (मंच) -डेमोक्रेटिक (लोकतांत्रिक) और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने नेपाली कांग्रेस और प्रचंड की अगुआई वाली सीपीएन-माओइस्ट सेंटर की ओर से उनके खिलाफ पेश किए गए अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने का फैसला किया।

इन पार्टियों ने ओली पर आरोप लगाया था कि उन्होंने पिछली प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं की। ओली की जगह लेने के लिए प्रबल दावेदार बताए जा रहे माओवादी प्रमुख प्रचंड ने प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया था कि वह अंकारी और आत्मकेंद्रित हैं।

नेपाली पूर्व प्रधानमंत्री ओली: -

  • उन्होंने कहा, ”इससे उनके साथ काम करते रहना संभव नहीं रहा गया था।” बहरहाल, 598 सदस्यों वाली संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए ओली ने प्रचंड एवं अन्य की ओर से लगाए गए सभी आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने देश के नए संविधान का विरोध कर रहे मधेसियों, जिनमें ज्यादातर भारतीय मूल के हैं, की शिकायतों के निदान के लिए वार्ता समर्थन किया। मधेसियों ने कुछ महीने पहले प्रदर्शन शुरू किए थे जिससे भारत से वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हुई थी।
  • ओली ने कहा, ”आंदोलनकारी मधेसी पार्टियों की मांगों के मामले का निदान शांतिपूर्ण तरीकों से किया जा सकता है उनकी मांगे पूरी करने के लिए संविधान में संशोधन किया जा सकता है।” उन्होंने मधेसी पार्टियों की ओर इशारा करते हुए कहा, ”फिर से आंदोलन की कोई जरूरत नहीं है।” उन्होंने देश को ”पीछे की तरफ” खींचने के लिए रची जा रही साजिश के खिलाफ भी लोगों को आगाह किया। ओली ने कहा कि इनके इस्तीफे के देश पर दूरगामी परिणाम होंगे और इससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी।
  • उन्होंने कहा, ”कई ऐसे मौके होते हैं जब सच बोलने वालों को दंडित किया जाता है और देशभक्ति के लिए खड़े होने वालों को सजा दी जाती है।”
  • संभवत: भारत की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा, ”नेपाल को एक प्रयोगशाला के तौर पर विकसित किया जा रहा है और विदेशी ताकते ऐसी साजिश कर रही हैं जिससे संविधान लागू नहीं किया जा सके।” ओली ने कहा कि नौ महीने पहले जब उन्होंने सत्ता की कमान संभाली थी, उस समय देश गंभीर संकट से जूझ रहा था और यह दुख की बात है कि सरकार ऐसे समय में बदल रही है जब यह पिछले साल आए जानलेवा भूकंप की ओर से दिए गए दर्द से उबर रही है। पिछले साल नेपाल में आए भीषण भूकंप में करीब 9, 000 लों मारे गए थे।
  • सीपीएन-यूएएमएल के नेता ओली ने कहा, ’इस समय सरकार में बदलाव का खेल रहस्मय है।’ उन्होंने कहा कि उन्हें अच्छा काम करने की सजा दी गई। पिछले साल सितंबर में नए संविधान को अपनाने के बाद से ही नेपाल में राजनीतिक संकट कायम है। मधेसी समुदाय नए संविधान का विरोध कर रहा है, क्योंकि उन्हें आशंका है कि इससे देश को सात प्रांतो में बांट कर उन्हें हाशिये पर डाल दिया जाएगा।
  • करीब पांच महीने चले मधेसियों के विरोध-प्रदर्शन के कारण नेपाल में जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति ठप पड़ गई थी। पुलिस के साथ झड़प् में 50 से ज्यादा लोगों के मारे जाने के बाद यह प्रदर्शन फरवरी में समाप्त हुआ था। नेपाल ने मधेसी संकट के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया था। हालांकि, भारत ने इस आरोप को खारिज किया है।
  • माओवादी ने ओली को सत्ता से बेदखल करने का फैसला दो माह पहले तब किया जब उन्होंने कहा कि वह मधेसियों की चिंताए दूर करेंगे और पिछले भूकंप में तबाह हुए घरों को फिर से बनाएंगे। अपने संबोधन में ओली ने कहा कि पिछले साल जब उन्होंने सत्ता संभाली, उस समय नेपाल-भारत संबंध सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था। बहरहाल, उनके प्रयासों से स्थिति सामान्य हुई।
  • ओली ने पिछले सप्ताह काठमांडू में हुई ’एमिनिटस या एमिनिटी (सुख-सुविधाएँ/मनोभाव) पीपुल्स (लोग) ग्रुप (समूह) ’ की बैठक का जिक्र किया जिसमें 1950 की नेपाल -भारत शांति एवं मैत्री संधि सहित नेपाल एंव भारत के बी हुई विभिन्न संधियों एवं समझौतो की समीक्षा के लिए चर्चा हुई। उन्होंने कहा, ’नेपाल-चीन संबंध और नेपाल -भारत संबंध खास हैं, जिनकी तुलना एक-दूसरे से नहीं का जा सकती।’ उन्होंने कहा कि उनके प्रयासों से किसी एक देश पर नेपाल की आर्थिक निर्भरता कम हुई है।
  • ओली ने कहा कि नेपाल के चीन के साथ परिवहन एवं ट्रांजिट (क्रांति) संधि पर दस्तखत किए ताकि दोनों सीमाओं में इसकी पहुंच हो। जब नेपाल के लोगों को भविष्य मे ऐसे संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा, जैसा सीमा बाधित किए जाने के समय करना पड़ता था। उन्होंने कहा, ’देश और लोगों के हित में नेपाल की अपने पड़ोसियों से बराबर की दूरी बनाकर रखनी चाहिए। हम अपने दोनों पड़ोसियों की संवेदनशीलता का सम्मान करते हैं और हम उनसे भी ऐसी ही अपेक्षा रखते है।’ बहरहाल, ओली ने यह भी कहा कि ’हम अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्ते चाहते हैं, लेकिन हम अपने अंदरूनी मामलों में दखल स्वीकार नहीं कर सकते।’ उन्होंने कहा कि नए संविधान के लागू होनें में रोड़े अटाकाने की खातिर उनकी सरकार गिराने की कोशिशें की गई।
  • उन्होंने चेताया कि देश को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। ओली के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को नेपाल कांग्रेस के 183, सीपीएन, एमसी के 70 और सीपीएन-यूनाइटेड (संयुक्त) के तीन सांसदों का समर्थन प्राप्त था। संसद में तीनों पार्टियों के कुल 292 सांसद हैं। ओली की सीपीएन, यूएमएल के सभी 175 सांसद हैं, जो विश्वास प्रस्ताव जीतने के लिए जरूरी 299 सीटों से काफी कम हैं।

खास बातें-

  • पुष्प कुमार दहल के समर्थन वापस लेने से ओली सरकार अल्पमत में आ गई।
  • ओली ने कहा कि समर्थन वापसी के पीछे मुख्य रूप में भारत की भूमिका है।
  • नेपाली मीडिया (संचार माध्यम) के मुताबिक भारतीय राजदूत ने समर्थन वापसी के बाद भोज दिया था।

सत्ता से बेदखल होने जा रहे नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने एक कुंठित बयान जारी किया है। उन्होंने अपनी सरकार से सीपीएन (माओवादी सेंटर (केंद्र) के समर्थन वापस लेने के पीछे भारत का हाथ बताया है। ओली ने काठमांडू में राष्ट्रीय सुरक्षा पर आयोजित एक सम्मेलन में कहा कि माओवादियों के समर्थन वापसी के पीछे मुख्य रूप से भारत की भूमिका है। उन्होंने कहा कि सरकार बदलने की प्रक्रिया स्वचालित प्रकिया नहीं, बल्कि रिमोट कंट्रोल (दूर से नियंत्रण संविधान) से संचालित है।

ओली ने पिछले साल अक्टूबर में जब सत्ता संभाली थी, तब नेपाल और भारत के रिश्ते कमजोर हुए थे और मधेसी प्रदर्शनकारियाेे ने नेपाल-भारत पर पांच माह तक आर्थिक नाकेबंदी की थी। ओली तभी से नेपाल के आंतरिक राजनीतिक मामलों में भारत के ’अक्खड़ और तीरीकों’ की आलोचना करते रहे हैं।

नेपाल के माओवादियों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और ओली के इस्तीफा देने से इनकार के बाद नेपाली कांग्रेस और सीपीएन (माओवादी) की ओर से अविश्वास प्रस्ताव दर्ज कराया गया है। ओली ने कहा कि माओवादियों ने जब उनकी सरकार से समर्थन वापस लिया उसके बाद पांच सितारा होटल में भोज आयोजित किया गया।

नेपाली मीडिया (संचार माध्यम) में यह खबर प्रमुखता के साथ आई कि नेपाल में भारत के राजदूत रंजीत राई ने माओवादियों के समर्थन वापसी के बाद भोज दिया। ओली ने कहा कि वह पड़ोसी देशोंं के साथ मित्रता पूर्ण संबंध बनाए रखने के नाम पर राष्ट्रीय सुरक्षा सें समझौता नहीं कर सकते।

नेपाली के वर्तमान प्रधानमंत्री प्रचंड: -

खास बातें-

  • प्रचंड ने कहा, यह बैठक उनके लिए ’आश्चर्यजनक’ रही।
  • बैठक को महज संयोग बताते हुए उन्होंने इसे अपने गर्व से भी जोड़ा।
  • मोदी -शो (प्रदर्शन) के बीच बैठक प्रचंड ने नेपाल के भूगोल को भी याद किया।

भारत में ब्रिक्स से संबंध बनाने वाले बिमस्टेक शिखर सम्मेलन में शामिल होने के बाद वापस नेपाल पहुंचे प्रचंड ने कहा कि उनकी पड़ोसी देशों के नेताओं के साथ बैठक दुर्लभ और सुखद रही।

’काठमांडू पोस्ट’ की रिपोर्ट (विवरण) के मुताबिक, प्रचंड का इशारा देर शाम मोदी और चीन के राष्टपति शी चिनफिंग के साथ हुई उनकी मुलाकात से था।

प्रचंड की पीएम मोदी और शी के साथ बैठक की एक तस्वीर फेसबुक पर आने के बाद, पूरे काठमांडू में अटकले तेज हो चली थीं, त्रिभुवन इटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) हवाईअड्‌डे पर पहुंचने पर, प्रचंड ने संवाददाताओं से कहा कि यह बैठक उनके लिए आश्चर्यजनक रही।

बैठक को महज एक संयोग कहते हुए उन्होंने कहा, हांलाकि, फिर भी यह मेरे लिए एक गर्व की बात थी’ प्रचंड ने चीन के राष्टपति से पहले मुलाकात की थी। इसके बाद उनकी संयुक्त बैठक शी और मोदी के साथ हुई।

प्रचंड ने कहा, ’मैं होटल के वेटिंग (ठहराव) लांउज (बैठकखाना) में था, जहां चीनी राष्टपति आ गए, यह मेरे लिए ऐसे ही था कि पत्थर की प्रतिमा खोज रहा था और भगवान मिल गए। करीब 20 मिनट बाद मोदी भी वहां आ गए। वह कुछ तकनीकी वजहों से वहां होटल में रह गये थे।

प्रचंड को बैठक के दौरान तीनों नेताओं के बैठने की जगह भी अदभुत और नेपाल के भूगोल के हिसाब से लगी। उन्होंने कहा, ’मैं बीच में था, शी उत्तर की तरफ और मोदी दक्षिण में बैठे थे।’ नेपाल के प्रधानमंत्री ने कहा यह एक दुलर्भ्ा और सुखद संयोग था, प्रचंड ने कहा, ’मैने त्रिपक्षीय रणनीतिक सहयोग का विचार रखा। दोनों नेताओं ने इस प्रस्ताव को सकारात्मक बताया।’

उन्होंने कहा, ’यह सकारात्मक पहलू है और इसे हमे अच्छे परिप्रेक्ष्य में लेना चाहिए। यह बैठक पहले से निर्धारित नहीं थी, प्रधानमंत्री ने कहा, ’मै समझता हूं कि गोवा में दो दिवसीय प्रवास फलदायक रहा।;

उपसंहार: - पिछले कुछ वर्षो के दौरान भारत के नेपाल के साथ संबंध कड़वाहट भरे रहे लेकिन अब उनमें सुधार हो रहा है। क्योंकि इसमें अब दोनों देश अपने रिश्ते को दृढ़ करने के लिए काफी प्रयास कर रहें हैं।

- Published/Last Modified on: May 22, 2017

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