भारत-अमेरिका रक्षा सौदा (India - USA Defense Deal) (Download PDF)

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प्रस्तावना:- भारत-अमरीका में हुए रक्षा समझौते से चीन व पाक की नींद उड़ गई है। करार के अनुसार भारत व अमरीका साजो, समान, मरम्मत व आपूर्ति के लिए एक दूसरे की संपदाओं और सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल कर सकेंगे। आतंक से निपटने में अमरीका ने भारत को सहयोग का भरोसा दिया है। साजो-सामान संबंधी आदान-प्रदान समझौते (लेमोआ) पर हस्ताक्षर करने का स्वागत करते हुए रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और अमरीका रक्षा मंत्री कार्टर ने कहा कि समझौता व्यवाहारिक संपर्क और आदान-प्रदान के लिए अवसर प्रदान करेगा। पर्रिकर ने अमेरिका से जेट इंजन तकनीक व मानव रहित हवाई यान पर भी बात की। माना जा रहा है कि जून 2016 में भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी के अमरीकी दौरे के समय इस समझौते की बुनियाद तैयार की थी।

  • भारत और अमरीका:- के बीच लेमोआ (लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट) समझौता काफी महत्वपूर्ण है। चीन का रुख काफी आक्रामक होता जा रहा है पर ऐसा नहीं कि भारत घबराकर यह समझौता कर रहा हैं। हमें हमारी सीमा रेखा से बाहर भी चौकसी और सुरक्षा बढ़ाने की जरूरत है। खासतौर पर अंतरराष्ट्रीय ट्रेड समुद्र के जरिए ही होता है। चूंकि चीन अमरीका को समुद्र में चुनौती दे रहा है। चीन अमरीका को न तो हवा में चुनौती दे सकता है न ही जमीन पर। इसलिए उसने दक्षिण चीन सागर पर अडियल रुख अपनाया। वहां अमरीका को ललकारना शुरू किया। अब अमरीका की समस्या यह है कि अगर वह अपने जहाज भेजकर इस क्षेत्र में ’पेट्रोलिंग’ करें तो खर्चा बहुत होता है और ऐसा करना व्यावाहारिक भी नहीं हैं। इसलिए उसे भारत के सहयोग की जरूरत है।
  • भारत व अमेरिका संबंध:-भारत भी अपने बूते हिन्द महासागर और दक्षिण चीन सागर में सुरक्षा नहीं कर सकता। भारत और अमरीका के संबंध इस समय अनुकूल हैं। इसलिए यह समझौता भारत और अमरीका दोनों के हित में हैं। इसके माध्यम से खासतौर पर लॉजिस्टिक सहारा, आपूर्ति, खाद्य सामग्री एवं जल सेवा, फौजियों के लिए ठहरने की जगह, परिवहन, संचार, स्वास्थ्य सेवाओं, संग्रहण सेवाओं, हथियार-उपकरणों के स्पेयर पाट्‌र्स, हथियारों की मरम्मत और बंदरगाह सेवाओं आदि का लाभ एक-दूसरे के अड्‌डों से उठाया जा सकेगा। दोनों देश आपसी बेस का इस्तेमाल आपदा और मानव राहत के लिए प्रयोग कर सकेंगे। संयुक्त प्रशिक्षण-अभ्यास कर सकेंगे।

भारत अमेरिका समझौता:

  • इस समझौते के जरिए चीन को एक तरह से संदेश मिल जाएगा कि भारत समुद्र में बढ़ती दखल पर चुप नहीं बैठेगा। दरअसल, चीन ने पनडुब्बियों की तैनाती में बहुत पैसा खर्च किया हैं। अगर अमरीका या भारत के दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में जहाज जाएं तो उनकी सुरक्षा के लिए इन्हें रक्षा जहाज भेजने पडेंगे। क्रूजर, डेस्ट्रॉयर, एंटी सबमरीन का खर्चा उठाना पड़े। इसलिए दोनों नेवी मिलकर कम खर्च में सुरक्षा कर पाएंगी। भारत-अमरीका के बीच विवादास्पद मसले भी नहीं हैं। हालांकि यह ध्यान रखना होता है कि विदेश नीति की स्वायत्ता को झटका नहीं लगना चाहिए। यह बरकरार रहनी चाहिए। अगर यह सुनिश्चित हो जाए तो दोनों के हित में ही समझौता रहेगा। वैसे तो कोई भी देश इतना संप्रभु नहीं है किसी से हाथ ही न मिलाए, कोई समझौता ही नहीं करें। जब भी ऐसे सैन्य समझौते होते है तो अकसर आलोचना होती है कि हम अमरीका के दबाव में आ गए हैं। खासतौर पर भारत में वामपंथी धड़े को अमरीका से समझौते में तकलीफ रहती हैं। अगर भारत सोवियत संघ से समझौता करता था तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती थीं। हमारे रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और अमरीकी रक्षा सचिव एश्टन कार्टर के बीच हुआ समझौता भारत-अमरीका के लिए लाभदायी होगा। आलोचकों को संशय से ऊपर उठकर देखना चाहिए। ऐसा कोई समझौता नहीं होता कि जिसमें एक देश का लाभ हो और दूसर मुल्क कम लाभ उठाए या उसका नुकसान हो। भारत को इससे कोई खामियाजा भुगतना पड़ेगा, ऐसे अविवेकपूर्व तर्को पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
  • यह समझौता आगे भी बढ़ना चाहिए। भारत को विकट परिस्थितियों के लिए तैयारी में अमरीका का साथ लेने में कोई हर्ज नहीं हैं। तात्कालिक रूप से चीन के प्रभाव को काउंटर करने के लिए यह समझौता प्रभावपूर्ण रहेगा। हमें केवल भारत-अमरीका पर ही फोकस नहीं रखना चाहिए। कई देशों के भी समुद्र में हित हैं। पर चीन को संदेश यह जाएगा कि जितनी वह आक्रामकता दिखाएगा, अमरीका भारत जैसे सहयोगियों के साथ उसे काउंटर करता रहेगा। अभी हमारी रक्षा खरीद अमरीका से बढ़ी है। वहां से आने वाले हथियार-उपकरणों की मरम्मत और स्पेयर पाट्‌र्स हासिल करने भी आसानी रहेगी। इस समझौते से हिन्द महासागर में भारत की ’ऑपरेशनल’ पहुंच और स्थायित्व बढ़ेगा। इसे केवल चीन का काउंटर ही नहीं मानना चाहिए। ऐसा नहीं है कि भारत और अमरीका चीन से युद्ध लड़ना चाहते हैं। ऐसे समझौते की ’बल्कै एंड व्हाइट’ (काला और सफेद) में नहीं देखा जाना चाहिए। इनमें थोड़ी बारीकी होती हैं। कोई भी अंतरराष्ट्रीय समझौता बहुत सीधा और सपाट नहीं होता है कि हम कहने लगें कि किसका नुकसान होगा और किसका फायदा?

भारत को फायदा:- इस समझौते से निम्न लाभ भारत को होंगे-

  1. आपदा में भारतीय सैन्य बलों की कार्य क्षमता में होगा इजाफा
  2. सप्लाई, स्पेयर पाट्‌र्स सर्विस और ईंधन का कर सकेंगे इस्तेमाल।
  3. मरम्मत व पुन: आपूर्ति में धरती, वायु, नौसैनिक बेस का उपयोग।
  4. भारत दुनियाभर में अमरीकी बेस का प्रयोग कर सकेगा।
  5. आतंक से जंग में भी मदद मिलेगी।
  • अन्य लाभ:- ऐसा नहीं है कि अमरीका हमारे सैन्य अड्‌डों का प्रयोग करने लगेगा। इस समझौते से फायदा यह रहेगा कि कभी युद्ध के हालात बने तो भारत या अमरीका को तैनाती में समय नहीं लगेगा। इस समझौते को आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि अगर दक्षिण चीन सागर में भारतीय नेवी के जहाज को ईंधन चाहिए तो उस क्षेत्र में नजदीक मौजूद अमरीकी टेंकर हमारे जहाज को ईंधन दे सकता है। इसी तरह अगर अमरीका या भारतीय वायुसेना के जहाज को मरम्मत या रखरखाव की जरूरत पड़ी तो इसके लिए दोनों देश आपस में मदद कर सकेंगे।
  • विचार:-समझौता मास्टर डील साबित होगा। इससे भारत को दुनिया के किसी भी हिस्से में अमरीका से मदद मिलेगी। यमन जैसे हिंसा ग्रस्त देशों में भारतीयों को बचाने में अमरीका की मदद मिल सकती है।

                                                                                                                                                                सुशांत सरीन, रक्षा विशेषज्ञ

  • थोड़े से लोगों ने राज्य की ज्यादातर आबादी को बंधक बना रखा है। सीमापार से घाटी में हिंसा फेलाने की कोशिश हो रही है। घाटी में शांति कायम रखने के लिए भारत की कोशिशें जारी हैं।

                                                                                                                                                                     मनोहर पर्रिकर, रक्षामंत्री

ड्रोन:-

  • भारत अमरीका से 22 गार्जियन ड्रोन खरीदने की तैयारी में है। यह ड्रोन समुद्र में निगरानी के लिए मददगार है। इसके लिए अमरीका हरी झंडी दे सकता है। अमरीका का यह कदम उसके दव्ारा जून में भारत को एक बड़ा रक्षा सहयोगी का दर्जा दिए जाने के कुछ दिनों के भीतर प्रधानमंत्री मोदी ने अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा से व्हाइट हाउस में मुलाकात में की थी।
  • ड्रोन एक तरह का मानवरहित वायुयान है, जिसे रिमोट से नियंत्रण किया जा सकता है या अपनेआप उड़ान के लिए भेजा जा सकता है। इससे लंबी दुरियों, अधिक ऊंचाइयां और निगरानी के लिए बनाया गया है। इस विमान से 50 हजार फिट ऊंचाई से निगरानी की जा सकती है एवं 24 घंटे से अधिक लगातार उड़ सकता हैं।
  • एशिया:- भारत और अमेरिका के बीच रक्षा समझौते को एशिया में शक्ति संतुलन का महत्वपूर्ण कदम कहा जा सकता हैं, विशेष तौर पर चीन की प्रतिक्रिया को देखते हुए इसे चीन की विस्तारवादी नीति के रास्ते चेतावनी भी समझा जा सकता है। हालांकि, यह समझौता दोनों देशों के जल, थल और वायु सेना के अड्‌डों का एक दूसरे देश की सेना दव्ारा प्रयोग के लिए है और इसमें किसी भी देश की सेना को कहीं अड्‌डा जमाने का प्रावधान नहीं है, लेकिन अगले कदम के रूप में उन प्रावधानों का अनुमान लगाना अतिशयोक्ति नहीं कहा जाएगा। दक्षिण चीन सागर पर अंतरराष्ट्रीय पंचाट की तरफ से झटका लगने के बावजूद चीन जिस तरह से मनमानी कर रहा है उसे देखते हुए इस समझौते का विशेष महत्व हैं। अमेरिका, वियतनाम, जापान और दक्षिण कोरिया सभी चीन के विस्तारवाद को नापसंद करते हैं यहां तक की भारत भी चीन से ज्यादा वियतनाम को समर्थन देता है। ऐसे में रक्षा मामलों में भारत-अमेरिका निकट आने पर चीन की यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही है कि इससे भारत ज्यादा सुरक्षित नहीं हो जाएगा। इसका यह अर्थ जरूर निकलता है कि जिस अमेरिका का सहारा लेकर चीन महाशक्ति बना है अब अगर उसका सहारा लेकर भारत भी अपनी हैसियत बढ़ा रहा है तो यह वैश्विक भू-राजनीति की उसी प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसके तहत दुनिया में आर्थिक रूप से ताकतवर होने वाले देश सामरिक रूप से भी शक्तिशाली होने की दिशा में बढ़ते हैं। किन्तु चीन से अधिक यह समझौता भारत और अमेरिका के सामरिक रिश्तों की दिशा में बड़ा बदलाव लाने वाला कदम है। इसे अमेरिकी रक्षा मंत्री एश्टर कार्टर और भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर दोनों ने महसूस किया है। 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान जब अमेरिकी लड़ाकू विमान मुंबई के सैनिक अड्‌डे पर ईंधन लिया था तो भारत में बड़ा विवाद उठा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की कड़ी आलोचना हुई थी कि उन्होंने भारत की विदेश नीति के विरूद्ध जाकर ऐसी अनुमति दी है, लेकिन आज वह घोषित नीति है और अमेरिका के ऐसे कदम पर आपत्ति का वह तर्क नहीं काम करेगा। इसके बावजूद अमेरिकी रक्षा नीति के साथ कई खतरे भी जुड़े हैं। अगर प्रधानमंत्री मोदी जी ने देश को अमेरिकी रक्षा सहयोग का लाभ दिलाने की सोची है तो उन्हें उस दिशा में भी सोचना होगा। यह एक ऐतिहासिक रक्षा समझौता था जो लंबे इंतजार के बाद हुआ।
  • सांसद:- ओबामा के राष्ट्रपति कार्यकाल में यह डील हो सकती है। अमरीकी अफसरों का कहना है कि व्हाइट हाउस -पेंटागन के अलावा अमरीकी कुछ अमरीकी सांसद भी चाहते है कि यह डील हो जाए।
  • उपसंहार:-भारत व अमेरिका के इस रक्षा समझौते से कई लाभ है तो कई नुकसान भी है पर अगर हमेें देश का आगे विकास करना है तो इतना खतरा तो भारत को उठाना ही पड़ेगा।

- Published/Last Modified on: October 14, 2016

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