भारत और इजरायल ( India and Israel in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना:- भारतीय और यहूदी दो महान सभ्यताएं हैं। आधुनिक विश्व में भले ही दोनों देशों का वर्तमान स्वरूप लगभग सात दशक ही पुराना है, लेकिन सदियों से हमारे बीच संबंध रहे हैं। एक ओर जहां भारत भौगोलिक और जनसंख्या की दृष्टि से विराट है वहीं इजरायल दोनों की पैमानों पर काफी छोटा है। लेकिन इससे इजरायल का विश्व में महत्व कम नहीं होता है। दरअसल, इजरायल विश्व में एक सशक्त विचार का प्रतीक है। निर्णय और प्रतिभा में अद्भुत। भारत ने अब इजरायल के साथ अपने संबंधों को नई दिशा दी हैं। इजरायल के भी अपने फायदे हैं। लेकिन कुल मिलाकर भारत को मध्यपूर्व के छोटे से देश इजरायल से लाभ प्राप्त होंगे।

India and Israel
Image Shows About Import & Export for India and Israel

मान्यता:-आखिरकार, 17 सितंबर 1950 को भारत ने इजरायल राष्ट्र को आधिकारिक तौर पर मान्यता प्रदान की, हालांकि उसके साथ भारत के राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध शुरू करने को मंजूरी दी, जो कांग्रेस पार्टी से संबंधित थे, हालांकि भारतीय जनता पार्टी (दल) के नेतृत्व वाली सरकारों के कार्यकाल में इजरायल के साथ रिश्तों को और भी अधिक प्रोत्साहन मिला। इजरायल ने मुम्बई में वाणिज्य दूतावास (ब्रिटिश राज के दौर में खुला पुरानी यहूदी एजेंसी (संस्था) का कार्यालय) बरकरार रखा, जो दोनों देशों के बीच आधिकारिक आदान-प्रदान का मार्ग बना और जिसने भारतीय यहूदी समुदाय को इजरायल में जाकर बसने में सहायता की।

सफर:- भारत और इजरायल के बीच संबंधों का दौर सदियों पुराना है। नए राष्ट्र के रूप में उदय से पहले ही इजरायल के यहूदी लोग पूर्व में स्थिति भारत में व्यापार और पनाहगार के रूप में आते रहे। यहां उन्हें अपनत्व भी प्राप्त हुआ।

  • व्यापार- भारत और इजरायल के बीच संबंधों के लगभग ढाई हजार वर्ष पुराने दस्तावेजी प्रमाण हैं। यहूदी नाविकों का पहला समूह 562 ई. पू. भारत में पहुंचा। कुछ इतिहासकारों का कहना हैं कि सुलेमान राजा के काल यानी 957 ई. पू. में यहूदी समूह भारत में पहुंचा था। यहूदियों का भारत के प्रति आकर्षण शुरू में मसालों का व्यापार था। भारत और यूरोप के बीच मसालों का व्यापार होता था।
  • कोच्ची- रोमन शासकों के अत्याचारों से बचने के लिए यहूदियों का दूसरा भारत प्रवास 70 ईस्वी में हुआ। यहूदियों का समूह कोच्ची में आया। कोंकंण में बसने वाले यहूदी बेने इजरायली कहलाए। कोलकाता के बगदादी यहूदी भी लगभग दो हजार वर्ष पूर्व भारत में आए थे। भारत में यहूदियों को स्थानीय राजाओं व लोगों द्वारा तंग नहीं किया जाता था। यहूदियों को अपने धर्म और संस्कृति की पूरी स्वतंत्रता थी।
  • सम्मान- केरल के राजा कुलशेखर रवि वर्मा (962 - 1019ई.) ने यहूदी मुखिया जोजफ रब्बान से भेंट कर ताम्र-पत्र दिए। साथ ही यहूदियों को मालाबार में बसने की इजाजत दी। भूमि अधिकार भी प्रदान किया। यहूदियों को मालाबार के श्रेष्ठजनों की बराबरी का सम्मान भी प्रदान किया गया । यहूदियों को ‘अंजुवनम’ नामक व्यापारिक अधिकार भी दिए गए।
  • सहयोग-पुर्तगालियों ने वर्ष 1568 में कोच्ची में यहूदी धर्मस्थल सेनेगॉग को ढहाया तो राजा राम वर्मा ने इसका पुननिर्माण कराया। दव्तीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर ने लगभग 60 लाख यहूदियों को मौत के घाट उतारा। ऐसे में जामनगर के राजा के महाराजा दिग्विजय सिंह जडेजा ने पोलैंड के यहूदियों के समूह को अपनी रियासत में पनाह दी थी।

शुरुआत:- नरेन्द्र मोदी के इजरायल दौरे को दोनों देशों के बीच रिश्तों की नई शुरुआत माना जा सकता है। शुरुआत इसलिए क्योंकि 7 दशक में यह पहला अवसर है जब भारत का कोई प्रधानमंत्री इजरायल यात्रा पर गया है। इजरायल के साथ संबंधों को लेकर बनाई गई दूरी को पाटने में लगा ये समय बहुत अधिक है। इजरायल हमेशा हमारी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाता रहा लेकिन संकोच की वजह से हमने कभी उस हाथ को थामा ही नहीं। जब हाथ थाम ही लिया है तो रिश्तों को नए आयाम तक भी पहुंचाना चाहिए। खासकर आतंकवाद से मुकाबले में दोनों देश एक-दूसरे को सहयोग कर सकते हैं। भारत की तरह इजरायल भी आतंकवाद का शिकार रहा है। दोनों देश अपने अनुभवों और ताकत का साझा इस्तेमाल करने पर सहमत हो जाएं तो इस चुनौती से निपटा जा सकता है। साथ ही व्यापार और रक्षा सहयोग के क्षेत्र में भी नए रास्ते तलाशे जाने चाहिए। जल संरक्षण के मामले में इजरायल से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। हमसे एक साल बाद आजाद हुए इजरायल की प्रगति गौर करने लायक है। पड़ोसी देशों से लंबे समय तक युद्ध में उलझे रहने के बावजूद इजरायल ने कम समय में बड़ी छंलाग लगाकर दुनिया को चौंकाया है।

  • प्रधानमंत्री का इजरायल में हुआ स्वागत भविष्य की संभावनाओं का संकेत देने के लिए पर्याप्त है। भारत इजरायल से बड़ी मात्रा में हथियार खरीदता है। दोनों देशों के बीच संबंधों की नई शुरुआत विश्व में शांति की स्थापना के साथ-साथ तमाम क्षेत्रों में प्रगति का सूचक बन सकती है। इजरायल के साथ संबंध जोड़ने में हुई देरी का खमियाजा दोनों देशों ने भुगता है। राजनीतिक कारणों ने हमें इजरायल से भले दूर रखा हो लेकिन अब रिश्तों की गर्माहट को सहेजने की भी जरूरत है और संवारने की भी। खासकर तब, जब चीन और पाकिस्तान के साथ हम संबंधों के नाजुक दौर से गुजर रहें हों। भारत हमेशा शांति का पक्षधर रहा है। लेकिन हमारी इस खूबी को कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। आर्थिक क्षेत्र में भी यह दोस्ती व्यापार के बंद दरवाजों को खोलने में सहायक हो सकती है। जल संरक्षण के मामलें में इजरायली तकनीक भारत के काम आ सकती है और यह हमारी प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए। उम्मीद है ‘एनटेब्बे दिवस’ पर शुरू हुई मोदी की यात्रा विकास के नए अध्याय का सबब बनेगी।

महत्व:- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन दिवसीय इजरायल यात्रा भारत की विदेश नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन है और इसी के साथ भारत ने निर्गुट आंदोलन के बचे-खुचे अवशेषों को विसर्जित कर दिया है। हालाकि, फिलिस्तीन प्राधिकरण के प्रवक्ताओं को उम्मीद है कि इस दौरे के बावजूद भारत से उसके पहले जैसे संतुलित संबंध कायम रहेंगे। फिलस्तीनियों के समर्थन की इसी नीति में अरब के मुस्लिम जगत और भारत के इस्लामी समाज के समर्थन का भाव भी छुपा था। लेकिन गुटनिरपेक्ष आंदोलन के बिखरने के साथ इजरायल भारत के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होता गया। औपचारिक तौर पर भले दोनों सरकारें कृषि, पानी आदि क्षेत्र में नए-नए समझौते करें लेकिन, वास्तव में दोनों देशों की चिंता सुरक्षा संबंधी है। यह महज संयोग नहीं हैं कि इजरायल अमेरिका के बाद भारत का सबसे बड़ा रक्षा संबंधी उपकरणों का आपूर्तिकर्ता है बल्कि इसका एक कोण पाकिस्तान और चीन की भारत विरोधी नीतियों से जुड़ता है। इजरायल ने भारत को ड्रोन विमान ही नहीं दिए हैं बल्कि हाल में 630 करोड़ डॉलर (अमरीका आदि देशों की प्रचलित मुद्रा) का बराक मिसाइल सौदा भी किया है। भारत की सुरक्षा नीति को रक्षात्मक से आक्रामक बनाने में भी इजरायली रणनीतिकारों ने परोक्ष मदद की है लेकिन, यह मदद एकतरफा नहीं है। नए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनिश्चित रुख के कारण इजरायल भारत में अमेरिका का विकल्प देख रहा है। भारत ने भी न तो 2014 में गाजा पट्‌टी पर किए ऑपरेशन (कार्रवाही) प्रोटेक्टिव (संरक्षक) एज की निंदा की और न ही पिछले दिनों फिलिस्तीनों राष्ट्रपति मोहम्मद अब्बास की यात्रा को ज्यादा अहमियत दी। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा अगर इन संबंधों को हिन्दूवाद और यहूदीवाद की कट्‌टरता से बचा सके तो यह दोनों देशों लिए ही नहीं पूरे इलाके के लिए अहम है।

भारत और इजरायल:- इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एयरपोर्ट (हवाईअड्‌डा) पर मोदी के स्वागत के लिए मौजूद रहे। यह 70 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला दौरा है। यह यात्रा इस लिहाज से भी अहम है कि इसी साल दोनों देशों के बीच राजनीति संबंधों के 25 साल भी पूरे हो रहे हैं। वहां की मीडिया (संचार माध्यम) लिख रही है कि ′ भारतीय पीएम मोदी की यात्रा इतिहास रचने वाली है। इजराइली कैबिनेट (मंत्रिमंडल) ने भारत- इजराइल के बीच कारोबार में 517 करोड़ रुपए की बढ़ोत्तरी को मंजूरी दी है। इससे भारत चीन को पीछे छोड़ बड़ा व्यापारिक साझेदार बनेगा। इजराइल दौरे में सामरिक क्षेत्रों में सहयोग के अलावा कम पानी में सिंचाई की तकनीक लाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का फोकस (ध्यान) रहेगा। इजराइल के राजदूत डैनियल कार्मन के अनुसार असैन्य मामलों में ये सबसे महत्वपूर्ण है। हाल में किसानों की आत्महत्या के कारण ये समझौता भारत के लिए आवश्यक है।

इजराइल में मौसम की कठिन परिस्थितियों और जल की गंभीर कमी का सामना करना पड़ता है। भारत के प्रति व्यक्ति 1500 क्यूबिक मीटर सालाना जल उपलब्धता के विपरीत इजराइल में प्रति व्यक्ति सालाना जल की उपलब्धता मात्र 200 क्यूबिक मीटर है। इसके बावजूद इजराइल यूरोप समेत अन्य देशों को उच्च गुणवत्ता के लिए कृषि उत्पाद निर्यात करता है।

  • कृषि का इजराइल में 3.3 प्रतिशत योगदान है।
  • निर्यात 18 प्रतिशत कृषि उत्पाद का होता है।
  • 20 प्रतिशत भूमि खेती लायक है

विश्व नई करवटें ले रहा है। अमेरिका और रूस अपनी भूमिकाएं तय कर चुके हैं। चीन इनके बीच बने स्पेस (जगह) में अपनी जगह बना रहा है। ऐसे में एशिया को केंद्र में रखकर देखें तो कहना अतार्किक नहीं होगा कि भारत के लिए चिंता करने का वक्त शुरू हो चुका है। इस हालात में जो देश (इजरायल) यह कहने की ताकत रखता है कि भारत के साथ रक्षा संबंधों में ‘हमे ना तो संकोच है और ना ही शर्मिंदगी।’ ऐसे में उसकी दोस्ती स्वागत योग्य है। भारत ने इजरायल के साथ 1950 से 1992 तक ‘बैंक (अधिकोष) चैनल (आयोजन करना) डिप्लोमेसी (कूटनीति) ’ के माध्यम से अपने संबंध बनाए। 1992 से ‘फ्रंट (सामने का) चैनल (आयोजन करना) डिप्लोमेसी (कूटनीति) ’ से दोनों देशों के रिश्ते आगे बढ़े। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत होगी कि भारत को इजरायल से क्या फायदा होगा या क्या चुनौतियां सामने आएंगी। माना जाता है कि भारत में एनडीए सरकार से पूर्व भारत- इजरायल संबंधों पर बात करना ‘टैबू’ की तरह था। पर वर्तमान समय की बदलती जरूरतों ने इसे अब खारिज कर दिया है। इसका एक कारण तो दोनों देशों में सत्ताधारी दलों (भाजपा एवं लिकुड) की विचारधारा में समानता है। अन्य कारणों के रूप में रक्षा एवं रणनीति है। अगर हम प्रधानमंत्री की इजरायल यात्रा और उसके राजनीतिक-कूटनीतिक परिणामों की बात करें तो। भारत 1950 के दशक से गुटनिरपेक्षता, सह-अस्तित्व और स्वतंत्रताओं का समर्थक रहा है। इन्हीं विशेषताओं के चलते भारत फिलस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देता रहा है। हालांकि अब भी भारत फिलस्तीन को लेकर अपने पुराने रुख को अपनाए हुए हैं। लेकिन प्रधानमंत्री की इजरायल यात्रा के बाद दुनिया शायद उसे बदले हुए नजरिए से देखे।

फिलस्तीन ‘टू नेशन’ (दो कौम) सिद्धांत को मानता है। ‘टू नेशन’ सिद्धांत के अनुसार गाजा पट्‌टी, जेरुसलक और वेस्टबैंक (पश्चिम, अधिकोष) एक साथ मिलकर फिलिस्तीन राष्ट्र होंगे। इजरायल इसे नकारता है। चूंकि कश्मीर मसले पर इजरायल भारत के ‘वन नेशन’ (एक कौम) सिद्धांत का समर्थन करता है इसलिए उसकी अपेक्षा यही होगी कि भारत भी ‘वन नेशन’ का समर्थन करे। यह तो तय है कि भारत जो अब तक इजरायल के साथ संबंधों को सामरिक स्तर पर तो तेजी से आगे बढ़ा रहा था। अब पॉलिटिकल (राजनीतिक) डिप्लोमेसी (कूटनीति) को लकर उसकी संकोच दूर हो चुकी है। यह भारत का चीन-पाकिस्तान और अरब देशों-पाकिस्तान की जुगलबंदी का रणनीतिक जवाब होगा।

अब भारत इजरायल के साथ मिलकर मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) बनाएगा। पीएम नरेन्द्र मोदी के दौरे के दौरान यह अहम समझौता हुआ है। मिसाइल बनाने की योजना के तहत एक संयुक्त कंपनी (संगठन) बनेगी। जो करार हुआ है उसके अनुसार मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) की असेंबलिंग भारत में होगी। इसके अलावा कई करार हुए हैं, 260 करोड़ के भारत- इजरायल इंडस्ट्रियल (उद्योगी) टेक्नोलॉजिकल (तकनीक) इनोवेशन (नवीनता) फंड (मूलधन) के लिए एमओयू, भारत में पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए एमओयू भारत- इजरायल डवलपमेंट (विकास) कॉर्पोरेशन (निगम) एग्रीकल्चर (कृषि) के लिए 3 साल के प्रोग्राम, (कार्यक्रम) इसरो और इजरायल के बीच परमाणु घड़ी के लिए सहयोग पर सहमति आदि शामिल हैं।

भारत और इजरायल को 1947 और 1948 में नौ महीने के अंतराल पर आजादी मिली थी। दोनों को ही आधुनिक राष्ट्र के रूप में जन्म लेते समय विभाजन का दंश झेलना पड़ा था। यहूदी एजेंसी (संस्था) के प्रमुख डेविड बेन-गुरियन द्वारा 14 मई को इजरायल राष्ट्र की स्थापना की घोषणा की गई और उसके साथ ही इजरायल संयुक्त राष्ट्र में शामिल हो गया। अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रमेन ने उसी दिन इस नए राष्ट्र को मान्यता भी दे दी।

अमेरिका ने ब्रिटेन द्वारा 1917 में की गई उस पहल का समर्थन किया था, जिसमें यहूदी राष्ट्र की स्थापना किए जाने का आह्वान किया गया था। इस पहल को बेलफोर घोषणापत्र (ब्रिटेन के तत्कालीन विदेश मंत्री ऑर्थर बेलफोर) के नाम से जाना गया। मई 1948 तक फिलीस्तीन अधिदेश के लिए उत्तरदायी रहे ब्रिटेन के बाद में फिलीस्तीन में यहूदी राष्ट्र और अरब राष्ट्र दोनों की स्थापना का विरोध किया था। अरब और मुस्लिम देश कभी भी अरब भूमि के बीचोबीच यहूदी राष्ट्र के लिए राजी नहीं हुए और उसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

किस्मत और समय का चक्र आज भारत और इजरायल को पहले से ही कहीं ज्यादा करीब ले आया है। इजरायल ने अपनी स्थापना के जटिल इतिहास और उथल-पुथल भरे वर्षो तथा उसके बाद हुए तीन अरब - इजरायली युद्धों को पीछे छोड़ते हुए एक लंबी दूरी तय की है। भारत ने भी इतिहास के बोझ को उतार फेंका है और वोट (मत) बैंक (अधिकोष) के प्रति संवदेनशील भारतीय राजनीति की आशंकाए घटती प्रतीत हो रही हैं, क्योंकि भारत और इजरायल के राष्ट्रीय हित बीते दशकों के दौरान लगातार एक बिन्दु की ओर झुकते रहे हैं। इजरायल के साथ बढ़ते संबंधों ने भारत को सार्वजनिक रूप से फिलीस्तीन को समर्थन देने तथा दोनों पक्षों से बातचीत के जरिए समाधान एवं सुरक्षित सीमाओं पर आधारित शांतिपूर्ण समाधान तलाशने के लिए प्रेरित करने से नहीं रोका। जहां एक ओर यह प्रत्येक भारतीय सरकार की आधिकारिक स्थिति रही है, वहीं इजरायल के साथ सार्वजनिक तौर पर नाता जोड़ने में कोई हिचकिचाहट भी नहीं रही।

इजरायल के राष्ट्रपति रेउवन की पिछले सितंबर की भारत यात्रा, परिपक्व होते भारत- इजरायल संबंधों का प्रतीक है, जो बीतते वर्षों के साथ प्रगाढ़ होते गए। भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने जनवरी 2016 में इजरायल की यात्रा की थी और प्रधानमंत्री मोदी की सरकार के सत्ता में आने के बाद से दोनों देशों के बीच ऐसे उच्च स्तरीय दौरों की संख्या बढ़ी है। व्यापक तौर पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 2017 में, जब दोनों देश अपने कूटनीतिक संबंधों के 25 साल पूरे हो रहे हैं, ऐसे में प्रधानमंत्री इजरायल की ऐतिहासिक प्रथम यात्रा पर जा सकतें हैं।

दूसरी ओर इजरायल ने प्रथम प्रधानमुत्री डेविड बेन गुरियन के दोर से ही अपनी इस धारणा को यथावत रखा है कि भारत और इजरायल आखिरकार करीबी दोस्त होंगे। बेन गुरियन और भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नियमित रूप से पत्र व्यवहार करते रहे। उपनिवेश को आज़ादी प्रदान करने की प्रक्रिया के जोर पकड़ने और एशिया एवं अफ्रिका में नए स्वतंत्र देश के उदय के साथ ही अन्य देश का समर्थन प्राप्त करने के लिए भारत की सहायता महत्वपूर्ण होगी, इसे स्वीकार करते हुए इजरायल को संशय से घिरे भारत को यहूदी देश को मान्यता प्रदान करने के लिए राजी करने में कड़ी मेहनत करनी पड़ी। और तो और इजरायल नेतृत्व ने नेहरू को राजी करने के लिए वैशिक यहूदी समुदाय के सबसे प्रसिद्ध व्यक्तित्व अल्बर्ट आइंस्टीन की भी मदद ली। लेकिन महान वैज्ञानिक आइंस्टीन भी नेहरू को राजी नहीं करा सके जबकि नेहरू जी उनका बेहद आदर करते थे।

इनकी हमें जरूरत:-

  • ड्रिप इरिगेशन, स्वचलित छनना
  • ऑटोमैटिक (स्वचालित) वॉल्वस और कंट्रोलर्स (नियंत्रण)
  • सिंचाई जल ले जाने वाले माध्यम लो डिस्चार्ज स्प्रेयर्स (अतिरिक्त पुरजा) , मिनी (छोटा) स्क्लिंर्स
  • कंपनसेटेड (आपूर्ति की) ड्रिपर्स और स्किंलर्स।
  • फर्टिगेशन (सिंचाई के साथ खाद)
  • अत्यंत घुलनशील और द्रव खाद
  • नियंत्रण के लिए ऑटोमैटिक वॉल्व और कम्प्यूटराइज्ड कंट्रोलर

ड्रोन-इजराइल जल्द ही भारत को 10 हैरॉन टीपी लड़ाकू ड्रोन देने वाला है। रक्षा मंत्रालय ने 2015 में करीब 26 अरब रुपए के इस सौदे को मंजूरी दी थी।

उम्मीद-देश के यहूदी समुदाय को मोदी जी की इजराइल यात्रा से भारत में अल्संख्यक समुदाय का दर्जा मिलने में मदद मिलेगी। भारत में यहूदी करीब 2000 वर्षों से रह रहे हैं।

भारत का तीसरा सबसे बड़ा हथियार सप्लायर (आपूर्तिकर्ता) देश इजरायल है।

इजरायल की मंशा- भारत के सहारे नए दोस्त चाहता है-भारत दुनिया की चौथी बड़ी इकोनॉमी (अर्थशास्त्र) है। उसके अरब-फारस के साथ अच्छे रिश्ते हैं। इजराइल भारत की इस हैसियत का प्रयोग मध्य-पूर्व के साथ एशिया के अन्य देशों के साथ कूटनीतिक सौदेबाजी में कर सकता है। दूसरी तरफ इजरायल भारत के मेक (बनाना) इन (भीतर) इंडिया, डिजिटल (अंकसंबंधी) इंडिया, स्टार्ट-अप (उद्धाटन) इंडिया (भारत) , स्वच्छ गंगा, स्मार्ट सिटी और राष्ट्रीय कृषि बाजार पहल काफी फलदायी हो सकती हैं।

इजरायल मोदी के दौरे से विरोधियों को यह जताना चाहता है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश उसका सबसे अच्छा दोस्त है। इजरायल भारत की दोस्ती का इस्तेमाल मिडिल-ईस्ट (मध्यपूर्वी) व एशिया के अन्य देशों के साथ डिप्लोमेसी (कूटनीति) में भी कर सकता है। ताकि दुनिया में उसकी स्वीकार्यता बढ़े।

सिस्टम (प्रबंध) :-इजरायल ने भारत को मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) , एंटी (के विरोधी) मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) सिस्टम (प्रबंध) , यूएवी, इलेक्ट्रॉनिक (विद्युत) वारफेयर सिस्टम, जैसी अहम तकनीकी दी है। इजरायल भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। इजरायल ने चीन को अवाक्स सिस्टम बेचने से इनकर कर दिया। पर उसने भारत को यह सिस्टम दिया।

रक्षा सौदा:- मोदी ने रक्षा सौंदो में अमेरिका और रूस की जगह इजरायल को दी तरजीह-

  • मोदी ने 965 करोड़ में इजरायली एयरोस्पेस (अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी) उद्योग की बराक-एंटी (के विरोधी) मिसाइल डिफेंस सिस्टम (प्रक्षेपास्त्र रक्षा व्यवस्था) खरीदने के सौदे को मंजूरी दी। पिछली यूपीए सरकार इस समझौते से पीछे हट गई थी।
  • भारत ने 8,356 स्पाइक (भेदना) एंटी (के विरोधी) टैंक (टंकी) गाइडेड (नियंत्रित) मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) (एटीजीएम) और 321 लांचरों को 52.5 करोड़ डॉलर (अमरीका आदि देशों की प्रचलित मुद्रा) में खरीदने का फैसला लिया। भारत ने इजरायली उपकरणों को अमेरिकी जेवेलिन मिसाइल पर तरजीह दी।
  • भारत इजरायल से 2680 करोड़ रुपए की 10 हेरॉन यूएवी भी खरीद रहा है। पाकिस्तान सीमा पर बाड़ लगाने से संबंधित तकनीक का भी भारत, इजरायल से आयात कर रहा है।
  • रूस और अमेरिका के बाद इजरायल हमारा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश हैं। इजरायल सबसे ज्यादा हथियार भारत को बेचता है। कुल निर्यात का 40 प्रतिशत। बीते तीन सालों में दोनों देशों के बीच 26 हजार करोड़ रुपए के रक्षा समझौते हुए हैं।

रिश्ते:-42 साल लग गए दोनों देशों के बीच राजनीतिक रिश्ते बनने में-

14 मई 1948 इजरायल अस्तित्व में आया।

  • 1950-भारत ने इजरायल को 1950 मं मान्यता दी। पर कूटनीतिक संबंध 1992 में बने। क्योंकि भारत इजरायल के धुरविरोधी फिलिस्तीन का समर्थन करता था। गोल्डा मायर इजराइल की पहली महिला पीएम थी।
  • 1962-चीन से युद्ध पर इजरायल ने भारत को मोर्टार, मोर्टार रोधी उपकरण दिए थे। 1965,71 और करगिल युद्ध में इजरायल ने भारत को सैन्य साजो सामान उपलब्ध कराए।
  • 1977-मोरारजी देसाई सरकार ने इजरायल से बेहतर संचार शुरू किया। उस समय इजरायल के रक्षा मंत्री कई सीक्रेट (गुप्त) ट्रिप (सक्रिय करना) पर भारत आए।
  • 1985-यूएन असेंबली (सभा) से इतर तत्कालीन पीएम राजीव गांधी, इजरायली समकक्ष सिमोन पेरेस से मिले। यह दोनों के प्रमुखों की पहली सार्वजनिक मुलाकात थी।
  • 1992 प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने दोनों देशों के बीच चली आ रही झिझक को खत्म करते हुए इजरायल के साथ पूर्ण राजनीति संबंध शुरू किए। भारत-इजरायल के बीच 20 करोड़ डॉलर व्यापार था।
  • 1999- के करगिल युद्ध के संकट के समय भारत के अनुरोध पर इजरायल की त्वरित प्रतिक्रिया ने उसे भारत के लिए भरोसेमंद हथियार आपूर्ति करने वाले देश के तौर पर स्थापित किया और इससे दोनों देशों के रिश्ते काफी मजबूत हुए। भारत और इजरायल के बीच तेजी से बढ़ रहे सामरिक संबंधों पर बात करना अब प्रतिबंधात्मक नहीं रहा।
  • 2003-पहली बार भारतीय विदेश मंत्री जसवंत सिंह इजरायल गए।
  • 2005 में भारतीय स्टेट (राज्य) बैंक (अधिकोष) ने इजरायल में अपनी पहली ब्रांच (शाखा) शुरू की।
  • 2000 - 2012 के दौरान 56 करोड़ डॉलर की एफडीआई आई भारत में इजराइल से।
  • वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद भारत और इजरायल के संबंध नए स्तर तक पहुंच गए। दोनों देशों में दक्षिणपंथी पार्टियों, यहां भाजपा और इजरायल में लिकुड़ की सरकारें हैं। दोनों में विचारधारा के स्तर पर कई समानाताएं हैं। इसने दोनों देशों के आपसी संबंधों को विस्तार दिया है। अब दोनों देशों के नेता मौजूदा रिश्तों की मजबूती के बारे में बात करने में झेंपते नहीं हैं। इजरायल राजदूत डेनियल कारमौन ने दोनों देशों के बीच सैन्य समझौते के बारे में कहा था हमें न तो संकोच है और न ही हम शर्मिंदा हैं।
  • 2015 में प्रणब मुखर्जी इजरायल जाने वाले देश के पहले राष्ट्रपति बने।
  • दोनों देशों के बीच 2007 - 2017 के दौरान 52 प्रतिशत व्यापार बढ़ा हैं।
  • 2007 - 2017 के दौरान 43 प्रतिशत निर्यात में इजाफा हुआ है भारत से इजराइल को।
  • भारत ने 3.6 अरब डॉलर का निर्यात इजराइल को 2016 - 2017 में किया।
  • इजराइल 1.39 अरब डॉलर का निर्यात भारत को 2016 - 2017 में किया।
  • 300 इजराइली कंपनियां भारत में कार्यरत हैं।
  • भारत में हर साल 38 हजार इजराइली टूरिस्ट आते है।
  • 40 हजार भारतीय टूरिस्ट गए इजराइल।

अनूठा मुकाम:-

  • संघर्ष-यहूदियों के लिए है ‘प्रॉमिस्ड लैंड’ … (वादा जमीन) प्रथम विश्वयुद्ध में फलिस्तीन पर तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य का कब्जा था। ब्रिटिश सेना ने ऑटोमन को हरा कर फलिस्तीन पर कब्जा जमाया। दव्तीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र ने स्वतंत्र इजरायइल और फलिस्तीन के गठन को मंजूरी दे दी। वैसे यहूदी लोग इजराइल को प्रॉमिस्ड लैड मानते हैं। उनके धर्म ग्रंथों में इस क्षेत्र का उल्लेख है।
  • संबंध- इजराइल से बाहर रहकर भी जुड़ाव … दिलचस्प तथ्य है कि वर्तमान में दुनिया भर में एक करोड़ 44 लाख यहूदी है। हर यहूदी का मानना है कि इजराइल उसके लिए पवित्र भूमि है। लेकिन वर्तमान में लगभग 75 से 80 लाख यहूदी ही रहते हैं। शेष यहूदियों का इजराइल से अब भी संबंध बना हुआ है। दुनिया भर में इजराइल के बाद सबसे ज्यादा यहूदी अमरीका में रहते हैं। यूरोप के कई देशों जैसे रूस, हंगेरी, पोलैंड वगैरह में यहूदियों की खासी आबादी रहती है। यहूदियों ने इसके लिए बकायदा फोरम (मंच) भी बनाए गए है। जिससे ये आपस में जुड़ाव रखते हैं।
  • हिटलर-जुल्म-हिटलर का कुख्यात ‘होलोकास्ट’ … जर्मन तानाशाह हिटलर ने दव्तीय विश्वयुद्ध के दौरान यहूदियों पर जानलेवा कहर बरपाया। इसे ‘होलोकास्ट’ कहा जाता है। आंकड़ों के अनुसार 60 लाख यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया गया। इनमें से 15 लाख बच्चे थे। हिटलर ने 42 हजार से ज्यादा यातना गृह बनाए थे। इनमें गैस चैंबर (सभा) उस दौर में काफी कुख्यात हुए थे।
  • नोबेल-विजेताओं में हैं 22 फीसदी यहूदी … दुनिया भर में मात्र 0.2 फीसदी ही यहूदी हैं, लेकिन आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि नोबेल पुरस्कार विजेताओं में से 22 फीसदी यहूदी हैं। दुनिया भर के विभिन्न देशों में बसे यहूदियों का विज्ञान के प्रति विशेष रुझान होता है। महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन भी यहूदी थे। इसके साथ ही महान विचारक कार्ल मार्क्स, माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग भी यहूदी हैं। यहूदियों में अन्वेषण की गजब की क्षमता होती है। समाजशास्त्रियों का कहना है कि यहूदी पारिवारिक वातावरण से बच्चों में प्रतिभा का विकास होता है।
  • जतन-समुद्र के खारे पानी को बनाया मीठा … इजराइल दुनिया के सबसे शुष्क क्षेत्र में स्थित है। लेकिन इजराइल दुनिया का एकमात्र देश हैं जहां अकाल नहीं पड़ता है। इसका कारण है कि यहां पानी की 70 फीसदी जरूरत को समुद्र के पानी से पूरा किया जाता है। इजराइल भर में पानी को मीठा करने के संयंत्र हैं। इजराइल ने तकनीक से पानी के लिए बारिश पर निर्भरता को खत्म कर दिया है।
  • खुफिया तंत्र-मोसाद, जो दुश्मन को जिंदा नहीं छोड़ती-

मोसाद, अमेरिका और ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी (संस्था) से तेज और खतरनाक है। यही वजह है वहां आतंकी हमले नहीं होते।

आतंकियों ने 1972 के म्यूनिख ओलिपिंक में उसके 12 खिलाड़ियों की हत्या कर दी थी।

मोसाद ने अगले 20 साल तक साजिश में शामिल एक-एक व्यक्ति को ढूंढकर मारा और अपने खिलाड़ियों की मौत का बदला लिया।

मोसाद- दुश्मन के लिए दुनिया भी छोटी … इजराइली गुप्तचर एजेंसी (संस्था) मोसाद के बारे में कहा जाता है कि मोसाद की पहुंच हर उस जगह तक है जहां इजराइल अथवा इजराइल के नागरिकों के खिलाफ कोई साजिश रची जा रही हो। मोसाद का मुख्यालय तेल अवीब शहर में है। कहते हैं मोसाद का मतलब मौत, एक बार जो दुश्मन उसके हत्थे चढ़ गया उसका बचना नामुकिन है। मोसाद के खूंखार एजेंट उसे दुनिया भर में कहीं भी खोज कर मौत के घाट उतार देते हैं। वर्ष 1972 के म्यूनिख ओलपिंग में बंधक बनाए इजराइली खिलाड़ियों को भी मोसाद ने छुड़ाया था। ब्लैक सैप्टेम्बर के आतंकियों को भी चुन-चुन कर मारा था।

बॉलीवुड का भी यहूदी कनेक्शन (संयोजन) : - भारत में यहूदी धर्म को मानने वाले लगभग 6 हजार लोग रहते है। भारतीय यहूदियों का बॉलीवूड से भी कनेक्शन रहा है। मुंबई फिल्म उद्योग के शुरूआती दौर में यहूदियों ने अहम किरदार निभाए थे।

  • नादिरा-मशहूर फिल्म जैसे श्री 420 पाकीजा और जूली में अपने अभिनय का जलवा बिखेरने वाली नादिरा का पूरा नाम फ्लोरेंस इज्केहल नादिरा था। बगदादी यहूदी परिवार की नादिरा को फिल्म जूली के लिए बेस्ट (सर्वोत्तम) सपोंटग (सहायक) एक्ट्रेस (अभिनेत्री) का फिल्मफेयर अवार्ड (पुरस्कार) भी मिला था। नादिरा रॉल्स-रॉयस रखने वाली बॉलीवुड की पहली अदाकारा थी।
  • डेविड-बॉलीवुड फिल्मों के मशहूर करेक्टर (चरित्र) आर्टिस्ट (कलाकार) डेविड अब्राहम चियुल्कर मराठी भाषी बने इजराइली समुदाय के थे। फिल्म बूट पॉलिश के जॉन चाचा के किरदार से वे काफी मशहूर हुए। वर्ष 1969 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। डेविड की चर्चित फिल्मों में गोलमाल (1979) व बातों-बातों में (1979) भी थीं।
  • सुलोचना-बगदादी यहूदी परिवार की सुलोचना का असली नाम रूबी मायर्स था। मूक फिल्मों की मशहूर नायिका सुलोचना की पहली फिल्म वर्ष 1926 की सिनेमा क्वीन (रानी) थी। इसके बाद उन्होंने टाइपिस्ट गर्ल, बाज, नीलकमल, आम्रपाली और जूली में भी अभिनय किया। उन्हें प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के अवार्ड (पुरस्कार) से भी नवाजा गया।

विचार:-

भारत-इजराइल संबंधों में गत 25 वर्षो से जो निरंतरता बनी हुई थी वो अब और मजबूत हो रही है। इसका दोनों को फायदा मिलेगा।

कमर आगा, मध्य-पूर्व एशिया और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इजराइल यात्रा दोनों देशों के संबंधों में महत्वपूर्ण पड़ाव है। भारत-इजराइयल संबंधों पिछले 25 वर्षो से निरंतरता बनी हुई थी जिसे मोदी ने अब चरम पर पहुंचाया है। मोदी की पार्टी भाजपा इजराइल समर्थक एवं भारत- इजराइल के मजबूत संबंधों की हिमायती रही है। इजराइल के साथ भारत के मजबूत संबंध जहां अमरीका और पश्चिमी देशों को पसंद हैं वहीं मध्य-पूर्व एवं खाड़ी देशों को यह थोड़े अखर सकते हैं। पर भारत ने खाड़ी के लगभग देशों से अपने संबंध मजबूत किए हैं। इसलिए इनके ज्यादा एतराज की संभावना नहीं है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के शासकों ने भारत की यात्रा की। किसी सऊदी शासक ने 51 साल बाद भारत की यात्रा की है। भारतीय प्रधानमंत्री भी कई खाड़ी देशों की यात्रा कर आपसी संबंधों को मजबूत बनाने का प्रयास किया है। वैश्वीकरण के दौर में अब व्यापार महत्वपूर्ण हो गया है। मध्य-पूर्व के देशों से भारत का व्यापार बढ़ रहा है। इसलिए भारत- इजराइल के संबंधों का असर अरब देशों के साथ नहीं पड़ेगा। टैक्नोलॉजी (तकनीक) की दृष्टि से इजराइल भारत के लिए महत्वपूर्ण देश है। इजराइल आधुनिक तकनीक विकसित करने में भारत की मदद कर सकता है।

भारत, अमरीका, रूस, फ्रांस के बाद सबसे ज्यादा हथियार इजराइल से खरीदता है वहीं इजराइल से निर्यात होने वाले हथियारों में से 40 फीसदी हिस्सा भारत का है। दोनों देशों के बीच अभी 5 अरब डॉलर (मुद्रा) का व्यापार है जिसे पांच साल में 20 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। दोनों के बेहतर संबंधों से तात्कालिक फायदा भारत और इजराइल दोनों को मिलेगा, लेकिन दीर्घकाल मेें भारत लाभ में रह सकता है। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत हथियार भारत में बनने से लोगों को रोजगार मिलेगा, साथ ही भारत को तकनीक मिल पाएगी। इजराइल के चीन से अच्छे संबंध हैं पर अच्छी तकनीक उसे भी हस्तांतरित नहीं करता है। इसका एक मुख्य कारण ऐसी तकनीक का या तो अमरीका के सहयोग से विकसित होना या अमरीकी कंपोनेट (आंशिक) लगे होना है। इसकी वजह से अमरीका, चीन को यह तकनीक नहीं देने देता है। भारत को तकनीक के हस्तांतरण पर अमरीका को चीन की अपेक्षा ऐतराज कम रहता है। हालांकि, चीन के साथ इजराइल का व्यापार भारत से भी अधिक है। यह आंकड़ा करीब 10 अरब डॉलर के करीब है। भारत को नई तकनीक मिलने से चीन को बैलेंस (संतुलन) करने मदद मिलेगी। भारत की रक्षा तैयारियां चीन को ज्यादा ध्यान में रखकर की जाती हैं बजाए कि पाकिस्तान के।

संबंधों में आ रही प्रगाढ़ता दोनों देशों के लिए फायदेमंद तो है पर भारत को यह ध्यान रखना होगा कि इससे पुराने मित्र देश नाराज न हों।

सलमान हैदर, पूर्व विदेश सचिव

  • भारत- इजराइल के संबंध की शुरुआत के समय दोनों देशों में काफी दुरियां थी। भारत, फिलिस्तीन और इजराइल के मामलें में दव्-राष्ट्र के सिद्धांत को मानता रहा है। भारत का मानना रहा है कि अरब राष्ट्र के रूप में फिलिस्तीन और यहूदी राष्ट्र के रूप में इजराइल का अस्तित्व बना रहे। हमरा रुझान ज्यादातर फलिस्तीन की तरफ ही रहा। इसका एक बड़ा कारण अरब देश थे। साथ ही भारत की मुस्लिम आबादी। अरब देशों के इजराइल से संबंध खराब थे और भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अरब देशों पर निर्भर था। इसके साथ ही अरब देशों में भारतीय कामगारों की बड़ी संख्या में रही है। इससे इजराइल को लगता था कि फलिस्तीन को लेकर हमारे विचार अच्छे नहीं हे। धीरे-धीरे बदलते समय के साथ कई अरब देशो ंसे इजराइल के भी संबंध सामान्य होकर मजबूती की ओर बढ़े हैं तो प्रधानमंत्री के दौरे के लिए इजराइल ने इतनी गंभीरता दिखाई है। भारत को इजराइल के साथ संबंधों पर गौर करते हुए आगे बढ़ना होगा। इस बात का ध्यान रखना होगा कि कहीं इससे भारत के पुराने मित्र देश नाराज ना हो जाएं। जहां तक भारत की गुटनिरेपेक्षता की नीति की बात है तो भारत ने इसे त्यागा नहीं है। गुटनिरपेक्षता से मतलब है किसी संगठन या गुट में शामिल नहीं हो हुए अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता बनाए रखना है।
  • भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है। हमने अपनी विदेश नीति में एक देश के प्रति बदलाव किया है। इसका यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि गुटनिरेपेक्षता की नीति का त्याग कर दिया है। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव आया और अमरीका एक मात्र महाशक्ति बन गया। इससे गुटनिरपेक्ष आंदोलन भी कमजोर पड़ गया। अब यह ज्यादा प्रभावी नहीं रहा है। जहां तक दोनो देशों के संबंधों से फायदे नुकसान की बात है तो आर्थिक दृष्टि से तो दोनों देश लगभग बराबर रूप से फायदे में रहेंगे क्योंकि आर्थिक संबंध तभी बनते हैं जब दोनों देशों को फायदा नजर आए। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो हमें अमरीका- इजराइल की दोस्ती का लाभ मिल सकता है लेकिन अरब देशों को ध्यान में रखते हुए इस पर संभल कर चलना पड़ेगा। भारत- इजराइल के मजबूत होते संबंधों पर पाकिस्तान यह अरब देशों को यह दिखाने की कोशिश करेगा कि दोनों देश एक हो रहे हैं और इजराइल के साथ-साथ भारत को भी दुश्मन देश के रूप पेश करेगा। पर इसमें उसे खास सफलता मिलना मुश्किल है क्योंकि अब कई अरब देशों के इजराइल से संबंध सामान्य बने हुए हैं।

भारत दो राष्ट्र के सिद्धांत पर विश्वास करता है और चाहता है कि इजराइल और फिलिस्तीन साथ-साथ रहें। दूतावास तेल अवीव में ही रहेगा।

नरेन्द्र मोदी

भारतीय पीएम की यह ऐतिहासिक यात्रा है। 70 साल में अभी तक भारत का कोई पीएम इजराइल नहीं आया है। इस यात्रा से दोनों देशों के सैन्य आर्थिक और कूटनीति रिश्ते मजबूत होंगे। दोनों देशों के संबंध नई ऊंचाई पर पहुंचेगे।

बेंजामिन नेतन्याहू, इजरायली पीएम

इजराइल का नाम लेते ही सैन्य टेक्नोलॉजी (तकनीकी) से जुड़े मुद्दे उठ जाते हैं, जिसका बाद में काफी जिक्र होगा। विविध क्षेत्रों में खुद को बनाए रखने के लिए इनोवेशन करने और उसे बहुत आगे तक ले जाने की क्षमता इजरायल की बहुत बड़ी ताकत है, जिससे भारत को सीखने की आवश्यकता है। भारत पेट्रोलियम पदार्थों के लिए अरब देशों पर अत्यधिक निर्भर था। ऐसे में वह इन देशों से गहरे रिश्तों के बगैर अपना काम नहीं चला सकता था। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की इस बड़ी घटना के लिए तीन साल की तैयारी लगी। खाड़ी क्षेत्र में 80 लाख भारतीयों, देश की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव और व्यापार संबंधों को ध्यान में रखकर उन्होंने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और ईरान जैसे महत्वपूर्ण इस्लामी देशों की और वहां के प्रतिनिधमंडलों की मेजबानी कर रिश्ते और मजबूत किए। इस तरह उन्होंने सुनिश्चित किया कि इजरायल की तरफ महत्वपूर्ण पहल मध्यपूर्व के रणनीतिक रूप से तेजी से बदलते माहौल में संबंधों के आड़े नहीं आएगी। इजरायल भारत के सैन्य सामग्री बाजार में अपनी 7.9 फीसदी हिस्सेदारी को काफी अधिक बढ़ाना चाहेगा। भारत के रूप में उसे ऐसा भागीदार मिला है, जिसके सुरक्षा परिदृश्य में उसी की तरह के खतरे हैं और वह ऐसा देश है जिसे तकनीक बहुत जरूरत है।

  • सैन्य सामग्री में सबसे ऊपर हाल ही में हुआ हेरॉन प्रगत सैन्य ड्रोन विमानों का 45 करोड़ डॉलर (मुद्रा) का सौदा है। यह ‘नो वॉर, नो पीस’ (युद्ध नहीं, कोई शांति नहीं)
  • जैसे हालात में नियंत्रण रेखा के पार हमले की क्षमता को अच्छा-खासा बढ़ा देगा। इसे प्रतिदव्ंदव्ी के क्षेत्र में उससे अधिक गहराई तक वार किया जा सकेगा, जो स्पेशल (विशेष) फोर्सेस (सेना) सर्जिकल (शल्य) स्ट्राइक (हड़ताल/धरना) के दौरान पैदल कर सकते हैं। जिसका बहुत समय से इंतजार है वह है बराक 8 सतह से हवा में मार करने वाला मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) सिस्टम (प्रबंध) जो भारतीय वायु रक्षा को मजबूती देगा जिसमें मोटेतौर पर इस क्षमता का अभाव है। साइबर सुरक्षा, खुफिया जानकारी हासिल करने की क्षमता और आतंकवाद विरोधी अभियानों में इजरायल की विशेषज्ञता बेमिसाल है। टैंक विरोधी नाग मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) के विकास में बार-बार मिल रही नाकामी को देखते हुए स्पाइक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) लॉन्चर (प्रक्षेपण) और भारतीय इन्फेन्ट्री (पैदल सेना) इकाइयों के लिए मिसाइलें वरदान सिद्ध होंगी। इस क्षेत्र में अंतिम बात है सीमा प्रबंधन के लिए विद्युत दिवार। भारत सीमा प्रबंधन को बहुत ऊंचे स्तर पर ले जाना चाहता है और लेबनानी सीमा पर इजरायली तैनाती और रिस्पॉन्स (जिम्मेदार) सिस्टम (प्रबंध) इसके लिए श्रेष्ठतम मॉडल (आदर्श) है।

भारत की विदेश नीति में इस नए मोड़ को कई देश रूचि से देख रहे हैं। और यह अच्छी बात है कि रणनीतिक रूप से भारत की जो स्वतंत्रता यहां दिखाई दी है वह भविष्य में भारतीय नीति का अंग होगी। इजरायल में हुई हाईप्रोफाइल (प्रखर वर्णन) घटनाओं का प्रसारण और भारतीय चैनलों (मार्ग) पर उसका बारीकी से विशेलषण निरर्थक सिद्ध नहीं होगा।

सैयद अता हसनैन

लेफ्टि. जन (सेवानिर्वृत) , कश्मीर में सेना की 15वीं कोर के पूर्व कमांडर (सेनाध्यक्ष)

इजरायल होने के मायने:- अपने से 11 गुना सैनिक वाले 13 देशों को हराकर बना इजरायल, 6 दिन में जीत ली थी जंग। इजरायल 13 मुस्लिम दुश्मन देशों से घिरा हुआ है। ये हैं मिस्र, सीरिया, , जॉर्डन, लेबनान, इराक, अल्जीरिया, कुवैत, लीबिया, मोरक्को, सऊदी अरब, फिलिस्तीन, सूडान और ट्‌यूनीशिया। छह लाख की सेना वाले इन देशों के मुकाबले इजरायल के पास 50 हजार सैनिक हैं। लेकिन उसने 1967 की जंग को 6 दिनों में जीत लिया। इजरायल पर रोज औसतन 13 रॉकेट (अग्नि बाण) दागे जाते हैं, जिनमें से ज्यादातर को वो हवा में ही नष्ट कर देता है। इजरायल का क्षेत्रफल 20,770 वर्ग किमी है, जो मिजोरम से भी कम है। दुश्मनों से घिरे होने के बावजूद इजरायल रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर टेक्नोलॉजी (तकनीकी) तक में कई देशों से आगे है। 83 लाख की आबादी क्षेत्रफल में मिजोरम से भी छोटा है ये यहूदी देश।

रक्षा:-बैलिस्टिक (प्रक्षेप) मिसाइल सिस्टम (प्रक्षेपास्त्र प्रबंध) से लैस है पूरा देश-

  • इजरायल का रक्षा बजट 1.15 लाख करोड़ हैं, जो उसकी जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 5.8 प्रतिशत है। जबकि भारत का रक्षा बजट 3.63 लाख करोड़ हैं, जो जीडीपी का 2.5 प्रतिशत है।
  • इजरायल की एयरफोर्स (वायु सेना) अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथे नंबर पर है।
  • इजरायल दुनिया का इकलौता देश हैं जो एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम से लैस है।

तकनीक:- एंटी (के विरोधी) वायरस (विषाणु) से सैटेलाइट (उपग्रह) सिस्टम (प्रबंध) तक में आगे-

  • इजरायल उन 9 देशों के क्लब (मंडल) में हैं, जिनका अपना सैटेलाइट सिस्टम (उपग्रह व्यवस्था) है। वो इसे किसी के साथ शेयर नहीं करता।
  • अमेरिका की सिलिकॉन वैली के बाद सबसे ज्यादा 3500 तकनीक कंपनियां (संगठन) यहीं हैं।
  • इजरायल में पहला मोबाइल फोन मोटोरोला बना। पहला एंटी (के विरोधी) वायरस (विषाणु) और पहली वॉइस मेल (स्वर का मेल) तकनीक भी इजरायल ने विकसित की।

समझौते:- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इजरायल दौरे पर पूरी दुनिया की नजरें है। इजरायली प्रधानमंत्री ने इस दौरे को ऐतिहासिक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा, स्पेस (अंतरिक्ष) तकनीकी, एग्रीकल्चर, पानी, इनोवेशन (नवाचार) और साइबर सिक्योरिटी (सुरक्षा) को लेकर कई अहम समझौते हो सकते हैं। इजरायल मीडिया (संचार माध्यम) के मुताबिक भारत और इजरायल के बीच 13 हजार करोड़ रुपए के रक्षा समझौतों पर मुहर लगने की संभावना है। इसमें एंटी (के विरोधी) टैंक (टंकी) मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) स्पाइक और एयर (वायु) डिफेंस (रक्षा) मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) बराक-8 की खरीद शामिल है। समझौते पर हस्ताक्षर होने के दो साल में इजरायल भारत को आठ स्पाइक मिसाइलें देगा। यह सौदा 3237 करोड़ रुपए का होगा। हाल ही में भारत ने इजरायल से जमीन से हवा में मार करने वाली बराक मिसाइले खरीदने के लिए दो बिलियन डॉलर (मुद्रा) का समझौता किया है।

  • इजरायल के 10 हेरोन टीपी ड्रोन को लेकर 2590 करोड़ रुपए की अहम डील (समझौता) होने वाली है। मोदी के इस दौरे से इजरायल की कंपनियों (संगठन) के लिए भारत में निवेश के बेहतर मौके बनेंगे। इसके अलावा जल प्रबंधन में भी इजरायल दुनिया के अग्रणी देशों में से एक है। उसने खारे पानी को मीठा पानी बनाने की तकनीक विकसित की है। जिसका फायदा भारत उठा सकता है। पीएम की इस यात्रा के दौरान भारत और इजरायल जल और सामरिक साझेदार बनेंगे।
  • गंगा के एक खंड की सफाई को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और इजरायल में समझौता हो सकता है। उच्च तकनीकी, जल, प्रबंधन, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, सैन्य सहयोग, स्मार्ट सिटी (आकर्षक शहर) , शोध से जुड़े समझौते हो सकते हैं। वहीं उद्योग शोध और विकास के लिए 40 मिलियन (दस लाख) अमेरिकी डॉलर (मुद्रा) का एक कोष बन सकता है। इसके अलावा मोदी मेक इन इंडिया के तहत इजरायली कारोबारी को भारत निवेश के लिए आमंत्रित करेंगे।

सात करार:-गंगा की सफाई से अंतरिक्ष तक की मदद-

  1. भारत-इजराइल में इंडिस्ट्रियल (उद्योगी) और एंड डी और तकनीकी इनोवेशन फंड। यह फंड (मूलधन) 26 अरब का होगा।
  2. जल संरक्षण
  3. कषि
  4. स्टेट (राज्य) वाटर (पानी) यूटिलिटी (व्यावहारिक) रिफॉर्म (सुधारना)
  5. परमाणु घड़ियां
  6. अंतरिक्ष क्षेत्र
  7. जीईओ-एलईओ ऑप्टिकल (दृष्ि-संबंधी) लिंक (संपर्क) में कोऑपरेशन (निगम) ।

कूटनीतिक-नेतन्याहू इन कोशिशों के जरिए अपने देश की जनता को बताना चाहते हैं कि उनके नेतृत्व में देश मजबूत हो रहा है। उसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। चीन और भारत जैसे देश यहां तक कि अरब मुल्कों तक भी उनकी पहुंच बन रही हैं।

  • टूटी परंपरा, फिलीस्तीन नहीं जाएंगे मोदी-इजरायल की यात्रा से ठीक पहले और बाद में मोदी फिलीस्तीन नहीं जाएंगे। यह कदम भारत की पूर्व अपनाई गई नीति से उलट है। इससे पहले यह परंपरा थी भारतीय राजनेता संतुलन बनाए रखने के लिए दोनों मुल्कों का दौरा करते थे। यह भारत का इजरायल के साथ अपने रिश्तों को खुलेआम स्वीकार करना जैसा है। यानी दोनों ही देश एक-दूसरे के हितों को इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) मंच पर रखेंगे बात।

कारोबार-दोनों देशों के बीच रक्षा सौदों के अलावा आईटी, कृषि जैसे क्षेत्रों पर अहम समझौते हुए हैं। दोनों देश निशुल्क व्यापारिक पर आगे बढ़ रहे हैं। इससे मेक इन इंडिया को फायदा मिलेगा। भारत, इजरायल से सिंचाई प्रौद्योगिकी हासिल करने की कोशिश कर रहा है। जल संकट से बचाया जा सकता है। आज भारत इजरायल का 10 वां सबसे बड़ा कारोबार साझेदार है। एशियाई देशों का तीसरा सबसे बड़ा कारोबार साझेदार है। भारत का तीसरा सबसे बड़ा हथियार सप्लायर (आपूर्तिकर्ता) देश इजरायल है। 25 साल 1295 करोड़ रुपए से बढ़कर कारोबार 32 हजार करोड़ रुपए हो गया है। इजरायल के आर्थिक मंत्री कोहेन के मुताबिक भारत में 1.3 अरब उपभोक्ता हैं। 30 करोड़ उच्च और मध्यम क्लास (कक्षा) के हैं, जिनकी परचेसिंग (क्रय) पावर (शक्ति) पश्चिमी देशों जैसी है।

नवाचार:- भारत में तकनीक विकास पर चर्चा होते ही लोग चीन का उदाहरण देते हैं। जबकि नवाचार में भारत को इजराइल से सीखने की जरूरत है। सिलिकॉन वैली के बाद तेल अवीव दुनिया का सबसे बड़ा स्टार्टअप (उद्धाटन) हब है। वहां नवाचार पहली शर्त है। स्टार्टअप सफलता दर भारत से कई गुना ज्यादा है।

  • इजराइल भारत के लिए एक मॉडल (आदर्श) इसलिए नहीं है कि वहां पर बड़े पैमाने पर मानव संसाधनों की उपलब्ध्ता है। अगर ऐसा होता तो चीन और भारत दुनयाि को लीड (नेतृत्व) करने की स्थिति में होते। इजराइल की आबादी मुश्किल से 86 लाख है, जबकि चीन की 1.38 अरब, भारत की 1.28 अरब व अमरीका की 32.5 करोड़ है। वहां स्टार्टअप की संख्या तकरीबन 4,000 है, जबकि अमरीका में 83,000 चीन में 10,000 और भारत में भी 10,000 है। कम स्टार्टअप के बावजूद वहां औसत सफलता दर दूसरों की तुलना में ज्यादा है। यही वजह है कि अब अमरीका और चीन नवाचार के मामले में तेल अवीव की तरफ देखने लगे हैं।

क्या है खासियत इजराइल के नवाचार उद्यमियों की-

  • ईकोसिस्टम-सिलिकॉन वैली के बाहर तेल अवीव स्टार्टअप हब का नायाब उदाहरण है। यहां पर युवा उद्यमी नवीनता को बेस (आधार) बनाकर ही काम शुरू करते हैं। वहां की सरकार, कॉरपोरेटर्स (पार्षदों) , इजराइली डिफेंस (सुरक्षा) , वेंचर (उद्यम) कैपिटल (राजधानी) फर्म्स (व्यवसाय-संघ) सहयोगी की भूमिका निभाते हैं। इंडिया (भारत) स्टार्टअप प्लान (योजना) में ये सभी बातें शामिल हैं, पर धरातल पर युवाओं को हर काम अपने स्तर पर ही करना होता है। सहयोग हासिल करने के लिए कारोबारी विभागीय नियमों में ही उलझे रहते हैं।
  • सरकार का सहयोग- इजराइल की सरकार ने 1974 में ही कार्यालय ऑफ (के) चीफ (मुखिय) साइंटिस्ट (वैज्ञानिक) (ओसीएस) का गठन किया था। सरकार 25 इनक्यूबेटर (अंडे सेन की मशीन) प्रोगाम (कार्यक्रम) चलाती है। हैवी डोमेन, क्लीन (साफ) टेक और मेडिकल डिवाइसेज (चिकित्सा उपकरण) के लिए हर साल सात लाख यूएस डॉलर (फ्रांस आदि की प्रचलित मुद्रा) का अनुदान दिया जाता है। पिछले साल स्टार्टअप को 30 मिलियन (दस लाख) डॉलर से ज्यादा का ग्रांट (अनुदान) जारी किया गया था।
  • स्टार्टअप (उद्धाटन) कल्चर (संस्कृति) -तेल अवीव में हर जगह स्टार्टअप हब कल्चर का नजारा दिखता है। भारत में बैंगलुरू उसी राह पर है, लेकिन उसका प्रभाव आम जनजीवन में दिखाई नहीं देता। वहां साइबर सिक्योरिटी (सुरक्षा) , एडटेक, एआई, मेडिकल डिवाइसेज और सास बेस्ड टेक जैसी विधाओं पर जोर दिया जाता है।

विफलता- वहां के उद्यमी विफलता से घबराते नहीं, बल्कि उसे सेलिब्रेट करते हैं। ताकि आगे बढ़ने की राह और आसान हो सके। जबकि भारत में विफलता मिलते ही कारोबार वाइंडअप कर लेते हैं।

मिश्रित राष्ट्र:- जहां फिलीस्तीन अरब और यहूदी जनता धर्मनिरपेक्ष देश में साथ-साथ रहे-के पक्ष में दलील देते हुए भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिलीस्तीन के विभाजन की योजना के विरोध में मतदान किया था। स्वतंत्र राष्ट्रों के रूप में इजरायल और फिलीस्तीन के गठन को मंजूरी को मिले बहुमत ने भारत के मत को नामंजूर कर दिया था। (विभाजन की योजना को दो-तिहायी बहुमत मिला: इसके पक्ष में 33 और विपक्ष में 13 मत पड़े। ब्रिटेन सहित 10 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया।)

दबाव:-वर्तमान में, फिलीस्तीन मामलें पर इजरायल किसी तरह के दबाव में नहीं है। न ही वह संपूर्ण फिलीस्तीन राष्ट्र को अपने दीर्घकालिक सुरक्षा हितों के अनुकूल देखता है। यरूशलम की स्थिति और शरणार्थियों की वापसी जैसे कुछ मामले दोनों पक्षों के रुख के मद्देनजहर नहीं सुलझाए जा सकते। इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू के नेतृत्व वाली कट्‌टरपंथी लिकुद पार्टी की मौजूदा सरकार, जिसका रूढ़िवादी यहूदी पार्टियों से गठबंधन है। फिलहाल किसी तरह के समझौते के मूड में नहीं है। इराक, सीरिया और यमन में भड़के गृह युद्धों और दाएश या इस्लामिक स्टेट के उदय से पश्चिम एशिया क्षेत्र में बंट गया है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान फिलीस्तीन मामले से हट गया है। इसलिए इजरायल पर फिलीस्तीन के साथ किसी भी तरह का समझौता करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव कम हैं।

  • इजरायल के लिए जो एकमात्र दबाव अहमियत रखता है, वह है अमेरिकी दबाव और इजरायलयों ने सफलतापूर्वक उस दबाव को निवर्तमान ओबामा प्रशासन से निष्प्रभावी करा लिया। ट्रंप की हुकूमत आक्रामक रूप से इजरायल समर्थक होगी। फिलीस्तीनी भी पश्चिमी तट में फिलीस्तीन प्राधिकार और गजा में हमास के बीच निराशाजनक ढंग से विभाजिक हैं। क्षेत्र में उथल-पुथल और ईरान व सऊदी अरब के बीच घोर प्रतिदव्ंदव्ता ने सऊदी अरब और इजरायल के हितों को एक होने के लिए बाध्य कर दिया है। इसलिए, क्षेत्रीय ताकतों के बीच भू-सामरिक प्रतिस्पर्धा बढ़ने से इजरायल के प्रति अरब के शत्रुतापूर्ण रवैये में कुछ कमी आई है।

वास्तविकता:-आज की वास्तविकता यह है कि भारत- इजरायल संबंधों का दायरा उच्च प्राद्योगिकी वाले उत्पाद, रक्षा उपकरण, सुरक्षा, आसूचना, कृषि प्रबंधन, फार्मास्यूटिकल्स (दवाइयों) आदि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को शामिल करते हुए लगातार बढ़ रहा है। रक्षा उपकरणों का संयुक्त उत्पादन और विकास सहयोग के एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरकर सामने आया है। इजरायल आज भारत के लए प्रमुख रक्षा उपकरणों को तीसरा बड़ा स्रोत है। इजरायल बरसो से दृढ़ निश्चय के साथ भारत को आकर्षित करता आया है। विशेषकर उस समय जब भारत को पाकिस्तान के साथ संघर्ष के समय महत्वपूर्ण रक्षा आपूर्तियों की आवश्यकता थी और आपूर्ति के अन्य स्रोत जल्द उपलब्ध नहीं हो सकते थे।

  • भारत ने भी जहां जवाब में वैसा ही व्यवहार किया। वहीं वह इजरायल के साथ प्रगाढ़ होते अपने संबंधों को नजरंदाज करने की कोशिश करता रहा। इसके कारण वही थे-अरब और इस्लामिक देशों के साथ संबंध। हालांकि अवरूद्ध मुक्त व्यापार समाझौता, चीन को इजरायली युद्ध सामग्री की आपूर्ति, भारत में कुछ इजरायली पर्यटकों द्वारा अशिष्ट और उग्र व्यवहार को लेकर चिंताए यथावत बनी रहीं। आज, हालांकि दव्पक्षीय संबंध, अन्य देशों के साथ संबंधों के अधीन नहीं रहे हैं। इजरायल के साथ संबंधों को भारतीय राजनीति में मोटे तौर पर दव्दलीय समर्थन हासिल है। भारत की असमंजस की स्थिति उस समय और इजरायल विरोधी भावनाओं को बढ़ावा देतो है, जो फिलीस्तीनियों के प्रति अपनी सहानुभूति तत्काल व्यक्त करते हैं। अजीब बात यह है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में जब नियमित रूप से हिन्दुओं का दमन किया जाता है और उन पर अत्याचार किए जाते हैं, तो भारतीय मुसलमान खामोश रहते हैं।

प्रयास:-इजरायल के साथ करीब रिश्ते ईरान और खाड़ी में अरब देशों के करीबी रिश्तों के साथ-साथ ही प्रगाढ़ हुए हैं। शीर्ष स्तर पर नियमित रूप से दौरों के कारण 2017 में भारत में गणतंत्र दिवस के अवसर पर संयुक्त अरब अमीरात के शहजादे को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने का फैसला लिया गया। मोदी जी ने बहुपक्षीय बैठकों में भाग लेने के लिए किए गए अपने विदेशी दौरों में इजरायली प्रधानमंत्री नेतानन्याहू से मुलाकात की है। इसका कोई विकल्प नहीं है और भारत अरब अथवा इस्लामी देशों और इजरायल के साथ करीबी रिश्ते कायम करने के प्रयास करता रहेगा। इस विकल्प को चुनने के लिए भारत पर कोई दबाव नहीं है। राष्ट्रपति के स्तर पर तो यात्राएं तो हुई हैं, वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री भारत की यात्रा पर आ चुके हें, लेकिन अब तक किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इजरायल की यात्रा नहीं की है। वर्ष 2017 में मोदी के इजरायल ऐतिहासिक यात्रा पर जाने वाले प्रथम प्रधानमंत्री बनने और इसे दुर्भाग्य को दूर करने का अवसर तैयार हो चुका हैं।

उपसंहार:- कुल मिलाकर भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी की इजरायल यात्रा पर जाना और इजरायल से हुए समझौते भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण कदम हैं। इससे आने वाले समय में भारत को बहुत फायदा होगा।

- Published/Last Modified on: August 24, 2017

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