भारत और म्यांमार (India and Myanmar - in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना: - रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या के बीच हो रही मोदी की म्यांमार यात्रा भारत की पूरब को देखने वाली व्यापारिक नीति को नया आधार प्रदान करेगी और इस इलाके की सुरक्षा व्यवस्था में नया आयाम जोड़ेगी। इस तीन दिवसीय यात्रा में ग्यारह समझौते हुए हैं। इनमें परिवहन परियोजनाओं समेत भूंकप प्रभावित पैगोडा की मरम्मत शामिल हैं, लेकिन मोदी की म्यामार की पहली दो तरफा यात्रा होने के नाते इसका विशेष महत्व है, क्योंकि इससे पहले वे 2014 में आसियान देशों की बैठक में गए थे तब वह बहुपक्षीय यात्रा थी।

Image of PM Narendra Modi With The State Counsellor of Myanmar

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म्यांमार का नामकरण: - म्यांमार ब्रह्मदेश बर्मा या म्यांमार दक्षिण एशिया का एक देश हैं। इसका आधुपिक बर्मी नाम ’म्यांमार’ है। बर्मी भाषांं में र का उच्चारण य किया जाता है अत: सही उच्चारण म्यन्मा है, तथा इसका हिन्दी उच्चारण म्यांमार या म्यानमार है। इसका पुराना अंग्रेजी नाम ब्रह्मदेश या बर्मा था जो यहां के सर्वाधिक बहुल बर्मा जाति के नाम पर रखा गया था। इसके उ. में चीन, पश्चिम में भारत, बांग्लादेश एवं हिन्द महासागर तथा दक्षिण एवं पूर्व की दिशा में इंडोनेशिया देश स्थित हैं। यह भारत एवं चीन के बीच एक रोधक राज्य का भी काम करता है। इसकी राजधानी नाएप्यीडॉ और सबसे बड़ा शहर देश की पूर्व राजधानी यांगून है, जिसका पूर्व नाम रंगून था।

ब्रह्मदेश को म्यन्मा या बमा नाम से जाना जाता है। ब्रिटिश राज्य के बाद इस देश को ’अग्रेजी’ में बर्मा कहा जाने लगा। सन 1989 में देश की सैनिक सरकार ने पुराने अंग्रेजी नामों को बदल कर पारंपरिक बर्मी नाम कर दिया। इस देश को ब्रह्मदेश को ’म्यन्मा’ और पूर्व राजधानी और सबसे बड़े रंगून को यांगून नाम दिया गया।

म्यांमार का भूगोल: - म्यांमार दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे बड़ा देश है, जिसका कुल क्षेत्रफल 6, 78, 500 वर्ग किलोमीटर है। म्यांमार विश्व का 40 वां सबसे बड़ा देश है। इसकी उत्तर पश्चिमी सीमाएं भारत के मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और बांग्लादेश के चिटगांव प्रांत को मिलती है। उत्तर में देश की सबसे लंबी सीमा तिब्बत और चीन के उनान प्रांत के साथ है। म्यांमार के दक्षिण-पूर्व में लाओस और थाईलैंड देश हैं। म्यांमार की तट रेखा (1, 930 किलामीटर) देश के कुल सीमा का एक तिहाई है। बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर देश के दक्षिण पश्चिम और दक्षिण में क्रमश: पड़ते है। उत्तर हेंगहुआन शान पर्वत चीन के साथ सीमा बनाते हैं।

म्यांमार में तीन पर्वत श्रृंखलाएं है जो कि हिमालय से शुरु होकर उत्तर से दक्षिण दिशा में फैली हुई है। इनका नाम है रखिने योमा, बागो योमा और शान पठार। यह श्रृंखला म्यांमार को तीन नदी तंत्र में बांटती है। इनका नाम है ऐयारवाडी, सालवीन और और सीतांग। ऐयारवाडी ब्रह्मदेश कि सबसे लंबी नदी है। इसकी लंबाई 2, 170 किलोमीटर है। मतलब की खाड़ी में गिरने से पहले यह नदी म्यांमार के सबसे उपजाऊ भूमि से हो कर गुजरती है। म्यांमार की अधिकतर जनसंख्या इसी नदी की घाटी में निवास करती है जो कि रखिने योगा और शान पठार के बीच स्थित है।

देश का अधिकतम भाग कर्क रेखा और भूमध्य रेखा के बीच में स्थित है। ब्रह्मदेश एशिया महादव्ीपीय के मानसून क्षेत्र में स्थित है, सालाना यहां के तटीय क्षेत्रों में 5000 मिलीमीटर, डेल्टा भाग में लगभग 2500 मिलीमीटर और मध्य म्यांमार के शुष्क क्षेत्रों में 1000 मिलीमीटर वर्षा होती है।

धरातल के आधार पर इसे चार भागों में बाँटा जा सकता है:

  1. उत्तरी तथा पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्र-यह 6, 000 से 20, 000 फुट तक ऊँचा है। इसमें बंगाल की खाड़ी तथा आराकान योमा पर्वत के मध्य की आराकन पट्‌टी भी शामिल है।
  2. पूर्व का शान उच्च प्रदेश- यह लगभग 3, 000 फुट तक ऊँचा एक पठार है जो दक्षिण में टेनैसरिम योमा तक फैला है।
  3. मध्य ब्रह्मदेश- यह देश का मुख्य कृषि प्रदेश है जो पूर्व में सैलवीन तथा पश्चिम में इरावदी तथा इसकी सहायक चिंदविन आदि नदियों से घिरा है।
  4. दक्षिण में इरावदी तथा सितांग नदियों का डेल्टा प्रदेश- इरावदी तथा सितांग की निम्न घाटी काफी उपजाऊ है। डेल्टा प्रदेश लगभग 10, 000 वर्ग मील में फैला है। यह विश्व के बड़े धान उत्पादक क्षेत्रों में से एक है तथा यहाँ कई प्रसिद्ध बंदरगाह भी स्थित हैं। इरावदी नदी मैदान के पश्चिमी भाग से बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

बौद्ध मत: -शिया का एक देश म्यांमार है। इसका भारतीय नाम ’ब्रह्मदेश’ है और 1973 तक यह भारत का ही अंग था। पहले म्यांमार का नाम ’बर्मा’ हुआ करता था, जो यहां बड़ी संख्या में आबाद बर्मी नस्ल के नाम पर पड़ा था। भारत के बौद्ध प्रचारकों से यहां बौद्ध मत का विस्तार हुआ।

पगोडा (स्तूप) : -उत्तर-पूर्वी एशिया के बड़े देशों में से एक म्यांमार पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहां की ’वर्ल्ड (विश्व) हेरिटेज (विरासत) साइटस’ (कार्यस्थल) शानदार स्मारक, असंख्य पगोडा, साफ-सुथरा और प्रदूषणमुक्त समुद्री तट, सुंदर बाग-बगीचे, लोगों की जीवनशैली, रमणीक पहाड़ी पर्यटन स्थल, जंगल, भव्य प्राचीन शहर और विस्मयकारी प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहे हैं। म्यांमार में लगभग प्रत्येक गांव में, जंगल में, मार्गों पर और प्रत्येक मुख्य पहाड़ी पर पगोडे (स्तूप) मिलेंगे। इनमें से ज्यादातर धार्मिक व दानशील व्यक्तियों द्वारा बनवाए गए हैं। वहां विश्वास प्रचलित है कि इनके निर्माण से पुण्य की प्राप्ति होती है। म्यांमार के पगोडे प्राय: बहुभुज की बजाय गोलाकृति के होते हैं। उन्हें डगोवा अथवा चैत्य कहा जाता है। वहां का प्राचीनतम चैत्य पगान में वुपया में है। यह तीसरी शताब्दी में बना हुआ बताया जाता है। 10वीं शदी में बना म्यिंगान प्रदेश का नगकडे नदाउंग पगोडा, 7वीं अथवा 8वीं शताब्दी में बना प्रोम का बाउबाउग्यी पगोडा, 1059 ई. में बना पगान का लोकानंद पगोडा तथा 15वीं सदी में बना सगैंग का तुपयोन पगोडा भी विख्यात हैं।

म्यांमार में सबसे अधिक महत्वपूर्ण पेगू के श्वेहमाउडू पगोडा और यंगून के स्वेदागोन पगोडा को माना जाता है। स्वेदागाने पगोडा सबसे अधिक प्रभावोत्पादक है। यह भव्य स्तूप बौद्ध मतावलंबियों के लिए बहुम पवित्र स्थल है। जहां आकर लोग शांति महसूस करते हैं। कहा जाता है कि यह पहले केवल 27 फुट ऊंचा बनाया गया था और 15वीं शती में इसे 323 फुट ऊंचा बना दिया गया। इसमें भगवान तथागत के आठ बाल और तीन अन्य बुद्धों के पवित्र अवशेष स्थापित बताए जाते हैं।

स्वेदागोन पगोडा म्यांमार का प्रसिद्ध बौद्ध मठ है, जिसका शाब्दिक अर्थ स्वर्ण शिववालय होता है। हालांकि म्यांमार के मुख्य तीर्थ स्थलों में से एक असली स्वेदागान खाक में मिल चुका है। स्वेदागान पगोडा का निर्माण मोन ने बागान काल में करवाया इसमें मौजूद रंगबिरंगी स्तूपों में हर एक के बीच में 99 मीटर का दायरा है। सोने के आवरण से ढका मुख्य स्तूप इस मठ की भव्यता में चार-चांद लगाता है।

शुरूआती दौर में भारत और म्यांमार के बीच कोई राजनीतिक संबंध नहीं था। यद्यपि म्यांमार उस काल में भी हिन्दू संस्कृति से इतना अधिक प्रभावित था कि इसके नगरों के नाम जैसे ’अयथिया’ अथवा ’अयोध्या’ संस्कृत नामों पर रखे जाने लगे थे। बाद में अशोक के काल मे ंबौद्ध मत और संस्कृत का म्यांमार में इतना अधिक प्रसार हुआ कि आज यहां के बहुसख्यक बौद्ध मलावलंबी हैं।

पर्यटन के लिए अनुपम: -

म्यांमार में कई पुरातात्विक स्थल हैं और पूरे देश में विभिन्न रंगारंग त्यौहारों का आयोजन वर्ष भर होता रहता है। यहां ’एडवेंचर’ (साहसिक) के शौकीनों से लेकर धर्म, संस्कृति, प्रकृति और पुरातात्विक स्मारकों के प्रति रुझान रखने वाले सभी के लिए ढेर सारी सौगातें हैं।

यंगून- यह म्यांमार का सबसे बड़ा शहर है और म्यांमार की पुरानी राजधानी रह चुका है। शहर में कई बड़े-बड़े बाग-बगीचे होने के कारण इसे ’गार्डन (बगीचे) सिटी (शहर) ऑफ (का) ईस्ट’ (पूर्व) भी कहा जाता है। यंगून में ही विश्व प्रसिद्ध ’गोल्डन (स्वर्ण) पगोडा’ है। पहले इसको रंगून कहा जाता था।

मांडले- इस शहर को ’सिटी (शहर) ऑफ (का) जेम्स’ भी कहा जाता है। यहां साहित्यिक और कई पारंपरिक कलाएं समृद्ध हुई हैं। म्यांमार का सबसे बड़ा सांस्कृतिक केन्द्र मांडले शहर और आसपास अनके पर्यटक स्थल हैं।

हमिंगन बेल- वैसे तो यह इलाका काफी छोटा है लेकिन इसकी प्रसिद्धि इसलिए है कि यहां के एक उपासना स्थल पर दुनिया का सबसे बड़ा घंटा है।

बागान- यहां के भव्य स्मारक म्यांमार के शासकों की धर्मनिष्ठता और प्रतिभा को दर्शाते हैं। यहां अनेक पगोडे हैं। आनंद और थाबिन्यू मंदिर देखने लायक है। बागान ऐसी जगह है जहां आपको कला के अदभुत नजारे देखने को मिलेंगे।

ताउन्ग्यी: - यह गर्मियों की सैरगाह है और धीरे-धीरे पर्यटन केन्द्र के रूप में उभरा है। लोग यहां प्राकृतिक सुन्दर और ठंडक का आनंद उठाने आते हैं। ताउन्ग्यी के पास इन्ले झील है। जो पर्यटकों का मन मोह लेती है। नीले पहाड़ों से घिरी इन्ले झील तैरते दव्ीपों पर बाग-बगीचों और तैरते गांवों के लिए जानी जाती है। यहां के रंगबिरंगे तैरते बाजार आकर्षण का केन्द्र है।

ब्रह्मदेश: -मुख्य बातें निम्न हैं-

  • जनवरी, 1948- ब्रह्मदेश को आजादी मिली।
  • सितंबर, 1987-मुद्रा के अवमूल्यन के चलते हजारों लोगों की बचत स्वाहा हो गई जिसके चलते सरकार विरोधी दंगे भड़के।
  • जुलाई, 1989-सत्ताधारी के जुंटा ने मार्शल (उच्च अधिकारी) लॉ (कानून) की घोषणा की। नेशनल (राष्ट्रीय) लीग (संघ) फार (के लिए) डेमोक्रेसी (लोकतांत्रिक) की नेता आंग सान सू की घर में नजरबंद।
  • मई, 1990-आम चुनावों में एनएलडी की भारी जीत। जुंटा ने चुनाव के नतीजों को माननें से इंकार किया।
  • अक्टूबर, 1991- सू की को नोबेल पुरस्कार।
  • जुलाई, 1995- सू की, की नजरबंदी से रिहाई।
  • मई, 2003 -जुंटा व एनएलडी समर्थकों के बीच झड़प के बाद सू की को तथाकथित सुरक्षा के लिए फिर हिरासत में ले लिया गया।
  • सितंबर, 2007-बौद्ध भिक्षुओं द्वारा सत्ता विरोधी प्रदर्शन।
  • अप्रैल, 2008-सरकार ने प्रस्तावित संविधान छपवाया जिसके मुताबिक एक तिहाई संसदीय सीटें सेना के हिस्से में जाएगी। सू की, के किसी भी प्रकार के पद ग्रहण करने पर प्रतिबंध।
  • मई, 2009- जान विलियम येता नामक अमेरिकी तैरकर सू की घर पहुंचा। सरकार ने सू की पर नजरबंद के नियम तोड़ने का आरोप लगाया।
Map of 7 States of Myanmar

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म्यांमार को सात राज्य और सात मंडल में विभाजित किया गया है। जिस क्षेत्र में बर्मी लोगों की जनसंख्या अधिक है उसे मंडल कहा जाता है। राज्य वह मंडल है, जो किसी विशेष जातीय अल्पसंख्यकों का घर हो।

मंडल-

  • ऐयारवाडी मंडल
  • बागो मंडल
  • मागवे मंडल
  • मंडाले मंडल
  • सागाइन्ग मंडल
  • तनीन्थाराई मंडल
  • यांगोन मंडल

रखाइन राज्य: - बर्मा के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक राज्य है। यह बंगाल की खाड़ी के साथ तटवर्ती हैं। पश्चिमोंत्तर में बांग्लादेश से सीमावर्ती है।

विवरण-यह बंगाल की खाड़ी के पूर्वी तट पर चटगांव (चिटागांग) से नेग्रेस अंतरीप तक विस्तृत है। इस प्रदेश का प्रधान नगर अकयाब है। प्रांत चार जिलों में विभक्त है।

चार मुख्य नदियाँ नाफ, मायू, कलदन और लेमरों हैं। कलदन गहरी है और इसमें छोटे जहाज 50 मील भीतर तक जा सकते हैं अन्य नदियाँ बहुत छोटी हैं, क्योंकि वे पहाड़ जिनसे ये निकली हैं, समुद्र के निकट हैं। पर्वत को पार करने के लिए कई समस्याए सुलझानी हैं।

प्रदेश पहाड़ी है और केवल दशम भूभाग में खेती हो पाती है। मुख्य फसल धान है। फल, तंबाकू, मिरचा आदि भी उत्पन्न किए जाते हैं। जंगल भी हैं, परन्तु वर्षा इतनी अधिक (औसतन 120 से 130 इंच तक) होती है कि सागवान यहां नहीं हो पाता है।

अराकानवासियों की सभ्यता अति प्राचीन है। लोकोक्ति के अनुसार 2, 666 ई. पू. से आज तक के सभी राजाओं के नाम ज्ञात है। कभी मुगल और कभी पुर्तगाली लोगो ने कुछ भागों पर अधिकार जमा लिया था, परंन्तु वे शीघ्र ही मार भगाए गए। सन्‌ 1826 से यहां अंग्रेजी राज्य रहा। जनवरी, सन्‌ 1948 से म्यांमार पुन: स्वतंत्र हो गया और अब वहां गणतंत्र राज्य है अराकान का प्रधान नगर पहले अराकान था, परन्तु अस्वास्थ्यप्रद होने के के कारण अब अकयाब प्रधान नगर हो गया है।

अराकाननिवासियों की देशी भाषा और रस्मरिवाजों में अन्य बरमानिवासियों से पर्याप्त भिन्नता है, परन्तु ये भी बौद्धधर्म के ही अनुयायी हैं।

सैन्य अभियान: -म्यांमार में भारतीय सैन्य अभियान 2015, 10 जून को भारत ने भारत- म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर आतंकीवादी शिविरों के खिलाफ शल्य-क्रियात्मक हमलों का आयोजन किया। 4 जून 2015 को एनएससीएन खापलांग ने मणिपुर के चंदेल जिले में 6 डोगरा रेजिमेंट (सेना) के एक भारतीय सेना के काफिले पर हमला किया और 18 सेना के जवानों को मार दिया । भारतीय मीडिया (संचार माध्यम) ने बताया कि इस सफल सीमापार ऑपरेशन (शल्य क्रिया) में हताहत आतंकियों की संख्या 158 तक है।

सीमा पर अभियान-

सटीक खुफिया सूचनाओं के आधार पर, भारतीय वायु सेना और 21 पैरा (एसएफ) ने भारत- म्यांमार की सीमा पर एक सीमापार की कार्रवाई की और भारत- म्यांमार सीमा के साथ एनएससीएन (के) और केवाईकेएल में से प्रत्येक में दो आतंकवादी कैंप (शिविर) को नष्ट कर दिया। यह अभियान दो स्थानों पर नागालैंड और मणुिपर सीमा पर म्यांमार क्षेत्र के अंदर किया गया था। एक जगह मणिपुर में उखरुल के निकट है। सेना ने नागा उग्रवादियों के दो पारगमन शिविरों पर हमला किया।

70 कमांडो कथित तौर पर इस ऑपरेशन (शल्य क्रिया) में शामिल थे। हमला राइफल्स (एक प्रकार की बन्दूक), रॉके लांचर, ग्रनेड और नाइट (रात्रि) विजन (दृष्टि) चश्मे से लैस (कम) कमांडो, म्यांमार के साथ सीमा के निकट भारतीय क्षेत्र के भीतर ध्रुव हेलीकॉप्टर से तेजी से आगे बढ़ने के बाद दो समूहों में विभाजित किए गए थे। प्रशिक्षण शिविरों में पहुंचने से पहले टीमों (समूहों) ने कम से कम 15 किलोमीटर की दूरी के लिए मोटे जंगलों से गुजरना शुरू कर दिया था। दो टीमों में से प्रत्येक को दो उप- समूहों में विभाजित किया गया था। दूसरे ने एक विस्फोटक को चलाने और भागने से रोकने के लिए एक बाहरी रिंग (गेरा) बनाई।

वास्तविक ऑपरेशन (शिवर घेरने और इसे नष्ट करने) लगभग 40 मिनिट था। आईएएफ के आई- 17 हेलीकाप्टरों को स्टैंडबाय (समर्थन करना) पर रखा गया था, कमांडो को खाली करने के लिए सेवा में दबाव डालने के लिए तैयार किया गया था, ऑपरेशन के बाद अपने बयान में भारतीय सेना ने कहा कि यह म्यांमार के साथ संपर्क में है और कहा की ”आतंकवादियों से पीडित दोनों देशो के बीच घनिष्ठ सहयोग का इतिहास रहा है। हम ऐसे आतंकवाद से निपटने के लिए उनके साथ काम करने की आशा रखते हैं।” भारत सेना ने 4 जून को सेना पर हमला करने वाले हमलावरों के खात्मे (158 की संख्या) का दावा किया है, जिनके हमले में मणिपुर के चंदेल जिले में 6 डोगरा रेजिमेंट के 18 सेना के जवानों की जान गई थी। यह 1999 के कारगिल युद्ध के बाद भारतीय सेना पर सबसे बड़ा हमले के रूप में चिन्हित किया गया है।

संबंध: - भारत और म्यांमार दोनों पड़ोसी हैं। इनके संबंध अत्यंत प्राचीन और गहरे हैं और आधुनिक इतिहास के तो कई अध्याय बिना एक-दूसरे ंके उल्लेख के पूरे ही नहीं हो सकते। आधुनिक काल में 1937 तक बर्मा भी भारत का ही भाग था और ब्रिटिश राज के अधीन था। बर्मा के अधिकतर लोग बौद्ध हैं और इस नाते भी भारत का सांस्कृतिक संबंध बनता है। पड़ोसी देश होने के कारण भारत के लिए बर्मा का आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक महत्व भी है।

भारत के लिए म्यांमार का महत्व बहुत ही स्पष्ट है भारत और म्यांमार की सीमाएं आपस में लगती हैं जिनकी लंबाई 1600 किमी से भी अधिक है तथा बंगाल की खाड़ी में एक समुद्री सीमा से भी दोनों देश जुड़े हुए हैं। अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणुिपर और नागालैंड की सीमा म्यांमार से सटी हुई है। म्यांमार के साथ चहुंमुखी संबंधों को बढ़ावा देना भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के आर्थिक परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र दुर्गम पहाड़ और जंगल से घिरा हुआ है। इसके एक तरफ भारतीय सीमा में चीन की तत्परता भारत के लिए चिंता का विषय है तो दूसरी तरफ भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में अलगावादी ताकतों की सक्रियता और घुसपैठ की संभावनाओं को देखते हुए बर्मा से अच्छे संबंध बनाए रखना भारत के लिए अत्यावश्यक है।

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी म्यांमार बहुत महत्वपूर्ण है। दोनों देशों ने सीमा क्षेत्र से बाहर प्रचलन करने वाले भारतीय विद्रोहियों से लड़ने के लिए वास्तविक समयानुसार आसूचना को साझा करने के लिए संधि की हैं। इस संधि में सीमा एवं समुद्री सीमा के दोनों ओर समन्वित रूप से ग्रस्त लगाने की परिकल्पना है तथा इसके लिए सूचना का आदान-प्रदान आवश्यक है ताकि विद्रोह, हथियारों की तसकरी तथा ड्रग, मानव एवं वन्य जीव के अवैध व व्यापार से संयुक्त रूप से निपटा जा सके।

स्पष्ट है कि भारत म्यांमार के साथ अपने संबंध को बिगाड़ने के पक्ष में कभी नहीं रहा हैं। वहीं म्यांमार की फौजी सरकार भी भारत के साथ संबंध बिगाड़ने के पक्ष में नहीं रही हैं क्योंकि पूर्वोत्तर के भारतीय राज्यों से सीमा के सटे होने के अलावा म्यांमार का पूरा तटवर्तीय क्षेत्र बंगाल की खाड़ी के जरिए भारत से जुड़ा हुआ है। इसकी कुल लंबाई लगभग 2, 276 किमी है। अत: भारत के लिए म्यांमार का बड़ा महत्व है। म्यांमार न केवल सार्क, आसियान का सदस्य है, बल्कि तेजी से बढ़ते पूर्व और दक्षिणपूर्व ऐशिया की अर्थव्यवस्था का एक द्वार भी है। इसके अलावा पूर्वोत्तर भारत में बढ़ती अलगाववादी गतिविधियों के मद्देनजर भी म्यांमार से भारत के रिश्ते का महत्व है। 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद फौजी सरकार के सूचना मंत्री ने असम के उल्फा, मणिपुर के पीएलए और नागालैंड के एनएससीएन पर कार्यवाही के लिए तत्पर होने का भरोसा जताया था। भारत, म्यांमार के जरिए थाईलैंड और वियतनाम के साथ संबंध मजबूत कर सकता है।

दक्षिण एशिया एवं दक्षिण एशिया के बीच सेतु के रूप में म्यांमार ने भारत के राजनयिक क्षेत्र को बहुत ज्यादा आकर्षित किया है। व्यवसाय, संस्कृति एवं राजन्य के मिश्रण की दृष्टि से दोनों देशो के बीच मजबूत संबंध है।

1951 की मैत्री संधि पर आधारित दव्पक्षीय संबंध समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं तथा एक दुर्लभ गतिशीलता एवं लोच का प्रदर्शन किया है। यह विडम्बना ही है कि पिछले कई वर्षो से बर्मा भारत की विदेश-नीति और राजनीतिक विमर्श में लगभग अनुपस्थित रहा है। 1987 में तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी की यात्रा ने भारत और म्यांमार के बीच मजबूत संबंध नींव रखी।

कुछ साल पहले म्यांमार में राजनीतिक एवं आर्थिक सुधारों के बाद से पिछले चार वर्षो में भारत- म्यांमार संबंधों में महत्वपूर्ण उछाल आया है। राष्ट्रपति यू थिन सेन 12 से 15 अक्टूबर, 2011 के दौरान भारत यात्रा पर आए थे जो मार्च, 2011 में म्यांमार की नई सरकार के शपथ लेने के बाद से म्यांमार की ओर से भारत की पहली राजकीय यात्रा थी। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमनोहन सिंह की 27 से 29 मई, 2012 के दौरान म्यांमार की यात्रा ने परिर्वतन का मार्ग प्रशस्त किया जो एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई जिसके दौरान दोनों पक्षों ने दर्जनों करारों पर हस्ताक्षर किए तथा भारत ने म्यांमार को 500 मिलियन (दस लाख) अमरीकी डॉलर (मुद्रा) के लिए एक नई लाइन (रेखा) ऑफ (का) क्रेडिट (श्रेय) (एल ओ सी) प्रदान की। राष्ट्रपति थिन सेन ने दिसंबर, 2012 में नई दिल्ली में आयोजित भारत-आसियान संस्मारक शिखर बैठक में भाग लिया। तथा मुंबई एवं रत्नागिरी का भी दौरा किया। डॉ. मनमनोहन सिंह ने बिस्मेटक शिखर बैठक के लिए मार्च, 2014 में फिर से म्यांमार का दौरा किया।

मई 2014 में भारत में मोदी सरकार की ’पड़ोसी पहलें’ की नीति फिर से दव्पक्षीय वार्ता के लिए और साथ ही आसियान, पूर्वी एशिया शिखर बैठक तथा आसियान क्षेत्रीय मंच से जुड़ी मंत्री स्तरीय बैठकों में भाग लेने के लिए 8 से 11 अगस्त, 2014 तक भारत की विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज की पहली म्यांमार यात्रा की।

बर्मा: - यह नहीं भूलना चाहिए कि वही बर्मा है जहां भारतीय स्वाधीनता की पहली संगठित लड़ाई का अगुवा बहादुरशाह जफर कैद कर रखा गया और वहीं उसे द्फ़नाया गया। बरसो बाद बाल गंगाधर तिलक को उसी बर्मा की मांडले जेल में कैद रखा गया। रंगून और मांडले की जेलें अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों की गवाह हैं। उस बर्मा में बड़ी संख्या में गिरमिटिया मजूदर ब्रिटिश शासन की गुलामी के लिए ले जाए जाए गए और वे लौट कर नहीं आ सके। इनके अलावा रोज़गार और व्यापार के लिए भारतीयों की भी बड़ी संख्या वहां निवास करती है। यह वही बर्मा है जो कभी भारत की पॉपुलर (लोकप्रिय) संस्कृति में ’मेरे पिया गए रंगून, वहां से किया टेलीफून’ जैसे गीतों में दर्ज हुआ करता था।

आर्थिक संबंधों में वृद्धि: - ऊर्जा एवं संसाधन की दृष्टि से समृद्ध म्यांमार ’अवसर की धरती’ के रूप में उभरा है। 3 साल पहले जिन आर्थिक एवं राजनीतिक सुधारों को शुरू किया उससे दोनों देश अपने आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए प्रतिबद्ध दिखते हैं जो दव्पक्षीय व्यापार 1980 के दशक के पूर्वार्ध में मात्र 12 मिलियन अमरीकी डालर था वह आज 2 बिलियन (एक अरब) अमरीकी डालर के आसपास पहुंच गया है।

अनेक भारतीय कंपनियां (संगठन) पहले ही म्यांमार में अपना डेरा जमा चुकी हैं तथा वहां काम कर रही हैं। इनमें अन्य कंपनियों के अलावा सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी ओ एन जी सी विदेश लिमिटेड (सीमित) (ओ वी एल), जुबिलांट आयल गैस, सेंचुरी पलाई, टाटा मोटर्स, एससार उनर्जी, राइटस, एसकॉर्ट रेनबेकसी, कैडिला हेल्थकेयर (स्वास्थ्य देखभाल) लिमिटेड (सीमित), डॉ. रेड्‌डी लैब सिपला एवं अपोलो जैसे नाम शामिल हैं। शीर्ष भारतीय कंपनियां अनेक उद्योगों में 2.6 बिलियन अमरिकी डालर का निवेश करना चाहती हैं, जिसमें दूरसंचार, ऊर्जा एवं विमानन क्षेत्र शामिल हैं।

जनता की शक्ति: -हालांकि राजनय एवं व्यवसाय के अपने-अपने तर्क होते हैं परन्तु जन-दर-जन संपर्क भारत एवं म्यांमार के बीच स्थायी मैत्री ज्यादातर यंगून एवं मांडले में बसा हुआ है। म्यांमार की प्रसिद्ध नेता आंग सान सू की, का भारत से एक विशेष रिश्ता है। उन्होंने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज (महाविद्यालय) में उस समय पढ़ाई की थी जब उनकी मां भारत में राजदूत के रूप में तैनात थी। भगवान बुद्ध का बोधस्थल बोध गया म्यांमार के नेताओं के लिए ऐसा स्थल है जिसका वे दौरा अवश्य करते हैं और यह उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। म्यांमार के लोगों को भारत सरकार द्वारा भेंट स्वरूप दिया गया सारनाथ शैली का बुद्ध स्तूप जिसे शवेडागन पगोडा परिसर में स्थापित किया है। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत रिश्ते का एक ज्वलंत उदाहरण है। इस पड़ोसी देश के युवाओं एवं बुजुर्गों दोनों के योग से नए श्रद्धालु मिल रहे हैं।

Image of India's Balancing Act In Myanmar

Image of India’s Balancing Act In Myanmar

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भारत प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जी: -पीएम मोदी जी ने कहा, ’सबका साथ, सबका विकास’ के तहत हम म्यांमार का भी सहयोग करेंगे- 10 खास बातें-

यंगून: -

  1. पीएम मोदी ने कहा कि म्यांमार द्वारा चुनौतियों का सामना किए जाने के बीच भारत उसके साथ खड़ा है।
  2. इससे पहले प्रतिनिधिमंडल स्तरीय वार्ता के दौरान पीएम मोदी जी ने कहा, हम अपने ’सबका साथ, सबका विकास’ के पहल के तहत ’सबका साथ, सबका विकास’ के तहत हम म्यांमार का उसके विकास के प्रयासों में सहयोग करते रहेंगे।
  3. उन्होंने कहा कि एक पड़ोसी के तौर पर और ’एक्ट-ईस्ट पॉलिसी’ के संदर्भ में म्यांमार के साथ के साथ संबंध को गहरा करना भारत के लिए एक प्राथमिकता है।
  4. पीएम मोदी की यंगून की स्टेट (राज्य) काउंसिलर (परामर्शदाता) आंग सान सू की से बातचीत के बाद जारी एक संयुक्त वक्तव्य में दोनों पक्षों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का आह्वान किया कि आतंकवाद से लड़ने में चुनिंदा और आंशिक तरीके छोड़े जाएं।
  5. दोनों नेताओं ने अपनी सीमाओं पर मौजूद सुरक्षा स्थिति पर चर्चा की और अपने देशों में हुई आतंकवाद तथा उग्रवाद प्रेरित हिंसा की अनेक घटनाओं पर चिंता प्रकट की।
  6. म्यांमार ने पिछले दिनों भारत में अमरनाथ यात्रा के दौरान हुए आतंकी हमलों की निंदा की। भारत ने उत्तरी रखाइन प्रांत में हुए हालिया आंतकी हमलों की निंदा की जहां म्यांमार के सुरक्षा बलों के कई जवान मारे गए।
  7. स्ूा की और पीएम मोदी की बातचीत के बाद दोनों पक्षों के बीच समुद्री सुरक्षा, म्यांमार में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने, स्वास्थ्य और सूचना प्रौद्योगिकी समेत विभिन्न क्षेत्रों में 11 समझौते हुए।
  8. साझा सीमा पर सुरक्षा और स्थिरता को बनाये रखने को सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए जरूरी बताते हुए म्यांमार ने भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति अपने सम्मान को दोहराया।
  9. म्यांमार ने इस बात का भी संकल्प लिया कि किसी आतंकवादी समूह को भारत के खिलाफ गतिविधियों के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देगा।
  10. पीएम मोदी ने शांति और राष्ट्रीय सुलह के लिए म्यांमार द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना की।

म्यांमार: -प्रधानमंत्री मोदी जी म्यांमार में भारतीय समुदाय को संबोधित किया। नोटबंदी और जीएसटी की तारीफ करते हुए मोदी ने कहा ’देश को भ्रष्टाचार और कालेधन से मुक्त करने के लिए सरकार ने बड़े और कड़े फैसले किए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार देश की आजादी के 75 साल पूरे होने तक ’न्यू इंडिया’ (नया भारत) बनाने का संकल्प लिया है। इसके लिए छोटे-मोटे परिवर्तन नहीं, बल्कि पूर्ण बदलाव में जुटें है। व्यापार में पारदर्शिता के लिए जीएसटी का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि जो काम 6 साल में नहीं हो सकता था, वह 60 दिन में हो गया।

मोदी जी ने कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समय म्यांमार भारतीयों का दूसरा घर था। दोनों देशों की सीमाएं ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे की भावनाएं भी आपस में जुड़ी है। दोनों देशों के संबंधों में पांच ’बी’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह बुद्ध, बिजनेस (कारोबार), भरतनाट्‌यम, बॉलीवुड आर बर्मा टीक हैं, लेकिन छठा महत्वपूर्ण ’बी’- भरोसा है, जिस पर दोनों देशों के संबंध टिके हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने म्यांमार के स्टेट (राज्य) काउंसलर (परामर्शदाता) आंग सान सू की के साथ दव्पक्षीय बैठक में कहा कि वह रखाइन प्रांत में जारी हिंसा पर वहां की सरकार की चिंताएं साझा करते हैं। रोहिंग्या समुदाय के कट्‌टरपंथी लोगों की हिंसा और सुरक्षाबलों की जवाबी कार्रवाई के चलते करीब सवा लाख रोहिंग्या बांग्लादेश पलायल कर चुके हैं। मोदी जी ने आह्यन किया कि सभी पक्ष मिल-बैठकर इसका समाधान ढूंढे। इस दौराने उन्होंने म्यांमार के सभी नागरिकों को निशुल्क वीसा देने तथा भारत की जेलों में कैद वहां के 40 नागरिकों को रिहा करने की घोषणा की। भारत और म्यांमार के बीच 11 समझौते भी हुए हैं।

हाल ही राखाइन हिंसा में चार सौ रोहिंग्या के मारे जाने के बाद वे बड़ी संख्या में बांग्लादेश में प्रवेश कर रहे हैं और भारत की सीमा पर भी उनके घुसपैठ की चुनौती है। एक तरफ भारत अपने यहां रह रहे चालीस हजार रोहिंग्या को म्यांमार वापस भेजने की तैयारी कर रहा है तो दूसरी तरफ भारतीय सर्वोच्च न्यायालय इसके विरुद्ध दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है। विडंबना यह है कि म्यांमार उन्हें अपने नागरिकता कानून के तहत जातीय समूहों में शामिल नहीं करता। इस बीच चीन की वन (एक) रोड (सड़क) वन (एक) बेल्ट (पट्‌टा) नीति में शामिल होने के लिए म्यांमार पर दबाव है तो भारत उसे अपने पाले में रखना चाहेगा। यही वजह कि मोदी के दौरे पर चीन की विशेष निगाहें हैं। हालांकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और मोदी की सकरात्मक वार्ता के बाद आशंकाएं कम होगी। ऐतिहासिक सांस्कृतिक निकटता होने के कारण भी उन्हें करीब आने में सुविधा होगी। भारत को अपने पड़ोसी में रणनीतिक साझीदार तो ढूंढने ही होंगे, साथ ही वहां लोकतांत्रिक आंदोलन को मजबूती देनी होगी, क्योंकि भारत की विशिष्टता और आकर्षण उसके लोकतंत्र में है और यही हमें चीन से अलग करता है।

उपसंहार: - दोनों देशों के बीच 1400 किलोमीटर की लंबी सीमा के नाते भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की अशांति के कई दूसरे तार म्यांमार से जुड़ते हैं और भारत को उम्मीद है कि इस दौरे के बाद इस बार म्यांमार उसे ज्यादा आश्वस्त करेगा और इसके साथ ही दोनों के संबंध ओर अधिक मजबूत व सुदृढ़ होंगे।

- Published/Last Modified on: October 5, 2017

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