दस समाचार (Top Ten News - in Hindi)

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विश्व: - विश्व में जहां एक ओर युवा नेतृत्व कमान संभाल रहा है, वहीं दूसरी ओर हमारे देश में अब भी बुजुर्ग राजनेता सवा सौ करोड़ से ऊपर की आबादी की दशा और दिशा तय कर रहे हैं। ये राजनेता हैं कि किसी भी सूरत में सेवानिवृत्त होने को तैयार ही नहीं है। इस युवा देश में क्यों न युवा नेतृत्व को भी आगे बढ़ने का समुचित अवसर मिलें?

  • ऑस्ट्रिया के नए चांसलर (कुलाधिपति) सेबेस्टियन कुर्ज की उम्र सिर्फ 31 साल है। न्यूजीलैंड की नई प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न सिर्फ 37 साल की हैं। टोनी ब्लेयर और डेविड कैमरन दोनों 43 की उम्र में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने। एमेनुअल मैक्रों 39 की उम्र में फ्रांस के राष्ट्रपति हैं। दुनिया में राजनीतिक दलों की औसत आयु सिर्फ 43 साल है। ऐसे में जिस तरह मतदाता खंडहर राजनीतिक दलों से ऊब रहे हैं, ये दल अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए लगातार नए खून को अपने साथ जोड़ रहे है और उन्हें आगे बढ़ा रहे हैं। इनकी तुलना में अगर भारत पर नजर डालें तो राजनीतिक दल अपनी बुजुर्गियत और वरिष्ठता की स्वामिभक्ति के साथ ठहरे से हैं। वर्ष 2014 में मौजूदा संसद में सिर्फ 12 सांसद 30 साल से कम उम्र के थे। एक तरफ हमारी आबादी (देश की औसत उम्र का मध्यांक 25 वर्ष है) लगातार युवा होती जा रही है, दूसरी तरफ संसद बुढ़ाती जा रही है।
  • पहली लोकसभा की औसत आयु 46 साल थी, जो कि दसवीं लोकसभा तक बढ़कर 51 साल हो चुकी थी। राजनेता सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर जाने के बाद भी वानप्रस्थ का कोई इशारा दिए बिना सत्ता की डोर थामे रहते हैं और, तब तक कुर्सी थामें रहते हैं जब तक कि उनका उत्तराधिकारी इसके लिए तैयार न हो जाए। गिने-चुने मामलों में कुछ युवा नेताओं को जिम्मेदारी के पद भी दिए गए, ज्यादातर मामलों में ऐसा मुख्यत: राजनीतिक विरासत के चलते ही हुआ। ऐसा भी नहीं है कि राजनीतिक दल युवा भारतीयों को शामिल ही नहीं करते। कहने को तो अधिकांश राजनीतिक दलों की युवा और छात्र इकाइयां हैं। लेकिन इनकी राजनीति में तरक्की प्रत्यक्षत: सीमित ही हैं। कुछ दलों में 75 साल सेवानिवृत्ति की उम्र तय करना एक स्वागत योग्य कदम है, फिर भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। आज के समय में राजनीति में हिस्सेदारी पैसे, विरासत और संपर्कों पर निर्भर है। संघर्षरत युवाओं को मजबूत बनाने के और भी रास्ते हैं। दक्षिण यूरोपीय देश सर्बिया एक 500 युवा राजनीतिक नेता कार्यक्रम चलाता है, जिसके तहत देश में लोकतंत्र के पुनरुद्धार के लिए नौजवान नेताओं को खोजकर राजनीतिक नेतृत्व को प्रश्रय दिया जाता है। इस कार्यक्रम में तरह-तरह की पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को राजनीतिक प्रशिक्षण मुहैया करा युवानेताओं का एक नेटवर्क (जाल पर कार्य) तैयार किया जाता है, जो पार्टी रुख से परे नीतिगत समाधान पेश कर सके और सत्ता प्रतिष्ठान के दरवाजे आमजन के लिए खोल सके। इस कार्यक्रम से युवा नेताओं को ताकत देने का एक मददगार राजनीतिक माहौल बनाने में सहायता मिली। इसके साथ ही वह राजनीतिक दलों में एकराय बनाने के साथ ही पार्टियों (दलों) की नीतियों पर भी प्रभाव छोड़ सके।
  • अफ्रीकी देश केन्या में भी नेशनल (राष्ट्रीय) डेमोक्रेटिक (लोकतांत्रिक) इंस्टीट्‌यूट (संस्थान) (एनडीआई) वर्ष 2001 से एक युवा राजनीतिक नेतृत्व अकादमी को मदद करता है। इस अकादमी में सभी दलों के युवा राजनीतिज्ञ अपने-अपने दलों में लागू की जाने वाली परियोजनाओं के साथ संधि वार्ता और जनसमर्थन विषय पर कौशल विकास प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। यूनिसेफ ने कोसोवो में वर्ष 2010 से 2013 के बीच इनोवेशंस (नवाचार) लैब (प्रयोगशाला) के लिए फंड (निधि) दिया। इसके तहत भावी नेताओं को मेंटर (गुरु) के साथ ही जरूरी सुविधाएं और सरकार में संस्थागत संपर्क मुहैया करवा कर सामाजिक रूप से प्रभाव छोड़ने वाले उनके विचारों का चयन किया जाना और उनको लागू किया जाना था। यूनाइटेड (संगठित) नेशंस (राष्ट्र का) डवलपमेंट (विकास) प्रोग्राम (कार्यक्रम) (यूएनडीपी) ने एशियाई देशों में युवा नेताओं की नेतृत्व क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय वर्कशॉप (कार्यशाला) के माध्यम से वर्ष 2007 और 2009 के बीच एशियन यंग (जवान) लीडर्स (नेता) प्रोग्राम (कार्यक्रम) चलाया। संस्थागत समर्थन से भी हमें काफी मदद मिल सकती है। विश्व के अनेक देशों जैसे मोरक्को, पाकिस्तान, केन्या, इक्वाडोर ने अपनी विधायिका में युवा नेताओं के लिए अलग से सीटें (स्थान) सुरक्षित कर रखी है। जब हमारे देश में समुदाय और जाति आधारित समूहों को आरक्षण दिया जा सकता है तो युवा नेताओं को क्यों नहीं दिया जा सकता? हमारे राजनीति ढांचे को राजनीति सशक्तीकरण के लिए मौके मुहैया कराए जाना चाहिए। स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में उन नेताओं को मौका दिया जाए जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया हो। ऐसे स्थानीय युवा नेताओं को कुछ राजनीतिक अनुभव हासिल करने के बाद राज्य विधानसभा चुनाव लड़ाना चाहिए और अंत में लोकसभा का चुनाव।
  • आखिर स्वस्थ लोकतंत्र में ऐसे ही तो जनप्रतिनिध बनते हैं। लेकिन वर्तमान में राजनीतिक दलों के आंतरिक लोकतंत्र में गिरावट, बेतहाशा बढ़ता चुनावी खर्च और स्थानीय निकाय, पंचायत और मेयर चुनाव में आरक्षण ने युवा नेताओं के आगे बढ़ने में रुकावटें खड़ी कर दी हैं। राजनीतिक दलों को गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को कुछ पदों पर आरक्षण दिए जाने के साथ ही मुख्यधारा की राजनीति में प्रोफेशनल्स (पेशेवरों) को शामिल करने के मुद्दे पर सक्रियता से विचार करने की जरूरत है। युवा राजनेता विशाल युवा आबादी वाले भारत की जरूरतों और ख्वाहिशों को समझते हैं। राजनीतिक दलों को ऐसे नेताओं को अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ने का मौका मुहैया कराकर लोकतंत्र को सशक्त बनाना चाहिए।

वरुण गांधी, सांसद, भाजपा, सुल्तानपुर से लोकसभा सदस्य, भारतीय जनता पार्टी के सबसे युवा महासचिव

उत्तर कोरिया: -उ. कोरिया ने 6वीं बार इंटर (दर्ज) कांटिनेंटल (महादव्ीपीय) बैलेस्टिक (प्रक्षेप) मिसाइल (प्रक्षेपण) (आईसीबीएम) का परीक्षण किया है। इसकी मारक क्षमता 13 हजार किमी से ज्यादा है। यह उ. कोरिया का सबसे शक्तिशाली मिसाइल है। सरकारी टीवी केसीएनए ने बताया कि इस मिसाइल का नाम हांगसोंग-15 है। यह वाशिंगटन डीसी समेत पूरे अमेरिका में कहीं भी मार कर सकती है। हांगसोंग-15 ने 4, 475 किमी की ऊंचाई तक गईं यह इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) स्पेस (अंतरिक्ष/जगह) से करीब 10 गुना ज्यादा है। इसके अलावा 950 किमी की दूरी तय की। 53 मिनट तक हवा में रही। उ. कोरिया ने इस साल 14वीं बार मिसाइल परीक्षण किया है। इससे पहले आखिरी परीक्षण इस साल 15 सितंबर को किया था। उ. कोरिया का कहना है कि यह अमेरिका से सुरक्षा करने के लिए जरूरी है, क्योंकि उसने 28, 500 सैनिकों को दक्षिण कोरिया में तैनात कर रखा है।

किम जोंग के मिसाइल परीक्षण निम्न हैं-

  • 150 मिसाइल परमाण्ुा परीक्षण उ. कोरिया ने 33 साल में किए हैं। इनमें से आधे से ज्यादा किम जोंग उन ने किए हैं।
  • 6 साल में किम जोंग उन ने 43 शॉर्ट (कम) रेंज (दूरी), 13 मीडियम (मध्यम), 10 क्रूज, 6 इंटर कांटिनेंटल मिसाइल व 4 परमाणु परीक्षण किए हैं।
  • 2 साल में उ. कोरिया ने 21वीं बार मिसाइल परीक्षण किया, इसमें चार असफल रहे हैं। तीन परमाणु परीक्षण भी किया है।

बैठक-

  1. जापान, अमेरिका, दक्षिण कोरिया के अधिकारियों ने आपात बैठक की। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने कहा है कि यह ऐसी परिस्थिति है, जिसे हम संभाल लेंगे।
  2. जापान के पीएम शिंजो आबे ने दुनिया से उ. कोरिया पर ज्यादा से ज्यादा दबाव डालने को कहा है। बोले-ऐसे कदम को निश्चित रूप से बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
  3. उ. कोरिया की मिसाइल जिस जगह जाकर गिरी, वह क्षेत्र जापान का एक्सक्लूसिव (अनन्य) इकोनॉमिक (अर्थव्यवस्था) जोन (क्षेत्र) है। जापान के ओमोरी दव्ीप से करीब 215 किमी दूर पश्चिम में हैं।
Image of Missile and their range left by Korea

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क्या है आईसीबीएम- इंटर कांटिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल या आईसीबीएम अंतरमहादव्ीपीय मिसाइल है। यह एक देश से दूसरे देश तक मार कर सकती है। यह एक कंट्रोल्ड (नियंत्रण) मिसाइल (प्रक्षेपण) होती है, जो कम से कम 5, 500 किमी की दूरी तय कर सकती है।

दुनिया में अब तक 7 देश आईसीबीएम मिसाइल का परीक्षण कर चुके हैं। इनमें रूस, अमेरिका, चीन, भारत, फ्रांस, इजरायल और उ. कोरिया शामिल हैं। रूस ने 1957 में पहली बार आईसीबीएम का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था। जिसने 6, 000 किमी की दूरी तय की। भारत ने 2012 में 5, 000 किमी तक मार करने वाली अग्नि-5 मिसाइल का परीक्षण किया था।

मिसाइल-दुनिया की सबसे लंबी दूरी तय करने वाली मिसाइल रूस के पास-

  • रूस- आर-36 एम 16000 किमी ये सबसे अधिक रेंज (दूरी) वाली मिसाइल है। वजन 8.8 टन है। गति 28, 440 किमी है।
  • अमेरिका- यूजीएम-133 ट्राइटेेंड-11, 300 किमी ये यूएस की सबसे अधिक रेंज वाली मिसाइल है। इसे पनडुब्बी से छोड़ा जाता है। गति 21, 000 किमी है।
  • चीन-डॉन्गफेंग 5-ए बी-13, 000 किमी इसकी जद में पूरा अमेरिका आता है। यह एक साथ कई निशाने साध सकती है।
  • फ्रांस- एम-51, 10, 000 किमी 2010 में सेना में शामिल हुई। पनडुब्बी से छोड़ा जा सकता है। 6 निशाने एक साथ साध सकती है।

उ. कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन ने भले ही परमाणु हथियार ले जाने वाली इंटर कांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें बनाने का दावा किया हो, मगर अमरीका के पास पहले से ही ऐसी विनाशक मिसाइलों को नष्ट करने की फुलप्रूफ (पूर्ण प्रमाण) तैयारी है। अमरीका ने धरती, समंदर और अंतरिक्ष में इमेजिंग सैटेलाइट (उपग्रह) और रडार तैनात किए हैं, जो दुश्मन की किसी भी गतिविधि को पलभर में भांप लेंगे। कई डिफेंस (रक्षा) सिस्टम (प्रबंध) हैं, जो पलक झपकते ही मिसाइल को भांप धरती के वातारण में प्रवेश करने से पहले ही अंतरिक्ष में नष्ट कर देंगे।

Image of Missile of North Korea

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ईकेवी डिफेंस (रक्षा) -ये इंटरसेप्टर (सेना वायुयान) मिसाइलें (प्रक्षेपण) धरती के वातावरण में प्रवेश करने से पहले ही 22, 000 मील प्रति घंटे की गति से दुश्मन की मिसाइलों को मार गिराती हैं।

पाकिस्तान: -पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। मुंबई में 2008 में 26 नवंबर को हुए आतंककारी हमले के मास्टर माइंड (विख्यात मन) हाफिज सईद को रिहा कर रहा है। लश्करे तैयबा पर प्रतिबंध के बाद जमात उद दावा के नाम से नया संगठन खड़ा करने वाले सईद को जनवरी में नजरबंद किया गया था। लाहौर उच्च न्यायालय ने उसे रिहा करने के आदेश दिए हैं। भारत ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताते हुए पाकिस्तान पर एक खतरनाक आतंककारी को मुख्यधारा में लाने का षड्‌यंत्र रचने का आरोप लगाया है। इस फैसले से साफ जाहिर होता है कि पाकिस्तान आतंककारियों को पनाह व समर्थन देने की अपनी पुरानी नीतियों पर ही चल रहा है। सईद ने भी रिहाई के आदेश के बाद कहा कि कश्मीरियों की आजादी की जंग को उनका समर्थन जारी रहेगा। सईद हरदम भारत के खिलाफ जहर उगलता रहा है।

  • पहले लश्कर और अब जमात उद दावा के आतंकी उसकी शह पर कश्मीर और भारत के अन्य हिस्सों में दहशतगर्दी फैलाते रहे हैं। अमरीका ने भी सईद पर एक करोड़ डॉलर (मुद्रा) का इनाम घोषित कर रखा है। हालांकि उसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के अमरीका व भारत के प्रयासों पर चीन संयुक्त राष्ट्र में अड़ंगा लगाता रहा है। सईद की रिहाई के आदेश में न्यायालय ने कहा कि पाकिस्तान सरकार पर्याप्त सबूत पेश करने में विफल रही है। ऐसा कैसे संभव हो सकता है। भारत समेत तमाम अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां (शाखा) 26/11 समेत तमाम आतंकी हमलों में हाफिज सईद का हाथ होने के अनेक सबूत पाकिस्तान सरकार को दे चुके हैं। साफ है इन सबूतों को पाक हुक्मरानों ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया है। पाकिस्तान आतंकी सरगना को सजा दिलाने के लिए कभी गंभीर नहीं रहा। हालांकि ऐसे संकेत मिले है कि वह हाफिज को रिहा करते ही किसी अन्य मामले में गिरफ्तार कर सकता है। इसके पीछे कारण साफ है। उसे अमरीका व अन्य यूरोपीय देशों से प्रतिबंध का डर है। फिर भी सईद के खिलाफ भारत को अपनी मुहिम जारी रखनी होगी। अब तो हमारे पास आसमान से ही बिना अंतरराष्ट्रीय सीमा पर किए आतंकी ठिकानों को तबाह करने की शक्ति ब्रह्योस है। पाकिस्तान को यह साफ बता देना चाहिए कि यदि उसने आतंककारियों को पनाह देना जारी रखा तो परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन जमात-उद-दावा का प्रमुख और 2008 के मुंबई हमलों का मास्टरमांइड हाफिज सईद की रिहाई पर पाकिस्तान को चेतावनी दी है। ट्रंप की प्रेस (मुद्रण यंत्र) सचिव सारा सैंडर्स ने एक बयान में कहा, अमेरिका सईद की रिहाई की निंदा करता है और उसकी दोबारा गिरफ्तारी की मांग करता है।’
  • सैंडर्स ने कहा, ”यदि पाकिस्तान सईद पर कानूनी रूप से कार्रवाई नहीं कर सकता और उसके अपराधों के लिए उस पर मुकदमा नहीं चला सकता तो पाकिस्तान को इसका अंजाम भुगतना पड़ेगा।” उन्होंने कहा कि सईद की रिहाई से अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का मुकाबला करने में पाकिस्तान की प्रतिबद्धता को लेकर गलत संदेश गया है। इससे अपनी धरती को आतंकवादियों का पनाहगाह नहीं बनने देने का पाकिस्तान का वादा झूठा साबित हुआ है। लश्करे तैयबा बनाने वाले और जमात उद दावा के प्रमुख सईद को पिछले हफ्ते रिहा कर दिया गया। पाकिस्तान सरकार ने किसी और मामले में उसकी हिरासत नहीं मांगी जिस पर न्यायालय ने उसे छोड़ने के आदेश दिए।

न्यूजीलैंड: -में दुनिया का ऐसा पहला रोबोट (यंत्र मानव) विकसित किया है, जो नेता बनेगा। कृत्रिम बंद्धिमान वाले इस रोबोट नेता ने हाल ही में आवास, शिक्षा, आव्रजन संबंधी नीतियों और स्थानीय मुद्दों पर पूछे गए सवालों के सटीक जवाब दिए हैं। सियासत में पारदर्शिता लाने के लिए उसे 2020 में न्यूजीलैंड में होने वाले आम चुनाव में उम्मीदवार बनाने की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं।

  • इस मशीनी (यंत्र) नेता का नाम ’सैम’ (एसएएम) है। इसे न्यूजीलैंड के 49 वर्षीय उद्यमी निक गेरिट्‌सन ने विकसित किया है। उन्होंने बताया, ’ऐसा लगता है कि फिलहाल राजनीति में कई पूर्वाग्रह हैं। दुनिया के नेता जलवायु परिवर्तन एवं समानता जैसे जटिल मुद्दों का हल नहीं निकाल पा रहे हैं।’ ग्रेरिट्‌सन मानते हैं। कि एल्गोरिदम में मानवीय पूर्वाग्रह असर डाल सकते हैं, पर पूर्वाग्रह प्रौद्योगिकी संबंधी समाधानों में चुनौती नहीं हैं। ग्रेरिट्‌सन का मानना है न्यूजीलैंड में 2020 के आखिर में आम चुनाव होंगे। तब सैम बतौर प्रत्याशी अपनी दावेदारी पेश कर सकेगा। वही, ’टेक (लेना) इन (में) एशिया’ ने अपनी रिपोर्ट (विवरण) में बताया कि प्रणाली भले ही पूरी तरह ’सटीक’ न हो, लेकिन यह कई देशों में बढ़ते राजनीतिक एवं सांस्कृतिक अंतर को भरने में मददगार हो सकती है।
  • न्यूजीलैंड में राजनीतिक उथल-पुथल के चलते रोबोट नेता की जरूरत: हाल में न्यूजीलैंड में राजनीतिक उथल-पुथल के बीच तीन दलों के गठजोड़ से जेसिंडा अर्देर्न प्रधानमंत्री बनी थीं। जेसिंडा देश के 150 साल के इतिहास में तीसरी महिला और सबसे युवा पीएम भी हैं। वे रिन्यूएबल (अक्षय) एनर्जी (ऊर्जा) और न्यूनतम वेतन बढ़ाने के मुद्दे पर सत्ता में आई हैं। उनकी पहल पर ही रोबोट सैम को वैकल्पिक नेता के तौर पर तैयार किया जा रहा है। जेसिंडा सैम के साथ विचार भी शेयर करती हैं।
  • सैम एक चैटबोट है फिलहाल इसे कानूनी वैधता नहीं मिली है। यह फेसबुक मैसेंजर (दूत) के जरिए लोगों को प्रतिक्रिया देना सीख रहा है। प्रायोगिकी तौर पर इस रोबोट पर न्यूजीलैंड से जुड़ी योजनाओं, नीतियों और तथ्यों से जुड़े सवाल पूछने के लिए लोगों को सूची में से दिए सवालों के विकल्प का चयन करना होता है। सैम उन सवालों का तय थ्योरी (सिद्धांत) और लोगों की राय के आधार पर जवाब दे रहा है।

रक्षा सौदा: - इतिहास में बोफोर्स ही ऐसी तोप है जिसने अपने दम पर चुनाव जीता। इसमें वीपी सिंह का भी कोई कम योगदान नहीं था। उन्होंने 1988 के इलाहाबाद उपचुनाव के साथ राजीव गांधी को राजनीतिक रूप से खत्म करने की चुनौती दी थी। ग्रामीण इलाहाबाद के मैदानों में मोटरसाइकिल पर घूम-घूमकर उन्होंने प्रचार किया।

  • उनका संदेश सरल सा होता: तीस साल हो गए बोफोर्स दलाली में न तो कोई पकड़ा गया, न किसी को सजा हुई। तोप ने करगिल में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। यह आर्टिलरी (तोपें) की मुख्य तोप बनी हुई है। इन 30 वर्षों में एक भी बोफोर्स और नहीं खरीदी गई, न बनाई गई फिर चाहे हाल ही ’धनूष’ नामक प्रोटोटाइप (प्रारूप) आजमाया गया। ऐसा दाग लगा है कि न और बोफोर्स खरीदी गई, न कोई कल-पुर्जे, गोला-बारूद और अन्य तोपें नहीं, किसी से दलाली वसूल नहीं की और न किसी को जेल भेजा। 1977 के बाद भारत ने रक्षा खरीद में यही किया है कि 1977 में पहली गैर-कांग्रेस सरकार चुनी गई थी और उसी साल केवल सोवियत सैन्य उपकरण खरीदने की परंपरा बदली गई।
  • जनता सरकार ने एंग्लो-फ्रेंच जेगुआर आजमाया। प्रतिदव्ंदव्ी एजेंटो (कार्यकताओं) ने पत्रकारों में खबरे फैलाई और दलाली का शोर मचा। इस रक्षा खरीद की रिपोर्टिंग (संवाद) में ’ग्रीनहाउस’ पत्रकारिता आई। जेगुआर विवादित हो गया और वह शुरू में सोची गई संख्या तक कभी नहीं पहुंचा। वह कितना अच्छा था इससे साबित होता है कि 40 साल बाद वायुसेना के पास 100 जेगुआर हैं। इसके बाद इंदिरा गांधी फिर सोवियत संघ की ओर मुड़ी। बाद में राजीव गांधी ने पूरा समीकरण ही बदल दिया। हमारे इतिहास में तीनों सेनाओं का पूरे संकल्प के साथ आधुनिकीकरण इंदिरा-राजीव के युग में हुआ। रक्षा बजट जीडीपी के चार फीसदी से ऊपर ले जाया गया, जबकि यह तब तक दो फीसदी या इससे नीचे होना आम था। उन्होंने फ्रांस से मिराज 2000, स्वीडन से बोफोर्स, मिलन मैत्रा मिसाइल (प्रक्षेपण) (फ्रेंच) और टाइप-209 पनडुब्बियां जर्मनी से खरीदी। हर सौदा घोटला बन गया। (या बनाया गया) । सैन्य क्षमता अधिकतम संभव क्षमता तक पहुंची। राजीव ने सोवियत उपकरण भी बड़े पैमाने पर खरीदे। बीएमपी बख्तरबंद वाहन, नई पनडुब्बियां और लीज (पट्‌टा) पर एक परमाणु पनडुब्बी (चक्र) ली। सत्ता गंवाकर उन्होंने इसकी कीमत चुकाई। इसमें दलाली व घोटाले होंगे लेकिन, कटु सत्य यही है कि आज यदि युद्ध हो तो मैदान में बहुत सारी सैन्य सामग्री वह होगी जिसे इंदिरा-राजीव ने या उनके बाद नरसिंह राव ने खरीदा।
  • रक्षा खरीद में भाजपा सरकारों का प्रदर्शन खराब है। ताबूत घोटाले (पूरी तरह काल्पनिक) का सामना करने वाली वाजपेयी सरकार ने युद्धकाल के अलावा ज्यादा खरीदी नहीं की। मोदी से बहुत अपेक्षा थी पर अब तक सिर्फ 36 राफेल विमानों का ऑर्डर (आदेश) दिया है, जबकि यूपीए सरकार ने 126 के लिए बातचीत की थी। वैसी ही सावधानी बरती जा रही है जैसी एके एंटोनी बरतते थे। मेक इन इंडिया (भारत में बनाना) और न जाने किस-किस की बात हो रही है। मजे की बात है कि भाजपा को बोफोर्स जैसे घोटाने के डर ने रोक रखा है। रक्षा पर समझौता न करना और हथियारों की कमी दूर करना मोदी जी के चुनाव प्रचार के मुख्य वादे थे। साढ़े तीन साल बाद झोली खाली है। डर, अनिर्णय और फोकस का अभाव इससे स्पष्ट है कि मोदी सरकार में चार रक्षा मंत्री हो चुके हैं। अब राफेल सौदे में मोदी की परीक्षा है। क्या वे कहेंगे कि मैं और मेरी सरकार ने कुछ गलत नहीं किया है। खरीद पर कायम रहेंगे बल्कि इसे विस्तार देंगे? वरना भारतीय वायु सेना मामूली ताकत रह जाएगी। एसयू-30 भी अब 20 साल पुराने हो चुके हैं। तीनों सेनाओं पर ध्यान देना होगा वरना इतिहास में मोदी का कमजोर आकलन होगा। राफेल पर पुरानी बातें दोहराई जाने लगी हैं। सबसे मूर्खतापूर्ण है तकनीकी का हस्तांतरण। छह दशकों में एचएएल और रक्षा उपक्रमों ने तकनीकी हस्तांतरण से आयातित प्रबंध असेंबल (इकट्‌ठा) किए हैं पर हेलिकॉप्टर छोड़े दे ंतो वे इससे कोई उपयोगी चीज बना नहीं सके हैं। हम आज भी इन्फेंट्री (पैदल सेना) राइफलों जैसे बुनियादी उपकरणों के ऑर्डर (आदेश) दे रहे हैं, कैंसिल (रद्द) कर रहे हैं फिर ऑर्डर (आदेश) दे रहे हैं। क्या मोदी जी में वह बात है कि देश वह खरीदें जो इसे खरीदन की जरूरत है और ’बनाना रिपब्लिक’ (गणतंत्र) (हमको ये भी बनाना है) की बातें बंद करें?
  • या तो राजीव की तरह जोखिम लेकर रक्षा आधुनिककीरण का बीड़ा उठाएं या सेना की घटती ताकत के चलते शी जिनपिंग और जनरल कमर बाजवा को बुलाकर अरुणाचल व कश्मीर का मसला सुलझा लें, फिर भारत में जो बचा हो उसकी रक्षा के लिए अमेरिका/नाटो से संधि कर लें और जैसा जापान ने दव्तीय विश्व युद्ध के बाद किया था भारत का रक्षा बजट जीडीपी के एक फीसदी तक सीमित रखने का वादा कर लें। तब एक फीसदी भी क्यों? क्योंकि उसकी जरूरत माओवादियों से लड़ने में हो सकती है। कुछ गणतंत्र-दिवस की परेड (व्यायाम भूमि) और वीकेंड (सप्ताहांत) पर सैन्य ठिकानों में मंत्रियों को फोटो खिंचवाने के लिए।

शेखर गुप्ता, एडिटर (संपादक) -इन (में) -चीफ (मुखिया) , ’द (यह) प्रिन्ट (छाप)

अमेरिका की लड़़ाई का नया तरीका

  • पुरी दुनिया में अमेरिकी स्पेशल (विशेष) कमांडो (छापामार) में बड़ती तैनाती का नाईजर एक छोटा उदाहरण है। किसी भी समय पर सेना की एलीट फोर्स (बल) की 8 हजार से ज्यादा जवान जिनमे नेवी सील (जलव्याघ्र) आर्मी (सेना) डेल्टा (नदीमुख-भूमि) फोर्स (बल) स्पेशल (विशेष) फोर्स (बल) आदि शामिल है अलग अलग देशों में तैनात होते है। 2001 में ऐसे जवानों की संख्या 2900 थी 2017 वे आते आते दुनिया के 143 देशों यानी तीन चौथाई हिस्से में तैनात किए जा चुके हैं। दुनिया में कभी भी अशांति हो, अमेरिका की स्पेशल (खास) ऑपरेशन (कार्यवाही) फोर्स (बल) वहां पहुंच जाती है। इराक, अफगानिस्तान, सीरिया और अन्य देशों में वे आतंकियों को मारने-पकड़ने का अभियान चला रहे हैं। मिस्त्र और सऊदी अरब में वे सैनिकों को विपरीत परिस्थ्ितियों से मुकाबला करने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। पूर्ववर्ती सोवियत संघ के देशों में वे रूसी प्रभाव को कम करने के काम में लगे हैंं। दक्षिण कोरिया में उनकी तैनाती उ. कोरिया को काबू में रखने के लिए की गई है।
  • पिछले 16 वर्षों में इस तरह के विशेष अभियान ही अमेरिका के लिए लड़ाई का नया तरीका बन गए हैं। स्पेशल फोर्स का इस्तेमाल पहले परंपरागत सैन्य अभियानों को मजबूती देने के लिए होता था, लेकिन देश के सबसे ज्यादा प्रशिक्षित ये सैनिक अब प्रशिक्षक, कूटनीतिज्ञ और संकटग्रस्त देशों के निर्माण के कामों में लगे हैं। हजारों सैनिकों की जगह स्पेशल फोर्स की छोटी टुकड़ी का आसान विकल्प हर राष्ट्रपति के कार्यकाल में आजमाया गया है, हालांकि यह बेहद खर्चीला है। अशांत देशों में इनकी तैनाती से अमेरिका के खिलाफ घृणा की भावना और बढ़ती है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अमेरिका को सुरक्षित रखने के मकसद में ये कहां फिट बैठते हैं, यह स्पष्ट नहीं है। स्पेशल फोर्स के पूर्व कमांडर जनरल डोनाल्ड बलडॉक कहते हैं कि इस मामले में कोई रणनीति ही नहीं बनाई गई है।
  • इससे स्पेशल फोर्सेस पर भी बुरा असर पड़ रहा है। इस साल अब तक चार देशों में स्पेशल फोर्स के 11 जवानों की मौत हो चुकी है। बिना सोचे-समझे तैनाती का नतीजा यह है कि पेंटागन को एक टास्क (कार्य) फोर्स (शक्ति) का गठन करना पड़ा है जो जवानों में बढ़ती नशाखोरी, पारिवारिक समस्याओं और आत्महत्या की समीक्षा कर रहा है। इन अभियानों की गति इतनी तेज है कि लड़ाई के दौरान भी जवानों से गलतियों की आशंका ज्यादा होती है। विशेष अभियानों पर बढ़ी निर्भरता अमेरिकी जरूरतों से पैदा हुई है। 11 सितंबर, 2001 को अल कायदा के हमले के बाद यह स्पष्ट हो गया कि परंपरागत सेना अमेरिका को सुरक्षित नहीं रख सकती। संसद ने राष्ट्रपति को अल कायदा के खिलाफ अभियान की अनुमति दी और स्पेशल फोर्स इसकी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन गए। जॉर्ज डब्ल्यू बुश राष्ट्रपति बने तो इराक ऐसे अभियानों का केन्द्र बन गया। बराक ओबामा ने पद संभालने के बाद दो लड़ाईयां बंद करने का भरोसा दिलाया, लेकिन स्पेशल कंमाडो के लिए परेशानियां और बढ़ गई। ओबामा ने युद्ध कार्यो में लगे परंपरागत सैनिकों की संख्या 1.5 लाख से कम कर 14 हजार कर दी, लेकिन स्पेशल कमांडो इराक, अफगानिस्तान या दूसरे देशों में बने रहे। ओबामा ने हालांकि स्पेशल (विशेष) ऑपरेशंस (कार्यवाही) का सालाना बजट बढ़ाकर 10.4 अरब डॉलर (मुद्रा) कर दिया और 15 हजार नए जवानों की भर्ती भी की। ट्रंप के कार्यकाल में भी यह ट्रेंड प्रवृत्ति बना हुआ है। स्पेशल (खास) फोर्स (शक्ति) के उपयोग के मामले में उन्होंने आक्रामक नीति अपनाई है।
  • स्पेशल ऑपरेशन की अल्फा टीम (दल) की पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा तैनाती होती है। इसके लिए चुने गए जवानों के चयन से लेकर प्रशिक्षण में एक से दो साल का समय लगता है। वे सैन्य प्रशिक्षण के अलावा उस देश की स्थानीय संस्कृति और भाषाएं सीखते हैं जहां उनकी तैनाती होनी है। उन्हें मेडिकल या खेती जैसे कामों का खास प्रशिक्षण भी दिया जाता है। लेकिन उनका मुख्य काम सैन्य अभियानों को अंजाम देना ही है। सेवानिवृत्त कमांडो (छापामार) रिचर्ड लैंब बताते हैं कि स्पेशल फोर्स को छह महीने की तैनाती के बाद छह महीने की छुट्‌टी का प्रावधान है, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। जवानों को बिना छुट्‌टी के दूसरी जगह पर भेज दिया जाता है। रक्षामंत्री जेम्स मैटिस का मानना है कि सेना इस समस्या का हल तलाश रही है। एक विकल्प यह हो सकता है कि कुछ जिम्मेदारियां परंपरागत सेना को दी जाएं। अगले साल की शुरुआत में इस अफगानिस्तान में तैनात किया जाएगा। अमेरिकी संसद के अकाउंटेबिलिटी (जवाबदेही) कार्यालय ने चेतावनी दी है कि स्पेशल ऑपरेशन फोर्स की संख्या बढ़ी है, लेकिन उनके अभियानों की संख्या इससे कई गुना ज्यादा बढ़ी है। इसके नतीजे खतरनाक हो सकते हैं, क्योंकि मौजूदा उपायों से हालात बेहतर होने की उम्मीद नहीं दिखती।

अमेरिका की सैन्य क्षमता

Table Contain Shows the US military capability

Table Contain Shows the US military capability

साल

कुल सैनिक

स्पेशल ऑपरेशन कमांडो

2001

14 लाख

43 हजार

2017

13 लाख

70 हजार

ब्रिटेन व भारत: - आईसीजे में न्यायाधीश के चुनाव में भारत के कूटनीतिक प्रयासों से छोटे-बड़े सभी देशों का समर्थन जुटाया गया। आखिर, ब्रिटेन के ग्रीनवुड के नाम वापस लेने से भारत के दलवीर भंडारी को सुरक्षा परिषद व महासभा, दोनों में बहुमत मिल गया। दुनिया के देशों ने लोकतांत्रिक परिपक्वता का परिचय दिया। निस्संदेह दुनिया में भारत मजबूत हुआ है।

  • सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश, मुंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस (न्याय) दलवीर भंडारी दूसरी बार इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) न्यायालय ऑफ (के) जस्टिस (न्याय) (आईसीजे) में निर्वाचित हुए हैं। यह चुनाव उनके लिए इतना सरल नहीं रहा जितना कि दिखाई देता है। उनका सीधा मुकाबला ब्रिटेन के प्रतिनिधि क्रिस्टोफर ग्रीनवुड से था। आईसीजे में निर्वाचित होने के लिए संयुक्त राष्ट्र की 15 सदस्यों वाली सुरक्षा परिषद और 193 सदस्य देशों वाली महासभा में जीतना जरूरी होता है। ग्रीनवुड को सुरक्षा परिषद में बहुमत हासिल था लेकिन महासभा में उन्हें बहुमत नहीं मिल पा रहा था उधर, भंडारी को महासभा में बहुमत मिल रहा था लेकिन वे सुरक्षा परिषद में पिछड़ जाते थे। ऐसे में बार-बार चुनाव हो रहे थे। आखिरकार बारहवें राउंड (चरण) में ग्रीनवुड ने अपना नाम वापस लिया और जस्टिस भंडारी 2018 से 2027 तक के लिए आईसीजे के न्यायाधीश चुन लिए गए। इससे पूर्व वे 2012 में छह वर्ष के लिए निर्वाचित हुए थे। तब आईसीजे में जॉर्डन से ताल्लुक रखने वाले न्यायाधीश ने तीन वर्ष के कार्यकाल के बाद अपना पद छोड़ दिया था क्योंकि वे जॉर्डन के प्रधानमंत्री बन गए थे। इस तरह रिक्त हुई आईसीजे के न्यायाधीश की कुर्सी के लिए भारत की ओर से दलवीर भंडारी को केन्द्र में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की मनमोहन सिंह सरकार ने मनोनीत किया था। तब उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा में 122 मत मिले थे। वर्तमान जीत के संदर्भ में उल्लेखनीय बात यह भी है कि 2012 में महासभा में मिली जीत के मुकाबले इस बार पिछले 11 राउंड के मुकाबलों में महासभा में भंडारी को अपेक्षाकृत कम मत मिल रहे थे। यह बात दीगर है कि ब्रिटेन के प्रतिनिधि ग्रीनवुड के मुकाबले ये मत जरूर अधिक रहा करते थे। सुरक्षा परिषद में लगातार जीत रहे ग्रीनवुड के लिए महासभा में ब्रिटेन समर्थन अभियान चला सकता था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और बारहवें राउंड में उसके प्रतिनिधि ने अपना नाम वापस ले लिया।
  • इस तरह दलवीर भंडारी मैदान में एकल उम्मीदवार ही रह गए और उनको सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्यों और महासभा के 193 में से 183 सदस्यों का समर्थन मिल गया। भंडारी की जीत इतनी दुष्कर शायद नहीं होती जितनी इस बार रही अगर उन्हें पहले ही मनोनीत कर लिया गया होता। भारत सरकार ने उनके मनोनयन में काफी देर लगा दी थी। उनका मनोनयन जून 2017 में हुआ। यदि वही मनोनयन पहले हुआ होता तो भंडारी के पक्ष में पर्याप्त समर्थन जुटाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता। बहरहाल, इस जीत से समूचा भारत खुश है। ऐन वक्त पर किए गए प्रधानमंत्री मोदी के कूटनीतिक प्रयास सफल हुए। शुरुआती प्रयास विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने किए थे लेकिन वे कारगर नहीं हो पा रहे थे। ऐसे में मोदी को मैदान में आना ही पड़ा और समर्थन अभियान की कमान संभालनी पड़ी। जुलाई में ब्रिक्स सम्मेलन में शिरकत के दौरान ब्रिक्स के सदस्य देशों से निजी तौर पर समर्थन मांगा गया। दुनिया के अन्य छोटे-बड़े सभी देशों के विदेश मंत्रियों से बातचीत की गई। यहां तक कि विदेश राज्यमंत्री एज. जे. अकबर ने छोटे-छोटे देशों का दौरा भी किया। वे जहां भी जाते प्रधानमंत्री मोदी का पत्र लेकर जरूर जाते थे और भंडारी के पक्ष में समर्थन की बात करते थे। इस मामले में उन्होंने सेनेगल के राष्ट्रपति से भी मुलाकात की। वे घाना सहित कई राजनयिकों से मिले और समर्थन जुटाया। इसके अलावा मोदी के आग्रह पर ही अमरीका भंडारी के समर्थन में सहयोग करने के लिए आगे आया। अमरीका के विदेश मंत्री रेक्स टिलर्सन और संयुक्त राष्ट्र में अमरीका की राजदूत निक्की हेली को इस काम के लिए आगे किया गया। उल्लेखनीय है कि निक्की हेली भारतीय मूल की है और अमरीका में सफज अधिवक्ता भी रही हैं। उन्होंने भारत के पक्ष में वातावरण बनाने में सक्रिया भूमिका निभाई। उन्होंने ब्रिटेन का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में भंडारी को पर्याप्त समर्थन हासिल है और चुनाव के हरेक राउंड के बाद इसमें बढ़ोतरी भी होती जा रही है।
  • इसका सीध सा अर्थ यह है कि दो तिहाई से अधिक दुनिया ब्रिटेन के प्रतिनिधि ग्रीनवुड के विरुद्ध है। ब्रिटेन ने भी लोकतंत्र में आस्था दिखाते हुए इस तर्क को स्वीकार किया। इस तरह ब्रिटेन ने आईसीजे के 71 वर्षों के इतिहास में पहली बार अपने प्रतिनिधि का न होना स्वीकार किया और ग्रीनवुड को 12वें राउंड के मतदान से पूर्व ही नाम वापस लेने को कहा। इसके बाद भारत को सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्यों के अलावा महासभा के 183 सदस्य देशों का समर्थन हासिल हो गया जो दुनिया में परिपक्व होते लोकतंत्र की ओर संकेत करता है इसलिए जस्टिस भंडारी की जीत भारत के साथ लोकतंत्र की जीत है। इस बात से कोई संदेह नहीं है कि भंडारी की जीत से संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थिति मजबूत हुई है। दुनिया में बढ़ते भारतीय रूतबे से सुखद अनुभूति होती है। लेकिन, भारत को यहीं पर नहीं रूक जाना चाहिए। अब जरूरत इस बात की है कि जिस तरह से भारत ने जस्टिस भंडारी के पक्ष में समर्थन जुटाकर दुनिया के देशों को अपने साथ जोड़ा है उसे अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्यता के लिए इसी तरह के प्रयास करने चाहिए।

धर्मेन्द्र भंडारी, कई देशो के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रमों में सलाहकार रहे और राजस्थान विश्वविद्यालय में अध्यापन कर चुके हैं।

  • अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी के दोबारा चुने जाने से यह साबित हो गया कि दुनिया के मंच पर भारत की राजनयिक पकड़ अमीर और ताकतवर देशों को टक्कर दे रही है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी ने इसे भारत के लिए गौरव का क्षण बताते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के प्रयासों की सराहना के साथ उन्हें बधाई दी है। सुषमा स्वराज ने भी वंदे मातरम्‌ का घोष करते हुए इसे देश की विजय बताया है। इसे ब्रिटेन जैसे ताकतवर देश पर भारत जैसे उभरते देश की विजय के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि न्यायमूर्ति भंडारी के चयन का मामला उनके और ब्रिटेन के उम्मीदवार न्यायमूर्ति ग्रीनवुड के बीच ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद के मध्य टकराव के रूप में उपस्थिति हो गया था। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य इजरायल और पाकिस्तान के मामले में प्रतिबंधों के सवाल पर अपने वीटों का प्रयोग करते रहे हैं और उससे विश्व के लोकतांत्रीकरण में या आतंकवाद और अपराध को काबू करने में बाधा पैदा होती है।
  • उसका भुक्तभोगी फिलिस्तीन और अरब देशों के साथ भारत भी रहा है। संभवत: यह अहसास सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों को हो गया और उन्होंने कम से कम अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के लिए ऐसी कटुता टालते हुए ब्रिटेन की उम्मीदवारी को वापस ले लिया। भारत के सुप्रीम (सर्वोच्च) कोर्ट (न्यायालय) के पूर्व न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी महासभा में लगातार जीत रहे थे और उनकी वह जीत 11 बार तक होती रही। जबकि ब्रिटेन के जज ग्रीनवुड सुरक्षा परिषद में भारी पड़ रहे थे लेकिन, महासभा में हार रहे थे। आमतौर पर महासभा में जिस उम्मीदवार को बहुमत मिलता है उसे ही चुना जाता था लेकिन, इस बार दोनों सदनों के अलग-अलग मत आने के कारण हारते ब्रिटेन ने तो एक बार संयुक्त अधिवेशन कराने की भी तैयारी शुरू कर दी थी। इस जीत की खुशी के बावजूद यथार्थ यही है कि आईसीजे के फैसले बाध्यकारी नहीं है। उनके फैसले को लागू करना संप्रभु देशों की इच्छा पर ही निर्भर करता है। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय कानून और लोकतंत्र के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा सुरक्षा परिषद ही है। पूरे मामलें में एक सीख भी है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यता के मौजूदा ढांचे में बदलाव बेहद जरूरी है। वह बदलाव उसमें भारत को शामिल करने या स्थायी सदस्यता की व्यवस्था समाप्त करने से ही संभव होगा।

बॉन सम्मेलन: - जलवायु परिवर्तन पर बॉन में हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विकसित देशों, खासकर अमरीका के अड़ियल रवैये की वजह से कोई सहमति नहीं बन पाई। विकसित देश जलवायु परिवर्तन के लिए विकासशील देशों को ज्यादा जिम्मेदार ठहराते हुए उनसे अधिक क्षतिपूर्ति की मांग करते आ रहे हैं। कितनी जायज है विकसित देशों की मांग?

  • पिछले दिनों फिजी की अध्यक्षता में जर्मनी के बॉन में जलवायु परिवर्तन पर बैठक हुई। दो साल पहले पेरिस में ऐसी ही बैठक में 197 देशों के बीच पेरिस समझौता हुआ था। इस समझौते के अनुसार सभी देश मिलकर प्रयास करेंगे कि सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में 2 डिग्री से ज्यादा की वृद्धि न हो। बेहतर प्रयास से इस वृद्धि को 1 डिग्री (तापमान) तक ही रोकने का प्रयास भी किया जाएगा। पेरिस समझौते पर राष्ट्रसंघ के 197 देशों में से 170 देशों ने मुहर लगा दी है। पिछले वर्ष मर्राकेश मेंं और इस वर्ष बॉन में बैठक का उद्देश्य पेरिस समझौते को अमल में लाने के लिए कानून-कायदे बनाना था। पेरिस समझौते पिछले वर्ष मर्राकेश में ही प्रभाव में आ गया था। बॉन बैठक में विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ा विषय यह था की नियम बनाने में विश्व के विभिन्न देशों की प्रगति और उनकी क्षमता को देखते हुए उनके प्रयासों में समता कैसे स्थापित की जाए? हालांकि विकसित देश जिनका उत्सर्जन विकासशील देशों से कई गुना ज्यादा है, इस बात पर अड़े रहे की पेरिस समझौते में देशों में कोई विभेद नहीं है और सबको सामान और साझा प्रयास करना होगा। अमरीका ने इस वर्ष जून मेें ही पेरिस समझौते से बाहर निकलने की इच्छा जाहिर कर दी थी।
  • राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार यह समझौता भारत और चीन जैसे देशों को उत्सर्जन कम करने को नहीं कहता और अमरीका के उद्योगों और अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक दबाव डालता है। यह बैठक अमरीका के पेरिस समझौते से हटने के बाद पहली बैठक थी और दुनिया में इस बात को देखने को कौतुहल था की अमरीका के बिना जलवायु परिवर्तन की बातचीत और वैश्विक प्रयासों पर क्या असर रहेगा? अमरीका ने राष्ट्रीय स्तर पर पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के द्वारा लाए गए उत्सर्जन कम करने वाले कई नियमों को खत्म कर दिया। इनमें क्लीन (साफ) पावर (शक्ति) एक्ट (अधिनियम) को खत्म करना और र्प्यावरण संरक्षण एजेंसी (शाखा) की शक्तियां कम करना शामिल हैं। अमरीका के कई राज्य अभी भी उत्सर्जन कम करने के अपने विश्वास पर अडिग हैं और इसके लिए प्रयासरत रहे है। ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन का बजट भी कम किया है जिसके फलस्वरूप इस बैठक में अमरीका के प्रतिनिधिमंडल में बीस से कम लोग थे। पहले यह संख्या 70 से अधिक होती थी। आशा के अनुरूप पूरे सम्मेलन में अमरीका की भूमिका काफी नकारात्मक थी। अमरीका व कुछ अन्य विकसित देशों की वजह से निर्णय प्रक्रिया काफी बाधित रही और बातचीत में प्रगति काफी धीमी।
  • खासकर वर्ष 2020 (जब पेरिस समझौता लागू होगा) उससे पहले के प्रयासों, विकासशील देशों को आर्थिक संसाधन की उपलब्धता और पेरिस समझौते के नियम-कानूनों में देशों और उनके प्रयासों के बीच समता स्थापित करने पर अमरीका का रुख काफी विपरीत रहा। अमरीका ने सम्मेलन की शुरुआत में ही अपना रुख तब स्पष्ट कर दिया था जब उसके प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख ने कहा कि इस बैठक में अमरीका का लक्ष्य विकासशील देशों के प्रयासों में समता की मांग को खारिज करवाना है। लेकिन अमरिका के भरसक प्रयासों के बाद जलवायु परिवर्तन के खिलाफ संघर्ष में वैश्विक एकता सराहनीय रही। ऐसे में भारत का कहना था कि विकसित देश समझौता लागू होने से पहले उत्सर्जन कम करने के वायदे पर अमल करे। भारत के नेतृत्व में विकासशील देशों ने विकसित देशों को उनके दोहा-2012 और वासों-2013 में किए गए वादों की याद दिलाई और उन्हें पूरा करने की मांग की। विकसित देशों खासकर यूरोपियन यूनियन (संघ) व अमरीका के हस्ताक्षर न करने से दोहा संशोधन लागू नहीं हो पाया। पेरिस समझौता हो जाने के बाद विकसित देशों की दोहा संशोधन पर मुहर लगाने की मंशा और कमजोर हुई है और 2020 से पहले वह कोई प्रयास करने में गंभीर नहीं दिखते। अमरीका और यूरोपीयन यूनियन की खिलाफत के चलते 2020 से पहले के प्रयास का मुद्दा सम्मेलन के एजेंडे (कार्यसूची) पर नहीं आ पाया। अंतरराष्ट्रीय बैठकों का एक ही चरित्र है। चीजें जब तक टाली जा सके टाल दो। वैज्ञानिक साक्ष्य बताते है कि जलवायु परिवर्तन के परिणाम गंभीर और अप्रत्याशित हैं। प्रयास के लिए समय काफी कम है। खासकर अगर मंशा तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री पर रोकना है तो काफी सार्थक और गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है। सम्मेलन शुरू करने से पूर्व प्रकाशित यूरोप की उत्सर्जन रिपोर्ट (विवरण) में बताया की पेरिस समझौते के तहत किए गए वायदे उत्सर्जन कम करने की वैज्ञानिक आवश्यकता का सिर्फ एक तिहाई है। पेरिस समझौता सही में अमल भी किया जाए तो इस सदी के अंत तक 3 डिग्री की तापमान वृद्धि हो सकती है। औद्योगीकृत देशों को भी जीवाश्म ईंधन की खपत और उत्सर्जन कम करने की आवश्यकता होगी। प्रयासों में देरी से जलवायु परिवर्तन का प्रकोप और बढ़ेगा। सबसे ज्यादा मार गरीब देशों पर पड़ेगी। उनका विकास अवरुद्ध होगा और उत्सर्जन कम करने का खर्च भी बढ़ेगा। इन सारे तथ्यों को धता बताते हुए विकसित देशों का रवैया वही ढाक के तीन पात वाला रहा। विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन की मार से जुझ रहे लोगों के लिए शायद ऐसे सम्मेलन सुरक्षित भविष्य की आशा की टिमटिमाती लौ की तरह है।

अजय कुमार झा, ’बियॉन्ड कोपेनहेगन’ के संयोजक, ’पैरवी संस्था के निदेशक’ जलवायु परिवर्तन, विकास और अधिकारों के लिए कार्यरत

नया वित्त आयोग: -केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 15वें वित्त आयोग के गठन को अपनी मंजूरी दे दी है। अब अगले कुछ ही दिनों में केन्द्र सरकार इसके अध्यक्ष और चार अन्य सदस्यों के नामों की घोषणा कर देगी। आमतौर इसके अध्यक्ष या तो राजनेता होते है या फिर कोई अर्थशास्त्री। कई अवसरों पर नौकरशाहों को भी यह कुर्सी मिली है। कायदे से देखें तो वित्त आयोग का काम बहुत ही महत्वपूर्ण है। खासतौर से देश की अर्थव्यवस्था के लिहाज से। वित्त आयोग जो सिफारिशें करता है, पांच साल तक देश भर की सरकारें उन्हीं पर काम करती है। देखा जाए तो एक तरह से वह केन्द्र और राज्यों के वित्तीय संबंधों की धुरी होता है। योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग के गठन तथा वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद के परिदृश्य में नए वित्त आयोग का काम बहुत जिम्मेदारी का हैं। वैसे तो उसके काम करने का क्षेत्र और शर्ते भारत सरकार तय करती है। यह काफी कुछ परिभाषित -सा भी है। लेकिन बदलते समय के साथ इनमें बदलाव काफी जरूरी लगता है। आज से 65 साल पहले जब वित्त आयोग ने कामकाज शुरू किया था तब देश के पास संसाधनों के नाम पर कुछ नहीं था। आज तो देश का गरीब से गरीब आदमी अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहा है। ऐसे में यह जरूरी है, कि, राजकोष की पाई-पाई देश के काम आए। भ्रष्टाचार में बहने से रूके। यह स्पष्ट करना बहुत जरूरी है कि कौन-सा क्षेत्र और योजनाएं केन्द्र सरकार के पैसे से चल रही हैं और कौन-सी राज्यों सें। शहर और गांव की सरकारों को कहां से कितना पैसा मिल रहा है और वो खुद क्या जुटा रही हैं। पहले राज्य केन्द्र से अधिकाधिक मदद के लिए लड़ते थे। प्राकृतिक आपदाओं के नाम पर मदद की राजनीति खूब होती थी। अब वैसा ही हाल सांसद और विधायक निधियों का है। क्यों नहीं धनराशि के आवंटन की मदों का एकीकरण किया जाए। एक ही काम को दस योजनाओं के तहत दस एजेंसियों (शाखा) से कराना बंद किया जाए जिसमें जनता के धन के अपव्यय की आशंकाएं खूब रहती हैं। अभी हम विकास की जिस राह पर हैं उसमें स्वयंसेवी संस्थाओं के नाम होने वाली पैसे की बड़ी लूट भी रुकनी चाहिए। इसलिए यह जरूरी है कि नए वित्त आयोग के काम करने का तरीका भी नया हो।

जिम्बाब्वे: - जिम्बाब्वे की सेना ने 15 नवंबर को राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे को नजरबंद कर दिया था। सेना ने इसे सफाई अभियान बताया था। 2 दिन बाद मुगाबे जनता के सामने आए। सेना और मुगाबे की पार्टी (दल) जनू-पीएफ ने इस्तीफे के लिए कहा, पर मुगाबे नहीं माने। जनता भी 2 दिन से प्रदर्शन कर रही थी।

जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे ने सेना, पार्टी और जनता के बढ़ते दबाव के बाद पद से इस्तीफा दे दिया। मुगाबे ने संसद को चिट्‌टी लिखकर कहा है कि उन्होंने अपनी मर्जी से ये फैसला लिया है। ये घोषणा जिम्बाब्वे संसद के स्पीकर (वक्ता) जैकब मुडेंडा उस समय की, जब संसद की संयुक्त बैठक में मुगाबे के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर सांसद बहस कर रहे थे। मुडेंडा ने मुगाबे का इस्तीफा पढ़कर सुनाया। इसके साथ ही देश में 37 साल के मुगाबे का शासन का अंत हो गया। इस्तीफे की खबर सुनते ही, जनता सड़कों पर आ गई और जश्न मनाने लगी। सेना ने 15 नवंबर को मुगाबे को नजरबंद कर दिया था। सेना ने मुगाबे के खिलाफ यह कार्रवाई उपराष्ट्रपति इमर्सन मनंगावा को हटाने के विरोध में की थी। इसके बाद मुगाबे की पार्टी जनू-पीएफ ने इस्तीफा देने अन्यथा महाभियोग का सामना करने की चेतावनी दी थी। पार्टी के 260 में से 30 सदस्यों ने मुगाबे पर महाभियोग के पक्ष में वोट दिया था।

सेना द्वारा मुगाबे को नजरबंद करने के बाद गिरफ्तारी के डर से सत्तारूढ़ पार्टी जनू-पीएम के अधिकांश सांसद या तो देश से बाहर चले गए हैं या वे अज्ञात ठिकानों पर छिपे हुए हैं। माना जा रहा है कि मुगाबे की पत्नी ग्रेसी भी देश छोड़कर दुबई या मलेशिया पहुंच चुकी हैं। उनका एक हफ्ते से कोई पता नहीं है।

तीन वजह-जिनके चलते रॉबर्ट मुगाबे इस्तीफा देने को मजबूर हुए

  1. इमर्सन मनंगावा- उपराष्ट्रपति पद से हटाए गए इमर्सन मनंगावा को पहली बार खुलकर सामने आ गए। बोले- जनता एक सुर में मुगाबे से हटने की मांग कर रही है। उन्हें उनकी भावनाओं को देखते हुए इस्तीफा दे देना चाहिए।
  2. सेना- सेना ने 15 नवंबर को मुगाबे को परिवार समेत नजरबंद कर दिया था। इसकी वजह, इमर्सन मनंगावा की बर्खास्तगी को माना गया। बाद में सेना ने उनसे इस्तीफे के लिए कहा। सेना और मुगाबे के बीच कई दौर की बातचीत भी हुई
  3. पार्टी- 19 नवंबर को मुगाबे को उनकी पार्टी जनू-पीएम ने नेता पद से हटा दिया। उन्हें राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने को कहा। पार्टी कार्यकताओं ने देश भर में प्रदर्शन शुरू कर दिया। पार्टी ने उन्हें तक अल्टीमेटम (अंतिम शर्त) दिया था।

इमर्सन मनंगावा जिम्बाब्वे सेना के बड़े चहेते बताए जाते हैं। उन्होंने जिम्बाब्वे की आजादी में अहम भूमिका निभाई थी। उन्हें मुगाबे का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता था। लेकिन मुगाबे ने पत्नी ग्रेसी के उकसाने पर बर्खास्त कर दिया था। अब पार्टी उन्हें अपना नेता चुन सकती है। उन्हें देश का अगला राष्ट्रपति भी बताया जा रहा है।

उत्तर कोरिया: -उ. कोरिया के साथ बढ़ती तू तू - मैं मैं संकेत दे रही है कि हालात अमरीका के नियंत्रण से बाहर हो रहे है। इस बीच दक्षिण कोरिया के साथ वह सालाना संयुक्त युद्धाभ्यास भी करने जा रहा है। ऐसे में भड़के हुए उ. कोरिया को नियंत्रित करने के लिए चीन व रूस का सहयोग क्या कारगर हो पाएगा?

  • आज से अमरीका और द. कोरिया के सालाना सैनिक अभ्यास ’विजिलेंट ऐस’ की शुरूआत हो रही है। इसमें दोनों देशों के करीब 12 हजार सैनिक 230 लड़ाकू विमानों को उड़कार अभ्यास करेंगे, जिसमें एफ-22 रेप्टर (शिकारी पक्षी) स्टील्थ (गोपनीयता) लड़ाकू विमान भी शामिल होंगे। अमरीका और द. कोरिया आठ सैनिक अड्‌डों पर मिलकर युद्ध में सुरक्षा का अभ्यास करेंगे। पिछले सप्ताह उ. कोरिया ने ह्वासुंग-15 नामक अंतरमहादव्ीपीय मिसाइल (प्रक्षेपण) परीक्षण किया था। इससे बने तनाव के माहौल में ये अमरीका-दक्षिण कोरिया का संयुक्त सैन्य अभ्यास आग में घी का काम करेगा। पहले से ही चीन और रूस, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उ. कोरिया के नेता को लेकर आक्रामक भाषा पर अपनी परेशानी जता चुके है। गत सप्ताह संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में अमरीका की राजदूत निक्की हेली ने जब ’उ. कोरिया को पूर्णत: नष्ट’ करने की बात की तो रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावारेव ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यदि अमरीका केवल उ. कोरिया को नष्ट करने के कारण ही ढूंढ रहा है तो रूस को भी सोचना होगा कि इस मुद्दे पर किस तरह के कदम उठाए।
  • रूस इस मामले में उलझे सभी देशों को संयम की ओर ले जाना चाहता है ताकि ये क्षेत्र संभावित विध्वंस से बच सके। उन्होंने दोनों तरफ के देशों को शांतिपूर्वक कूटनीतिक वार्तालाप से इसको सुलझाने का आग्रह किया। चीन भी बार-बार कह चुका है कि दोनों गुटों को आक्रामक भाषा से बचना चाहिए। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कई बार कहा कि चीन उ. कोरिया पर परमाणु और मिसाइलों के परीक्षण पर रोक लगाने के लिए तभी दबाव बना सकता है जबकि अमरीका व द. कोरिया भी अपने सैन्य अभ्यासों पर रोक लगाए। लेकिन, इन बातों का असर राष्ट्रपति ट्रंप पर नहीं दिख रहा। जब उ. कोरिया ने ह्वासुंग-15 का परीक्षण किया तो ट्रंप ने ट्‌वीट कर कहा कि उन्होंने चीन के राष्ट्रपति से बातचीत की है और वे परीक्षण से उत्पन्न खतरे को संभाल लेंगे। लेकिन, अगले ही दिन उन्होंने एक अन्य ट्‌वीट में कह दिया कि चीन का अब इस ’अदने रॉकेट (अग्निबाण) वाले’ (किंग जुंग उन) पर कोई असर नहीं है। इससे न केवल वे इस तनाव को बढ़ावा दे रहे हैं बल्कि चीन और रूस के सहयोग की संभावना को भी कमजोर कर रहे हैं। आज अमरीका, उ. कोरिया के परमाणु और मिसाइलों के परीक्षणों के आगे कमजोर होता जा रहा है और नेतृत्व धीरे-धीरे चीन व रूस के हाथ में आता जा रहा है।
  • उ. कोरिया अब तक परमाणु हथियारों वाला देश बन चुका है और इसकी मिसाइलें दक्षिण अमरीका को छोड़कर दुनिया के किसी भी कोने तक मार कर सकती हैं। ह्वासुंग-15 एक बड़े परमाणु बम को लेकर 13 हजार किलामीटर तक मार कर सकती है। उ. कोरिया अंतरराष्ट्रीय पांबदियों को नकारते हुए लगातार ’फिसाइलमेटेरियल (सामग्री) ’ का उत्पादन करता रहा है और परमाणु बमों के लघुरूपण में सक्षम है। मिसाइलों में भी वह दोनों ठोस एवं द्रव्य ईंधन का इस्तेमाल करता है और जैसा कि पिछले सप्ताह सुरक्षा परिषद में भी कहा गया कि जबर्दस्त अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों के बावजूद कुछ देश लगाातर उ. कोरिया को तकनीकी सहायता पहुंचा रहे हैं। उ. कोरिया के आज 164 देशों से राजनयिक संबंध है। और 45 देशों में उ. कोरिया के दूतावास मौजूद है। करीब 24 देशों के दूतावास उ. कोरिया में हैं। इनमें कई बड़े देश जैसे ब्रिटेन, जर्मनी, रूस, चीन, पाकिस्तान और भारत भी शामिल हैं। यद्यपि भारत ने भी उ. कोरिया के मिसाइल परीक्षणों की निंदा की है लेकिन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने वहां दूतावास को आपसी बातचीत और सूचनाओं के लिए जरूरी भी बताया है।
  • उ. कोरिया हमेशा से अमरीका से सीधी बात करने की मांग करता रहा है जबकि अमरीकी नेता लगातार उ. कोरिया से अपने परमाणु व मिसाइल कार्यक्रम को खत्म करने की मांग करते रहे है। अब जब उ. कोरिया अपने आप को पूर्णत: परमाणु हथियारों वाला देश मानता है तो शायद उसके परमाणु व मिसाइलों की योजना को समाप्त करने से पूर्व शर्त लगाना प्रभावी नहीं हो सकता। परमाणु हथियारों व अंतरमहादव्ीपीय मिसाइलों के अपने ऐतिहासिक लक्ष्य में सफल हो चुके उ. कोरिया को अब परमाणु भय दोहन से डराना आसान नहीं। उ. कोरिया आज इस स्थिति में है कि अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों में लचीलापन लाने के लिए मोलभाव कर सकता है। वह अपनी सेना के आधुनिकीकरण और आर्थिक उन्नति के नाम पर भी मोलभाव कर सकता है। आज खतरा गलत समझा और गलत सूचना से ही युद्ध छिड़ने का ही नहीं है बल्कि तकनीकी कारणों से भी हथियारों की देखरेख को खतरा हो सकता है। उ. कोरिया के हथियारों की प्रभावोत्पादकता, दक्षता और सटीकता पर भी सवाल बने हुए हैं। एक समय अमरीका ने पाकिस्तान के हथियारों की सुरक्षा और देखरेख के लिए पहल की थी। पाकिस्तान की बहुकेन्द्रित राजनैतिक व्यवस्था की तुलना में उ. कोरिया में शक्ति केन्द्र एक ही है इसलिए वहां ऐसी पहल आसान रहेगी। यह अतिआवश्यक भी है। जब तक यह नहीं हो सकता, अमरीका को चाहिए कि वह उ. कोरिया को परमाणु परीक्षण से रोकने के लिए बने सिक्स (छ: ) पार्टी (दल) टॉक्स (बाते) के लिए प्रोत्साहित करे।
  • उ. कोरिया रासायनिक और जैविक हथियारों का इस्तेमाल भी कर सकता है। अमरीका की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) के यूएस-कोरिया इंस्टीट्‌यूट (संस्थान) के अनुसार परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होने पर कम से कम 21 लाख लोगों की जानें जाने का खतरा है और करीब 77 लाख लोग इससे दुष्प्रभावित हो जाएंगे
  • सिओल कोरियाई सीमा से 35 मील दूर है, कॉन्ग्रेसनल रिसर्च (अध्ययन) सर्विस (सेवा) रिपोर्ट (विवरण) के मुताबिक विनाश के उ. कोरियाई हथियारों के इस्तेमाल बिना युद्ध पूर्व दो दिनों में 3 लाख जानें जा सकती हैं।

प्रो. स्वर्ण सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार, जेएनयू के सेंटर (केन्द्र) फॉर (के लिये) इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) पॉलिटिक्स (राजनीतिक) , ऑर्गेनाइजेशन (संस्था) एंड (और) डिस्आर्मामेंट (निरस्त्रीकरण) विभाग में अध्यापन का लंबा अनुभव

कांग्रेस: -

  • राहुल गांधी, कांग्रेस का निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाने वाले हैं। सोनिया गांधी के कार्यकाल में जहां कांग्रेस ने दो बार केन्द्र में और 26 राज्यों में सरकार बनाई थी वहीं आज दो अंकों में सिमटी देश की सबसे पुरानी पार्टी (दल) अपने अस्तित्व के लिए भी संघर्षरत है। क्या गांधी-नेहरू परिवार का नया नेतृत्व कांग्रेस के वो सुनहरे दिन फिर से लौटा पाएगा……. ?
  • अगले कुछ दिनों में राहुल गांधी देश में सबसे ज्यादा समय तक सत्तासीन रहे और 132 साल पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभालने वाले है।। इस पद पर वे निर्विरोध चुने जाएंगे। यह देखा गया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से कांग्रेस अध्यक्ष पद पर अधिकतर गांधी नेहरू परिवार का सदस्य ही आसीन रहा है। इतिहास गवाह है कि जब जब अध्यक्ष पद गांधी नेहरू परिवार से इतर किसी अन्य व्यक्ति के पास रहा तो पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को वह व्यक्ति स्वीकार ही नही हुआ ऐसे कई मौको पर पार्टी में विघटन की नौबत आ चुकी है। कांग्रेस में अब यह स्थापित स्वीकार्य तथ्य है कि गांधी नेहरू के वंशज ही इस पार्टी को एक जुट रख सकते हैं। उनका नेतृत्व ही इसका अस्तित्व बताए बचाए रख सकता है। हालांकी वर्तमान में कांग्रेस अपने राजनीतिक जीवन के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। वर्ष 1951 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय जहाँ कांग्रेस का देश के 90 प्रतिशत हिस्से पर शासन था वही आज यहा सिमट कर मात्र दस प्रतिशत हिस्से में रह गया है। वर्ष 1998 में जब सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद संभाला तो भी देश के 19 प्रतिशत हिस्से पर कांग्रेस का शासन था। राहुल गांधी, गांधी-नेहरू परिवार के छठे सदस्य होंगे जो यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालेंगे। वर्ष 2004 से सांसद राहुल गांधी यूं तो लंबे समय से पार्टी से जुड़े हुए हैं। पहले महासचिव और फिर उपाध्यक्ष के रूप में वे अपना योगदान देते रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सात साल बाद चुनाव होने जा रहा है। 19 साल पार्टी अध्यक्ष रही सोनिया गांधी भी लंबे समय से पार्टी के दैनिक क्रियाकलापों और निर्णयों से खुद को दूर रखे हुए हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता जब भी किसी मामले पर उनसे सलाह करने जाते है तो वे राहुल से बात करने को कह देती हैं। पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी है लेकिन महत्वपूर्ण निर्णय राहुल ही ले रहे हैं।
  • वर्तमान में राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी कार्यकर्ताओं को निराशा से उबारकर फिर से उनमें नया जोश भरने की होगी। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस लगातार एक के एक बाद राज्यों में चुनाव हारती जा रही है। पहले केन्द्र और फिर राज्यों में होती लगातार पराजयों से कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं में घोर निराशा व्याप्त होती जा रही है। उन्हें लगता है कि अब कांग्रेस के साथ कोई भविष्य नहीं है। राहुल गांधी की सार्वजनिक छवि भी अभी तक गैर जिम्मेदार राजनेता की ही रही है। उनके बचकाना बयान और जनहित से जुड़ी समस्याओं पर समझ की कमी के चलते अक्सर उन्हें संचार माध्यमों में निशाना बनाया जाता रहा है। खासकर इसे लेकर सोशल (सामाजिक) मीडिया (संचार माध्यम) पर तो लगातार ट्रोल (चक्कर देना) होते रहे हैं। वे अपनी इस छवि को बदलने के लिए काफी मेहनत कर रहे हैं। अब वे बहुत सोच समझकर बयान देते हैं। पहले उनकी चुनावी सभाओं में जहां श्रोता उनकी बातों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते थे, वहीं अब उनके भाषणों को ज्यादा संजीदगी से सुना जाने लगा है। लोगों के बीच धीरे-धीरे वे अपनी जगह बनाते जा रहे है। फिलहाल उन्हें तेज रफ्तार से काम करने की जरूरत है क्योंकि उन्हें लगातार चुनौतियों का सामना करना है। आने वाले समय में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। विशेषतौर पर हिन्दी भाषी राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस पिछले 15 सालों से सत्ता से दूर है। कुछ ही दिनों में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनावों में तो राहुल जोर शोर से जुटे हुए हैं। राहुल का यह बदला रूप देखकर पार्टी कार्यकर्ताओं का खोया आत्मविश्वास फिर से लौटने लगा है। वे भी अब गुजरात में कांग्रेस की जीत के लिए पूरी गंभीरता के साथ प्रयास कर रहे हैं।
  • गुजरात में कांग्रेस अगर किसी कारणवश सत्ता हासिल नहीं कर पाती लेकिन बेहतर प्रदर्शन करती है तो इसे राहुल के नेतृत्व के कारण ही माना जाना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो क्या वे खंडित विपक्ष को एकजुट कर बड़ी चुनौती पेश कर सकते हैं। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सशक्त विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। एक मजबूत विपक्ष ही सत्ता की मनमानियों पर अंकुश लगा सकता है। पर अहम सवाल यही कि क्या वे मोदी के विराट आभामंडल के सामने टिक सकते हैं? क्या वे भाजपा के दिन-ब दिन मजबूत होते जनाधार में सेंध लगा सकते हैं? क्या वे कांग्रेस से छिटके पिछड़े, दलितों और अल्पसंख्यकों जैसे उसके परंपरागत समर्थकों को वापस जोड़ सकते हैं? इन सब सवालों के जवाब तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन इसमें कोई शक नहीं राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प बनने और मतदाताओं के सामने अपनी मजबूत छवि पेश करने के लिए गंभीरता से कोशिश कर रहे हैं। और यह कोशिशें पिछले कुछ समय से दिखाई भी दे रही है। हो सकता है कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर मतदाताओं का विश्वास अर्जित करने में कुछ समय लगे पर भविष्य में होने वाले चुनावों में से किसी एक राज्य में भी वे सत्ता हासिल करने में सफल हो जाते हैं तो वह जीत उनकी नेतृत्व क्षमता पर मुहर लगा देगी। आज उन्हें जरूरत है तो सिर्फ एक जीत की जो उनकी नेतृत्व क्षमता को स्थापित कर दे।

नीरजा चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार, तीन दशक से पत्रकारिता में सक्रिय, राजनीति विश्लेषक। कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के साथ जुड़ी रही हैं।

ओखी तुफान: - देश के कई राज्यों में तांडव मचाने वाले चक्रवात ओखी ने सरकारों के आपदा प्रबंधन की पोल खोल दी है। पूर्व चेतावनी होने के बावजूद जिम्मेदार एजेंसियों (शाखाओं) में समन्वय के अभाव में बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि हुई। ठोस कार्रवाई करने के बजाय सरकारें एक-दूसरे पर दोषारोपण कर अपनी जिम्मेदारी से बचती दिखाई दे रही हैं।

चक्रवाती तूफान ’ओखी’ धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है, यह राहत की बात है। लेकिन इससे पहले तमिलनाडु व केरल के तटों से टकराने के बाद इस चक्रवात ने जिस तरह की तबाही मचाई वह चिंताजनक तो है ही साथ ही हमारे आपदा प्रबंधन तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत की ओर संकेत करता है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हिन्दुस्तान में ओखी से प्रभावित इलाकों में लोगों की जान बचाने के लिए भारतीय तट रक्षक दल ने तत्परता से प्रयास किए हैं अन्यथा इस चक्रवात की चपेट में आकर मरने वालों की तादाद और ज्यादा हो स कती थी। श्रीलंका से उठे ओखी ने केरल, लक्षदव्ीप और पश्चिम समुद्र तट पर गहरा असर डाला है। ओखी का अलर्ट (चेतावनी) जारी करने को लेकर केरल सरकार का दावा है कि मौसम विभाग ने 30 नवंबर को जब अलर्ट (चेतावनी) जारी किया तब तक तूफान आ चुका था। यह बात सही है कि प्राकृतिक आपदा, कहकर नहीं आती लेकिन इससे निपटने के बंदोबस्त समय पर कर लिए जाएं तो जान-माल की हानि को एक हद तक कम किया जा सकता है। हर साल सरकारें आपदा प्रबंधन के नाम पर करोड़ों रूपए का बजट प्रावधान रखती हैं। राष्ट्रीय स्तर से लेकर जिला स्तर तक आपदा प्रबंधन तंत्र बना हुआ है। फिर भी ऐसे चक्रवातों की जानकारी समय रहते क्यों नहीं मिल पाती? तकनीकी तौर पर देखा जाए तो किसी भी चक्रवात की सूचना देने में दो बाते अहम होती हैं। पहला चक्रवात का साइंस (विज्ञान) पार्ट (हिस्सा) और दूसरा चक्रवात से जुड़ी सूचनाओं का आदान-प्रदान। आपदा प्रबंधन के लिहाज से चक्रवातों की चेतावनी देने के स्तर अलग-अलग हैं। इसके तीन चरण निम्न हैं-

  1. पहले चरण में प्री-साइक्लोन (चक्रवात) चेतावनी दी जाती है। इसके तहत यह बताया जाता है कि अमुक चक्रवात कब और कहां बनने की आशंका है। श्रीलंका के पास से गुजरते हुए ओखी चक्रवात बंगाल की खाड़ी से अरब सागर होता हुआ केरल और तमिलनाडु के तटीय इलाकों को प्रभावित करेगा यह जानकारी पहले सही थी।
  2. दूसरे चरण में साइक्लोन (चक्रवात) अलर्ट (चेतावनी) जारी किया जाता है। यह कम से कम 48 घंटे पहले दिया जाना चाहिए।
  3. वहीं तीसरे चरण में साइक्लोन (चक्रवात) चेतावनी होती है जो कम से कम 24 घंटे पहले दी जानी चाहिए।

लेकिन समय की यह बाध्यता इस बात की नहीं है कि कोई जानकारी इससे पहले नही दी जाएगी। दरअसल केवल यह जानकारी देना ही पर्याप्त नहीं है कि कोई चक्रवात कब और कहां बनेगा बल्कि यह सूचना भी आम जनता तक पहुंचना जरूरी है कि अमूक चक्रवात की तीव्रता क्या होगी?

किसी भी च्रकवात के साथ मुख्य रूप से हवा की गति, बारिश व समुद्र में उठनी वाली लहरों की ऊंचाई से यह अनुमान लगाया जाता है कि चक्रवात की भयावहता क्या होगी? और, इसी के अनुरूप बचाव कार्यों और आपदा प्रबंधन से जुड़ी दूसरी तैयारियां की जाती हैं। इसलिए यह आरोप लगाना ठीक नहीं होगा कि हम साइक्लोन जैसी आपदा की सूचना समय पर नहीं दे पा रहे। बल्कि कहा यह जाना चाहिए वे या तो समय पर काम शुरू नहीं कर पाते या फिर संबंधित एजेंसियों (शाखाओं) में समन्वय का अभाव रहता है। दरअसल किसी भी साइक्लोन की तीव्रता का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि समुद्र से उठने वाली लहरों की ऊंचाई कितनी है? केरल के मुख्यमंत्री ने चेतावनी मिलने का समय कम होने का जो मुद्दा उठाया है वह अपनी जगह सही हो सकता हैं। लेकिन इस तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि आज के दौर में जब सूचना पाने के कई माध्यम दूसरे भी हैं तो ऐसे में किसी अधिकृत जानकारी का ही इंतजार किया जाना उचित नहीं है। मोटे तौर पर कोई चक्रवात आए या न आए आपदा प्रबंधन से जुड़े सिस्टम (व्यवस्था) को तो सदैव सक्रिय ही रहना चाहिए।

कोई भी संपर्क एकतरफा नहीं हो सकता। मौसम विभाग, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए), गृह विभाग के साथ-साथ राज्य सरकारों में भी समन्वय जरूरी है। अहम सवाल यही है कि जब मौसम विभाग ने चेतावनी जारी कर दिया था तो संबंधित राज्य सरकारें क्यों नहीं एजेंसियों के संपर्क में रहती हैं? किसी के बताने पर ही काम शुरू होगा यह सोच तो काफी हास्यास्पद लगती है। वैसे भी हमारे देश में उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और गुजरात ऐसे तटीय प्रदेश हैं जो ऐसे चक्रवातों से सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। जब भी चक्रवात जैसी स्थिति होती है तो इन राज्यों में सबसे ज्यादा नुकसान की आशंका रहती हैं। समुद्र में किसी भी प्रकार की हलचल हो तो उसका सबसे पहले शिकार होते है मछुआरे। मछुआरों को समुद्र में होने वाली गतिविधियों की जानकारी नहीं होती, न ही कोस्ट (लागत) गार्ड (रक्षक) और भारतीय नौसेना फौरन कोई सूचना साझा कर पाती है। मछुआरों को ऐसी आपदा की जानकारी के साथ इसके खतरों से निपटने का प्रशिक्षण जरूरी है। संतोष की बात यह है कि हमारे समुद्र तटों पर बसे हमारे महानगर मुबंई, चैन्नई व कोलकाता में अभी ऐसी आपदा के खतरों की आशंका कम हैं लेकिन जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों को नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। कुल मिलाकर ओखी चक्रवात हमारी आंखे खोलने वाला है। हमें इससे भी भयावह चक्रवातों के लिए तैयार रहना होगा। (इस ओखी तूफान का अर्थ है ओखी अर्थात आंख)

लक्ष्मण सिंह राठौड़, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पूर्व महानिदेशक एवं राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के सदस्य

भारत: -आसियान देशों के शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भागीदारी और उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से वार्ता के साथ भारत की नई भूमिका की संभावनाएं बढ़ गई हैं। यह महज संयोग नहीं है कि ट्रंप ने इस क्षेत्र का वर्णन करने के लिए एशिया-पैसिफिक (शांति) के बजाय इंडो-पैसिफिक शब्द का इस्तेमाल करके अपने मित्रों और प्रतिदव्ंदव्यों, सभी को चौंका दिया है। देखना यह है कि चीन के मुकाले अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान की यह चतुर्भुजी एकता इस इलाके और दुनिया के लिए नए शक्ति-संतुलन का निर्माण कैसे करती है। एक तरफ ये चारों देश यह देख रहे हैं कि चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना किस हद तक व्यापारिक घाटे को दूर करती हुई परवान चढ़ती है और आसियान देशों को अपनी तरफ आकर्षित करती है तो दूसरी तरफ आसियान की सफलता के लिए नए सिरे से तैयारी भी हो रही है। भारत 2005 से ही आसियान देशों की बैठक में हिस्सा लेता रहा है लेकिन, न तो वह वाणिज्यिक मोर्चे पर कोई पहल करता देखा गया और न ही रक्षा संबंधी मोर्चे पर। भारत की बैठक में औपचारिक भागीदारी ही रही है। उधर चीन ने अपने प्रभाव से कंबोडिया जैसे अमेरिकी खेमे के देश को पाला बदलने के लिए मजबूर कर दिया तो फिलिपींस और थाईलैंड को तटस्थ कर दिया। ऐसे में अमेरिका इस इलाके में चीन से रिश्ता रखते हुए भारत को नई भूमिका के लिए प्रेरित कर रहा है। मोदी भी इस भूमिका के लिए उत्साहित हैं। इसी के मद्देनजर उन्होंने आसियान देशों के सभी राष्ट्रध्यक्षों को भारत के गणतंत्र दिवस पर दिल्ली आने के लिए आमंत्रित किया है। अगर अमेरिका भारत के लिए कोई बड़ी भूमिका निर्धारित करना चाहता है तो उस दिशा में स्पष्ट बातचीत होनी चाहिए। अस्पष्ट बातचीत और संकेतों में भारत को कुछ लाभ होने की बजाय सिर्फ चीन से तनातनी का ही सामना करना होगा। ट्रंप की नीतियां अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों के मुकाबले लोचा देने वाली हैं, क्योंकि जिस वैश्वीकरण से इस इलाके में समृद्धि आनी है उसी नीति का अमेरिका विरोध कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर भी कदम पीछे खींचे हैं। इन स्थितियों में कई बार चीन ज्यादा जिम्मेदार दिखने लगता है। मोदी को ट्रंप से इन तमाम मसलों पर खुलकर बात करनी होगी।

सोवियत रूस: - रूस में हुई साम्यवादी सोवियत क्रांति को पूरे 100 साल हो गए। इसे 7 नवंबर को मनाया जाता है लेकिन, रूसी भाषा में इसे ’अक्ताब्रिस्काया रिवलूत्सी’ यानी अक्टूबर क्रांति कहते हैं। इस क्रांति को पिछले सौल साल की सबसे बड़ी घटना कहा जा सकता है। दुनिया के कई अन्य देशों में भी क्रांतियां हुई, चीन में भी हुई लेकिन सोवियत क्रांति विश्व इतिहास की एक बेजोड़ घटना थी। यह घटना 1917 में घटी थी, जबकि पूरा यूरोप प्रथम महायुद्ध में उलझा हुआ था। यूरोप के पांचो साम्राज्य-रूस की ज़ारशाही, ऑस्ट्रो-हंगेरियाई, जर्मन, तुर्क और ब्रिटिश साम्राज्य अंदर से हिल रहे थे। ऐसे में व्लादिमीर इलिच लेनिन के नेतृत्व में रूस में जो खूनी क्रांति हुई, वह वैसी नहीं थी, जैसे फौजी तख्ता-पलट हमारे पड़ोसी देशों में होते रहते हैं। वह कार्ल मार्क्स और फ्रेदरिच्र एंगेल्स के साम्यवादी विचारों पर आधारित क्रांति थी। इस अर्थ में वह फ्रांसीसी क्रांति (1789) से भी अलग थी।

मार्क्सवादी दर्शन की व्याख्या करना यहां संभव नहीं है, लेकिन जैसा कि मार्क्स ने अपने ’कम्युनिस्ट (साम्यवादी) घोषणा-पत्र’ (1848) में कहा था, साम्यवादी क्रांति का लक्ष्य उत्पादन के साधनों पर विश्व के मजदूरों का आधिपत्य कायम करके पूंजीवाद की कब्र खोदना था। एक नई समतामूलक संस्कृति को जन्म देना, समाज को वर्गविहीन बनाना और विश्व विजय करना था। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए मार्क्स ने दव्ंद्वात्मक भौतिकवाद, वर्ग संघर्ष और अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत प्रतिपादित किए और हिंसक क्रांति का समर्थन किया। मार्क्स के जीते-जी तो कुछ नहीं हुआ लेकिन, उनके जाने के 30 - 35 साल बाद रोज़ा लक्समबर्ग, लियोन, त्रॉत्सकी और लेनिन जैसे नेताओं ने उनके विचार को आगे बढ़ाया और रूस में क्रांति कर दी।

इस क्रांति का असर विश्वव्यापी हुआ। पूर्वी यूरोप के कई देश यूगोस्लाविया, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी, पोलैंड, पूर्वी जर्मनी आदि साम्यवादी हो गए। पश्चिम में क्यूबा और पूरब में चीन तक लाल हो गए। भारत, फ्रांस, इंडोनेशिया, ब्रिटेन, वियतनाम, अफगानिस्तान और इराक जैसे कई देशों के नेताओं पर लाल नही ंतो गुलाबी रंग तो चढ़ ही गया। पूंजीवाद की टक्कर में समाजवादी लहर सारी दुनिया में चमकने लगी। साम्यवादी क्रांति के नाम पर खून की नदियां बहीं। लगभग 10 करोड़ लोग मारे गए। लगभग 50 साल तक सारा विश्व शीतयुद्ध की चपेट में सिहरता रहा, लेकिन साम्यवादी क्रांति के इस शताब्दी वर्ष में हमें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि यह क्रांति सिर्फ 70 - 80 साल में ही दिवंगत क्यों हो गई? चीन की दुकान पर तख्ता साम्यवादी का लगा है लेकिन, माल अब वहां पूंजीवाद का बिकता है।

मार्क्स और लेनिन की क्रांति कुछ ही देशों में सिमटकर क्यों रह कई? यह विश्व धर्म क्यों नहीं बन पाई? इसका पहला कारण, जो समझ पड़ता है, वह यह है कि यह क्रांति मानव स्वभाव के विपरीत थी। हिंसा से जार या च्यांग काई शेक का तख्ता पलट दिया गया, यह तो ठीक है, लेकिन आम जनता पर भी उसी हिंसा को थोपे रखना बिल्कुल अव्यावहारिक सिद्ध हुआ। लाखों-करोड़ों लोग तानाशाही फरमानों के आगे मजबूरी में सिर टेकते रहे, लेकिन उन्होंने साम्यवादी व्यवस्था को कभी स्वीकार नहीं किया। मानव जीवन में राज्य की भूमिका काफी कम और परिवार व समाज की भूमिका काफी ज्यादा होती है, लेकिन राज्य को पूर्णरूपेण खत्म करने का दावा करने वाले साम्यवादी ने रूस में राज्य को एक महादैत्य का रूप दे दिया, जिसने सोवियत साम्राज्य को ही कच्चा चबा डाला।

दूसरा कारण साम्यवादी पार्टी (दल) का सर्वेसर्वा बन जाना रहा। सोवियत और चीनी साम्यवादी व्यवस्था सारे तालों की चाबी साम्यवादी पार्टी के महासचिव की जेब में रहती है। पार्टी के अधिकारियों को रूस में बड़े-बड़े धन्ना-सेठों की तरह ठाट-बाट से रहते हुए देखा है। उनके बंगले (ढांचा) और उनकी कारों (स्कदा) को सोने से मढे हुए देखा है। वे अहंकार में डूबे हुए और आम जनता के सुख-दुख से कटे हुए लोग होते है। उनके भ्रष्टाचार पर कोई अंकुश नहीं होता। इन देशों की संसदे और विधानसभाएं रबर के ठप्पे से ज्यादा कुछ नहीं होती। विपक्ष के नाम पर शून्य होता है। लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों, विद्वानों को पार्टी नेताओं की तारीफ में कसीदे काढ़ने के अलावा क्या काम रहता है। इसलिए जब सोवियत व्यवस्था के खिलाफ बगावत हुई तो रूसी लोगों ने राहत की सांस ली। साम्यवादी पार्टी के कमजोर होते ही रूस, भी टुकड़े-टुकड़े हो गया।

बेशक रूस में जारशाही, चीन में च्यांग काई शेक और क्यूबा में बतिस्ता के खात्मे के बाद दबे-पिसे वंचित, शोषित और पीड़ित लोगों ने राहत की सांस ली थी और उनकी आर्थिक स्थिति सुधरी थी, लेकिन उसकी तुलना में पूंजीवादी देशों के इन्हीं वर्गों की स्थिति बेहतर हो गई थी। इसलिए मार्क्स की ’सर्वहारा’ क्रांति की जड़े जमी ही नहीं। संसार के सर्वहारा तो एक क्या होते, किसी एक देश के सर्वहारा ने भी पूंजीवादी व्यवस्था का चक्का जाम नहीं किया। साम्यवादी क्रांति के दम तोड़ने का तीसरा कारण यह था।

मार्क्सवादी क्रांति के परवान नहीं चढ़ने का चौथा कारण यह भी था कि दुनिया में खेमेबाजी शुरू हो गई। एक नाटो-समूह बन गया और दूसरा वारसा-समूह। एक का नेता अमेरिका और दूसरे का रूस। रूस ने शीतयुद्ध में अपनी शक्ति का बड़ा हिस्सा गंवा दिया और फिर चीन ने अपनी अलग राह पकड़ ली। यूगोस्लाविया और चेकोस्लावाकिया में भी बगावत हो गई। गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों ने अपना अलग रास्ता पकड़ लिया। साम्यवादी सपना लूट-पिटकर रह गया।

रूस, चीन और क्यूबा की अपनी मजबूरियों के कारण वहां की क्रांतियां विफल हुई लेकिन भारत, पाकिस्तान, नेपाल, अफगानिस्तान जैसे देशों में साम्यवादी का क्या हाल है? इन देशों में कुछ दशकों पहले तक साम्यवादी ने अपनी कुछ सरकारें बनाई, लेकिन अब तो हाल यह है कि वे आखिरी सांसे गिन रही हैं। वे सच्चे मार्क्सवादी अर्थों में साम्यवादी कभी रही ही नहीं। वे अपने देश की स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक ढल ही नहीं सकती। जो भी हो, विफल होने के बावजूद इतिहास में मार्क्सवाद और रूसी क्रांति का स्थान अप्रतिम रहेगा, क्योंकि उन्होंने मानव जाति को अनेक नए सपनों और संभावनाओं से ओत-प्रोत किया है।

वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

- Published/Last Modified on: January 23, 2018