अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी दिवस (International Refugee Day in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना:- दुनिया के बहुत से देश शरणार्थियों और विस्थापितों की समस्या से जूझ रहे हैं। भारत भी ऐसी ही परेशानियों से जूझता रहा है। पत्रिका भी इस समस्या को ‘जूद अभियान’ के तहत उठा रहा है। देश के विभाजन के बाद भी पाकिस्तान से हिंदू परिवारों का विस्थापन जारी रहा है। 1965 और 1971 के दौर में भारत आए इन हिंदुओं की संख्या लाखों में पहुंच गई है। वीजा लेकर वैध तरीके से आए इन लोगों को भारत में न तो शरणार्थी माना जाता है और न ही उन्हें कोई नागरिक अधिकार हासिल हैं। अब ये पाकिस्तान लौटना भी नहीं चाहते है। भारत में रहने वाले अब ये विस्थापित भारतीय नागरिकता के लिए संघर्षरत है। आखिर क्या है इन्हें भारतीय नागरिकता देने की राह में अड़चनें?

दमन का इतिहास:-

हिंदू सिंधियों के दमन का इतिहास राजा दाहिर के बलिदान और अरब लुटेरे मुहम्मद बिन कासिम के 712 ई. में सिंध पर कब्जा जमाने तक का पुराना है। वर्ष 1947 का बंटवारा भी सिंध के लिए उतना ही घातक था, जितना अरब का कब्जा। यह सिंधी हिंदुओं का दूसरा नरसंहार था, सम्पति की लूट, औरतों का अपमान, देश से निष्कासन सब हुआ। उन्हें, ऐसे तीसरे दर्जे के नागरिकों की तरह रहने पर मजबूर कर दिया गया, जिन्हे समाज अच्छे से नहीं देखता था। जैसे उन्हें समाज में कोई अधिकार ही नहीं बल्कि समाज को उन पर हर तरह का शारीरिक और मानसिक अत्याचार करने का अधिकार है।

अत्याचार:-

मुहम्मद बिन कासिम के सिंध पर कब्जे के बाद से उन पर शासकीय पद पाने पर अप्रत्यक्ष रोक थी। उन्हें अपना जीवन और सम्मान बचाने के लिए केवल व्यापार करने और कर चुकाने की ही अनुमति थी। धर्म के आधार पर बने पाकिस्तान में शासन में भाग लेने के सब दरवाजे संवैधानिक रूप से बंद कर दिए गए। राजकीय संस्थाओं से लेकर सत्तारूढ़ दल, सामंत, धार्मिक नेता, यहां तक कि राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी न केवल धन छीनना शुरू कर दिया बल्कि उनके जीवन और सम्मान पर भी आक्रमण करने लगा। सिंधी समाचार पत्रों के आंकड़ों के अनुसार सिंध प्रांत में 1 जनवरी 2012 से 7 जून 2015 तक 69 हिंदू लड़कियों का अपहरण कर उनका धर्म-परिर्वतन कराकर मुसलमानों से शादी करा दी गई। 25 मंदिरों में आग लगाकर मूर्तियों को अपवित्र किया गया। बादीन जिले के पैनजरियों कस्बे में धार्मिक उन्मादियों में एक भूरो भील को कब्र खोदकर उसमें डाल दिया। उसी जिले के तांडो बागो गांव से अल्लाहदिनों भील की लाश कब्र से निकालकर किसी दूसरी जगह दफन करने के लिए उसके रिशतेदारों को मजबूर किया गया।

न्याय को मजबूर हिंदू:-

फरवरी 2012 में घोट की जिले के मीरपुर के मढेलो गांव की रिंकल कुमारी के अपहरण ने हिंदू लड़कियों के अपहरण, बलात धर्म परिवर्तन और उनके बेचे जाने की ओर ध्यान आकर्षित किया। पाकिस्तान के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मुहम्मद चौधरी की अदालत में इस केस की गूंज उठी। पीड़िता ने चीख-चीखकर जज को दुर्दशा बताई पर अदालत नहीं पसीजी बल्कि उन्हें ये संदेश मिला कि ‘हिन्दुओं के लिए यहां न्याय नहीं है।’ परिणामस्वरूप यहां से हिन्दुओं का दूसरा पलायन हुआ जो अब तक जारी है। उन्होंने उत्तरी सिंध के अधिकांश कस्बे खाली कर दिए। वे या तो राज्य के बड़े शहरों जैसे कराची और हैदराबाद चले गए हैं या भारत और दूसरे देशों में चले गए हैं।

अमरकोट:-

वर्तमान में छोटकी जिले भरचूड़ी के पीर (कुंवर भगतराम के हत्यारे) और अमरकोट की पीर अयूब जां सरहिंदी के पूजा स्थल, सिंधी हिंदु लड़कियों के अपहरण, धर्म परिवर्तन और उनकी बिक्री के गढ़ हैं, इन दोनों धार्मिक स्थानों पर पीर शेखी बघारते हुए सूची जारी करते हैं कि कितनी हिंदु स्त्रियों को उन्होंने मुसलमान बनाया है। ये पीर अकसर फौज के समर्थन में रैलियां भी निकालते हैं जो इस तथ्य को स्पष्ट रूप से बताते हैं कि हिंदुओं के प्रति शत्रुता का यह काम उन्हें किसने सौंपा है।

मदरसे:-

वर्तमान में सिंध में केवल दो ही जिलों थार और अमरकोट में ही हिंदू काफी संख्या में हैं। 2010 से प्रतिबंधित लश्कर-ए-तैयबा के नेता हाफिज सईद और जमात-उद-दावा को थार जोन को हिंदुओं से मुक्त कराने का काम सौंपा गया फिर हाफिल सईद को साफ तौर पर आतंकवादी घोषित कर दिया गया है और उसके गतिविधयों में रोक लगा दी गई। यह खुले तौर पर थार में संदिग्ध मदरसे स्थापित करने लगा हुआ है। ये मदरसे हिंदुओं को जबरन मुसलमान बनाने के काम में लगे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि जिस तरह के मदरसे अफगान युद्ध में खेबर पख्तूनख्वा में सोवियत रूस के विरूद्ध इस्तेमाल किए गए उसी तरह इन मदरसों का जाल भारत के विरूद्ध इस्

तेमाल किया जाएगा।

हिंदू:-

हिंदुओं की दुर्दशा चाहे वे किसी भी श्रेणी के हों, दलितों से अलग नहीं है। हिंदुओं में फूट डालने, उन्हें कमजोर करने के लिए दलितों का मुद्दा उठाया जा रहा हैं ताकि कोली, भील और मेघवाल अपने आप को हिंदु कहना बंद कर दें और उनकी बहुसंख्या अल्पसंख्यक में बदल जाए। इसी उद्देश्य से आगामी जनगणना के लिए हिंदू और दलितों के अलग-अलग वर्ग बनाए गए है। पाकिस्तानी संस्थाओं, शासकों और धार्मिक अतिवादियों का एकमात्र लक्ष्य हिंदुआंे से शुत्रता पर टिका हुआ हैं। भारत से घृणा के कारण अगर वे भारत विरोधी षडयंत्र करते रहे तो शायद आने वाले 10 - 15 वर्षों से संभव है वहां एक भी हिंदू न बचे वे या तो मुसलमान बन जाएंगे या देश छोड़ देंगे।

संविधान:-

संविधान का अनुच्छेद 6 कहता है, जान व सम्मान को खतरा हो तो विभाजन के समय पाकिस्तान गए नागरिक लौट सकते हैं। अनुच्छेद 21 जीने का अधिकार देता है और अनुच्देद 14 सभी को बराबरी का हक देता हैं।

बंदिश:-

भारतीय नागरिक अधिनियम 1955 लागू होने के बाद उसकी धारा 5 (1) में भारत में लोगों के पंजीकरण की इजाजत नहीं दी गई जिनके अभिभावक अविभाजित भारत में रहते थेे। यानी जो हक संविधान ने दिए हमने उस पर बंदिशें लगा दी हैं।

पूर्वज:-

असम अकॉर्ड की तरह अभिभावक की जगह ‘पूर्वज’ शब्द अपना लें तो परेशानियां घटे। 1965 और 71 की लड़ाई और बाबरी मस्जिद घटना के बाद से दोनों देशों के संबंध खराब हुए। इसके बाद से सीमा पर से लोगों के लौटने का सिलसिला बढ़ा है।

अधिकार:-

बंटवारे के बाद की पहली जनगणना के अनुसार पश्चिमी पाकिस्तान में 16 और पूर्वी इलाके में 33 फीसदी गैर मुस्लिम आबादी थी जो लगातार घटी है। पाक के संविधान ने सबको बराबरी का दर्जा दिया पर साथ ही शासन की बागडोर केवल मुसलमानों के हाथ रखने की बात कहकर दीवारें खींच दी। अल्पसंख्यकों को धार्मिक और जातीय आधार पर अलग-अलग रखने का सिलसिला लगातार जारी है। जिया-उल-हक के दौर में कट्‌टर पंथियों को पनाह मिली। सबके मन में यह जहर घुल गया कि पाकिस्तान को सऊदी अरब की तर्ज पर वहाबी राज्य बनाया जाए। न कोई आवाज उठा सके न कोई चुनौती दे सके ओर न कोई विरोध कर सके। ईसाइ, अहमदिया, सिंधी, हिंदू सहित तमाम अलपसंख्यकों पर अत्याचार होने लगे। शर्म की बात यह हे कि सरकार ये सब खामोशी से देखती रही।

सहना:-

हिंदू अकेले नहीं जो ये सब सहते रहे पर असल में हिंदुओं का बुरा समय बाबरी मस्जिद की घटना के बाद शुरू हुआ। पाकिस्तान में सैकड़ों मंदिर तोड़े गए। तब हिंदू परिवारों की लड़कियों पर जुल्म का दौर शुरू हुआ, जो अब भी जारी है। लड़कियों का जबरन धर्म बदल दिया जाता है। धार्मिक उन्माद ने सारी हदे पार कर दीं है। न सरकार कुछ बोली, न अदालतों ने इंसाफ किया। पिछले वर्षो में 10 हजार से ज्यादा हिंदू परिवार चले गए। ये सब अच्छे खासे अपर या मिडिल (ऊपर या बीच) का कक्षा परिवार हैं। जिनकी बच्चियां अपहरण कर ली गई, जमीनें छीन ली गई। ऐसे में उनके पास हिंदुस्तान जाने के सिवाय कोई चारा नहीं था। यहां चाहते हुए भी कोई साथ नहीं दे सकता है तेज हों या बुद्धिजीवी कोई मुंह नहीं खोल सकता है। ये ‘साइलेंट मेजोरिटी’ (चुप बहुमत) है जो खुद ही डर के साये में जी रही है। कई सेक्यूलर (लौकिक/धर्मनिरेपक्ष) लोगों पर हमले होते हैं। निगाह रखी जाती हैं पर गैर बराबरी और जुल्म देखकर हम खामोश नहीं रह सकते है।

यहां पिछले साल एक जूता जनसमूह ने अपने उत्पाद पर ओम लिख दिया। हमने जमकर विरोध किया और कारखाना को बंद करचाकर दम लिया। पर पंजाब और सिंध जहां धर्म के नाम पर ये हरकते और इंसानी ज्यादतियां करते हैं वहां कोई जुबान नहीं खोल सकता हैं। यकीन मानिए पाकिस्तान में अधिकांश लोग अमन पसंद हैं। वे होली दीवाली हंसी खुशी से मनाते है। ये दहशतगर्द दिमागों दीवालियापन का शिकार हैंं जो धर्म की आड़ में हैवानियत को अंजाम देते हैं।

वीजा:-

सोशल मीडिया (समाज संचार माध्यम) के कारण से हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार और हिंसा के मामले सामने आने लगे हैं। पुलिस लोगों के दबाव में हरकत में आती है। फिर भी हालात नाजुक हैं। भारत तो धर्मनिरपेक्ष देश हैं उसे भी अब वो हालात पैदा नहीं करने चाहिए जिसके लिए पाकिस्तान बदनाम है। पर ये सुनने देखने को मिलता है कि सरहद पार मुसलमान चैन से नहीं तो इसका खामियाजा पाक में हिंदुओं को भुगतना पड़ता है। जो लोग भारत आना चाहते हैं उनके लिए वीजा आसान होना चाहिए। भारत के दरवाजे बंद होगे तो ये लोग कहां जाएंगे।

बातचीत:- पाकिस्तान से आकर देश में विस्थापित हुए हजारो हिंदू परिवार भारतीय नागरिकता की मांग कर रहे हैं सीमांत लोक संगठन के हिंदू सिंह सोढ़ा इस मुद्दे को लेकर लंबे समय से संघर्षरत हैं। प्रस्तुत हैं सोढा से पत्रिका की खास बातचीत के अंश-

प्रश्न 1- पाकिस्तान से आकर बसे लोगों की मुश्किले क्या शुरू से ही इतनी थीं?

उत्तर- ये लोग गैर कानूनी या घुसपैठिए नहीं हैं। ये जान बचाकर वीजा पर आते रहे हें। खतरा होते तो पकड़े गए अपराधियों, आतंकियों में नाम होता हैं। न इन्हें शरणार्थी का दर्जा मिला है न विदेशी नागरिक का। सलमा आगा को ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया (निरिक्षण भारतीय नागरिक) का दर्जा व अदनान सामी को भारतीय नागरिकता दे दी, तो हमें भी मिले।

प्रश्न 2 -सरकार ने पहचान पत्र देने की घोषणा कर क्या मसौदा तैयार किया हैं?

उत्तर- भाजपा ने सत्ता में आने के बाद 15 दिसंबर 2014 को 11 नोटिफिकेशन (अधिसूचना) जारी किए उसमें मंशा तो साफ लगती है। राज्यों ने क्रियान्वयन की व्यवस्था नहीं बनाई। संविधान तो हमारे हक में खड़ा है। भारतीय नागरिक अधिनियम में 2004 में आखिरी संशोधन हुआ। नागरिकता का हक कागजों में तो है लेकिन नीतिगत ढांचे के बिना हासिल कैसे होगा? मसौदे में नागरिकता की पंजीकरण फीस सौ रुपए करने, छोटी अवधि वीजा में देरी पर जुर्माने से छूट आदि कुछ खूबियां भी हैं तो ढेरों खामियां भी। जरूरी है वीजा और नागरिकता तय अवधि में सौंपी जाए।

फिलहाल 7 से 12 साल बाद नागरिकता मिली है। ये अवधि जितनी घट सके उतना ही अच्छा। पारदर्शी प्रक्रिया, समयबद्ध क्रियान्वयन व जवाब देही तय हो। मसौदे से कुछ शर्तों पर आरबीआई की स्वीकृति के बिना बैंक खाता खोलने, रहने या काम करने की जगह खरीदने आदि का जिक्र हैं, लेकिन ये शर्त और आधार का खुलासा नहीं है। सेफ कारोबार या काम करने का जिक्र हैं पर कारोबार कौन परिभाषित करेगा? सीमा पार रह रहे बुजुर्ग माता पिता से मिलने के लिए परिवारों को मल्टीपल (अनेक) एण्ट्री (प्रवेश) वीजा के बारें में मसौदा खामोश है। हैरत की बात ये हैं कि नागरिकता सौंपने के लिए जैसलमेंर, जोधपुर, जयपुर, भोपाल, इंदौर, रायपुर सहित 7 राज्यों के कुल 18 जिलों को चिन्हित किया गया है। यानी अन्य इलाकों में विस्थापितों को हक से महरूम रहना होगा? नागरिकता सौंपने का दायरा पूरा देश होना चाहिए। ये भी स्पष्ट होना चाहिए कि जो पाकिस्तान से भारत आए विस्थापित 15 साल से पासपोर्ट पर रह रहे हैं उन्हें नवीनीकरण की जरूरत है या नहीं। एक और बड़ी खामी है कि इस मसौदे में पंजीकरण के नवीनीकरण आदि के लिए स्थानीय प्रशासन को दो साल के लिए पावर डेलीगेट (शक्ति प्रतिनिध के रूप में नियुक्त/प्रतिनिधि मंडल) किया है।

प्रश्न 3 क्या सिविल सोसाइटी (जन संबंधी समाज) ने मसले के हल के लिए कोई सुझाव गृह मंत्रालय को दिए हैं?

उत्तर:-हमारी मांग है कि एक ऑटोनॉमस बॉडी (स्वराज्य शरीर) में विस्थापितों का प्रतिनिधित्व हो जो नीतियों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करें। पुनर्वास पर साफ नीति बने जिसमें शिक्षा, रोजगार व उनकी संस्कृति के संरक्षण की भी बात हो। फिलहाल, पाक नागरिकता छोड़ने पर भी असमंजस है। दस साल पहले तक दस रुपए के स्टाम्प पर लिखकर हम पाक नागरिकता छोड़ सकते थे लेकिन अब स्पष्टता नहीं। पाक छोड़ता नहीं, भारत अपनाता नहीं। हमने अपने अनुभव और सुझाव सरकार को भेजे हैं। 70 - 80 के दशक में तो विस्थापितों के बच्चों को शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण तक हासिल था, लेकिन हम तो इनके लिए भारतीय बच्चों के बराबर का हक मांग रहे हैं। विस्थापित चिकित्सक के लिए एमसीआई की मंजूरी की शर्त भी बेतुकी है। डिग्री की मान्यता देख प्रेक्टिस की इजाजत दे दीजिए। समय है कि सरकार हिन्दू विस्थापितों की खुशहाली पुनर्वास और विकास के लिए सिविल सोसायटी और अंतरराष्ट्रीय कार्यकर्ता को भरोसे में लेकर मजबूत नीति को अमल में लाए।

सुरक्षा:-

सुरक्षा के मसले की आड़ में आम इंसान तकलीफ में है। आप सोचते हैं कि वीजा नियम कड़े करने से दहशतगर्दों पर रोक लगेगी लेकिन क्या कभी दहशत गर्द सीधे रास्ते से आते हैं, और फिर आप कुछ भी करें ये आपके यहां दाखिल हो ही जाते हैं।

उपसंहार:-शरणार्थियों को पनाह देने के लिए हिंदुस्तान ही बड़ा दिल रखे, वीजा नियम आसान बनाए ताकि यहां जिल्लत की जिदंगी जी रहे हिंदुओं को इज्जत से जीने का हक मिल सके।

- Published/Last Modified on: August 17, 2016

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