यरुशलम (Jerusalem - in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना: - मध्यपूर्व का ऐतिहासिक शहर यरुशलम अपने में इतिहास को समेटे हुए है। मानव सभ्यता के प्रारंभ से ही यरुशलम में विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों का समागम रहा है। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में इजराइल की आधिकारिक राजधानी के रूप में यरुशलम को मान्यता की घोषणा की है। तेल अवीव से अब अमरीकी दूतावास यरुशलम जाएगा। मध्यूपर्व में शांति की स्थापना के लिए जरूरी है कि इजराइल और फलस्तीन के मुद्दों का शांतिपूर्ण हल हो। यरुशलम में संस्कृतियों के बीच सौहार्द और हिंसा का मिलाजुला इतिहास भी रहा है और वर्तमान में भी शांति के प्रयासों का दौर जारी है। लेकिन राजधानी के रूप में मान्यता के बाद विवाद बढ़ गया है। लेकिन यरुशलम के भविष्य में शांति की स्थापना के लिए जरूरी है कि वर्तमान को संवारा जाए। इतिहास के काले पन्नों की छाया न पड़े। वैश्विक शांति के लिए यह बड़ा कदम होगा।

Jerusalem, a Middle Eastern city west of the Dead Sea Image

Jerusalem, a Middle Eastern City West of the Dead Sea Image

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हकीकत: - लगभग चार हजार साल पहले सालेम के राजा मेल्चीजेदेक और अब्राम के बीच सुलह हुई। इसका उल्लेख उत्पत्ति की पुस्तक में मिलता है। भजन संहिता में राजा दाउद कहते हैं कि जिस प्रकार यरुशलम को पहाड़ियों ने घेरा हुआ है उसी प्रकार परमेश्वर अपने लोगों की रक्षा करता है। राजा दाउद ने जेबुसिट्‌स से उपजाऊ घाटियां जीती और इजराइल के 2 गोत्रों को एक कर यरुशलम की स्थापना की। यरुशलम को शालोम यानी शांति का शहर कहा जाता है। बताया जाता है कि इजराइल की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ही मध्यपूर्व में शांति की बहाली करना था। तर्क यह हे कि कई ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार यरुशलम यहूदी आस्था का केन्द्र रहा है। इसके समर्थन में कई प्रमाण मौजूद हैं। लेकिन बड़ा मुद्दा है कि क्या हमें वाकई में यरुशलम को राजधानी घोषित करने के मुद्दे पर अमरीका की मंजूरी की जरूरत है। यहां यह स्पष्ट करना है कि यरुशलम के बारे में ऐतिहासिक तथ्य भले ही कुछ क्यों न हों लेकिन हमें जमीनी हकीकत भी देखनी होगी। ईसाई, यहूदी और मुस्लिमों के लिए यरुशलम आस्था का स्थान है। इजराइल एक लोकतांत्रिक देश है और उसे सभी धर्मो के बारे में सोचना और निर्णय लेना जरूरी है। इजराइल के बारे में ये सर्वविदित है कि यहां सभी समुदायों को बराबर हक मिलता है। ऐतिहासिक रूप से भी देखें तो हम पाते हैं कि अरब देशों का इजराइल और फलस्तीन की समस्या के हल के प्रति सकारात्मक रवैया नहीं रहा है। अधिकांश इजराइली दो राष्ट्रों की अवधारणा के समर्थक हैं। स्वतंत्र देश के रूप में फलस्तीन के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है। इजराइल और फलस्तीन दोनों देशों के प्रमुखों की ओर से पिछले काफी वर्षों के दौरान सुलह के प्रयास किए जा रहे है। आशा है कि इस दिशा मेें जल्द ही कोई सर्वमान्य हल निकलेगा।

माइकल काहन, इतिहासवेता, माशैव, इजराइल

सरहदों का सफरनामा: - इजराइल और फलस्तीन के बीच करीब एक सदी से भी ज्यादा समय के दौरान सरहदों के विवाद का इतिहास रहा है। युद्ध, शांति और संघर्ष के बीच रहा है मुद्दा।

  • यहूदी राज्य- फलस्तीन में यहूदी राज्य की स्थापना के समर्थन को वर्ल्ड जायेनिस्ट ऑर्गेनाइजेशन (संस्था) का गठन किया गया।
  • यूएन प्लान (योजना) - संयुक्त राष्ट्र ने फलस्तीन को दो राष्ट्रों में बांटा। यहूदी नेताओं ने स्वीकारा, अरब नेताओं ने खारिज किया।
  • युद्ध क्षेत्र में- यहूदी समुदाय ने इजराइल का गठन किया। इस पर इजराइल और अरब देशों के बीच युद्ध छिड़ गया।

विश्व में इजराइल के महत्व के 4 कारण: -

  1. राजनीतिक-इजराइल दुनिया का सौवां सबसे छोटा देश है लेकिन सारे अरब देश मिलकर भी उसे नहीं झुका पाए हैं। इसका प्रमुख कारण है उसे अमरीका और पश्चिमी देशों से मिलने वाला राजनीति समर्थन है जब भी किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर इजराइल का मुद्दा उठता है तो अमरीका मजबूती से इसके साथ खड़ा रहता है।
  2. आर्थिक- इजराइलियों में रचे बसे हुए होते हैं तकनीक-आइडिया (योजना) । इजराइल स्टार्टअप्स की सबसे बड़ी फैक्टरी (कारखाना) है। अमरीकी शेयर बाजार में 80 फीसदी कंपनियां (संघ) लिस्टेड (सूचीबद्ध) हैं जो कि जापान, जर्मनी, फ्रांस, भारत जैसे देशों की कंपनियों को मिलाकर बराबर संख्या में बैठती है। तकनीकी हस्तांतरण के जरिए अच्छी-खासी आय होती है।
  3. सामरिक- दुनिया में भौगोलिक रूप में छोटा देश इजराइल बड़ी सैन्य शक्ति है। इसकी वायुसेना का अमरीका, रूस, चीन के बाद चौथा स्थान है। इसे कम दूरी की मिसाइलों (प्रक्षेपण), ड्रोन तकनीक में महारथ हासिल है। सभी नागरिकों को सैन्य सेवा अनिवार्य है। लड़को को तीन साल व लड़कियों को दो साल सेना में काम करना अनिवार्य है।
  4. वैश्विक- इजराइल दुनिया का एकमात्र यहूदी देश है। यहूदी नागरिक चाहे जहां भी पैदा हुआ हो उसे इजराइल की नागरिकता पैदा होते ही मिल जाती है और वह इजराइल आकर बस सकता है। अमरीका के व्यापार, प्रशासन, मीडिया (संचार माध्यम) और हॉलीवुड के बड़े हिस्से पर यहूदियों का कब्जा है जो इजराइल की सहायता करते हैं।

फलस्तीन: - फलस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) को फलस्तीनियों के एकमात्र प्रतिनिध के रूप में मान्यता देने वाला भारत पहला गैर-अरब देश था। पीएलओ ने 1975 में नई दिल्ली में अपना कार्यालय खोला, जिसे मार्च 1980 में पूर्ण राजनयिक मान्यता मिली और 1988 में फलस्तीन को मान्यता देने वाले प्रमुख देशों में से भारत एक था। इजराइल को लेकर भारत का रुख हिचकिचाहट से भरा रहा। भारत ने 1950 में इजराइल को मान्यता दी व 1953 में उसे मुंबई में वाणिज्य दूतावास खोलने की अनुमति दी थी। लेकिन भारत के फलस्तीनियों के पक्ष में होने के कारण दोनों देशों के बीच संबंध नही ंके बराबर रहे। इसके कई कारण थे। एक तो इजराइल गठन धर्म के आधार हुआ था जिसके सिद्धांत का भारत विरोधी था। दूसरा भारत गुटनिरपेक्ष देशों में था जबकि इजराइल अमरीका के गुट में था। वर्ष 1992 में भारत के इजराइल में दूतावास खोलने के बाद संबंध मजबूत होते गए।

ओस्लो समझौता: - यरुशलम को लेकर फलस्तीन और इजराइल के बीच ओस्लो समझौता हुआ था। जिसमें दोनों देशों बीच एक-दूसरे के स्वायत्त क्षेत्रों को मान्यता देने का समझौता से पश्चिमी तट का विभाजन हुआ।

विचार: -मध्यपूर्व पर सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की आपूर्ति और वहां काम करने वाले प्रवासी हैं। वैसे यरुशलम को आधिकारिक राजधानी का दर्जा देने से हम पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ेगा।

कमर आगा, मध्यपूर्व के विशेषज्ञ

अमरीका में यरुशलम को इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता देने के प्रयास काफी समय से चल रहे थे। इस मुद्दे पर वहां के रिपब्लिकन (प्रजातंत्र वादी) और डेमोक्रेटिक (लोकतांत्रिक) दोनों दल एकमत रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप से पहले बराक ओबामा और जॉर्ज बुश ने चुनाव के दौरान ऐसा वादा किया था लेकिन वे इसे पूरा नहीं कर पाए। भारत ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि वह अपने पुराने नजरिये पर कायम है। भारत की नीति फलस्तीन और इजराइल के रूप में दो राष्ट्रों के समर्थन की रही है और फलस्तीन की मदद भी करता आया है। अरब देशों के आंतरिक मामलों में भारत दखल भी नहीं देता है और न ही ज्यादा टीका-टिप्पणी करता है। भारत की चिंता इस बात की है कि इससे किसी प्रकार का संघर्ष शुरू होने से कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा न हो जाए क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है। तेल की कीमते बढ़ने से भारत का आयात बिल बढ़ता है।

जिसका प्रभा अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। पर ऐसा होने की आशंका कम ही है क्योंकि सीरिया और इराक दोनों जब आईएसआईएस के साथ संघर्ष में उलझे हुए थे तब भी कच्चे तेल की कीमते नहीं बढ़ी थी। अब वहां से आईएसआईएस खात्मे की ओर अग्रसर है और वहां के युवाओं का आईएसआईएस के प्रति आकर्षण कम होता जा रहा है। सीरिया और इराक में स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। अमरीका ने अपने फैसले का समय सोच-समझकर चुना है। और वे एकजुट होकर इस फैसले का विरोध नहीं कर पाएंगे। यमन में गृहयुद्ध चल रहा है, सऊदी अरब में शाही परिवार में सत्ता परिवर्तन के लिए वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, कतर का पड़ोसी देशों ने बहिष्कार कर रखा है। सीरिया और इराक आईएसआईएस से संघर्ष कर रहे हैं। ईरान के अरब में ही कई देश विरोधी है। इसलिए वहां स्थितियां ही ऐसी बनी हुई हैं कि कोई देश खुद को संघर्ष की स्थिति में नहीं झोंकना चाहता है। दिखावे के लिए ये देश बयानबाजी कर लेंगे, अरब लीग का सम्मेलन बुला कर प्रस्ताव पास कर देंगे जिससे उनकी जनता को लगे कि अमरीका का विरोध हो रहा है। इजरायल से संबंध तोड़ने का कदम शायद ही कोई देश उठाए। यहां तक की जॉर्डन भी यह नहीं कर पाएगा। लेबनान को लेकर यह देखना होगा कि वहां इजरायल हिजबुल्ला को कितना नियंत्रित कर पाएगा। इसको नियंत्रित करने में इजरायल को थोड़ा मुश्किल होगा। इसलिए मध्य-पूर्व में संघर्ष की आशंका गौण है और भारत, फलस्तीन का साथ छोड़ता नजर नहीं आता है।

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप का ये कदम मध्यपूर्व में शांति की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। यरुशलम का मुद्दा इजराइल और फलस्तीन आपस में निपटाएं। अमरीका का यरुशलम को राजधानी घोषित करने का कदम मध्यपूर्व की राजनीति में अपने हितों को साधने की सियासी रणनीति भी है।

बंशीधर प्रधान, प्रोफेसर, जेएनयू, नई दिल्ली

  • यरुशलम को इजराइल की राजधानी स्वीकारनें का प्रस्ताव अमरीकी कांग्रेस (संसद) ने वर्ष 1995 में पास कर दिया था। इसके बाद बनने वाले किसी भी राष्ट्रपति ने इसे लागू नहीं किया। वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव के दौरान कई वादे ऐसे किए थे जो कि वे पूरे नहीं कर पाए हैं। चुनावी वादों के अलावा कई अन्य मुद्दों पर उनके रवैये के कारण उनकी विश्वसनीयता खत्म हो रही है। ट्रंप को लगा कि इस चुनावी वादे के बहाने वे अपनी विश्वनीयता भी बनाए रख सकते हैं और खुद पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों से अलग भी दिखा सकेंगे। लेकिन ट्रंप के बयान को देखा जाए तो उन्होंने चतुराई पूर्व ढंग से अमरीका का दूतावास तेल अवीव से यरुशलम स्थानातंरित करने की बात कही है पर कहीं यह नहीं कहा कि वे राजधानी के रूप में संगठित यरुशलम को स्वीकारते हैं या विभाजित यरुशलम को।
  • इस विवाद का निपटारा दोनों देश मिलकर करेंगे। संयुक्त राष्ट्र भी यरुशलम के संबंध में प्रस्ताव पारित कर चुका है। ऐसे में ट्रंप का यह कदम अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सीधा उल्लंघन है। अमरीका को अपनी इजराइल की योजना में सऊदी अरब का भी साथ मिला हुआ है। सऊदी अरब ने इस पर लेबनान को भी सहमत करने का प्रयास किया था। लेबनान के राष्ट्रपति जब सऊदी अरब की यात्रा पर गए तो वहां उनको बंधक बनाने की खबर आई और उन्होंने वहां से इस्तीफा भी भेजा। उसके बाद जब इसको लेकर बवाल हुआ तो वे अपने देश लौटे और उन्होंने वापस पद ग्रहण किया। इसके पीछे की कहानी यरुशलम से जुड़ी हुई है। सऊदी अरब, इजराइल के प्रस्ताव पर लेबनान को राजी करना चाहता था लेकिन लेबनान के राष्ट्रपति इस बात पर राजी नहीं हुए तब यह सब नाटक हुआ। इसलिए इस घोषणा की पटकथा पहले से लिखी जा चुकी थी दरअसल, अमरीका सऊदी अरब और ईरान के बढ़ते प्रभाव से चिंतित है और इसे किसी भी कीमत पर रोकना चाहता है। इसके लिए वह इजराइल से भी हाथ मिलाने के लिए तैयार है। लेकिन अमरीका की इस घोषणा से ईरान का प्रभाव बढ़ सकता है। अमरीका का यह कदम राजनीतिक रूप से बहुत ही गलत है। इससे मध्य-पूर्व में शांति की संभावनाएं और धूमिल पड़ सकती हैं और हिंसा का एक नया दौर शुरू हो सकता है।

अमरीका: - इजरायल ओर फिलिस्तीन के बीच यरुशलम को लेकर वर्षों से खटास रही है। अमेरिकी राष्टपति ने अपने एक फैसले में येरुशलम को इजरायल की राजधानी घेषित करके वह काम किया है जिस्से कई देश उसका बहिस्कार कर सकते हें। यह बात इजरायल में पदस्त रहे पूर्व अमेरिकी राजदूतों ने कही है। उनका मानना है कि इससे मध्य पूर्व में शांती की कोशिशें को बड़ा झटका लगेगा साथ ही आतंकी संगठन भी अमेरिका एवं उसके नागरिकों के खिलाफ हिंसा को अंजाम दे सकते है।

  • जब किसी दूसरे देश का मामला पेचिदा होकर फंस जाता है तो सरकार वहा स्थित अपने राजदूतों और उच्चायुक्त से बात करता है सलाह करती है। अमेरिका में ऐसा बिल्कुल नही होता है। वहा के ट्रंप प्रसाशन में सलाह मशवीरे की सस्वीकृति नही दिखाई देती है। हाल ही में राष्ट्रपति डोंनाल्ड ट्रंप ने यरुशलम को इजरायल की राजधानी घेषित करने की बात कही है। उनके फैसले का अमेरिका सहित कई देशों में विरोध हो रहा। अमेरिका में उन्ही के पार्टी के लोग उनके फैसले से सहमत नही है। फैसले का क्या होगा यह बाद में पता चलेगा। इस बारे में इजरायल में पदस्त में रहे 11 पूर्व राजदूतों से पूछा गया की क्या ट्रंप ने सही फैसला लिया है। 11 में से 9 ने कहा कि यह बहुत गलत फैसला है, इसमें जोखिम और खतरा बहुत है। शेष 2 राजदूतों ने कम शब्दों में अलग बाते कहीं है।
  • राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को देखकर कहा जा सकता है कि उन्होंने यह फैसला इस समय क्यों लिया। यह किसी को नहीं पता कि उन्हें इससे क्या मिल जाएगा, उन्होंने इस फैसले के लिए इसी समय को क्यों चुना। सभी पूर्व 11 अमेरिकी राजदूत इस घटनाक्रम पर गंभीरता से निगाह रखे हैं। ट्रंप के प्लान (योजना) में यह बात भी शामिल है कि तेल अवीव (इजरायल की मौजूदा राजधानी) स्थित अमेरिकी दूतावास को यरुशलम स्थानांतरित किया जाएगा। जो लोग यह समझते हैं कि ट्रंप को इजरायल और यरुशलम की जमीनी वास्तविकता का अहसास है, वे लोग भी मानते हैं कि ट्रंप ने गलत तरीका अपनाया है। पूर्व राजनयिक मानते हैं कि यह एक अलग तरह का संकट है, पता नहीं इसमें अमेरिका को क्या हासिल होगा, लेकिन इसमें कई तरह की राजनीतिक रियायतें जरूर शामिल हो जाएगी।
  • 1959 से 1961 तक आइजनहावर के शासनकाल में इजराइल में अमेरिकी राजदूत रहे ऑग्डेन आर रेड उन अपवादों में हैं, जो ट्रंप के फैसले को उचित ठहराते हैं। उनसे पूछा गया तो कहते हैं, मेरे ख्याल से यह उचित फैसला है लेकिन मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकता हूं। दूसरे अपवाद एडवर्ड एस वाकर जूनियर (कनिष्ठ) हैं। वे 1997 से 1999 तक बिल क्लिंटन के शासनकाल में इजरायल में राजदूत रह चुके हैं। उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि यह समय की बात है। उन्होंने (ट्रंप ने) उस वास्तविकता को पहचाना है, जो हम नहीं कर पाए थे। हम सभी जानते हैं कि इजराइल की अपनी राजधानी है, जिसे यरुशलम कहते हैं। मध्य-पूर्व में मेरे 35 वर्षों के कार्यकाल में इस बारे में किसी ने कभी सवाल नहीं उठाया। अमेरिका ने 1948 की पॉलिसी (नीति) का दायरा तोड़ा है, शायद इसलिए आज अधिक देशों में उसकी आलोचना हो रही है। पॉलिसी यह थी कि ’यरुशलम को क्या पहचान दी जाए, उसका क्या स्ट्‌ेटस होगा’, यह मसला इजरायल और फिलिस्तीन के बीच सुलह-समझौते का है।
  • एडवर्ड वाकर जूनियर कहते हैं, यह प्रश्न बिल्कुल सही है कि लाइनों (रेखाओं) और सीमाओं को भी देखा जाना चाहिए। आप देखिए इजरायल के आसपास कौन-सी लाइन है और फिलिस्तीन के चारों और कौन सी? राष्ट्रपति ट्रंप को लगा होगा कि इसमें सुलह-समझौते जैसी कोई बात नहीं है, इसलिए उन्होंने फैसला ले लिया।
  • इन्होंने फैसले को खतरनाक बताया: 2001 से 2005 तक जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में इजराइल में राजदूत रहे डेनियल कर्टजर ने कहा-यह सही दृष्टिकोण वाला फैसला नहीं है। इस फैसले में ढलान ही ढलान है। राजनयिक एंव मध्य-पूर्व में शांति के स्तर पर भी, इसमें कहीं कुछ मिलने वाला नहीं है। हम एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ रहे हैं, सिवाय इजरायल को छोड़कर। हमें ऐसे राष्ट्रपति से अलग चलना होगा जो खुद को शांति भंग करने वाला कहते हों। यह प्रक्रिया बिल्कुल सही नहीं है। अमेरिका से कोई उम्मीद नहीं करता कि वह किसी एक पक्ष में जाकर खड़ा हो जाए और दूसरे पक्ष को कुछ करने का मौका ही न दिया जाए।
  • जॉर्ज डब्ल्यू बुश के ही कार्यकाल में 2005 से 2009 तक इजरायल में राजदूत रहे रिचर्ड एच. जोन्स कहते हैं- यह फैसला हमास और आईएस को अधिक भड़काने वाला साबित हो सकता है। इसके कारण वे अधिक हिंसा को अंजाम दे सकते हैं। संभव है कि फिलिस्तीन सरकार अंतरराष्ट्रीय सहयोग जुटाकर इजरायल की आलोचना और उसका बहिष्कार करने में सफल हो जाए। यह जोखित भरा कदम है और इसकी कीमत इजराइलियों को ही चुकानी होगी।
  • यरुशलम की स्थिति को लेकर इजरायल और फिलिस्तीन के बीच बातचीत होनी थी, लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने उस अवसर को गंवाकर खुद को अलग-थलग करने वाला काम किया है।
  • 2000 अमरीका के कैप डेविड में समझौता हुआ। इजराइली सेना ने लेबनान का मोर्चा छोड़ा। इस समझौते के अनुसार भी दोनों पक्ष अंतिम आपसी समझौते पर नहीं पहुंचे। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यरुशलम को इजराइल की आधिकारिक राजधानी के रूप में मान्यता का ऐलान किया। कई देशों का विरोध जारी।

बड़ी बहस: - यरुशलम को इजरायल की राजधानी की मान्यता देने के अमरीकी फैसले पर संयुक्त राष्ट्र में मतदान हुआ। भारत ने अमरीका और इजरायल के विरुद्ध जाकर फलस्तीन के पक्ष में मतदान किया। जब अमरीका और इजरायल भारत से नजदीकियां जता रहें हो तो क्या रहीं इस मतदान की वजह? क्या भारत परंपरागत नीति के दबाव में था? क्या उसका फैसला स्वायत्त विदेश नीति का परिणाम कहा जा सकता है? क्या हमें अब अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए?

  • संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव पारित कर अमरीका को कहा है कि यरुशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता के फैसले को उसे वापस लेना चाहिए। प्रस्ताव पर हुए मतदान में अमरीका के साथ केवल नौ देश थे और 35 ने मतदान में भाग नहीं लिया। भारत सहित 128 देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। इसका अर्थ है कि भारत अब भी फलस्तीन के साथ खड़ा है और अमरीका के फैसले को वह स्वीकार नहीं करता। भारत के प्रधानमंत्री मोदी इजरायल गए और वे इस देश के साथ संबंध बेहतर करने के इच्छुक दिख रहे थे। ऐसा लगता था कि भारत फलस्तीन का साथ छोड़ रहा है। लेकिन, संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रस्ताव के समर्थन में मतदान करना, इस बात को गलत साबित करता है। भारत हमेशा से नीतिगत तौर पर फलस्तीन का साथ देता रहा है। इसमें बदलाव की कोशिश तो बिल्कुल ही नहीं होनी चाहिए। हमारी अपनी नीति है और हम संप्रभु राष्ट्र की तरह अपने फैसले करते हैं। हमें बिना किसी के दबाव में आए यह तय करना चाहिए कि हमें आखिर क्या करना है और किसके साथ रहना है। सवाल अरब देशों के साथ देने और नहीं देने का नहीं हैं? हम पेट्रोलियम उत्पाद इन देशों से आयात करते रहे हैं, इन बातों को ध्यान में रखने का भी प्रश्न नहीं है। असल बात तो यह है कि आखिर सही क्या है। दुनिया में अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक चल कौन रहा हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें देना होगा।
  • यदि भारत इस मौके पर अमरीका का साथ देता तो दुनिया को गलत संदेश जाता कि बड़ी आर्थिक और सामरिक ताकत बनता जा रहा देश, गैर जिम्मेदाराना व्यवहार कर रहा है। हकीकत तो यह है कि अमरीका ने यरुशलम पर जो जिद पकड़ ली है, इस जिद को सही ठहराने के लिए विभिन्न देशों को धमका रहा था। अमरीका के राष्ट्रपति ने तो साफ तौर पर कहा कि उन देशों को अमरीका के साथ खड़े होना चाहिए, जिन्हे वह आर्थिक सहायता देता रहा है। उन्होंने यह धमकी भी दे डाली कि यदि अमरीका से सहायता प्राप्त देश उसका साथ नहीं करते तो उनकी सहायता संयुक्त राष्ट्र में अलग-थलग पड़ जायेगी। ऐसी आशंका थी कि भारत अमरीका के समर्थन में खड़ा हो सकता है क्योंकि हाल ही में अमरीका ने उसे अपना प्रमुख राजनीतिक व सामरिक सहयोगी बताया था। लेकिन, भारत ने इसके बावजूद उसका साथ नहीं दिया। हो सकता है कि अमरीका के घरेलू राजनीतिक हित सधते हों, जो उन्होंने इस तरह का कदम उठाया लेकिन भारत के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। भारत अपनी नीति पर टिका हुआ है, इसमें बदलाव के बारे में सोचना ठीक नहीं कहा जा सकता। स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है यह फैसला।

प्रो. बंशीधर प्रधान, जेएनयू, नई दिल्ली के सेंटर (केन्द्र) फॉर (के लिये) वेस्ट (पश्चिम) एशियन स्टडीज (अध्ययन) स्कूल (विद्यालय) ऑफ (के) इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) स्टडीज (अध्ययन) में लंबा अध्यापन अनुभव

भारत और इजरायल के बीच में भावनात्मक और ऐतिहासिक संबंध रहे है। इन्हें संयुक्त राष्ट्र में यरुशलम के संबंध में भारत के मतदान के आईने में नहीं देखा जा सकता। भारत ने यरुशलम को इजरायल की राजधानी मान्यता के संदर्भ में अमरीकी फैसले के विरोध में मतदान किया यानी उसने एक बार फिर फलस्तीन का ही पक्ष लिया। यह भारत की राजनीतिक विरासत का परिणाम है जो पूरे मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम संदर्भ में देखता रहा है। और, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अरब देश के साथ अपने संबंध के आधार पर फैसला करता रहा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भावना के आधार पर फैसला नहीं हो सकता है। सभी राष्ट्रों को अपना तात्कालिक व दीर्घकालिक हितों को देखकर फैसला लेना पड़ता है। भारत अचानक इजरायल के समर्थन में मतदान करता हो इसके नकारात्मक परिणाम होते। इससे पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे पर तमाम इस्लामिक देशों को भारत के विरुद्ध एकजुट करने का प्रयास करता। साथ ही भारत की आंतरिक राजनीति में भाजपा विरोधी छदम धर्मनिरपेक्षवादी राजनीतिक दल इसे विदेश नीति पर हिन्दुत्व की छाप दिखाकर देश में साामजिक व राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ाने का काम करते। इस मतदान को इजरायल के विरोध में मानना गलत होगा। भारत और इजरायल का संबंध हिन्दू और यहूदी संबंध के रूप में देखा जाना चाहिए। जब दुनियाभर में यहूदियों पर अत्याचार हुआ भारत में उन्हें सम्मानित और सुरक्षित स्थान मिला। वर्ष 1928 की जनगणना में भारत में 24 हजार यहूदी थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक नाना हरिपालकर ने तो मराठी में एक पुस्तक इजरायल लिखी जो वहां बेहद लोकप्रिय हुई। इसके उपकार में वहां एक चौक का नाम पालकर चौक रखा गया। इजरारयल के साथ भारत का संबंध स्वार्थ का संबंध नहीं भावनात्मक है। यहूदी और हिन्दू दोनों ही धर्म परिवर्तन को अस्वीकार करते हैं। भारतीय जनसंघ ऐसी अकेली पार्टी रही है जो इजरायल से संबंधों की वकालत करती रही। इसी पार्टी से निकले अटल बिहारी वाजपेयी 1977 की जनता पार्टी सरकार में जब विदेश मंत्री बने तो पहली बार इजरायल गए थे। यद्यपि कांग्रेस सरकार के दौरान भी इजरायल से संबंध सुदृढ़ हुए लेकिन अपराध बोध के साथ। अब एक बार फिर प्रधामंत्री मोदी ने इजरायल के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाने की कोशिश की है। यह मतदान इजरायन के विरुद्ध बिल्कुल भी नहीं।

प्रो. राकेश सिन्हा, दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन, इंडिया (भारत) पॉलिसी (नीति) फाउंडेशन (नींव) के मानद निदेशक।

अन्य विचार: -

  • स्याुंक्त राष्ट और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की अवहेलना करतेंं हुए अमेरिका राष्टपति डोनाल्ड टम्प ने यरूशलम को इजरायल की राजधानी घोषित कर नही आशंका पैदा कर दी गई है। इजरायल प्रधानमंत्री बैंजामिन नेतनयाहू भले इसे शांती की दिशा में उठाया गया कदम बताएं लेकिन संयुक्त राष्ट से लेकर पूरी दुनिया से उठे विरोध और आशंका की आवाजों ने साबित कर दिया है की यह कदम सूझबूझ के साथ नही उठाया गया है। यरूशलम इसलाम ईसाई और यहूदी तीन बड़े धर्मों की पवित्रस्थली है। यहा अगर यहुदियों का सुलेमानी मंदिर है तो मुसलमानों की अल अक्सा मस्जिद होने के साथ ईसाईयों की वेस्टर्न (पश्चिमी) वॉल (दीवार) भी है। यह जगह इजराइल और फिलिस्तीन के बीच झगड़े की जड़ है। तेल अवीव की जगह इसे इजराइल की राजधानी घोषित करना और अमेरिका दूतावास को वहा ले जाना इजराइल जैसे लोतांत्रिक राज्य को धार्मिक्ता प्रधान करने वाला कदम तो है ही साथ ही मध्यपूर्व मे स्थित सभ्यताओ की संघर्ष की की गांठ को सक्रीय कर देना भी है।
  • यरूशलम 1967 की लड़ाई के बाद से इजराइल के कब्जे में है लेकिन उसकी कानूनी सिथति विवादित है। इजराइल उसे अपनी राजधानी बताता है लेकिन संयुक्त राष्ट्र के तमाम सदस्यों के दूतावास तेल अवीव में है। अब अगर ट्रम्प के फैसले का साफ संदेश है कि वह विवादित स्थल नही है। और इस पर फिलीस्तीन का कोई दावा नही है। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट के महासचिव अंटोनियो गुटेरस ने तो इसका विरोध किया ही है सउदी अरब मिस्र अरब लीग इरान चीन और रूस के अलावा ब्रिटेन और युरोपियन संघ सभी ने ट्रम्प के इस कदम पर आपित्त जताई है। फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने तो अमेरिका ने यरूशलम पर इजरायली कब्जे को कानूनी मान्यता नहीं दी थी। इस अमेरिकी कदम से संभव है कि फिलिस्तीन पर कुछ खोकर समझौता करने का दबाव बने। इसके बावजूद इस कदम से पड़ने वाले उन व्यापक प्रभावों की अनदेखी करना मुश्किल है जो उग्रवाद को बढ़ावा देते हैं। उग्रवादी संगठन हमास के एक गुट ने कहा भी है कि वे इस कदम को सफल नहीं होने देंगे और उनके पास दूसरे विकल्प खुले हैं। जरूरत है कि दुनिया के तीन महान धर्मों के इस स्थल को शांति का प्रतीक बनाया जाए।

उपसंहार: -संयुक्त राष्ट्र में भारत का मतदान एक कूटनीतिक फैसला है जिसे इजरायल बखूबी समझता है। उसने अपनी कोई नाराजगी न पहले जाहिर की और न अब की है। इसका कारण यहूदियों की हिन्दुओं के प्रति कृतज्ञता रही है। उम्मीद है कि दोनों देशों के भावनात्मक संबंध जल्दी ही विदेश नीति में भी परिलक्षित होंगे। दूसरी ओर हिंसा तो कतई इस मुद्दे का समाधान नहीं है। इजराइल और फलस्तीन दोनों पक्षों को हिंसा का त्याग करना होगा जिससे के इस मुद्दे का सर्वमान्य हल निकलेगा।

- Published/Last Modified on: January 23, 2018

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