लोकपाल व लोकायुक्त (Lokpal and Lokayukta) (Download PDF)

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प्रस्तावना: -भारत दुनिया का बड़ा लोकतांत्रिक देश है। और किसी भी लोकतांत्रिक देश की सरकार के लिए जरूरी होती है। शासन में पारदर्शिता। सत्ता का मनोविज्ञान बिल्कुल ही अलग किस्म का होता है। एक बार सत्तासीन होने के बाद सत्ता का मोह बढ़ने लगता है। सत्ता में मौजूद लोगों को चाहिए कि देश के लोगों को जताएं कि वे कितनी ईमानदारी से देश की जनता के हित में कामकाज कर रहे है। इस मामले में पारदर्शिता की आवश्यकता होती है। जब पारदर्शिता नहीं होती तो संदेह पनपने लगते हैं ऐसे में जरूरी हो जाता है एक ऐसी संस्था का होना जो बताए कि कहां और क्या गलत हो रहा है? समय पर उसकी जांच कार्रवाई जा सके। इस काम के लिए भारत के संदर्भ में केंद्रीय स्तर पर लोकपाल की आवश्यकता महसूस की जाती रही है।

नियुक्ति: -

  • लोकपाल की नियुक्ति को लेकर देश में व्यापक आंदोलन भी हुए हैं। लेकिन, जैसा कि सभी जानते हैं, सत्ता का मनोविज्ञान ही अलग होता है। यही वजह है कि सत्ता में बैठे लोग लोकापाल की नियुक्ति को टालते रहे हैं। उल्लेखनीय है कि अब सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा कि वह लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया को पूरी करे। विपक्ष के नेता की मौजूदगी की आड लेकर लोकपाल की नियुक्ति रोके रखने को कोई औचित्य नहीं है। सरकार का कहना हैं कि वर्तमान कानून में संशोधन के बिना लोकपाल की नियुक्ति संभव नहीं है तो न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बिना संशोधन के बिना लोकपाल की नियुक्ति की जा सकती है। आमतौर पर कानून में संशोधित लंबित हो तो न्यायालय आदेश नहीं देता लेकिन यह मामला अलग है। अगर नेता विपक्ष नहीं हैं तो लोकपाल चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, भारत के प्रधान न्यायाधीश या नामित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी एक नामचीन हस्ती का चुनाव कर सकते हैं।
  • न्यायालय ने यहां तक टिप्पणी डाली कि केंद्र सरकार के पास इस बात का सही तर्क नहीं है कि इतने समय तक लोकपाल की नियुक्ति को लंबित क्यों रखा गया? सवाल उठना लाजिमी है या कहें कि जिज्ञासा होती है कि न्यायालय से इतना सब कुछ सुनने के बाद क्या केंद्र सरकार लोकपाल की नियुक्ति करेगी? तो इसका उत्तर दे पाना बहुत ही मुश्किल है। अब तक नहीं किया तो कैसे कहा जा सकता है कि वह लोकपाल नियुक्त करेगी या नहीं करेगी? इस प्रश्न का सही-सही उत्तर तो केंद्र में सत्तारुढ़ लोग ही दे सकते हैं। लेकिन, हम तो इतना ही कह सकते है कि लोकपाल की नियुक्ति अवश्य की जानी चाहिए। यह तर्क मायने नहीं रखता कि सामने मान्यता प्राप्त विपक्ष का नेता नहीं है। सरकार ने ऐसे अनेक पदों पर नियुक्ति की है, जिनकी नियुक्ति समिति में मान्यता प्राप्त विपक्ष नहीं है लेकिन उसका होना लोकपाल की नियुक्ति की तरह ही जरूरी माना गया है। उल्लेखनीय है कि मुख्य सतर्कता आयुक्त, मुख्य सुचना आयुक्त जैसे पदों की नियुक्ति के लिए समिति में लोकसभा में विपक्ष के नेता का होना जरूरी है।
  • लोकसभा में विपक्ष में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी (दल) के तौर पर है लेकिन उसके नेता मल्लािर्जुन को विपक्ष के नेता के तौर पर मान्यता प्राप्त नहीं है सवाल लोकतंत्र का है और लोकतंत्र में विश्वास बरकार रखने के लिए जरूरी है कि लोकपाल जैसे पदों पर नियुक्ति किया जाना जरूरी है। यह ठीक है, मान्यता प्राप्त विपक्ष का होना एकमात्र कानूनी संशोधन नहीं है और भी कई संशोधन लोकपाल से संबंधित कानून में होने हैं लेकिन इन संशोधनों के बिना भी लोकपाल की नियुक्ति की जा सकती है। यह तो इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है कि सरकार लोकपाल की नियुक्ति करे या न करे। सरकार की इच्छा शक्ति को जगाने का काम ही सर्वोच्च न्यायालय ने किया है। यदि सरकार लोकपाल की नियुक्ति का कदम उठाती है तो यह लोकतंत्र के हित में उठाया गया कदम कहलाएगा। लोकतंत्र में पारदर्शिता बहुत महत्व खती है और इसे बनाए रखने के लिए लोकपाल एक नियंत्रक का काम करता है। लोकपाल की नियुक्ति पक्ष और विपक्ष के बीच विश्वास बनाने का भी काम करने में सहायक है। लोकतंत्र का आधार संवाद है और किसी भी निर्णय तक पहुंचने के लिए संवाद बहुत ही आवश्यक होता है। यह संवाद विश्वास से ही होता है मुझे लगता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच विश्वास बनाए रखने के लिए लोकपाल की नियुक्ति जितनी अधिक जल्दी होगी बेहतर रहेगा। जरूरत इस बात की भी है कि जल्दबाजी में औपचारिकता भर के लिए लोकपाल नहीं आए बल्कि सोच-समझकर इसका दायरा बढ़ाए जाने से विश्वास कायम हो सकेगा। लगेगा कि सरकार और जनता के बीच पारदर्शिता बनी हुई है। यदि लोकपाल की नियुक्ति होंती है तो सरकार की साख भी बेहतर होगी। इस झिझक को समाप्त करना होगा कि लोकपाल के होने से कामकाज में बाधा आ सकती है। इसके विपरीत लोकपाल के होने से सरकार का कामकाज आसान ही होने वाला है। सरकार को उसके बारे में बनी आशंकाएं दूर करने में मदद मिलेगी। जरूरत है तो आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की।

के. एन. गोविंदाचार्य सामाजिक चिंतक, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं।

सुर्प्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) : -

  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को लोकपाल एक्ट तुरंत लागू करने का आदेश दिया है। जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने जारी आदेश में कहा कि सरकार लोकपाल और लोकायुक्तों की नियुक्तियां लंबिन न रखे। लोकपाल एक्ट (काम करना) में संशोधन किए बिना भी काम कर सकते हैं। अब तक लोकपाल की नियुक्ति लटकाने के लिए केंद्र सरकार कोई भी जायज वजह नहीं बता पाई।
  • बता दे कि इस मामलें में एनजीओ (नॉन गवरमेंट ओर्गनाइज़ेशन) (गैर सरकारी संगठन) कॉमन (साधारण) कॉज की याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 28 मार्च को फैसला सुरक्षित रख लिया था। केंद्र की तरफ से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कोर्ट को बताया था कि लोकपाल बिल के कई संशोधन संसद में लंबित हैं। लोकसभा की चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, चीफ (प्रमुख) जस्टिस (न्यायाधीश) या उनकी ओर से नामित सुप्रीम कोर्ट के जज और एक नामचीन हस्ती के साथ नेता विपक्ष भी शामिल होता है। नेता विपक्ष की जगह सबसे बड़े दल के नेता को समिति में रखने का संशोधन कानून में किया जाना है। इसके साथ करीब 20 संशोधन लंबित हैं।
  • इस मामले में एनजीओ कॉमन कॉज की तरफ से वरिष्ठ वकील शांति भूषण ने कहा था कि सरकार लोकपाल की नियुक्ति में दिलचस्पी नहीं ले रही है। जानबूझकर संशोधन विधेयक रोक रखा है। उन्होंने कोर्ट को बताया था लोकपाल बिल साल 2013 को पारित होने के बाद 2014 में प्रभावी हो गया था, लेकिन अभी तक लोकपाल नियुक्त नहीं हो पाया हैं।

उद्देश्य: -

  • सत्ता का विकेंद्रीकरण लोकतंत्र की मूल भावना है। इसी उद्देश्य से देश भर में निगत, बोर्ड (मंडल) और आयोगों का गठन हुआ। लेकिन जब इनमें नियुक्तियों की बोर्ड और आयोगों का गठन हुआ। जब इनमें नियुक्तियों की बारी आती है तो फिर सरकार किसी भी पार्टी की हो, तो अपने-अपने को ही सत्ता दी जाती हैं। इस सियासी खेल में जनकल्याण ताक पर रख दिया जाता है। जनता से नकारे गए यानी चुनाव हारे हुए नेताओं अथवा राजनीतिक ’तृष्टिकरण’ के लिए इन्हें कुर्सी मिल जाती है। केबिनेट (मंत्रिमंडल) और राज्य मंत्री तक का दर्जा इन्हें मिल जाता है। ज्यादातर कागजों में चलने वाली इन संस्थाओं की आम जनता के प्रति कोई जवाबदेही भी नहीं होती है। आखिर इन सरकारी कठपुतलियों की डोर तो पांच साल तक सरकार के हाथों में ही रहती हैं

बहस: -

  • देश में लोकपाल को लेकर बहस 60 के दशक में जब भ्रष्टाचार शासन-व्यवस्था में जड़े जमाने लगा तो पश्चिम के देशों की तरह एक ऑम्बड्‌समैन की जरूरत महसूस की जाने लगी। ऑम्बड्‌समैन के लिए लोकपाल शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वर्ष 1963 में लोकसभा सदस्य लक्ष्मीमल सिंघवी ने किया। वर्ष 1966 में मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में गठित प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी सिफारिश में जन शिकायत निवारण के लिए केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना पर जोर दिया। वर्ष 1968 में पहला लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयक लोकसभा में पेश किया गया। अन्ना आंदोलन के बाद वर्ष 2013 में संसद में लोकपाल बिल पारित होने के बाद 2014 में राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से कानून बना। लेकिन सरकार ने 27 जुलाई, 2016 को लोकसभा में लोकपाल और लोकायुक्त (संशोधन) बिल पेश किया। 16 वीं लोकसभा के वर्ष 2014 में हुए चुनाव में विपक्षी दलों में से किसी भी दल को नेता विपक्ष के पद के लायक बहुमत नहीं मिला। चूंकि लोकपाल का नेता विपक्ष भी सदस्य होता है। सरकार इसी तकनीकी पेच का बहाना बनाकर बार-बार लोकपाल की नियुक्ति को टालती रही है। फलस्वरूप मामला सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने सरकार को टालमटोल का रवैया अपनाने की बजाए लोकपाल की नियुक्ति करने का एक प्रकार से आदेश दिया। लोकपाल की नियुक्ति पर सरकारी रवैये से जाहिर होता है कि सरकार ऐसी संस्थाओं के पद खाली ही रखना चाहती हैं जो उन की नकेल कस सके।

हालात: -

  • राजस्थान-मानवाधिकार आयोग पिछले आठ महीनें से सदस्यों के लिए इंतजार कर रहा है। अध्यक्ष प्रकाश टाटिया। स्टाफ (अधिकारियों का समूह) -जगह के लिए सुप्रीम कोर्ट में मामला ले जाने को कहना पड़ा।

मिलावट रोकने के लिए ट्रिब्यूनल (धर्मशाला) बनवाने में हाई कोर्ट (उच्च न्यायालय) को मुख्य सचिव को तलब करना पड़ा। एक साल बाद कार्य व्यवहारिक रूप में शुरू हो पाया।

आयोगों तथा बच्चों से संबंधित बोर्ड (मंडल) और कमेटियों (समितियों) में अध्यक्ष और सदस्य नहीं लगाने पर हाईकोर्ट को स्व: प्ररेणा से प्रसंज्ञान लेना पड़ा। इसके बावजूद सरकार बार-बार समय लेती रही और कोर्ट को सख्त रुख दिखाना पड़ा।

खाद्य सुरक्षा कानून में राशन, मिड-डे मील और आंगनबाड़ी से संबंधित शिकायतें सुनने के लिए आयोग बनाना था लेकिन वो अब तक कागजों में ही बन पाया है।

महिला, अजा-अजजा और बाल आयोग का गठन तो हुआ लेकिन सरकारी योजनाओं के माध्यम से कोई बड़ा कार्य अब तब नहीं करा पाए। राजनीतिक बयानों की भरमार।

  • मध्यप्रदेश-सवा सौ से ज्यादा विगम-मंडल-आयोग। अध्यक्ष -उपाध्यक्ष की नियुक्ति राजनीतिक तरीके से। नियुक्तियां सियासी तृष्टिकरण और राजनीतिक संतुलन बनाने के लिए।

पर्यटन निगम में राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त भाजपा नेता तपन भौमिक अध्यक्ष है। टिकट व चुनाव से भौमिक को दूर रखा गया। बाद में इन्हें अध्यक्ष का पद दिया गया।

इंदौर विकास प्राधि में कृष्ण मुरारी मोघे को टिकट-चुनाव से दूर रखने के बाद नाराजगी दूर करने अध्यक्ष का पद दिया गया। भोपाल विकास प्राधिकरण में ओम यादव को अध्यक्ष बनाया गया। इनको भी विधानसभा का टिकट नहीं दिया गया था।

पर्यटन विकास निगम तो कमाऊ निगम साबित हुआ है, जबकि राज्य सड़क परिवहन विकास निगम के खस्ताहाल होकर डूबने का सबसे बड़ उदाहरण हैं।

कांग्रेस शासनकाल में तो नौ ऐस निगम-मंडल रहे, जो खराब आर्थिक स्थिति के कारण सरकार पर बोझ बन गए और बाद में बंद कर दिए गए।

  • छत्तीसगढ़-छग में करीब 37 निगम, मंडल आयोग और प्राधिकरण पर ज्यादातर राजनीतिक पृष्ठभूमि और सत्ताधारी भाजपा से संबंध रखने वालों की नियुक्ति हो रही है।

राज्य में ऐसे कई मामलें हैं, जब सरकार संकट में घिरती है, तो आयोग चुप्पी साथ लेता हैं। बाल श्रमिकों को रोकने में भी आयोग नाकाम साबित हो रहे हैं।

चुनावी हारीं लता उसेंड को नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनाया है। देवजी भाई पटेल को पाठयपुस्तक निगम, और विधायक शिवरतन

शर्मा को छत्तीसगढ़ मिनरल (खनिज) डेवलपमेंट (विकास) कार्पोरेशन (निगम) का अध्यक्ष बनाया गया है।

2015 में बीजापुर में जवानों द्वारा महिलाओं से छेड़छाड़ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने नोटिस दिया था, पर इस मामले में राज्य मानवाधिकार

आयोग ने चुप्पनी साधे रखी।

नेता प्रतिपक्ष टीएस कहतें हैं- कि मंडल, आयोग, प्राधिकरण की जिम्मेदारी काफी अहम होती है। ऐसे में संबंधित क्षेत्र के जानकारों की नियुक्ति होनी चाहिए।

जवाबदेही: -

बोर्ड-निगम जैसी संस्थाओं में नियुक्ति के लिए योग्यता के निर्धारण के साथ ही इनकी जवाबदेही भी सुनिश्चित की जाए।

आलोक मेहता, पदमश्री से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार

  • लोकतंत्र में आवश्यक है कि सभी वर्गो और समुदायों का अधिकाधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। सभी कार्य मंत्रालय या मंत्री नहीं कर सकते हें इसलिए विभिन्न बोर्ड (मंडल) -निगम आवश्यकता होती है। साथ ही यह माना जाता है कि ऐसी संस्थाओं से लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण होता है। लेकिन जरूरी है कि इन संस्थाओं पर सही और योग्य लोगों का चयन हो। राजनीतिक तृष्टिकरण, खानापूर्ति के लिए ऐसी संस्थाओं में अयोग्य लोगों की नियुक्ति होती है तो इससे समाज का भला नहीं हो पाता है वास्तव में जो योग्य, सक्षम और उस क्षेत्र के विशेषज्ञ हों ऐेसे लोगों की नियुक्ति ही सही होती है। हाल के वर्षों में बहुत सी संस्थाओं में ऐसी नियुक्तियां विवादित रही हैं इसका मुख्य कारण ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति भी रहा है जो उस क्षेत्र के विशेषज्ञ नहीं रहे है। जैसे किसी कला के क्षेत्र के संस्थान में ऐसे व्यक्ति को नियुक्ति कर दिया जाता है जिसे कला का ज्ञान नहीं हो। ऐसी स्थिति में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं तो लाभान्वित हो जाते है लेकिन ऐसी संस्थाओं की साख खराब हो जाती है। कहने को ऐसी संस्थाओं पर नियुक्ति पाने वाले लोगों को वेतन नहीं दिया जाता है लेकिन इनके गाड़ी, मकान, विदेशी दौरो आदि जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ रूपए खर्च हो जाते हैं।
  • जबकि देश और प्रदेशों में कई संस्थाएं ऐसी भी है जिनके पदों को लंबे समय तक खाली रखा जाता है लोकपाल पर देश में लगभग चार दशक से अधिक समय तक बहस होती रही, तब जाकर यह मूर्त रूप ले पाया है लेकिन सरकार तकनीक कारणों का सहारा लेकर इसे लटकाती रही है जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) को लोकपाल की नियुक्ति का एक तरह से आदेश देना पड़ा है। यही हाल राज्यों में लोकायुक्त है। कई राज्यों में लोकायुक्त पद 5 - 10 वर्षो तक पद खाली पड़े रहते हैं। लोकायुक्त चयन में सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है इसलिए कई बार यह आरोप भी लगते रहे हैं कि सरकार का इनकी नियुक्ति में पूर्वाग्रह रहता है। देश में 90 फीसदी लोग ईमानदारी से जीवन-यापन करते हैं।
  • देश में बहुत से अफसर ईमानदार है। बहुत से नेता भी ईमानदार हैं, हम सभी को बेईमान नहीं कह सकते है। इसलिए शासन व्यवस्था को पारदर्शी ढंग से संचालन करने के लिए लोकपाल, लोकायुक्त जैसी संस्थाओं में समय पर नियुक्ति की जाए। हाल ही दिल्ली सरकार के कामकाज पर शूूंगलू कमेटी (समिति) की रिपोर्ट (विवरण) आई है जिसमें सरकार पर सत्ता के दुरुप्रयोग का आरोप लगे हैं। इसमें बहुत सी ऐसी नियुक्तियों पर सवाल उठाया गया है जिनमें कार्यकर्ताओं को समायोजित किया गया है। इसलिए चाहे दिल्ली हो या दूसरा राज्य या केंद्र सरकार निगमों-बोर्ड आदि संस्थाओं में नियुक्ति में मनमानें ढंग से नियुक्ति पर रोक लगनी चाहिए। इनकी योग्यता, जबावदेही सार्वजनिक होनी चाहिए। साथ ही इन संस्थाओं की कार्य रिपोर्ट (विवरण) हर साल जारी की जानी चाहिए। जिससे जनता जान सके कि इनका कामकाज कैसा रहा है साथ ही इनको कार्य सही ढंग से नहीं करने पर कार्यकाल के बीच हटाने का प्रावधान होना चाहिए। इन संस्थाओं की जनता के प्रति जवाबदेहिता भी तय करनी होगी। जिससे कि आखिर लोगों को पता चल सके कि निगम सहयोग आयोग और बोर्डों में नियुक्ति होने वाले प्रतिनिधि क्या काम रहे हैं।

राजनीतिकरण: -

नियुक्तियों में योग्यता को पैमाना नहीं रखांं जाता है। राजनीतिक तुष्टिकरण ही मूल उद्देश्य बन कर रह गया है।

संजय कुमार, निदेशक, सेंटर (केन्द्र) फॉर (का) स्टडी (अध्ययन) डवलपिंग (विकास) सोसायटी (समाज)

  • देश में विभिन्न बोर्ड-निगम और अन्य संस्थाओं की व्यवस्था शासन- व्यवस्था के सुचारु रूप से संचालन में सहयोग के उद्देश्य से की गई थी। लेकिन धीरे-धीरे इन संस्थाओं का स्वरूप बदल गया। बोर्ड-निगमों में राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों की नियुक्ति की जाने लगी और इससे इन संस्थाओं के राजनीतिकरण का दौर शुरू हुआ। इनका उपयोग अब राजनीतिक दलों के ऐसे लोगों को समायोजित करने में होने लगा है जिन्हें मंत्री नहीं बनाया जा सकता है या चुनाव हर चुके हैं। इनके राजनीतिकरण का नुकसान जनता को हुआ है। एक तो बोर्ड -निगम अपने कार्य पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते हैं और दूसरा इनमें राजनीतिक लोगों की नियुक्ति होने से दूसरे दल की सरकार आते ही इन लोगों को पद छोड़ना पड़ता है, भले ही कार्यकाल पूरा हो या नहो। दूसरी तरफ लोकपाल, लाेाकयुक्त और सीवीसी जैसी संस्थाओं में नियुक्ति में सरकारों की ओर से देरी की जाती है इन संस्थाओं में पद लंबे समय तक खाली पड़े रहते हैं। सरकार ऐसी संस्थाओं के लिए ऐसे लोगों की तलाश में होती है जो निर्धारित योग्यताओं के साथ-साथ नियुक्ति करने वाले दल के प्रति सहानुभूति भी रखे। कारण है कि इन संस्थाओं को कई अधिकार प्राप्त हाेेते हैं।
  • ये सरकार के लिए ’मुश्किले’ भी पैदा कर सकते हैं। इसलिए इन संस्थाओं नेतृत्व करने वाले लोग जरूरत पड़ने पर सरकार के विपक्ष की बजाए उनके साथ खड़े होने चाहिए। कई बार ऐसे लोगों को ढूंढने में दिक्कत होती है तो समय लग जाता है तो कई बार सरकार जानबूझ कर इन पदों को खाली रखती है। इसके उदाहरण के तौर पर लोकपाल को देखा जा सकता है। केंद्र में लोकपाल की नियुक्ति काफी समय से लंबित है। इसकी नियुक्ति के लिए हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा और सरकार को लोकपाल की नियुक्ति करने के लिए कहा है। सत्ता में चाहे कोई दल हो लेकिन ऐसे होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर लगभग सभी दलों में एक तरह की अनौपचारिक सहमति रहती है। विभिन्न बोर्ड-निगम जिस उद्देश्य से गठित किए गए थे वो पूरा नहीं कर पा रहे हैं। ये राजनीतिक लोगों को समायोजित करने का जरिया मात्र बन कर रह गए हैं और इस मामले में सभी राजनीतिक दल एकमत हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि जब इन संवैधानिक पदों का गठन कर दिया गया है तो फिर इनकी नियुक्ति के लिए भी एक मैकेनिज्म (तंत्र) बनना चाहिए। इसमें सत्तारूढ़ दल ही नहीं सभी राजनीतिक पार्टियों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। जिससे कि किसी भी नियुक्ति में आपत्तियों की गुजाइंश कम से कम हो। सरकारों ने कार्य विभाजन के लिए पूर्व में निगम, बोर्ड और आयोगों का गठन किया था। लेकिन इसमें इस प्रकार की नियुक्तियां की जाने लगीं जिससे कि इनके कार्य को राजनीतिक चश्में से देखा जाने लगा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये जरूरी है कि इन नियुक्तियों में पारदर्शिता बरती जाए। जिससे कि इन संवैधानिक संस्थाओं का उद्देश्य पूर्ण हो सके।

उपसंहार: -बहरहाल सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने हाल ही केंद्र सरकार को लोकपाल नियुक्ति में टालमटोल करने पर फटकार लगाई और जल्द इस पद पर नियुक्ति करने को कहा है। अब देखना होगा कि यह लोकतांत्रिक सरकार के कामकाज में बाधा उत्पन्न करेंगे या फिर भ्रष्टाचार मुक्त करके उनकी छवि स्वच्छ करनें में कारगर सिद्ध होंगें।

- Published/Last Modified on: June 11, 2017

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