यूनानी दिवस चिकित्सा पद्धति (Medical Day Medicine)

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प्रस्तावना: - यूनानी चिकित्सा पद्धति की अरब देशों से शुरुआत हुई और यूनान में इसे बढ़ाया गया। यूनानी चिकित्सक बुकरात ने इसे एक चिकित्सा शैली के रूप मेे विकसित किया व बाद में जालीनूस, शेखबू अली सीना, जकररिया राजी, इब्ने नफीस ने अपने विशेष योगदान से इसे एक संपूर्ण इलाज की पद्धति में तब्दील किया। भारत में इसकी शुरुआत 13वीं-17वीं शताब्दी के बीच हुई। शेखबू अली इब्ने सीना ने कई किताबें यूनानी तिब्बत की पृष्ठभूमि पर लिखी। लेखन के दौरान वे भारत में प्रसिद्ध आचार्य सुश्रुत व चरक से भी प्रभावित रहे। भारत के हकीम अजमल खां का नाम विशेष रूप से यूनानी चिकित्सा पद्धति के विकास व विस्तार के लिए उल्लेखनीय है। इन्हीं के जन्मदिवस को यूनानी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

  • जनक: - यूनानी पद्धति के जनक हैं बुकरात, हिप्पोक्रेट बुकरात के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। इन्हें फादर (पुरोहितों की उपाधि) ऑफ (का) यूनानी मेडिसिन (चिकित्सा-शास्त्र) के नाम से भी जाना जाता है। यूनानी चिकित्सा पद्धति से जुड़े सिद्धांतों के अलावा इन्होंने कई वर्षों तक शरीर की संरचना पर खास शोध किया और इसी आधार पर यूनानी के उपचार का आधार तय हुआ। जिन्हें चार अखलात कहते हैं।
  • इलाज: - यूनानी के अनुसार मानव शरीर चार मूलभूत तत्वों (आग, हवा, मिट्‌टी, और पानी) से बना है और यूनानी सिद्धांत के अनुरूप ये तत्व शरीर के अखलात यानी बलगम, खून, सफरा (पीला पित्त) और सौदा (काला पित्त) के साथ संतुलन बनाकर सेहत बनाते हैं। इनमें गड़बड़ी होने या मात्रा में बढ़ोत्तरी से रोग जन्म लेते हैं। इन अखलात व तत्वों के अनूठे मिश्रण से हर व्यक्ति का मिजाज तय होता है। ये मिजाज चार कैफियत (गर्म, ठंडा, गीला व सूखा) पर आधारित हैं। इसके अलावा तत्वों व कैफियत के साथ में काम करने से एक नया कंपाउंड (यौगिक पदार्थ) बनता है जिसे खिलत्‌ कहते हैं। इससे व्यक्ति का मिजाज बदलकर गर्म-गीला, गर्म-सूखा, ठंडा-गीला और ठंडा-सूखा बन जाता हैं।

इलाज निम्न हैं-

  • इलाज -बिल-गिजा-यह हाइटोथैरपी हैं (जिसमें खाद्य सामग्री को डाइट (आहार) में शामिल करने वन परहेज करने की सलाह देते हैं। खासकर इम्यूनिटी (प्रतिरक्षक) बढ़ाने वाली चींजे खाने के लिए कहते हैं। वहीं पेरशानी बढ़ाने वाली गरिष्ठ, खट्‌टी, तली -भुनी, मसालेदार चीजें आदि से परहेज कराया जाता है।
  • इलाज -बिल-दवा-यह फार्माकोथैरपी कहलाती है। इसके तहत जड़ी-बूटियों, मौसमी फल व सब्जी आदि को सीधें या अलग-अलग रूप में प्रयोग में लेते हैं। जैसे गोलियां, चूर्ण, चटनी, जोशांदा, माजून, पाउडर, रोगन आदि को रोग के प्रकार के अनुसार मरीज को दते हैं।
  • इलाज -बिल-तदबीर-यह रेजिमेंटल थैरेपी है जिसमें शमूमत (अरोमा थैरपी) जोंक (लीच), हिजामा (कपिंग) दलक (मसाज), हमाम (बाथ) फसद (वेनीसेक्शन), सींगी (दूषित रक्त बाहर निकालने के लिए मेडिकेटेड (औषधीय) सींग प्रभावित हिस्से पर लगाना) आदि से इलाज होता हैं।
  • इलाज -बिल-यद-आधुनिक रूप से व अन्य चिकित्सा पद्धति में कहा जाने वाला ऑपरेशन (शल्य-क्रिया) या सर्जरी (शल्य-चिकित्सा) को यूनानी में इलाज -बिल-यद कहते हैं। रोग की गंभीरता व मरीज की स्थिति के अनुसार जब इलाज के अन्य तरीके काम नहीं करते तो इसे ही एकमात्र विकल्प मानकर अपनाया जाता है।

जांच: -

  • आयुर्वेद की तरह यूनानी में भी नब्ज यानी नाड़ी देखकर रोग की पहचान की जाती है। इसमें नब्ज की गति को ध्यान में रखा जाता है। इसके अलावा मरीज का यूरिन (मूत्र) टैस्ट (जाँच) भी कया जाता है। जिसमें इसके रंग और गाढ़ेपन को देखते हैं। साथ ही मरीज का फिजिकल (शारीरिक) एग्जामिशन (सावधानीपूर्वक जाँच), चेहरे के हावभाव, रंगत और परिवार के इतिहास को जाना जाता है।
  • बीमारी कोई भी हो यूनानी में बसे पहले उपचार के तहत पेट साफ करते हैं। जिसके लिए मुसीलाद (पेट को मुलायम और साफ करने वाली दवा) देते हैं। इसके बाद मरीज को रोग और गंभीरता के आधार पर जड़ीबूटी को उबालकर, भिगोकर, कूटकर, गोली, शरबत, तेल, अर्क आदि के रूप में सिंगल (एकल) या कंपाउंड (यौगिक पदार्थ) के रूप में देते हैं।
  • दवा के नाम: -यूनानी पद्धति में चपटी दवाइयों को ’कुर्स’ पानी या गोंद को मिलाकर तैयार दवा को ’हब’ (धुरा) कहते हैं तरल रूप में मौजूद दवा को खमीरारा और जोशांदा कहते हैं। दांत को साफ करने वाले पाउडर को ’सनून’ कहते हैं। सर्दी-खांसी में दवाएं बलगम को पकाकर बाहर निकालती हैं थकान, चक्कर आने जैसे रक्त संबंधी विकारों में दवाएं ब्लड (रक्त) से विषैले तत्वों को बाहर करती है। पेन्क्रियाज, लिवर, आंत, त्वचा पर काले धब्बे आदि दिक्कतों में दी जाने वाली दवाएं अतिरिक्त काला व पीला पित्त बाहर निकाल राहत देती हैं।
  • पाचन सुधारे: - पाचन संबंधी समस्या, पेट में दर्द होनो या मरोड़ उठना, भूख न लगना, कब्ज, एसिडिटी (अम्लता) आदि परेशानियों में भोजन करने के 5 मिनट बाद दवा लेने की सलाह देते हैं। इसका काम पाचक रस का स्त्रावण बढ़ाना होता हैं।

कुछ खास यूनानी नुस्खे: - घर पर भी इन आसान उपायों को अपनाया जा सकता है। इनके दुष्प्रभाव नहीं हैं-

  1. सर्दी-जुकाम-कलौंजी को शहद के साथ लें। या बादाम, मिश्री या काली मिर्च रात को सोने से पहले भी लें।
  2. गला जात होना-3 ग्राम पिसी दालचीनी व 5 ग्राम शहद लें। गले में सूजन, दर्द व खराश कम होगी।
  3. इम्यूनिटी (प्रतिरक्षण) - केसर की 1 - 2 कतरन को एक चम्मच शहद के साथ माह में 1 - 2 बार लें।
  4. अपच-हरड़, गुलाब की पत्तियां, सौंफ और मुनक्के को चीनी के घोल में मिलाकर पी सकते हैं।
  5. मजबूत हड्‌िडयां-जैतून, बादाम, कुंजद, जर्द आदि के तेल से हफ्ते में 2 - 3 बार मालिश करें।

भ्रम व तथ्य: - इलाज की अलग-अलग पद्धति को ध्यान में रखते हुए अक्सर लोगों में यूनानी चिकित्सा को लेकर भी कुछ भ्रम हैं। जानें इनकी सच्चाई-

  • भ्रम- इस पद्धति से इलाज लेने पर मरीज के शरीर पर दुष्प्रभाव होता है।

तथ्य-इस पद्धति में हबों मिनरल यानी जड़ी-बूटियों को अलग-अलग तरह से विभिन्न रूपों में प्रयोग किया जाता हैं। ऐसे में विशेषज्ञ के बताए अनुसार दवा को सही डोज (खुराक) और तरीके से न लेने पर इसका दुष्प्रभाव हो सकता है।

  • भ्रम-यूनानी इलाज अन्य पद्धति की तुलना में काफी महंगा है।

तथ्य-नहीं, ऐसा नहीं है। यह इलाज का प्राकृतिक रूप है जो महंगा नहीं है। जड़ीबूटियों को विभिन्न रूपों में प्रयोग होने के चलते यह हर वर्ग के व्यक्ति के उपचार के लिए इसे उपयोग में लेते हैं। हर जगह इसके विशेषज्ञ उपलब्ध हैं।

  • भ्रम- इलाज के दौरान खानपान में काफी परहेज करना पड़ता है।

तथ्य- प्राकृतिक रूप में होने के कारण ये दवा शरीर में धीरे-धीरे अंदरुनी रूप से असर करती हैं। ऐसे में खानपान में कुछ ऐसी चीजों से परहेज कराते हैं जो परेशानी को बढ़ाती हैं और दवा के असर को कम करती हैं।

  • भ्रम- प्रयोग होने वाली दवाएं धीरे-धीरे असर करती हैं।

तथ्य- ऐसा नहीं है, नेचुरल (प्राकृतिक) होने के कारण ये अंदरुनी रूप से असर करती हैं। ऐसे में ये दवाएं रोग के प्रभाव को कम करने के बजाय इसकी जड़ को धीरे-धीरे खत्म करने का काम करती हैं। इसलिए इसमें थोड़ा समय लग सकता है।

  • भ्रम-यूनानी दवाएं हर कहीं आसानी से उपलब्ध नहीं होती हैं।

तथ्य-इन दिनों यूनानी डॉक्टर (चिकित्सा) हर जगह हैं। आयुर्वेद की तरह ही यूनानी केंद्रों पर ये दवाएं आसानी से मिल जाती हैं। चूर्ण, चटनी, शरबत आदि के रूप में ये दवाएं बाजार में उपलब्ध हैं। चिकित्सक सलाह के बाद ही इन्हें लें।

  • ट्रेडिशनल (परंपरागत) ट्रीटमेंट (किसी बीमार या घायल व्यक्ति का इलाज (औषध या परिचर्या द्वारा) : - खास थैरेपी (मानसिक या शारीरिक रोगों की चिकित्सा (प्राय: बिना औषध या शल्य-क्रिया के) से साफ किया जाता है खून। मौसमी बदलाव से गठिया, जोड़ों का दर्द, अस्थमा, मधुमेह, स्लिप (नींद की अवधि) डिस्क (परिकलक में प्रयोग के लिए सूचना संचित करने वाली प्लास्टिक निर्मित वस्तु), पैंरों में सूजन व झनझनाहट, हार्ट (दिल) अटैक (हमला) व कब्ज की परेशानी होती है। यूनानी पद्धति की कुछ थैरेपी खास तरह से काम कर रोग का निदान करती है।
  • लीच (द्रवों की सहायता से मिट्‌टी से रसायनों का अलग होना) थैरेपी (मानसिक या शारीरिक रोगों की चिकित्सा, प्राय: बिना औषध या शल्य-क्रिया के) - 3, 500 वर्ष पहले से जोंक को इलाज के लिए प्रयोग में ले रहे हैं। इस थैरेपी में लीच यानी जोंक का इस्तेमाल किया जाता हैं जोंक की लार करीब 100 से ज्यादा ऐसे तत्व होते हैं जो एंटीबायोटिक (जीवाणुनाशक औषधि), दर्दनाशक और रक्त की धमनियों को खोलने वाले तत्व होते हैं। शरीर के जिस हिस्से में थैरेपी देनी होती है वहां बाहरी रूप से जोंक को छोड़ दिया जाता है। शरीर से दूषित रक्त चूसने के बाद जोंक खुद-ब-खुद त्वचा से हट जाती हैं।
  • समय- एक-डेढ़ माह चलती है। सप्ताह में 1 - 3 बार मरीज को थैरेपी लेनी पड़ती है। कुछ मामलों में खुजली की शिकायत हो सकती है जो 2 - 4 दिनों में ठीक हो जाती हैं।
  • कपिंग थैरेपी-इसे हिजामा भी कहते हैं। इस थैरेपी में छोटे-छोटे कप का इस्तेमाल किया जाता है। दर्द वाले प्रभावित हिस्से पर इसे लगाकर रक्त को इसकी मदद से खींचा जाता है। इससे रक्त में मौजूद विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं। इससे शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ने के साथ ही ऊतकों और ब्लड (रक्त) में आक्सीजन का स्तर भी बढ़ता है।
  • समय-यह थैरेपी माह में एक से दो बार लेनी पड़ सकती है। कुछ मामलों में त्वचा पर लाल या बैंगनी रंग के धब्बे पड़ जाते हैं जो धीरे-धीरे खुद-ब-खुद खत्म हो जाते हैं।

यूनानी विशेषज्ञों का पैनल-डॉ. हिना जफर झुंझुनूं, डॉ. अजहरुद्दीन जयपुर, प्रो. एस शफीक नकवी, नई दिल्ली।

रिपोर्ट अंकित गुप्ता, दिव्या शर्मा

फैक्ट (तथ्य) फाइल (किसी वस्तु या व्यक्ति के विषय में एकत्रित काग़जात या जानकारी): -

  • मौसमी बीमारियां जैसे डेंगू, चिकनगुनिया आदि में मरीज को बुखार कम करने के लिए गिलोय की जड़ या पत्तों को उबालकर या कूटकर शहद के साथ लेने की सलाह देते हैं।
  • शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए पौष्टिकता से भरपूर सब्जी (पालक, अदरक आदि), फल (संतरा, केला, कीवी, आदि), सूखे मेवे (बादाम अखरोट आदि), खिचड़ी, दलिया, साबुत दाना आदि खाने के लिए कहते हैं।
  • मेडिकल (औषधि और रोग के उपचार से संबंधित) नॉलेज (ज्ञान): - आमतौर पर आयुर्वेद, नेचुरोपैथी (प्राकृतिक इलाज) की तरह ही यूनानी चिकित्सा काम करती है। असल में इनमें इलाज, जांच आदि समान होती हैं फर्क सिर्फ इनके आधार में पाया जाता है। जानें इन तीनों पद्धतियों के बीच के अंतर कोयूनानी पद्धति में इलाज का आधार मरीज के शरीर में मौजूद चार अहम तत्व हैं। शरीर में लाल तत्व को खून, सफेद को बलगम, पीले पित्त को सफरा और काले पित्त को सौदा का नाम दिया गया है। इनमें गड़बड़ी से रोग उत्पन्न होते हैं जिनका कारण समझकर इलाज शुरू किया जाता है। वहीं आयुर्वेद और नेचुरोपैथी में वात-पित-कफ तीन तत्वों को इलाज को आधार मानते है।

सवाल जवाब: -

  • सवाल-यूनानी दवाएं कैसे काम करती हैं और इलाज की अवधि क्या हैं?

उत्तर- इस पद्धति में रोग को दबाने के बजाय उसके कारण को जानकर दवाएं दी जाती है। रोग की गंभीरता पर इलाज की अवधि तय होती है। सर्दी, जुकाम आदि में 2 - 5 दिन लगते हैं व थैरेपी में कई हफ्ते लगते हैं।

  • सवाल-क्या दवा की तासीर गर्म हैं?

उत्तर - दवा देते समय मरीज के शरीर का तापमान व रोग का मिजाज ध्यान में रखते हैं। सभी दवाएं गर्म नहीं होती। गर्म तासीर वाली दवाओं के साथ कुछ ऐसी दवा (अर्क, शरबत) भी देते हैं जो तासीर से होने वाले नुकसान से बचाती हैं। कुछ दवाएं दूध के साथ देते हैं ताकि इनका असर तेज व बेहतर हो सके जैसे अश्वगंधा।

  • सवाल-क्या दवा लेने का कोई खास समय हैं?

उत्तर - हां, दवा लेने का खास समय निर्धारित हैं। जैसे कुछ दवाएं खाली पेट व कुछ नाश्ता या भोजन करने के बाद लेने की सलाह देते हैं लिवर (जिगर), आंत, दिमाग, हृदय से जुड़े रोगों में खमीरा (टॉनिक) खाली पेट लेने की सलाह दी जाती है।

  • सवाल-क्या पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ये दवा लेनी चाहिए?

उत्तर - यूनानी दवाएं किसी भी उम्र और वर्ग के लोगों को दी जा सकती है। जैसे 3 साल से कम उम्र के बच्चों को चूर्ण देने की बजाय चटनी व शरबत आदि देते हें ताकि वे आसानी से दवा ले सकें। ये स्वाद में थोड़ी मीठी होती हैं जिन्हें लेने में बच्चों को कोई परेशानी नहीं होती।

औषधि: - मर्ज और इसकी गंभीरता के अनुसार कई रूपों में औषधि दी जाती है।

  • गोली (हब) -कई तरह की औषधियों के पाउडर को मिलाकर गोलियां बनाते हैं। इसके लिए इसमें गोंद या पानी मिलाते हैं द्ध गोल गोलियां को हब (केंद्रस्थल) व चपटी को कुर्स कहते हैं।

प्रयोग-शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, बीमारी के बाद कमजोरी दूर करने, ताकत व स्फूर्ति लाने के लिए दी जाती हैं।

  • पाउडर (सुफूफ) - औधधियों या वनस्पतियों को सबसे पहले बारीक पीसा जाता है। इसके बाद छलनी से इसे छान लेते हैं। इस पाउडर को युनानी में सुफूफ कहते हैं।

प्रयोग- अंदरुनी हिस्से (दिमाग या नाक) से जुड़े रोगों में यह उपयोगी है। बाहरी चोट या घाव में भी इस पाउडर का छिड़काव करते हैं।

  • तेल (रोगन) - बादाम, तिल, गुलाब आदि से निकले तेल (रोगन) को कई रोगों में बाहरी रूप से इस्तेमाल किया जाता है। कई तरह की परेशानियों में इससे मालिश की सलाह दी जाती है।

प्रयोग- तेल के साथ कुछ जड़ी- बूटियों के पत्तों का रस मिलाकर लिवर (जिगर) से जुड़े रोग, सूजन व हेपेटाइटिस आदि में देते हैं।

  • चटनी (लऊक) -कुछ हर्ब, वनस्पतियों को मिलाकर चटनी के रूप में तैयार करते हैं, जिसे लऊक कहते हैं। ये स्वाद में मीठी होती हैं और नाश्ते के बाद लेने की सलाह दी जाती है।

प्रयोग- गले से जुड़े रोगों को दूर करने में टॉन्सिलाइटिस (गलतुंडिका-शोथ, टांसिलों में दर्द और सूजन), गले में खराश, दर्द और खांसी शामिल हैं।

  • काढ़ा (जोशांदा) - कई औषधियों व जड़ी-बूटयों से तैयार जोशांदा को पानी में उबालकर ठंडा कर या कुछ खास दवाएं यानी खिसांदा को पानी में कुछ घंटे भिगोकर व छानकर पीने के लिए कहते हैं।

प्रयोग- जड़ी-बूटयों से तैयार हर्बल काढ़े को सर्दी, खांसी, जुकाम, नजला और त्वचा रोगों के इलाज में देते हैं।

  • भस्म (कुश्ता) - शरीर में माइक्रोन्यूट्रिएंट्‌स (सूक्ष्म पोषक तत्वों) (जिंक (जस्ता), कैल्शियम (चूना/रासायनिक तत्व) व कॉपर (ताँबा) (की पूर्ति भस्म (कुश्ता) से करते हैं। जरूरतानुसार धातु रत्न को राख होने तक जलाकर शुद्ध कर दवा में मिलाते हैं।

प्रयोग- दिमाग, लिवर, हृदय से जुड़े रोगों, पुराना बुखार, अस्थमा खांसीव जोड़ों के दर्द आदि में इसे उपयोग में लेते हैं।

उपसंहार: -एक तरह से यूनानी चिकित्सा पद्धति प्राकृतिक ईलाज होने के कारण हमारे शरीर के अंदर से बीमारी के जड़ में जाकर रोग को समाप्त करती हैं। लेकिन इसमें में थोड़ा समय लगता है लेकिन यह सभी के लिए बहुत कारगर हैं। इसलिए इस पद्धति को अन्य चिकित्सा पद्धति की तरह ही बीमारी के समय अपनाना चाहिए।

- Published/Last Modified on: May 1, 2017