मुस्लिम के तीन तलाक का मामला (Muslim Divorce Case) (Download PDF)

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प्रस्तावना: -तीन तलाक का विरोध करने के लिए लोग अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं, केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्याय सभा) में जारी इस संबंध में दायर केस (प्रकरण) की सुनवाई में सरकार का पक्ष साफ कर दिया है। मुस्लिम पर्सनल (व्यक्तिगत) लॉ (निम्न स्तर) बोर्ड (मंडल) और कई मुस्लिम धर्मगुरु सरकार के रुख और कोर्ट (न्याय सभा) में इस मामले की सुनवाई का विरोध कर रहे हैं। मुस्लिम धर्मगुरु इसे धर्म से जुड़ा निजी मामला बता रहे हैं वहीं सरकार ने तीन तलाक में मानवाधिकार और महिलाओं के अधिकार से जुड़ा मुद्दा माना है। जहां कट्‌टर मुसलमान इसमें कोर्ट (न्याय सभा) और सरकार के दखल के खिलाफ हैं वहीं कई मुस्लिम महिलाओं ने इसके विरोध पर सड़क और कोर्ट (न्याय सभा) का रुख भी किया है। कई मुस्लिम महिलाओं ने विरोध का अपना तरीका अपनाया हैं।

उत्तर प्रदेश: -

  • के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए कहा, जब देश एक है तो कॉमन (आम) सिविल (नगर) कोड (कूट-संबंधी) क्यों नहीं? जब देश एक है, तो शादी-ब्याह के कानून एक क्यों नहीं हो सकते? पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की 91वीं जयंती के अवसर पर उन पर लिखी किताब ’चन्द्रशेखर- संसद में दो टूक’ का उन्होंने विमोचन किया। इस दौरान उन्होंने तीन तलाक के मुद्दे पर कुछ लोगों के मौन पर सवाल भी उठाया।
  • उन्होंने देश की तीन तलाक की समस्या पर कहा कि महाभारत में द्रोपदी के चीरहरण के दौरान वहां मौजूद लोगों के मौन का उदाहरण देते हुए कहा कि तीन तलाक पर जो मौन है, वे अपराधियों जैसे हैं। उन्होंने तीन तलाक को बड़ी समस्या बताते हुए इसे महिलाओं के साथ बड़ा अन्याय बताया। समान नागरिक संहिता पर योगी ने कहा कि चन्द्रशेखर भी समान नागरिक संहिता के पक्ष में थे। उन्होंने कहा कि सबके लिए एक कानून होना चाहिए।

योगी के पास पहुंचे तलाक के कई मामले-

  • हैदराबाद की दो महिलाओं को पतियों से वॉटसएप पर तलाक मिला।
  • कानपुर की आलिया को स्पीड (गति) पोस्ट (डाक व्यवस्था) से उनके पति ने तलाक दिया।
  • बांदा की तलाक पीड़िता आशिया को फोन पर ही तलाक दे दिया।
  • सहारनपुर की शगुफ्ता के साथ मारपीट कर उसे घर से निकाल दिया गया और पति ने तलाक दे दिया।
  • मौलाना: - मुस्लिम पर्सनल (व्यक्तिगत) ला (निम्नतम) बोर्ड (मंडल) के प्रवक्ता मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि तलाक और द्रोपदी के चीरहरण में अंतर है। दोनों के बीच तुलना नहीं की जानी चाहिए। महासचिव मौलाना वली रहमानी ने कहा, ऐसो बयानों पर प्रतिक्रिया देना में जरूरी नहीं समझता। योगी चीजों को सिर्फ एक चश्में से ही देखते हैं। आल (सारा) इंडिया (भारत) मुस्लिम वुमेन (महिला) पर्सनल (व्यक्तिगत) ला (निम्नतम) बोर्ड (मंडल) की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने कहा, तलाक के मामले की द्रौपदी के चीरहरण से तुलना नहीं की जानी चाहिए। अगर योगी इसे तर्क के रूप में पेश कर रहे हैं तो यहां हिन्दू महिलाओं को भी दहेज के लिए जलाया जा रहा है।
  • महिलाओं के अधिकार: - पर्सनल ला बोर्ड की महिला मेंबर (किसी संगठन आदि का सदस्य) डॉ असमां जंहरा कहती है कि महिलाओं को तलाक मामले में 2 अधिकार दिए गए हैं। इसमें ’खुला’ और ’फस्ख-ए-निकाह’ हैं। ’खुला’ में महिला अगर अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती है तो वह दारुल-कज़ा में अपील कर सकती है । उलेमा पति को बुलाता है और उसकी राय भी पूछता है। जबकि ’फस्ख-ए-निकाह’ में भी महिला पति के साथ नहीं रहना चाहती है तो फिर वह दारुल-कज़ा जा सकती है।
  • मुस्लिम नेताओं की राय: - मुस्लिम धर्मगुरू राशिद महली फिरंगी ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं के हक के लिए उनके शिक्षा और रोजगार पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इस्लाम में फैमिली (पारिवारिक) लाइफ (जीवन) के बारे में जो तरीका बताया गया है वह सही तरीका है। कुछ महिलाएं इसका विरोध कर रही है लेकिन अधिकांश इसके खिलाफ नहीं हैं। मुस्लिम नेता शाइस्ता अंबर ने कहा कि ये महिलाओं के अधिकार और उनके हक का मामला है।
  • शरीरत: -’ ऑल (सारा) इंडिया (भारत) मुस्लिम पर्सनल (व्यक्तिगत) ला (निम्नतम) बोर्ड (मंडल) ने तीन तलाक पर 5 करोड़ महिलाओं के सर्वे का हवाला दिया और कहा कि मुस्लिम महिलाएं शरीयत के साथ हैं। तलाकशुदा महिलाओं की मदद के लिए पर्सनल ला बोर्ड तैयार है। बोर्ड ने मियां-बीवी के विवाद को लेकर कोड (कूट-भाषा) ऑफ (के लिये) कंडक्ट (आचरण/प्रदर्शन) भी जारी किया और फिजुलखर्ची से बचने की सलाह दी।

प्रथा: -

  • अटॉनी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा है कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में तीन तलाक की प्रथा को मंजूरी नहीं दे सकते हैं। महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर ही अधिकार हासिल हैंं उन्हें निचले दर्जे पर नहीं रख सकते हैं। रोहतगी की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने सरकार से इस मुद्दे में दखलअंदाजी न करने की बात कही थी। सरकार का स्टैंड (ठहरना) स्पष्ट करते रोहतगी ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष देश में ऐसा नहीं हो सकता कि एक धर्म का महिलाओं को कुछ और अधिकार मिलें, दूसरे मजहब की महिलाओं को कुछ और अधिकार मिलें। उन्होंने कहा कि सरकार का रुख साफ है कि ऐसी प्रथांए असंवैधानिक हैं।
  • मुस्लिम महिलाओं की आवाज को अब और दबाया नहीं जा सकता है। ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर घिरे मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य अब गैर जिम्मेदाराना बयानों पर उतर आए हैं। हमारा राष्ट्र रूप से कहा है कि जब दुनिया के 22 मुस्लिम देशों में तीन तलाक की प्रथा पर आधिकारिक रूप से प्रतिबंध है तो फिर यह भारत में ये क्यों लागू है? दरअसल, ये मुस्लिम समाज पर अपनी कथित सत्ता को बनाएं और बचाए रखने की मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड की जददोजेहद है। लॉ बोर्ड ये कतई नहीं चाहता है कि मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकार दिए जाएं। अब आप लॉ बोर्ड के इस बयान को ही देखें कि जब शादी का दावतनामा पोस्टकोर्ड (डाक-कार्ड) से कबूल हो जाता है तो फिर तलाक क्यों नहीं पोस्टकार्ड, एसएमएस (सरल मोबाइल (गतिशील) संदेश) अथवा व्हाट्‌सएप पर दिया जा सकता है? मैं लॉ बोर्ड की इस मानसिकता को उजागर करना चाहती हूं कि वे कुतर्को की किस हद तक उतर आए हैं। शादी का दावतनामा भले ही पोस्टकार्ड पर कबूल हो जाता है लेकिन शादी के लिए दुल्हा-दुल्हन को मौजूद रहना होता है। बाकायदा दोनों को अपना-अपना कबुलनामा देना होता है। लॉ बोर्ड के इन बचकाने तर्को को सुनकर लगता है कि वे लोग न जाने किस दुनिया में जी रहे हैं। मुस्लिम महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आ रही है।
  • अब उन्हें तीन तलाक की प्रथा ’कबूल’ नहीं है। हमारा संगठन पिछले 10 वर्ष से मुस्लिम पारिवारिक कानून को संहिताबद्ध करने के लिए प्रयासरत है। तीन तलाक और बहुविवाह को खत्म करने के लिए मसौदा भी तैयार किया गया है। आखिरकार मुस्लिम महिलाओं को भी वैवाहिक संस्था में अपनी बात को कहने और अधिकारों का उपयोग करने का हक होना चाहिए। तलाक के बाद मुस्लिम महिलाओं को होने वाली परेशानियों से बचाया जा सकेगा। हमारा विरोध मुस्लिम महिलाओं से तलाक लेने के तरीके से है। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि तीन तलाके के खात्मे के बाद मुस्लिम समाज में तलाक नहीं होगा। पति पत्नी के बीच तलाक हो सकता है लेकिन इसके बाद मुस्लिम पतियों को भारत के संविधान के अनुरूप तलाक की प्रक्रिया को अपनाना होगा। ये सही है कि देश में मुस्लिम महिलाओं के सामने तीन तलाक ही उनके पिछड़ेपन का एकमात्र कारण नहीं हैं। मुस्लिम महिलाओं में अशिक्षांं भी एक बड़ी चुनौती है। इसे दूर करने के लिए कार्य किया जाना होगा। लेकिन तीन तलाक की प्रथा का खात्मा वर्तमान में मुस्लिम महिलाओं के लिए बड़ी राहत होगी।

नूरजहां सफिया नियाज, भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सहसंस्थापक, मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्षरत

लखनऊ: -

  • ऑल (सारा) इंडिया (भारत) मुस्लिम पर्सनल (व्यक्तिगत) लॉ (निम्नतम) बोर्ड (मंडल) कार्यकारिणी की आगामी 15 अप्रैल को शुरू होने वाली दो दिवसीय बैठक में तीन तलाक और अयोध्या विवाद के बातचीत से हल समेत कई अहम मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया। बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य मौलना खलिद रशीद फरंगी महली ने बताया कि बोर्ड (मंडल) कार्रकारिणी की बैठक 15 अप्रैल लखनऊ स्थित नदवा में आयोजित की जाएगी।
  • तीन तलाक के मुद्दे पर यूपी की राजधानी लखनऊ में हुई बैठक में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने दो टूक कहा है कि पर्सनल लॉ में सरकार की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। बैठक के बाद बोर्ड ने दावा किया कि हिंदुस्तान के ज्यादातर मुसलमान मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव नहीं चाहते।
  • बोर्ड ने बाबरी मस्जिद मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) के फैसले को मानने की बात कही हैं। महासचिव मौलाना वली रहमानी ने कहा कि देश भर में बोर्ड के हस्ताक्षर अभियान के जरिए मुसलमानों ने फिर बता दिया कि संविधान इस देश के नागरिकों को धार्मिक मामलों पर अमल करने की आजादी देता है। ऐसे में मुस्लिम पुरुष और महिलाएं शरिया कानूनों में कोई भी बदलाव या हस्तक्षेप नहीं चाहते हैं। बोर्ड (मंडल) की दो दिवसीय बैठक की अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद राबे हसनी नदवी ने की।
  • मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महल बोले-शरिया में बताए गए कारणों के अलावा यदि कोई अन्य बहाने से तीन तलाक देता है तो उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा।
  • धार्मिक आजादी संविधानिक अधिकार है। पर्सनल लॉ की राह में कोई रुकावट न पैदा की जाए।

मौलाना वली रहमानी, महासचिव, एआईएमपीबी

बैठक में कल्बे सादि से लेकर फिरंगी महली समेत 61 सदस्य उपस्थित थे।

लखनऊ में दो दिन से चल रही ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक दो दिन बाद समाप्त हो गई, बैठक की समाप्ति के बाद दावा किया कि देश में शरई कानूनों में किसी भी तरह की दखलंदाजी को सहन नहीं करेगें। साथ ही हिन्दुस्तान के ज्यादातर मुसलमान मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी तरह का बदलाव नहीं चाहते। बोर्ड ने कहा मुस्लिम दहेज के बजाय संपत्ति में हिस्सा दें, तलाकशुदा महिला की मदद की जाय। बोर्ड तीन तलाक की पाबंदी के खिलाफ है।

योग गुरु बाबा रामदेव: - ने कहा की तीन तलाक को सही साबित करने के लिए जो लोग कुरान शरीफ का हवाला दे रहे हैं वे दरअसल इस्लाम और कुरान का अपमान कर रहे हैं। रामदेव ने लखनऊ में तीन दिवसीय योग महोत्सव के पहले दिन कहा कि किसी भी महिला के साथ नाइंसाफी नहीं होनी चाहिए, चाहे वह किसी भी मजहब की हो।

मामला: - तीन तलाक का मुद्दा इस समय सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) में है, जिस पर पांच जजों की पीठ सुनवाई करेगी। इस मामलें में पक्षकार बने केंद्र सरकार और कुछ सामाजिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि तीन तलाक लैंगिक समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और दूसरे मौलवियों का तर्क है कि तीन तलाक को कुरान की मंजूरी प्राप्त है। यह शरिया कानून का हिस्सा है और इसलिए न्यायपालिका के दायरे से बाहर है। पिछले साल दिसंबर में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि तीन तलाक महिलाओं को संविधान में प्राप्त समानता के अधिकार का हनन करता है।

खास बातें-

  • 16 फरवरी को न्यायालय में मुद्दे तय होंगे।
  • 11 मई से मामले की सुनवाई शुरू होगी।
  • सब पक्षों के वकील तैयार होकर आएं।

नई दिल्ली-

  • तीन तलाक के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय जल्द सुनवाई पूरी करेगा। सीजेआई खेहर ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है, जिसमें मानवाधािकर का मुद्दा भी हो सकता है। यह दूसरे मामलों पर भी असर डाल सकता है। हम इस मामले में कॉमन (आम) सिविल (नगर) कोड (कूट-भाषा) पर बहस नहीं कर रहे। न्यायालय मामले में कानूनी पहलू पर फैसला देगा। 16 फरवरी को न्यायालय में मुद्दे तय हुए थे और 11 मई से मामले की सुनवाई शुरू होगी। कोर्ट ने कहा -सब पक्षों के वकील तैयार होकर आएं और एक हफ्ते में सुनवाई पूरी करेंगे।
  • दरअसल, तीन तलाक को असंवैधानिक करार देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) में सुनवाई हुई। पिछली सुनवाई में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में उक हलफनामा दाखिल कर केंद्र की दलीलों का विरोध किया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने हलफनामे में कहा था कि तीन तलाक को महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन बताने वाले केंद्र सरकार का रुख बेकार की दलील है। पर्सनल नॉ को मूल अधिकार के कसौटी पर चुनौती नहीं दी जा सकती। तीन तलाक, निकाह हलाला जैसे मुद्दे पर कोर्ट (न्यायालय) अगर सुनवाई करता है तो ये जूडिशियल (न्यायिक) लेजिस्लेशन (विधि-समूह) की तरह होगा। केंद्र सरकार ने इस मामलें में जो स्टैंड (ठहरना) लिया है कि इन मामलों को दोबारा देखा जाना चाहिए ये बेकार का स्टैंड (ठहरना) है, पर्सनल लॉ बोर्ड का स्टैंड (ठहरना) है कि मामले में दाखिल याचिका खारिज किया जाना चाहिए क्योंकि याचिका में जो सवाल उठाए गए हैं वो जूडिशियल रिव्यू (पुनर्निरीक्षण) के दायरे में नहीं आते। हलफनामें में पर्सनल लॉ को चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • सोशल (सामाजिक) रिफॉर्म (दोष हटाना) के नाम पर मुस्लिम पर्सनल लॉ को दोबारा नहीं लिखा जा सकता क्योंकि ये प्रैक्टिस (प्रवर्तन) संविधान के अनुच्छेद-25 - 26 और 29 के तहत प्रोटेक्ड (उपज) है। कॉमन (आम) सिविल (नगर) कोड (कूट-भाषा) पर लॉ (गुणवत्ता स्तर से नीचे) कमिशन (आयोग) के प्रयास का विरोध करते हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि कॉमन सिविल कोड संविधान के डायरेक्टिव (निदेश) प्रिंसिपल (नियम) का पार्ट है। दरअसल, तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई थी। इस मामले में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से एफिडेविट (शपथ पत्र) दाखिल कर याचिका का विरोध किया जा चुका है इसके बाद मामले मेंं केंद्र सरकार की ओर से हलफनामा दायर किया गया जिसमें कहा गया है कि तीन तलाक के प्रावधान को संविधान के तहत दिए गए समानता के अधिकार और भेदभाव के खिलाफ अधिकार के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। केंद्र ने कहा लैंगिक समानता और महिलाओं के मान सम्मान के साथ समझौता नहीं हो सकता। केंद्र सरकार ने कहा कि भारत जैसे सेक्यूलर (चिरकालीन) देश में महिला को जो संविधान में अधिकार दिया गया है उसको उससे वंचित नहीं किया जा सकता। तमाम मुस्लिम देशों सहित पाकिस्तान के कानून का भी केंद्र ने हवाला दिया जिसमें तलाक के कानून को लेकर रिफॉर्म हुआ है और तलाक से लेकर बहुविवाह को रेग्यूलेट (व्यवस्था करना) करने के लिए कानून बनाया गया है। तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु विवाह के संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से जवाबदाखिल करने को कहा गया था।
  • तीन तलाक मामलें की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए पांच जजों की संविधान पीठ बनाई जा सकती है। चीफ (प्रमुख) जस्टिस (न्यायाधीश) जेएस खेहर ने ये इशारा करते हुए कहा कि ’इस मामले में कानूनी पहलुओं पर ही सुनवाई होगी। सभी पक्षों के एक-एक शब्द पर सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) कानून से अलग नहीं जा सकता।’ सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर 11 मई से गर्मियों की छुट्‌िटयों में सुनवाई शुरू करेगा। 30 मार्च को मामले के मुद्दे तय किए जाएंगे।
  • तीन तलाक मामलें की सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। कोर्ट ने सभी पक्षों से कहा था कि वो कोर्ट मामले को लेकर उठे सवालों की लिस्ट (सूची) सौंपे। 14 फरवरी को सुनवाई में सीजेआई खेहर ने का था कि ये एक ऐसा मामला है। जिसमें मानवाधिकार का मुद्दा भी हो सकता है। ये दूसरे मामलों पर भी असर डाल सकता है। लिहाजा, हम इस मामले में कॉमन (आम) सिविल (नगर) कोड (सूचना) पर बहस नहीं करेंगे। कोर्ट (न्यायालय) केवल कानूनी पहलू पर फैसला देगा।

भवनेश्वर: - नरेन्द्र मोदी ने भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में तीन तलाक पर बोलते हुए मुस्लिम महिलाओं को भरोसा दिया कि सरकार और पार्टी (राजनीतिक पार्टी) उनके साथ है। मोदी ने कहा कि तीन तलाक से मुस्लिम महिलाएं कष्ट में है। हमें इसका समाधान करना चाहिए। इसके लिए जिला स्तर पर काम करने की जरूरत है। हमें न्यू इंडिया (नया भारतीय) के फॉर्मूले (नियम) पर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा, भाजपा को पिछड़े मुस्लिमों के लिए सम्मेलन करना चाहिए।

तीन तलाक की घटनाएं: -

देश में लंबे समय से एक तरफ जहां तीन तलाक के मुद्दे पर सड़क से लेकर सदन तक एक बड़ी बहस छिड़ी हुई, वहीं इससे जुड़ी घटनाएं भी सामने आ रही हैं

  • फेंका तेजाब- मोबाइल पर तीन तलाक देने के बाद यूपी के न्यूरिया में एक 40 साल की महिला पर उसके पति व ससुराल वालों ने तेजाब फेंक दिया। महिला का नाम रेहाना हुसैन है। 6 साल पहले रेहाना को उसके पति ने न्यूजीलैंड से फोन पर तलाक दे दिया था जिसे उसने मानने से मना कर दिया था। रेहाना इसके खिलाफ उत्तराखंड हाईकोर्ट (ऊँचा स्थान न्यायालय) चली गई।
  • अमरोहा-अमरोहा निवासी नेशनल (राष्ट्रीय) प्लेयर (खिलाड़ी/अभिनेता) को तीन तलाक देने के मामले पर पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष सहिस्ता ने कहा कि एक पढ़े लिखे घराने की महिला की क्या गलती है। उसे बेटी पैदा करने की सजा क्यों दी जा रही है। उसे तलाक देने वाले का सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। हमारे पर्सनल लॉ बोर्ड में लोग अपने तरीके से देखते हैं। क्या अमरोहा में कोई काजी नहीं थे।
  • सनतनगर-16 मार्च को सनतनगर पुलिस थाने में सुमैना शर्फी की शिकायत पर केस (प्रकरण) दर्ज किए गए हैं। सुमैना का आरोप है कि ओवैस तालिब ने बीते साल 28 नवंबर को वाट्‌सएप पर तीन तलाक का मैसेज भेजा था।

हैदराबाद-

खास बातें-

  • सऊदी में रहने वाले बैंकर (महाजन) ने हैदराबाद में रहने वाली पत्नी से तलाक लिया।
  • तलाक के लिए पति ने अखबार में इश्तिहार छपवाया।
  • पुलिस ने पति के खिलाफ धोखाधड़ी और प्रताड़ना का मामला दर्ज किया।
  • व्हाट्‌सप और स्पीड (गति) पोस्ट (डाक ले जाने वाला) पर तलाक लेने के मामलों के बाद अब एक खबर यह आई है कि सऊदी अरब निवासी एक बैंकर ने अपनी पत्नी से अखबार में इश्तािहार छपवाकर तलाक ले लिया। उनकी पत्नी की उम्र 25 साल है और वह हैदराबाद में रहती हैं। मोहम्मद मुश्ताकुद्दीन नाम के इस बैंकर के खिलाफ अब हैदराबाद पुलिस ने प्रताड़ना और धोखेबाजी का मामला दर्ज कर लिया गया है। महिला ने पुलिस को बताया कि चार मार्च को एक स्थानीय उर्दू अखबार में तलाक का इश्तिहार देखकर वह चकित रह गई थीं। इसके बाद उनके पास पति के वकील का फोन भी आया।
  • मोहम्मद मुश्ताकुद्दीन की शादी 2015 में हुई थी जिसके पांच महीने बाद वह अपनी पत्नी के साथ सऊदी चले गए थे, वहां पिछले साल उनकी पत्नी ने एक बेटी को जन्म दिया। दो महीने पहले ये दोनों भारत लौटे और पति से कथित तौर पर झगड़े के बाद लड़की अपने मायके में रहने लगी। बताया जाता है कि तीन हफ्ते बाद मोहम्मद मुश्ताकुद्दीन बिना किसी सूचना के सऊदी लौट गए। पत्नी का कहना है कि पति ने उनका फोन उठाना बंद कर दिया और उसके ससुर ने उसे घर में घुसने भी नहीं दिया।
  • महिला का कहना है कि ’अगर मैंने कुछ गलत किया है तो मुझसे या मेरे घरवालों से बात तो करते। अगर मैंने कुछ गलत किया है तो वह सबके सामने मुझसे तलाक लेते जैसे उन्होंने सबके सामने मुझसे शादी की थी’ वह आगे कहती हैं ’मुझसे बगैर मिले वह सऊदी क्यों भाग गए और एक दस महीने की बच्ची के बाप होते हुए विज्ञापन देकर मुझसे तलाक क्यों लिया’
  • पुलिस के मुताबिक मुश्ताकुद्दीन ने अपनी पत्नी को 20 लाख के दहेज के लिए प्रताड़ित किया। पुलिस अधिकारी गंगाधर का कहना है ’हमने मामले की जांच की हैं और यह भी देख रहें हैं कि क्या शरिया के तहत अखबार के जरिए तलाक लेना वाजिब हैं’
  • गौरतलब है कि हैदराबाद में ही कुछ दिन पहले एक मामला सामने आया था जिसमें एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को पोस्टकार्ड (डाक-कार्ड) के जरिए तीन तलाक दे दिया। वहीं इसी साल के शुरूआत में हैदराबाद के एक व्यक्ति ने अमेरिका में बैठे बैठे अपनी पत्नी को व्हाट्‌सएप के जरिए तीन तलाक का संदेश भेज दिया। अगले महीने सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक के मामले को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई की जाएगी।

पटना: -

  • पटना (राज्य ब्यूरो) जदयू के प्रधान राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने कहा है कि तीन तलाक और समान नागरिक संहिता को ले अल्पसंख्यकों पर केंद्र सरकार जबरन अपना कोई फैसला नहीं थोपे। किसी भी परिवर्तन से पहले देश में एक आम सहमति बनना जरूरी है। ऐसा नहीं होने से यह कदम संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता में लोगों की मौजूदा आस्था को ठेस पहुंचाने वाला साबित हो सकता है।
  • बिना विस्तृत विचार विमर्श और एकमत बनाए इसे थोपा नहीं जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पार्टी (राजनीतिक दल) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी विधि आयोग को लिखे पत्र में अपना मत स्पष्ट कर चुके हैं। त्यागी ने कहा कि पार्टी देश में सकारात्मक बदलाव लाने के सभी प्रयासों का स्वागत करती हैं।
  • वहीं दूसरी तरफ धार्मिक मान्यताओं, विशेष तौर पर अल्पसंख्यक समुदायों पर जबरन थोपे जाने वाले ऐसे किसी प्रस्ताव पर घोर चिंता व्यक्त करती है। पार्टी (राजनीतिक दल) का मानना है कि संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए उचित कदम उठाए जाने चाहिए।
  • जदयू का दृढ़ मत है कि समान नागरिक संहिता, तीन तलाक या धार्मिक भावनाओं से जुड़े किसी भी मुद्दे पर हर पक्ष से रचनात्मक संवाद स्थापित करने के बाद ही ऐसा कोई कानून बने। देश की संसद, राज्यों की विधानसभाएं एवं विधान परिषद और नागरिक समाज में व्यापक बहस के बाद ही किसी प्रकार का कानून बने।

सर्वोच्च न्यायालय: -

  • माला दीक्षित-इस देश में विभिन्न जाति, वर्ण, समुदाय के लोग रहते हैं यहा शादी, तलाक, संरक्षक और उत्तराधिकार के कानून हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई धर्मो में अलग अलग हैं। समान नागरिक संहिता का मुद्दा बहस से निकल कर एक बार फिर सुप्रीमकोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) पहुंच गया है। सुप्रीमकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई है जिसमें केन्द्र सरकार को पूरे देश के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश मांगा गया है। यह याचिका राष्ट्रवादी मुस्लिम महिला संघ की अध्यक्ष फराह फैज ने दाखिल की है।
  • पेशे से वकील फराह फैज ने मुस्लिमों में प्रचलित तीन तलाक, चार शादियां और निकाह हलाला को भी सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दे रखी है जिस पर कोर्ट तीन तलाक मुद्दे पर 11 मई से होने वाली सुनवाई में विचार करेगा। पूरे देश के लिए समान नागरिक संहिता की मांग करते हुए कहा गया है कि गत 14 फरवरी को तीन तलाक मामले में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की पीठ ने साफ कर दिया था कि वे केवल तीन तलाक और बहुविवाह पर विचार करेंगे। वे समान नागरिक संहिता पर विचार नहीं करेंगे। कहा गया है कि इसी कारण समान नागरिक संहिता पर यह अलग याचिका दाखिल की है। कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 44 में सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश दिया गया है लेकिन राजनीति के चलते संसद ने केवल हिन्दू कानूनों के अधिनियम ही पास किये। ये संविधान के नीति निदेशक तत्वों के खिलाफ है।

मुसलमान: -

  • देश का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा समुदाय होने के बावजूद मुस्लिमों को कभी नहीं छुआ गया। सुप्रीम कोर्ट संविधान का संरक्षक है इसलिए यह मुद्दा कोर्ट में उठाया गया है। कोर्ट भारत सरकार को निर्देश दे कि वह भेदभाव को खत्म कर देश भर के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करे ताकि देश के मुसलमान प्रगतिवादी सुधारों से वंचित न रहे। कहा है कि राज्यों ने इसे लागू करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। सामान्य तौर पर इसके लिए अल्पसंख्यकों को जिम्मेदार ठहराया जाता है जबकि वास्तविकता ये है कि सामान्य मुसलमानों का इससे कोई लेना देना नहीं हैं। सिर्फ नेताओं जो या तो राजनेता हैं या स्वघोषित कम्यूनिटी (समुदाय) लीडर (नेतृत्व-कर्ता) हैं, अपने हितों के लिए और अपनी प्रभुता बनाए रखने के लिए इस मुद्दे का राजनीतिकरण करते हैं। याचिकाकर्ता ने इस बारे में विभिन्न राजनेताओं को पत्र लिखे राष्ट्रपति को भी पत्र लिखा पर कुछ नहीं हुआ।

समान नागरिक संहिता: -

  • समान नागरिक संहिता आज की सबसे बड़ी जरूरत है ताकि धर्म निरपेक्ष देश में नागरिकों के बीच क्षेत्र और धर्म के आधार पर भेदभाव खत्म हो और मत बैक की की राजनीति बंद हो। कहा गया है कि समान नागरिक संहिता कोई नई थ्योरी (सिद्धांत) नहीं है बल्कि मोहम्मद साहब ने मदीना चार्टर (राजपत्र) में 622 सीई में जो दुनिया का पहला लिखित संविधान है, में ये प्रस्तुत की है। कहा गया है भारतीय संविधान में मिले बराबरी और सम्मान से जीवन जीने के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए समान नागरिक संहिता जरूरी है। समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए मजबूत राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। हिन्दू कोड बिल के समय भी कई वरिष्ठ नेताओं ने विरोध किया था लेकिन ये पारित हुआ क्योंकि नेहरू जी दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति थी। अनुच्छेद 44 संविधान में दिए गए धार्मिक आजादी (अनुच्छेद 25 और 26) का उल्लघंन नहीं करता। उदाहरण के तौर पर यूनीफार्म (एक समान) फैमिली (पारिवारिक) ला (निम्नतम) हैं। हिन्दू कोड (कूट-भाषा) बिल (लेखा पत्र) केवल हिन्दुओं के लिए नहीं है बल्कि ये सिख बौद्ध और जैन पर भी लागू होता है और पिछले 6 दशकों से किसी ने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाई।
  • इस देश में विभिनिन जाति, वर्ण, समुदाय के लोग रहते हैं यहां शादी, तलाक, संरक्षक और उत्तराधिकार के कानून हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई धर्मों में अलग अलग हैं। विभिन्न पर्सनल (व्यक्तिगत) ला (निम्नतम) में कोई समानता नहीं है। पर्सनल ला में अधिकार धर्म और लिंग पर आधारित हैं। शादी, तलाक, उत्तराधिकार आदि सामाजिक मुद्दे व धर्मनिरपेक्ष प्रकृति के हैं इसलिए इन्हें कानून से नियमित किया जा सकता है।

खत्म: -

  • तीन तलाक पर चल रही बहस के बीच मुस्लिम धर्म गुरु और ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना कल्बे सादिक ने कहा कि डेढ़ साल में मुस्लिम लॉ बोर्ड इस प्रथा को खत्म कर देगा। कल्बे सादिक ने कहा ’हम लोंगो ने तय किया है। कि हम खुद इस बुराई (तीन तलाक) को समाज से मिटा देंगे। हमारा निवेदन सरकार से है कि वो हस्तक्षेप ना करे हम एक डेढ़ साल में इसे खत्म कर देंगे।

उपसंहार: -तीन तलाक के बढ़ते मामलों पर ऑल इंडिया (सारा भारत) मुस्लिम महिला पर्सनल (व्यक्तिगत) लॉ (निम्नस्तर) बोर्ड (मंडल) की अध्यक्ष सहिस्ता अंबर ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय तब तक नहीं मिल सकता तब तक इस पर कोई ठोस कानून नही बन जाता। मुस्लिम लॉ बोर्ड की निष्क्रियता से मुस्लिम पुरुष तीन तलाक का गलत उपयोग कर रहे है यह तब तक नहीं खत्म होगी, जब तक इसका गलत इस्तेमाल करने वालों को सजा नहीं दी जाती। अत: समाज में बढ़ रही तीन तलाक की प्रथा को रोकना बहुत आवश्यक हैं।

- Published/Last Modified on: May 22, 2017

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