उत्तर कोरिया का मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) परीक्षण (North Korea’S Missile Test) (Download PDF)

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प्रस्तावना:-उत्तर कोरियाके बारे में समझा जाता है कि उसे चीन का संरक्षण प्राप्त है, लेकिन ऐसा नहीं है। चीन की अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कारण उत्तर कारिया उसे भी चुभने लगा है। उत्तर कोरिया ने हाल ही में पनडुब्बी से बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया, जिसने चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे प्रतिदव्ंदव्यों को महादव्ीप में शांति और स्थिरता के लिए एकजुट कर दिया।

  • बैठक:-टोक्यों में जापान, चीन और दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई। उसमें उनके आपसी मसलों पर बातचीत से ज्यादा महत्वपूर्ण थी उत्तर कोरिया के परीक्षण की चर्चा। तीनों देशों के प्रमुख नेताओं ने एक स्वर में उत्तर कोरिया की निंदा की। पनडुब्बी से मिसाईल परीक्षण पर उसने दुनिया को फिर यह दिखाने की कोशिश की है। कि वह अमेरिका और उसके सहयोगियों को आसानी से निशाना बना सकता है। उसका इशारा जापान और दक्षिण कोरिया की तरफ था। हाल के महीनों में उपरोक्त देशों के बीच तनाव की गंभीर स्थितियां पैदा हो चुकी हैं।

विचार निम्न हैं-

  • जे. बर्कशायर मिलर-कांउसिल ऑन फॉरेन रिलेशन (सीएफआर) में इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) अफेयर फेलों जे. बर्कशायर मिलर कहते हैं- अगर तीनों देशों के बीच कोई मतभेद हैं, तो एक बात सामान्य है, जो दुर्लभ भी हैं। अगर वे चाहते हैं कि उत्तर कोरिया को कैसे भी करे डिफ्यूज (बम आदि को नाकाम करना या किसी खतरे को समाप्त करना) किया जाए, या उसकी क्षमताएं नगण्य कर दी जाएं, तो तीनों देशों को कॉमन ग्राउंड (सामान्य भूमि) की ज्यादा जरूरत होगी।
  • फेलो स्कॉट ए सिंडर-कोरिया स्टडीज के सीनियर (जांच के वरिष्ठ) फेलो स्कॉट ए सिंडर कहते हैं-हम सभी ये अच्छी तरह जानते हैं कि जब उत्तर कोरिया मिसाइलों का परीक्षण नहीं करता था, तब भी चिंताएं होती थीं, लेकिन उनका स्तर आज जितना नहीं था लेकिन लंबे समय की रणनीति ऐसी बनानी होगी, जिससे क्षेत्र में स्थिरता कायम हो। इसके लिए आपसी सहयोग की बहुत ज्यादा जरूरत है।
  • उत्तर कोरिया का मिसाइल परीक्षण ऐसे समय किया गया जब उसके दो दिन पहले ही अमेरिका और दक्षिण कोरियाई सेना ने संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू किया है। उत्तर कोरिया ने उनके सैन्य अभ्यास को हमले की नीति बताते हुए उसकी आलोचना की है। वह हमेशा ही या तो युद्ध जैसे शब्दों से आलोचना करता है। या फिर मिसाइल परीक्षण करता हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र का शिकंजा:-उत्तर कोरिया के पांचवे और कथित रूप से अब तक के सबसे शक्तिशाली परमाणु परीक्षण की दुनियाभर में हो रही निंदा के बीच संयुक्त राष्ट्र सूरक्षा परिषद में उत्तर कोरिया पर नए प्रतिबंध लगाने को लेकर सहमति बन गई है। दुनियाभर के लिए सिरदर्द बन चुके इस देश के खिलाफ नए प्रतिबंध लगाने की दिशा में तत्काल काम भी शुरू हो गया है। बंद कमरे में सुरक्षा परिषद की एक आपात बैठक के दौरान इस परीक्षण की कड़ी निंदा की और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 41 के तहत प्रतिबंध से संबंधित एक नए प्रस्ताव का मसविदा बनाना शुरू करने पर सहमति जताई। सुरक्षा परिषद की यह बैठक जापान, दक्षिण कोरिया व अमरीका के अनुरोध पर हुई। उत्तर कोरिया के सहयोगी चीन के विरोध के बावजूद उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगाने पर सहमति बनी।

परमाणु परीक्षण की खास बातें-निम्न हैं-

  • यह उत्तर कोरिया क पांचवां सबसे बड़ा परमाणु परीक्षण हैं।
  • बैंलिस्टिक रॉकेटों पर परमाणु शस्त्र ले जाने में सक्षम हो गया।
  • परमाणु परीक्षण स्थल के पास भूकंप के झटके महसूस हुए।
  • भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 5.3 आकी गई थी।
  • अमरीका, रूस, जापान, फ्रांस समेत कई देशों ने निंदा की हैं।

अमरीका उ. कोरिया को कभी भी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के तौर पर स्वीकार नहीं करेगा। उसके इरादे जिस कदर गंभीर हो रहे हैं, उसके लिए कार्रवाई करने की जरूरत है।

                                                                                                                                     बराक ओबामा, अमरीका राष्ट्रपति

उत्तर कोरिया पर तीनों देशों ने जो कहा-

  • जापानी विदेश मंत्री फुमिओ किशिदा ने कहा- हम उत्तर कोरिया की कार्रवाई यूं ही सहन नहीं कर सकते।
  • दक्षिण कोरियाई विदेश मंत्री युन ब्यूंग ने कहा कि हम उसकी गतिविधियों रोकने पर सहमत हैं। दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति पार्क ग्यून हे ने भी किम को तानाशाह और प्रत्याशित व्यक्ति करार दिया।
  • चीनी विदेश मंत्री वागं यी ने कहा कि हम ऐसी किसी भी घटना के खिलाफ हैं, जिससे क्षेत्र में अशांति बढ़े।

चीनी सोशल मीडिया (समाज संचार माध्यम) की ट्रेंड रिपोर्ट (विवरण) में उत्तर कोरियाई शाक किम जोंग उन को अस्थिर दिमाग एवं विश्वास नहीं करने वाला नेता बताया गया है। लोगों ने सरकार से कहा कि वह किम पर ज्यादा लगाम कसे।

                                                                                                                           मोतोको रिच, टोक्यों ब्यूरों चीफ (मुखिया)

  • दावा:- पहले परमाणु परीक्षण के बाद उ. कोरिया ने दावा किया कि उसने पांचवां अंडरग्राउंड (धरती के अंदर) परीक्षण किया है। उस परीक्षण के कारण भूगर्भीय तरंगे उठी और कहीं-कहीं भूकम्प की भी सूचना है। परीक्षण के बाद भू-गर्भीय हलचलें देखी गई और निश्चित ही उनका संबंध इस परीक्षण से है। इससे साबित होता है कि उसके परीक्षण का उपकरण पहले की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली है।
  • टीएनटी जांच:-उ. कोरिया पर नजर रखने वाले दक्षिण कोरिया के रक्षा-मंत्रालय ने बताया कि उसके उपकरण की विस्फोटक ऊर्जा 10 किलोटन (टीएनटी) के बराबर थी। इसके पहले उ. कोरिया ने गत जनवरी में ऐसे उपकरण का परीक्षण किया था। वह छह किलोटन के बराबर था। यानी इस बार उसने ज्यादा टीएनटी इस्तेमाल किया। जबकि जुलाई 1945 में न्यू मैक्सिकों में जमीन के ऊपर ’ट्रिनिटी न्यूक्लियर टेस्ट’ (जांच) किया गया था। वह परमाणु युग की शुरूआत थी, उसमें 20 किलोटन विस्फोटक ऊर्जा का उपयोग किया गया था।
  • लक्ष्य:-किसी उपकरण की मारक क्षमता का केवल उसकी विस्फोटक ऊर्जा से संबंध ही नहीं होता, बल्कि उसे लक्ष्य तक पहुंचाने की क्षमता होनी भी जरूरी है। दक्षिण कोरियाई, अमेरिकी और जापानी अधिकारी यह जानने में जुटे हैं कि क्या उ. कोरिया छोटे आकार का न्यूक्लियर उपकरण तैयार करने में सक्षम है, जिसे लॉन्च साइट से बैलिस्टिक मिसाइल के साथ दागकर हजारों किलोमीटर दूर लाखों लोगों को निशाना बनाया जा सकता है। पिछले दशकों के अध्ययनों के आधार पर दक्षिण कोरियाई और अमेरिकी विशेषज्ञ यह मान चुके हैं कि उ. कोरिया ऐसे लक्ष्य के करीब है। अमेरिकी विशेषज्ञों के अन्य समूह ने कहा कि उ. कोरिया को अमेरिकी महादव्ीप तक मिसाइल पहुंचाने की तकनीक विकसित करने में पांच साल और लगेंगे।
  • अमरीका व द. कोरिया:-कई अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ उ. कोरिया के परीक्षणों की निगरानी करते रहे हैं, क्योंकि उन्हें उ. कोरिया दावों पर विश्वास नहीं है। उ. कोरिया शासन ने पहले जिन परीक्षणों की सफलता के दावे किए, वे हमेशा सही साबित नहीं हुए हैं। अमेरिका को द. कोरिया का साथ है, क्योंकि दोनों कोरिया के बीच हमेशा युद्ध जैसी स्थिति बनी रहती है। उ. कोरिया के पहले परीक्षण के बाद से अब तक अमेरिकी विशेषज्ञों ने भूगर्भीय तरंगो और भूकम्प का परीक्षण किया था।
  • आकंड़े:-अमरीका के आंकड़े दक्षिण कोरियाई लैब से भिन्न हैं-

8 अक्टूबर 2006 : 9:35 पीएम (शाम), भूकम्प की तीव्रता 4.3

  • उपकरण: प्लूटोनियम के साथ अन्य सामग्री, विस्फोटक ऊर्जा एक किलोटन से कम।
  • मिसाइल: (प्रक्षेपास्त्र)-तीन माह पहले उसने जापान के समुद्र में मिसाइलों का परीक्षण किया। वह ताइपोडोंग-2 थी, जो अलास्का (अमेरिका) पहुंचने में सक्षम थी। वह परीक्षण पहली ही बार में विफल हो गया था।

24 मई 2009 : 8:54 पीएम (शाम), भूकम्प की जीव्रता 4.7

  • उपकरण- बम की क्षमता 2.35 किलोटन।
  • मिसाइल- (प्रक्षेपास्त्र)- तादपोडोंग 2 मिसाइल से अप्रैल 2009 में सैटेलाइट (उपग्रह) परीक्षण की कोशिश की, लेकिन विफल रही। उसका पेलोड समुद्र में गिरा था। जुलाई 2009 में उसने तीन मिसाइलें छोड़ी, जो समुद्र में गिरी। वो मिसाइलें 300 मील भी नहीं उड़ पाई थीं।

2 फरवरी 2013: 9:57 पीएम (शाम), भूकम्प की तीव्रता 5.1

  • उपकरण- उसने दावा किया कि यह बम पिछले दो परीक्षणों से ज्यादा शक्तिशाली है। अमेरिकी विवरण आई कि इस मिनिएचराइज्ड न्यूक्लियर वेपन (परमाणु अस्त्र संबंधित शस्त्र, हथियार) की विश्वसनीयता कम हो सकती है।
  • मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र)- मई 2013 में कम दूरी की तीन मिसाइलों का परीक्षण विफल रहा था।

5 जनवरी 2016 : 8:30 पीएम (शाम), भूकम्प की तीव्रता 5.1

  • उपकरण- उ. कोरिया ने दावा किया कि उसने हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया। मई में अमेरिकी और द. कोरियाई खुफिया अधिकारियों ने माना कि उ. कोरिया कम एवं मध्यम दूरी की मिसाइलों से जापान और द. कोरिया पर निशाना साध सकता है।
  • मिसाइल-(प्रक्षेपास्त्र)-अप्रैल में उसने पनडुब्बी से मिसाइल परीक्षण किया।

8 सितंबर 2016 : 8.30 पीएम (शाम), भूकम्प की तीव्रता 5.3

  • उपकरण- द. कोरियाई अधिकारियों ने कहा कि उ. कोरिया का यह सबसे शक्तिशाली बम हैं।
  • मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र)-पांच लगातार विफलताओं के बाद उसने इंटरमीडिएट (मध्यवर्ती) -रेन्ज (पंक्तिबद्ध) की ऊंचाई वाली बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। वह मिसाइल अमेरिकी बेस पहुंचने में सक्षम है।
  • बीजिंग- चीन की मर्जी के खिलाफ उ. कोरिया के तानाशाह किम जोंग ने पांचवां परमाणु परीक्षण कर अपने खतरानाक इरादे के संकेत दिए हैं अब उसे अपने आका और एक मात्र मददगार चीन की भी परवाह नहीं है।
  • अमरीका:- उत्तर कोरिया के ताजा परमाणु परीक्षण ने दुनिया के दूसरे देशों को चिंता में डाल दिया है। यह चिंता वाजिब भी हैं क्योंकि जिस तरह की तकनीक विकसित कर यह परीक्षण किया गया है उससे अब अमरीका का तट सीधा परमाणु हमले के दायरे में आ गया है। उत्तर कोरिया का दावा है कि उसने अब तक के सबसे छोटे आकार का न्यूक्लियर (परमाणु अस्त्र संबंधित) वेपन (शस्त्र हथियार) बनाया है। प्राथमिक तौर पर परमाणु बम 8-9 किलोग्राम वजन का होता हैं। उत्तर कोरिया ने करीब 5 किग्रा वजनी छोटा बम बनाने का दावा कर रहा है। जिन्हें मिसाइल के जरिए ज्यादा दूर तक छोड़ा जा सकता है। हालांकि, उत्तर कोरिया के मिसाइल व परमाणु परीक्षणों को लेकर शुरू से शक रहा है। अब तक उसने पांच-छह बार ऐसे परीक्षण किए हैं। उसके मिसाइल परीक्षण काफी आधुनिक हो चुके हैं। ये इंटर कॉन्टिनेन्टल (दो महादव्ीपों के बीच) हैं अर्थात काफी दूरी तक मार करने की क्षमता रखती हैं। उत्तर कोरिया शुरू से ही कहता रहा है कि वह अमरीका तक मार करने वाले हथियारों के जरिए यानी एक तरह से वह अमरीका को अपनी ताकत दिखाना चाह रहा है।
  • छह समूह का पाबंध:-उत्तर कोरिया के पिछले सालों में किए जा रहे परमाणु व मिसाइल परीक्षणों को देखें तो इसे सबसे बड़ी बात यह सामने आ रही है कि ऐसे परीक्षणों के लिए उत्तर कोरिया पर रोक लगाने के प्रयासों पर प्रभावी काम हुआ ही नहीं। वर्ष 2003 में छह देशों के एक समूह ने जिसमें अमरीका, रूस, द. कोरिया, उत्तर कोरिया व जापान के साथ चीन भी शामिल थे, यह तय किया कि भविष्य में उत्तर कोरिया की परमाणु शक्ति के संबंध में रोके, घटाएं और समाप्त करने की नीति के अनुरूप काम करेंगे। यानी एक तरह से उत्तर कोरिया को पाबंद किया जाएगा कि वह अपनी सामरिक क्षमताओं में परमाणु परीक्षण रोंके। चीन के उत्तर कोरिया पर प्रभाव को देखते हुए उसे समूह का संयोजक बनाया था।
  • चीन:-पिछले दो साल से तो इस समूह की बैठक बंद हैं माना जाता है कि अमरीका पर दबाव बनाने के लिए चीन ने जानबूझ कर समूह- 6 के प्रयासों में ढिलाई दी। एक तरह से उत्तर कोरिया का ढाल बनकर उसे 2006 से ही परमाणु क्षमताओं का विस्तार करने का मौका दिया। वर्ष 1993 में ही उत्तर कोरिया ने परमाणु अप्रसार संधि से बाहर होने का ऐलान करते हुए खुद की परमाणु क्षमता बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी थी।
  • समझौता-यहां तक कि वर्ष 1994 में जिनेवा समझौते में अमरीका और चीन दव्ारा उत्तर कोरिया को खाद्यान्न व ऊर्जा सहायता की सहमति भी इसकी एवज में की गई थी ताकि वह परमाणु शोध के काम को रोके। लेकिन उत्तर कोरिया के मौजूदा तानाशाह किम जोंग उन के पिता किम जोंग इल के समय में किए यह समझौता बेअसर रहा। मौजूदा शासक भी खुद को आक्रामक दिखाने के लिए अपना ध्यान परमाणु परीक्षणों की ओर लगा रहे हैं यह भी देखना होगा कि उत्तर कोरिया को इन परीक्षणों के लिए सबसे ज्यादा सहायता भी चीन ने ही दी।
  • भारत-अब अमरीका और चीन दोनों ही इस परीक्षण से तनाव में हैं पिछले दो साल से हालांकि भारत के संबंध उत्तर कोरिया से बेहतर हो रहे हैं यह अमरीका तक संदेश पहुंचाने की हमारी नीति भी हो सकती है। लेकिन जहां तक कि भारत का सवाल है, वह शुरू से ही कहता रहा है कि हथियारों का प्रसार अस्थिरता को बढ़ावा देने वाला होता हैं। यह बात उठती है कि जो तकनीक उत्तर कोरिया के पास है जापान व द. कोरिया जैसे देश को खुद को अमरीका के ’न्यूक्लियर अम्ब्रेला’( परमाणु अस्त्र संबंधित छाते) में सुरक्षित महसूस करते हैं। यह भी बात उठती है कि जो तकनीक उत्तर कोरिया के पास है उससे द. कोरिया और जापान भी परमाणु हथियार बनाने लगे तो क्या होगा? क्योंकि यह क्षमता विकसित करने की तकनीक और सामग्री इन देशों के पास भी है।
  • चीन और आतंकवाद-जहां तक कि पाकिस्तान का सवाल है सब जानते हैं कि उसने मिसाइल तकनीक उत्तर कोरिया से ली और बदले में उसें परमाणु अस्त्रों की तकनीक दी। दिलचस्प यह भी है कि दोनों देशों को इन तकनीकों का मूल आपूर्तिकर्ता चीन रहा है। हम यह भी देख रहे हैं कि भारत भी अपनी पाकिस्तान नीति में बदलाव ला रहा है। हम अब तक आतंकवाद भारत की समस्या बताते रहे लेकिन अब इसे द. ऐशिया ही नहीं बल्कि समूचे एशिया महादव्ीप के लिए खतरा बता रहे हैं ऐसे में आतंकवाद से यह परमाणु हथियारों का तरीका भी जुड़ जाता है। माना जा रहा है कि जिस मिसाइल तकनीक को पाकिस्तान ने उत्तर कोरिया से हासिल किया है, पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों को उम्मीद है कि वे भी इसे हासिल कर सकेंगे। ऐसे में खतरा और बढ़ जाता है।
  • चर्चा:-उत्तर कोरिया अपने मिसाइल व परमाणु परीक्षणों जैसी उकसावे भरी गतिविधियों से फिर चर्चा में हैं। उत्तर कोरिया के ताजा परमाणु परीक्षण ने दुनिया को चिंता डाल दिया हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु अप्रसार की चर्चाओ के बीच ऐसे परीक्षणों के लिए कौन से कारण जिम्मेदार हैं?
  • उपसंहार:-मोटे तौर पर उत्तर कोरिया के सनक भरे परमाणु परीक्षणों को नहीं रोका गया तो निरस्त्रीकरण के प्रयासो को झटका लगना स्वाभाविक है। बंद पड़ी समूह- 6 के देशों की इस समले पर बात फिर शुरू होनी चाहिए। समूह में भारत समेत दूसरे देशों को भी जोड़ा जाना चाहिए। उत्तर कोरिया के शासक वहां अकाल और बाढ़ जैसी देश की दूसरी समस्याओं को अनदेखी कर जिस तरह से परमाणु शक्ति प्रसार में लगे हुए हैं उससे एक न एक दिन पूरी दुनिया के लिए बड़ा खतरा सामने आने की आंशका रहेगी। उत्तर कोरिया को तो अपनी चिंता करनी ही होगी।

- Published/Last Modified on: October 14, 2016

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