भारत माता (Osmania University Case - Essay in Hindi) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: -मार्च 2016 के महिने में जेएनयू में देश विरोधी नारेबाजी को लेकर मचा बवाल अभी थमा नहीं कि हैदराबाद से सांसद असुदुद्दीन ओवैसी ने भारत माता की जय नहीं बोलने की बात कह कर देश प्रेम और देशद्रोह से जुड़े नए विवाद को हवा दी है। कोई अगर दवाब भी डाल दे तो भी भारत माता की जय नहीं बोलने की बात कहने वाले ओवैसी का तर्क है कि ऐसा कहना संविधान में नहीं लिखा गया है। यूं तो विवादित बयान देते रहना ओवैसी बंधुओं की आदत है लेकिन बात देश से जुड़ी हो तो प्रतिक्रियाएं भी तीखी होना स्वाभाविक है। ऐसा हो भी रहा है। भारत माता की जय बोलने पर दबाव कहां तक जायज हैं? क्या इनकार करने वालों को राष्ट्र विरोधी समझा जाए या चुनाव के मौकों पर सिर्फ राजनीतिक भड़कावा है। कुछ भी हो इस बात को हवा देने से देश का भला नहीं होने वाला है।

परिभाषा: - हमारी नज़र में वतन की परिभाषा में हमारा वो राष्ट्र है जिसमें पहाड़, नदियां व अनेक संस्कृतियों की महक है, तरह-तरह की भाषाओं को बोलने वाले लोग हैं। हमारे लिए राष्ट्र जज्बात व मोहब्बत है। देश देवता की सूरत में नहीं दिखता है बल्कि हमें यह मानना चाहिए कि देश हमारी आत्मा हैं। इसकी जय-जयकार को महसूस करना चाहिए और ऐसा करते रहना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि हमारे देश में विभिन्न संस्कृतियों के विभिन्न संप्रदायों के लोग रहते हैं। हमारा देश आजादी से पहले का देश है और इससे मोहब्बत करने वाले किसी एक विशेष कोम के लोग नहीं हैं। यही कारण है कि वतन की बात आने पर, मशहूर शायर इकबाल ने ’नया शिवाला’ में लिखा था, ’पत्थर की मूरतों में समझा है तू खुदा है, खाक ए वतन का मुझ को हर जर्रा देवता’। निस्संदेह यह प्यार की परीक्षा है और अपने राष्ट्र से प्रेम रखना कोई गुनाह भी नहीं है। लेकिन, राष्ट्र से प्यार रखना ही चाहिए पर प्यार उससे किया जाता है जिसमें आत्मा हो इसलिए राष्ट्र हमारी आत्मा का आधार है। इस आत्मा को महसूस करने देना चाहिए।

मूर्ति: - भारत आस्तिक और नास्तिक दोनों तरह के लोगों का है। और हो सकता है कि असम और प. बंगाल के मुसलमानों को वंदे मातरम कहने में कोई परेशानी न हो क्योंकि यह उनकी संस्कृति का शब्द है। संगीतकार ए. आर. रहमान जो तमिल संस्कृति से आते हैं, उन्होंने संगीत भी दिया और गाया भी ’मां तुझे सलाम’। यह भी स्वीकार्य है कि उनके देश में कोई मूर्ति पूजा को मानता है तो कोई मूर्ति पूजा को नहीं मानता है। यहां बहुत से आर्यसमाजी लोग भी हैं। जब वे ईश्वर की कोई मूर्ति को स्वीकार नहीं करते, वे राष्ट्र की कोई मूर्ति को कैसे स्वीकार कर लेंगे? वे कैसे भारत को माता मानकर पूजेंगे? इसी तरह की बात देश के किसी कोने के किसी मुस्लिमों के साथ भी हो सकती हैं।

नजरिया: - हमें भारत को हिंदी-हिंदू -हिंदुस्तान या उर्दू-मुसलमान-हिंदुस्तान के नजरिये से देखना बंद करना होगा। हमें हिंदुसतान कैसा हो, के बारे में जम्मू-कश्मीर ही नहीं हमें अंदमान और मणिपुर के लोगों से भी पूंछना होगा कि वे हुिदंस्तान को किस नजरिये से देखते हैं। हमारा राष्ट्र गीता, कुरान या राष्ट्र ग्रंथ भी नहीं हैं। यह कोई मूर्ति नहीं है बल्कि आत्मा का आधार है, इसे लोगों को स्वयं महसूस करना होगा। इस मामले में किसी एक की परिभाषा अन्य किसी पर लागू करना ठीक नहीं है। हिंदुस्तान में यह कैसे हो सकता है कि असुद्दीन ओवैसी या मोहन भागवत बतांएगे, कि भारत और भारतीय होने की क्या परिभाषा होगी? देश के संविधान निर्माताओं ने इस मामले में सभी को स्वतंत्रता दी है उस आत्मा की जय-जयकार करने की, जिसे वह राष्ट्र मानता है। इस मामले में उसका तरीका कुछ अलग भी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए।

विवाद की शुरुआत: - आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने जेएनयू में देशद्रोही नारेबाजी की घटना सामने आने के बाद कहा था कि नई पीढ़ी को देशक्ति की बातें सिखाई जानी चाहिए। ओवैसी के अनुसार उनका कहना था कि ’हमारे संविधान में कहीं नहीं लिखा कि भारत माता की जय बोलना आवश्यक है चाहे हम पर कितना भी दवाब क्यों न डाला जायें पर भारत माता की जय बिलकुल नहीं बोलेगें।

मत: - मत निम्न हैं-

  • जावेद के अनुसार भारत माता की जय बोलना मेरा कर्तव्य ही नहीं बल्कि यह मेरा अधिकार है। मैं कहता हूं भारत माता की जय, भारत माता की जय।
  • शिवेसना के अनुसार, शिवसेना नेता रामदास कमद ने कहा कि ओवैसी का बयान बहुत गंभीर है। वे पाकिस्तान चले जाएं, उन्हें भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं हैं।
  • केंद्रीय मंत्री एम. वेकैया नायडु ने ओवैसी का बयान दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि ओवैसी को अपने इस बयान पर शर्म आनी चाहिए।

ओवैसी: - साध्वी निरंजन ज्योति, केंद्रीय राज्य मंत्री के अनुसार असदुद्दीन ओवैसी जैसे लोग सार्वजनिक रूप से भारत माता की जय बोलने से इनकार करें तो इससे बड़ा देशद्रोह कोई हो ही नहीं सकता है। ऐसे व्यक्ति की न केवल लोकसभा सदस्यता रद्द की जानी चाहिए बल्कि उस पर देशद्रोह का मुकदमा भी चलाया जाना चाहिए। ओवैसी यह कहते हैं कि संविधान में कहीं भी नहीं लिखा कि भारत माता की जय बोलना जरूरी है। यह समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसी घटिया बातें कहने वाले इस देश में रहते ही क्यों हैं? संविधान में न भी लिखा तो क्या हुआ उस भारत माता, जिसकी गोद में हम रहते हैं, खाते हैं और सोते हैं उसका अहसानमंद नहीं होना चाहिए? यह इस देश का दुर्भाग्य ही है कि हर मामले में राजनीति अधिक होने लगी है। मामूली घटनाओं को ऐसा तूल दे दिया जाता है मानो देशभक्ति की बात करने वाले किसी को अपराधी ठहरा रहे हैं। दूसरे विषयों पर इतना हल्ला होता है कि संसद की कार्यवाही तक नही चलने देते हैं।

हमारे यहां ओवैसी बंधु देश के खिलाफ जितना जहर उगल रहे हैं उतनी मनमानी करने की छूट तो दी ही नहीं जानी चाहिए। इस देश में रहने वालों के देश और उसके मान-सम्मान के बारे में सोचना ही होगा। ओवैसी तो ऐसे कह रहे हैं जैसे वे हिंदुस्तान में नहीं बल्कि दुनिया के दूसरे देश में रहते हैं भारत माता की जय बोलना देशक्ति का सबसे बड़ा अहसास है और जो लोग इस अहसास को महसूस नहीं करते उनसे बड़ा गुनाहगार कोई नहीं।

हमारे देश को आजादी के दीवानों ने भारत माता की जय बोलकर ही अंग्रेजी हुकूम का मुकाबला किया था। ऐसे में यदि कोई भारत माता की जय बोलने से इनकार करता है तो इससे बड़ी घटिया मानसिकता कोई हो ही नहीं सकती है। भारत माता की जय बोलना तो हमारे यहा जन्मघुट्टी की तरह है। भला कोई अपनी मां का जयकारा लगाने से कैसे मना कर सकता हैं

मुद्दा: - हमारे देश के ढांचे को देखें तो भारत माता की जय बोलना नहीं है। हां, अगर मुद्दा यह होता कि भारत की संप्रभूता और अखंडता पर भरोसा है या नहीं कश्मीर भारत का अंग है या नहीं अगर इसके खिलाफ कोई बोले तो उस पर सवाल उठाए जा सकते हैं। पर अभी कोई भारत माता की जय नहीं बोल रहा है तो उसे बहुत तुल नहीं देना चाहिए। क्योंकि हमारे देश के ढांचे में धर्म का कोई स्थान नहीं है। धर्म बहुत निजी मसला है। इसी तरह अगर ओवैसी जोर-जोर से यह बोलते हैं कि वे भारत माता की जय नहीं बोलेंगे तो वे भी अपने भटकाव का परिचय दे रहे हैं। अगर ओवैसी मोहन भागवत का नाम लेकर जय न बोलने का बयान देते हैं तो उल्टे भागवत का काम आसान कर रहे हैं। बहुसंख्यकों के समक्ष वे अल्पसंख्यकों का पक्ष कमजोर कर रहे हैं। इस भावना में किसी को भी उग्र होने की जरूरत नहीं है। हमारे देश के राजनीतिक ढांचे में सैद्धांतिक रूप से धर्म का कोई स्थान नहीं है। पर दुर्भाग्यवश धर्म को ही राजनीति का केंद्र बना दिया गया है।

राशिद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार

प्राथमिकता: - इस तरह की तमाम बातें हमारे देश में बहुत पहले तय हो चुकी हैं। जैेसे पहले वंदे मातरम को लेकर विवाद था। खुद मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जो बड़े धर्म गुरु भी थे, उन्होंने अल्पसंख्यकों की ओर से वंदे मातरम की कुछ पंक्तियां बोलने पर जो ऐतराज जताया गया था, उससे इनकार किया। उन्होंने साफ कहा कि ये पंक्तियां बोलने में मुस्लिमों को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। अपने वतन से प्रेम करना इस्लाम में कहीं मना नहीं है। आखिर क्यों हम फिर से 1947 के दौर में जाना चाहते हैं? हमें पुराने हादसों से सीखना चाहिए। भारत माता की जय बोलना बहुत अच्छी बात है पर अगर कोई जय नहीं बोल रहा हैं तो उसे राष्ट्रद्रोही करार देना भी गलत है। यह उस समय भारत की प्राथमिकताओं में शामिल मसला नहीं है। भारत में हर धर्म को आजादी है यहां कानून का शासन है।

राशिद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार

भारत: - ओवैसी जब भाषण देते हैं कि वे भारत माता की जय नहीं बोलेंगे तो वे ऐसा प्रतीत कराते हैं कि देश में भारत माता की जय बोलना जबरदस्ती कराई जा रही है पर ऐसा माहौल नहीं है। राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इस मुद्दे को भावनात्मक बनाया जा रहा है। यह राजनीतिक लाभ दोनों ओर से उठाने की कोशिश की जा रही है। ओवैसी जैसे लोगों की जाहिर तौर पर भत्सर्ना होनी चाहिए, जो एक किसम की अकड़ दिखा रहे हैं। पर साथ ही साथ एक व्यापक प्रश्न यह है कि बहुसंख्यकवाद की अवधारणा भी नहीं पनपनी चाहिए। इसका नुकसान हमारे पड़ोसी पाकिस्तान, बांग्लादेश और अन्य मुस्लिम बाहुल्य देशों को भुगतना पड़ा है। भारत में ऐसा कभी नहीं रहा और न ही इसे पनपने देना चाहिए। भारत की खासियत आपसी टकरावों को न्यूनतम करके आगे बढ़ना रहा है। आजादी के समय तमिल समस्या पनपी फिर भाषाई विवाद पनपा पर एक समय के बाद सब मुख्यधारा का हिस्सा बन गए। पर अभी टकराव बढ़ाने की राजनीति हो रही हे। एक कह रहा है कि जय नहीं बोलेंगे तो दूसरी ओर कहा जा रहा है कि इनका राष्ट्रवाद सौ फीसदी राष्ट्रवाद नहीं है। यह टकराव रोका जाना जरूरी है।

राशिद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार

उपसंहार: - देश के प्रति आस्था सबकी है। उसे दिखाने का तरीका जरूरी नहीं एक हो। अगर कोई तिरंगा नहीं फहरा रहा है या जय नहीं बोल रहा है तो उसे राष्ट्रद्रोही कहने से बचना चाहिए। यह न तो कोई आजादी का दौर है न ही किसी तरह का संघर्ष चल रहा है। अब विकास की राजनीति का दौर है। एक कह रहा है कि भारत माता की जय नहीं बोलेगें। तो दूसरी तरफ जय नहीं बोलेगे तो देश में रहने का अधिकार नहीं है। दोनों ओर से फिजुल तर्क दिए जा रहे हैं किसी ओवैसी या साध्वी के भड़काऊ बयान का सामाजिक, मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा बहिष्कार होना चाहिए। ओवैसी जैसे लोग जो मुद्दा उठा रहे हैं, वह समाज के सामने समस्या ही नहीं है।

- Published/Last Modified on: April 19, 2016