Current News (Concise) ]- Examrace" /> Current News (Concise) ]- Examrace" />

पुलिस विश्वविद्यालय (Police Universities - Essay in Hindi) [ Current News (Concise) ]

()

प्रस्तावना: - भारत में केंद्रीय, राज्य, डीम्ड एवं निजी विश्वविद्यालयों को मिलाकर कुल 700 से अधिक विश्वविद्यालय है। कृषि, कानून, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, चिकित्सा सहित अनके विषयों के लिए अलग से विश्वविद्यालय चलाए जा रहे हैं। पर देशभर के पुलिसबल में करीब 35 लाख कर्मी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए जुटे रहते हैं, उससे संबंधित विषय के पेशेवर अध्ययन के लिए मात्र दो विश्वविद्यालय ही मौजूद हैं। आज विशेषज्ञता का दौर है और यह विशेषज्ञता अकादमियों में हासिल नहीं होती है। इसलिए हमारे देश में दो के अलावा भी ओर पुलिस विश्वविद्यालय होने चाहिए। जिससे पुलिस का मनोबल बना रहें।

मोदी: - प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पुलिस को संवेदनशीलता के साथ-साथ स्मार्ट बनाना चाहते हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि पुलिस की छवि सकारात्मक बनाने में संवेदनशीलता एवं उसकी कार्यक्षमता सुधारने के लिए स्मार्टनेस एक अनिवार्य शर्त है, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि इस महत्वाकांक्षी विजन को क्या प्रधानमंत्री धरातल पर ला पाएंगे? अर्थात इस महत्वपूर्ण कार्य को मोदी जी कर पाएंगे।

सम्मेलन: - दिल्ली की सियासी भागदौड़ से दूर गुजरात के कच्छ में हाल ही में सम्पन्न हुए पुलिस महानिदेशक सम्मेलन का एजेंडा स्वयं मोदी की देखरेख में तैयार किया गया था तमाम राज्यों के पुलिस महानिदेशक एवं केन्द्रीय पुलिस बलों के प्रमुखों की इस वार्षिक बैठक में इस बार पुलिस सुधार, कानून-व्यवस्था और सुरक्षा पर सोशल मीडिया का असर सामुदायिक पुलिस, आपदा प्रबंधन, महिला सुरक्षा एवं पर्यटन पुलिस, पुलिस को तकनीकी रूप ये सुदृढ़ बनाने जैसे अनेक मुद्दों पर चर्चा हुई। लेकिन प्रधानमंत्री की मौजूदगी में पुलिस विश्वविद्यालयों पर प्रस्तुतिकरण इस बैठक का खास आकर्षण रहा। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब देश के हर राज्य की पूलिस और केन्द्रीय पुलिस बलों के पुलिसकर्मियों के लिए अनेक अकादमियां मौजूद हैं तो अलग से पुलिस विश्वविद्यालयों की आवश्यकता क्यों है? दरअसल प्रधानमंत्री इस तथ्य से भलीभांति परिचित हैं कि चिकित्सा, कृषि, इंजीनियरिंग एवं कानून जैसे पेशेवर विषय दुनिया को अपने विशिष्ट ज्ञान से तभी लाभांवित कर पाए, जब उनके अध्ययन-अध्यापन के लिए विश्वविद्यालय स्थापित किए गए। अब तो रेल विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा भी हो चुकी है। लेकिन जिस पुलिसबल में देशभर में करीब 35 लाख कर्मी, आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं और जिसके 33 हजार कर्मी शहीद हो चुके हैं। उससे संबंधित विषय के पेशेवर अध्ययन के लिए मात्र दो विश्वविद्यालय ही मौजूद हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए यह तो पुलिस वालों के साथ बेमानी होगा।

शोध: -क्या ऐसे हालात में पुलिस से यह उम्मीद करना बेमानी नहीं है कि पुलिसकर्मी मानव-व्यवहार एवं मानव-प्रबंधन, विज्ञान एवं तकनीक के अत्याधुनिक प्रयोग, आपदा प्रबंधन, कानून, समाजशास्त्र, अपराधशास्त्र जैसे विषयों की नवीनतम जानकारी रख सकेंगे। यह समझ लेना आवश्यक है कि पुलिस अकादमियों का कार्य प्रशिक्षण देना है जिसके अन्तर्गत गहन शारीरिक प्रशिक्षण भी शामिल होता है। जबकि विश्वविद्यालय शिक्षा एवं शोध के लिए स्थापित किए जाते हैं, जो किसी भी सभ्य आधुनिक समाज की प्रगति का द्योतक होते हैं। विश्वविद्यालयों का गठन मानवता के महान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता हैं।

संभव: - यह सब लोग जानते है कि सहनशीलता, तर्कशीलता, बौद्धिकता और विशेषज्ञता जैसे लक्ष्य विश्वविद्यालयों के अभाव में संभव ही नहीं हैं। विश्वविद्यालय अपने विद्यार्थियों के मन में अपने उन आधारभूत मूल्यों को सहेजते हुए राष्ट्रनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिनका उनमें अटूट विश्वास होता है। यही कारण है कि मोदी जी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भारत के प्रथम पुलिस विश्वविद्यालय, रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। उसके बाद राजस्थान ने देश का दूसरा पुलिस विश्वविद्यालय: सरदार पटेल पुलिस सुरक्षा एवं दाण्डिक न्याय विश्वविद्यालय, जोधपुर में स्थापित किया। पुलिस आज अनेक समस्याओं से जूझ रही है। नित नई चुनौतियों का सामना पुलिस को करना पड़ रहा है जिसके लिए वह फिलहाल तैयार प्रतीत नहीं होती है। पुलिस विश्वविद्यालय पुलिस विषयों के गहन अध्ययन और अनुसंधान के साथ ही ज्ञान के प्रसार और अभिवृद्धि द्वारा ऐसे पुलिसकर्मियों के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण निभा सकते हैं, जो राष्ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय एवं लोकतांत्रिक मूल्यों की गहरी समझ रखते हो।

सुरक्षा: - पुलिस विश्वविद्यालय अपने शैक्षिक कार्यक्रमों में अंतर-विषयक अध्ययन को प्रोत्साहन देने के अलावा विज्ञान और प्रोद्योगिकी में ऐसे पाठ्‌यक्रमों की व्यवस्था कर सकते हैं, जिसका सीधा लाभ राष्ट्र को और सुदृढ़ बनाने में हो सकता है। ऐसा पुलिस अकादमियों के माध्यम से संभव नहीं है। आज विशेषज्ञता का दौर है। इस दौर में हर पेशा चाहे वह कृषि हो या चिकित्सा, कानून हो या इंजीनियरिंग, अधिक से अधिक विशेषज्ञता हासिल करने में व्यस्त हैं। इसलिए पुलिस पेशे को भी अपनी तमाम गतिविधियों की समझ हासिल करने तथा आतंकवाद, चरमपंथ, संगठित अपराध, साइबर अपराध जैसी खतरनाक चुनौतियां का सामना करने लिये विशिष्ट शिक्षण संस्थाओं की अत्यंत आवश्यकता है।

भर्ती: - मोदी ने इस अहम बैठक में दोनों पुलिस विश्वविद्यालयों पर प्रस्तुतिकरण के दौरान इस बात को रेखांकित किया कि पुराने ढर्रे से चल रही भर्ती की बजाय अब पुलिस को भर्ती के लिये अधिक पेशेवर तरीके अपनाने होंगे और इस कार्य में पुलिस विश्वविद्यालय अहम भुमिका निभा सकते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि पुलिस विभाग की भर्तियों के लिए पुलिस विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को न केवल प्राथमिकता दी जाएगी बल्कि भविष्य में केवल वे ही पुलिस में भर्ती के लिए पात्र होंगे।

पुलिसिंग: -पुलिस महानिदेश्ाक/आईजीपी सम्मेलन हर साल स्थायी रूप से दिल्ली में आयोजित कराया जाता है। जहां इसका विषय ’स्मार्ट पुलिसिंग’ रखी गई । मोदी ने स्मार्ट पुलिस का मतलब: सेंसिटव और रिट्रक्ट, मॉडर्न और मोबाइल, अलर्ट और अकाउंटेबल, रिस्पॉन्सिव और रिलायबल एवं टेक्नोसेवी -ट्रेंड रखा था। वहीं इस साल कच्छ के रण में आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन का विषय सेंसिटिव पुलिसिंग रखी गई है। इसमें प्रधानमंत्री ने कहा कि पुलिस को स्थानीय समुदाय और लोगों के साथ संवेदन शीलता व मजबूत संबंध स्थापित करने चाहिए।

प्रधानमंत्री कच्छ में आयोजित सम्मेलन में तीनों दिन मौजूद रहे। पुलिस और खुफिया तंत्र मोदी का पंसदीदा विषय है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर आईएसआईएस के बढ़ते खतरे और महिला सुरक्षा पर जोर दिया। अलग-अलग राज्यों की पुलिस में आपसी समन्वय, पुलिस के व्यवहार, जांच प्रणाली में सुधार पर बल दिया।

स्मार्ट: -हर साल पुलिस महानिदेशक सम्मेलन का आयोजन गुजरात में हुआ। उक्त सम्मेलन में यह मुद्दा जोर-शोर से उठाया गया कि हमारे देश की पुलिस को आंतरिक सुरक्षा से लड़ने के लिए न सिर्फ संवेदनशील बनाना पड़ेगा बल्कि उन्हें स्मार्ट भी बनाना पड़ेगा। भारत में अलग-अलग राज्यों में पुलिस को स्मार्ट बनाने की बात पर अगर हम गौर फरमाएं तो पंजाब और भविष्य में इसमें गुणात्मक सुधार की उम्मीद की जा सकती है। हालांकि इस मामले में हमारे कई राज्यों की पुलिस अभी भी बहुत पीछे है।

परिणाम: - सच तो यह है कि अगर हम पुलिस को स्मार्ट बनाने को थोड़ा देसी भाषा में कहें तो यह कहा जा सकता है कि हमें चेकनाका और नाकेबंदी से आगे निकलकर साइबर स्मार्टनेस की ओर कदम बढ़ाना होगा। इस काम को राजस्थान सहित देश के दूसरे राज्यों के मुख्य शहरों में सीसीटीवी कैमरों और वीडियों कैमरों के जरिए अंजाम दिया जा रहा है। इस काम के लिए पुलिस को बहुत कम खर्च करने की जरूरत होगी। हम कम संसाधन खर्च करके भी बेहतर परिणाम ला सकते हैं।

अकादमी: - देश की आंतरिक सुरक्षा को दुरुस्त बनाने के लिए पुलिस के लिए समय-समय पर ट्रेनिंग की व्यवस्था करनी होगी। उन्हें शारीरिक तौर पर ट्रेनिंग के अलावा साइबर क्राइम को समझने के लिए ट्रेनिंग की व्यवस्था करनी चाहिए। यह सही है कि कई राज्यों की पुलिस के पास बहुत ही कम संसाधन हैं। वहीं दूसरी ओर आंतकवादी तकनीकी तौर पर ज्यादा मजबूत हुए हैं। वे आंतक को अंजाम देने के लिए हर रोज नई तकनीक को इस्तेमाल में ला रहे हैं। अब फर्ज कीजिए कि कोई आतंकी घटना को अंजाम देने के लिए एसयूवी हृीकल्स को उपयोग में लाता हैं उस पर दबिश देने के लिए पुलिस के पास अच्छे हृीकल्स नहीं हैं तो फिर परिणाम कैसे अच्छे आएंगे? हालांकि, मान्यता यह है कि पुलिस अपने परिणाम को कम संसाधन में भी बेहतर बना सकती है। देश में गुजरात और राजस्थान की पुलिस की अकादमी पुलिस को स्मार्ट बनाने के लिए उन्हें साइबर क्राइम को समझने की ट्रेनिंग दे रही हैं। पुलिस को संयम के साथ बदलना पड़ेगा और उस दिशा में अलग-अलग राज्यों को भी जोर लगाना पड़ेगा।

संसाधन: - आप पंजाब के गुरुदासपुर की आतंकी कार्रवाई का ध्यान करें तो आपको नजर आएगा कि वहां की पुलिस बेहतर अंजाम इसलिए दे पाई क्योंकि उनके पास सभी आधुनिकतम हथियार भी मौजूद थे। राजस्थान पुलिस के पास संसाधनों की कमी है। वहीं इसके मुकाबले दूसरे छोटे राज्यों आंध्र प्रदेश या तेलांगना पर गौर फरमाएं तो वहां की पुलिस के पास नक्सलियों से लड़ने के लिए बेहद आधुनिक और बेहतर हथियार हैं। देश की आंतरिक सुरक्षा को दुरुस्त करने के लिए अलग-अलग राज्यों की पुलिस के पास हृीकल्स, बंदूकें और आतकवादियों का पीछा करने के लिए हर जरूरी साधन नवीनत सुविधाओं से लैस हों तभी बात बनेगी।

जानकारी: - देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए अलग-अलग राज्यों के बीच समन्वय का होना बहुत जरूरी होता हे। अक्सर होता यह है कि राजस्थान में कोई गैंगवार की घटना या फिर आतंकवादी घटना होती है तो उसमें पकड़े जाने वाले अपराधी हरियाणा, उत्तर प्रदेश या बिहार के होते हैं। यहां उनका चालान काटकर उन्हें उनके राज्य पुलिस को सौंप दिया जाता है। और इसके बाद उस अपराधी के बारे में कोई भी जानकारी नहीं कि जाती है। उस अपराधी की (कहां पर हैं) के बारे में खबर नहीं रखी जाती है। वह क्या कर रहा है, क्या नहीं कर रहा है? आतंकवादी घटनाओं के मुजरिमों में तो जानकारी करते हैं, पर गैंगवार जैसी घटनाओं में ऐसा नहीं किया जाता है। आज सीसीटीवी कैमरे पुलिस के लिए मददगार साबित हो रहे हैं। उन्हें आतंकी या अपराध की घटनाओं पर लगाम कसने में इससे बहुत मदद मिल रही है। अब बाजार और घरों में चौखट, दरवाजा और खिड़कियों की तरह सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने को बहुत जरूरी समझा जा रहा है। हालांकि पुलिस को शहरों से निकलकर ग्रामीण इलाकों के बारे में भी सोचने की जरूरत है। वहां के मुख्य जगहों पर सीसीटीवी कैमरे भी लगवाने चाहिए। फिर भी आज की तारीख में हमारी पुलिस व्यवस्था देश के अलग-अलग राज्यों से बेहतर तरीके से जुड़ नहीं पाई हैं। इस जानकारी करने की कोई व्यवस्था हमारें यहां अंतर्राज्यीय स्तर पर विकसित नहीं हो पाई है। इसके अभाव में अपराध और आतंकी घटनाओं को बढ़ावा मिलता जाता है।

उपंसहार: -सरकार को सब क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए इसके अलावा पुलिस के क्षेत्र में भी ध्यान रखना होगा उनके लिए दो विश्वविद्यालय के अलावा भी ओर विश्वविद्यालय स्थापित करने होगें जिससे पुलिस सही तरह से प्रशिक्षत होकर अपना काम बेहतर तरीके से कर सकेगी क्योंकि आज हर जगह सुरक्षा की दृष्टि उनकी बहुत जरूरत पड़ती हैं।

- Published on: February 16, 2016