विश्व का बेशकीमती कोहिनूर हीरा (Precious Kohinoor Diamond - Article in Hindi) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: -कोहिनूर एक ऐसा बेसकीमती हीरा है जिसे हर प्रांत, देश, विदेश के लोग पाना चाहते हैं। इसे रोशनी का पर्वत कहते हैं। इस हीरे ने कृष्णा-गोदावरी से गंगा-जमुना, सह्याद्रि से हिंदुकुश तक हजारों बरस का सफर किया है। भारत की सांस्कृतिक थाती हीरे के दिल में समायी हुई है। राजाओं और बादशाहों के ताज से कोहीनूर ने सियासी को देखा हैं। कालखंडों का इतिहास हीरे से सांसे लेता है। यह हीरा लगभग डेढ़ सौ साल (150 वर्ष) से बंधक में हैं। सात समंदर पार विदेशी महारानी के ताज में कोहिनूर हीरा जड़ दिया गया था। अब यह देश आजाद हो चुका है। अब यह हीरा किसी राजा के कैद मेें नहीं है। यह हीरा देशवासियों का दुलार पाना चाहता हैं। सुना है कि देश की सरकार कहती है कि हीरे को न तो लूटा गया था न इसे चोरी किया गया था। इस हीरे को तो विदेशी हुकुमरानों को केवल उपहार वस सौंपा गया था। अनुमान के तौर पर स्वयं हीरा कह रहा है कि हीरा कोई नजराना नहीं है। हीरे को केवल एक कीमती पत्थर का टुकड़ा न समझना। देशवासियों के सांसों की गर्मी का अहसास करने को हीरे का भी दिल धड़कता है। यह हीरा देश लौटना चाहता हैं। अपनों के बीच आकर दूर नहीं जाना चाहता हैं।

सफरनामा-ए-कोहिनूर: - कोहिनूर का सफर निम्न स्थानों से हैं-

  • श्यामन्तक में छिपा है राज- विष्णु पुराण सहित अन्य प्राचीन भारतीय ग्रंथों में श्यामन्तक मणि का उल्लेख है। सत्राजित से जाम्बवान्‌ और फिर श्रीकृष्ण तक इस मणि के पहुंचने की कथा हैं। कहा जाता है कि कोहिनूर ही मूल रूप से श्यामनतक मणि थी।
  • मालवा के मैदान से कहानी: - मूल रूप से 793 कैरेट का कोहिनूर आंध्र प्रदेश के गालकॉडा की खानों से निकाला गया था। कोहिनूर की दस्तावेजी जानकारी वर्ष 1304 में मिलती है, तब यह मालवा के राजा महलाक देव की संपत्ति में शामिल था।
  • अनूठा मिथक- वर्ष 1304 में अलाउद्दीन खिलजी ने कोहिनूर को हथिया लिया था। उसी समय मिथक जुड़ा कि ये हीरा जिसके पास होगा वो दुनिया पर राज करेगा, ये दुर्भाग्य भी लाएगा। इसे ईश्वर या महिला ही पहन सकती है।
  • पानीपत युद्ध से बाबर को मिला- बाबरनामा के अनुसार कोहिनूर बाद के वर्षो में समरकंद में रहा। वर्ष 1526 में पानीपत के पहले युद्ध के बाद आगरा किले में कब्जे के दौरान बाबर ने इसे कब्जे में किया था। तब ये हीरा 186 कैरेट का था।
  • नामकरण- नादिर शाह ने वर्ष 1739 में औरंगजेब के पोते सुल्तान महमद से इस हीरे को छीन कोहिनूर नाम दिया। फारस में वर्ष 174 में नादिर शाह की हत्या के बाद कोहिनूर उसके पोते शाहरुख मिर्जा के कब्जे में आ गया था।
  • अफगानिस्तान- शाहरुख मिर्जा ने सैन्य मदद की ऐवज में नादिर शाह के सेनापति अहमद अब्दाली को ही कोहिनूर हीरा सौंप दिया। अहमद अब्दाली इस हीरे को लेकर अफगानिस्तान तक पहुंचा। इसके बाद यह हीरा अब्दावली के वंशजो के पास रहा।
  • रणजीत सिंह से दिलीप सिंह तक- अब्दाली वंशज शाहशुजा के लाहौर पहुंचने पर पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह ने 1813 में कोहिनूर हासिल कर लिया रणजीत सिंह कोहिनूर हीरे को अपने ताज में पहनते थे। उनकी मौत के बाद हीरा उनके बेटे दिलीप सिंह तक पहुंचा।
  • जगन्नाथ पुरी- महाराजा रणजीत सिंह कोहिनूर हीरे को आडिशा के जगन्नाथ पुरी मंदिर को दान में देना चाहते थे। लेकिन अग्रेज शासकों ने महाराजा रणजीत सिंह की इस अंतिम इच्छा को पूरा नहीं किया।
  • लाहौर संधि- 1849 में ब्रिटेन ने दिलीप सिंह को हराया। दिलीप सिंह ने लाहौर की संधि पर गवर्नर (राज्यपाल) जनरल (सामान्य) लॉर्ड डलहौजी के साथ हस्ताक्षर किए। इस संधि के अनुसार कोहिनूर को इंग्लैंड की महारानी को सौंपना पड़ा।
  • डलहौजी- ततकालीन गर्वनर जनरल लॉर्ड डलहौजी कोहिनूर हीरे को युद्ध में लूट मानता था। डलहौजी इसे खुद लाहौर से मुंबई लेकर पहुंचा। तीन महीने की लंबी समुद्री यात्रा के बाद जुलाई, 1850 को इसे इंग्लैंड की महारानी को पेश किया गया।
  • तराशने पर घट गया आकार- इंग्लैंड की तत्कालीन महारानी विक्टोरिया ने कोहिनूर को फिर तराशने का फरमान दिया। ये गलत ही साबित हुआ, डच फर्म कोस्टर ने इस नायाब हीरे को कुछ इस प्रकार तराशा कि ये 186 कैरेट से 105 कैरट ही रह गया।

रिपोर्ट मणिमंजरी सेनगुप्ता

सियासत: -कोहिनूर हीरे पर मालिकाना हक को लेकर सियासी अदला-बदली वाला रुख बी ग्रेड (दूसरा स्तर/श्रेणी) की बॉलीवुड के लिए अच्छा मसाला हो सकता है। 105 कैरेट के इस हीरे के ब्रिटेन पहुंचने और फिर ताज में सजने तक को लेकर अलग-अलग मत हैं। वैसे इसे लेकर दो सिद्धांत अधिक चलते हैं जो निम्न हैं-

  • पहला सिद्धांत के अनुसार ब्रिटिश और कुछ भारतीय मानते हैं कि महाराणा रणजीत सिंह दव्ारा पूर्वी भारत जनसमूह को यह तोहफे में दिया गया है।
  • दूसरे सिद्धांत के अनुसार यह बताया जाता है कि महाराणा रणजीत सिंह के देहांत के बाद उनके बेटे दिलीप सिंह से जबरना छीना गया था। फिर भी कोहिनूर ब्रिटेन पहुंच गया। भले ही वैधानिक तौर पर लेकिन इसके पीछे इरादे कतई नेक नहीं थे।

न्यायालय: - पिछले सप्ताह केंद्र सरकार ने सुप्रीम न्यायालय में कोहिनूर वापसी की याचिका पर चल रही सुनवाई में जवाब दिया कि हीरा ब्रिटिश शासकों दव्ारा न जो जबरन छीना या चुराया गया बल्कि पंजाब के शासकों दव्ारा यह तोहफे के रूप में दिया गया था। जब न्यायालय के ब्रेच में सॉलिसिटर (वसीयत जैसे कानूनी कागज बनाने वाला व कानूनी मामलों में राय देने वाला वकील) जनरल रंजीत कुमार से पूछा कि क्या सरकार कोहिनूर पर अब भी अपना दावा करती है तो उन्होंने जवाब दिया ’अगर हम कोहिनूर जैसी चीजों पर दूसरे देशों के सामने दावा करते हैं तो हर दूसरा राष्ट्र हमसे भी अपनी चीजों को मांगने का दावा करने लगेगा। तब हमारे संग्रहालयों में कुछ बचेगा ही नहीं।’ हालांकि एक दिन बाद ही केंद्र सरकार का हृदय परिवर्तन हुआ और न्यायालय ने कहा कि वह सौहार्दपूर्ण तरीके से कोहिनूर को वापस लाने की हरसंभव कोशिश के लिए प्रतिबद्ध हैं।

सरकार: - पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1956 में आधिकारिक तौर पर कहा था कि कोहिनूर वापस नहीं लिया जाना चाहिए। लेकिन तब से लेकर अब तक कई देश इस पर दावा जताते रहे हैं, ब्रिटेन में भारतीय समुदाय ने कई बार कोहिनूर भारत वापस भेजने की मांग उठाई हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोदी की ब्रिटेन यात्रा के दौरान भारतीय मूल के ब्रिटिश सांसद कीथ वाज ने कोहिनूर लौटाने की बात प्रमुख रूप से उठाई थी। वाज की टिप्पणी पूर्व मंत्री और सांसद शशि थरूर के ऑक्सफोर्ड यूनियन (संगठन) में दिए गए उस भाषण की प्रतिक्रिया में थी, जिसमें थरूर ने ब्रिटेन को भारत पर राज की ’क्षतिपूर्ति अदा करने’ की बात कही थी। वाज ने कहा था कि भारत को कोहिनूर लौटाना भले ही पेचीदा और निरर्थक है पर लेकिन ऐसी बहुमूल्य वस्तु को न लौटाने के पीछे कोई बहाना नहीं बनाया जा सकता है।

2013 में अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर आगमन पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा था कि वे हीरे का वापस लौटाने में विश्वास नहीं करते है। यह समझदारी भी नहीं है। उनका कहना था कि हीरा लंदन में ही रहेगा। अगर किसी एक चीज लौटाने के लिए हां कर दी तो फिर लंदन म्यूजियम (संग्रहालय) खाली ही हो जाएगा। भारत ही नहीं पाकिस्तान से भी कोहिनूर पाने की कवायद होंती रही है। भारत में शिरोमणि अकाली दल दव्ारा सरकार को हीरा वापस न ला पाने के लिए आलोचना की जाती रही है।

उपहार या लूट: -उपनिवेशवाद-साम्राज्यवाद निश्चय ही आधुनिक युग में धिक्कार पूर्ण शब्द हैं। उपनिवेशक शक्तियों ने जिन भी देशों पर राज किया वहां से पुरा महत्व की अनेक वस्तुओं को वे लूट के रूप में अपने देश लेकर आए। उस दौर की संपदाओं पर हक जमाना अलग बात है और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा लगाकर शोर मचाना नितांत दूसरी बात है। अब ऐसा मामला अगर कोहिनूर से जुड़ हुआ हो तो मामला और भी पेचीदा हो जाता है। सुप्रीम न्यायालय का कहना है कि कोहिनूर वापसी के केस की सुनवाई इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इससे ब्रिटेन पर दबाव बनेगा। लेकिन केंद्र सरकार ने सुप्रीम न्यायालय में कहा है कि कोहिनूर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (पूर्वी भारत जनसमूह) को दिया गया उपहार था। लेकिन सरकार का ये बयान ऐतिहासिक तथ्यों से विपरीत है। सभी जानते हैं कि ब्रिटिश-सिख युद्ध-1849 के बाद अंग्रज इसे युद्ध की लूट के रूप में लेकर गए थे। लेकिन अंग्रेजों ने लाहौर की संधि कराई और पंजाब के नाबालिग राजा दिलीप सिंह को ब्रिटेन लेकर गए। वहां उन्होंने दिलीप सिंह के हाथों ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया को कोहिनूर बतौरा नजराना दिलवाया। ऐसे में इस समूचे प्रकरण में एक और पेंच हैं सुप्रीम न्यायालय जिसमें में भले ही केस पर सुनवाई चल रही है लेकिन व्यवहारिक रूप से देखा जाए तो ये मसला दोनों देशों के बीच कूटनीति का अधिक है।

ब्रिटेन: -देखा जाए तो वर्ष 1970 की संयुक्त राष्ट्र संधि भी है जिसके तहत पुरा व सांस्कृतिक निधियों के अवैध आयात-निर्यात पर प्रतिबंध लगता है लेकिन एक और समस्या है कि इसे युद्ध में लूटे गए सामान पर लागू नहीं किया जा सकता है। कोहिनूर का मामला भी इसी के तहत आता है। ब्रिटेन के लॉर्ड एल्गिन 18वीं शताब्दी में तुर्की से पार्थेनियन मार्बलस (संगमरमर) को लेकर आए थे एल्गिन का तर्क था कि तुर्क इस धरोहर की समुचित रूप से देखरेख नहीं कर रहे थे। ये संगमरमर आज भी ब्रिटिश संग्रहालय में रखे हुए हैं। वर्ष 2014 में चर्चित वकील अमाल क्लूनी और जैफ्री रॉबर्टसन ने चेताया था कि यदि ब्रिटेन इन संगमरमर को नहीं लौटाता है तो वे इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (अंतरराष्ट्रीय न्यायालय) का दरवाजा खटखटाएंगे। लेकिन अब तक उनकी ओर से ऐसी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई है।

वापसी: - कोहिनूर को वापस लाकर गुलाबी रंग में पुन: तराशा जाए। कोहिनूर वापसी के नारे को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़कर मुद्दे को पेश किए जाने के अपने फायदे और नुकसान हैं लेकिन मौजूदा कानून और अंतरराष्ट्रीय अभिसमयों पर नजर डालें तो कोहिनूर वापसी का शोर इसकी असल वापसी को शायद ही सुनिश्चित कर पाएगा।

प्रांत: - हीरे निम्न प्रांतों में विद्यमान हैं -

  • रूस- यहां 2014 में 39 मिलियन कैरेट हीरे निकाले गए है और 608 मिलियन कैरेट का भंडार हैं।
  • बोत्सवाना- यहां पर सात विश्व प्रसिद्ध हीरे की खानें हैं। उपलब्धता में दूसरे नंबर पर हैं।
  • कांगो- वर्ष 2014 में रफ डायमंड का अव्वल निर्यातक है यहां विश्व का 20.5 प्रतिशत उत्पादन हैं।
  • ऑस्ट्रेलिया- अरगाइल खान से सालाना 12 मिलियन कैरेट हीरे का उत्पादन होता है।
  • द. अफ्रीका- गुलाबी-नीले हीरे की विश्व प्रसिद्ध खानें है। बड़ी हीरा कंपनियों ऑफिस (जनसमूहो का कार्यालय) है।

दावा: - निम्न प्रांतों ने दावे किये हैं-

  • पाकिस्तान- पंजाब की विरासत बताया है, वकील जाफरी ने 786 खत लिखे।
  • बांग्लादेश- उप महादव्ीप की साझा विरासत व संस्कृति के हवाले से दावा किया है।
  • द. अफ्रीका- इस हीरे को अपनी खान से निकाला हुआ बता कर दावा पेश किया।
  • ईरान-अफगानिस्तान- कोहिनूर ने अपनी यात्रा के दौरान प्रस्तुत देशों में पड़ाव डाला। इसी आधार पर ये दोनों देश हक जता रहे हैं।

पांच प्रमुख हीरे: - जो निम्न हैं-

  • सरजियो हीरा- यह हीरा 3167 कैरेट का है, यह हीरा ब्राजील से है, इसकी कीमत 400 मिलियन डॉलर है। इसकी विशेष बात यह है कि यह कार्बोनेडो हीरा है। कुछ वैज्ञानिक इसे यूरेनस-नेप्चयून का टुकड़ा बताते हैं। ये पृथ्वी के किसी भी हीरे से अधिक कठोर क्षमता वाला है।
  • कलिनन हीरा- यह हीरा 3106 कैरेट का है, यह हीरा दक्षिण अफ्रीका से आया है, कीमत 395 मिलियन (सहस्राब्दी) डॉलर हैं। इसकी विशेष बात यह है कि दक्षिण अफ्रीका की प्रीमियर (प्रमुख) खान से उत्खनित इस बड़े रफ हीरे को बाद में कई अन्य छोटे हीरों में तराशा गया है। इनमें से कलिनन-1 ब्रिटिश शाही ताज में हैं।
  • लेसडी हीरा-यह हीरा 1111 कैरेट का है, यह हीरा करोवी की खान, बोत्सवाना में हैं, इसकी कीमत 60 मिलियन (सहस्राब्दी) डॉलर (अमेरिका की प्रचलित मुद्रा) हैं, इसकी विशेष बात यह है कि नवंबर 2015 में उत्खनन हुआ है। इस हीरे का टेनिस बॉल का आकार है। पृथ्वी में उत्खनित दूसरा सबसे बड़ा हीरा हैं।
  • एक्सेलसियर हीरा- यह हीरा 995 कैरेट का हैं, यह हीरा दक्षिण अफ्रीका में हैं इसकी कीमत 26 लाख डॉलर (अमेरिका की प्रचलित मुद्रा) हैं। इसकी विशेष बात यह है कि यह नीली व सफेद आभा में हैं। बाद में इसे 10 अन्य हीरों में तराश दिया गया।
  • सिएरा स्टार हीरा- यह हीरा 968 कैरेट का हैं, यह हीरा अफ्रीका देश सिएरा लियॉन में हैं, इसकी कीमत 25 लाख डॉलर (अमेरिका की प्रचलित मुद्रा) हैं, इसकी विशेष बात यह है कि यह शुद्धता में सबसे अच्छा हैं। बाद में 17 अन्य हीरों में तराशा गया है।

रिपोर्ट मनोज रोहिल्ला

लाहौर: -अब पाक ने भी कह दिया है कि बेशकीमती हीरा कोहिनूर ब्रिटेन से वापस नहीं ला सकते है। पंजाब सूबे की सरकार ने लाहौर उच्च न्यायालय में दलील दी है। कि महाराजा रणजीत सिहं ने 1849 में ईस्ट इंडिया कंपनी (पूर्वी भारत जनसमूह) के साथ समझौते के तहत कोहिनूर ब्रिटेन को दिया था। इसलिए इसे वापस नहीं लाया जा सकता है। भारत में भी इस हीरे को ब्रिटेन से लाने की मांग चल रही है। बैरिस्टी जावेद इकबाल जाफरी की याचिका पर सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय में सरकार ने यह दलील दी है।

धरोहर: -कोहिनूर वापसी का मामना तो सुर्खियां बटोर रहा हैं, लेकिन इस शोर के पीछे देश की उन पुरा वस्तुओं को वापस लाने की कवायद थम गई है, जिन धरोहरों को चोरी- छिपे तस्करी कर समंदर पार भेजा गया था। विदेशी नीलामीघरों में इनकी ऊंचे दामों पर बेधड़क बिक्री होती है। भारत हमेशा से ऐतिहासिक वस्तुओं का बड़ा बाजार रहा है। विदेशी नीलामीघर जैसे क्रिस्टी और सोथेबी में भारतीय पुरा वस्तुओं की भरमार रहती हैं। सवाल उठता है किएंटीक्युटीज एंड आर्ट ट्रेजर्स एक्ट, 1972 जिसमें पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) को पुरासपंत्तियों संबंधी समस्त अधिकार प्रदान किए गए हैं।

एएसआई: - के पास गैरकानूनी तौर पर विदेशों में भेजी गई भारतीय पुरा संपत्तियों को वापस लाने की जिम्मेदारी है। लेकिन बानगी इसके विपरीत है। कथित आर्ट डीलर (कला प्रदर्शनी) इन कड़े कानूनों’ को धता बताकर रास्ता निकाल ही लेते हैं। इन पूरे खेल में नौकराशाही कागजी कवायद में ही सिमटी रहती है। एक्ट (संसद दव्ारा पारित कानून/अधिनियम) के अनुच्छेद 2 (1) (ए) के अनुसार कोई भी वस्तु जिसका ऐतिहासिक महत्व है और 100 अथवा इससे अधिक वर्ष पुरानी है उनका एएसआई के पास पंजीकरण कराना जरूरी होता है। ऐसे में यदि किसी के पास कोई पारिवारिक वस्तु 200 से अधिक वर्ष पुरानी है तो उसका ऐतिहासिक महत्व का आंकलन किस प्रकार होगा। मंदिरों में स्थापित ऐतिहासिक मूर्तियां भी इसी श्रेणी में आती हैं।

अन्य देश: -यहां तक कि इराक में सैन्य कार्रवाई के दौरान अमरीकी सैनिकों ने हाथ साफ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। कई सैनिक बगदाद स्थित संग्रहालय से मैसोपोटामिया युगीन कई बहुमूल्य वसतुए चोरी कर ले गए थे। ये वस्तुएं अमरीकी ब्लैक मार्केट (काला बाजार) में धड़ल्ले से बेची गई। नाजियों ने भी दव्तीय विश्व युद्ध के दौरान विभिन्न देशों में पुरा संपदाओं की लूट की। जर्मनी ने वर्ष 2009 में ऐसी संपदाओं की वापसी के लिए कानून भी बनाया लेकिन आज तक कोई भी पूरा संपदा की वापसी नहीं की गई है। अब भारत में कुछ संगठनों की ओर से भी कोहिनूर की वापसी की मांग की जा रही है।

कपूर: -कानून की खामियों का फायदा सुभाष चंद्र कपूर जैसे लोग उठाते हैं। न्यूयॉर्क के मैनहेटन इलाके में आर्ट गैलरी (कला प्रदर्शनी) चलाने वाले कपूर ने बरसों तक कानून को फायदा उठाकर अपने धंधे से चांदी बनाई। स्मगलिंग (तस्करी/चोरी) से कपूर ने भारतीय पुरा संपदाओं को जमा कर विदेशी बाजारों में ऊंचे दामों पर बेचा है। कपूर अपने कर्मचारियों के जरिये भारत में पुरा संपदाओं की चोरी करवाता था। बाद में इन पुरा संपदाओं को वह विदेशों में मंगवाता और फिर ऊंचे दामों पर म्यूजियम (संग्रहालय) और आर्ट गैलरी (कला प्रदर्शनी) को बेचता था। देश से ऐतिहासिक पुरा संपदाओं की बेतादाद लूट के बाद आखिरकार कपूर को गिरफ्तार किया जा सका। कपूर अपने बचाव के लिए म्यूजियम (संग्रहालय) और कला प्रदर्शनी को ऐसी पुरा संपदा ’दान’ भी करता था। इस ’दान’ को पकड़ने में लाचार कानून आड़े आता था। एक्ट (कानून) के अनुच्छेद 14 के अनुसार पुरा संपदा की चोरी को प्रमाणित भी करना पड़ता है। वैसे देश के भीतर किसी भी व्यक्ति को पुरा संपदा के परिवहन के लिए जिला कलेक्टर (जिलाधीश) और विदेश में परिवहन के लिए कस्टम महानिदेश की अनुमति लेनी पड़ती है। लेकिन इस कानून की आड़ में ओर भी कई अंडरग्राउंड रैकेट (भूमि के भीतर के भाग का कोलाहल) पनप गए हैं।

अन्य धरोहर: - निम्न हैं-

सुल्तानागंज बुद्ध-बिहार के भागलपुर में वर्ष 1861 मेे रेलवे ट्रेक की खुदाई में मिली है। यह डेढ़ हजार साल पुरानी है। अभी इंग्लैंड के बर्मिघम म्यूजियम (संग्रहालय) में है।

अमरावती रेलिंग-अमरावती से निकाले गए रेलिंग के 70 टुकड़े 1859 में ब्रिटेन ले जाए गए। अभी लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम (संग्रहालय) में इन्हें प्रदर्शित किया गया है।

शाहजहां का प्याला- सफेद आभा वाले हरिताश्म पत्थर से बना। 1857 की क्रांति के बाद हथियाया गया था। कई यूरोप देशों से होकर अभी विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम (संग्रहालय) लंदन में है।

स्वर्ण सिंहासन- महाराजा रणजीत सिंह के इस स्वर्ण सिंहासन को अग्रेंज युद्ध में ले गए। अभी लंदन के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम (संग्रहालय) में हैं।

टीपू का टाईगर (चीता) - इस यात्रिक खिलौने में बाघ दव्ारा ब्रिटिश सैनिक को दबोचते हुए दिखाया गया है। अभी ये लंदन के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम (संग्रहालय) में प्रदर्शित है।

पत्र: - पिछले वर्ष केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने मौजूदा कानूनों को और भी असरदार बनाने के लिए कानून मंत्रालय के सचिव को पत्र लिखा था। पत्र में कानून को धारदार बनाने के लिए प्रस्ताव मांगे गए थे। लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं की जा सकी है।

उपसंहार: -प्रस्तुत सब बातों से यह तो साफ जाहिर है सभी देश अपने-अपने हिसाब से कोहिनूर को प्राप्त करना चाहते है पर ऐसा अभी संभव नहीं हैं। खास बात तो यह है हीरा जो एक अमूल्य व बेशकीमती धरोहर है वह अभी सही रूप से सलामत है इसी बात से हर देश को संतोष रखना चाहिए।

- Published/Last Modified on: May 13, 2016