अमेरिका में होने वाला राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार (President Election US 2016 Candidates Essay in Hindi) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: -दुनिया के सबसे ताकतवर देश का रुतबा हासिल करने वाले अमरीका के महामहिम पद की उम्मीदवारी के लिए ’जंग’छिड़ी हुई हैं। प्रमुख दल रिपब्लिकन के टिकट के लिए दावेदार डोनाल्ड ट्रंप और डेमोक्रेट्‌स की ओर से हिलेरी क्लिंटन एडी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। दोनों अपने देशवासियों को सपने दिखा रहे हैं और वादे भी कर रहे हैं। आखिरकार अमरीका को भी अच्छे दिनों की उम्मीद है। नायक खोजे जा रहे हैं। बदलते वैश्विक परिदृश्य में हमारे भी हित अमरीका से जुड़े हैं। वहां की सियासी हलचल हम पर भी असर डालती है, मुकाबला दिलचस्प हैं।

ट्रंप: - रिपब्लिकन के टिकट की उम्मीदवारी में अब अकेले दावेदार डोनाल्ड ट्रंप ने अमरीकी राष्ट्रवाद की विचारधारा को बुलंद किया है। मुस्लिमों और प्रवासियों के बारे में अपने कथित ’संकुचित’ विचारों के कारण ट्रंप को एक ओर जहां आलोचना भी झेलनी पड़ रही है वहीं दूसरी ओर उनके समर्थकों व प्रशंसकों की भी तादाद काफी है और ये बढ़ भी रही हैं। दावेदार डोनाल्ड ट्रंप को 1134 गणतंत्र डेलीगेट्‌स का समर्थन हासिल हैं। 1237 पार्टी का टिकट पाने के लिए रिपब्लिकन डेलीगेट्‌स की जरूरत होती हैं।

डेमोक्रेट उम्मीदवार बनी सैंडर्स के नाम अमरीका की मशहूर आइसक्रीम बैन एंड जैरी का एक स्वाद भी है। वे अमरीकी प्रतिनिधि सभा का सबसे अधिक समय प्रतिनिधित्व करने वाले स्वतंत्र उम्मीदवार भी हैं।

ट्रंप के किस्से: - निम्न हैं-

शराब खुद नहीं पीते थे बैचते थे- रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड निजी जीवन में शराब -सिगरेट नहीं पीते हैं, लेकिन उन्होंने ’ट्रंप वोदका’ अमरीका बाजार में उतारी। ट्रंप चुनाव में अकेले ऐसे उम्मीदवार हैं। जिनके नाम पर बोर्ड गेम ट्रंप है। घाटे के कारण इसे बाद में बंद कर दिया।

हाथ मिलाने से परहेज- अरबपति डोनाल्ड ट्रंप को लोगों से हाथ मिलाने से भी परहेज है। उनका इस बारे में तर्क है कि इससे कीटाणु फेलते हैं। तीन बार शादी कर चुके ट्रंप के महिलाओं के बारे में भी कई विवादस्पद बयान है।

मैगायॉट ’ ट्रंप प्रिंसेस’- तडक-भड़क वाली जिदंगी जीने वाले ट्रंप के पास 281 फीट लंबी मैगायॉट (लक्जरी नौका) ट्रंप राजकुमारी भी थी। 2.9 करोड़ डॉलर में खरीदी यॉट ट्रंप ने बाद 4 करोड़ डॉलर में बेची थी।

विवरण, साहिल भल्ला

मेरे प्रशासन का मूलमंत्र अमरीका होगा। कोई भी अमरीकी नागरिक अपने को कभी भी दूसरे दर्जे का नहीं समझेगा। मेरा सपना अमरीका फिर महानता के पथ पर आगे बढ़ता जाए।

डोनाल्ड ट्रंप

हिलेरी: -हिलेरी क्लिंटन ने वर्ष 2008 में अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए भाग्य आजमाया था, लेकिन बुराक ओबामा के सामने उनकी चमक फीकी पड़ गई हालांकि, ओबामा ने उन्हें अपनी सरकार के पहले कार्यकाल में विदेश मंत्री बनाया था। इस बार अमरीका की पहली महिला राष्ट्रपति बनने का सपना संजाये हिलेरी सियासी मैदान में दांव लगाए हुए है। दावेदार हिलेरी क्लिंटन को 2240 डेमोक्रेट्‌स डेलीगेट्‌स का समर्थन हासिल है। 2383 पार्टी का टिकट पाने के लिए डेमोक्रेट्‌स डेलीगेट्‌स की जरूरत होती है।

महाविद्यालय की पढ़ाई पूरी करने के बाद हिलेरी ने डेनाली राष्ट्रीय उद्यान में बर्तन साफ करने का काम किया। वैल्डेज शहर में उन्होंने मछली साफ करने का काम मिला। लेकिन उन्होंने खराब मछली पैक करने से मना किया तो नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

हिलेरी के किस्से: - निम्न हैं-

एल्बम को दी है आवाज- डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को ज्यादातर लोग पूर्व विदेश मंत्री, सीनेटर या पूर्व पहली महिला के रूप में ही जानते हैं, उन्हें वर्ष 1997 में ऑडियो एल्बम ’इट टेकस अ विलेज’ के लिए ग्रैमी अवार्ड मिला था।

नासा ने नकारा था- हिलेरी क्लिंटन का बचपन से ही सपना था कि अंतरिक्ष के अनंत की खोज करना। नासा में आवेदन किया लेकिन नासा ने जवाब दिया धन्यवाद लेकिन हम अपने संगठन में महिलाओं की भर्ती नहीं करते हैं।

विवरण, साहिल भल्ला

अमरीका को हर दिन एक चैंपियन की जरूरत होती है और मैं वो चैंनियन बनना चाहिती हूं। मेरा लक्ष्य है कि अमरीका के सपने को पूरा करना। इसके लिए मैं कोई भी कसर बाकी नहीं रखूंगी।

हिलेरी क्लिंटन

चुनाव प्रकिया: -निम्न हैं-

  • दो साल से तैयारी- उम्मीदवार पहले चंदा जमा करने व जनता का रुख भांपने को समिति बनाते हैं। ये चुनाव से दो साल पहले शुरू हो जाता है। दो प्रमुख पार्टियां ही दावेवार उतारती है।
  • डेलीगेट्‌स पर दारोमदार- चुनाव प्रक्रिया प्रमुख अथवा राज्य कॉकस से शुरू होती है। डेलीगेट्‌स (पार्टी प्रतिनिधि) का चुनाव होता हैं। निश्चित संख्या में डेलीगेट्‌स जरूरी होता है।
  • फिर पार्टी कवेंनशन (दल सम्मेलन) - प्रमुख में चुने गए पार्टी प्रतिनिध दूसरे दौर में दल सम्मेलन में हिस्सा लेते हैं। कवेंनशन में ये प्रतिनिधि पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का चुनाव करते हैं।
  • 270 मत जरूरी- मतदाता संबंधी चुनते हैं। 538 का इल्क्टेाेरल महाविद्यालय राष्ट्रपति चुनता हैं। जीत के लिए 270 मत जरूरी है।

विवरण, निशांत सक्सेना

रवैया: - भारत के प्रति रवैया खट्‌टा मीठा निम्न पूर्व व वर्तमान विदेशी राष्ट्रपतियों का रहा हैं। जो निम्न हैं-

  • जॉन एफ कैनेडी- 1961 - 63: साम्यवादी सोवियत संघ से मुकाबले में भारत को रणनीतिक साझेदार मानते थे। 1962 के चीन युद्ध में भारत को मदद दी थी।
  • रिचर्ड निकसन- 1969 - 74: भारत विरोधी रवैया रहा है। 1971 के युद्ध में पाक की मदद के लिए सातवां बेड़ा भेजा है। 1974 के परमाणु परीक्षण का विरोध भी किया हैं।
  • जिमी कार्टर- 1977 - 81: सोवियत विरोधी जपा सरकार के दौरान भारत से संबंधों में सुधार हुआ है। कार्टर भारत दौरे पर आए। भारत को एटमी मटेरियल सप्लाई (माल को आगे पहुंचाना) रोका।
  • बिल क्लिंटन- 1993 - 2001: पोकरण परमाणु परीक्षण का विरोध, भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। वर्ष 2000 में भारत आए, तकनीक के क्षेत्र में करार हुआ।
  • जॉर्ज बुश- 2001 - 2009: ’दुनिया को भारत की जरूरत है’ कहने वाले बुश के दौर में कई करार हुए। वर्ष 2000 का एटमी करार अहम रहा है।
  • बराक ओबामा- 2009-अब तक: वर्ष 2010 में भारत दौरा किया। यूएन सुरक्षा परिषद में भारतीय दावे का समर्थन हुआ। लेकिन भारतीय उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे।

असर: - हार-जीत का उम्मीवारों पर भी असर होगा।

रिपब्लिकन जीते तो-

  • फायदे: निम्न पर होगी नजर- पाकिस्तान: पाकिस्तान के परमाणु जखीरे पर आशंका जताई। भारत को कश्मीर पर समर्थन मिल सकता है। आर्थिक: चीन से अमरीका को होने वाले आयातित सामान पर 45 प्रतिशत कर लगाने की घोषणा से हमें फायदा होगा। निवेश: ट्रंप का आर्थिक साम्राज्य भारत में भी होगा। पूणे-मुंबई में रियल एस्टेट में निवेश होगा। बाकी शहरों पर नजर।
  • नुकसान : ये है सबसे बड़ी आशंका- वीजा: एच-1 बी वीजा के बारे में विरोधाभासी बयानों से पेशवरों को अमरीका जाने में परेशानियां हो सकती हैं।

मेरा मानना है कि भारत में बहुत अच्छा काम हो रहा है विशेषकर आर्थिक क्षेत्र में लेकिन इस बात की अधिक चर्चा नहीं की जाती है।

डोनाल्ड ट्रंप

डेमोक्रेट्‌स जीते तो

फायदे- निम्न पर होगी नजर

  • पाकिस्तान: डेमोक्रेट्‌स पाक केखिलाफ परंपरागत रूप से भारतीय पक्ष के साथ में रहे हैं।
  • आर्थिक: भारतीय कंपनियों को ओबामा के शासनकाल के दौरान अमरीका में काफी सुविधाएं मिली है।
  • निवेश: डेमोक्रेट्‌स का वादा है कि भारत में निवेश के और अवसर तलाशे जाएंगे। इसके लिए सहयोग बढ़ेगा।

नुकसान-यह है सबसे बड़ी आशंका

  • ढुलमुल रवैया: डेमोक्रेट्‌स राष्ट्रपति अक्सर व्यवहार रूप में भारत के प्रति ढुलमुल रवैया अपनाते रहे हैं।

भारत के साथ आर्थिक सहयोग से दोनों देशों को आपसी फायदा मिला है। समाज से बाहर जैसे मुद्दों पर भारतीय चिंताओं का हम सर्वमान्य हल निकालेंगे।

अन्य फायदे: -भारत के ट्रंप या हेलरी दोनों से अन्य फायदे भी हैं- दक्षिण एशिया 90 के दशक तक अमरीका के लिए राजनीतिक राडार पर एक बिंदू के समान था। डेमाक्रेट राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के दौर में भारत को पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चे पर काफी कटु अनुभवों का सामना करना पड़ा था।

  • हिलेरी क्लिंटन से फायदा-लेकिन वर्ष 2012 में बतौर अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री एसएम कृष्णा का पुरजोर समर्थन कर अमरीका की आतंकवाद के मुद्दे पर भर्त्सना की थीं।

हिलेरी के विदेश मंत्री रहते हुए अमरीका की ओर से पाकिस्तान को हथियारों की बड़ी खेप मुहैया नहीं कराई गई थी। आतंकवाद के खिलाफ भारत की मुहिम को हिलेरी ने मुंबई के होटल ताज में रहकर प्रतीकात्मक समर्थन दिया था। इन सभी हालिया तथ्यों सेें संकेत हैं कि हिलेरी यदि राष्ट्रपति पद के लिए चुनी जाती हैं तो वो भारत के साथ रिश्तों की मजबूती का प्रयास करेगी। हाल ही में उन्होंने साक्षात्कार में कहा था कि पाक को लादेन के छिपने के ठिकानें के बारे में पता था। हिलेरी ने भारत के साथ व्यापार को भी बढ़ाने का संकल्प लिया है। वे भारत को ’अपरिहार्य साझेदार’ मानती हैं। हिलेरी के पद संभालने से पाकिस्तान कम से कम सैद्धांतिक रूप से अलग-अलग पड़ जाएगा। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन मामले में भी हिलेरी ने भारतीय पक्ष का समर्थन किया है।

  • ट्रंप से फायदा- ट्रंप की बात करें तो उन्होंने लादेन को पकड़ने में अमरीकी कार्यर्ताओं की मदद करने वाले शकील अफरीदी की रिहाई की हिमायत की है। हालांकि, ट्रंप को अपने इस बयान के कारण पाकिस्तानी पक्ष का विरोध भी सहना पड़ा। लेकिन ट्रंप यहीं नहीं रुके, उन्होंने पाकिस्तान को वैश्विक समस्या तक करार दिया है। उनका मानना है कि आतंकवाद के प्रति पाकिस्तान दोगला रवैया अपनाता है। ट्रंप ने पाकिस्तान के परमाणु जखीरे पर भी आशंका जताई है। उनका कहना है कि पाकिस्तान पर अंकुश लगाने में भारत आने वाले समय में अमरीका का सबसे बड़ा सहयोगी साबित होगा। रिपबिल्कन टिकट के दोवदार डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ व्यापार समझौता में और तेजी लाने का आह्यान किया है। ट्रंप ने अपने चुनाव अभियान के दौरान आउटसोर्सिंग, वाजी और प्रवास संबंधी अधिकारों को लेकर नकारात्मक बयानबाजियां जरूर की हैं, लेकिन ये मत बटोरने की कवायद ज्यादा प्रतीत होती हैं।

अमेरिका: - ट्रंप का उभरना अमरीकी नौकरीपेशा वर्ग की हताशा जाहिर करता है। नौकरियां गंवाने वाले और वैश्वीकारण से अमरीका को नुकसान की धारणा वाले उनके साथ हैं। टुंकु वरद्धराजन, फेलो, हुवर इंस्ट्रीट्‌यूट (र्स्टनफोर्ड) व पूर्व संपादक न्यूजीवीक अंतराष्ट्रीय, न्यूयॉक से ग्राउंड विवरण

अमरीकी राष्ट्रपति पद की दौड़ पर अमरीका और दुनिया का नजरिया, दोनों अहम उम्मीदवारों की कवायद और भविष्य में भारत-यूएस संबंध के बारे में न्यूयॉर्क से पत्रिका के मनीष भरद्धाज को वरद्धराजन ने बताई ग्राउंड विवरण…. .

1 मनीष के प्रश्न- मौजूदा राष्ट्रपति चुनाव अमरीकियों और दुनिया के नजरिए से पिछले चुनावों से किन मायनों में अलग हैं?

वरद्धराजन के उत्तर: -’छोटा चुनाव’ यानी प्राइमरीज (प्राथमिक) के जरिए अपना-अपना दल का राष्ट्रपति पद का दावेदार चुना जाता है। अब तक प्रेसिडेंशियल (अध्यक्ष) प्राथमिक में काफी विरोध और असंतोष दिखाई दिया है। वॉशिंगटन के प्रति बड़ी हताशा का भाव उभरा है। अमरीकी मंदी और नैराश्य में डूबे दिखाई दे रहे हैं। दुनिया के लिए यह समझना मुश्किल है कि रिपब्लिकन पार्टी कैसे एक भड़काऊ और अनुभवहीन व्यक्ति (ट्रंप) को राष्ट्रपति का दावेदार बनाने वाली है। अभी दुनिया की निगाहें सबसे ज्यादा इसी बात पर टिकी हैं। हालांकि सच तो यह है कि खुद रिपब्लिकन पार्टी को भी यह ठीक से समझ नहीं आ रहा है।

2 मनीष के प्रश्न- अमरीकी मतदाताओं को दोनों संभावित उम्मीदवारों-हिलेरी क्लिंटन -ट्रंप से क्या उम्मीदें हैं? व्हाइट हाउस के लिए ज्यादा मुफीद कौन रहेगा?

वरद्धराजन के उत्तर- ट्रंप उन अमरीकियों की आवाज बनकर उभरे हैं, तो यथास्थिति (बिजनेस एज़ यूशूअल) से तंग आ चुके हैं। ये लोग मानते हैं कि अमरीका दुनिया की रक्षा की कीमत चुका रहा है। दुनियाभर की वस्तुएं खरीद रहा है और बदले में उसे कुछ नहीं हासिल हो रहा है। ऐसे तबके के लिए ट्रंप उम्मीद की किरण बनकर उभरे हैं। हिलेरी को ट्रंप के मुकाबले कम पसंद किया जा रहा है। उनके लिए लोगों में ज्यादा जोश नहीं है। उनके साथ जो अमरीकी हैं, वे सिर्फ दल सिंबल की वजह से हैं। और उनमें यूएस को आखिरकार एक महिला राष्ट्रपति मिलने का ही भाव है। व्हाइट हाउस में हिलेरी से बहुत अप्रत्याशित अपेक्षाएं नहीं हैं। विदेश मंत्री रह चुकी हैं। अमरीकी उनके बारे में बहुत कुछ जानते हैं। इसे उलट ट्रंप की नीतियों से लोग अनजान हैं। अभी तक अमरीकी प्राइमरी चुनाव में उनकी वाक्‌पटुता से ही रू-ब-रू हुए हैं।

3 मनीष के प्रश्न- ट्रंप के राष्ट्रीय फलक पर उभरने की बड़ी वजह क्या हैं?

वरद्धराजन के उत्तर- ट्रंप का उभरना अमरीकी नौकरीपेशा वर्ग की हताशा जाहिर करता है। वो लोग उनके साथ हैं, जिन्होंने नौकरियां गंवाई हैं, उस वैश्वीकरण के विरोधी उनके साथ हैं, जिसने अमरीकी उद्योग को खोखला कर दिया। वे लोग उनके साथ खड़े हैं, जो 21वीं सदी की स्पर्धा में बने रहने के लिए जरूरी कौशल और शिक्षा नहीं पा सके।

4 मनीष के प्रश्न- भारत-अमरीकी रिश्तों के लिए कौन बेहतर होगा? भारतीय महत्वाकांक्षाओं को कौन पूरी कर सकता है? हिलेरी या ट्रंप?

वरद्धराजन के उत्तर- हिलेरी ने भारत के साथ नजदीकी से काम किया है। ट्रंप तो नुकसान ही करेंगे। ट्रंप फ्री ट्रेड के खिलाफ हैं। जो कि भारत के हित में नहीं होगा। प्रवासियों पर कड़ा रुख है वह भी भारत के लिए अहितकर होगा। हिलेरी दुनिया की तस्वीर देखती हैं, वहीं ट्रंप अमरीका की विकृत तस्वीर देख रहे हैं।

5 मनीष के प्रश्न -एशियाई समुदाय में किसकी ज्यादा पकड़ है? क्या अल्पसंख्यक ट्रंप के खिलाफ रहेंगे?

वरद्धराजन के उत्तर- ट्रंप ने अश्वेतों और लातिनों को अपने खिलाफ कर लिया है तो वे तो किसी भी हाल में उन्हें मत नहीं करेंगे। और एशियाई समुदाय को भी वे ज्यादा नहीं लुभा पाएंगे। उनकी अधिकांश अपील केवल नौकरीपेशा अमरीकी श्वेतों में है और इस मतबैंक को पाने के लिए उनके शब्दों के आडंबर ने अन्य समुदायों (रेस) को दुश्मन बना दिया है।

6 मनीष के प्रश्न - ट्रंप जीत जाते हैं तो उनकी मुस्लिम विरोधी छवि वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में आड़े आएगी?

वरद्धराजन के उत्तर- नि: संदेह। पर मुस्लिम विरोधी नीति लागू करना उनके लिए बहुत ही मुश्किल काम होगा। अमरीकी सुप्रीम न्यायालय इसे खारिज करते हुए संभावित तौर पर असंवैधानिक करार दे देगा।

7 मनीष के प्रश्न -मौजूदा अमरीकी अर्थव्यस्था की स्थिति को बेहतर ढंग से कौन संभाव पाएगा?

वरद्धराजन के उत्तर -इस मोर्चे पर दोनों से ही ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं। हिलेरी क्लिंटन बतौर प्रशासक करों और सरकारी खर्च में बढ़ोतरी करेंगी और संगठनों के काबू में रहेंगी। ट्रंप तो ट्रेड के मसलों में भयानक साबित होंगे। वे अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं करने वाले है। इसलिए अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर तो दोनों ही अरुचिकर लग रहे हैं।

भारत-अमरीका: -अमरीका के सबंध वर्तमान में नई ऊंचाइयों पर हैं। ओबामा का दूसरा कार्यकाल खत्म होने को है। अमरीका में नए राष्ट्रपति के चुनाव की सरगर्मियां हैं। दावेदारी के लिए ट्रंप व हिलेरी में हैं। अमरीका में भारतीय दूतावास में कार्यरत रहे पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल से अमरीकी चुनाव, उम्मीदवारों, नतीजों पर भारतीय नजरिये और वर्तमान सियासी परिदृश्य पर बातचीत के मुख्य अंश

1 भारत के प्रश्न -वर्तमान अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव को आप कैसे देखते हैं?

कंवल सिब्बल के उत्तर- मेरा मानना है कि ये चुनाव काफी कुछ तमाशे के समान हैं। विकास में प्राथमिक को ही लें तो हकीकत में ये दोयम दर्जे के उम्मीदवारों को ही सामने ला पाई है। इस प्रक्रिया में हम देखते हैं बेलगाम बयानबाजी, कीचड़ उछालने की कोशिशें, झूठे वादे और पैसे की बर्बादी। अमरीका में बढ़ती आर्थिक विषमता का नतीजा है बर्नी सेंडर्स जैसे उम्मीदवारों का उदय।

2 भारत के प्रश्न -ट्रंप की संभावित जीत का भारत पर क्या असर होगा?

कंवल सिब्बल के उत्तर -अव्वल तो ट्रंप जीतने वाले नहीं हैं। और यदि वे जीतते भी हैं तो उन्हें अमरीकी हितों के लिए भारत जैसे देशों के साथ संतुलित रवैया अपनाना होगा। अभी ट्रंप पर कोई जिम्मेदारी नहीं है इसलिए वे मत बटोरने और लोकप्रियता के लिए बयानबाजियां कर रहे हैं। जीत के बाद उनकी प्राथमिकता चीन होगा, भारत गौण विषय है।

3 भारत के प्रश्न- क्या ट्रंप नाटो और मध्य एशिया संबंधी बयानों पर गंभीर हैं?

कंवल सिब्बल के उत्तर- नहीं ये उनकी ओर से केवल बयानबाजियां भर हैं। नाटो कायम रहेगा। ये यूरोप में अमरीकी दखल का माध्यम है। मध्य एशिया से सेनाएं वापस बुलाने तथा अमरीका के आंतरिक मामलों में ध्यान केंद्रित करने का ट्रंप का रवैया अमरीका को वैश्विक शक्ति से क्षेत्रीय बना देगा। इससे ट्रंप भ्रम फैला रहे हैं। वे ऐसा कर नहीं पाएंगे।

4 भारत के प्रश्न- हिलेरी की जीत से भारत-यूएस रिश्तों पर क्या असर होगा?

कंवल सिब्बल के उत्तर- हिलेरी की जीत से भारत-अमरीका संबंधों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा। सकारात्मक और नकारात्मक रवैया बरकरार रहेगा। आपसी हितों के चलते हमारे संबंधों में काफी हद तक स्थायित्व पहले से ही है। दोनों देश ही आपस में सबंधों की व्याख्या करेंगे।

5 भारत के प्रश्न- क्या ओबामा के बाद भी रिश्तों में गरमाहट कायम रहेगी?

कंवल सिब्बल के उत्तर- ये सही है कि प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों से अमरीका से रिश्तों में काफी सकरात्मक सुधार आ गया है। मोदी जून में अमरीकी कांग्रेस को संबोधित करेंगे। लेकिन ओबामा की पाक, अफगान और चीन नीतियों से भारत को कोई फायदा नहीं हुआ। ओबामा के बाद भी भारत -अमरीका संबंधों में बेहतरी रहेगा कुछ मतभेदों के साथ।

6 भारत के प्रश्न -भारतीय परिदृश्य में ओबामा काल की क्या उपलब्धियों रही?

कंवल सिब्बल के उत्तर- यूपीए-2 के बाद भारत-अमरीका संबंधें में आए ठहराव मोदी जी ने काफी हद तक बदल डाला है। उन्होंने अमरीकी यात्राओं से समूचे परिदृश्य को बदला है। ओबामा की गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में भारत यात्रा काफी सकारात्मक रही है। आई सेक्टर में सहयोग, जलवायु परिवर्तन, न्यूक्लियर लाइबिलिटी बिल और आतंकवाद विरोधी अभियान में आपसी सहयोग बहुत उपलब्धियों रहीं है।

7 भारत के प्रश्न- पाकिस्तान के प्रति अमरीकी नीति में क्या बदलाव आएगा?

कंवल सिब्बल के उत्तर- अमरीका में नए राष्ट्रपति के बाद भी पाकिस्तान के प्रति उनकी नीति में कोई बदलाव नहीं आएगा। पाकिस्तान के प्रति बयानबाजी के बावजूद वो अमरीका के लिए भौगोलिक और राजनीतिक रूप से अहम ही रहेगा। अमरीका अब तक अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को अहम नहीं मानता है। अमरीका यहां चीन और पाकिस्तान को ही भारत के मुकाबले में ज्यादा अहमियत देता है। चाबार रूट के ऑपरेशल हो जाने के बाद शायद स्थिति में बदलाव हो।

उपसंहार: -हिलेरी अथवा ट्रंप वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए लगता है कि भारत के लिए दोनों उम्मीदवारों से फायदे की स्थिति है, वहीं हमारे पड़ोसी पाकिस्तान के लिए आने वाले दिनों में दिक्कतें पेश आ सकती हैं। बिना प्रशासनिक अनुभव वाले करोड़पति ट्रंप या पहली महिला राष्ट्रपति का सपना सजोए हिलेरी कौन मारेगा बाजी? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

- Published/Last Modified on: June 21, 2016