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भारत के प्रधानमंत्री के विदेशी दौरे (Prime Minister’s Foreign Tour) [ Current News (Concise) - ]

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प्रस्तावना:- भारी जनादेश मिलने के बाद प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह चुनना आसान नहीं था कि शुरुआत कहां से करें? देश के भीतर से या विदेश से करें, पर उन्होंने बड़ी चतुराई से यह आकलन किया कि विदेशी में तो लोकतांत्रिक ढंग से चुने हुए नेता का सम्मान स्वाभाविक रूप से होगा जबकि देश के भीतर मिली लोकप्रियता के बावजूद उनके विरोधी आलोचना करना जारी रखेंगे। वे जानते थे कि जैसे ही देश के बाहर उनकी छवि बदलेगी, देश में स्वत: ही बदलाव आ जाएगा। यही रणनीति उन्होंने अपनाई। जानकार मानते हैं कि मोदी ने जिस तरह से विश्व में खुद को स्थापित करने और भारत का दुनिया में कद बढ़ाने की रणनीति अपनाकर जो जलवा दिखाया है, वैसा ही घर में भी दिखाना होगा।

अमरीकी यात्रा:-

अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र का, जब भारतीय प्रधानमंत्री मोदी 08 जून 2016 को अमरीकी यात्रा के दौरान सत्र को संबोधित कर रहे थे। तब सत्र के चारों ओर तालियां बज रही थीं। मोदी जी प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले दो वर्ष में यह अमरीका की उनकी चौथी यात्रा थी। 45 मिनिट के इस मंत्रमुग्ध कर देने वाले संबोधन के बाद कांग्रेस के कुछ सदस्य मोदी का ऑटोग्राफ (हस्ताक्षर) लेते हुए भी नजर आए। यह दृश्य 2005 के बिलकुल विपरीत था, जब पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इसी अमरीकी कांग्रेस में अंग्रेजी में लिखा हुआ बेजान भाषण पढ़ा था, जिसे केवल वे ही पढ़-सुन रहे थे। पर मोदी ने इसी अंग्रेजी भाषा में ऐसा प्रभाव वाला भाषण दिया, जिसमें कहा जाता है कि वे उतने सहज नहीं हैं। यह विरोधाभास मात्र इतना ही नहीं है। उस समय मनमोहन सिंह अमरीकी सरकार की आंख का तारा थे, जो कि मोदी से नफरत करती थी।

नफरत मोहब्बत:-

प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद मोदी ने अमरीका की अपने खिलाफ नफरत को मोहब्बत में तब्दील कर दिया। मोदी के भाषण पर टीवी चैलन सीएनएन ने टिप्पणी की ’मोदी ने अमरीका के साथ अपने और भारत के आश्चर्यजनक रूप से प्रगाढ़ होते संबंधों पर संबोधन दिया और हमारे विधि निर्माता उन्हें सराह रहे थे।’ मोदी के कभी समर्थक नहीं रहे वॉस्ट्रीट जर्नल ने भी सीएनएन की ही तरह लिखा ’अमरीकी सांसदों दव्ारा नेता का गर्मजोशी से स्वागत’ यह वही अमरीकी कांग्रेस है, जिसने कभी अपने बनाए कानून से इन्हीं मोदी को अमरीका में प्रवेश से रोक दिया था। सीएनएन ने सांसदों के बीच मोदी के चुटीले वक्तव्य का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि ’भारत में ऐसा होता हैं।’ सामान्यत: हमारे बृद्धिजीवी कहेंगे ’देखो अमरीकी सीनेट कितनी अच्छी तरह कार्य करती है और हम कितने खराब हैं’ उन्होंने अमरीकी सांसदो से कहा ’आपकी कांग्रेस हमारी राज्यसभा जैसी है।’

विदेशी मंत्री:-

लंदन में जब करीब 70 हजार लोगों की भीड़ को मोदी ने संबांधित किया तो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमयन ने भी उन्हें इस ग्रह का सर्वाधिक लोकप्रिय व्यक्ति बताया था। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने उन्हें सम्मानीय राजनेता कहा, तो ऑस्ट्रलियाई प्रधानमंत्री टोनी अबॉट ने भारत को मोदी ने नेतृत्व में एशिया की उभरती हुई लोकतांत्रिक शक्ति बताया। संचार माध्यम की जानी मानी हस्ती रूपर्ट मडॉक ने उन्हें स्वतंत्र भारत में अब तक का श्रेष्ठ नीतियों वाला राजनेता बताया हैं।

रणनीतिकार:-

न्यूयॉर्क टाइम्स (समय) के अनुसार जिस तरह की घनिष्ठता मोदी व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच है, उसने कई लोगों को बैचेन किया हुआ हैं। उन्होंने अमरीका में अपने और भारत के आलोचको का मुंह बंद कर दिया है। सीएनएन के अनुसार मोदी ने बड़ी चतुराई से अमरीकी यात्रा से पहले सारे मुद्दों को बौना कर दिया हैं। विश्व ख्याति की मोदी की यह कोशिश अब भारत के लिए सामरिक निधि बन चुकी हैं और यह आकस्मिक नहीं हैं। यह दल मोदी की भलीभांति सोची समझी रणनीति का नतीजा हैं। भारत में चाणक्य, शिवाजी और गांधी जैसे राजनीतिज्ञों के बाद मोदी नए मुख्य राजनीतिज्ञ रणनीतिकार के तौर पर उभरे हैं। सधे हुए रणनीतिकार के रूप में मोदी आगे बढ़े। पहले मोदी जी ने दुनिया के अन्य देशों का दिल जीता। उन्होंने बाहर बना दी गई अपनी गलत दवि को साफ कर खुद को स्थापित किया।

विदेशी दौरे:-

करीब एक दशक तक मोदी को गैर-धर्मनिरपेक्ष और यहां तक कि हिटलर का हिंदू रूप भी कहा गया है। मोदी ने यह भलीभांति समझ लिया था कि वह जनादेश को तब तक सत्ता की सफलता में नही बदल सकेंगे जब तक कि संसद में बहुमत के अलावा लोगों का विश्वास न जीते लें। भारत विरोधी गुटों ने भारत और भारत के बाहर मोदी के खिलाफ खूबी जहर उगला था, वे जानते थे कि जैसे ही देश के बाहर उनकी छवि बदलेगी, देश में स्वत बदलाव आ जाएगा। उन्होंने योजनाबद्ध ढंग से विदेशी दौरे किए। दो साल में 98 दिन में 37 देशों के दौरे किए। जिस अमरीका में कभी उनका जाना प्रतिबंधित था, आज वे वहां के रॉकस्टार (चट्‌टान जैसे तारे) के रूप में उभरे है।

प्रभाव जमाना:- अमरीकी सीनेट दव्ारा मोदी का जबरदस्त स्वागतम पिछले दो साल की मोदी कीे कड़ी मेहनत का नतीजा है, जिसके माध्यम से वे न केवल अमरीकी बल्कि विश्व को प्रभावित करने में लगेे हुए हैंं। प्रमुख प्रभाव निम्न हैं-

  • पहला, भारत में ही मोदी विरोधी और विदेश में उन विरोधियों के साझेदारों को दरकिनार कर शांत करना, जिन्होंने मोदी की छवि खराब की थी और इस कारण से सत्ता के लिए जरूरी उच्चस्तरीय बेदाग प्रशासनिक छवि हासिल करना जरूरी था।
  • दूसरा स्वयं को साबित करना एवं देश कद व अर्थव्यवस्था का स्तर उठाने में विश्व को साथ लेकर चलना। इन सबके लिए मोदी ने जितने प्रयास किए निश्चित रूप से वे सफलता के रूप में सामने आए हैं।

आज मोदी दुनिया के बड़े नेता हैं। उन्होंने भारत को विश्व के उन देशों के करीब लाकर खड़ा किया है जो मिसाइल और परमाणुशक्ति के मामले में अग्रणी माने जाते हैं। अब से पहले भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के इतने नजदीक नहीं था। हमारी स्थिति और प्रभाव चीन के समकक्ष हो गए हैं। अब भारत ने पाकिस्तान को चीन का मुंह देखने को मजबूर कर दिया है।

विदेश:-

यहां एक बात गौर करने लायक है कि उन्होंने पश्चिम से पहले पड़ोसी देशों की यात्राएं की। मोदी की रणनीति को सबसे पहले रेखांकित करते हुए वॉलस्ट्रीट जर्नल ने 13 मई 2015 को लिखा ’मोदी के पहले साल में उनकी विदेशी दौरों में व्यस्तता एक प्रमुख बात रही।’ उन्होंने 18 देशों का दौरा किया। 52 दिन बाहर गुजारे।’ मोदी की बराक ओबामा, एजेंला मर्केल जैसे शीर्ष नेताओं के साथ मिलें। भारत में यह संदेश गया कि मोदी एक विश्व नेता हैं और भारत को एक वैश्विक ताकत के रूप में उभार रहे हैं। इस टिप्पणी के बाद मोदी तीन बार अमरीका समेंत 20 बार विदेश गए।

लोकप्रियता:-

यह सच है कि मोदी ने भारत में उनके खिलाफ चल रहे घृणा अभियान को कमजोर करने के लिए विश्व में खुद को स्थापित करने और भारत का दुनिया में कद बढ़ाने की रणनीति अपनाई। उन्होंने इस रणनीति को अपने शपथग्रहण समारोह से पहले उजागर भी कर दिया था जब उन्होंने सार्क देशों के प्रमुखों को समारोह में आमंत्रित किया। बाद में वे भले अमरीका गए हों या ऑस्ट्रलिया, इंग्लैंड या मध्यपूर्व, वहां भारत की तरह ही लोग उनके कार्यक्रम में गए। सभी देशों ने यह अहसास किया कि विदेश में रह रहे भारतीयों के मन में भी मोदी की जबरदस्त लोकप्रियता हैं। मोदी को यह भलीभांति मालूम है कि लोकतंत्र में किसी नेता का असली परीक्षा लोगों में उसकी लोकप्रियता ही होती हैंं।

विदेश नीति:-

मोदी की हाल ही अमरीका समेत अन्य देशों की यात्रा की उपब्धियों को और खास तौर से अमरीका की संसद में दिए गए उनके संबोधन के बाद देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे मोदी जी की यह यात्रा विशेष तौर पर सफल रही हो। हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री जब-जब अमरीका गए हैं। और वहां की संसद को संबोधित किया है उनको भी ठीक ऐसा ही सम्मान मिला है। भले ही वे राजीव गांधी हों, नरसिम्हाराव हो, या फिर अटलबिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह हो। हां इतना जरूर है कि अमरीका से संबंधों को लेकर इन पूर्व प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में जो प्रयास किए गए उनमें मजबूती का दौर जरूर हुआ है। लेकिन यह कहना कतई उचित नहीं होगा कि भारत को प्रधानमंत्री की इन यात्राओं से वह सब कुछ मिल गया जो पहले नहीं मिला हो। एक बात जरूर है कि अमरीका का आतंकवाद को लेकर दृष्टिकोण में यह बदलाव इसलिए नहीं आया है कि हमारे प्रधानमंत्री की चार यात्राओं ने दबाव बनाने का काम किया है। हकीकत तो यह है कि अमरीका अब आतंकवाद को लेकर इसलिए बदलाव करने लगा है क्योंकि वह खुद आतंकवाद का शिकार हुआ हैं। लेकिन यह देखने में आ रहा है कि अमरीका ने पाक के संबंध में अपनी नीतियों में ऐसा बदलाव नहीं किया है जिसकी भारत को अमेरिका से अपेक्षा थी।

छवि:-

कोई भी राष्ट्रध्यक्ष किसी अन्य देश में जाता है तो यह अपेक्षा जरूर होती है कि वह अपनी यात्रा वाले देश में अपने देश के हितों की पैरवी जरूर करेगा। अमरीकी वीजा के मामले में हम अभी कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं कर पाए हैं। जबकि अमरीका ने जो चाहा, भारत की ओर से उसको पूरा सहयोग किया गया है। विदेश नीति में यह एकतरफा संवाद नहीं चलता हैं। यह बात सही है कि प्रधानमंत्री का दृष्टिकोण यह रहा है कि अमरीका हमारा मित्र बने। मित्रता कायम हो, इससे हमें कोई शिकायत भी नहीं। पर वैश्विक मंत्र पर इससे ऐसा संदेश नहीं जाना चाहिए कि हम अमरीका के ’अलायंस’ (शत्रु) बन रहे हैं। इससे विश्वभर में हमारी विपरीत छवि बन सकती हैं। विदेश नीति के मोर्चे पर इस बात का ध्यान रखने की जरूरत है।

                                                                                                                           सलमान खुर्शीद, पूर्व विदेश मंत्री

कूटनीति का लोहा:-

आर्थिक विकास के मामले में विकसित देशों को पीछे छोड़कर दुनिया को हैरत में डालने वाली मोदी सरकार का डंका अब कूटनीति के क्षेत्र में बोल रहा है। अपनी 5 देशों की यात्रा में मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण तंत्र (एमटीसीआर) में भारत के प्रवेश का रास्ता साफ कराने और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता हासिल होने की कई बड़ी बाधाओं को पार करना प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति और कूटनीति की, बड़ी सफलता है। उनकी अमरीका यात्रा का असर ही तो रहा है कि उनके स्वदेश लौटने से पूर्व ही पाकिस्तान को अमरीका से आतंकवाद पर कड़ी चेतावनी का सामना करना पड़ा। अमरीका ने प्रधानमंत्री की अपने यहां की यात्रा को न सिर्फ ऐतिहासिक बताया बल्कि भारत-अमरीका संबंधों पर उनके दृष्टिकोण को ’मोदी सिद्धांत’ का नाम दिया है। अमरीका के अनुसार इस सिद्धांत ने न सिर्फ इतिहास की हिचकिचाहट को दूर किया है बल्कि यह दुनिया के लिए कल्याण के लिए भी काम कर रहा है। मगर अपने यहां, उनके विरोधी अब भी इस यात्रा की उपलब्धियों को नजरअंदाज कर सियासी बाजी खड़ी करने में जुटे हैं। इस यात्रा के दौरान अमरीका, स्विट्‌जरलैंड और मेक्सिको ने परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्या के लिए भारत का पुरजोर समर्थन किया है। साथ ही भारत ने (एमटीसीआर) में शामिल होने की सभी बाधाएं भी पार कर लीं। इस यात्रा का ऐतिहासिक क्षण उस समय आया जब प्रधानमंत्री ने अमेरीकी संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित किया। उनका भाषण सुनकर अमरीकी सांसद मंत्रमुग्ध हो गए थे। कूटनीतिक मोर्चे के साथ ही आर्थिक मोर्चे पर भी मोदी सरकार की नीतियों का लोहा दुनिया ने माना है।

वित्तीय वर्ष:-

वैश्विक मंदी थपेड़े, लगातार दो साल सूखे की मार और सुधारों की राह में विपक्ष के अड़ंगे के बावजूद मोदी सरकार की सुशासन और विकास केंद्रित नीतियों के परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2015-16 की अंतिम तिमाही (जनवरी-मार्च) में 7.9 प्रतिशत विकास दर हासिल की हैं। चौथी तिमाही में उच्च विकास दर के फलस्वरूप पूरे वित्त वर्ष 2015-16 के दौरान भारत की विकास दर 7.6 प्रतिशत रही हैं जो न सिर्फ बीते पांच वर्ष में सर्वाधिक है बल्कि अमरीका, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, रूस और चीन जेसे देशों की आर्थिक वृद्धि दर काफी आगे है।

पाक:-

इस बात को जोर-शोर से कहा जा रहा है कि हमारे प्रधानमंत्री की अमरीका यात्रा के तत्काल बाद अमरीका ने पाकिस्तान को चेता दिया कि वह आतंकवाद को आश्रय देना बंद करें। सवाल यह हैं कि इससे क्या होगा? क्या सचमुच पाकिस्तान ने ऐसा करना बंद कर दिया हैं? क्या इससे हेडली भ्ाारत को मिल गया है? बातें और उनके नतीजों में कथनी और करनी का अंतर साफ दिखता है।

विनिर्माण क्षेत्र:-

वास्तव में देश का यह विकास दर मोदी सरकार की ’सबका साथ, सबका विकास’ नीति का परिणाम है। ’मेक इन इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों से विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर दहाई का अंक छू रही है। मोदी सरकार ने दो वर्षो में रक्षा और बीमा सहित विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति को उदार बनाया है। वहीं व्यवसाय शुरू करने की प्रक्रिया आसान बनाई गईं वस्तु एवं सेवा कर विधेयक भले ही कांग्रेस के विरोध के चलते राज्यसभा में अटका पड़ा हो पर दिवालियेपन पर नए कानुन सहित कई सुधार लागू किए हैं। इन सब उपायों का ही नतीजा है कि घरेलू और विदेशी निवेशकों को रुख भारतीय अर्थव्यवस्था की ओर मुड़ा है। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के कुशासन के चलते विनिर्माण क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ जिससे युवाओं को रोजगार के लिए भटकना पड़ता था।

उपसंहार:- हमारे प्रधानमंत्री जी दुनिया भर के देशों की यात्रा कर रहे हैं और उनको करना भी चाहिए। लेकिन हमारे देश में विदेश-नीति के जानकार लोगों की राय लेकर व विपक्ष को विश्वास में रखकर जाएं तो बेहतर नतीजें निकल सकते हैं। वे अपनी यात्राओं में ऐसे मसलों को रखें जिसे पूरे देश का समर्थन हासिल हो। अन्यथा ऐसी यात्राओं से खास नतीजों की उम्मीद करना व्यर्थ है। पर काफी हद तक मोदी जी की इन विदेशी यात्राओं से फायदा यह हुआ है कि देश प्रगति की ओर बढ़ रहा हैं। इस बात को हम नजरअदांज नहीं कर सकते हैं।

अत: सारांश के रूप में इन विदेशी यात्रा से कुछ नुकसान है तो कुछ फायदे भी हैं।

- Published on: August 17, 2016