भारत रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की सेवा निवृति(Governor of the RBI Raghuram Retirement - in Hindi)

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प्रस्तावना: - भारत रिजर्व बैंक के चर्चित गवर्नर रघुराम राजन इस साल तीसरा कार्यकाल 4 सितंबर 2016 में गवर्नर के पद से पूर्णतया सेवानिवृत्त हो जाएंगे। अर्थात राजन का तीन साल का कार्य चार सितम्बर को समाप्त हो जाएगा। पिछले दिनों उनकी कार्यशैली को लेकर पक्ष-विपक्ष में बयानों का दौर जम कर चला। चर्चा इस बात की रही कि क्या उनका कार्यकाल बढ़ाया जाना चाहिए? सरकार के कामकाज को लेकर राजन के बेबाक बयानों ने भी इस मुद्दे को खूब गर्माया और उन पर भी आरोपों की झड़ी सी लग गई। इससे पहले इस पद को लेकर कभी भी इतनी चर्चा नहीं होती थी। सवाल यह है कि क्या यह पद वाकई अचानक इतना अधिक खास हो गया? या फिर रघुराम राजन ने अपने कामकाज के तौर-तरीकों से इस पद की भूमिका को और बढ़ा दिया है। आखिर क्या रही उनकी नीतियां? भारतीय अर्थव्यवस्था यदि तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है तो इसका श्रेय राजन को मिले या फिर किसी और को? ये नीतियां आगे भी जारी रह पाएंगी अथवा नहीं। यह बाते आगे आने वाले समय में पता चल पाऐंगी।

प्रस्ताव: -

  • दूसरी ओर प्रदेश में राजन की जगह नए नामों को लेकर फिलहाल अटकलें ही जारी हैं। गौरतलब है कि राजन का कार्यकाल दिसंबर 2015 में पूरा हो गया था। इसके बाद सरकार ने उन्हें 3 - 3 माह के दो प्रस्ताव दिए। दूसरा प्रस्ताव 30 जून को समाप्त हो गया है। अब नियमों के अनुसार राजन को ओर प्रस्ताव नहीं दिया जा सकता है। लगातार दो बार प्रस्ताव ले चुके मुख्य सचिव सीएस राजन अब भले ही दूसरा कार्यकाल 30 जून को सेवानिवृत हो गये लेकिन राज्य सरकार उन्हें अब भी अपने साथ ही रखना चाहती है। तभी तो सेवानिवृत्ति के बाद राजन को नया पद सौंपने की तैयारी हो गई है।

स्थापना: -

  • भारतीय रिजर्व बैंक (जहाँ रुपयों का लेने-देन होता हैं) की स्थापना भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के प्रावधानों के अनुसार 1 अप्रेल, 1935 को हुई थी। रिजर्व बैंक का केंद्रीय कार्यालय प्रारंभ में कोलकत्ता में स्थापित किया गया था जिसे 1937 में स्थायी रूप से मुंबई में स्थानांतरति किया गया है। केंद्रीय कार्यालय वह कार्यालय है जहां गवर्नर बैठते हैं और नीतियां निर्धारित की जाती हैं।
  • जानना रोचक होगा कि रिजर्व बैंक की स्थापना अंग्रेजो ने एक निजी बैंक के रूप में की थी। बाद में, आजादी से पहले ही, इसका राष्ट्रीयकरण हुआ। अब तो रिजर्व बैंक की ’होली ट्रिनिटी’ के रूप में तीन स्पष्ट जिम्मेदारियां बताई गई हैं। कीमते स्थिर रहे, वित्तीय स्थिति दृढ़ रहे और कर्ज नियंत्रण में रहे।

केंद्रीय बोर्ड (मंडल): -

  • रिजर्व बैंक का कामकाज केंद्रीय निदेशक मंडल द्वारा शासित होता हैं। भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम के अनुसार भारत सरकार इस मंडल को नियुक्त करती है जो चार वर्ष के लिए होता है। इनमें सरकारी निदेशक, पूर्णकालिक गवर्नर और अधिकतम चार उप गवर्नर, गैर सरकारी निदेशकों में सरकार द्वारा नामिक विभिन्न क्षेत्रों से दस निदेशक और दो सरकारी अधिकरी व चार अन्य निदेशक (चार स्थानीय मंडलों से प्रत्येक से एक) होते हैं।

रिर्जव बैंक के कार्य निम्न हैं-

  • मौद्रिक प्राधिकारी: - रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (भारत का रिजर्व बैंक) देश की मौद्रिक नीति तैयार करता है। आरबीआई इस नीति का कियान्वयन और उसकी निगरानी करता है। मौद्रिक नीति का मकसद मूल्य स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ उत्पादक क्षेत्रों को पर्याप्त ऋण उपलब्धता को सुनिश्चित करना होता है।
  • विदेशी मुद्रा प्रबंधक: - आरबीआई विदेशी मुद्रा प्रबंधक अधिनियम, 1999 के प्रावधानों के तहत विदेशी मुद्रा का प्रबंध भी करता है। इसका उद्देश्य विदेश व्यापार और भुगतान को सुविधाजनक बनाना और भारत में विदेशी मुद्रा बाजार का कम्रिक विकास करना और उसे बनाए रखना है।
  • वित्तीय प्रणाली का विनियामक: - बैंकिंग परिचालन के लिए विस्तृत मानदंड निर्धारित करने का रिजर्व बैंक का अहम काम है। इसके अंतर्गत वह देश की बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली का काम करता है। बैंकिंग परिचालन मानदंडो के पीछे सबसे बड़ी बात बैंकिंग प्रणाली करना और आम जनता को सस्ती और सुलभ बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराना भी देश के रिजर्व बैंक का काम है।
  • मुद्रा जारीकर्ता: - भारतीय रिजर्व बैंक देश की मुद्रा (करेंसी) जारी करने का कार्य करता है और उसका विनिमय भी करता है। परिचालन के योग्य नहीं करने पर मुद्रा और सिक्कों को नष्ट करता है। ऐसा वह आम जनता को अच्छी गुणवत्ता वाले करेंसी नोटों और सिक्कों को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने के लिए करता है।
  • विकासात्मक भूमिका: - राष्ट्रीय उद्देश्यों की सहायता के लिए व्यापक सतर पर प्रोत्साहनात्मक कार्य भी करता है। सरकार के बैंकर के रूप में केंद्र और राज्य सरकारों के लिए व्यापारिक बैंक की भूमिका अदा करता है। उनके बैंकर का कार्य भी करता है। बैंको के लिए बैंकरों का काम करते हुए सभी अनुसूचित बैंको के बैंक खाते रखता है।

रघुराम राजन: -

  • राजन ने रिजर्व बैंक गवर्नर का पद महत्वपूर्ण बनाने के लिए कुछ अलग से विशेष नहीं किया। दरअसल, यह पद उदारीकरण के दौर से ही वित्तीय क्षेत्र में अधिक महत्वपूर्ण हो गया था। हम यह भी जानते है कि रिजर्व बैंक के ज्यादातर पूर्व गवर्नर नौकरशाही के अनुसार ही रहे है। इससे उलट रघुराम राजन अकादमिक क्षेत्र से आते हैं यही कारण रहा, वे सरकार की अधिक परवाह किए बिना अपने बयान खुलकर देते रहे है। ऐसा करने से ही उन पर चर्चाएं अधिक हुई और उन्होंने मीडिया (संचार माध्यम) की ओर अपना ध्यान खींचा।

हस्ती: -

  • रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में रघुराम राजन कोई साधारण हस्ती नहीं हैं। वे इससे पहले शिकागो विश्वविद्यालय में पढ़ा चुके हैं। हालांकि उन पर सेवा निवृत्ति के बाद आईएमएफ या विश्व बैंक में पद तलाशने जैसे आरोप लगाए गए सुब्रमण्यम सवामी खुद भी अर्थशास्त्री हैं और वे राजनेता भी हैं। उन्होंने राजन पर आरोप लगाए तो उनके उद्देश्य के बारे में वे ही जानते हैं लेकिन जिस तरह के व्यक्ति राजन हैं, उनके बारे में यह कहा जा सकता है कि वे विश्व बैंक या आईएमएफ में पद के लालची नहीं होगे। बल्कि प्रस्तुत संस्था ही उनकी सेवाएं लेने को लालची हैं।

गवर्नर का पद: -

  • भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर का पद हमेशा से ही महत्वपूर्ण रहा है। जब से भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई और दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं का सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ने लगा तो यह पद और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया। दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की उथल-पुथल के मद्देनजर आरबीआई गवर्नर को कई महत्वपूर्ण कदम उठाने पड़ते हैं। इसके अलावा आरबीआई देश में संचालित निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंको पर अंकुश रखने का भी काम करता है।
  • आमतौर के रिजर्व बैंक के गवर्नर बहुत ही कम बोलते हैं। ऐसा समझा जाता है कि यह पद सीएजी या चुनाव आयुक्त जैसे पदों की तरह की शुष्क पद हैं। सीएजी का पद साल में एक बार होता है तो चुनाव आयुक्त का पद जब चुनाव हों, तब भी सक्रिय और महत्वपूर्ण नजर आता है। इसके अलावा उनके कामकाज को लेकर मीडिया (संचार माध्यम) और आम जनता की रूचि कम ही रहती है। लेकिन, रिजर्व बैंक गवर्नर का पद ऐसा है कि उसे दुनिया के अर्थतंत्र की हर खबर रखनी होती है। जो भी फेसले दुनिया की अर्थव्यस्था में लिये जा रहे होते हैं, उनके अनुसार अपनी अर्थव्यवस्था के लिए कदम उठाते हैं। ऐसे में उनके हर कार्य पर अब दुनिया की निगाह रहती है। उदाहरण के तौर पर यदि अमरीका का फेडरल रिजर्व में ब्याज दर में 0.5 फीसदी की कमी या बढ़ोतरी का निर्णय करता है तो उसका असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इस फेसले के असर के मुताबिक रिजर्व बैंक गवर्नर को अपनी रणनीति तैयार करनी पड़ती है। वह उसी तरह की मौद्रिक नीति को लेकर फेसले करते हैं। मौद्रिक नीति हर तीसरे महीने घोषित की जाती है। यह नीति आरबीआई गवर्नर ही जारी करते हैं। इसलिए वे मीडिया से साल में कम से कम चार बार तो रूबरू होते ही हैं।

नियुक्ति: -

  • ऐसे में दुनिया की अर्थव्यवस्था को अच्छी समझ रखने वाला और सारी परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए मौद्रिक नीति तैयार कर सकने वाले को ही रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया जाता है। प्रो. वी. एस. व्यास दो बार रिजर्व बैंक केंद्रीय बोर्ड (मंडल) में रहे हैं और पूर्व आरबीआई गवर्नर वाईपी रेड्‌डी और सी. रंगराजन के साथ उन्होंने काम किया है। केंद्रीय मंडल के सदस्य के तौर पर हमारा काम रिजर्व बैंक के गवर्नर को परामर्श देना रहा है। आरबीआई गवर्नर सभी परामर्शों पर ध्यान देते हैं। लेकिन फेसलों के लिए वे ही जिम्मेदार होते हैं। उनका फैसला ही आरबीआई का फैसला कहा जाता है। आरबीआई गवर्नर की नियुक्ति वित्तमंत्री के परामर्श और प्रधानमंत्री के माध्यम से होती है। इस आधार पर ऐसा समझा जाता है कि रिजर्व बैंक भारत सरकार के अधीन काम करता है जबकि वस्तुस्थिति यह है कि यह स्वायत्त संस्था है।

व्यवहार: -

  • काम के प्रति व्यावहारिक रवैये के कारण मोदी सत्ता में आए या हो सकता है कि उन्होंने ऐसी छवि निर्मित की हो। किन्तु इसके विपरीत उनकी छवि दिखाने वाले कई किस्म के उदाहरणों में रघुराम राजन सबसे पहले दिमाग में आते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के पास चौंकाने वाली अकादिमक उपलब्धियों के साथ बेहतरीन आर्थिक दूरदृष्टि भी है। उन्होंने 2008 की आर्थिक मंदी को पहले ही देख लिया था और विश्व बाजार में उथल-पुथल भरे दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिरता भी प्रदान की है।

परिचय: -

  • दुनिया में आर्थिक उथल-पुथल मची है, जो यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर जाने से और बढ़ी है। ऐसे समय में मोदी को निवेशकों का भरोसा बनाए रखने और अर्थव्यवस्था को स्थिरता देने के लिए अपने आस-पास सर्वश्रेष्ठ लोगों को बनाए रखना चाहिए। जब मोदी अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्हें मालूम होना चाहिए कि 2005 में जब ये निवेशक आर्थिक उछाल में मदमस्त थे, तो राजन ने ही उन्हें जमीनी हकीकत से परिचय करवाया था।

अभिषेक राखेजा उम्र: 19 एडिनबरा विश्वविद्यालय, यूके

अर्थतंत्र और आरबीआई: - पूर्व मेंं हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया के अन्य देशों के साथ उतनी नहीं जुड़ी हुई थी जितनी कि अब है। उदाहरण के तौर पर इन दिनों वैश्विक अर्थतंत्र संकट के दौर से गुजर रहा है। चारो तरफ मंदी की स्थिति है। जापान, जैसी सुदृढ़ अर्थव्यवस्था वाले देश भी पीछे हटने लगे हैं। ऐसे में अब बेहद जरूरी हो गया है कि हम दुनिया के देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर बारीकी से निगाह रखें। किसी भी देश में हो रहे आर्थिक परिवर्तन का असर हमारी अर्थवयवस्था पर पड़ता है।

बॉस: (प्रबंधक) - रिजर्व बैंक गवर्नर आमतौर पर बहुत अधिक चर्चा में नहीं आते है। वे मौद्रिक नीति घोषण के समय या फिर अन्य किसी बड़े फेसले के समय ही चर्चा में रहते है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि ज्यादातर अर्थशास्त्री वित्तमंत्री को ही अपना प्रबंधक मानकर चलते रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादातर रिजर्व बैंक गवर्नर वित्त मंत्रालय के अधिकरी रहे और उनका प्रबंधक वित्तमंत्री ही रहा है। उनकी नियुक्ति में उसका परामर्श बेहद महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में वे भले ही वे स्वायत्त संस्था के प्रमुख ही क्यों न हों, उनके मस्तिष्क में उनका बॉस तो केंद्र सरकार का वित्त मंत्री ही रहा है। वे उसके संपर्क में रहते हुए उनसे सलाह करते हुए कार्य करते रहे हैं।

इतिहास: - निम्न हैं-

  • चिंतामणि देशमुख भारतीय रिजर्व बैंक के पहले भारतीय गवर्नर थे। वे अगस्त 1943 से जून 1949 तक गवर्नर रहे।
  • सबसे अधिक समय तक रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. बेनेगल रामाराव रहे थे। वे जुलाई 1949 से 14 जनवरी 1957 तक आरबीआई गवर्नर रहे हैं।
  • ए. घोष रिजर्व बैंक के सबसे कम अवधि के लिए गवर्नर रहे। उन्होंने इस पद पर मात्र 15 दिन कार्य किया।

मौद्रिक नीति: -

  • वैसे तो रघुराम राजन भी पहले गवर्नर की तरह ही थे। पर उनका विवादों के बीच कार्यकाल खत्म होना अर्थव्यवस्था के लिए एक झटके की तरह हैं। वैश्विक मंदी के दौर में, ऐसी स्थिति पैदा होना हमारी अर्थव्यवस्था को थोड़ा नुकसान पहुंचा सकती है। देखने में भी आया कि उनके जाने की खबर के बाद शेयर बाजार पर भी असर देखा गया है। अभी समस्या यह है कि जो भी वैश्विक स्तर पर जो भी टिप्पणियां आ रही है वे नकारात्मक हैं। इसका मतलब है कि निवेश पर फर्क पड़ेगा हमें याद रखना चाहिए कि हमारा घरेलू निवेश बढ़ नहीं रहा है, सकल निवेश भी कम है। यही कारण है कि सरकार ने राजन के कार्यकाल खत्म होने की घोषणा के बाद निवेशकों के नकारात्मक भाव को समझते हुए डिफेंस (समर्थन) और एविएशन (विमानचालक) सेक्टर में 100 फसीदी एफडीआई को मंजूरी दे दी।

मॉनेटरी (आर्थिक) पॉलिसी (नीति): -

  • पर सबकी नजरें रहने लगी हैं। रिजर्व बैंक पर फोकस बढ़ा है। वैश्विक मंदी के बाद से केंद्र बैंक की भूमिका ओर भी महत्वपूर्ण हो गई है। राजन ने मुद्रास्फीति पर लगाम लगाने की जो नीति अपनाई वह जारी रहेगी। उन्होंने कीमतें काबू में रखीं थी। क्रेडिट (उधारी चुकाना) रेटिंग (गुणवत्तव श्रेणी) ऊपर आई। राजन की नीतियों का लघुअवधि में असर दिखाई देगा। आगे भी आरबीआई को ब्याज दरों और कीमतों को नियंत्रण में रखना होगा। हालांकि ऐसा कोई बड़ी उपलब्धि राजन के खाते में नहीं है, उन्होंने उसी तरह काम किया, जैसे पहले गवर्नर कर रहे थे। हालांकि वे पूर्व में रहे गवर्नर से थोड़े अलग ज्यादा स्पष्ट बोलते थे।

संस्था: -

  • भारत की पूंजी बाजार में धीमें-धीमें सुधार आया है। वैसे हमारे देश में कोई बड़ा सुधार लघुअवधि में संभव नहीं है। पर राजन ने इन्हें सुधार कर उन्हें बनाए रखा और इस परंपरा को आगे बढ़ाया। एक्सचेंज (बदलती) रेट (कीमत) को नियंत्रण में रखा जिससे हमारे निर्यातकों को मदद मिली। इस दौरान निवेशकों ने निवेश करने में भरोसा भी दिखाया। रिजर्व बैंक का गवर्नर एक संस्था का प्रतिनिधित्व करता है। उससे व्यक्तिगत टकराव नहीं होना चाहिए। आरबीआई स्वायत्त पद होता है। राजन इस स्वायत्तता के तहत ही बातें करते थे। हमारे नेताओं को समझना चाहिए कि गवर्नर सरकारी पदानुक्रम में नहीं आते हैं। सरकार को किसी स्वायत संस्था के दायरे में नहीं बांधना चाहिए। यही एक लोकतंत्र का प्रतीक भी है। जर्मनी, फ्रांस, जापान, इंडोनेशिया और पश्चिमी देशों से केंद्र बैंक का गवर्नर एक बहुत वरिष्ठ पद होता है। उसके प्रति सम्मान रहता है। मौद्रिक नीति और मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखना होता है, वह राजन ने भी किया। भारत में 1990 से आरबीआई गवर्नर का अभिनय अहम हो गया है। अब बदलती अर्थव्यवस्थाओं में रिजर्व बैंक का अभिनय बदल रहा हैं।

अभिनय: - निम्न हैं-

  • आरबीआई और सरकार में विवाद होना दुर्भाग्यपूर्ण है।
  • अर्थव्यवस्था की राह सुगम रखने के लिये ऐसे विवाद नहीं होने चाहिए।
  • राजन स्पष्ट बात करने में विश्वास करते हैं। मुद्दों पर बात करते थे। उन्होंने नए मॉनेटरी (आर्थिक) फ्रेमवर्क (ढाँचा/सामाजिक व्यवस्था) का मकसद रखा था।
  • मौदिक नीति का अभिनय अहम हो रहा है।
  • बदलती अर्थव्यवस्थाओं में रिजर्व बैंक का अभिनय बदल रहा है। एक्सचेंज रेट पॉलिसी (बदलती कीमत नीति और इंटरेस्ट रेट पॉलिसी, (ब्याज कीमत नीति) फिसकल पॉलिसी के साथ-साथ अहम हो गई हैं। इसलिए आरबीआई के सभी गवर्नर इस दिशा में काम कर रहे हैंं। राजन ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया हैं धन बाजार को सुधारने में भी राजन ने अपनी भूमिका निभाई।

कार्यकाल: -

  • रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा कि केंद्रीय बैंक के प्रमुख का कार्यकाल लंबा होना चाहिए। वैश्विक स्तर में जो चलन है उसे भारत में भी अपनाया जाना चाहिए। राजन का तीन साल का कार्यकाल अगले नौ सप्ताह में खत्म हो जाएगा। राजन ने अर्थव्यवस्था और बैंको में एनपीए के विभिन्न आयामों के संबंध में संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति के समक्ष अपनी बात रखी थी। सूत्रों के अनुसार उनसे सदस्यों ने पूछा कि आरबीआई गवर्नर का कार्यकाल कितना होना चाहिए। सूत्रों ने कहा कि आरबीआई गवर्नर का कहना था तीन साल का कार्यकाल थोड़ा है। यह पूछने पर कि क्या यह पांच साल का होना चाहिए, माना जाता है कि राजन ने अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मिसाल दी है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व में निदेश मंडल के सदस्य के अलावा चेयरमैन और उप चेयरमैन का कार्यकाल चार साल का होता है और उन्हें दोबारा नियुक्त किया जा सकता हैं।

बैठक: -

  • उन्होंने हालांकि दूसरे कार्यकाल के लिए मना कर दिया है। सूत्रों ने कहा कि तीन घंटे से अधिक चली बैठक के दौरान गवर्नर राजन ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एम वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली समिति के समक्ष अर्थव्यवस्था की स्थिति, सुधार और आरबीआई के पुनर्गठन व भारत में बैंकिंग क्षेत्र की चुनौतियों तथा आगे के राह के बारे में अपनी बात रखी। सूत्रों के अनुसार राजन ने समिति को एनपीए की समस्या से निपटने के लिए उठाए गए विभिन्न कदमों के बारे में जानकारी दी।

समिति: -

  • ब्याज दर तय करने की नई व्यवस्था को जल्द से जल्द लागू करने के उद्देश्य से वित्त मंत्री अरुण जेटली ने रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन से बातचीत की। जेटली के कार्यालय में बैठक के बाद राजन ने संवाददताओं को बताया कि वित्त मंत्रालय व रिजर्व बैंक के बीच नियमित बातचीत होती रही है। सरकार ने ब्याज दरों में बदलाव के लिए छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) बनाई है। अभी तक ब्याज दर घटाने-बढ़ाने का फैसला रिजर्व बैंक के गवर्नर ही करते रहे हैं। 9 अगस्त को घोषित होने वाली द्धिमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा से पहले एमपीसी का काम पूरा हो जाएगा यह पूछने पर राजन ने कहा कि मेरा मानना है कि फिर भी देखते हैं कि हम कितना आगे बढ़ते हैं। मौजूदा व्यवस्था के तहत गवर्नर को ब्याज दरों में बदलाव को लेकर रिजर्व बैंक समिति की सिफारिशों को मानने या नहीं मानने का अधिकार है।

रीको: -

  • राजस्थान में उनकी भूमिका को देखते हुए सरकार राजन को रीको सभापति और निवेश सलाहाकर जैसा महत्वपूर्ण पद देने जा रही हैै। सूत्रों के अनुसार यह सब 9 जुलाई से पहले हो जाएगा, क्योंकि इस दिन मुख्यमंत्री को रूस दौरे पर जाना है और राजन उनके साथ होंगे। दोनों वहां औद्योगिक निवेश के लिए कारोबार मीट में शामिल होगे। अभी वर्तमान में भी राजन ने मुख्य सचिव के साथ रीको सभापति का पद की जिम्मेदारी भी संभाली हुई है।

एसबीआई का विवरण: -

  • भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की आर्थिक अनुसंधान इकाई ने कहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक एक संस्थान है और गवर्नर रघुराम राजन के जाने से इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। एसबीआई ने कहा कि हमारा मानना है कि कोई संस्थान किसी भी व्यक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। वहीं संस्थान की साख व स्वतंत्रता ज्यादा महत्व रखती हैं।
  • एसबीआई खोज दल का का कहना हैं कि क्या कोई घटना अर्थव्यवस्था और आरबीआई के सकारात्मक और नकारात्मक हो सकती है। संस्थान खेल के तमाम नियम-कायदे तय करता है। खोज दल के विवरण में कहा जाता है कि रिजर्व बैंक दूरदर्शी, प्रगतिशील और स्वतंत्र संस्थान है। इसका अपना एक इतिहास है। राजन ने पहले दोबार गवर्नर पद संभालने के संकेत दिए थे पर स्वामी जी के आलोचनाओं के बाद उन्होंने राज्पाल नहीं बनने का निर्णय लिया। विवरण में कहा गया है कि यह कहना गलत ही राजन के गवर्नर बनने के बाद ही रिजर्व बैंक ने मंहगाई से लड़ने के कदम उठाए है। जबकि महंगाई वर्ष 2008 से रिजर्व बैंक की शत्रु रही है। विवरण में दीर्घावधि में मंहगाई दर पांचवी फीसदी रखने का लक्ष्य तय करने की वकालत भी की गई है, जबकि रिजर्व बैंक ने 4वीं फीसदी का लक्ष्य रखा है।
  • विवरण में यह भी बताया गया हे कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मंहगाई दर खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों के हिसाब से घटती-बढ़ती है। इसको सप्लाई (मांग) बढ़ाकर ही नियंत्रित किया जा सकता है।

मुंबई: -

  • जापानी ब्रोकरेज जनसमूह नोमूरा का मानना है कि रिजर्व बैंक गवर्नर राजन के उत्तराधिकारी के जिन नामों को लेकर अटकलों का दौर जारी है उनमें अधिकांश लोग मुद्रास्फीति के लेकर तटस्थ से लेकर नरम रुख तक रखते हैं। वहीं राजन के बारे में माना जाता रहा है कि वे मुद्रास्फीति को लेकर सख्त रुख अपनाते रहे हैं। नोमूरा के अर्थशास्त्रियों ने इस बारे में एक नोट भी जारी किया। इसमें कहा गया है कि राजन के उत्तराधिकारी की मौद्रिक नीति के बारे में व्यक्तिगत सोच इसकी दिशा भी बदल सकती है। वहीं, सरकार के साथ मौद्रिक नीति संबंधी करार और मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) गठन से राज्यपाल का दबदबा कुछ घटेगा।

उत्तराधिकारी के नाम: -

  • वैसे तो 15 नाम सूची में आए है पर उनमें से कुछ प्रमुख नाम यहां दिये जा रहे हैं। आरबीआई गवर्नर की दौड़ में चार दिग्गज अधिकरियों के नाम सामने आए हैं। जिनमें से एक नाम पर सरकार सहमत हो सकती है। इनमें रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर उर्जित पटेल, दो पूर्व डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन व सुबीर गोकर्ण और देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक की सभापति अरुंधति भट्टाचार्य शामिल है। प्रधानमंत्री कार्याकाल के सूत्रों के अनुसार संसद के मानसून सत्र से पहले गवर्नर पद के लिए नाम की घोषणा कर दी जाएगी। इनके अलावा नोमूरा के अनुसार रिजर्व बैंक गवर्नर के लिए मौजूदा मुख्य आर्थिक सलाहाकर अरविंद सुब्रह्यमण्यन, नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया है। इनके अलावा पूर्व सीएजी विनोद राय, विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु, राजस्व सचिव शक्तिकांत दास, ब्रिक्स बैंक के प्रमुख केवी कामथ, सेबी सभापति यूके सिन्हा शामिल है।

प्रमुख उत्तराधिकरी: -

  • भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर राजन के बाद अब भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्यमण्यम, भाजपा सांसद स्वामी के निशाने पर हैं। यह एक संयोग ही है कि, वे इस पद पर राजन के ही उत्तराधिकारी हैं। लेकिन यह बात उनके पक्ष में जाती है कि उनकी वर्तमान मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ही हुई है। जबकि राजन को गवर्नर मनमोहन सरकार ने बनाया था। यह भी एक संयोग है। कि तीनों का संबंध हार्वर्ड विश्वविद्यालय से है। कहने वाले कह रहे हैं कि, दोनों से स्वामी का कोई पुराना हिसाब होगा लेकिन स्वामी को जानने वाले अच्छी तरह से जानते है कि, यह उनकी फितरत है।

स्वामी: -

  • कभी भी वे किसी पर भी आरोप लगाते रहते हैं, जैसे राजन के मामले में किया इससे पहले और अभी भी ’गांधी परिवार’ उनकी हिट सूची में सबसे ऊपर हैं। मानो आरोप लगाए बिना उन्हे आराम नहीं मिलता है। अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण भी हमारे सामने है। सारा देश उन्हें सम्मान देता है लेकिन स्वामी ने उन्हें भी नहीं छोड़ा। ऐसे-ऐसे व्यक्तिगत आरोप लगाए जिन्हे दोहराना भी उचित नहीं होगा। बीजेपी सांसद सुब्रह्यमण्यम ने कहा कि मई 2014 में बीजपी के सत्ता में आने के बाद राजन कांग्रेस के कार्यकता तौर पर काम कर रहे थे। एसएमई को कारोबार से बाहर कर उन्होंने अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है।
  • फिर सवाल यही उठता है स्वामी जी का महसद क्या हैं। आखिर वे ऐसा क्यों करते हैं। और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है। पहले उन्होंने राजन पर आरोप लगाए तो भारतीय उद्योग जगत सहित देश के वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री ने राजन का साथ दिया। बावजूद इसके स्वामी चुप नहीं हुए और अंतत: राजन को कहना पड़ कि वे दूसरा कार्यकाल नहीं लेंगे। अध्यापन के अपने मूल पेशे में लौट जाएंगे। अब जब स्वामी ने अरविंद को निशाने पर लिया है, तब भी वित्त मंत्री कह रहे हैं कि उन्हें व सरकार को अरविंद पर पूरा भरोसा है। प्रधानमंत्री जरूर अभी इस हमले पर कुछ नहीं बोले हैं लेकिन बकौल वित्त मंत्री के दल अध्यक्ष अमित शाह भी स्वामी के आरोपों से सहमत नहीं है। तब सवाल उठता है कि, स्वामी चुन-चुन कर उन लोगों का निशाना क्यों बना रहे हैं जिनकी काबिलियत पर भारत ही नहीं दुनिया में किसी को कोई शक नहीं है। एक सवाल यह भी उठता है कि भाजपा में नए-नए आए स्वामी को इतनी हिम्मत किसने दी? यदि दल उनसे सहमत नहीं है तो फिर उसे उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाई करनी चाहिए। यदि दल में ऐसी सख्ती नहीं दिखाई दी तो उसे इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि स्वामी का अगला निशाना वित्त मंत्री जेटली और प्रधानमंत्री मोदी भी हो सकते हैं। स्वामी जी ने राजन व अरविंद के अलावा उन्होंने आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास और बिना नाम लिए जेटली पर भी हमला किया था।
  • तब दल क्या करेगा। इस बात पर कोई शक नहीं है कि राजन हो या अरविंद दोनो ही अपने वर्तमान पदों से हटेंगे तो उन्हें पलकों पर बिठाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थाओं की कोई कमी नहीं होगी। इससे पहले कि, वे किसी ओर पर कोई मुसीबत आए, उससे पहले केंद्र सरकार को उनके पंसदीदा व्यक्ति को ही गवर्नर बना देना चाहिए। अन्यथा फिर सरकार को इस बात की विश्वास लेनी चाहिए कि वे या उन जैसा कोई और व्यक्ति महत्वपूर्ण पदों पर किसी ऐसे वयक्ति को फिजुल के आरोपों से जलील नहीं करेगा, जो अपनी ’पदीय गरिमा’ के तहत उन आरोपों का जवाब नहीं दे सकते है। स्वामी को यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके इस व्यवहार से उनके राजनीतिक हित तो सध सकते हैं लेकिन दो अच्छे अर्थशास्त्रियों के देश से बाहर जाने का दाग हमेशा उनके माथे पर रहेगा।

आरोप: -

  • यह स्तब्ध करने वाली बात है कि एनडीए सरकार राजन जैसे बेशकीमती रत्न को भारतीय आर्थिक परिदृश्य से बाहर कैसे जाने दे रही है। भाजपा के डिसेंटर-इन-चीफ (साफ़ बोतल जिसमें शराब सावधानी से डालते हैं उसके मुख्य) डॉ. सुब्रह्यण्यम स्वामी के नेतृत्व में भाजपा के कुछ सदस्यों ने जिस तरह राजन की आलोचना की वह अजीब बात है। डॉ. स्वामी लगातार कहते रहे हैं कि आरबीआई गवर्नर बढ़ती ब्याज दरों की अनदेखी कर रहे हैं। वे खुद अर्थशास्त्री हैं और यह चकराने वाली बात है कि वे मुद्रास्फीति और ब्याज दरों के बीच आदान-प्रदान का अनिवार्य रिश्ता नहीं समझ पाए। राजन ने स्पष्ट कर किया है कि दोनों को समान स्तर पर रहना संभव नहीं हैं। किन्तु भाजपा के लिए शर्मिंदगी की स्थिति प्रधानमंत्री ने पैदा की, जिन्होंने लंबे समय तक चुप्पी बनाए रखी। यह तो पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री से चौंकाने वाली समानता थी। चिंता की बात तो यह है कि चुप्पी पहली बार नहीं थी। उनके खुद के लोग देश के कुछ प्रखर प्रतिभाशाली लोगों को दूर कर रहे हैं। फिर स्वामी आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्यण्यम के पीछे पड़ गए, जो एनडीए द्वारा नियुक्त हस्ती हैं।

प्रतिक्रिया: -

  • रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के खिलाफ स्वामी के हमलों पर प्रधानमंत्री जी ने पहली प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ’कोई खुद को व्यवस्था से ऊपर मानता है तो यह गलत है। रघुराम राजन कम देशभक्त नहीं है। वे राजपाल रहें या नहीं लेकिन देश की सेवा करते रहेंगे।’ इसके तहत मोदी ने बातों ही बातों में स्वामी को नसीहत भी दे डाली। बोले -ये जो लोगों का प्रचार मिलता है, उससे देश का भला नहीं होगा।

शेयर बाजार: -

  • राजन के दोबारा कार्यकाल नहीं लेने के आश्चर्यजनक फेसले से शेयर बाजारों को बचाने के उद्देश्य से देश प्रमुख वित्तीय संस्थान एलआईसी (भारतीय जीवन बीमा) ने ब्लूचिप जनमूहों के शेयर खरीदने के लिए 99 करोड़ रुपए का निवेश किया है। इनके अलावा दूसरे घरेलू वित्तीय संस्थानों ने भी शेयर बाजार में जान डालने की कोशश की। जबकि विदेशी संस्थागत निवेशकों ने एक ही दिन में 2, 873 करोड़ रुपए निकाल लिए। मौजूदा वित्त साल के दौरान विदेशी निवेशकों की ओर से एक दिन में निकाली गई यह सबसे बड़ी राशि हैं। डिपोजिट (जमा) किए गए आकंड़ों के अनुसार राजन को दोबारा गवर्नर नहीं बनने के फेसले के चलते विदेशी निवेशकों ने शेयर बाजार में भारी बिकवाली की। वहीं, एलआईसी समेंत घरेलू म्यूचुअल फंडो (कोष) ने बाजार को संभालने के लिए जोरदार खरीददारी की। म्युचुअल फंडो ने 459 करोड़ रुपए का निवेश किया। लेकिन बाजार भाग्यशाली नहीं रहा और इसमें विदेशी निवेशकों ने बिकवाली दबाव बनाया है। राजन की घोषणा के बाद शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ सकती है। इसे देखते हुए सेबी और बदलती सेवाओं की तैयारी कर ली है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली से डॉलर की डिमांड पूरी करने के लिए तैयार है। डॉलर की मांग बढ़ने से रुपया कमजोर हो सकता है।

मापदंड: -

  • राजन पहले ऐसे रिजर्व बैंक गवर्नर हैं- उनके लौट जाने के निर्णय के कारण। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के कारण जिन पर पूरा देश बहस कर रहा है। किसी भी हस्ती को परखने के प्रस्तुत दो मापदंड होते हैं। पहला व्यक्तित्व दूसरा कृतित्व।
  • व्यक्तित्व- में तो न जाने क्या -क्या आ जाता है। व्यक्तित्व जैसे राजन तो वह आपका व्यक्तित्व हैं। असहनीय बात सहन करते जाते हैं-जैसे कि राजन नहीं करते तो यह भी व्यक्तित्व है। बौखला जाना, अविचलित रहना सशंकित रहना, आत्मविश्वास से रहना सब कुछ हमारा व्यक्तित्व है। कद-काठी का आकर्षण होना जैसे राजन की तुलना मीडिया (संचार माध्यम) में हॉलीवुड हीरो से की गई यह भी उनका व्यक्तित्व हैं। और हम कब कितना और कैसे बालते हैं। वह भी हमारा व्यक्तित्व हैं।
  • कृतित्व- संभवत: एक महीन किन्तु गहरी रेखा है। बोलने वाले संदर्भ में। कुछ बोलना- हमारे कृतित्व का हिस्सा हो जाता है। जैसे राजन के हुए। ब्याजदर पर प्रश्नों के उत्तर में उन्होंने जब कहा कि आप मुझे सांता क्लॉज कहते हैं जो चाहे कहिए पर मेरा नाम राजन है। इतना कहना तो उनका व्यक्तित्व हैं। यही प्रसिद्ध भी हुआ है। किन्तु पूरा वाक्या पढेंगे तो उनका कृतित्व सामने आएगा। मेरा नाम रघुराम राजन हैं वे जो चाहते हैं- वही करते हैं। वही किया। तो वह राजन जी का कृतित्व हैं।
  • व्यक्तित्व शरीर है। कृतित्व ’बॉडी ऑफ वर्क’ यानी शरीर द्वारा किया कार्य है। दूसरा मापदंड पहले के बिना हो नहीं सकता।

तुलना: -

  • राजन ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर पद के दायित्व को समझाते हुए रोचक तुलना की थी। जेम्स बॉन्ड से। कि वे वैसा नहीं दिखना चाहते है। सच्चाई तो यह है कि वे कुछ वैसे ही हैं- नेम इस बॉन्ड, जेम्स बॉन्ड। यानी उनका नाम बॉन्ड जैसा ही हैं।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (भारत का रिजर्व बैंक): -

  • विश्व के श्रेष्ठ संस्थानों में है। उसके शीर्ष पद की गरिमा, विश्वसनीयता और दृढ़ता राजन ने निश्चित रूप से बढ़ाई है। किन्तु जिस तरह का करुण क्रन्दन हो रहा है- वह अशोभनीय है। और जिस तरह से कहा जा रहा है कि कई मिलियन डॉलर अब दाव पर हैं/होंगे- यह तो हास्यास्पद ही हैं। राजन ग़जब के गवर्नर हैं। किन्तु जिस तरह का विलाप उन्हें लेकर हो रहा है- वह व्यर्थ है।

कारण: -

  • ठोस कारण है ऐसी बातों को रद्द करने का। यदि भारत जैसे महान राष्ट्र को किसी व्यक्ति विशेषक को जाने देने से इतना बड़ा खतरा हो रहा हो- तब तो उस व्यक्ति को तत्काल जाने ही देना चाहिए।
  • राजन ने स्वयं गांभीर्य दिखाते हुए सही ही कहा है कि रिजर्व बैंक सशक्त है। कोई भी गवर्नर इसे सफलतापूर्वक चला सकता हैं।

मंहगाई: -

  • राजन के समय सबसे कम इन्फ्लेशन (मुद्रा स्फीति) है। किन्तु आकंड़ो में। चुनाव के चुनाव मंहगाई पर जीते हारे जा रही हैं। तब दाल को लेकर हल्ला था। अब टमाटर पर न जाने कौन-कौन सी खाद्य वस्तुओं में मंहगाई कसी जाती है। जो कागज पर वामन और दुकानों पर विराट बनी रहती है। राजा कोई भी हो अभी तक मंहगाई से राहत किसी को नहीं मिली। वैसे भारत को अभी बहुत काम करने हैं।

डोसा इकोनॉमिक्स सिद्धांत: -

  • जब राजन से उनकी प्रसिद्ध ’डोसा इकोनॉमिक्स’- थ्योरी (अर्थशास्त्र का सिद्धांत) पर एक इंजीनियरिंग छात्र से प्रश्न पूछा- तो उत्तर से पता नहीं, वहां उपस्थित लोग सहमत हुए या नहीं मैं तो असहमत नहीं ही हुआ। क्योंकि प्रश्न पूरे देश की अर्थवयस्था, मंहगाई और राजन के नेतृत्व वाले रिजर्व बैंक की कार्य शैली को सीधा चुनौती देने वाला था। ’डोसा इकोनॉमिक्स’ बताते हुए पहले राजन ने कहा था कि इन्फ्लेशन और इंटरेस्ट (मुद्रा स्फीति और ब्याज) दोनों की दर ऊंची हो तो 1 लाख रु. निवेश करने वाला व्यक्ति वर्ष के शुरू में भी उतने ही डोसे खरीद कर खा सकता है- जितने कि साल के अंत में। किन्तु यदि इन्फ्लेशन दर कम हो तो इंटरेस्ट की दर कम होने के बावजूद वह ज्यादा डोसे खरीद सकेगा। यही सभी जगह लागू किया जा सकता है। 5.5 प्रतिशत इन्फ्लेशन रेट (मुद्रा स्फीति कीमत) हो। 8 प्रतिशत इंटरेस्ट (ब्याज) हो तो 2.5 प्रतिशत कमाई ही हो सकती है।
  • इस पर बाद में एक छात्र ने पूछा था- कि इन्फ्लेशन बढ़ने पर तो डोसे की कीमत बढ़ गई, पर घटने पर नहीं घटी तो? हमारे प्रिय डोस का क्या सर?
  • मुसकराकर राजन ने कहा- वो अर्थशास्त्र का एक अलग सिद्धांत है। डोसा बनाने की तकनीकी नहीं बदली। जबकि बनाने वाले का मेहनताना बढ़ता जा रहा है। तो फैक्टरी वर्कर (उद्योग कर्मचारी) या बैंक क्लर्क (चपरासी/बाबू) अब नई तकनीकी के सहारे ज्यादा लोगों को सर्व (परोस) कर रहे हैं- जो डोसा वाला नहीं कर पा रहा है। इसलिए तकनीक बदल कर, प्रोडक्शन (उत्पादन) बढ़ाइए। नहीं तो कीमते घटेगी नहीं। इतने विस्तार से इसलिए डोसा इकोनॉमिक्स की बात यहां की गई हैं।

बैंक घाटा: -

  • दूसरी बात है बैंको और उनके बूरे डूबते कर्जो पर राजन की कठोर मुद्रा हैं। इस पर उन्हें 100 प्रतिशत कीमत दी जाना चाहिए। उन्होंने बैंको को साफ कहा कि छुपाएं नहीं और डूबते खाते सामने लांए। इसे बैंको ने कतई पसंद नहीं किया। और पालन करने की विवशता में बैंको की बैलेंस शीट (संतुलन पत्तर) लगातार अब भारी घाटे दिखा रही हैं।

तथ्य: -

  • रिजर्व बैंंक सभी गवर्नर पहले दिन से ही ’स्वायत्ता’ के लिए तत्पर व तैनात खड़े दिखते हैं सही भी है। हां, राजन ’असहिष्णुता’ पर भी बोले थे। और ’मेक इन इंडिया’ पर भी। बोलने का उनका प्रभावी अंदाज है। वे मूल रूप से कोई सरकारी अफसर तो हैं नहीं। जैसे कि लगातार उनसे पहले के भी गवर्नर रहे हैं। ’इंटलेक्चअुल सिटीजन’ (नगरवासी) के रूप में वे बैकिंग के बाहर के मुद्दों पर भी दृढ़तापूर्वक अपनी राय रख देते हैं। क्या वे इसलिए जाने दिए जा रहे हैं? हो सकता है किन्तु मोदी जी अुनसार तीन तथ्य साफ हैं-
  • मोदी सरकार के पास ’नतीजे देने वाले’ लोग पहले ही कम हैं या नहीं है। इसलिए राजन के जाने एक और चुनौती खड़ी हो गई है।
  • किसी भी सरकार को उसकी अपनी पसंद और सुविधा से लोगों को नियुक्त करने का अधिकार किसी ठोस कारण से ही संविधान में दिया गया है। इसलिए क्यों जाने दिया या गलत फैसला लिया जैसे विवाद व्यर्थ हैं। ये तो मोदी हैं, राजीव गांधी तक ने डॉ. मनमोहन सिंह को रिजर्व बैंक गवर्नर पद पर जारी नहीं रखा था।
  • संस्थान बड़े होते हैं। बने रहते हैं। व्यक्ति आते-जाते रहते हैं। किन्तु जो व्यक्ति याद रहे- वही सच्चा, योग्य व कर्मठ होता है। राजन भुलाए नहीं भूले जा सकते है। वैसे वो अपने देश लगातार आते- जाते रहेंगे।

भारत की प्रतिष्ठा: -

  • देश- दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्रियों और उद्योगपतियों ने रघुराम राजन के दोबारा आरबीआई गवर्नर नहीं बनने की घोषणा पर निराशा जताई है। उन्होंने कहा है कि यह भारत की अर्थशास्त्र के लिए अच्छा नहीं है। दुनिया में यह संकेत जाएगा कि महंगाई और फंसे कर्ज (एनपीए) के खिलाफ नीतियों को सरकार का समर्थन नहीं मिला। राजन का जाना पूरे देश का नुकसान होगा। यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए काफी महंगा साबित होगा। राजन ने कहा था कि वह आरबीआई से दूसरा कार्यकाल नहीं चाहते हैं। राजन ने अध्यापन में लौटने की इच्छा जताई है। ऐसा 24 साल में पहली बार होगा जब रिजर्व बैंक के गवर्नर तीन साल के कार्यकाल के बाद विदा होंगे। यह जी-20 देशों में भी सबसे कम हैं।

विचार: -प्रस्तत विचार निम्नलिखित हैं-

  • शिकागो विश्वविद्यालय- में राजन के सहकर्मी लुइगी जिंगेल्स ने कहा कि ’राजन रिजर्व बैंक छोड़कर बूथ लौट रहे हैं। हमारे लिए अच्छी बात है लेकिन भारत के लिए बड़ी नुकसान वाली बात हैं।’
  • हार्वर्ड विश्वविद्यालय- की प्रो. गीता गोपीनाथ ने कहा कि ’सरकार को राजन को बनाए रखने के लिए लड़ना चाहिए था। इतिहास बताएगा कि राजन सिर्फ भारत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के केंद्र बैंक गवर्नरों में सबसे ज्यादा प्रभावी रहे हैं’
  • इंग्लैंड में लेबर पार्टी (मजदूरी दल) - के नेता और भारतीय मूल के अर्थशास्त्री मेघनाद देसाई बोले ’मुझे आश्चर्य नहीं हो रहा, लेकिन इससे दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा पर आंच जाएगी।
  • एसोचैम -ने कहा, यह भारत की अर्थशास्त्र के लिए शुभ नहीं है। राजन ऐसे समय जा रहे जब विश्व अर्थव्यवस्था भारत के लिए जोखिम बनी हुई है।
  • बायोकॉन सीएमडी किरण मजूमदार शॉ- ने कहा कि ’जटिल परिस्थितियों में हमें राजन जैसा व्यक्ति चाहिए।
  • इन्फोसिस के मानद सभापति नारायणमूर्ति बोले, राजन ऐसे समय जा रहे जब सालाना 10 प्रतिशत ग्रोथ (विस्तार) और एक करोड़ नौकरियां होनी चाहिए।
  • मोइली- कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली ने कहा कि ’मौजूदा सरकार राजन के स्तर की नहीं है। संघ और स्वामी के साथ वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी राजन के खिलाफ लॉबिंग की।’
  • आरजेडी प्रवक्ता मनोज झा- ने कहा, ’राजन के रहते लोग खुद को सुरक्षित समझते थे। राजन ने सही फैसला किया क्योंकि उन्हें स्वामी जैसे लोगों के साथ काम करना पड़ता।’

फैसला: -

  • रिजर्व बैंक के गवर्नर पद पर राजन को दूसरी पारी खेलने को मौका मिलता या नहीं लेकिन दूसरी पारी के लिए जिस तरह उन्होंने स्वयं इनकार किया ये सुखद नहीं माना जा सकता है। रिजर्व बैंक का गवर्नर कौन बने, कब तक पद रहे ये फैसला सरकार को करना होता है।

राजनीति: -

  • लेकिन राजन का कार्य खत्म होने से पहले जिस तरह उन्हें राजनीतिक विवाद में घसीटा गया उसे किसी भी सूरत में उचित नहीं ठकराया जा सकता है। खासकर भाजपा सांसद स्वामी ने जिस तरह राजन पर हमला बोला वह न सिर्फ राजन बल्कि तमाम आर्थिक विशेषज्ञों को बुरा लगा और लगना भी चाहिए था। स्वामी जी ने जिस तरह सार्वजनिक रूप से राजन की कार्यक्षमता पर सवाल उठाए वह राजनीति का निकृष्ट उदाहरण माना जा सकता है। स्वामी अपने आप को बेहतर अर्थशास्त्री मानते होंगे, लेकिन गवर्नर के रूप में राजन के कार्यकाल में अनेक उल्लेखनीय कार्य देखने को मिले है। स्वामी के इस कथन में शायद ही कोई सहमत हो कि राजन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को तबाह करके रख दिया। राजन से पहले 22 दूसरे अर्थशास्त्री रिजर्व बैंक के गवर्नर का पद संभाल चुके हैं। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शुमार हैं। हर गवर्नर के काम करने का तरीका दूसरे से अलग होता है। यह सही है कि राजन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को संभालने में बड़ा योगदान दिया है। मुद्रास्फीति पर नियंत्रण पाने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को तेजी से बढ़ने की तरफ अग्रसर किया है। राजन से स्वामी के निजी मतभेद हो सकते हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से उनकी आलोचना करना गवर्नर पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने के समान है। स्वामी ने राजन को कांग्रेस का कार्यकता तक करार दे दिया है। स्वामी को यह बताना चाहिए कि राजन ने ऐसा क्या कर दिया जो वे कांग्रेस के कार्यकर्ता नजर आने लगे हैं। स्वामी अब भाजपा सांसद है, लिहाजा राजन पर उनके हमलों के पीछे राजनीतिक गंध आना स्वाभाविक है। साथ ही समूचे प्रकरण पर भाजपा नेतृत्व की खामोशी भी आश्चर्यजनक ही मानी जाएगी।
  • राजन के जाने से देश को होने वाले फायदे-नुकसान का अंदाजा चंद महीनों बाद हो ही जाएगा, लेकिन इस तरह के पदों पर बैठने वाले लोगों पर होने वाले हमले नई परंपरा को जन्म दे रहे हैं। ऐसी परंपरा जिसमें एक सरकार द्वारा मनोनीत व्यक्तियों का दूसरी सरकार के आने पर विरोध होता हैं। विरोध भी किसी ठोस कारण से नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से है। राजन ने गहन चिंतन और सरकार से विस्तृत बातचीत के बाद दूसरा कार्य लेने से इनकार किया है लेकिन इसे उनका निजी फैसला मानने के साथ दबाव की राजनीति से तो जोड़कर देखा ही जाएगा जो किसी हालत में देश के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता हैं।

उपसंहार: -

  • श्रेष्ठ व्यक्ति का श्रेष्ठ उपयोग सभी कर सकें, असंभव है। किन्तु करना ही होगा। चूकि श्रेष्ठ हैं ही कितने? और जो हैं, वे उपलब्ध कहां हैं? अर्थात राजन जैसे श्रेष्ठ व्यक्ति का उपयोग भारत नहीं कर पाया है। राजन जैसे व्यक्ति इस दुनियां में कम ही देखने को मिलते हैं उनके विदेश जाने से देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति का आगे क्या होगा यह तो आने वाले समय में पता पड़ ही जाएगा।

- Published/Last Modified on: July 6, 2016