ज्ञान-विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में खोज Research in Field of Science Technology and Space [ Current News (Concise) - ]

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प्रस्तावना:- हमारे देश-विदेश में हर क्षेत्र में खोज होती रहती है अभी हाल ही में ज्ञान-विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में कई प्रकार की खोज हुई जिसका फायदा आने वाले भविष्य में देखने को मिल सकता हैं। जो इस प्रकार हैं-

ज्ञान-विज्ञान:-

  • चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम (बच्चों की विशेष व्यवस्था):- आईआईटी खड्‌गपुर के छात्रों और व्याख्याताओं ने विकसित की ऐसी इलेक्ट्रनिक डिवाइस (विद्युत उपकरण) जो कर सकेगी बच्चों को ट्रैक। रेडियो फ्रीक्वेंसी (तंरगे) आइडेटिफिकेशन (पहचान) पर आधारित इस व्यवस्था में रेडियो तरंगो का इस्तेमाल मैसेज (संदेश) पढ़ने व कलेक्ट (एकत्रित) करने में किया जाता है। यह पूरी व्यवस्था टैब (उपकरण) और रीडर (पाठक/पढ़ने वाला) पर काम करता हैं इसे व्यापक सर्वे (दौरे) के बाद बनाया गया। सर्वे में कई पैरेंट्‌स व कोलकत्ता ट्रैफिक (जाम) पुलिस शामिल थे। इसमें विद्याथी आईडी कार्ड (पहचान पत्र) को आरआईएफडी पर टैग (मूल्य, पता आदि दर्शाने वाला लैबल या नाम देना) किया जाता है। आरआईएफडी रीडर्स को बस में इंस्टाल (प्रवेश) कर देते हैं। एक बार आईडी कार्ड रीड होने के बाद विद्यार्थी की जानकारी डेटाबेस (कंप्यूटर में संग्रहीत विशाल तथ्य सामग्री) में दर्ज हो जाती है। यह प्रयोग दो सप्ताह तक किया जाता गया है।
  • कृत्रिम हाथ-पैर:- मेलबर्न विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने बनाया स्टेंटरॉड। इस खोज के लिए मानवों पर 2017 में शुरू होगा परीक्षण। विज्ञान और तकनीक के अनूठे संयोग ने एक ऐसा उपकरण तैयार किया है, जिससे अब कृत्रिम अंग व्यक्ति के सोचने की क्षमता से चल सकेंगे। इस तकनीक की मदद से किसी दुर्घटना के शिकार और प्रॉस्थेटिक लिंब (कृत्रिम अंग) के सहारे रहने वाले लोग भी सामान्य इंसानो की तरह जिंदगी जी सकेंगे। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस खोज को लेकर कहा है कि यूं तो यह सुनने में भविष्य की बात लगती है लेकिन अब यह संभव होगा और इस खोज का फायदा घायल सैनिकों और ऐसे हजारों लोगों को मिल सकेगा। इस खोज के माध्यम से दिव्यांग लोग कृत्रिम अंगों का और बेहतर इस्तेमाल कर पाएगे।
  1. क्या है स्टेंटरॉड?-यह एक मॉचिस के आकार का उपकरण है, जो मस्तिष्क के संकेतो को प्रमाणित कर सकता है। यह जालीनुमा स्टेंटरॉड सिर्फ 3 सेमी लंबा हैं और 3 मिमी चौड़ाई का उपकरण हैं जो निकल मिश्रित धातु से बना है।
  2. काम- स्टेंटरॉड को दिमाग के उस प्रमुख हिस्से के नजदीक रक्त धमनी में लगाया जाएगा, जो शरीर से हरकत करवाता है। इस जालीनुमा उपकरण में इलेक्ट्रोड (विद्युत बैटरी में विद्युत आने या जाने देने वो दो बिन्दं विद्युताग्र) लगे हुए हैं और प्रत्येक इलेक्ट्रड लगभग 10,000 न्यूरॉन्स की एक्टिविटी (तैयारी) को पंजीकृत करेगा। दिमाग में लगाया गया यह उपकरण एक वायर (तार) के दव्ारा से संकेत मरीज के छाती तक पहुंचाएगा।
  • मुश्किल- ब्रेन संकेत कैसे दिखते हैं यह वैज्ञानिकों के लिए पहेली है। उन संकेतों को प्रमाण करना एक मुश्किल काम था। कुछ और खोजो ने मस्तिष्क का ऊपरी भाग निकालकर इलेक्ट्रोड डाल मस्तिष्क के उस हिस्से के संकेतो को प्रमाण किए, जो हमारे शरीर की हरकत को चलाता हैं।

                                                                                            डॉ थॉमस ऑक्जले, मेलबर्न विश्वविद्यालय

  • इलेक्ट्रॉड निर्देशक ब्रेन में लगाने से कई तरह के इंफेशक्शन (अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करने में समर्थ वस्तु), फ्रायब्रॉसिस होने आदि का खतरा रहता है। जबकि रक्त वैसल में लगाने से यह ज्यादा प्रॉटेक्टेड (सुरक्षित) रहेगा और ब्रेन को नुकसान नहीं पहुंचेगा।

                                                                                                            प्रो टेरेंस ऑब्राइन, न्यूरोलॉजिस्ट

  • पॉपकार्न (मक्का का लावा)-दीपक शर्मा, साइंटिफिक ऑफिसर (विज्ञान के अधिकारी), क्या यह सवाल आपके भी दिमाग में आया है कि आखिर पॉपकार्न इतना उछलता क्यों हैं? इस सावल का जवान विज्ञान के पास है। पॉपकार्न के लिए जिस अनाज का इस्तेमाल करते हैं। वे सख्त होते हैं। इनके बीच के हिस्से में दाना होता है, ऊपर कठोर स्टार्च (आहर पदार्थ का एक तत्त्व) की परत होती हैं। इसमें 10.15 फीसदी नमी होती है। अनाज को भूना जाता है इससे पहले निचले हिस्से की नमी गर्म होती है। यह वाष्प में बदल जाती है। और फेलती है। इससे ऊपरी कठोर सतह पर दबाव पड़ता है और दाना फट जाता है। वाष्प दाने के निचले हिस्से से झटके से निकलती है और न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार दाने को ऊपर की ओर उछाल देती है। दाना फूलता और गर्मागर्म पॉपकार्न तैयार होते हैं।
  • पानी का फिल्टर ( द्रव छानने के लिए/छन्नी):- अमेरिका की जानीमानी वॉटर फिल्ट्रेशन प्रॉडक्टर बनाने वाली जनसमूह ब्रीटा ने हाल ही में ऐसा फिल्टर शुरू किया है जो सीधा गले के भीतर ही लगा दिया जाएगा।
  • जनसमूह के थ्रॉटप्योर नाम का इन-बॉडी (शरीर) फिल्टरेशन (द्रव छानने के लिए) व्यवस्था बनायी गई है। जनसमूह का दावा है कि यह सुविधाजनक फिल्टर है जो हर जगह शरीर में हानिकारक और जहरीली अशुद्धताओं को जाने से रोकेगा। यह लचीले उपकरण की तरह होगा। जिसे गले के भीतर इंस्टाल (प्रवेश) करना और हटाना काफी आसान होगा।
  • शुद्ध पानी- यह फिल्टर गले में लगभग 3000 गैलन (द्रव का एक नाप जैसे लिटर) वॉटर (पानी) या कहें कि 3 महीने तक पानी का फिल्टरेशन करेगा। जब फिल्टर बदलना होगा तो एक लाल रंग की लाइट (रोशनी) आपके गले में जलती हुई दिखाई देगी। यह फिल्टर तीन मिनिट में 10 ऑन्स पानी फिल्टर करेगा।
  • मानव कोशिकाओं:- अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्‌यूट ऑफ हैल्थ (एनआईएच) (राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्था) उस खोज की फन्डिंग (खर्च या किसी विशेष कार्य के लिए जमा किया उपलब्ध धन) पर लगा बैन हटाने वाला हैं, जिसमें मानव कोशिकाएं वन्य जीवों के भ्रूण में इंजेक्ट (प्रवेश) कर बीमारी के कारण खोजे जाते हैं। यह घोषणा विज्ञान बीमा के एसोसिएट (संपर्क/संबंध रखना) निर्देशक कैरी वॉलिनेट्‌ज ने ब्लॉग पोस्ट (सूचना पट्ट लगाना) में की है। इसी तरह की खोज में मानव कोशिकाएं या अंगो को वन्य जीवों में विकसित करने की कोशिशें की जाती हैं। ताकि बीमारी के मूल कारण बेहतर तरीके से समझकर उनकी उपचार पद्धति विकसित की जा सके।
  • बैन हटने के बाद एनआईएच भी इस खोज में फन्डिंग कर सकता है। शोधकर्ता पहले भी मानव कोशिकाएं अन्य जीवों में फंडिंग लगाते रहे हैं। एक केस में मानव ट्‌यूमर चूहे में प्रवेश किया गया था ताकि उन दवाओ का परीक्षण हो सके, जो ट्‌यूमर नष्ट करती हैं। स्टेम (तना या रोकथाम करना) कोशिकाओं की खोज मूल रूप से अलग होती है। इस खोज की फन्डिंग पर बैन हटने से मरीजों को भी लाभ मिल सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी मरीज की किडनी फेल हो गई है, तो वन्य जीवन में उसे विकसित किया जा सकेगा। हालांकि इस योजना से सभी सहमत हो, यह संभव नहीं है क्योंकि वैश्विक स्तर पर इसकी स्वीकार्यता नहीं है।
  • कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के स्टेम सेल खोज पॉल नोएफ्लर कहते हैं-जब मानव कोशिकाएं किसी अन्य जीव के भ्रण में इंजेक्ट की जाती हैं, तब वे उस वन्य जीव के दिमाग से जुड़ी होती हैं। ऐसे में उनके सही कार्य करने का सवाल उठता हैं, जो गंभीर है।
  • जॉन होपकिन्स बर्मन इंस्टीट्‌यूट ऑफ बायोएथिक्स (जैविक संस्था) के निर्देशक जैफ्री पी. काहन कहते हैं- जब दो प्रकार के जीवों में विकसित कोशिकाओं को मिलाया जाएगा तो क्या वह मानव कोशिकाएं कहलाएगी। यहां दूसरा बड़ा सवाल यह उठता है कि लोग उसे कितना स्वीकारेंगे। लोग आनुवांशिकी रूप से परिवर्तित ऑर्गेनिज्म स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन मानव और वन्य जीव के मिश्रण वाले ऑर्गेनिज्म की स्वीकार्यता अभी स्पष्ट नहीं है।
  • सांप के लंबे होने का राज:- क्या आप जानते हैं कि सांप इतने अधिक लंबे क्यों होते हैं? वैज्ञानिकों को भी इसी गुत्थी को सुलझााने में सालों लग गए। हाल ही में एक खोज के दौरान उन्होंने यह पता लगाया है कि सांप के लंबे होने के लिए केवल एक जीन जिम्मेदार है। उस जीन का नाम है ऑक्टी (ओसीटीवाई) जीन स्टेम। यह जीन कोशिकाओं पर नियंत्रण रखता है और रीढ़ वाले प्राणियों के शरीर के मध्य भाग यानी धड़ की वृद्धि को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाता है।
  • खोज के दौरान यह देखा गया कि सांपों के विकास के दौरान ऑक्टी जीन आमतौर पर होने वाले भ्रूण विकास के दौरान ज्यादा समय तक प्रभावी रहता है। लिस्बन, पुर्तगाल के इंस्टीट्‌यूट गुलबेकियन डे सीएंसिया (आईजीसी) की डॉ. रीटा आयर्स ने संचार माध्यम को बताया कि ’शरीर के विभिन्न हिस्सों का निर्माण जीनों के बीच किसी कड़ी प्रतिस्पर्द्धा जैसा होता है। धड़ को बनाने वाले जीन धीरे-धीरे काम करना बेद कर देते हैं, ताकि पूंछ बनाने वाले जीन अपना काम शुरू कर सके। सांपों के मामले में, खोज दल ने पाया कि भ्रूण विकास के दौरान ओर लंबे समय तक सक्रिया रहता हैं। इससे यह साफ हो जाता है कि सांप का धड़ इतना लंबा क्यों होता है और उसकी पूंछ छोटी क्यों होती है।’
  • अचानक- इस खोज के अनुसार, क्रमागत बदलाव के तहत ऑक्टी जीन डीएनए क्षेत्र के ठीक बाद रहता है, इससे यह तैयार रहता है। दरअसल वैज्ञानिक इस विषय पर खोज कर रहे थे कि चूहियों के धड़ असामान्य रूप से लंबे या छोटे क्यों होते हैं।
  • जीवन:- अभी तक विज्ञान यही मानता रहा है कि जीन के लिए भोजन बेहद जरूरी है पर एक निश्चित समय तक कुछ लोगों के बिना भोजन या बिना पानी के जिंदा रहने की खबरें वैज्ञानिकों को इसके लिए प्रेरित करती रही हैं कि वह ऐसी खोज करें, जिससे यह मुमकिन हो पाए। इस दिशा में कुछ प्रयास हुए हैं, कुछ धारणाएं और मान्यताएं भी हैं-
  • कितनी बार आपके मन में यह विचार आया होगा कि काश कभी खाना बनाना ही न पड़े? या कोई ऐसी टेबलेट बाजार में मिलती, जिसे खाकर भूख मिट जाती? केवल आप ही नहीं, बल्कि विज्ञान भी सालों से इसका हल ढूंढने की कोशिशें में लगा है। पर क्या वाकई ऐसा संभव है कि बिना भोजन के मनुष्य जिंदा रह सके या पेड़-पौधों की तरह हमारा शरीर खुद ही अपने लिए जरूरी पोषक तत्व ढूंढ ले? सालों से कई वैज्ञानिक भोजन के विकल्प की तलाश कर रहे हैं। वहीं, कई वैज्ञानिकों का दावा है कि यह संभव है।
  1. हवा- एक समुह का दावा है कि जीने के लिए हमें खाने की जरूरत नहीं है। आप बिना खाने के केवल हवा पर रह सकते हैं। मूलत: यह धारणा हमारे वेदों में है, जिसे प्राणा (प्राणवायु) के नाम से जाना जाता है। इन्हें पश्चिमी देशों में ब्रेथेरियन्स कहते हैं।
  2. इनका मानना है कि व्यक्ति केवल हवा और सूर्य की रोशनी से शरीर के लिए जरूरी सभी तत्व ले सकता हैं और बिना खाने के जिंदा रह सकता हैं। ब्रेथेरियन्स बनने के लिए आपको पहले शाकाहारी बनना होगा, फिर जानवरों से प्राप्त हर तरह की वस्तुएं को छोड़ना होगा जैसे दूध-दही, मक्खन आदि। इसके बाद आपको केवल तरल पदार्थो पर आना होगा और फिर धीरे-धीरे केवल हवा और सूरज की रोशनी से मिलने वाले तत्वों के सहारें जिंदा रहा जा सकता है।
  3. विरोध- हालाकि इसके विरोध में भी कई तर्क मौजूद हैं। कई पाश्चात्य वैज्ञानिकों का कहना है कि हम पेड़ पौधों की तरह सूरज की रोशनी से अपना भोजन नहीं बना सकते, इसलिए केवल हवा पर जीना संभव नहीं है।
  4. भोजन का विकल्प- भोजन के बिना स्वस्थ्य रहने की इच्छा पूरी करने के लिए कंप्यूटर इंजीनियर रॉ ब्रायन ने एक अलग पहल की हैं। जैसे कार को चलाने के लिए ईंधन चाहिए, वैसे ही शरीर को भी इंर्धन चाहिए। ब्रायन ने अपने शरीर पर प्रयोग करते हुए मैग्नेशियम, पोटेशियम, इलेक्ट्रोलायड आदि कई मिनरल्स और विटामिन्स का मिश्रण लिया और यह जानने की कोशिश की कि क्या केवल जरूरी पोषक तत्वों की पूर्ति कर खाने की जरूरत को खत्म किया जा सकता हैंं? इस एक्सपेरिमेंट (प्रयोग) के बाद ब्रायन ने 39 पोषक तत्वों का एक पाउडर बनाया, जिसे सॉल्वेट नाम दिया।
  5. क्षमता- हमारा शरीर आखिर कितने दिनों तक बिना भोजन के रह सकता है? वैज्ञानिकों के पास इसके लिए कोई निश्चित आंकड़ा नहीं है। यह भूखे रहने वाले व्यक्ति के वातावरण, उसके शरीर की क्षमता, शरीर में जमा मोटापा, पानी की स्थित आदि पर निर्भर करता हैं। भूखे रहने के उपलब्ध प्रमाणो की बात करें तो महात्मा गांधी 21 दिनों तक भूख हड़ताल पर रहे थे, लेकिन इस दौरान वह पानी पीते रहे थे। दूनियाभर में लोगों के 28, 36 और 40 से भी ज्यादा दिनों तक भूखे रहने के प्रमाण मिले हैं।

अंतरिक्ष में खोज:-

  • वाशिंगटन-
  • नासा के वैज्ञानिकों ने सौरमंडल से बाहर पृथ्वी जैसे 20 ग्रहों की पहचान की हैं, जहां जीवन की संभावनाएं जताई गई हैं। नासा के केपलर मिशन (विशेष कार्य के लिए विदेश में भेजा गया शिष्टमंडल) के तहत अब तक ढूंढे गए चार हजार से ज्यादा ग्रहों में से इनकी पहचान की गई है। ताजा शोध में 2016 केपलर ग्रहों को जीवन के अनुकूल क्षेत्र (हैबिटेबल जोन) में होने का दावा किया गया है। इसका मतलब है कि तारों के समीप स्थित इन ग्रहों की सतह पर पानी भी हो सकता है। पानी की मौजूदगी के तार सीधे जीवन की संभावना से जुड़ते है। शोधकर्ताओं ने बताया कि 216 ग्रहों में से 20 की प्रकृति पृथ्वी के समान है। सैन फ्रंसिस्को राज्य विश्वविद्यालय के स्टीफन के अनुसार, यह केपलर दव्ारा तलाश किए गए मानव जीवन की संभावनाओं के अनुकूल ग्रहों की पूरी सूची है। अब इन्हीं 20 ग्रहों पर ध्यान केंद्रित कर उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाना संभव हो सकेगा। साथ ही सचमुच में जीवन की संभावनओं का पता लगाया जा सकेगा।
  • जीवन के अनुकूल क्षेत्र (हैबिटेबल जोन) की सीमाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं। अगर ग्रह तारे के ज्यादा समीप होंगे तो उनकी स्थिति सौरमंडल के शुक्र ग्रह के समान होगी। दूरी बढ़ने पर वहां की परिस्थितियां मंगल ग्रह के समान हो सकती हैं। शोधकर्ताओं के दल में भारतीय मूल के रवि कुमार कोप्परापु भी शामिल हैं। इन ग्रहों पर फिलहाल नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट (अंतरिक्ष उड़ान) केंद्र में अध्ययन चल रहा है। वैज्ञानिकों ने इन ग्रहों से पूर्ण बड़े पिंड के तौर पर वर्गीकृत किया है।
  • मंगल:-
  • अमरीका की अंतरिक्ष कार्यकर्ता नासा ने अंतरिक्ष में रहने लायक जगह बनाने संबंधी परियोजना के लिए छह जनसमूहों से साझेदारी की है। अंतरिक्ष कार्यकर्ता इन जनसमूहों से मिलकर, प्रोटोटाइप (आदि रूप, पहला नमूना जो कृति का आधार हो) विकसित करेगी, जिससे भविष्य में मंगल ग्रह पर मानव अभियान शुरू किया जा सके। नासा के एडंवास एक्सप्लोरेशन (अतिरिक्त) व्यवस्था के निर्देशक जेसन क्रूसन ने कहा कि मंगल और अंतरिक्ष में मानवयुक्त स्पेसक्राफ्ट भेजना नासा की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसके लिए हम सरकारी और निजी दोनों स्थानों के ज्ञान, कौशल और इनोवेशन (नवीन प्रक्रिया) का उपयोग करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, यह निवास स्थान धरती से मार्स की यात्रा में मानव के लिए एक सुरक्षित ठिकाने की तरह होगी।
  • नासा दव्ारा साझेदारी के लिए चयनित जनसमूहों में बोइंग, बिगेलों एयरोस्पेस, लॉकहीड मार्टिन, आर्बिटल एटीके, नैनोरॉक्स व सिएरा शामिल हैं। यह सभी जनसमूह नासा के साथ मिलकर अगले 24 महीनों में एक ग्राउंड (मैदान) प्रोटोटाइप विकसित करने के अलावा अंतरिक्ष का अध्ययन करने संबंधी अवधारणा पर भी काम करेगी। इस परियोजना पर दो सालों में लगभग 65 मिलियन अमरीकी डॉलर खर्च होगा। लागत का 30 प्रतिशत चयनित साझेदारी खर्च करेंगे।
  • विज्ञान गलतियों से ही बना है, लेकिन यह ऐसी गलतियां हें, जो होना फादेमंद रहा हैं, क्योंकि इन्होंने थोड़ा-थोड़ा कर के हमें सत्य की ओर पहुंचाया है।

                                                                                                                            जूल्स बर्ने, वैज्ञानिक

उपसंहार:- इसी तरह हमारे देशभर के हर क्षेत्र में नई-नई खोज होती रहेगी तो वो दिन दूर नहीं जब पूरा विश्व ही विकास की ओर अग्रसर रहेगा और पूरा विश्व ही आधुनिक कहलाएगा।

- Published/Last Modified on: September 7, 2016