ज्ञान-विज्ञान व खोज (Science and Discovery in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना:-विश्व के कोई भी वैज्ञानिक किसी भी विषय पर तकनीकी कार्य करते रहते है जिससे लोगो का आने वाला जीवन आनंदमय बन जाये। आज उन्हीं से हम आपके के लिए कुछ नई ज्ञान -विज्ञान व खोज से संबंधित तकनीकी लेकर आये जो निम्न हैं-

कैब्रिज विश्वविद्यालय:- के वैज्ञानिकों ने मानव का कृत्रिम दिमाग बनाया है। इसके लिए नाक, लीवर (यकृत) या पैर के नाखुन की कोशिकाओं से स्टेम (प्रतिपादक) सेल (कोशिका) को लिया जाता है। जब एक खास स्तर पर ब्रेन (दिमाग) सेल विकसित हो जाती हैं तो उन्हें जैली जैसी एक तरल में डाल दिया जाता है जो इस बेबी ब्रेन के चारों तरफ सुरक्षा घेरा बनाता है। इसके बाद इसको जरूरी पोषकता दी जाती है और तीन महीने में यह बेबी ब्रेन बनकर तैयार हो जाते हैं। लेकिन इसमें सोचने की क्षमता नहीं होती हैं। इस ब्रेन के विकास से ऑटिज्म व शिजोफ्रेनिया जैसी बीमारियों के इलाज में मदद की उम्मीद हैं।

हड्डियां:-

हड्‌िडयों से जुड़ी 12 दिलचस्प जानकारी निम्न हैं-

  • हमारी हड्डियों की संख्या क्यों घट जाती है?- जन्म के समय शरीर में 300 हड्डियां होती हैं लेकिन मृत्यु के समय तक शरीर में सिर्फ 206 बचती हैं। इसकी वजह कई हड्डियों जैसे खोपड़ी आदि का जुड़कर एक इकाई बन जाना है। 18 वर्ष की आयु के बाद हड्डियों का विकास बंद होना यानी इनमें फ्यूजन होना है।
  • इन्हें स्वस्थ्य कैसे रखे?- हड्डियों का घनत्व 30 की उम्र तक बढ़ता हैं। इसके बाद व्यायाम न करने, कैल्शियम (एक रासायनिक पदार्थ) की कमी से डेसिटी कम होती जाती है।
  • कैसे जुड़ती हैं टूटी हड्डियों? - हड्डियों की क्षतिग्रस्त हुई सतह के तंतु आपस में जुड़कर खुद को सिल लेते हैं और एक नई हड्डियों का रूप ले लेते हैं।
  • काम का है कंकाल- ये हमें सहारा देकर सक्षम बनाता है। दिमाग, दिल और फेफड़ों को सुरक्षा देता है। रक्त कोशिकाओं का निर्माण करता है और उन सभी जरूरी पोषक तत्वों को सुरक्षित व नियमित करता है जो शरीर के लिए जरूरी होते है।
  • सबसे ज्यादा हड्डियां - हमारे हाथ, अंगुलियों और कलाई में सबसे ज्यादा 54 हड्डियां होती हैं जो हमें लिखने, कुछ पकड़ने और हर तरह का काम करनें में मदद करती हैं।
  • सबसे बड़ी और छोटी- जांघ की 19 इंच फीमर हड्डि शरीर में सबसे बड़ी होती है। वहीं कान में घुंडी नुमा स्टेपीज नाम की 0.11 इंच की हड्डि सबसे छोटी होती है। हड्डियों की मजबूती के लिए कैल्शियम युक्त चीजें लें। विटामिन-डी के लिए सुबह 30 मिनिट धूप में जरूर बैठें।
  • जीवित टिश्यू हैं- हड्डियों में कोलेजन टिश्यूज प्रोटीन होता है जो खुद को हमेशा जीवित और प्रगतिशील बना रखता है। ये शरीर में इतनी तेजी से खुद-ब-खुद बनता व बढ़ता रहता है कि आने वाले सात साल में हमें एक नया कंकाल मिल सकता है।
  • हमारे दांत भी हड्डियां हैं- नहीं, उन्हें हड्डियां नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनमें हड्डियों की तरह कैल्शियम और मिनरल्स (खनिज पदार्थ) तो होता है लेकिन कोलेजन टिश्यू नहीं। इसलिए ये लचीले नहीं होती है।
  • महिलाओं व पुरुषों की हड्डियों में अंतर- लगभग समान हैं लेकिन बनावट व आकार का फर्क केवल पेट के नीचे वाले भाग की पेल्विस हड्डियों में हैं।
  • हड्डियां कभी नहीं घूमती- आमतौर पर लोगों में भ्रम है कि हड्डियां घूम जाती है लेकिन ऐसा नहीं है। हड्डियां नहीं बल्कि उनके जोड़ो में घुमाव होता है। जैसे घुटने के जोड़े।
  • कुछ जोड़ चटकते क्यों हैं?- मांसपेशी व तंतु (लिगामेंट) विभिन्न जोड़ को सपोर्ट (सहारा) देते है। जिसमें लचीली हड्डियां भी मदद करती हैं। इनके घिसने पर जोड़ चटक जाते हैं।
  • ’फनी बोन’ (विचित्र, हड्‌डी) देती झन्नाटा- यह एक हड्डि नहीं बल्कि कोहनी में मौजूद की एक अल्नर नस है जो बाहर की ओर स्थित है। किसी चीज से टकराने पर इसमें झन्नाहट दर्द होता है।

ईबस तकनीक:-

  • फेफड़ों के बीच के हिस्से (मीडियास्टीनम) में गांठों की समस्या, टीबी के अलावा कई बार कैंसर आदि के कारण भी हो सकती है। ऐसे में स्थिति स्पष्ट करने के लिए इस स्थान से सैंपल (नमूना) लेकर बायोप्सी की जाती है। बेहद नाजुक इस हिस्से में भोजन नली, हृदय व विभिन्न प्रकार की ग्रंथियां होने के कारण अब तक सैपंल लेने के लिए मरीज का ऑपरेशन करना पड़ता था। लेकिन एंडो ब्रोंकियल अल्ट्रासाउंड (ईबस) तकनीक बिना ऑपरेशन सैंपल लेने में कारगर है।

जाँच-

  • मरीज को लोकल (आंशिक/स्थानीय) एनेस्थीसिया (निश्चेतना) देने के बाद एक विशेष प्रकार के टेलिस्कोप (दूरबीन) को उसके मुंह के जरिए श्वास नलियों तक पहुंचाया जाता है और उस हिस्से की सोनोग्राफी की जाती है। गांठ की स्थिति दिखने पर सूई से सैंपल लेते है। जांच में करीब एक घंटे का समय लगता है जिसके बाद मरीज को करीब दो घंटो तक चिकित्सक देखरेख में रखा जाता है।
  • जाँच के दौरान गांठो के फेलाब से यह भी पता चलता है कि कैंसर कौनसी स्टेज का है। टीबी, फेफड़ों व आसपास की विभिन्न ग्रंथियों में सूजन की समस्या का भी पता लगाया जाता है। हालांकि यह जांच सुरक्षित है। कुछ मामलों में इसके कारण कुछ दिनों तक मरीजों के गले या छाती में दर्द रह सकता है। दवा का असर रहने तक नींद आने की समस्या भी हो सकती है। यह जांच जयपुर के अस्थमा भवन में उपलब्ध है। जिसका खर्च 10 हजार रुपए है।

कलकत्ता:-

  • कोलकत्ता की जाधवपुर विश्वविद्यालय के खोजकर्ताओं ने बिजली बनाने का एक अनुठा तरीका ढूंढा है। उन्होंने मछली के शल्क को रिसाइकिल (इस्तेमाल की गई वस्तु का पुन:निर्माण करना) कर उससे ऐसा रेशा विकसित करने का दावा किया है, जिससे आसपास की यांत्रिक ऊर्जाओं जैसे, हवा के चलने, शारीरिक गति, मशीन व ध्वनियों से निकले वाले कंपन को सरलता से विद्युत ऊर्जा में बदला जा सकेगा।
  • विश्वविद्यालय की ऑर्गेनिक (आंगिक) नैनीपीजोइलेक्ट्रिक डिवाइस (विशेष प्रयोजन के लिए निर्मित वस्तु) लेबोरेटरी (प्रयोगशाला) से जुड़े असिस्टेंट प्रो. (सहायक महाविद्यालय/विश्वद्यािलय के अध्यापक) दीपाकर मंडल के मुताबिक इसके लिए मछली के शल्क को प्रोसेस (प्रक्रिया) कर बायो-पीजोइलेक्ट्रिक नैनोजेनरेटर विकसित किया जा सकेगा। मंडल के अनुसार मछली का शल्क कोलेजन नाम के रेशे से मिलकर बना होता है। कोलेजन नैनोफाइबर भी पीजोइलेक्ट्रिसिटी उत्पन्न करने में सक्षम है, लेकिन किसी ने अभी तक मछली में पाए जाने वाले कोलेजन नैनोफाइबर पर ध्यान नहीं दिया। वैज्ञानिकों के अनुसार कोलेजन के एक फाइबर (रेशे) तंतु से 50 एलईडी बल्बों को रोशन किया जा सकता है।
  • दीपांकर मंडल के अनुसार उनका लक्ष्य भविष्य में बायो पीजोइलेक्ट्रानिक नैनोजेनरेटर को हार्ट (दिल) के पेसमेकर में लगाना है। उम्मीद करते हैं कि हमारा काम स्व संचालित और इलेक्ट्रानिक्स (बिजली) के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़ेगा।

रोबोट:-

  • ऑक्सफोर्ड जॉन रेडक्लीफ अस्पताल के चिकित्सको की टीम ने दुनिया में पहली बार रोबोट की मदद लेकर मनुष्य की आंख की सर्जरी की है। चिकित्सकों ने आंख से एक मिलीमीटर के सौवें हिस्से से भी पतली झिल्ली हटाकर वापस रोशनी लौटाने में कामयाबी पाई है।
  • चिकित्सको को उम्मीद है कि यह तकनीक मौजूदा समय में इंसानी हाथों दव्ारा संभव आंखों के ऑपरेशन की तुलना में बेहद जटिल ऑपरेशन (शल्य-क्रिया) के रास्ते खोलेगी। ऑपरेशन के बाद दोबारा रोशनी पाने वाले 70 साल के मरीज पादरी बिल बीवर ने कहा, यह मेरे लिए किसी परी कथा से कम नहीं है। सर्जरी (शल्य चिकित्सक) करने वाले ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर (अध्यापक) रोबर्ट मैकलर्न के अनुसार, आंख के पीछे ऑपरेशन करने में बेहद सावधानी की जरूरत होती है। आंख की दीवार के एक छोटे से छेद से आंख को बगैर कोई नुकसान पहुंचाए रोबोट सिस्टम (प्रबंध) से सारी प्रक्रिया को करना एक चुनौती था।
  • पतली सुई को आंख में चलाने के लिए जॉय स्टिक और टच (स्पर्श) स्क्रीन (पर्दे) का इस्तेमाल किया और माइक्रोस्कोप (सूक्ष्मदर्शी) से पूरी प्रक्रिया पर नजर रखी गई। यह रोबोट सर्जन के हाथों से लगने वाले झटकों को रोकने में भी सक्षम है।
  • आंख जैसे नाजुक अंग में ऑपरेशन करना बेहद कठिन कार्य है। क्योंकि आंख का ऑपरेशन करने में बेहद सावधानी की जरूरत होती है।

पोलैंड:-

  • के एक गोताखोर ने दुनिया की सबसे गहरी अंडरवाटर (पानी के अंदर) गुफा खोजने का दावा किया है। यह गुफा हेलेंस्की प्रांत स्थित पूर्वी चेक टाउन के पास 12325 फुट समुद्र की गहराई में है। खोजकर्ता क्रिस्टोक स्टार्नावस्की ने अपनी इस खोज की तुलना 21वीं सदी में कोलबंस दव्ारा की गई खोज से की है। 48 वर्षीय स्टार्नावस्की, समुद्र में 200 मीटर की गहराई तक खुद गए और उसके बाद अडंरवाटर रोबोट भेजा जो कि 404 मीटर गहराई तक गया। ऑपरेटिंग केबल छोटी होने की वजह से रोबोट गुफा की तलहटी को नहीं छू सका।
  • स्टार्नावस्की इसके पहले 2015 में 265 मीटर की गहराई तक जाने में कामयाब हो चुके हैं। हालांकि तब भी वे गुफा की तलहटी तक नहीं पहुंच सके थे। इस करानामें के बाद शरीर को धरती के वातावरण में ढालने के लिए उन्होंने लगभग 6 घंटे तक डिकंप्रेसन चेंबर में गुजारे। उनके अनुसार डाइव (गोता) लगाने में सबसे बड़ी चुनौती पानी का तापमान और मिट्‌टी थी।

अमरीका:-

  • वैज्ञानिकों ने बेहद कम पावर (शक्ति) में अधिक शक्तिशाली चिप लगाने वाला कंप्यूटर सर्किट तैयार किया है। यह सर्किट गणित के केयॉस सिद्धांत पर आधारित है एक्सपट्‌र्स (विशेषज्ञ) के अनुसार यह इतना जटिल और संवदेनशील है कि इसमें बहुत छोटा सा भी परिवर्तन बड़ा बदलाव कर सकेगा।
  • खोजकर्ता के अनुसार, इससे मूर के पुराने पड़ चुके सर्किट के सिद्धांत को भी एक बार फिर प्रभावी तरीके से प्रयोग किया जा सकेगा। मूर के लॉ में कहा गया है कि इंटीग्रेटेड (एकीकृत) सर्किट (परिक्रमा) में ट्रांजिस्टरों की संख्या लगभग हर दो साल बाद दोगुनी हो जाती है।
  • हालांकि अभी यह अपने सैद्धांतिक रूप में है, लेकिन खोजकर्ता को विश्वास है कि कार्यक्रम किए जा सकने वाला ट्रांजिस्टर (एक बिजली युक्त/रेडिया) सर्किट विकसित कंप्यूटिंग क्षमता में जबरदस्त इजाफा होगा बल्कि इसका असर, ट्रांसपोर्ट, शिक्षा व चिकित्सा पर भी पड़ेगा। सबसे महत्वपूर्ण है कि अभी तक सबसे बड़ी बाधा माना जा रहा पावर, इसके बाद बड़ी समस्या ही नहीं रह जाएगा अर्थात्‌ बड़ी समस्या का हल मिल जाएगा।
  • अमरीकी कंप्यूटर वैज्ञानिकों ने एक ऐसा नॉन लिनियर कंप्यूटर सर्किट विकसित किया है, जिससे अधिक शक्तिशाली चिप को बेहद कम पावर में संचालित किया जा सकेगा। साथ ही मूर की पुरानी पड़ चुकी सिद्धांत का भी उपयोग हो सकेगा।
  • हम ट्रांजिस्टर के आकार के मामले में भौतिक विज्ञान की सीमाओं के करीब पहुंच चुके है। इसलिए अब माइक्रोप्रोसेर्स की दक्षता बढ़ाने के लिए नए तरीके खोजने होंगे। इसके लिए हम केयॉस सिद्धांत का प्रयोग करना चाहते हैं। इससे ट्रांजिस्टर सर्किट, अन्य टास्क के लिए प्रोग्राम (कार्यक्रम) तैयार कर सकेगा। नई चिप बेहद कम ट्रांजिस्टारों के साथ अधिक शक्तिशाली प्रोसेसिंग स्पीड (गति) की मांग को पूरा सकेगी।

                                                                        बेहम किआ, नार्थ कैरोलिना स्टेट विश्वविद्यालय से जुड़े और रिसर्च टीम (दल) के नेतृत्वकर्ता

कैंसर की टी सेल थेरेपी (कोशिका उपचार):-

  • पिछले कुछ सालों में कैंसर से निपटने के लिए चिकित्सा विज्ञानियों ने सर्जरी, कीमोथेरपी और रेडिएशन थरेपी जैसे कई उपाय खोजे है।
  • बीते एक दशक में कई टार्गेटेड थेरेपी इजाद किए गए। लेकिन किसी भी तरीके से इस जानलेवा बीमारी पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं पाया जा सकता। अब इस जंग में नई पहल के तौर पर प्रतिरक्षा-विज्ञान की टी-सेल थेरेपी (उपचार) का इस्तेमाल कर इसे जीतने की कोशिश की जा रही है।
  • पिछले 15 सालों में कैंसर पर हुए कार्मो के ऐसे नतीजे नहीं देखे, जैसा इस थेरेपी से अभी तक हासिल हुआ है। वह वास्तव में चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नई क्रांति का सूत्रपात हैं। टी सेल थेरेपी एक जीवित दवा जैसी है। जो कि पूरे जीवनभर हमारे शरीर में रहकर संक्रमणों और बीमारियों से बचाव कर सकती है।

                                                                                                                                                                       चियास बोनानी, खोजकर्ता

  • मानव शरीर के रक्त में पाई जाने वाली श्वेत रुधिर कणिकाओं में बी लिंफोसाइट और टी लिंफोसाइट्‌स होती हैं। इस थैरेपी में कैंसर मरीज के शरीर से टी लिंफोसाइट को अलग कर, उसके साथ लैब में सेमेरिक एंटीजन रिसेप्टर को टैग (मूल्य) किया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद दोबारा उसे मरीज के शरीर में प्रवेश करा दिया जाता है। शरीर में प्रवेश के बाद टी कोशिका कैंसर कारक बी लिंफोसाइट पर सीधा हमला शुरू कर देती हैं। इस चिकित्सा तकनीक को सिमेरिक एंटीजन रिसेप्टर टी सेल थेरेपी या सीएआर-टी तकनीक के नाम से भी जाना जाता है।
  • फ्रेड हचिंसन कैंसर रसिर्च सेंटर के शोधकर्ताओं ने एक स्टडी (अध्ययन) में पाया कि जिन एडवांस (प्रगति) नॉन हॉगकिन लिंफोमा केंसर से पीड़ित मरीजों के इन्यून सिस्टम (प्रबंध) को सेमेरिक एंटीजन रिसेप्टर टी थेरपी से बेहतर किया जा सकता है। सीए आर-टी तकनीक से कैंसर कोशिकाओं को आसानी से पहचान कर उन पर सीधा हमला किया जा सकता है।
  • सीएआर-टी सेल थेरेपी पर किए गए ट्रायल (परीक्षण) के नतीजे बताते हैं कि यह सभी तरह के ब्लड (रक्त) कैंसर के मरीजों के लिए रामबाण है। एक्सपट्‌र्स के मुताबिक यह थेरेपी उन मरीजों के लिए एक बेहतर विकल्प हो सकती है, जो स्टेम सेल ट्रांसप्लॉन्ट (कोशिका ,प्रतिरोपण) या कीमोथेरपी के बाद भी कैंसर से जूझ रहे हैं। अमरीकन एसोसिएशन फॉर एडवांस साइंस के रिसर्चर (संस्था की प्रगति विज्ञान के खोजकर्ता) स्टेनले रिडल इसे चिकित्सा विज्ञान की अभूतपूर्व उपलब्धि बताते हुए कहते हैं, कि टी सेल थेरेपी के नतीजे जिस तरह लास्ट स्टेज (अंतिम चरण) के कैंसर मरीजों में देखे गए, उस पर सहज विश्वास नहीं होता।

मॉडीफिकेशन- (मामूली परिवर्तन करना)

  1. पहले चरण में टी सेल थेरेपी के दौरान सबसे पहले मरीज या किसी तीसरे व्यक्ति के शरीर में श्वेत रक्त कणिकाओं में पाई जाने वाली टी लिंफोसाइट या टी कोशिकाओं को निकाला जाता है। जिनके साथ लैब (प्रयोगशाला) में एंटीजन रिसेप्टर टेंग किए जाते हैं।
  2. दूसरे चरण में मॉडीफाइड कोशिकाओं को खुद का विभाजन कर संख्या बढ़ाने की अनुमति दी जाती है। जिसके बाद उन्हें वापस मरीज के शरीर में प्रवेश कराया जाता है। जहां नए एंटीजन रिसेप्टर टी कोशिकाओं को, कैंसर कोशिकाओं पर हमला करने को प्रेरित करते हैं।

प्रक्रिया- शरीर से रक्त का सैंपल लिया जाता है। उसके बाद रक्त से टी सेल से अलग किया जाता है। फिर टी-सेल रिसेप्टर की मालीक्यूल टेगिंग की जाती है। फिर मोडिफाइड टी-सेल प्रोटीन (सब्जी आदि में पाया जाने वाला पौष्टिक तत्व) रिसेप्टर किया जाता है।

मटका:-

  • जब फ्रिज नहीं हुआ करता था तो लोग ठंडा पानी पीने के लिए मटके का इस्तेमाल करते थे। कई लोग आज भी फ्रिज के बजाय मटके के पानी का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर मिट्‌टी के घड़े में पानी कैसे ठंडा हो जाता है।
  • दरअसल मिट्‌टी के घड़े की दीवारों में असंख्य सूक्ष्म छिद्र होते हैं और इन छिद्रो से पानी रिसता रहता है। जिस कारण घड़े की सतह पर हमेशा गीलापन रहता है। मटके की सतह पर छिद्र अतिसूक्ष्म होते हैं। इन छिद्रो से निकले पानी का वाष्पोत्सर्जन होता रहा है और जिस सतह पर वाष्पोत्सर्जन होता है वह सतह ठंडी हो जाती है। वाष्पोत्सर्जन क्रिया में पानी ही वाष्प बनता है। और यह क्रिया हर तापमान पर होती रहती है। वाष्पोत्सर्जन की क्रिया में बुलबुले नहीं बनते हैं और वायु की गति वाष्पोत्सर्जन की दर को तेज कर देती है। यानी साफ है कि जब घड़े की सतह पर वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया चलती रहती है, जिससे उसकी दीवारों ठंडी रहती हैं और इसी के चलते मटके का पानी ठंडा रहता है।
  • मटका र्प्यावरण के लिए हितकारी होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के नजरिए से भी फायदेमंद है। इसमें रखा पानी पीने से गला खराब होने का डर कम होता है। क्योंकि इसके पानी का तापमान इंसान के शारीरिक तापमान के बराबर होता है।

ब्रिटेन में इंजन और स्पीड (गति) का विज्ञान:- ब्रिटेन में निर्माणधीन, विश्व की सबसे तेज कार के निर्माण प्रोजेक्ट (योजना) को नए स्पान्सर (समर्थक) मिलने के बाद इस पर दोबारा काम शुरू हो गया है। ब्लडहाउंड सुपर सोनिक (ध्वनि के वेग से अधिक वेगशाली) कार प्रोजेक्ट (योजना) के लिए चीन की सातवीं सबसे बड़ी कार कंपनी (जनसमूह) गीले ऑफिसियल (अधिकारी) ऑटोमोटिव पार्टनर (भागीदार) होगी। 85 प्रतिशत तैयार हो चुकी इस कार में अब तक का सबसे बड़ा हाइब्रिड राकेट इंजन लगाया गया है। ध्वनि से भी तेज, (1000 किमी/घंटे) चलने वाली इस कार को ब्रिटिश इंजीनियर (अभियंता), विंग कमांडर रिर्चड नोबल, ऐंडी ग्रीन और रॉन आयसर् मिलकर तैयार कर रहे हैं। इसके अगले साल तक अफ्रीकी के ट्रैक (पदचिन्ह) पर दौड़ने की संभावना जताई जा रही है। अगर इस कार का परीक्षण सफल रहता है तो यह दुनिया की सबसे तेज कार होगी।

इसे बनाने के प्रोजेक्ट की शुरुआत 2007 में हुई थी। लेकिन बीच में बजट की कमी से कई बार रोकना पड़ा था।

  • स्पीड ट्रैक (गति पदचिन्ह)- पर तहलका मचाने एक और ’महा-कार’ के अगले साल तक पदार्पण करने की संभावना है। सामान्य फार्मूला (वैज्ञानिक प्रयोग) वन कारों से आठ गुना अधिक शक्तिशाली इंजन से लैस (कम) यह कार क्या दुनिया की सबसे तेज कार बन पाएगी, यह तो समय ही बताएगा। लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह रेसिंग (दौड़) के साथ इंजन तकनीक की दुनिया के लिए भी ध्रुवतारा बन सकेगी।
  • खासयित-खास-सुपर सौनिक कार ब्लडहाउंड की लंबाई 13.4 मीटर और वजन 7.5 टन है। इसमें झटके झेलने के लिए लगभग 30 टन क्षमता के सस्पेंसन लगाए गए हैं। जो कि स्मूथ ड्राइविंग का अनुभव देने के साथ ही कार इंजन को आघातों से भी बचाएंगे। इसमें लगने वाले इंजन की क्षमता 135000 हार्स पावर (शक्ति) होगी। जो कि 21 टन क्षमता का थ्रस्ट पैदा करेगा। यह किसी भी सामान्य फार्मूला वन कार से आठ गुना अधिक होगा। कार पर नियंत्रण रखने के लिए 6 टन क्षमता के एयरब्रेक लगे होंगे। कार की छत पर धूल जमने से बचाने के लिए उसे स्टील जैसी चिकनी धातु से निर्मित किया गया है। वहीं, चिड़ियों से बचने के लिए इसमें यूरो फाइटर (लड़ाकू) टाइफून (तूफ़ान) के विंडस्क्रीन (कार आदि का सामने का शीशा) जितनी मजबूत केनोपी लगाई गई है। यह केनोपी उच्चतम गति के दौरान 800 ग्राम तक की चिड़िया के टकराव को झेलने में सक्षम होगी।

जापान:-

  • नई तकनीक जापान के इंजीनियर (अभियंता) एक नई तरह की विंडमिल (पवनचक्की) तैयार करके धरती की ऊर्जा जरूरतों को हल ढूंढने का दावा किया है। प्रोजेक्ट सफल रहता है तो जानलेवा तूफानों से बिजली बनाई जा सकेगी।
  • एक जापानी इंजीनियर ने टाइफन से संचालित होने वाली विंड (हवा) टरबाइन (इंजिन या मोटर) बनाने का दावा किया है। यह इलेक्ट्रिसिटी (बिजली) जनरेटर (विद्युत उत्पन्न करने वाला यंत्र) उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के दौरान भी विद्युत उत्पादन कर सकेगा। इसके विकसित करने वाले जापानी इंजीनियर अत्सुशी शिमिजु कहते हैं, उनके बनाए जनरेटर से एक तूफान में इतनी बिजली बनाई जा सकेगी कि उससे आने वाले 50 सालों तक जापान की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा। यह ऊर्जा पूरी धरती पर एक दिन में खपत होने वाली कुल ऊर्जा की आधी होगी। जापान अभी तक यूरोप से विंडमिल का आयात करता है।

टरबाइन (इंजिन या मोटर) -

  • को अनचाहे हिंसक तूफानों को झेलने लायक बनाने के लिए उसे अडजेस्टेबल (समायोजित किए जा सकने वाले) ब्लेड और गति नियंत्रक लगाए गए हैं जिससे टरबाइन की गति पर नियंत्रण रखा जा सके। यह मैग्नस सिद्धांत पर काम करती है। जिसमें हवा का घुमाव, ब्लेड के चारों ओर इस तरह होता है कि वह घूमने लगती है।
  • यह एक बहुत चुनौती भरा प्रोजेक्ट है। इसमें सफल हो पाने की गुंजाइश भी बेहद कम है। क्योंकि दुनिया में अभी तक इतनी अधिक क्षमता की बैट्री नहीं विकसित की जा सकती है, जो इस टरबाइन से पैदा होने वाली बिजली का भंडारण कर सके। लेकिन यह हमारे लिए एक मौका और ऐसी तकनीक है, जिसकी हमें जरूरत है। मैं डॉन क्वीक्सोटाइ की तरह बात कर रहा हूं। वे हार गए थे पर मैं जीतेन जा रहा हूं।

                                                                                                                                                      अत्सुशी शिमिजु, जापानी इंजीनियर

रसायन विज्ञान:-

  • के लिए इस सरल केमिस्ट्री के लिए फ्रांस के ज्यां-पियरे सोवेज, ब्रिटेन के डॉ. जे फ्रैसर स्टाडर्ट व नीदरलैंड के बर्नार्ड फेरिंगा को चुना गया है। तीन वैज्ञानिक और तीन ही दशकों की यह मेहनत आखिरकार दुनिया के लिए एक नायाब मशीन लाई है। रसायन विज्ञान में नोबेल के लिए चुने गए।
  • डॉ. जयां -पियरे सोवेज, डॉ. जे फ्रैसर स्टाडर्ट और बनार्ड फेरिंगा ने एक आणविक मोटर विकसित की है। इसका आकार मानव बाल के हजारवें हिस्से के बराबर है। दुनिया की इस सूक्षमतम मैकेनिकल (यांत्रिकीय) डिवाइस (विशेष कार्य के लिए निर्मित की गई वस्तु) से वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि भविष्य में, नए तरह के स्टोरेज सिस्टम (जमा प्रबंध) विकसित किए जा सकेंगे। रॉयल (राजकीय/भव्य रूप से) स्विडिश एकेडमी (विदव्ानों की समिति) ने पुरस्कार घोषणा के दौरान इस आविष्कार की तुलना 1830 में बनी पहली इलेक्ट्रिक मोटर (विद्युत वाहन) से की।
  • वैज्ञानिकों ने कहा दो दशकों में पहली बार आणविक स्तर पर कोई गतिशील डिवाइस (विशेष कार्य के लिए निर्मित की गई वस्तु) विकसित हुई है। रसायनों की तिकड़ी ने लंबे रिसर्च (खोज) के बाद रिंग के आकार के अणु को संश्लेषित करने में सफलता पाई है। हालांकि खोजकर्ताओं को इस बात का पता पहले से था।

महत्वपूर्ण- इस आविष्कार ने नैनो तकनीक विकास के अगले चरण में प्रवेश किया है। डॉ. बर्नार्ड फेरिंगा ने कहा, यह चिकित्सा विज्ञान को नया आयाम देगा। भविष्य में चिकित्सा सीधे आणविक रोबोट को बीमार व्यक्ति की नसों में प्रवेश करा सकेंगे। जो कि कैंसर कोशिकाओं को तलाश सकेगा। यह टार्गेटेड ड्रग में भी बड़ी भूमिका निभाएगा।

विकासक्रम निम्न हैं-

  • 1983 में आणविक मोटर बनाने का तरीका खोजा।
  • 1999 मालीक्यूलर मोटर विकसित की गई।
  • 15 साल में मोटर की गति बढ़ाने में पाई सफलता।
  • 2011 में बनाई चार पहिया मालीक्यूलर कार।

यह खोज, नैनोमशीन बनाने के लिए नए दरवाजे खोलने जैसा है। हम ऑटोमेटिक मशीन में बदलना चाहते है। अब इसके सुरक्षित उपयोग के बारे में सोचना है।

                                                                                                                                                            डॉ. बर्नार्ड फेरिंगा, नोबेल विजेता

रसायन विज्ञान के हीरो- प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी और नोबेल पुरस्कार विजेता रिचर्ड फेनमैन ने 1959 में नैनो तकनीकी के दूसरे चरण की नींव रखी थी। उसे अगले मुकाम तक पहुंचाने का काम इन तीन रसायन विज्ञानियों ने किया इस सफलता में उनका तीन दशक लंबा संघर्ष है।

  • डॉ. ज्यां-पियरे सोवेज-उम्र 71 वर्ष, जन्म पेरिस योगदान, 1983 में रिंग आकार वाले अणुओं को आपस में जोड़ने में सफल हुए इसे कैटे नेन कहते हैं।
  • डॉ. केजे फ्रैसर स्टाडर्ट- उम्र 74 वर्ष जन्म-एडिनबर्ग (ब्रिटेन), योगदान- मोटर के पाट्‌र्स के लिए 1991 मेंरोटाएक्सेन विकसित किया।
  • बनार्ड फेरिंगा-उम्र: 64 वर्ष, जन्म नीदरलैंड, योगदान फेरिंगा ने 1999 में दुनिया की पहली सूक्ष्मतम मोटर विकसित करने में सफलता पाई।

भौतिक विज्ञान- में वर्ष 2016 का नोबेल पुरस्कार ब्रिटेन के तीन वैज्ञानिकों को संयुक्त रूप से दिया जाएगा। यह पुरस्कार तत्वों के विविध रूपों से जुड़ी खोज के लिए दिया जाएगा। नोबेल कमेटी (समिति) के अनुसार वैज्ञानिकों ने अबूझ दुनिया को समझने के लिए दरवाजे खोले हैं।

  • डेविड थूल्स-जन्म 1934, योगदान, 1980 के दशक में थूल्स ने व्याख्या की कि किसी परतों में प्रवाहित हो रही विद्युत का कंटक्टेंस पूर्णाक में मापना संभव है।
  • डंकन हाल्डेन-जन्म 1951, लंदन में, योगदान- हाल्डेन ने बताया, कैसे विभिन्न तत्वों में पाए जाने वाले चुंबकों के गुणों को समझने में टोपोलॉजी थ्योरी (सिद्धांत) का प्रयोग हो।
  • माइकल कोस्टरनिट्‌ज- जन्म 1951, लंदन, योगदान इन्होंने पुराने सिद्धांतों को पलटते हुए बताया कि निम्न ताप पर सुपर (असाधारण) कंडक्टिविटी संभव है।

एडवांस टेक्नोलॉजी (प्रगति, तकनीकी विधियाँ):-

  • अक्सर हम अपने पार्सवर्ड (गुप्त शब्द, विशेषत: किसी स्थान में प्रवेश पाने या कंम्यूटर को चलाने के लिए) भूल जाते हैं। लेकिन कैसा हो कि आपका दिमाग ही आपके कंप्यूटर का पासवर्ड बन जाए। टेस्सॉस टेक विश्वविद्यालय में कुछ ऐसी ही तकनीक विकसित करने की पहल की जा रही है।
  • टेस्सॉस टेक (समझना/ग्रहण करना) विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अब्दुल सेरवडडा और उनके साथियों ने एक स्टडी (अध्ययन) में पाया है कि दिमाग की तरंगों का उपयोग कंप्यूटर पासवर्ड के रूप में किया जा सकता है। व्यवहारिक और बायोमेट्रिक सिद्धांत पर आधारित यह सुरक्षा सिस्टम (व्यवस्था) एक पासवर्ड की तरह काम करता है जो सर्विस (सेवा) के पहले असली यूजर (उपयोगकर्ता) की पहचान करता है। दरअसल यह सिस्टम व्यवहार और दिमागी पैटर्न (संरक्षक) से संचालित होने की वजह से अंधे जैसा होता है। वह सिर्फ और सिर्फ तरंगे और हावभाव पढ़ता है।
  • साइबर सुरक्षा विषय पर प्रोफेसर सेरवडडा ने कहा कि तकनीक ने इंसान की दिमागी तरंगों को पासवर्ड के रूप में प्रयोग करने के दरवाजे तक पहुंचा दिया है, लेकिन अभी इस क्षेत्र में बहुत अधिक खोज की जरूरत है। नेशनल साइंस फाउंडेशन (राष्ट्रीय विज्ञाव नींव) तीन साल के एक प्रोजेक्ट (योजना) के लिए फंड (विशेष कार्य के लिए जमा किया गया धन) भी दे रहा है। इसका उद्देश्य ईईजी ब्रेन पैटर्न व्यवाहारिक तौर तरीकों को कैसे सुरक्षा के रूप में उपयोग किया जाए इस बात की खोज करना है।

अलास्का और सर्बिया:-

  • धरती की गहराई में एक पिघले लोहे की नदी बह रही है। यह अलास्का और सर्बिया के पश्चिम में है। यह लौह नदी धरती की सतह से 3,000 किलोमीटर नीचे है। 420 किलोमीटर चौड़ी और करीब 7,000 किलोमीटर लंबी नदी का विस्तार 5,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में बताया जाता है। धरती के नीचे खोजी गई इस लौह नदी का तापमान सूर्य की सतह के तापमान के आसपास है।
  • टेक्निकल (तकनीकी) यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) ऑफ (का) डेनमाकर् के वैज्ञानिको की इस खोज के बारे में नेचर (सृष्टि/स्वभाव) जियोसाइंस जर्नल (सामान्य) में छपी एक रिपोर्ट (विवरण) में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसका पता लगाने में तीन यूरोपीय सैटेलाइट्‌स (उपग्रहों) से हासिल डेटा (आंकड़ व तथ्य) का प्रयोग किया गया है।
  • धरती के नीचे बहने वाली लौह नदी का पता यूरोपियन अल्फा, चार्ली और ब्रैवो ने मिलकर लगाया है। इन्हें 2013 में लान्च (शुरू) किया गया था। अल्फा और चार्ली धरती की सतह से 450 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कक्षा में है, जबकि ब्रैवो धरती से 500 किलोमीटर दूर की कक्षा में है। टीम (समूह) के वैज्ञानिक फिनले कहते है कि इससे धरती के आकार की भौतिकी को बेहतर तरीके से समझ कर भविष्य में इस ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तनों की भविष्यवाणी की जा सकेगी।
  • इस पिघले लोहे की नदी की धारा धरती के नीचे बहने वाली सबसे तेज गति की जलधाराओं से भी थोड़ा ज्यादा ही है और इसमें लगातार वृद्धि होती देखी जा रही है। वर्तमान में यह एक साल में 45 किलोमीटर की दूरी तय कर रही है। हालांकि इस प्रवाह और परिवर्तन के लिए कौन-सा कारक जिम्मेदार है इस बात की जानकारी हासिल नहीं हो सकती है।
  • रिसर्च टीम (खोज समूह) के वरिष्ठ वैज्ञानिक क्रिस फिलने के अनुसार, ऐसा शायद धरती के कोर के चुंबकीय क्षेत्र में बनने वाली यह जेट स्ट्रीम (छोटी संकरी नदी/धारा) धरती की भीतरी कोर के रोटेशन (घूर्णन) दर में परिर्वतन के कारण भी हो सकती है।

सिंथेटिक (कृत्रिम रीति से बना) अंग:-

  • वेक फॉरेस्ट (जंगल) यूनिवरर्सिटी के रिसर्चरों (विश्वविद्यालय के खोजकर्ताओं) ने एक ऐसा 3 डी बायो प्रिंटिग (छापने की क्रिया) टूल (कारीगर के औजार) तैयार किया है, जिससे न केवल अस्थि, पेशीय तंतु व कान के बाहरी हिस्से जैसी चीजें प्रिंट (छाप) की जा सकेंगी, बल्कि उससे सिंथेटिक अंग भी बनाए जा सकेंगे।
  • रिसर्चरों ने इस टूल से बनाए अंगो का जानवरों में सफल प्रत्यारोपण भी किया। उन्हें उम्मीद है कि थोड़ा और रिसर्च कर वह इन सिंथेटिक अंगों को मानव में प्रत्यारोपित कर सकेंगे।
  • नेचर (स्वभाव) बायोटेक्नोलॉजी (जैविक तकनीकी) पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट (विवरण) अनुसार इस टूल (कारीगर के औजार) को इंटीग्रेटेड (एकीकृत) टिश्यू ऑर्गन (अंग) प्रिंटिंग सिस्टम (छापने की क्रिया का प्रबंध) कहा जाता है। इससे जैविक रूप से अपघटित होने वाले सिंथेटिक टिश्यू बनाए जाते हैं।
  • रिसर्चरों ने इस प्रयोग के दौरान मानव जबड़े की एक अस्थि, कान का बाहरी हिस्सा व मुलायम पेशीय उत्तक बनाए। उन्होंने बना अंगों का एक छोटा नमूना चूहे में प्रत्यारोपित किया। प्रत्यारोपण के कुछ हफ्ते बाद पाया कि सिंथेटिक टिश्यू चूहे के असली टिश्यू से जुड़ किए।

एचआईवी:-

  • एड्‌स के लिए जिम्मेदार एचआईवी वायरस को जड़ से खत्म करने के लिए शोधकर्ता ने नई दवा तैयार करने का दावा किया है। एचआईवी की दवाओं का परीक्षण करने वाली संस्था एचवीटीएएन, दक्षिण अफ्रीका में 14 जगहों पर इस दवा का परीक्षण कर रही है। यह दवा एचआइवी के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकती है अगर यह दवा 60 फीसदी भी कारगर सिद्ध होती है तो बड़ी संख्या में एचआईवी पीड़ित आबादी वाले दक्षिण अफ्रीका के देशों के लिए यह वरदान साबित होगी। इसके नतीजे 2020 तक मिलेंगे।

उपसंहार:- इस प्रकार कई प्रकार के ज्ञान, विज्ञान, व खोज के बारे में हमे दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने अवगत कराया है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत ही लाभदायक है।

- Published/Last Modified on: January 10, 2017

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