विज्ञान और विश्वास (Science and Faith - in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना: - विज्ञान की अवधारणा मानव को एक बेहतर जीवन के लिए अग्रसर करती है। आग जलाने और पहिए के आविष्कार से मानव ने विज्ञान के ककहरे को सीखा, चाहे अनजाने में ही। तब से वर्तमान तक मानव विज्ञान के सिद्धांतों को आत्मसात कर रहा है। लेकिन कई बार विश्वास के चश्मे से विज्ञान पर संदेह ही तस्वीर उभरने लगती है। फिर चाहे वो डार्विन का क्रमिक विकास का सिद्धांत हो। विज्ञान और विश्वास के बीच संघर्ष। लेकिन संदेह के पीछे ठोस तथ्य हों, सरकारें आगे आएं। बेहतर वैज्ञानिक समाज के निर्माण के लिए।

Image of Science and faith

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विज्ञान और विरोधाभास: - हम संशय के युग में जी रहे हैं। कई देशों में विज्ञान और वैज्ञानिक विचारों पर हमला हो रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक तथ्य से इनकार करते हैं। यूरोप में भी विज्ञान विरोधी विचारों को बल मिल रहा है। यूरोप के कई देशों में लोगों का मानना है कि वैक्सीन (टीका) हानिकारण होते हैं। हाल के वर्षों में भारत में भी विज्ञान विरोधी विचारों ने घुसपैठ कर ली है। राजस्थान के प्राथमिक शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने न्यूटन को गुरुत्वाकर्षण के नियम का श्रेय देने पर सवाल उठाया है तो केन्द्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री एसपी सिंह ने डार्विन के क्रमिक विकास के सिद्धांत को ही खारिज कर दिया है। सिंह ने अपने बयान के द्वारा अमरीका की उत्पत्ति के वैज्ञानिक सिद्धांत विरोधी लॉबी (सभाकक्ष) का समर्थन किया है। जबकि सिंह स्वयं उच्च शिक्षित हैं। लेकिन सोशल (सामाजिक) मीडिया (संचार माध्यम) पर एक समूह द्वारा सिंह के बयान का समर्थन किया गया। सिंह का बयान उस रणनीति का हिस्सा है जिसमें वैज्ञानिक तथ्यों को एक विचारधारा के तहत समाहित करने का प्रयास किया जाता है। अमरीका और यूरोप के साथ-साथ इस्लामी देशों में भी यही हाल है। पाकिस्तान में विद्यालयी किताबों में डार्विन के सिद्धांत को गैरतार्किक करार दिया गया है। तालिबान भी विद्यालयी में विज्ञान की पढ़ाई के कारण तालिबान हमले करता है। सिंह कहते हैं डार्विन के सिद्धांत पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाई जाए। ये खतरनाक हालात हैं क्योंकि भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों में मानवीयता के साथ वैज्ञानिक सोच समाहित है। हालात ये हैं कि सरकार के द्वारा इस प्रकार के बयानों का जोरदार खंडन नहीं किया जाता है। गैर वैज्ञानिक बयानों को जनता गंभीरता से नहीं लेती है। लेकिन आज के डिजिटल (अंकसंबंधी) युग में इस प्रकार के बयान चुनौती भी है। ये छद्म विज्ञान या उत्पत्ति विज्ञान को बढ़ावा देते हैं। पाठयपुस्तकों से उत्पत्ति के वैज्ञानिक सिद्धांत को बदलने से हम गैर तार्किक पीढ़ी को तैयार करेंगे। वैज्ञानिक सोच पैदा करने से अभिप्राय लैब (प्रयोगशाला) में प्रयोग करना और रिसर्च (अध्ययन) पेपर (कागज) तैयार करना हैं। तार्किक सोच से आम व्यक्ति का रोजमर्रा का जीवन बेहतर हो सकता है।

दिनेश सी. शर्मा, इंडिया साइंस वायर के एडिटर

विज्ञान और तथ्य: - वैज्ञानिक तथ्यों को प्रमाण की कसौटी पर कसा जाता है। समसामयिक इतिहास में कुछ वैज्ञानिक तथ्य ऐसे भी हैं जिन्हें लेकर कुछ समूहों का मानना है कि ये सच नहीं हैं। जबकि इन्हें तथ्यों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका हैं।

  1. जलवायु परिवर्तन- आधुनिकीकरण के नाम पर प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के बेलगाम दोहन से दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन हो रहा है। नासा और विश्व की कई प्रतिष्ठित एजेंसियां (शाखाएं) इसे तथ्यों के द्वारा प्रमाणित कर चुकी हैं। लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का जलवायु परिवर्तन की अवधारणा को नहीं मानते हैं। दुनिया के सभी देश जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर कर चुके हैं लेकिन अमरीका ने अब तक इस करार पर समझौता नहीं किया है।
  2. महामशीन से खतरा-ब्रह्यांड के रहस्यों को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने बिग (बड़ा) बैंग (धमाका) के हालातों का वैज्ञानिक प्रयोग शुरु किया। फ्रांस और स्विट्‌जरलैंड की सीमा पर लार्ज हैडरॉन कोलाइडर नामक महामशीन बनाई गई है। लेकिन इसके निर्माण के साथ ही कई समूहों का कहना है कि इससे प्रलय आ सकता है। यूरोप में तो कई संगठन अब तक इसका विरोध करते हैं। उनका कहना है कि महामशीन के इस महाप्रयोग से प्रकृति में विनाशकारी परिणाम सामने आएंगे।

घटनाएं और तथ्य: - विश्व में आज भी कई युतांकारी घटनाओं को संदेह की नजर से देखा जाता है। तथ्यों के आधार पर ये घटनाएं प्रमाणित हैं। लेकिन इन्हें लेकर आज भी कुछ समूहों द्वारा इन पर सवाल उठाए जाते हैं।

  1. किसकी थी करतूत-अमरीका में सितंबर, 2001 में ट्‌िवन टावरों (मीनारों) पर हुए आतंकी हमलों में कुछ समूहों द्वारा खुद अमरीकी सरकार का हाथ माना जाता है। अमरीका में आज भी 9/11 टुथ मूवमेंट (दांत आंदोलन) नामक संगठन इस पर काम कर रहा है। उनका तर्क है कि जिस प्रकार से ट्‌िवन टावर जमींदोज हुए थे वो एक तरह से कंट्रोल्ड (नियंत्रण) एक्सप्लोजन (विस्फोट) था। साथ ही हमले के दिन बड़ी संख्या में यहूदी कर्मचारियों का छुट्‌टी लेने का तर्क भी दिया जाता है। वैसे अमरीकी सरकार इन तथ्यों को खारिज कर चुकी है।
  2. चंद्रमा पर मानव-सर्वविदित वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव ने वर्ष 1969 में चंद्रमा पर कदम रखा था। लेकिन आपको ये जानकार आश्चर्य होगा कि स्वयं अमरीका में ही कई समूहों का मानना है कि वियतनाम युद्ध से जनता का ध्यान हटाने के लिए नासा ने इसे रचा था। वर्ष 2001 में फॉक्स टीवी (टेलिविजन) नेटवर्क (जाल पर कार्य) ने एक डॉक्यूमेंट्री (दस्तावेज) में बताया था कि किस तरह अमरीका ने 70 के दशक में ’स्पेस (अंतरिक्ष) रेस (दौड़) ’ में सोवियत संघ को पछाड़ने के लिए मून (चांद) लैंडिंग (अवतरण/भूमि पर उतार) का वीडियो जारी किया था।

वैज्ञानिक पहल: - सभ्यता से मध्यकाल- आज हम वैज्ञानिक आविष्कारों के बारे में ध्यान भी नहीं देते हैं, लेकिन सभ्यता के विकास से मध्यकाल तक इन्होंने संपूर्ण मानवीय अस्तित्व को एक नई दिशा दी है। आज की वैज्ञानिक सोच मानव के इन शुरुआती सोपानों का ही परिणाम है। तीन मुख्य आविष्कार निम्न हैं-

  1. पहिए से रफ्तार-मानव ने लगभग 3500 ईसा पूर्व पहिए का आविष्कार किया था। चाक के पहिए से रथों में लगने तक इसने काफी लंबा सफर तय किया है। पहिए में लगने वाली धुरी (एक्सल) से बड़ा बदलाव हुआ।
  2. कील से आई क्रांति-आज साधारण सी दिखने वाली कील का भी मानव सभ्यता के बदलाव में बड़ा हाथ रहा है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में यूनानी खोजकर्ता आर्केमीडीज ने स्क्रू वाली उन्नत कीलों का आविष्कार किया था।
  3. दिक्सूचक से ’दिशा’- शुरुआती दौर में नाविक तारों के जरिए दिशा का पता करते थे। 9 वीं शताब्दी के बाद चीन के नाविकों ने दिक्सूचक या कंपास का आविष्कार किया। मध्ययुग में इससे नए महादव्ीपों की खोज हुई।
  4. कागज पर अक्षर- जर्मन आविष्कारक गुटेनबर्ग ने 15 वीं शताब्दी में यांत्रिक छपाई वाली प्रिटिंग प्रेस (छापाखाना) का आविष्कार किया। किताबों के रूप में ज्ञान-विज्ञान के प्रसार में प्रिटिंग प्रेस (छापाखाना) ने अहम भूमिका को निभाया है।

तीन आधुनिक खोज से बदली दुनिया: - वैज्ञानिक खोज से दुनिया में कई बदलाव हुए लेकिन इन 3 आधुनिक खोजों से मानव जीवन बदल गया। इनके जरिए मानव को बेहतर की ओर के मार्ग में आसानी भी मिली।

  1. उजियाला-मशाल, दीये और लालटेन में टिमटिमाती दुनिया को 1879 में थॉमस एडिसन ने रोशनी बल्ब का नायाब तोहफा दिया। इससे जल्द ही पूरी दुनिया में रोशनी फैल गई। लोगों की कार्य अवधि में भी इजाफा हुआ। औद्योगिक क्रांति के प्रसार में रोशनी बल्ब का अहम योगदान है।
  2. सेहत-पेनिसिलिन का आविष्कार भले ही अनजाने में हुआ लेकिन वैेज्ञानिक एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने समूची मानवता को सेहत का मंत्र प्रदान कर दिया। जीवाणु जनित रोगों से लोगों को निजात मिली। वर्ष 1944 से पेनिसिलिन का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ।
  3. संवाद-आज इंटरनेट शब्द किसी परिचय का मोहताज नहीं है। कई लोगों के अथक प्रयासों से संवाद का ये अनूठा माध्यम विकसित हुआ। अमरीकी वैेज्ञानिक लॉरेंज रॉबर्ट द्वारा 1960 के दशक में विकसित ’अरपानेट’ आज दुनिया भर में संवाद के माध्यम इंटरनेट का शुरुआती रूप था।

अन्वेषण जरूरी: - मानव का स्वभाव है हर चीज के बारे में शोध करना।

विचार-समाज में बहुत से लोग वैज्ञानिक तथ्यों को अपने विश्वास के अनुसार मानने लगते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि कई बार लोगों को इससे फायदा मिलता है और बहुत बार लोगों का समर्थन भी मिलता है। ऐसे लोगों को समर्थक वर्ग भी उनके अनुसार विश्वास जताने लग जाता है। समर्थक उस व्यक्ति पर आश्रित होने या अन्य किसी प्रभाव के कारण विश्वास जताते हैं। कई बार लोग विश्वास न जताने के कारण किसी नुकसान होने की आशंका की वजह से भी विश्वास करती हैं। जैसे माना जाता है कि आग के अंगारों पर चलेंगे तो पैर जल जाएगा। लेकिन कई लोग चलते हैं पर उनका पैर नहीं जलते हैं। फिजिक्स (भौतिक विज्ञान) का सिद्धांत बताता है कि तेजी से चलने से पैर नहीं जलता है। विज्ञान में हर बात को साबित करने के प्रमाण की जरूरत पड़ती है और जब तक प्रमाण नहीं मिलता है तो इसे अंधविश्वास ही कहा जाता है। यदि हम किसी बात का खंडन करते हैं तो उसके लिए भी प्रमाण की आवश्यकता होती है।

किसी चीज पर विश्वास करने का सबसे मुख्य कारण प्रोत्साहन और दंड होता है। प्रोत्साहन और दंड से ही व्यक्ति की सोच को नियंत्रित किया जाता है। विश्वास का कारण प्रोत्साहन और दंड होता है। इससे हमारी सोच नियंत्रित होती है। किसी बात का खंडन करते हैं और लोगों को दंड दिया जाता है तो वे इस बारे में बात नहीं करते हैं। सोच और बात में ज्यादा फर्क नहीं होता है। इसे शब्दकल्पी कहते हैं यानी जो दिखाई नहीं देता है पर हम सोचते हैं। यह हमारे व्यवहार पर निर्भर करता है। हमारा समाज के साथ, अपने आप के साथ कितना व्यवहार है? व्यवहार बल और दंड द्वारा नियंत्रित होता है। ऐसे ही हमारी सोच भी नियंत्रित होती है। हम एक समूह या समुदाय से संबद्ध होते है तो समुदाय जिस तरह की सोच का समर्थन करता है उसे हम मन में लाते हैं। समुदाय जिस सोच को नकार देता है, उसको हम मन से निकाल देते हैं। व्यवहार जैसे नियंत्रित होता हैं, सोच वैसे ही नियंत्रित होती है। समुदाय का समर्थन मिलेगा तो गलत सोच हावी होने लगती है। इस सोच को तर्क, प्रशिक्षण और समुदाय में अच्छे व्यवहार के जरिए परिवर्तित किया जा सकता है। प्रसिद्ध विचारक जॉन स्टुअर्ट मिल ने पांच वैज्ञानिक नियमों के बारे में बताया। इन नियमों को विज्ञानसम्मत नियम कहा जाता है। इसमें जिस चीज को मानते हैं वो विज्ञान सम्मत यानी वैज्ञानिक होता है। यदि तर्क को नहीं मानेंगे तो यह अवैज्ञानिक हो जाता है। इसलिए चिंतन में परिवर्तन लाना आवश्यक है। बहुत सी चीजें ऐसी होती हैं जो हम देख नहीं पाते है लेकिन इसका अस्तित्व होता है और यह विज्ञान द्वारा प्रमाणित होता है। जैसे वायु इसे हम देख नहीं पाते लेकिन इसका अस्तित्व होता है। यदि किसी को लगता है कि बंदर मनुष्य का पूर्वज नहीं है तो उसे इसके प्रमाण देने चाहिए क्योंकि डार्विन ने भी अपने सिद्धांत के समर्थन के लिए प्रमाण दिए थे। बिना प्रमाण के यह भी अंधविश्वास ही माना जाएगा। हमारी सोच और मन को वैज्ञानिक बनाने के लिए परिवेश तैयार की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक सोच ही मौलिक सोच है।

एसपीके जेना, मनोविज्ञान का अध्यापन, दिल्ली विवि.

  • लोगों के वैज्ञानिक तथ्यों पर विश्वास नहीं करने के कई कारण होते हैं। इसका एक प्रमुख कारण धार्मिक होता है। बहुत से लोग धार्मिक गतिविधियों से जुड़े होते हैं और जो चीज उसकी विचारधारा से मेल नहीं खाती है उसे वह स्वीकार नहीं कर पाता है। कई बार वे तथ्यों को थोड़ा मान लेते हैं तो कई बार पूरा नकार देते हैं। कुछ उदार होते हैं वो तथ्यों को स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन वे लोंग दोनों चीजों को साथ लेकर चलते हैं। बहुत से लोग इस बात को समझते हैं कि विज्ञान अपनी जगह पर सही है और कई धर्मों के धार्मिक ग्रंथों में भी यह लिखा हुआ है कि इंसानों को ईश्वर ने बनाया है। ऐसे में इन ग्रंथों में विश्वास रखने वाले लोग फिर इस बात को नहीं मानते कि मनुष्यों का क्रमिक विकास हुआ है। ऐसे लोग इन चीजों को मानेंगे भी तो एक सीमित दायरे में। दायरा यह कि वे इस चीज को समझते हैं लेकिन पूरे तरीके से मानते नहीं हैं। वे मानते हैं कि बंदर का क्रमिक विकास हुआ है पर जब धर्म की बात आती है तो वे उसका भी समर्थन करते हैं।
  • व्यक्ति जब बिना सवाल के तथ्य स्वीकारने लग जाता है तो उसकी जिज्ञासा कम होने लगती है। बार-बार के दोहराव से झूठ सच लगने लगता है। लोग कई बार वैज्ञानिक तथ्यों और धार्मिक विश्वास के बीच अपने स्तर पर ही संतुलन बनाने की कोशिश करने लगते हैं। जिसका कोई आधार नहीं होता है।
  • वे दोनों पक्षों को साथ लेकर चलते है। विज्ञान सच पर आधारित होता है और इसमें प्रमाण महत्वपूर्ण होते हैं। बदलते समय में व्यक्तिगत भावनाएं भी बदलते समय अनुसार नहीं बदलती हैं तो वह पिछड़ जाता है। सतर के दशक में जब आधुनिकीकरण का एक नया दौर शुरू हुआ था तो काफी संख्या में लोगों का विज्ञान की तरफ रुझाव हुआ था। लोगों का अंधविश्वास और आडंबरों की तरफ काफी कम विश्वास हो गया था। विज्ञान हर चीज को प्रमाणित करता है और फिर ही मानता है। इसलिए उसमें मानव की रुचि स्वाभाविक हो जाती है। इंसान जब पैदा होता है तो उसमें जिज्ञासा स्वाभाविक होती है। जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है तो वो परिस्थितियों के अनुसार बदलने लगता है। उसे जो सिखाया जाता है वो बिना सवाल के स्वीकार करने लग जाता है इससे उसकी जिज्ञासा कम होने लगती है। बार-बार एक ही चीज दोहराई जाती है तो उसे लगता है कि यही सच है और यही ठीक है। मानव में जिज्ञासा जन्म से होती है। बच्चा घूम फिरकर, चीजों को समझकर जीवन में आगे बढ़ाता है। इसी तरह विज्ञान की तरफ उसका रुझान स्वाभाविक होता है पर जैसे उसे सिखाया जाता है, बताया जाता है।

रिपन सिप्पी, मनोविज्ञानी, स्पेशन एज्युकेटर (शिक्षक)

उपसंहार: - सारांश के रूप में हम कह सकते हैं कि जैसी परिस्थितियां व परिवेश होता है उस पर काफी कुछ निर्भर करता है। ऐसे कारणों की वजह से भी व्यक्ति की विज्ञान में रुचि और अरुचि काफी निर्भर करती हैं और उसी के अनुसार पर वह विज्ञान में विश्वास भी करता है।

- Published/Last Modified on: March 12, 2018

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