ज्ञान-विज्ञान और अंतरिक्ष (Science and Space) (Download PDF)

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प्रस्तावना:- पूर्व की भांति इस बार हम आपके लिए कुछ ज्ञान-विज्ञान व अंतरिक्ष से जुड़ी खबरे लाए हैं जो आपका ज्ञान बढ़ाएगें। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एक ही अभियान में विभिन्न देशों के 68 उपग्रह एक साथ पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर नया विश्व प्रमाण कायम करेगा। इसरों अगले छह मीने में अपने सबसे विश्वसनीय ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) से इस अभियान को अंजाम देगा।

ज्ञान:-

  • व्यायाम- क्या यह संभव है कि व्यायाम दिमाग के लिए जरूरत से ज्यादा अच्छा साबित हो? 2014 में छोटे चूहों के साथ प्रयोग में सबसे पहले यह चिंताजनक विचार उठा, क्योंकि उन्हें जितनी व्यायाम कराया, उतनी ही उनकी लंबी अवधि की याददाश्त खराब होती गई। उस अध्ययन के पहले तक खोज यही कहती थी कि व्यायाम दिमाग की सेहत के लिए वांछनीय तथ्य से ज्यादा कुछ नहीं है। इससे दिमाग की ओर रक्त-प्रवाह बढ़ता है, जिससे वहां की कोशिकाओं के बीच रक्त नलिकाओं और कनेक्शन (संयोजन) का अधिक विकास होता है। इससे आमतौर पर दिमाग अधिक दुरस्त होता हैं। ज्यादातर न्यूरों (तंत्रिका विज्ञान) साइंटिस्ट (वैज्ञानिक) मानेंगे कि व्यायाम का प्रमुख लाभ तो यही है कि इससे न्यूरोजेनेसिस यानी नई कोशिकाओं का बनना बढ़ जाता है। खासतौर पर हिप्पोकैंपस नामक भाग में, जो सीखने और याद रखने के लिए जिम्मेदार है।
  • दूसरा अध्ययन-एक के बाद दूसरे अध्ययन से यह बार-बार साबित हुआ है कि व्यायाम खासतौर पर दौड़ने जैसे एरोबिक व्यायाम से हिप्पोकैंपस की कोशिकाओं की संख्या व्यायाम न करने वालों की तुलना में दुगुनी-तिगुनी हो जाती है, जिससे नया कौशल सीखने की योग्यता बढ़ जाती है। निचोड़ यह है कि दौड़ने वाले जानवर, न दौड़ने वालों की तुलना में प्रखर बुद्धि वाले हो जाते हैं। वैज्ञानिकों ने इस संभावना पर विचार नहीं किया कि वे युवा, जीवंतता से परिपूर्ण और नए ज्ञान से भरी कोशिकाएं पुराने स्थापित कोशिकाओं को परे धकेल दे हावी हो जाएं, जिनमें लंबी अवधि की याददाश्त मौजूद है। यदि ऐसा है तो दिमाग चाहे नई कोशिकाओं से तरोताजा हो गया हो, लेकिन संभव है कि दिमाग उन बातों को याद ही न कर पाए, जो व्यक्ति ने पहले अनुभव किया या सीखा हो। 2014 के चूहों के साथ प्रयोग में इसी बात की पुष्टि हुई। युवा चूहों को पिंजरे के एक विशेष हिस्से में खतरा होने का अनुभव कराया जाता है। यह ऐसी स्मृति होती है, जो जानवरों में लंबी अवधि की याददाश्त के रूप में दृढ़ता से जम जाती है। फिर चूहों की आधी संख्या को दौड़ने दिया जाता है। फिर सारे चूहों को ऐसा इंजेक्शन लगाया गया, जो दिमाग में नई कोशिकओं को रेखांकित करता है।
  • निष्कर्ष-कुछ हफ्तों बाद सारे चूहों को उस पिंजरे में डाल दिया गया, जिससे उन्हें पहले प्रयोग में खतरे का अहसास हुआ था। व्यायाम न करने चूहे जगह पहचान कर बिदक गए, लेकिन दौड़ने वाले चूहों ने ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई, जाने उन्हें खतरे का पुराना अहसास याद नहीं आया। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि दौड़ने ने यह याददाश्त नष्ट कर दी, जो व्यायाम शुरू करने के पहले बनी थीं। लेकिन टेक्सास की ए एंड एम विश्वविद्यालय के मॉलिक्यूलर एंड सेल्यूलर मेडिसिन (आण्विक और चिकित्सा शास्त्र )के प्रोफेसर (विश्वविद्यालय व महाविद्यालय के अध्यापक) अशोक शेट्‌टी और उनके सहयोगी यह निष्कर्ष स्वीकारने में झिझक रहे हैं। शेट्‌टी ने कहा, ’हम यह मानना नहीं चाहते कि व्यायाम याददाश्त के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।’
  • नया अध्ययन-फिर एक नया अध्ययन करने का फैसला हुआ, जो इस माह द जर्नल ऑफ न्यूरोसाइंस में प्रकाशित हुआ। शोधकर्ताओं ने 2014 का प्रयोग दोहराने का निश्चय किया, लेकिन इस बार बड़े चूहों पर, पहले किए अन्य शोधों से पता लगा था कि छोटे चूहों की बजाय मध्यम आकार के चूहों के दिमाग हमसे मिलते-जुलते हैं। इन्हें पानी की भूल-भूलैया से निकलने की तरकीब सीखना थीं, क्योंकि शिकार करने वाले जानवरों को बचकर निकलने की याददश्त लंबे समय तक याद रखनी होती है। चूहों ने तेजी से यह सीख लिया। फिर कुछ चूहों को दौड़ाया गया। फिर इंजेक्शन देकर दिमाग में नई कोशिकाओं को पहचाना गया। लेकिन 2014 के प्रयोग के विपरीत दौड़ने वाले चूहों ने खोजा था, जबकि दौड़ने वाले चूहों में दोगुना नई कोशिकाएं थीं। नई कोशिकाएं तो विकसित हुई, लेकिन याददाश्त प्रभावित किए बगैर।
  • डॉ. शेट्‌टी कहते है कि ’छोटे हो या बड़े चूहे तो चूहे ही होते हैं आदमी नहीं। संभव है नई कोशिकाएं बनने से किसी खास प्रकार की याददाश्त प्रभावित होती हो। हमें व्यायाम का दिमाग पर पड़ने वाले प्रभाव की बारीकियों का पता लगाने के लिए अलग-अलग प्रयोग करने होंगे। फिलहाल तो उनका यही मानना है कि यदि आप चूहे नहीं है तो बेशक व्यायाम करना आपके दिमाग के लिए फायदेमंद हैं।

विज्ञान:-

  • नासिका छिद्र:-मानव चेहरे में कई अहम चीजें हैं। जैसे दो कान, दो आंख, एक मुंह, एक नाक आदि। दो कान के पीछे यह तर्क है कि ध्वनि को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में समय लगता है। इसलिए दो कान होने पर हम दो अलग-अलग दिशाओं की बातें एक साथ सुन पाते हैं और आवाज किस दिशा से आ रही है, यह पहचान पाते हैं। दो आंखो का फायदा यह है कि हम ज्यादा बड़े कैनवस (चित्रकारी करने का मोटा कपड़ा) में दृश्यों को एक साथ देख पाते हैं। पर क्या कभी यह सवाल आपके दिमाग में आया है कि हमारी नाक तो एक ही है, फिर उसमें दो-दो नासिका छिद्र क्यों होते हैं। फिर नाक में भी केवल एक ही छेद क्यों नहीं? आइए इस सवाल का जवाल तलाशते हैं विज्ञान में।
  • काम- स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में सूंघने की क्षमता और इस प्रक्रिया को समझाने को लेकर एक अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन में उन्होंने पाया कि पूरे दिन में हमारे दोनों नासिका छिद्रों में से एक नासिका छिद्र दूसरे की तुलना में बेहतर और ज्यादा तेजी से सांस लेता है। प्रतिदिन या दिन में कभी भी दोनों नासिका छिद्रों की यह क्षमता बदलती रहती है। यानी हमेशा दो नासिक छिद्रों में से एक नासिक छिद्र बेहतर और एक थोड़ा कम सांस खींचता हैं और सांस खींचने की यह दो अलग-अलग क्षमताएं हमारे जीवन के लिए बेहद जरूरी है।
  • बेहद जरूरी हैं दो नासिका छिद्र- गंध और कणों को हमारी नाक की त्वचा अलग-अलग मात्रा में ग्रहण करती है। कुछ चीजों की गंध जहां तुरंत हमारी नाक से होते हुए मस्तिष्क तक जाती है, वहीं कुछ चीजों की गंध को बेहद धीरे-धीरे महसूस होती है। ऐसे महक को पहचानने के लिए हमें थोड़े समय की जरूरत होती है और ये गंध वह सीधे फेफड़े तक नहीं पहुंचते है। यानी हमारी नाक के यह दो नासिका छिद्र ही हैं, जो हमें ज्यादा से ज्यादा चीजों की गंध को समझने में मदद करते हैं। इन दो नासिका छिद्रों की वजह से ही आप नई गंधों को भी पहचान पाते हैं।
  • कुछ वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष की गंध को समझने की कोशिश की। एस्ट्रोनॉट्‌स ने अंतरिक्ष से वापस आकर अपने स्पेस (अंतरिक्ष) सुट्‌स को सूंघा तो पाया कि उसमें जले हुए मीट या धातुओं के जलने जैसी गंध थी।
  • नाक समझदार हैं-आपकी नाक इतनी समझदार है कि यह आपको रोज-रोज की गंधों का एहसास देकर परेशान नहीं करती। इसे ’न्यूरल अडॉप्टेशन’ (तंत्रिका अनुकूलन) कहते हैं। यानी हमारी नाक ऐसी गंधों के प्रति उदासीन हो जाती है, जिन्हें हम प्रतिदिन सूंघते है और वह उन गंधों की पहचान तुरंत कराती है, जो हमारे लिए नई होती हैं।
  • प्रकृति का पांचवां बल:-प्रकृति अब भी वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली है। ऐसा माना जा रहा है कि प्रकृति के रहस्य से उठे इस पर्दे से सैकड़ों साल पुरानी कई धारणाएं ध्वस्त हो जाएगी, जिस पर भौतिक विज्ञान टिका है। ऐसे इसलिए माना जा रहा है, क्योंकि प्रकृति के फंडामेंटल (मूलभूत) बलों में एक नए बल का पता चला है। विश्वविद्यालय ऑफ कैलिफार्निया, इरविन के भौतिकविदों ने पांचवे फंडामेंटल बल को खोजने का दावा किया है।
  • डार्क फाेेटोन- यह नया सिद्धांत ’सब एटॉमिक पार्टिकल एक्स बोसोन’ ब्रह्यांड के बारे में अब तक की प्रचलित मान्यताओं को बदल देगा। यह खोज हाल ही में जर्नल फिजिकल रिव्यू लेटर्स में प्रकाशित हुआ है। इसका पता डार्क फोटोन पर खोज के दौरान चला। डार्क फोटोन को डार्क मैटर के तौर पर जाना जाता है। अभी तक इस बारे में बेहद कम जानकारी थी। वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्यांड के द्रव्यमान में 85 प्रतिशत हिस्सा डार्क मैटर का है।
  • खोजियों ने एक रेडियोधर्मी विघटन की विसंगति का पता लगाया है। प्रकाश का एक कण इलेक्ट्रॉन (विद्युत) से 30 गुना भारी होता है। फेंग ने हा, प्रयोगकर्ता पांचवे बल को खोजने का दावा नहीं कर सकते। अभी केवल एक नए कण के संकेत भर मिले हैं।

अभी तक थे केवल चार फंडामेंटल फोर्स (मूलभूत/आधारभूत सिद्धांत सेना)-

  1. ग्रेविटेशनल फोर्स (सेना)
  2. इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फोर्स (विद्युतीय चुम्बिकीय सेना)
  3. स्ट्रॉन्ग न्यूक्लियर (मजबूत हथियार)
  4. वीक न्यूक्लियर (कमजोर हथियार)
  • नया- यूसीआई का ये काम बताता है कि यह डार्क फोटॉन होने के बजाय फोटाग्राफिक एक्स बोसोन हो सकता है। सामान्य इलेक्ट्रिक (विद्युत) बल इलेक्ट्रॉन (भौतिकी) व प्रोटॉन (पर लगता है। नया बोसोन कण केवल इलेक्ट्रॉन और न्यूट्रॉन (भौतिकी) से इंटरेक्शन (मिलकर कार्य) करता है। इसके पहले किसी अन्य बोसोन कण को ऐसा व्यवहार करते नहीं देखा गया था।

                                                                                                                                                           टिमोथी टैट, खोजकर्ता

  • कुछ ऐसी है प्यास के पीछे के विज्ञान की कहानी:-वैज्ञानिकों के अनुसार जब हम भूखे होते है और खाना खाते हैं तो ’पेट भर चुका है’ यह संदेश हमारे मस्तिष्क तक पहुंचाने में शरीर को लगभग 20 मिनिट का समय लगता है यही कारण है कि कई बार आप अपनी भूख से ज्यादा खा जाते हैं लेकिन जब बात प्यास की करते हैं तो आपका शरीर यह संदेश दिमाग तक पहुंचाने में इतनी देरी नहीं करता हैं।
  • संदेश- जब आपके रक्त प्रवाह में तरल पदार्थो की मात्रा कम होती है, आपका शरीर आपकों यह एहसास दिलाता है कि आप प्यासे हैं। जब आपका दिमाग यह महसूस करता है कि आपके शरीर में नमक की मात्रा ज्यादा हो गई है, न्यूरोन्स निकलते हैं और आपके दिमाग में प्यास के लिए संदेश बनता हैं।
  • आपका दिमाग काफी समझदार है। यह आपको ज्यादा भोजन से नहीं रोकता, लेकिन पानी पर नजर रखता है।
  • पानी- पानी सभी लिए सबसे जरूरी पोषक तत्व हैं और इसी की वजह से हम इस धरती पर जीवित हैं, पृथ्वी पर 71 प्रतिशत पानी है। वहीं मानव की बात करें तो हमारा शरीर 60 प्रतिशत पानी से बना है। हम प्रतिदिन पसीने, मल-मूत्र, सांस लेने और रोने जैसी क्रियाओं में पानी शरीर से निकालते हैं और उसे तुरन्त हटाने करने की जरूरत होती है।
  • मस्तिष्क,शरीर को विद्युतीय आवेग से नियंत्रित करता है जो शरीर की कोशिकाओं के इलेक्ट्रोलायट्‌स से चलता है, जैसे नमक। जैसे ही हमारे शरीर में इन इलेक्ट्रोलायट्‌स की मात्रा नियमित मात्रा से अलग होती है, हमारा शरीर डिहायड्रेटिड (खाद्य पदार्थों में से पानी निकलना या शरीर एवं उत्तकों का अधिक मात्रा में पानी खो देना) महसूस करने लगता है।
  • जान-शरीर जमा मोटापे को भविष्य में एनर्जी (ताकत) की तरह प्रयोग कर सकते हैं। पर बेहद कम समय में जरूरत से ज्यादा पानी पीना आपकी जान भी ले सकता है। अमरीकन केमिस्ट्रीि सोसायटी (रसायन समाज) के अनुसार 7 लीटर से कम पानी 75 किग्रा के व्यक्ति को मार सकता हैं।
  • मलेरिया:-हाल ही के खोज में पता चला है कि मुर्गियां मच्छरों के आतंक से निजात दिला सकती हैं। दरअसल उनसे ऐसी गंध निकलती है जो मच्छरों को दूर रखती है स्विडिश विश्वविद्यालय ऑफ एग्रीकल्चर (कृषि शास्त्र) साइंसेज (विज्ञान) और इथोपिया की अदीस अबाबा विश्वविद्यालय के खोजों ने मिलकर इस स्टडी (परीक्षण) को अंजाम दिया हैं।
  • स्विडिश विश्वविद्यालय ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज में इकोलॉजिस्ट (पर्यावरण विज्ञान व पौधों एवं जंतुओं का एक दूसरे से एवं उनके वातावरण से संबंध) रिकर्ड इग्रेल कहते हैं, लोगों को लगता है कि मच्छरों को सिर्फ खून से मतलब होता है, पर ऐसा नहीं है। हमने पाया मच्छरों को भी अच्छे खून और खराब खून में अंतर पता होता है। वे इसे अपनी गंध पहचानने की क्षमता से जान लेते हैं। 2015 में मच्छरों के काटने की वजह से फेलने वाली बीमारी का शिकार 214 मिलियन लोग हुए थे। जिसमें से लगभग 4,38,000 लोगों की मौत हो गई थीं। इसी तरह हर साल लाखों लोग मलेरिया की वजह से मारे जाते हैं।
  • आंसू:-खुशी हो गम, आंसू कब आंख के कोरो से लुढ़क जाएं, किसी को भी ठीक-ठीक पता नहीं रहता। यह शरीर का एकमात्र ऐसा स्राव है, जिस पर अभी तक सबसे कम खोज किया जा सकी हैं। दरअसल खोज के लिए ताजे आंसू होना आवश्यक होता है, जिसका मिलना लगभग असंभव माना जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर आंसुओं पर खोज की जाए तो मानव व्यवहारों के बारे में कई अहम जानकारियां हाथ लग सकती है। इस समस्या को खत्म करने के लिए इजरायल के वाइजमान इंस्टीटयूट ऑफ साइंसेज में काम करने वाले न्यूरोबायोलॉजिस्ट (तंत्रिका विज्ञान व जीव-विज्ञान का ज्ञाता) नाम सोबेल व उनके साथियों ने एक आंसू बैंक बनाने की योजना तैयार की है। सोबेल लंबे समय से आंसुओं पर खोज कर रहे हैं। इन्होंने इसके पहले 2011 में भी एक महिला के आंसू का परीक्षण किया था।
  • सोबेल के इस आंसू बैंक बनाने के लिए तरल नाइट्रोजन (रंगहीन या गंधहीन गैस) से खास तरह का सिस्टम (सिद्धांत) विकसित किया है। इससे सैंपल (नमूना) को देर तक ताजा बनाए रखा जा सकेगा।
  • सोबेल के इस आंसू बैंक से मुझे बड़ी उम्मीदें हैं। अगर बैंक तैयार हो गया तो इससे मानव व्यवहार पर खोज के नए दव्ारा खुल सकते हैं। मैं खुद भी आंसुओं पर खोज कर रहा हूं।

                                                                                                                                                     साद भामला, बायोइंजीनियर

  • इंद्रधनुष:-साइंटिफिक सोसायटी इंस्टीटयूट ऑफ फिजिक्स का कहना है कि इंद्रधनुष का रंग वातावरण में फेले रासायनिक प्रदूषणों की चेतावनी दे सकता है। साथ ही इससे बारिश की मात्रा के अनुमान में भी मदद मिल सकती है। जर्मनी की ड्रेस्डेन विश्वविद्यालय से जुड़े अलक्जेंडर हासमेन पिछले 20 सालों से इंद्रधनुष पर ही खोज कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बारिश के बाद प्रकाश के बिखरे पैटनर् से वर्षा बूंदों और उनकी सही मात्रा का सटीक रूप से अनुमान लगाया जाना संभव है। अगर इस आंकड़े को रडार डेटा (आंकड़ो) से जोड़ दिया जाए तो बारिश में जमीन पर गिरने वाले पानी का भी सटीक अनुमान लगा पाना संभव हो जाएगा। हासमेन उनके विश्लेषण का तरीका परीक्षणों पर पूरी तरह खरा उतरता है तो इंद्रधनुष को ऑप्टिकल सेंसिंग टूल के रूप में प्रयोग करके बारिश के भौतिक विज्ञान का अध्ययन किया जा सकेगा।
  • प्रभाव-हासमेन सबसे बड़ी चुनौती मैथेटिकल नमूना को इंद्रधनुष से सेमुलेशन को मानते हैं। वे कहते हैं कि बारिश की बूंदे बिल्कुल गोल नहीं होती लेकिन वे गिरते समय हवा के खिंचाव से पावरोटी के आकार की हो जाती हैं। यह इंद्रधनुष पर बड़ा प्रभाव डालता हैं और सांख्यकीय रूप से बिखरी हुई गणना प्रदान करता है। हासमेन का यह खोज यूरोपियन जर्नल ऑफ फिजिक्स (शरीर) में प्रकाशित हुआ है।
  • रोबोटिक दुनिया:- भविष्य की दुनिया में इंसान और रोबोट साथ रहेंगे यह तय है। इन रोबोट की अपनी सोच होगी। आसान जिंदगी का यह रास्ता कई मुश्किले भी खड़ी करेगा।
  • उम्मीद या खतरा- स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय की ’एआई 100’ रिपोर्ट ने 2030 की रोबोट संचालित दुनिया की तस्वीर सामने रखी है। साथ ही बहस भी कि इंसानी दुनिया को भविष्य के रोबोट संचालित करेंगे या दुनिया इंसान के हाथों में होगी, और ये खुद सीखने वाले रोबोट उसके मददगार होंगे। इन सवालों से टेक जनसमूहों काफी समय से जूझ रही हैं। अगस्त के आखिर और सितंबर के शुरूआती सप्ताह में पांच दिग्गज आईटी जनसमूह (अल्फाबेट, अमेजन, फेसबुक, आईबीएमऔर माइक्रोसॉफ्ट) रोबोट तकनीक लिए नियम कायदे बनाने के लिए माथापच्ची कर रही थीं। लेकिन दुनिया की नजरे इनकी बातचीत के नतीजों से ज्यादा सबसे बड़ी टे जनसमूह एपल पर थीं, जिसने इन बैठकों से दूरी बना रखी हैं। इस बीच आटिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) से जॉब कटौती का मुद्दा भी बहस में हैं।
  • क्या हैं आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस- आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस यानी खुद निर्णय लेने में सक्षम मशीन। ऐसी मशीन जिसके पास अपना दिमाग है। जो आपकी आदतों से जानकारी लेती है, खुद को अपडेट करती है और इसी के अनुसार निर्णय लेती हैं। यह इंटरनेट के सहारे विभिन्न सूचनाओं के संपर्क में रहती है।
  • खतरा- खोज मानते हैं कि यह तकनीक युद्ध के नियम बदल देगी। रोबोटिक सैनिक मानवता के लिए बड़ा खतरा साबित होंगे। सरकारें इस तकनीक का इस्तेमाल इंसानी जिंदगी में दखल बढ़ाने के लिए कर सकती हैं।
  • सोचने वाला रोबोट पर किसका होगा कमांड?-’कैप्टन अमरीका’ और ’एवेंजर्स’ जैसी साइंस (विज्ञान) फिक्शन फिल्मों की बहस अब हकीकत की दुनिया में भी तेज हो गई है। इस बहस के तीन मुख्य हिस्से हैं-
  • पहली बहस- आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के प्रयोगों के नियम क्या हों? इस सवाल पर दिग्गज आईटी जनसमूहों लगातार बैठके कर रही हैं। इन जनसमूहों ने नौकरी, परिवहन और युद्ध जैसे विषयों में एआई की सीमाएं तय करने पर बातचीत शुरू की हैंं।

दिक्कत-दुनिया की सबसे बड़ी टेक जनसमूह एपल इन बैठकों से नदारद है। एपल का कहना है कि एआई प्रयोगों के लिए किसी नियम कायदे की फिलहाल जरूरत नहीं है।

  • दूसरी बहस-एआई रोबोट दुनिया में शामिल होंगे, तो उनके लिए नियम क्या होंगे?- ड्राइवर लैस कारों की दुर्घटनाओं ने यह सवाल नए सिरे से उठाया है। विकसित देशों में एआई का दखल बढ़ रहा है।

दिक्कत- हकीकत की जिंदगी कंम्यूटर की कोडिंग से ज्यादा जटिल और चौंकाने वाली है। इसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है। खुद समस्याओं को सुलझाने वाले अतिविकसित रोबोट अभी दुनिया उलझनों में सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं।

  • तीसरी बहस- एआई रोबोट के दखल से नौकरियों में कमी आएगी?- हालिया रिपोर्ट (विवरण) ने बताया कि एआई से 50 फीसदी नौकरी कम होगी। दुनिया में बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में यह चिंता बढ़ाने वाली खबर है।

दिक्कत- आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को विकसित देश प्रमोट (प्रगति के लिए सहायता) कर रहे हैं, वे नोकरी कटौती से ज्यादा प्रभावित नहीं होगे। लेकिन विकासशील देशों में नौकरी से सामाजिक असंतुलन बढ़ेगा।

2030 तक घरो के काम निपटाएगा रोबोट- आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैस (तुलना) रोबोट। टेक जनसमूहों इसके निर्माण पर सबसे ज्यादा ध्यान दे रही हैं। ऑटोमोबाइल से खाद्य-प्रदार्थ बाजार तक में ऐसे रोबोट ने इंसानों की जगह लेना शुरू भी कर दिया है। अब ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी बदलने की दिशा में बढ़ रहे हैं। स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय ने ’एआई100’ रिपोर्ट (विवरण) ने 2030 की दुनिया का खाका सामने रखा है। दो साल की यह खोज बताती हैं कि रोबोट 2030 में आम परिवारों का हिस्सा होंगे।

  • इसके खतरे में- सरकारें अपने फायदे के लिए एआई से मिली सूचनाएं इस्तेमाल करेगी। रोबोट के कार्यक्रम हैंक कर उससे गलत काम भी कराया जा सकता है। इससे क्राइम (गैर कानूनी काम) के नए रूप सामने आ सकते हैं।
  • परिवहन- 2003 में वाहन पार्किगर 2007 में दुर्घटना क्षेत्रों की पहचान और 2015 में लेन बदलने में सफलता 7 2016 से बिना ड्राइवर के वाहन पार्किंग अंजाम दी।
  • सेल्फ ड्राइविंग- 1930 के साइंस फिक्शन हकीकत बन चुके हैं। 200 के बाद समुद्र और अंतरिक्ष में ऐसे व्हीकल हकीकत थे। अब सड़कों पर आने के कगार पर।
  • घरों में रोबोट- 2001 में ’इलेक्ट्रोलक्स ट्रिलोबाइट’ रोबोट ने वैक्यूम क्लीनिंग (सफ़ाई करने में प्रयुक्त विद्युत उपकरण जो धूल, मिट्‌टी को खींच लेता हैं) में योगदान देकर भविष्य की तस्वीर दिखाई थी, यह काफी हद तक साफ हो चुकी है।
  • हेल्थकेयर- कैंसर के सेल ढूंढकर शरीर के अंदर खत्म करने में उपयोग। बीमारी का सालों पहले पता लगाने में यूज की तैयारी। एआई मेडिकल (चिकित्सा -शास्त्र संबंध) का भविष्य हैं।

अंतरिक्ष:-

  • प्लेनेट-एक्स:-21 दिसम्बर 2012 या और पीछे जाएं तो 2003 में धरती के खत्म होने की सनसनीखेज बात आपके दिमाग से शायद ही अभी निकल पाई होगी। हर बार घटना की आशंका एक जैसी होती है, बस तारीख बदलती है। यह सिलसिला पिछले एक शताब्दी से चला आ रहा है।
  • कारण-कल्पना कीजिए पृथ्वी से कई गुना बड़ा कोई उल्का पिंड अंतरिक्ष में अपने परिपथ में घूम रहा है। घूमते-घूमते यह पृथ्वी की कक्षा के काफी करीब आ जाए, तो क्या होगा? यकीनन वह धरती के ताकतवर गुरुत्वीय बल की वजह से इसकी सतह से टकराएगा। टक्कर के बाद होने वाला विनाश क्षुद्र ग्रह के आकार और टकराने की गति पर निर्भर करता है। एक अनुमान के मुताबिक 47 हजार ऐसे क्षुद्रग्रहों को अभी तक पहचाना जा चुका है, जो कभी धरती से टकरा सकते हैं। इसलिए समय-समय पर धरती के नष्ट होने की आशंका व्यक्त की जाती रही हैं। इसी कड़ी में खगोलविदों के एक समूह ने सितंबर में एक ग्रह प्लेनेट एक्ट के धरती से टकराने की आशंका जाहिर की हैं।
  • नासा- अमरीकी स्पेस एजेंसी (कार्यकर्ता) नासा का कहना है कि 1.5 मील से बड़ा एक क्षुद्र ग्रह वैश्विक स्तर पर घातक नुकसान का कारण बन सकता हैं। हालांकि वह किसी प्लेनेट एक्स या नाइबीरू नाम के ग्रह के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। नासा के अनुसार पिछले दशक में खगोलविदों ने धरती की तरफ बढ़ रहे एक ऑब्जेक्ट (मूर्त प्रदार्थ वस्तु, जिसे देखा या छुआ जा सके) को जरूर ट्रैक (किसी के बारे में नियमित रूप से जानकारी रखना या खोज पर चलना) किया था, लेकिन वह प्लेनेट एक्स नहीं था।
  • एस्ट्रोनामर पेसर्विल लॉवेल ने 1900 के दशक में एक्स प्लेनेट के सिद्धांत को हवा दी। उन्होंने वर्षों तक इस अज्ञात ग्रह पर खोज किया। हालांकि वे प्लेनेट के बारें में बहुत पुख्ता तरीके से कुछ नहीं कह सके। लेकिन उससे 1930 में प्लूटों को खोजने में मदद मिली।
  • ब्लड मून (लाल चंद्रमा)- चंद्रमा के धरती के करीब आने की वजह से उसे रोशनी सीधे सूर्य से मिलने की बजाय धरती की परावर्तित रोशनी अधिक मात्रा में मिलने लगती है। इसकी वजह से चंद्रमा लाल दिखाई देता है। खगोल विज्ञान में इस घटना को ब्लड मून के नाम से जाना जाता है।
  • खगोलविदों के एक समूह ने हाल ही में ’ब्लड मून’ का एक वीडियों फुटेज कैप्चर करके यू-टयूब पर पोस्ट किया।इस वीडियों के अनुसार में इस घटना को धरती खत्म होने का लक्षण बताया गया। इसके अनुसार एक छिपा हुआ ग्रह सितंबर में पृथ्वी से टकरा सकता हैं। इस बार पहली बार इसका संबंध ब्लड मून से जोड़ा गया है। इसमें दावा किया गया है कि कई बार चांद लाल दिखता है, इसका कारण चांद पर प्लेनेट एक्स की छाया पड़ना है। एक नई सिद्धांत के सामने आने के बाद इस बहस ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है कि क्या धरती सितंबर में खत्म हो जाएगी। प्लेनेट एक्स को नाइबीरु भी कहा जाता हैं।
  • वाशिंगटन- नासा के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने अब का सबसे धीमा मैग्नेटर ढूंढने का दावा किया है। यह 6.67 घंटे में एक चक्कर पूरा करता है। मैग्नेटर अत्यधिक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र वाले न्यूट्रॉन स्टार को कहा जाता है। इसके कारण विद्युत-चुंबकीय किरणों की विकिरण क्षमता बहुत कम हो जाती है। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने बताया कि आमतौर पर मैग्नेटर दस सेकेंड में अपना एक चक्कर पूरा करता है। नासा ने नए मैग्नेटर को 1ई-1613 नाम दिया है। पृथ्वी से नौ हजार प्रकाश वर्ष दूर आरसीडब्लू 103 में स्थित हैं।
  • उल्का पिंड:-2015 ’किसमस ईव’ नाम के क्षुद्र ग्रह को लेकर बहस छिड़ी थीं। लेकिन यह धरती से 6.8 लाख मील दूर से निकल गया। उस समय नासा जेट प्रोपल्सन लैब की तरफ से चेतावनी भी जारी की गई थीं।
  • रूस- फरवरी 2013 में एक विशाल आग का गोला रूस के ऊपर गिरने वाला था। इसका वजन लगभग 11.000 टन था। लेकिन धरती की सतह के साथ टकराने से पहले ही जलकर राख हो गया। इसकी वजह से जो शॉकवेव पैदा हुई उसने सभी इमारतों को हिला डाला था। इस घटना में 1.000 से अधिक लोग घायल हुए थे।
  • साइबेरिया- 30 जून 1908 सोवियत रूस के साइबेरिया भू-भाग में एक विशालकाय विस्फोट हुआ था। जिसकी पुष्टि बाद में उल्कापात के रूप में हुई थीं। वैज्ञानिकों के अनुसार उल्कापिंड का व्यास 50 से 100 मीटर था। इसके धरती के टकराने से 2.000 वर्ग किलोमीटर से अधिक भाग का जंगल नष्ट हो गया था। इसे आग की लपटें काफी दूर तक देखी गई थीं आसमान में धूल का गुबार कई दिनों तक छाया रहा था।
  • अंतरिक्ष में जंग:-एक ऐसी लड़ाई जिसमें खून नहीं बहेगा। मशीनें लड़ेगी और कंप्यूटर अल्गोरिदम जीत-हार तय करेगी। दुनिया के बेहतरीन दिमाग रॉकेट और अंतरिक्ष एयरक्राफ्ट से इसे संचालित करेंगे। सौरमंडल का लाल ग्रह मंगल मैदान होगा। 28 अगस्त को अमरीकी एस्ट्रॉइड मिशन की सफलता के बाद इस लड़ाई का समय तय हो गया है। 2020 में अमरीका और चीन मंगल पर कब्जे की कोशिश करेंगे।
  • दांव अमरीका व चीन की नजरें भारत पर- यह जंग सीधे तौर पर चीन और अमरीका एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं। लेकिन नजरें भारत पर हैं। भारत ने 2014 में मंगल के ऑर्बिट में दाखिल होकर दुनिया को चौंकाया था। रूस इस लड़ाई में फिलहाल पिछड़ा है। हालांकि वह कभी भी चौका सकता हैं। यूएई जंग का नया खिलाड़ी हैं उसका मिशन जंग का स्वरूप बदलने की क्षमता रखता है।
  • मैदान लाल ग्रह और उसका ऑबिट- चीन और अमरीका ने 2020 तक मंगल पर रोवर भेजने का लक्ष्य निर्धारित किया है। 24 अगस्त को चीन ने रोवर नमूना का प्रदर्शन किया। इधर, छह अमरीकी अंतरिक्ष यात्री एक साल मंगल जैसे माहौल में बिताने के बाद 28 अगस्त को हवाई दव्ीप से वाशिंगटन पहुंचे।
  • वजहअकूत खनिज संपदा के लिए-माना जाता था कि अंतरिक्षीय लड़ाई का केंद्र चंद्रमा या बुध होंगे, लेकिन हालिया खोजों ने मंगल में दिलचस्पी जगा दी है। मंगल पर खनिजों की अकूत संपदा है और जल्द अपना केंद्र स्थापित कर अमरीका और चीन ज्यादा से ज्यादा संपदा पर कब्जे की तैयारी में हैं।
  • लक्ष्य मंगल पर इंसान बसाना- चीन 2040 से 2060 के बीच मंगल पर आम इंसानों की मौजूदगी के लिए काम कर रहा। रूसी एजेंसी (कार्यकर्ता) रोसकोस्मोस भी इस में साझीदार। अमरीकी एजेंसी (कार्यकर्ता) स्पेस (अंतरिक्ष) एक्स इस तरह का अपना मिशन 2024 तक पूरा करना चाहती है।

तैयारी- 55 साल से जारी कोशिशें

  • 1960 सोवियत संघ की मंगल पर पहुंचने की पहली कोशिश। इसके बाद उसके चार अन्य विमान भी फेल रहे।
  • 1964 नासा का मरीनर-4 मंगल की कक्षा में पहुंचने वाला दुनिया का पहला मिशन बना।
  • 1971 सोवियत संघ की मंगल की कक्षा में प्रवेश किया।
  • 1998 जापान की कोशिश।
  • 2003 यूरोप का मार्स एक्सप्रेस (तेजी के साथ) ऑर्बिट में पहुंचा।
  • 2011 चीनी कोशिश नाकाम।
  • 2013 भारत ने मंगल की ओर कदम बढ़ाएं।

हथियार-भविष्य के मिशन निम्न हैं-

मंगल पर अपनी बादशाहत दर्ज कराने की दौड़ में फिलहाल अमरीका और चीन के अलावा यूरोपियन स्पेस एजेंसी (अंतरिक्ष कार्यकर्त्ता) और भारत हैं।

  • एस्टेरॉइड मिशन (नियोग)- खर्च-63 अरब रुपए, वजन 20 किलोग्राम है, मंगल के करीब 20 किलो वजन क्षुद्रगह को चंद्रमा की कक्षा में स्थापित किया जाएगा। ताकि आसानी से, कम खर्च में उसका अध्ययन किया जा सके।
  • रेड मिशन-खर्च 37 अरब रुपए वजन 5897 किलोग्राम है, अमरीकी एजेंसी स्पेस एक्स का यह मिशन 2018 में पूरा होने की संभावना है। नासा की इस मिशन में हिस्सेदारी नहीं है।
  • इनसाइट- खर्च 10 अरब रुपए, वजन 360 किलोग्राम हैं। नासा 5 मई 2018 को प्रक्षेपित करेगा। यह मंगल की जमीन की भीतरी परतों का अध्ययन करेगा और खनिजों की पुख्ता मौजूदगी का पता लगाएगा।
  • मंगलयान-2- खर्च 500 करोड़ रुपए, वजन 475 किलोग्राम हैं, भारतीय एजेंसी इसरो 2020 में यह मिशन भेजेगी। यह मंगल के ऑर्बिट में दाखिल होगा। साथ ही लैंडर और रोवर भेजने की भी योजना है।
  • अमीरात मार्स मिशन- खर्च 42 अरब रुपए वजन 1500 किलोग्राम है, जुलाई 2020 तक यूनाइटेड (संयुक्त मिला हुआ) अरब अमीरात की योजना मंगल के ऑर्बिट में दाखिल होने की हैं।
  • मार्स 2020- खर्च 167 अरब रुपए, वजन 700 किलोग्राम है, नासा का यह रोवर मिशन तय कर देगा कि भविष्य में मंगल पर किसका कब्जा होगा।
  • एक्सोमार्स रोवर- खर्च 70 अरब रुपए, वजन 828 किलोग्राम, यूरोपियन स्पेस एजेंसी की योजना जुलाई 2020 में अपने रोवर को मंगल पर पहुंचने की हैं।
  • 2020 चाइनीज मार्स मिशन- खर्च 135 अरब रुपए, वजन 1300 किलोग्राम है चीन की राष्ट्रीय स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (सार्वजनिक कार्यों का प्रबंध, प्रशासन) 2020 में मंगल पर रोवर पर पहुंचने की तैयारी में हैं।
  • नासा 2022 ऑर्बिटर- खर्च 67 करोड़ रुपए, वजन 1900 किलोग्राम है, नासा के प्रस्तावित मिशन को शुरूआत में 67 करोड़ रुपए की सहायता मिली हैं। इससे मंगल ऑर्बिट में टेली कम्यूनिकेशन (संदेश) की शुरुआत अंतरिक्ष संचार में पैठ बना रहा हैं।

उपग्रह प्रक्षेपण:- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एक ही अभियान में विभिन्न देशों के 68 उपग्रह एक साथ पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर नया विश्व प्रमाण कायम करेगा। इसरों अगले छह मीने में अपने सबसे विश्वसनीय ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) से इस अभियान को अंजाम देगा। इससे पहले पिछले 22 जून को पीएसएलवी सी-34 ने एक साथ 20 उपग्रहों का प्रक्षेपण कर पूरी दुनिया को चौंकाया था। इसरो की वाणिज्यिक इकाई एंट्रिक्स के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक राकेश शशिभूषण ने इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पीएसएलवी विश्व के अन्य अंतरिक्ष शक्ति संपन्न देशों को वाणिज्यिक तौर पर कड़ी प्रतिस्पर्धा दे रहा है। विश्व के कई देश अपने उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए इसरों के पास आ रहे हैं। इसरों निदेशक (जनसंपर्क) देवी प्रसाद कार्णिक ने कहा कि इसके लिए उन ग्राहकों को अंतरराष्ट्रीय मंजूरी हासिल करनी होगी, जो इसरो के सहयोग से बने उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित करना चाहते हैं। इसरों उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने को तैयार हैं।

- Published/Last Modified on: October 14, 2016

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