खोज एवं ज्ञान विज्ञान (Search and Knowledge Science in Hindi) (Download PDF)

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कैंसर: -मां के दूध में कैसर का इलाज संभव है। यह दावा स्वीडन के वैज्ञानिकों ने किया है। उनका कहना है कि मां के दूध में एक ऐसा तत्व पाया जाता है जो ट्‌यूमर (गाँठ) सेल्स (कोशिका) को खत्म कर देता है। उन्होंने इसका नाम हेमलेट रखा है। खास बात यह है कि ये सिर्फ शरीर की बुरी कोशिकाओं को ही खत्म करता है, जबकि अच्छी कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है। इसकी खोज एक प्रयोग के दौरान अचानक हुई।

वैज्ञानिको के मुताबिक अब कैंसर से पीड़ित एक मरीज को हेमलेट इंजेक्शन लगाया गया तो देखने को मिला कि कुछ ही दिन में उसके ट्‌यूमर सेल्स खत्म होने लगे। यह प्रयोग सबसे पहले ब्लैडर (मूत्राशय) कैंसर पर किया गया। इसके अलावा आंत और सवाईकल कैंसर के मरीजों पर भी इसका प्रयोग किया गया, जो सफल रहा है। कीमोथैरेपी में भी इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है।

हेमलेट की खोज स्वीडन के लुंड विवि में इम्यनोलॉजिस्ट (प्रतिरक्षाविज्ञानी) प्रोफेसर (आचार्य) कैथरीन स्वान बोर्ग ने की है। यह एंटीबॉयोटिक (कीटाणुनाशक) खोज रही थीं। इसी दौरान उन्हें मां के दूध में एक ऐसा तत्व मिला, जिसने ट्‌यूमर सेल्स को खत्म कर दिया। स्वानबोर्ग कहती है ’हमें एक प्रयोग के लिए मानव कोशिकाएं और बैक्टीरिया (जीवाणु) चाहिए थीं। इसलिए हमने ट्‌यूमर सेल्स को चुना। दरअसल, हम नोबेल (उपन्यास/अपूर्व) एंटीमाइक्रोबिअल (रोगाणुरोधी) एजेंट्‌स (प्रतिनिधि) की खोज कर रहे थे। इसी दौरान मां के दूध में एक बहुत ही अच्छा तत्व दिखाई दिया। मैं उस समय दंग रह गई, जब हमने उसे अपने प्रयोग में शामिल किया, देखा कि ट्‌यूमर सेल्स खत्म हो गए। यह एक बहुत ही हैरान करने वाली आकस्मिक खोज थी। हेमलेट बहुत ही चमत्कारी है। यह सीधे ट्‌यूमर सेल्स को निशाना बनाकर उन्हें खत्म कर देता है। मां के दूध में अल्फा-लेक्टलबुमिन नामक प्रोटीन पाया जाता है। जिसे दवा के रूप में परिर्वतन कर कैंसर का इलाज संभव है।’ हेमलेट की इस सफलता के बाद स्वीडिश वैज्ञानिकों की टीम (समूह) इसकी दवा लाने की भी योजना बना रही है।

हेमलेट इस तरह काम करता है -

  • हेमलेट कैंसर पर कई तरीकों से हमला करता है। पहले ये कोशिकाओं के बाहरी सुरक्षा तंत्र को खत्म करता है। फिर पावर (शक्ति) स्टेशन (स्थान) माइट्रोकांड्रिया (सूक्षम) और इंस्ट्रक्शन (अनुदेश) मेन्यूअल (संक्षिप्त) केन्द्रक को निशाना बनाता है। इससे ट्‌यूमर सेल्स की ताकत खत्म हो जाती है और वे खुद मरने लगती हैं। इस पूरी प्रकिया को एपोपटोसिस कहते हैं। इसके शुरुआती प्रयोग ब्लैडर कैंसर से पीड़ित मरीज पर किए गए। जिसमें देखने को मिला कि कुछ ही दिन में हेमलेट ने उन्हें खत्म कर दिया।

स्टेम सेल (तना कोशिका): -

  • 2013 में 16 मई के दिन अमेरिकी वैज्ञानिकों को अहम कामयाबी मिली थी। वैज्ञानिकों ने क्लोन (किसी पौधे या पशु की कोशिका से वैज्ञानिक पद्धति द्वारा बनी उसकी एकदम सही अनुकृति) किए गए इंसानी भ्रूण से स्टेम सेल यानी मूल कोशिका निकालने में सफलता पाई थी। स्टेम सेल खुद को शरीर की किसी भी कोशिका में ढाल सकते हैं। वैज्ञानिक काफी समय से कोशिश कर रहे हैं कि पार्किंसन, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, रीढ़ में चोट और आंखो में रोशनी के इलाज में इनका इस्तेमाल हो सके। चूंकि प्रत्यारोपण में शरीर के बाहरी अंग को स्वीकार नहीं करने की आशंका बहुत ज्यादा होती है, इसलिए वैज्ञानिकों ने मरीज के खुद के डीएनए क्लोनिंग करके स्टेम सेल बनाने का प्रयास शुरू किया था। 1996 में इसी तकनीक का डॉली भेड़ का क्लोन बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया था। डॉली पहली स्तनपायी प्राणी थी, जिसे क्लोन करके बनाया गया था।

खास-

  • खराब किडनी का इलाज स्टेम सेल थेरेपी से हो सकेगा। यानी किडनी (गुर्दा) ट्रांसप्लांट (प्रत्यारोपण) की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस क्षेत्र में शुरुआती कामयाबी मिली हैं।

एचआईवी: -

  • यूएस शोधकर्ताओं ने डीएनए एडिटिंग (संपादन) टूल की मदद से जीवित पशुओं के जीन से एचआईवी के डीएनए को हटाने में सफलता हासिल की है। इससे वैज्ञानिकों में आशा जगी है कि वे एड्‌स संक्रमित मानव में से एड्‌स के वायरस को हटा सकते हैं। मॉलीक्यूलर (आणविक) थेरेपी (चिकित्सा) नामक एक पत्रिका में यह शोध छपा है। टेंपल विश्वविद्यालय और विवि ऑफ पिट्‌सबर्ग के शोधकर्ताओं ने बताया कि यह असाधारण सफलता तीन अलग-अलग जीवों के मॉडल (आदर्श) में मिली है।

सफलता-

  • शोधकर्ताओं ने सबसे पहले एचआईवी-1 के प्रतिरूप का प्रदर्शन कर उसमें एचआईवी के वायरस को संक्रमित पशु की प्रतिरक्षा कोशिका से पूरी तरह से हटाकर दिखाया। यह सफलता जेनेटिक एडिटिंग से हासिल की, जिसे क्रिस्पर/कैस9 नाम से जानते हैं।
  • वैज्ञानिकों ने चूहे में प्रयोग कर इससे उम्मीद जगी है कि मानव में एड्‌स का इलाज संभव है। यह जेनेटिक एडिटिंग के जरिए किया गया है।

शोध-

  • यह शोध 2016 में छप चुके पहले के एक अध्ययन के ’प्रूफ (प्रमाण) ऑफ (का) कॉन्सेप्ट (संकल्पना) ’ पर आधारित है। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने एचआईवी-1 डीएनए को ट्रांसजेनिक चूहों वाले मॉडल (आदर्श) के आधार पर उस जंतु के शरीर के सभी कोशिकाओं के जीन में सम्मिलित कर दिया था।

नया अध्ययन-

  • शोधकर्ताओं की इस टीम (दल) का नेतृत्व करने वाले टेंपल विवि के प्रोफेसर वेनहुई हे ने कहा, हमारा नया अध्ययन बहुत व्यापक है। हमने अपने पहले के अध्ययन के डेटा (जानकारी) की पृष्टि की और अपने जेनेटिक एडिटिंग रणनीति की कार्यक्षमता को बढ़ाया। हम यह प्रदर्शित करना चाहते थे कि यह रणनीति चूहों के दो मॉडलों (आदर्शों) पर बहुत प्रभावी है। पहले मॉडल के चूहे में एचआईवी का मामूली संक्रमण किया गया जबकि दूसरे मॉडल वाले चूहे में एचआईवी का स्थायी संक्रमण किया गया।

सिंथेटिक रेटिना: -

  • ऑक्सफोर्ड विवि के शोधकर्ताओं ने सिंथेटिक (कृत्रिम) रेटिना (दृष्टिपटल) बनाने में सफलता हासिल की है। एक्सपट्‌र्स (विशेषज्ञ) के मुताबिक ये दृष्टिहीन लोगों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है। यह रेटिना सॉफ्ट (मुलायम) टिशू (ऊतक) से तैयार किया गया है। इस क्षेत्र में अब तक की गई रिसर्च (खोज) में यह अपनी तरह की विशेष उपलब्धि है। क्योंकि अब तक जितने भी रेटिना बने, वह हाई (उच्च) मटेरियल (सामग्री) से तैयार हुए थे।
  • इस नई खोज में लेबोरेटरी (प्रयोगशाला) एन्वायर्नमेंट (पर्यावरण) में सिंथेटिक टिशू से विकसित किए गए इस आर्टिफिशियल (कृत्रिम) रेटिना का सफल बायोलॉजिकल (जैविक) परीक्षण हो चुका है। माना जा रहा है कि इस खोज के जरिये कम इन्वेस्टमेंट (निवेश) में ऐसी तकनीकी डेवलप (विस्तार) की जा सकेगी जो नेचुरल (प्राकृतिक) ह्यूमन (मानवी) टिशूज (ऊतक) के बहुत करीब होगी। साथ ही इससे रेटिना से संबंधी कई तरह की दिक्कतों से मरीजों को निजात दिलाने में मदद मिलेगी।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, जिस प्रकार कैमरे (छायाचित्र उतारने का यंत्र) द्वारा की जा रही फोटोग्राफी (फोटो द्वारा चित्र खींचने की क्रिया) की क्वालिटी (गुणवत्ता) इस बात पर निर्भर करती है कि निश्चित लाइट (रोशनी) में कैमरे के पिक्सल्स (परिकलक पर्दे पर अति सूक्ष्म अपने में संपूर्ण क्षेत्रों में से एक जो मिलकर पूरा चित्र बनाते हैं) किस तरह रिएक्ट (प्रतिक्रया) करेंगे, इंसान द्वारा चीजें देखने में वही भूमिका रेटिना, आंखों में निभाते है। इंसान की आंख के पीछे बनी रेटिना की गांठ प्रोटीन (एक रासायनिक सत्व) सेल्स (कोशिका) से निर्मित होती है। ये सेल्स लाइट को इलेक्ट्रिकल (विद्युतीय) सिग्नल (संंकेत) में तब्दील कर देती हैं, जो नर्वस सिस्टम (तंत्रका तंत्र) से होता हुआ दिमाग तक जाता है। तब ही हम किसी दृश्य को देख पाते हैं। ऑक्सफोर्ड विवि में बनाए गए रेटिना में सॉफ्ट वॉटर ड्रांपलेट्‌स सा हाइड्रोजेल्स हैं। साथ ही बायोलॉजिकल सेल और प्रोटीन की झिल्ली है। फिलहाल इसका परीक्षण केवल लेबोरेट्री (प्रयोगशाला) कंडीशन्स (शर्ते) में ही किया गया है। कई बायोटेक (जैव प्रौद्योगिकी) कंपनियों (समूहों) ने इस खोज की सराहना की है। और सहयोग देने की बात कही है।
  • खोज की प्रमुख वेनेसा शील्ड के मुताबिक वे हमेशा से चाहती थी कि नई तकनीकी इस तरह काम करे जिस तरह जीवित इंसानी ऊतक करते हैं। इस खोज की सफलता से वे यह संभव कर पाई हैं।
  • इस खोज का नेतृत्व करने वाली कोलंबिया की वेनेसा शील्ड बताती है, ’इंसान की आंखे सबसे ज्यादा संवदेनशील हैं। इसलिए बाहरी पदार्थ जैसे कि मेटल (धातु) कै रेटिनल (दृष्टिपटल) इंप्लांट (प्रत्यारोपण) नुकसानदायक हो सकते हैं। जिससे सूजन या खुजली जैसी परेशानी आ सकती है। पर ये सिंथेटिक बॉयोलॉजिकल (जैविक) इंप्लांट (प्रत्यारोपण) सॉफ्ट (मुलायम) और वाटर (पानी) बेस्ट (श्रेष्ठ) है और आंखो के लिए पूरी तरह अनुकूल है। इसलिए सुरक्षित भी हैं।’

अंटार्कटिका: -

  • संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) दुनिया के 10 सबसे सूखाग्रस्त इलाकों में से एक है। यूएई मेें पानी की समस्या बढ़ती जा रही है। अगले 25 सालों में यहां इतना सूखा पड़ जाएगा कि मानव का इस क्षेत्र में जीवनयापन करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। संयुक्त अरब अमीरात पानी की इस समस्या से निपटने के लिए आइसबर्ग (हिमशैल) का सहारा लिया जाएगा। यूएई के राष्ट्रीय योजना सलाहकार ब्यूरो ने योजना बनाई है कि अंटार्कटिका तट के हर्ड आइसलैंड से करीब 8800 किमी दूर एक हिम पर्वत (आइसबर्ग) को खींचकर फुजैराह लाया जाएगा।
  • फुजैराह उन सात अमीरात मे से एक है, जिनसे मिलकर यूएई बना है। फिर इस आइसबर्ग को पिघलाकर पीने का पानी बनाएगी। इस प्रोजेक्ट (परियोजना) में कितना खर्च आएगा इस बात का खुलासा नहीं किया है। एक हिमपर्वत से 10 लाख लोगों के पीने के पानी की जरूरत पांच साल तक पूरी की जा सकती है।

शुरुआत-

  • अबूधाबी के मदसर स्थिति राष्ट्रीय योजना सलाहकार ब्यूरो (सरकारी विभाग) ने बताया 2018 में परियोजना की शुरूआत की जाएगी। हिमपर्वत को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर बॉक्स (डिब्बा/संदुक) में भर दिया जाएगा। सूरज की गर्मी से जब बर्फ पिघलेगी तो उससे निकले पानी को दूसरे टैंक में एकत्रित किया जाएगा। फिर इस पानी का शुद्धीकरण करके इसे पीने के उपयोग में लाया जाएगा।
  • रिपोर्ट (विवरण) के मुताबिक, औसतन एक हिमपर्वत से 20 अरब गैलेन पानी निकाला जा सकता है। इतना पानी यूएई में रहने वालों के लिए पर्याप्त होगा। हिमपर्वत को समुद्र तट के किनारे रखने से वहां के वातारण में नमी आएगी। इससे बारिश होने की संभावना भी बढ़ेगी।

- Published/Last Modified on: June 11, 2017

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