सेना दिवस (Sena Diwas - Essay in Hindi)

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प्रस्तावना: - 15 जनवरी 1949 यह दिन हमारे भारत देश के लिए एक महान दिवस है क्योंकि आज के दिन भारत देश 68 वांं सैन्य दिवस मनाने जा रहा है। आज ही के दिन भारतीय सेना की कमान ब्रिटिश जनरल फ्रांसिस बूचर से जनरल के. एम. करिअप्पा के हाथ में आ गई थी। इसके बाद से चाहे कोई भी परिस्थिति रही हो, सेना ने देश के गौरवान्वित करने का मौका ही दिया है। जब सेना युद्ध में उलझी नहीं होती हो अकसर ऐसा देखने में आता है कि घरेलू आपदाओं के दौर में सेना का इस्तेमाल कुछ अधिक ही हो जाता है। तो क्या बदल रही है भारतीय सेना की भूमिका? क्या होते हैं इसके नुकसान? यदि लड़ाई की परिस्थिति बनी तो क्या होगा सेना के मनोबल पर असर? मनोबल बनाए रखने के लिए क्या करना होगा?

सेना दिवस: - 15 जनवरी 1949 को ब्रिटिश प्रमुख सर फ्रांसिस बुचर ने भारतीय सेना के कमांडा-इन चीफ का पद लेफ्टिनेट जनरल के एम करियप्पा को सौंपा था। भारतीय सेना की कमान पूरी तरह से मिलने के उपलक्ष्य में ही हम हर वर्ष 15 जनवरी को सेना दिवस मनाते आ रहे हैं। भारत आज यानी 15 जनवरी 2016 को अपना 68 वां सेना दिवस मना रही हैं।

फतह: - भारत का वर्ष 2015 - 16 में 40.07 अरब डॉलर रक्षा बजट है, 1949 में जन, करियप्पा आजद भारत की सेना के पहले कमांडर इन चीफ बने। 13 लाख से ज्यादा सक्रिय सैनिकों के साथ भारतीय सेना दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना हैं। भारतीय फौज ने 1947, 65, 71 और 199 में पाकिस्तान से लड़ाई लड़ी और सभी में फतह हासिल की। बस 1962 में चीन के खिलाफ हार झेलनी पड़ी। घरेलू विपत्ति के दौर में कभी-कभी ही सेना को बुलाया जाना चाहिए पर कई बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है, जब सेना ही इनसे जूझती नजर आती है।

प्राथमिक काम: - सेना का प्राथमिक काम देश की रक्षा करना है। बाहर के दुश्मन से बचाव के लिए उसकी जरूरत होती है। यदि सीमा पर कोई आक्रमणकारी गतिविधि करे तो उसे रोकने के लिए सेना है। इसी लिहाज से फौज को सुसज्जित किया जाता रहा है। इन्ही परिस्थितियों को देखते हुए ही उसके पास तोप, टेंक हैं, गोला-बारूद है और अन्य बड़ी सामग्री है। लेकिन, उसकी दूसरी भूमिका यह है कि जब लड़ाई नहीं चल रही हो और देश में कोई ऐसी कोई विपत्ति आ जाए जिससे निपटने में आंतरिक सुरक्षा बल सक्षम न हो तो उसकी सहायता ली जाती है।

भूमिका: - यह सही है कि घरेलू विपत्ति के दौर में कभी-कभी ही सेना को बुलाया जाना चाहिए लेकिन देश में कई बार ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है, जबकि सेना ही ऐसी परिस्थितियों से जूझती नजर आती है। उदाहरण के तौर पर कश्मीर में आंतकी गतिविधियां नियमित सी होती हैं और उनसे निपटने के लिए सेना को हमेशा ही वहां तैनात रहना पड़ता है। इसी तरह प्राकृतिक आपदाएं जैसे कहीं बाढ़ आ गई हो तो या फिर कोई बड़ी दुर्घटना हो गई हो तो अकसर सेना को ही बुला लिया जाता है। यह सही है कि सेना के पास पर्याप्त संसाधन होते हैं और उसके पास प्रशिक्षित जवान भी होते हैं, ऐसे में उन्हें बुलाया जा सकता है। लेकिन, ऐसी विपत्ति में सेना का कार्य सीमित दिनों के लिए होता है। इन परिस्थितियों से निपटने के लिए हालांकि देश में अन्य राहत दल हैं लेकिन उनका अनुशासन इतना बेहतर नहीं है कि वे परिस्थितियों को संभाल सके। शायद इसलिए सेना को बार-बार इन मामलों में याद किया जाता है। चूंकि सेना लड़ाई में तो व्यस्त नहीं है और इतने बड़े देश में कहीं न कहीं तो ऐसी परिस्थिति बन ही जाती है, जबकि सेना की सहायता लेनी पड़ जाती है। ऐसे में लगता यही है कि जैसे सेना का कार्य घरेलू विपत्तियों से निपटना ही रह गया है। वास्तव में इसे सेना की भूमिका बदलना नहीं बल्कि सिर्फ भ्रम ही कहा जाएगा।

अभ्यास: - जरा सोचिए कि यदि कश्मीर में पाकिस्तान या चीन का हमला हो और जो फौज वहां घरेलू परिस्थितियों से जूझ रही हो उसके लिए दूसरी तरफ मुंह मोड़ कर लड़ना कितना कठिन हो सकता है? इसलिए यह तो सोचना ही पड़ेगा कि यदि सेना को इस तरह के कामों में लगा भी लिया गया तो इसके लिए कुछ समय-सीमा तो तय हो। उदाहरण के तौर पर यदि कोई खिलाड़ी ओलंपिक में भाग लेता है तो उसे साल भर तक उसका अभ्यास करना पड़ता है। सैनिक यदि घरेलू स्तर पर ही व्यस्त हो तो उसे युद्ध के लिए अभ्यास के लिए समय कब मिलेगा? एक बड़ा नुकसान यह है कि सेना लंबे समय तक यदि घरेलू परिस्थितियों से जूझती है तो उसकी विशेष राजनीतिक सोच भी बनने लगती है। आज से 20 साल पहले तक तो फौज के मन में राजनीतिक सोच की बात तो दिमाग में आती ही नहीं थी लेकिन अब सैनिक यह सोचने लगे हैं कि उसे सेना में कार्य करते हुए क्या मिल रहा है? उसे अपेक्षाकृत अन्य सेवा के लोगों से कम सेवाए मिल रही है।? दीर्घकालीन में सेना की ओर से हस्तक्षेप करने की आशंका बनने लगती है। सैनिक के मन में आने लगता है कि उसे ये भत्ते नहीं मिल रहे हैं। सैनिक अब यह सोचने लगा है कि सीमा पर जान हम देते हैं लेकिन सुविधाएं पाने के मामले में अन्य लोग आगे रहते हैं। जबकि अन्य सेवाओं के लोगों को इस तरह के भत्ते मिल रहें हैंं।

भारतीय: - इन वर्षों में सेना के जांबाज सैनिकों और अधिकारियों ने यह पूर्ण रूप से प्रमाणित कर दिया है कि भारतीय सेना विश्व की किसी भी सैन्य -शक्ति से कम नहीं है। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के बाद भी 1 वर्ष 5 माह तक सेना की कमान ब्रिटिश सेना अधिकारी सर फ्रांसिस बूचर के ही हाथों में रही। भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कमान भारतीय हाथों में सौंपने से पहले, यह संशय प्रकट क्रिया कि अभी कुछ वर्षों के लिए सेना की कमान ब्रिटिश जनरल के हाथों में ही रहने दी जाए क्योंकि हमें इसका अनुभव नहीं है। सेना के एक उच्च अधिकरी ने कहा, ’सर हमें अनुभव तो हमें देश का प्रधानमंत्री बन कर देश चलाने का भी नहीं था किन्तु आप सफलतापूर्वक यह कार्य कर रहे हैं, तो फिर आपको जनरल के. एम. करिअप्पा की काबिलियत पर संशय क्यों? ’ प्रधानमंत्री ने तब निर्णय किया और 15 जनवरी 1949 को भारतीय सेना की कमान ब्रिटिश जनरल सर फ्रांसिस बुचर से जनरल के. एम. करिअप्पा के हाथों में आ गई, तभी से 15 जनवरी सेना दिवस के रूप में मनाया जाता हैं।

मार्शल: - 26 जनवरी के दिन दिल्ली में अमर जवान ज्योति पर उन सभी सैनिकों को श्रंदाजली दी जाती है जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की आहूति दी थी। सेना दिवस पर सेना के सभी कमांड-बढ़े कार्यालय पर और सेना की सभी यूनिटों में विभिन्न प्रकार के आयोजन किए जाते हैं जनरल करिअप्पा ने स्वस्थ्य परंपराओं, अनुशासन, देश के प्रति समर्पण और राजनीति से सदा दूर रहने के संस्कार दिए। भारतीय सेना में पूर्ण भारतीयता की नींव डाली। वे जीवन पर्यन्त एक सैनिक बने रहे। और सेनाओं की मर्यादा को निभाते रहे। शायद इन्ही विशेषताओं के कारण अवकाश प्राप्त करने के बाद देश ने उन्हें फील्ड मार्शल की पदवी से नवाजा था।

सेना: -सन्‌ 1948 से लेकर आज तक सेना ने एक बार नहीं अनेक बार अपना समर्पण, बहादुरी और बफादारी के परिचय दिए है। चाहे वे प्राकृतिक आपदाएं ही रही हों या सीमा पर शत्रु से लोहे लेने की जरूरत पड़ी हो। इतना ही नहीं जब जब हमारे राजनेताओं और नौकरशाहों उचित नर्णिय लेने में सक्षम नहीं हुए, तब-तब सेना ने अपने स्तर सही निर्णय लेकर कार्य को सम्पादित किया है। एक घटना भारतीय सैन्य अकादमी के देहरादून को संबोधित करते हुए आर्मी कमांडर शमी खां ने स्वयं बयां की थी। कि पाकिस्तानी सेना ने सियाचिन की भारतीय चौकियों पर हमला कर तीन-चार चौकिंया कब्जा ली थी। उन्होंने उधमपुर से सियाचन जाकर अपना कैम्प लगा दिया और स्थानीय कमांडर को बलाकर हिदायत दी कि शमी खां यहां से वापस तब ही जाएगा जब ये चौकियां पाकिस्तान से वापस ले ली जाएगी। स्थानीय कमांडर ने सियाचिन में तैनात सेना से इस उद्देश्य की प्राप्ति में संशय प्रकट किया । शमी ने स्वयं स्थिति का जायजा लिया और आवश्यक ट्रुप्स सियाचिन में मंगवायें और उन चौकियों में वापिस कब्जा किया। उन्होंने लिखा है कि ’मैंने यह सब कुछ इसलिए किया क्योंकि भारतीय सेना के इतिहास में यह न लिखा जाए कि मेरी कमान के दौरान सियाचिन की चौंकयां पाकिस्तान ने हथियां ली।’

आर्मी: - अमृतसर स्वर्ण मंदिर में आर्मी एक्शन के समय दिल्ली में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री वार-रूम में बैठकर एक्शन की पल-पल की रिपोर्ट ले रही थीं। जनरल ने रात के 2.30 बजे के आस पास प्रधानमंत्री को सूचित किया कि आर्टलरी और टेंको की सहायता के बिना अमृतसर की अभेद्य किलेबेदी को तौड़ना मुमिकन हैं। अगर ऐसा नहीं किया गया तो भारतीय सेना को हार का मुंह देखना पड़ेगा। प्रधानमंत्री असमंजस में थी। वे आर्टलरी और टेंको को इस्तेमाल नहीं करना चाहती थी। सेना ने अपने निर्णय लिए, आर्टलरी फायर का इस्तेमाल भी किया और टेंक भी अंदर भेजे, सुबह तक भारतीय सेना का स्वर्ण मंदिर पर कब्जा था।

सन्‌ 1971 के युद्ध में जब जनरल मानेक शॉ ने करीब एक लाख पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण करवाया था। उस समय कुछ राजनीतिक और नौकरशाहों को यह मान्यता थी कि इन्हें समाप्त कर दिया जाए। मानेक शॉ इससे सहमत नहीं हुए और उन्होंने युद्ध बंदियों को देश के हवाले कर दिया।

मनोबल: - सेना से अच्छे परिणाम के लिए उनके मनोबल को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। मनोबल गिरता है तो आधुनिक हथियार, सुविधाएं भी आशांतीत परिणाम प्राप्त करने में मदद नहीं कर पाते। इसलिए हमारे सैनिक अपनी वर्दी उतारते हैं तो उनकी सुविधाओं का ध्यान रखना हमारा कर्तव्य है। हमारे देश में पिछले कई वर्षों से सेना के प्रति बरती जा रही उदासीनता निश्चित रूप से सेना के मनोबल को प्रभावित करेगी। अब हाल ही के मौहोल पर नजर डाली जाए तो पूर्व सैनिक के वन रैंक वन पैंशन व सातवे वेतन आयोग में सेना के प्रति व्यवहार अच्छा नहीं था जिससे सेना का मनोबल धीरे-धीरे घटता जा रहा हैं। मनावैज्ञानिक भलीभांति समझते हैं कि जब व्यक्ति अपनी पीड़ाओं को व्यक्त करने में असमर्थ पाता है तो उसकी कार्यकुशलता पर क्या असर पड़ता हैं?

हमारी फौज की स्थिति

Scenario of Indian Army

Scenario of Indian Army

भारत

पाकिस्तान

चीन

अमरीका

सैनिक

13, 25, 000

6, 17, 000

22, 85, 000

14, 30, 000

टैंक

3, 569

3, 124

9, 150

8, 325

आर्म्ड फाइटिंग व्हीकल्स

5, 085

3, 187

5, 085

25, 782

सेल्फ प्रोपेल्ड गन

290

470

1, 710

1, 934

आर्टिलरी

6, 445

3, 263

6, 246

1, 791

मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर

292

200

1, 770

1, 330

उपंसहार: - देश की रक्षा के लिए सेना कितनी महत्वपूर्ण है यह हमें समझना होगा इसके लिए अन्य सेवाओं की अपेक्षा सेना की हर आवश्यकता का ध्यान सरकार को रखना होगा एवं इसके साथ उनके मनोबल को बनाए रखने के लिए उन्हें हर समय प्रेरित करना होगा जिससे वे प्राथमिक कार्य से भटके नहीं हैं और अपना कार्य मन लगाकर करें।

- Published/Last Modified on: March 25, 2016