सियाचिन ग्लेशियर (Siachen Glacier and Indian Army - Essay in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना: - देश की सीमा पर कहीं घने जंगल है, कहीं अपार पानी तो कहीं दुर्गम पहाड़ियां और रेगिस्तानी इलाका हैं इनमें सबसे कठिन मोर्चा है सियाचिन ग्लेशियर का यहां पारा सर्दियों में तो शून्य से भी 60 डिग्री तापमान नीचे चला जाता है। चिंताजनक आंकड़े ये हैं कि ऐसी बर्फीली सीमा पर 1984 से दिसंबर 2015 तक हमारे 869 सैनिक शहीद हो गए। इनमें से अधिकतर की शहादत दुश्मन की गोली से नहीं बल्कि बेरहम मौसमी मार से हुआ हैं। पड़ोसी देश का भी यही हाल रहा हैं। ऐसे दुर्गम इलाकों को शांति क्षेत्र क्यों नहीं घोषित कर दिया जाता हैं जहां किसी भी देश की सैन्य गतिविधयां वर्जित हों।

सीमा: - देश की सीमा की रक्षा के लिए सैनिकों को न केवल दुश्मन की संभावित घुसपैठ पर लगातार निगाह रखनी पड़ती है बल्कि मौसम के साथ भी लड़ना होता है। जंगली इलाकों में भी चौकसी काफी कठिन होती है और गुजरात या राजस्थान की ओर से लगती सीमा पर तापमान 50 डिग्री को छूने लगता है, धूल भरी आंधियों चलती हैं, लेकिन, जम्मू-कश्मीर की ओर से लगती सीमा, अरुणाचल-सिक्किम की ओर नाथू ला दर्रा और खासतौर पर सियाचिन की सीमा की परिस्थितयां बिल्कुल अलग हैं।

सीमा पर दुर्गम मोर्चे: -निम्न हैं-

  • सियाचिन ग्लेशियर सीमा - समुद्रतल से 18, 875 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। तापमान-50 डिग्री तापमान तक पहुंच जाता है।
  • भार-पाक सीमा, द्रास- जम्मू-कश्मीर के करगिल जिले में स्थित है वर्ष भर यहां तापमान लगभग इकाई के अंक में हैं।
  • भारत-पाक सीमा, राजस्थान- रेतीला इलाका है। कई क्षेत्रों का तापमान 50 प्रतिशत तापमान तक पहुंच जाता है। पानी की बेहद कमी रहती है।
  • भारत-चीन सीमा, अरुणाचल- अत्यधिक बारिश वाला इलाका है। माउंटेन रेजीमेंट और वायुसेना मिलकर क्षेत्र की रक्षा करते हैं।
  • भारत-चीन सीमा, सिक्किम - सालभर तेज बारिश व बर्फबारी का दौर चलता है। सेना की नाथू ला दर्रा पर बराबर गश्त है।
  • जम्मू-कश्मीर सीमा - ठंड व आतंकी गतिविधियां सेना के लिए परेशानियां खड़ी करने वाली।
  • भारत-चीन सीमा, उत्तराखंड - सर्दी में शून्य से नीचे तापमान और मानसून में अधिक बरसात होती है। चीनी सैनिक सीमा रेखा का उलंघन करते रहते हैं।

रक्षा बजट: - हमारे देश का रक्षा बजट करीब ढाई लाख करोड़ रुपए का है। इसमें से यदि सियाचिन ग्लेशियर जैसे इलाके में सालाना करीब 2000 करोड़ रुपए भी आता है तो इसे बहुत अधिक नहीं कहा जा सकता। सियाचिन के बारे में पहले कोई नहीं जानता था। यह ऐसी जगह है जहां इंसान तो दूर परिंदे तक नहीं रह सकते हैं। ऐसे में इस स्थान पर कोई युद्ध कर पाएगा इसकी कल्पना नहीं की जा सकती हैं। यह बात सही है कि ऐसे स्थानों पर सेना की तैनाती करना रक्षा खर्चों को अनावश्यक बढ़ाने वाला है। इस मद में खर्च होने वाली राशि सैनिक कल्याण पर खर्च की जा सकती है।

ऐसे क्षेत्रों को सेना विहीन कर शांति क्षेत्र घोषित करने के लिए पहल कौन करे। सियाचिन जैसे दुर्गम इलाकों में सेना तैनात रखने का कोई औचित्य नहीं है। यह सैन्य खर्च बढ़ाने वाला ही साबित हो रहा है। 1984 व इसके बाद से ही पाकिस्तान की हरकतों को देखते हुए यहां सेना तैनात रखना जरूरी समझा गया है। अब जब भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों के जवान हिमस्खलन से मारे जा रहे हैं तो फिर यह चर्चा उठनी लगी है।

मौसम: - सियाचिन जैसे इलाके में गर्मियों में सामान्य तापमान शून्य से 15 प्रतिशत तापमान कम होता हैं। सर्दियों में यह शून्य से 60 प्रतिशत तापमान नीचे तक पहुंच जाता हैं तो त्वचा गलने लगती है। ऐसे में ठंडी हवा का सैकड़ों किलोमीटर की रफ्तार से चलना जीवन के खतरे को और भी बढ़ा देता है। जहां सांस लेना कठिन होता है। रक्तचाप की हालत ऐसी कि यदि समुद्रतल की 200 - 300 मीटर की ऊंचाई वाले इलाके में हों तो इंसान को सघन चिकित्सा इकाई में भर्ती कराना पड़ता है लेकिन, देश का सैनिक सीमा की रक्षा के लिए डटा रहता है। आंकड़े बताते हैं कि 1884 से लेकर 2015 तक मौसम की मार और अन्य कारणों के चलते 869 सैनिकों की मौतें हुई है। इसमें से करीब 700 सैनिकों को तो हमने मौसम की मार से शुरुआती दो-तीन वर्षो में ही खो दिये थे। बाद में हमने इस इलाके में सैनिकों के लिए बहुत से कदम उठाये। अब घायल सैनिकों के लिए तत्काल हेलीकॉप्टर पहुंच जाते हैं। चिकित्सा के लिए समय पर चिकित्सकों को पहुंचाया जाता हैं। पहाड़ों पर निगरानी करके जब सैनिक वापस आता है तो उसके लिए नमक डालकर गर्म पानी तैयार रहता है, ताकि वह ठंडे हो चुके शरीर को गर्म कर सके। हम अपने सैनिकों को पूरे प्रशिक्षण के साथ ग्लेशियर पर चौकसी के लिए भेजते हैं। इसके अलावा मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सैनिक या कमांडर को अधिकतम 90 दिन ही वहां पर चौकसी करने दी जाती है। इन हालात में सैनिकों को सजा के तौर पर वहां नहीं भेजा जाता बल्कि हमारे सैनिक आगे बढ़कर हाथ उठाकर वहां चौकसी के लिए जाना चाहते हैं।

खतरा: - अकसर कहा जाता है कि भारत-पाकिस्तान के बीच कोई सीमा नहीं हो तो कितना अच्छा होगा? यदि कोई यह कहे कि सियाचिन जैसे इलाके में जहां न केवल हिंदूस्तान बल्कि पाकिस्तान के सैनिक भी तो गोली की बजाय मौसम की मार से मारे जाते होंगे। तो, क्यों न इसे शांति क्षेत्र घोषित करके सैन्य गतिविधि रहित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए। निस्संदेह, यह सुझाव बहुत ही शानदार है और मन को भाने वाला भी है लेकिन प्रायोगिक तौर पर ऐसा कर पाना संभव नहीं है। फिर, हमें सावधान होना है कि हम पाकिस्तान जैसे दुश्मन पर हम भरोसा नहीं कर सकते। कई बार हम ऐसा करके पछताते रहे हें। अब कोई भी जोखिम लेना ठीक नहीं होगा। फिर कैसे भूल जाएं कि दूसरी तरफ चीन भी है। हम शायद ऐसा सोच भी लें लेकिन शर्त यही है कि इसके लिए कम से कम पाकिस्तान दुनिया के नक्शें पर न हो। हमने बड़ी मुश्किलों से सियाचिन की ऊंची चोटियों पर कब्जा जमाया है, हम करगिल की तरह इन्हें खोकर फिर हासिल कर लेने का खतरा नहीं उठा सकते।

एनजे: - सियाचिन की समस्या काफी पुरानी है। वर्ष 1972 में शिमला समझौते में सियाचिन के एनजे-9842 नामक स्थान पर युद्ध विराम की सीमा तय हो गई। पाकिस्तान द्वारा मानचित्रों में इस हिस्से को दिखाने पर भारत ने 1985 में एनजे-9842 के उत्तरी हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।

हित: - शांति क्षेत्र बनाने की वकालत करने वालों का मानना है कि सियाचिन से सैन्य गतिविधियां बंद करना भारत-पाक और चीन तीनों के हित में है। लेकिन, इसके लिए आपस में भरोसा जगाना होगा हर किसी को डर हैं कि कोई भी चौकी से सैनिक हटाए तो दूसरा उस पर कब्जा कर लेगा। इसलिए सैन्य गतिविधियां जारी हैं।

युद्ध क्षेत्र: - हमारे जांबाज, चाहे सियाचिन ग्लेशियर हो, चाहे राजस्थान के रेगिस्तान अथवा देश की दूसरी दुर्गम चोटियां सभी जगह तैनाती के दौरान देशभक्ति व शौर्य के जज्बे को बनाए रखते हैं। सीमित सुविधाओं के बावजूद हमारे जवान आत्मविश्वास और बहादुरी से तमाम बाधाओ का सामना करते रहे हैं। देश की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले सेना के तीनों अंगों के ये जवान और अफसर जरूरत पड़ने पर समय-समय पर देश की आतंरिक आपदाओं में भी जनता की रक्षा के लिए आगे आते हैं। तपता रेगिस्तान, जहां तापमापी का पारा 50 डिग्री तक पहुंच जाता हैं। तपन इतनी की शरीर की चमड़ी जलने लगती हैं। पानी का इंतजाम तक कठिन हो जाता है। उड़ते रेत के टीलों के बीच दिशाभ्रम तो साधारण बात है। शायद आम जनता, नेता और नौकरशाह यह नहीं जानते होंगे कि सियाचिन ग्लेशियर 72 किलोमीटर लंबा और 28 किलोमीटर चौड़ा है। यहां 20 से 24 हजार फीट ऊंचाई पर साल भर बर्फ की परत जमा रहती है। आम तौर पर यहां तापमान शून्य से 30 से 60 डिग्री तक नीचे चला जाता है। फिर भी जवान सदैव तैनात मिलेंगे। सियाचिन विश्व का सबसे ऊंचाई पर स्थित युद्ध क्षेत्र है। दूसरे मायने में बर्फ का तैरता दरिया है। तमाम विपरीत परिस्थितियों में हर समय खुद में खुन का बहाव जारी रखने के जतन रखना कोई आसान काम नहीं है।

दुर्घटना: - दुर्गम इलाकों में तैनात हमारे सेनाओं में कोई न कोई अकसर अपने साथियों से बिछुड़ता रहता हैं। दुश्मन से भी और मौसमी प्रकोप से भी। कभी बर्फ के तूफान के बाद दब जाने से तो कभी असावधानीवश सेना के वाहनों के बर्फ के गहरे गड्‌ढों में फिसल जाने के कारण हादसे होते है। बर्फजनित बीमारियों से ग्रसित होना आम है। बिना युद्ध के ऐसे हादसे सभी देशों के लिए ठीक नहीं। तब सवाल यह भी उठ सकता है कि क्यों नहीं सभी अपनी सेनाएं ऐसे जानलेवा इलाके से हटाने पर सहमत हो जाते? एक नजर में यह विचार काफी अच्छा लगता है। लेकिन सबसे बड़ी बात है कि पहल कौन करें? अपने रक्षा इंतजामों को खतरे में डालने के ऐसे प्रयास तो पहले भी किए गए हैं। लेकिन भरोसा पाक और चीन ने ही तोड़ा है। ऐसा फिर नहीं होगा इसकी गारंटी कौन देगा?

समस्या: - सियाचिन में तैनाती के दौरान सैनिकों को नहाने को नहीं मिलता। पानी पीने के लिए बर्फ पिघलानी पड़ती है। सैनिकों के पास एक खास तरह की गोली होती है, जिसे पिघले पानी में डालकर उसे पीने लायक बनाया जाता हैं।

चिंता की बात यह है कि आधुनिक हथियार, गोला-बारूद आदि की व्यवस्थाओं के लिए भी हमारे यहां काफी देर हो जाती हे। सियाचिन जैसे दुर्गम इलाकों में सैनिकों के काम में आने वाले वस्त्र और अन्य उपकरण आज भी विदेशों से ही मंगाए जाते हैं। दूसरी बात यह भी कि बदलते दौर में हम देश के प्रति मर मिटने वाले इन जवानों के प्रति श्रद्धा व विश्वास का भाव भी कम करते जा रहे हैं। राजनेता और यहां तक कि आम जनता भी अपनी सोच ऐसी रखने लगी है जैसे जवानों की तैनाती व उनकी मुश्किलों से किसी को कोई वास्ता ही नहीं हैं। कितने लोग ऐसे है जो महज पैसे के लिए अपनी जान पर खेलने को तैयार हो सकते हैं तनख्वाह तो पेट पालने के लिए सभी को मिलती हैं। किन्तु देश के लिए समर्पण की भावना से तपती रेत और जमा देने वाली ठंड के बीच प्रकृति के साथ मुकाबला करना आसान नहीं बल्कि टेढ़ी खीर है, यह तो सबको समझना ही होगा। हम कोरी बाते कर सकते हैं लेकिन बाधाओं का मुकाबला करने वाले देश के जवानों के प्रति इस तरह का भाव ठीक नहीं। सेना की तुलना किसी अन्य सेवा से नहीं हो सकती हैं।

इलाका: - चिंता की बात यह है कि सेना के जवानों की जान की कीमत पर यह तैनाती हो रही है। ऐसा इलाका जहां गहरी खाई में ट्रक गिर जाए तो पता तक नहीं लगे। हवा ही सफेद होती दिखती है तो फिर सांस लेने में तो तकलीफ होगी ही न। सियाचिन जैसे इलाकों में तैनात जवानों को सिर पर हर समय मौत का साया मंडराता दिखता है। यह भी दुश्मनों की वजह से नहीं बल्कि प्रकृति के कारण। मुर्शरफ के पाक सेना प्रमुख रहते हुए तीन बार सियाचित के लिए हमले हुए लेकिन नाकाम रहे। पाकिस्तान अब भी यहां कब्जा करने की नापाक कोशिशें करता रहता हैं। चिंता की बात यह है कि चीन भी इस इलाके में दखल करता हुआ पाकिस्तान की मदद कर रहा है। वह इस इलाके में सड़के बना रहा हैं।

सम्मान: - हमारी सरकारों को शहीदों के परिजनों व पूर्व सैनिकों के कल्याण की दिशा में मन लगाकर प्रयास करने होंगे। उनको सम्मान दिया जाना आज की बड़ी जरूरत है। अफसोसजनक तथ्य यह भी है कि सैनिकों की कार्य परिस्थितियां को दखते हुए हमारी सरकारें उनको यथोचित सम्मान नहीं दे पा रही है। आज भी पूर्व सैनिक लगातार अपनी मांगों को लेकर सत्ता में बैठे लोगों के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। उनकी समस्याओं के समाधान का किसी के पास समय ही नहीं है। सैनिको और सैन्य अधिकाकरयों के वेतन आयोगों में लगातार सुविधाओं में कटौती की जा रही है। जरा कल्पना करें कि सीमा की रक्षा पर तैनात जवानों के माता-पिता पत्नी और अन्य नाते-रिश्तेदारा तो हर समय ही तनाव में गुजरते होंगे। पता नहीं कब किसी अनहोनी की खबर आ जाए।

उपसंहार: - बर्फीले तूफान ने हमारे सैनिकों को ही शहीद किया हो ऐसा नहीं हैं। पिछले सालों में पाक के सैनिक भी बड़ी संख्या में जिंदा ही दफन हो चुके हैं। इसलिए चिंता केवल भारत की ही नहीं बल्कि पाकिस्तान की भी होनी चाहिए। कि वह व्यर्थ में ऐसे दुर्गम इलाकों में अपने जवानों की जान यूं नहीं गंवाए। मौजूदा हालात इस दिशा में पहल करने लायक दिखते ही नहीं। इसके लिए भरोसा जरूरी हैं। सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र युद्ध विहिन कब कहलाएगा इसका पता तो आने वाला समय ही बताएगा।

समाप्त

- Published/Last Modified on: March 11, 2016

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