खोज (Some important research in Hindi) (Download PDF)

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वजन: -अधिकतर लोगो के सामने केविन हाल सोचते थे के लोगो के मोटे होने के कारण एकदम सामन्य है। वे पूछते थे, मोटे लोग कम खाते और अधिक एक्सरसाइज (व्यायाम करना) क्यों नहीं करते हैं। भौतिकशास्त्री हाल जितनी कैलोरी खाओ, उतनी हजम करो के गणित में भरोसा करते थे। लेकिन, उनकी खुद की रिसर्च (अनुसंधान) और रियलिटी (वास्तविकता) टीवी शो (कार्यक्रम) में हिस्सा लेने वालो ने उन्हे गलत साबित का दिया।

  • अमेरिका की नेशनल (राष्ट्रीय) इंट्रस्टट्‌ियूट (संस्थान) आफॅ (का) हेल्थ (स्वास्थ्य) (एनआईएच) मे साइंटिस्ट (वैज्ञानिक) हाल ने कुछ वर्ष पहले अपने मित्र के कहने पर टीवी शो (कार्यक्रम) द (यह) बिगेस्ट (सबसे बड़ी) लॉजर देखना शुरू किया था। वे बताते हैं, मैंने उन लोगों को एक हफ्ते में 9 किलो वजन घटाते देखा था। कठोर एक्सरसाइज (व्यायाम) और सीमित डाइट (आहार योजना) से वजन कम किया जा सकता है। फिर भी, एक सप्ताह में 9 किलो तो बहुत होता है। इसलिए उन्होंने शो में भाग ले रहे 14 लोगों का अध्ययन करने का निर्णय लिया। पूरे सीजन (अवसर) में हर प्रतिभागी ने 57 किलो वजन घटा लिया जो उनके शरीर की चर्बी का 64 प्रतिशत था। हाल को स्टडी (अध्ययन) से ऐसी जानकारी मिली जिसकी उन्हे आशा नही थी। शो के बाद 14 मे से 13 प्रतिभागियो ने जितना वजन घटाया था, उसका 66 प्रतिशत वापस हासिल कर लिया। चार लोग तो पहले से ज्यादा मोटे हो गए थें
  • हाल की रिसर्च (खोज) वैज्ञानिकों को समझने मे मदद कर रही है कि डाइटिंग (आहार योजना) क्यो इतनी कठिन है, लंबे समय तक वजन कम रखना मुश्किल क्यो है और कुछ लोगे को वजन कम रखने मे समस्या क्यो होती है। प्रमुख शोधकर्ता सहमत है कि अच्छी सेहत के लिए एक्सरसाइज (व्यायाम करना) महत्वपूर्ण है पर यह लंबे समय तक शरीर को फैट से दूर रखने का विश्वसनीय तरीका भी नहीं हैं। किसी व्यक्ति के आहर से वजन की घट बढ़ तय होती हैं। मोटापे के प्रमुख शोधकर्ता फ्रेंक साक्स कहते है, निश्चित आकार का पालन करने वाले कुछ व्यक्ति 25 किलो वजन घटाकर इको फेट से दूर रखने का विश्वसनीय तरीका भी नही है। किसी व्यक्ति के आहार से वजन की घट बढ़ तय होती है। मोटापे के प्रमुख शोधकर्ता फ्रेंक साक्स कहते है, निश्चित आहार का पालन करने वाले कुछ व्यक्ति 25 किलो वजन घटाकर दो वर्ष तक उसे कायम रखते हैं जबकि उसी तरीके पर चलने वाले कुछ व्यक्ति वजन चार किलो बढा लेते हैं।
  • हाल साक्स और अन्य वैज्ञानिक दर्शा रहैं कि वजन कम रखने मे किसी खास डाइट (आहार योजना) की बजाय व्यक्ति का महत्व ज्यादा है। रिसर्च से पता लगा है, 80 प्रतिशत मोटे लोगो का वजन कम होने के बाद फिर बढ़़ गया। यह इसलिए क्योंकि जब आपका वजन घटता है तो रेस्टिंग (आराम) मेटाबॉलिज्म़ (चयापचय) (आराम के दौरान शरीर कितनी उर्जा का उपयोग करता है।) की प्रक्रिया धीमी पड़ जांती है। मेटाबॉलिज्म़ (चयापचय) शरीर की कोशिकाओं और अंगों को जीवित रखने की रसायनिक प्रतिक्रिया है। हाल ने पाया कि बिगेस्ट (सबसे बड़ी) लॉजर शो के प्रतिभागियों का जब घटा वजन थोड़ा बढ़ गया तो उनका रेस्टिंग मेटाबॅालिज्म़ (आराम चयापचय) उसके हिसाब से नहीं चल सका। इसकी बजाय वह धीमा रहा। वजन घटाने के प्रोग्राम (कार्यक्रम) की शुरूआत की तुलना में उसनें प्रतिदिन 700 कैलोरी (ऊष्मांक) कम खर्च की थी।
  • विश्व मे दो अरब से अधिक मोटे लोगो के लिए केविन हाल के निष्कर्ष निराश करने वाले हो सकते हैं। वे बताते हैं, यह इच्छाशक्ति की कमी नही बल्कि शरीर रचना का नतीजा है। लेकिन, धीमा मेटाबॅालिज्म़ (चयापचय) ही सब कुछ नही है। बहुत सारे लोग वजन घटाने मे कामयाब रहते हैं। कुछ व्यक्ति हर तरह की डाइट (आहार योजना) के साथ वज़न कम कर सकते हैं। हाल कहते हैं आप कुछ व्यक्तियो को कम कारबोहाईड्रेट और कम फेट (मोटापा) का डाइट देते हैं। उन्मे से कुछ लोग वजन घटाने में बहुत सफल रहते हैं। कुछ लोगों का वजन नही घटता है और कुछ का बढ़ जाता हेै। विशेषेज्ञ इस गुथ्थी को हल करने की दशा में आगे बड़ रहे हैं।
  • ब््रााउन विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान और मानव व्यवहार की प्रोफेसर (प्रधान अध्यापक) रेना विंग पिछले 23 वर्षों से नेशनल (राष्ट्रीय) वेट (वजन) कंट्रोल (नियंत्रक) रजिस्ट्री (पंजीकरण) (एनडब्ल्यूसीआर) चला रही हैं। यह वजन घटानें और उसे बनाए रखने वाले लोगों का रिकॉर्ड (प्रमाण) रखती है। कोलोरेडो विश्वविद्यालय में मोटापे के शोधकर्ता और विंग के सहयोगी जेम्स हिल का कहना है, ‘हमने इस सोच के साथ शुरुआत की थी वजन घटाने और फिर उसे बनाए रखने में कोई व्यक्ति सफल नहीं हुआ है। रजिस्ट्री में शामिल होने की शर्त है, किसी व्यक्ति ने अपना वजन 30 किलो घटाया और उसे एक वर्ष तक बनाए रखा है। आज रजिस्ट्री में 10000 से अधिक व्यक्ति शामिल है और प्रति व्यक्ति के वजन घटने का औसत लगभग 30 किलो है। वर्तमान सूची में लोगों ने अपना वजन औसतन पांच वर्ष तक कम बनाए रखा हैं।
  • रजिस्ट्री के बारे में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है कि सूची में शामिल हर व्यक्ति ने अपना वजन अलग-अलग तरीकों से घटाया है। करीब 45 प्रतिशत लोगों ने बताया, उन्होंने स्वयं विभिन्न किस्म का डाइट (आहार योजना) अपनाकर वजन कम किया। 55 प्रतिशत ने बताया, उन्होंने वजन घटाने के निश्चित प्रोग्राम (कार्यक्रम) का पालन किया है। अधिकतर लोगों ने एक से अधिक डाइट अपनाया तब जाकर उनका वजन कम हुआ।
  • शोधकर्ताओं ने उनके बीच कुछ समानताएं पाई हैं-स्टडी (अध्ययन) में शामिल 98 प्रतिशत लोगों ने बताया उन्होंने अपने डाइट में सुधार किया है। 94 प्रतिशत ने अपनी शारीरिक गतिविधि बढ़ा दी और एक्सरसाइज (व्यायाम) का सबसे प्रचलित तरीका पैदल चलना रहा।
  • विंग कहती हैं, ‘उन लोगों ने कोई जादुई काम नहीं किया है। कुछ लोगों ने दूसरों से ज्यादा व्यायाम किया, कुछ ने कम कार्बोहाइड्रेट लिया, कुछ ने कम फैट का डाइट लिया। एक बात समान रही कि उन्होंने अपन रोजमर्रा की आदतों में बदलाव किया’। वजन घटाने के बारे में पूछे जाने पर स्टडी के अधिकतर लोगों ने बताया, वे हर दिन नाश्ता करते हैं, सप्ताह में एक दिन वजन नापते हैं, हर सप्ताह दस घंटे से कम टीवी देखते हैं और रोज एक घंटा व्यायाम करते हैं।
  • शोधकर्ताओं ने उनके रवैए और व्यवहार को भी देखा। उन्होंने पाया कि लंबी अवधि तक वजन कम रखने वाले लोग किसी बीमारी के भय या लंबा जीवन जीने की इच्छा रखने या अपने प्रियजन के साथ अधिक दिन गुजारने जैसे करणों से प्रेरित रहे। हाल, विंग और उनके सहयोगी बताते है रजिस्ट्री में दर्ज लोगों में कोई भी दो व्यक्ति ऐसे नहीं हैं जिन्होंने एक ही तरीके से वजन घटाया हो। ओटावा में बेरियाट्रिक (क्रूर/जंगली) मेडिकल (चिकित्सा संबंधी) इंस्टीट्‌यूट (संस्थान) इस विचार पर काम करती है। वहां वजन घटाने का कार्यक्रम शुरू करने वाले सभी लोगों को छह माह तक एक जैसे डाइट और व्यायाम प्लान पर रखा गया लेकिन उन्हें चिकित्सक की मदद से अपनी पसंद का कार्यक्रम चुनने की आजादी दी गई। अधिकतर लोगों ने अलग-अलग प्लान अपनाए और सफल हुए। इंस्टीट्‌यूट (संस्थान) के डायरेक्टर (निर्देशक) योनी फ्रीडहॉफ बताते हैं, हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग मापदंड होने चाहिए। हर किसी के लिए एक जैसा डाइट सही नहीं हो सकता है। लेंसेट पत्रिका में पकाशित एक लेख में हाल और फ्रीडहॉफ ने चिकित्सकों से अपील की है कि वे वजन घटाने के लिए बेहतर डाइट पर बहुत अधिक ध्यान देने की बजाय स्वस्थ और अच्छी जीवनशैली अपनाने पर जोर दें।
  • मार्च 2017 की एक स्टडी में पाया गया, जो लोग अधिक वजन को कलंक मानते है, उन्हें कम हुए वजन को बनाए रखने में मुश्किल होती है। इसलिए अधिकतर विशेषेज्ञ लोगों को बेहतर परिणामों के लिए वजन पर ध्यान रखने की बजाय स्वास्थ्य सुधारने के उपाय अपनाने पर जोर देते हैं। हाल कहते हैं, यदि आपका फोकस (ध्यान) केवल वजन पर होगा तो आप फायदा पहुंचाने वाले परिवर्तनों को छोड़ देंगे।

केमिकल-हम अपने रोजमर्रा के जीवन में जिन केमिकल्स (रासायनिक) के संपर्क में आते हैं, उनका वजन बढ़ाने से संबंध है। इनमें शामिल हैं, डिब्बा बंद फूड (भोजन) कंटेनरों (पात्र), कैश (नकद) रजिस्टर (पंजीकृत कराना) रसीदों, सोफा, मेट्रेेस (चटाई) में पाया जाने वाला रसायन बिसफेनॉल ए (बीपीए) और हमारे भोजन में पाए जाने वाले कीटनाशक के अवशेषों, प्लास्टिक (लचीला), कॉस्मेटिक्स (अंगराग) में मिलने वाले थैलेट्‌स। इन रसायनों में मानव हार्मोन्स (आंतरिक रस) की नकल करने की क्षमता हैं। ये केमिकल फैट (मोटापा) के संग्रह को बढ़ावा देने वाले एंडोक्राइन सिस्टम (अंत: स्त्रावी प्रणाली) को प्रभावित कर सकते हैं। न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय मेडिसिन (दवाई) विद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर (प्रधान अध्यापक) डॉ. लियोनार्डो ट्रेसांडे कहते हैं, पुराना सिद्धांत है कि खराब आहार और व्यायाम की कमी मोटापे के लिए जिम्मेदार है लेकिन रसायनों के संपर्क में आने से भी मोटापा बढ़ता है। केमिकल हमारे हार्मोन्स और मेटाबॉलिज्म (चयापचय) को अस्तव्यस्त कर सकते हैं जिनसे बीमारियां और वजन बढ़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

आवश्यक-स्वास्थ्य सुधारने के लिए ज्यादातर लोगों को बहुत ज्यादा वजन कम करने की आवश्यक नहीं है। रिसर्च (खोज) बताती है, केवल 10 प्रतिशत वजन कम करके लोग ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप), ब्लड शुगर (डायबिटीज) के स्तर में उल्लेखनीय परिवर्तन हासिल कर सकते है। इससे दिल की बीमारियों और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा घट जाता है।

डिस्को बैक्टीरिया (जीवाणु): -सिंथेटिक (कृत्रिम पदार्थ) बायोलोजी (जीव विज्ञान) का मूल विचार यह है कि जीवित कोशिकाओं को कंप्यूटर (परिकलक) की तरह प्रोग्राम (कार्यक्रम) किया जा सकता है ताकी हम उनसे वे काम करवा ले या ऐसे योगिक पैदा करवा लें, जो उनके प्राकृतिक साथी नहीं कर पाते है। अब तक यह केमिकल (रसायन) सिग्नल (संकेत) से होता रहा। मैचासुनेटस इंस्टीट्‌यूट (संस्थान) ऑफ (का) टेक्नोलोजी (तकनीकी विधि) के जीव नही नही नही नही वैज्ञानिक क्रिस्टोफर वॉइग्ड ने नेचर केमिकल (रसायन) बायोलोजी (जीव विज्ञान) में प्रकाशित शोधपत्र में केमिकल (रसायन) की बजाय रंगीन प्रकाश से यह काम करने का रास्ता बताया है।

  • डॉ. वॉइग्ट ने वर्ष 2005 में ई. कोलाय बैक्टीरिया (जीवाणु) के चार जीन बदले, जिससे इस सुक्ष्मजीव में प्रकाश और अंधकार को प्रतिक्रिया देने की काबिलियत आ गई। अब वे इस बैक्टीरिया (जीवाणु) को रंग महसूस करने की क्षमता दमना चाहते है, जबकी आमतौर पर यह मानव के पेट में रहते है। इसका मतलब था डीएनए की 46 हज़ार जोंड़ियो वाली 18 जीन से छोड़छाड़। इन परिवर्तनो से इनमें तीन प्रकार के लाइट (रोशनी) सेंसर (संवेदक) विकसित हुए, जाम पोधौ और एलगी (कवक) में पाए जाने वाले फोटो (छायाचित्र) रिसेप्टरों जैसे है। ये उन्हे दिन का समय मौसम आदि का पता देते हैं, जिसके अनुसार वे प्रजनन (रिप्रोडक्शन) (प्रजनन) तय करते है। जैसे एक सेंसर 535 नेनोमीटर (समुद्री मील दूर) वेवलेंथ वाले प्रकाश (जिसे मानव ओख हरा रंग कहेगी) से स्विच ऑन (खोलना) होता है और कुछ अधिक लंबाई वाली लाल वेवलेंथ (तरंग दैर्ध्य) से स्विच ऑफ (बंद करना) होता है।
  • लाइट (रोशनी) सेंसर (संवेदक) का इस्तेमाल उन जीन को कंट्रोल (नियंत्रण) करने में हो सकता है, जाम लाखे पगकार के रसायन बनाते है। वैज्ञानिक आर्टिफिशियल (कृत्रिम) स्विटनर (प्रलोभन) से लेकर ढेर सारी दवाएँ बनाने की सोच रहेें है। लेकिन सही केमिस्ब् के लिए जरूरी है कि बैक्टीरिया (जीवाणु) कई रसाएनिक क्रियाएँ ठीक क्रम से अंजाम दे। रसाएनों से यह करना मंहंगा होगा। डॉ. वाईट सोचते है कि रसायनो की जगह यदि बंद होने और चालू होने वाले रंगीन लाईट (रोशनी) लगा दिए जाएँ तो यह काम हो सकता है। वे मज़ाक में कहते हैं कि यह थेड़ा डिस्को बैक्टीरिया (जीवाणु) जैसा है। एक कोशीय जीवो की यह रंगो की मस्ती ही शयद केमिकल (रसायन) मैन्युफेक्चरिंग का भविष्य है।

- Published/Last Modified on: September 6, 2017

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