अंतरिक्ष (Space Missions in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना:- बढ़ती जनसंख्या और घटते संसाधनों ने मनुष्य को अंतरिक्ष में नए विकल्प तलाशने के लिए विवश किया है। ऐसे में वैज्ञानिक सौरमंडल के भीतर व बाहर तैर रहे खगोलीय पिंडो, ग्रहों की तरफ उम्मीद की नजर से देख रहे हैं। जिससे इन ग्रहो का गहराई से अध्ययन किया जा सके।

मंगल ग्रह:-वह दिन दूर नहीं जब मंगल ग्रह पर सफर के लिए यात्री यान की शुरुआत होगी। मंगल यात्रा की यह योजना वर्ष 2025 तक शुरू होने की उम्मीद है। एक बार में 100 यात्री मंगल ग्रह पर जा सकेंगे और इस सफर में 80 दिन लगने की उम्मीद है। इसे इंटरप्लानेट्री ट्रांसपोर्ट सिस्टम (परिवहन प्रबंध) नाम दिया गया है। जीवन में एक बार के इस रोमांचक सफर के लिए टिकट की श्रुुआत 5 लाख डॉलर से शुरू होगी और बाद में कम करके इसे एक लाख डॉलर तक किया जा सकता है। हालांकि अभी सबसे बड़ी अड़चन सिस्टम (प्रबंध) तैयार करने को लेकर है, जिसकी लागत 10 अरब डॉलर आंकी जा रही है।

इसरो:- भारत के ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) के प्रक्षेपण की उल्टी गिनती शुरू हो गई। पीएसएलवी अपने अब तक के सबसे लंबे मिशन के तहत 8 उपग्रहों को लेकर अपनी उड़ान भरेगा। इनमें से एक मौसम संबंधी और अन्य सात उपग्रह हैं।

चेन्नई में इसरो ने पहली बार एक रॉकेट के जरिए दो अलग-अलग कक्षाओं में 8 सैटेलाइट (उपग्रह) भेजे हैं। इसमें 3 स्वदेशी और 5 विदेशी उपग्रह हैं। इससे एक प्रक्षेपण का खर्च (120 करोड़ रुपए) भी बच गया। इससे पहले यूरोपीय स्पेस एजेंसी (अंतरिक्ष कार्यस्थान) ही ऐसा कर चुकी है। रॉकेट पीएसएलवी सी-35 ने श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी। करीब सवा दो घंटे में भारत का पहला टू-इन-वन (एक में दो जैसा काम) स्पेस (अंतरिक्ष) मिशन (किसी विशेष कार्य खासतौर विदेश में भेजना जाने वाला शिष्टमंडल) पूरा हो गया। यह इसरो का अब तक का सबसे लंबा और पेचीदा मिशन हैं। एक कक्षा में उपग्रह स्थापित करने में 17 से 20 मिनिट का समय लगता है।

पीएसएलवी की प्रक्रिया निम्न हैं-

  • 9:12 बजे पीएसएलवी रॉकेट (अग्नि बाण) ने 8 उपग्रहों के साथ उड़ान भरी।
  • 2 घंटे 15 मिनिट का समय लगेगा उड़ान में।
  • 320 टन वजन है।
  • 16 मिनिट (बहुत सूक्ष्म) 56 सेकंड (पल भर का समय) बाद या 17 मिनिट में पीएसएलवी ने 730 किमी ऊंचाई पर पहुंचा और फोर्थ स्टेज (चौथा वरण) इंजन (यंत्र जो ऊर्जा को गति में परिवर्तित करता है) बंद किया एवं ध्रुवीय सूर्य समकालिक कक्षा में स्थापित होगा स्थापित।
  • 17 मिनिट 33 सेकंड में स्कैटसैट अलग होकर ऑर्बिट में पहुंचा।
  • 1 घंटे 22 मिनिट में इंजन फिर शुरू किया।
  • 2 घंटे 11 मिनिट में रॉकेट 689.73 किमी की ऊंचाई पर आया।
  • यहां से एक-एक कर 7 उपग्रहों को उनकी ऑर्बिट में भेजा।

8 उपग्रह निम्न हैं-

पीएसएलवी के साथ भेजे जाने वाले दो अन्य भारतीय उपग्रहों में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थाएं बंबई दव्ारा तैयार प्रथम (10 किग्रा) और पीईएस विश्वविद्यालय, बेंगलुरू का पिसैट शामिल है। पांच विदेशी उपग्रहों में अल्जेरिया के तीन (अल्सैट-1 बी 117 किलोग्राम), (अल्सैट-1 एन सात किग्रा), कनाडा का एक (एनएलएस-19 आठ किग्रा) और अमरीका का (पाथफ इंडर-44 किग्रा) शामिल है। सातों उपग्रहों को 689 किमी ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया जाएगा।

  • स्कैटसैट की खासियत-
  • 377 किग्रा वजनी स्कैटसैट-1 मौसम उपग्रह है।
  • साइक्लोन और तूफान की सटीक सूचना देगा।
  • यह 48 घंटे में पूरे ग्लोब को कवर करेगा।
  • 5 साल तक सेवा देगा।

नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी (अंतरिक्ष कार्यस्थान) भी स्कैटसैट की सूचना इस्तेमाल करेंगे। यह सैटेलाइट 2009 में भेजे गए ओशियनसैट-2 की जगह लेगा, जिसने 2012 में सैंडी तूफान को ट्रैक (पीछा करने में) करने में अमेरिका की मदद की थी।

  • जीपीएस नैनो उपग्रह- आईआईटी बॉम्बे के छात्रों ने 8 साल में इसे बनाया है। यह स्पेस में इलेक्ट्रान (अंतरिक्ष में विद्युत कण) की गिनती करेगा। 10 किलो वजनी इस नैनो सैटेलाइट को बनाने में 1.5 करोड़ खर्च हुए। इसमें लीथियम बैट्री (जिसके सेलों में विद्युत धारा बहती है) लगी है। सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं की सूचना देगा। ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) के सिग्नल को बेहतर बनाने में मदद करेगा। इसकी लाइफ (जिंदगी) 4 माह की है।
  • पिसैट- ’पिसैट’ को पीईएस यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय), बेंगलुरु ने बनाया है। यह सैटेलाइट (उपग्रह) पृथ्वी की स्टडी (खोज) में मदद करेगा। पांच किलो वजनी यह सैटेलाइट 185 गुणा 135 किमी का 80 मेगापिक्सल रिजोल्यूशन फोटो (तस्वीर) खींचने में सक्षम है। 250 छात्रों ने इसे 5 साल में बनाया। यह पृथ्वी से 680 से 720 किमी की दूरी पर रहेगा। इसका नैनो कैमरा 12 फ्रेम/सेकंड के हिसाब से फोटो लेगा।
  • सैटेलाइट- भारत ने विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण 1999 में शुरु किया था। पीएसएलवी से यह 36वीं लॉचिंग थी। छोटे आकार के पिग्गीबैंक उपग्रहों का ठेका 2007 से इसरो पा रहा है, तब इसने एगील इतावली उपग्रह को प्रक्षेपित किया था। भारत की सालाना 12 लॉन्च (शुरू) की योजना बना रहा है। भारत ने अब तक 121 सैटेलाइट छोड़े हैं इनमें से 79 विदेशी सैटेलाइट और 42 भारतीय है। इससे उसे करीब 12 करोड़ डॉलर मिले हैं।
  • यूरोपीय एजेंसी- इससे इसरो संस्था बढ़ेगी। दो अलग कक्षा में सैटेलाइट भेजने के लिए दो रॉकेट भेजने पड़ते थे। इस तरह समय और एक प्रक्षेपण का खर्च भी बच गया। यूरोपीय एजेंसी 2012 से अब तक वेगा रॉकेट के जरिए ऐसे 7 मिशन पूरे कर चुकी है।
  • पाकिस्तान- पाकिस्तान की स्पेस एजेंसी सुपार्को इसरो से आठ साल पहले 1961 में बनी थी। आज उसका कोई स्थान नहीं है। भारत ने 121 उपग्रह भेज दिए। जबकि पाकिस्तान दूसरों देशों की मदद से दो ही उपग्रह भेज पाया।
  • बेंगलूरु-चक्रवाती तूफान वरदा की सटीक भविष्यवाणी कर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के उपग्रहों ने 10 हजार लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई है। इसरों ने इसी साल पृथ्वी की कक्षा में दो मौसम उपग्रह इनसैट-3डीआर और स्कैटसैट-1 को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया था, जिसने वरदा की गतिविधियों की जानकारी पहले ही दे दी। इस आधार पर लोगों को सतर्क कर दिया गया, जिससे जान-माल की क्षति बेहद कम हुई है। इसरों ने दोनों उपग्रहों का प्रक्षेपण सितम्बर में ही किया था।
  • मौसम उपग्रह इनसैट-3डीआर को जीएसएलवी रॉकेट से 8 सितंबर को और स्कैटसैट-1 उपग्रह को पीएसएलवी सी-35 से 26 सितंबर को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया। इन दानों उपग्रहों ने वरदा की गति और दिशा का सटीक अनुमान लगाया और उसके तटीय इलाकों से टकराने के समय की बेहद सटीक भविष्यवाणी की। 12 दिसंबर को वरदा तटीय इलाकों से टकराया था। तूफान से चेन्नई, तिरावल्लूर और कांचीपुरम में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हो सकता था। मगर पूर्व तैयारियों के चलते कम से कम 10 हजार लोगों की जान बचा ली गई। तूफान चेन्नई में 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से प्रवेश किया जिससे लगभग 11 हजार पेड़ उखड़ गए थे।

इनसैट-3डीआर की विशेषता निम्न हैं-

  • अत्याधुनिक मौसम उपग्रह इनसैट-डीआर बेहतरीन इमेंजिंग सिस्टम और एटमॉफियरिक साउंडर से लैस है।
  • यह जमीन से 70 किमी ऊंचाई तक 40 स्तरों पर वायुमंडल का तापमान दे सकते हैं।
  • 15 किलोमीटर की ऊंचाई तक 21 स्तरों पर नमी का लेवल माप सकते हैं।
  • इससे रात में भी बादलों और कोहरे की सटीक जानकारी मिलती है।
  • इसमें डेटा रिले ट्रांसपोडर तथा राहत एवं बचाव ट्रांसपोडर से भी लैस है।
  • स्पेस एक्स (अंतरिक्ष विशेषत:) :- सितंबर में हुए रॉकेट हादसे के बाद स्पेस एक्स एक बार फिर अंतरिक्ष में उड़ान के लिए तैयार है। जनसमूह के अनुसार इंजीनियरों (अभियंताओं) ने हादसे की वजह का पता लगा लिया है और वह दिसंबर तक नया रॉकेट प्रक्षेपित कर सकते है। कंपनी (जनसमूह) के सीईओ एलन मस्क ने एक इंटरव्यु के दौरान कहा कि अब तकरीबन सभी दिक्कतें ठीक की जा चुकी हैं। एक ऐसी समस्या थी कि इसे अभी तक रॉकेट के इतिहास में कभी नहीं देखा गया था। गौरतलब है कि स्पेस एक्स के रॉकेट फाल्कलन 9 में उड़ान से दो दिन पहले परीक्षण के दौरान आग लग गई थी। जिसकी वजह से रॉकेट के साथ फेसबुक का 200 मिलियन डॉलर का उपग्रह भी जलकर खाक हो गया था। इस हादसे ने स्पेस एक्स का बड़ा नुकसान हुआ और नासा की इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्थान) तक की उड़ानी में भी बाधा पहुंचाई।

स्पेसएक्स की योजना-

  • पाइवेट (निजी) रॉकेट (अग्नि बाण) फमर् स्पेसएक्स के सीईओ एलोन मस्क ने सरकार से 4425 उपग्रह लॉन्च करने की अनुमति मांगी है। इससे नेटरपीड बढ़ेगी और मंगल पर कॉलोनी (बस्ती) बसाने की उनकी योजना भी सफल होगी।
  • सबसे पहले 800 उपग्रह भेजे जाएंगे, जो केवल अमरीका को सेवा मुहैया कराएंगे। बाद में दुनियाभर के देशों को सेवा दी जाएगी। 385 क्रिगा का एक उपग्रह है। 1 लाख करोड़ का खर्च आएगा।
  • हर उपग्रह 3-5 साल तक फंक्शन (कार्यक्षम) करेंगे, इसके बाद दूसरे सैटेलाइट (उपग्रह) इनकी जगह लेंगे। 2020 तक काम शुरू होगा। 1,419 उपग्रह पहले से सक्रिय है। 1100-1320 किमी की ऊंचाई पर स्थापित होंगे। इसके बाद मंगल पर बस्ती बनाने की नींव रखेंगे। 100 लोग कार्गो के साथ मंगल पर भेजेंगे। मंगल में पहुंचने के लिए 6-8 माह (करीब) लगेंगे। बाद में मंगल का सफर 80 दिन का होगा।
  • फंड (विशेष कार्य के लिए जमा किया गया धन)- मंगल पर बस्ती बसाने के लिए काफी रुपयों की जरूरत है। इसके लिए पर्याप्त फंड जुटाया जा रहा है। मेरी कल्पना हकीकत में बदलेगी मुझे पूरा यकीन है।

                                                                                                                                                                                          एलोन मस्क

  • स्पेस हैबिटेशन(अंतरिक्ष, रहने की प्रक्रिया):- गहरे अंतरिक्ष में अधिक समय तक आराम से रहने के लिए कई यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालयों) के विद्यार्थी ने कई नायाब इनोवेशन (नवीन प्रक्रिया) किए हैं। अमरीकी स्पेस एजेंसी (अंतरिक्ष कार्यस्थान) नासा के एक्सप्लाेेशन (अचनाक तीव्र वृद्धि) सिस्टम (प्रबंध) व हैबिटेशन (रहने की प्रक्रिया) एकेडमिक (शैक्षिक) इनोवेशन (नवीन प्रक्रिया) चैलेंज (चुनौती) सीरीजि (एक्स हैब) का हिस्सा रहे इन विद्यार्थीयों ने स्पेस में पौधे उगाना, एक्ट्रोनॉट, फिटनेश (उपयुक्त/पूरी तरह स्वस्थ) और हवा की शुद्धिकरण जैसे काम शामिल रहे हैं। गौरतलब है कि नासा एक्स हब चैलेंज पिछले सात सालों से चल रहा है। नासा के नेशनल स्पेस ग्रांट (अनुमति देना/अनुदान) फाउंडेशन (राष्ट्रीय अंतरिक्ष नींव) की तरफ से 117000 डॉलर की सहायता राशि दी गई थी।

विश्वविद्यालय निम्न हैं-

  • उताह विश्वविद्यालय -उताह यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों ने एक ऐसा संयत्र विकसित किया है जो बेहद कम गुरुत्वीय बल होने की स्थिति में पौधों की जड़ों तक हवा, आक्सीजन व पोषक तत्वों को पहुंचाएगा। ईडन नाम के इस सिस्टम (व्यवस्था) को विकसित कर तीस दिनों तक पौधे उगाने का परीक्षण हो चुका है। इससे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्थान) को अधिक व्यावहारिक बनाया जा सकेगा।
  • कोलोराडो विश्वविद्यालय - यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के विद्यार्थी ने लैबोसिस संयत्र को अपग्रेड करने का काम किया है। इससे मंगल ग्रह पर भी पौधे उगा पाएंगे। यह किसी ग्रीनहाउस की तरह काम करेगा। इससे मंगल ग्रह में खाद्यान्न उत्पादन किया जा सकता है जिससे अंतरिक्ष यात्रियों को लाभ मिलेगा।
  • आसान पैट- प्रैट इंस्टीट्‌यूट के इंजीनियरिंग (संस्थान के अभियंतों) विद्यार्थियों ने ’मॉथ’ नाम की डिजाइन (रूपरेखा) तैयार की है। यह गहरे अंतरिक्ष में जाने वाले यात्रियों के लिए किचन और स्लीपिंग (नींद) पॉड का काम करेगा। किचन एरिया (क्षेत्र) में एक थ्री (तीन) डी फूड (भोजन) प्रिंटर (मुद्रक यंत्र), पौधे उगाने की जगह, रिहाइड्रेशन, खाद्यान्न भंडार, अपशिष्ट कम्पेक्टर (वस्तु कम जगह लेते हुए) सेनेटाइजर और वायस ऑपरेटेड कंट्रोल सिस्टम (परिचालन नियंत्रण व्यवस्था) होगा।
  • ओहियो विश्वविद्यालय - ओहियो स्टेट विश्वविद्यालय विद्यार्थियों ने एक जल आपूर्ति सिस्टम विकसित किया है। यह पैसिव वाटरिंग सिस्टम आर्बिटल टेक्नोलॉजीज (कला विवरण संबंधी) कार्पोरेशन (महापालिका) के वेजीटेबल प्रोडक्शन सिस्टम (सब्जी उत्पादन करना व्यवस्था) से इंटरफेस करने में सक्षम है। जो कि स्पेस स्टेशन पर पौधे और सब्जियां उगाता है। यह संयत्र कई सामग्रियों से बनाया गया है। यह प्रोजेक्ट (योजना), स्पेस स्टेशन पर उगाई जाने वाले अगली पीढ़ी के बीजों के विकसित करने के लिए अहम होगा।
  • मैरीलैंड विश्वविद्यालय- विद्यार्थियों ने दो एस्ट्रोनॉट की क्षमता वाले इनफ्लाटेबल एयरलॉक विकसित किया है। जिसका उपयोग स्पेस या किसी ग्रह की सतह पर होगा। उन्होंने इसके लिए बढ़ते क्रम में कई मॉडल तैयार किये। इससे एयरलॉक साइज, डिजाइन आदि से जुड़े जरूरी डाटा मिलने की उम्मीद है। जिनका प्रयोग नासा दव्ारा भविष्य में लो अर्थ आर्बिट से बाहर जाने में होगा।

चंद्रमा:-

  • 5वां सबसे बड़ा उपग्रह चंद्रमा है इसका वजन 81 अरब टन है। यह धरती से हर साल 4 सेंटीमीटर दूर खिसक रहा है। 50 अरब साल में यह धरती का एक चक्कर 47 दिन में पूरा करेगा। अगर चांद गायब हो जाये तो धरती पर केवल 6 घंटे का दिन ही होगा। चंद्रमा 27.3 दिन में पूरा करती धरती का एक चक्कर। चंद्रमा का केवल 27 प्रति हिस्सा ही दिखता है। अगर आपका वजन 60 किग्रा है तो चांद पर ग्रेविटी (भार के कारण वस्तु का पृथ्वी के केंद्र की ओर खींचा जाना) के कारण वह 10 किग्रा रह जाएगा।

मंगल:-

  • नासा के क्यूरोसिटी रोवर ने मार्स की सतह पर ऐसे रासायनिक तत्वों के साक्ष्य खोजे हैं, जिसने लंबे समय में उसके वातावरण को बदलने में योगदान दिया है। यह इस बात का संकेत है कि लाल ग्रह की सतह इतिहास में सामान्य होने की उपेक्षा जटिल और दिलचस्प रही होगी। इस रोवर ने मार्स के वातावरण में पाई जाने वाली गैसों जेनॉन और क्रिप्टॉन का विश्लेषण किया।
  • वैज्ञानिकों के अनुसार, इन दोनों का इस्तेमाल, ट्रेसर के रूप में करके मंगल के वातावरण की उत्पत्ति और विकास को समझा जा सकता है। वैज्ञानिकों की खास रुचि जेनॉन और क्रिप्टॉन के खास आइसोटोप्स या केमिकल (रसायन) वैरियंट्‌स का पता लगाने में है। सैम टीम (समान जनसमूह) पहली बार ऐसी सीरीज शुरू कर रही है, जिससे मार्स पर पाई जाने वाली जेनॉन और क्रिप्टॉन के सभी आइसोटोप्स को मापा जाएगा।

स्पेस रॉकेट (अंतरिक्ष अग्नि बाण) :-

  • दुनियाभर के वैज्ञानिक अंतरिक्ष से जुड़ी कई तकनीकों पर काम कर रहे हैं। इसी दिशा में कार्नेल विश्वविद्यालय में एक बेहद अनोखा रिसर्च (खोज) किया जा रहा है। यहां शेधकर्ताओं की एक टीम स्पेस (समूह अंतरिक्ष) में जाने वाले रॉकेटों के लिए एक ऐसा प्रोपल्सन िसस्टम (प्रबंध) तैयार कर रही है, जिसमें जैविक ईंधन की बजाय पानी का इस्तेमाल किया जाएगा। अत: इस सिस्टम में पानी नहीं बल्कि उसके अवयव हाइड्रोजन व ऑक्सीजन का होगा इस्तेमाल।
  • नासा के पूर्व टेक्नोलॉजिस्ट (शिल्प कला विज्ञान में निपूर्ण/तकनीकी विधियाँ) मेसन पेक को उम्मीद है कि उनकी टीम पानी से उड़ने वाला रॉकेट तैयार करने में कामयाब हो जाएगी। वे कार्नेल विश्वविद्यालय टीम के निर्देशक हैं, जो कि प्रोपोलेंट के रूप में रॉकेट में पानी का उपयोग करने वाला सिस्टम (व्यवस्था) तैयार करने के लिए दिन-रात एक कर रही है। इस नये सिस्टम में सीधे पानी का उपयोग न करके, उसके दो प्रमुख अवयवों, ऑक्सीजन व हाइड्रोजन का उपयोग किया जाएगा। रॉकेट पर लगे सोलर पैनल से उत्पन्न बिजली के माध्यम से पानी को तोड़ दिया जाएगा। इस प्रक्रिया के दौरान जो ऊर्जा उत्पन्न होगी उसका उपेयाग रॉकेट को आगे धकेलने में किया जाएगा।
  • रॉकेट पर लगे उच्चतम दक्षता वाले सोलर पैनल अंतरिक्ष के शून्य गुरुत्वाकर्षण और कठिन वातावरण में भी काम करने में सक्षम होंगे। हालांकि बिजली को स्टोर (एकत्र) करने के लिए परंपरागत बैटरियों का ही प्रयोग किया जाएगा। पानी से उसके अणुओं को अलग करने इस विधि को इलेक्ट्रोलिसिस (विद्युतीय) कहते हैं।
  • इस प्रयोग के पहले भी इलेक्ट्रोलिसिस का प्रयोग मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशनों में ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए किया है। जिससे उच्च दाब वाले ऑक्सीजन स्टोरेज टैंक ले जाने से मुक्ति मिली। मेसन पेक को उम्मीद है कि टीम (समूह) जल्द ही कुछ ऐसी तकनीक भी इजाद कर सकेगी, जिससे चंद्रमा या अन्य उपग्रहों पर जीम बर्फ का उपयोग पानी की जगह किया जा सकेगा।

सिस्टम (व्यवस्था) प्रक्रिया-

  • सबसे पहले रॉकेट पर लगे सोलर पैनल से तैयार विद्युत को दो भिन्न-भिन्न इलेक्ट्रोड के दव्ारा पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाता है।
  • दूसरी प्रक्रिया में बुलबुले के रूप में दोनों गैस निकलती हैं, जिन्हें अलग-अलग एकत्रित कर इनका उपयोग आगे ईंधन के रूप में किया जाता है।
  • तीसरी प्रक्रिया में विखंडन प्रक्रिया को तेज करने के लिए कई बार रासायिक उत्प्रेरक के तौर पर कोबाल्ट फास्फेट भी मिलाया जाता है।

नासा:-

  • मानव रहित अंतरिक्षयान ओसीरिस-रेक्स ने फ्लोरिडा स्थित केप केनरवल एयरफोर्स स्टेशन (हवाई सेना स्थान) के एटलस (मानचित्रावली) वी रॉकेट से उड़ान भर कर अंतरिक्ष यात्राओं की नई संभावनाओं को पंख लगा दिया। यान खतरनाक वातावरण वाले और संभावनाओं से भरपूर बेन्नू क्षुद्रग्रह पर दो साल की यात्रा के बाद पहुंचेगा। जिसके बाद उसकी सतह से धूल मिट्‌टी के रूप में नमूने जुटायेगा। 21,100 किलोग्राम वाला यह अंतरिक्षयान अगस्त 2018 में बेन्नू की सतह को स्पर्श (छूकर) करेगा। अंतरिक्षयान 2023 में धूल के रूप में साक्ष्य लेकर धरती पर वापस लौटेगा।
  • 800 मिलियन डॉलर खर्च वाले इस मिशन की कार्यावधि 7 साल की होगी। वैज्ञानिक इसे इंसान की अंतरिक्ष यात्रा के लिए एक अहम पड़ाव मान रहे हैं। मिशन को टाइम कैप्सूल कहे जाने वाले बेन्नू क्षुद्रगह की जांच से धरती पर जीवन उत्पत्ति से संबंधित कई राज खुलने की संभावना है। ओसीरिस रेक्स के डिप्टी (सहायक) प्रोग्राम साइंटिस्ट (कार्यक्रम वैज्ञानिक) क्रिस्टीन रिके कहते हैं, भेजा गये कैप्सूल के लौट कर वापस आने पर साईटिस्टों (वैज्ञानिको) के लिए ज्ञान का बड़ा उपहार साबित होगा।

नीले ग्रह:-

  • धरती पर घटते रिर्सोसेज ने वैज्ञानिकों को नीले ग्रह का विकल्प खोजने को विवश कर दिया है। नासा के अनुसार, जो खनिज संपदा क्षुद्रग्रहों पर पाई जाने की संभावना है, वह धरती पर प्रत्येक व्यक्ति के पास 100 बिलियन डॉलर के बराबर है। लाभ को देखते हुए अमरीका ने ’कॉमर्शियल स्पेस लॉन्च (अंतरिक्ष शुरू) कम्पेटिवनेस एक्ट (संसद दव्ारा पारित कानून/अधिनियम) लॉ’ (विधि व्यवस्था) पर हस्ताक्षर किया है। इससे अमरीकी नागरिकों को भविष्य में क्षुद्रग्रहों की संपदा का उपभोग करने का अधिकार होगा। सरकार ने प्राइवेट कंपनियों (निजी जनसमूहों) को भी स्टेरायड माइनिंग के लिए आमंत्रित किया है।
  • भविष्य में क्षुद्रग्रहों का प्रयोग मार्स और उसके आगे गहरे अंतरिक्ष में जाने के लिए स्पेस स्टेशन के रूप में भी हो सकता है। यह स्पेस (अंतरिक्ष) क्राफ्टों (वायुयान) के लिए यह फ्यूल स्टेशन के रूप में भी काम कर सकता है।

नासा का अगला कदम-

  • नासा ऐस्टेरॉयड (क्षुदग्रह/तारारूप) रिडायरेक्ट मिशन योजना पर काम कर रहा है। इस मिशन का उद्देश्य धरती के नजदीक ऐसे क्षुद्र ग्रह तलाशना है, जिन्हें पकड़कर चंद्रमा की कक्षा में लाया जा सके। इस मिशन के पहले स्टेप (कदम) की डिजाइन (रूपरेखा) पर हाल ही में मुहर लगी है। एआरएम दो भागों वाला मिशन है। इस मिशन के दिसंबर 2021 में शुरू होने की संभावना है।

जापान-

  • जापान ने 9 मई 2013 में मिशन हायाबूसा शुरू किया था। इसके तहत उसने स्पेस इंजीनियरिंग स्पेसक्राफ्ट सी लॉन्च किया था। इसके सितंबर 2005 में धरती के नजदीक परिक्रमा कर रहे क्षुद्रग्रह आईटोकावा पर उतारा गया। हायाबूसा ने क्षुद्रग्रह के आकार, वातावरण, रंग रासायनिक संरचना और इतिहास का अध्ययन किया।
  • टाइम कैप्सूल के नाम से प्रसिद्ध क्षुद्रग्रह ’बेन्नू’ का क्षेत्रफल एफिल टावर के लगभग बराबर है। यह सौरमंडल में धरती का सबसे करीबी और नया खगोलीय पिंड हैं।

आकाशगंगा:-

  • अमरीकी अंतरिक्ष स्पेस एजेंसी के हंबल टेलिस्कोप से हासिल त्रिविमीय चित्रों से पता चला है कि, यूनिवर्स में अनुमान से दस से बीस गुना अधिक आकाशंगगाओ की संख्या है। नए अध्ययन के अनुसार इनकी संख्या 2 खरब से अधिक होने की संभावना है। यूनिवर्स, निर्माण के वक्त जितना था, वह आज की तुलना में बहुत छोटा था। सारी गैलेक्सियां बेहद पास-पास थीं। हबल टेलिस्कोप ने यह खुलासा 90 के दशक में आकाश के एक छोटे हिस्से की तस्वीर कैप्चर (कैद करना/बंदीकरण) करके किया। अभी तक हम जितनी आकाशगंगाएं देखने में सक्षम हैं वे कुल आकाशगंगाओं की मात्र 10 से 20 प्रतिशत हैं।

उपसंहार:- इस तरह हमने देखा कि दुनियाभर के वैज्ञानिक धरती पर ही नहीं वरन अंतरिक्ष में भी नई-नई खोज कर रहे हैं जिससे आम व्यक्ति को अंतरिक्ष के बारे में पूरी एवं सही जानकारी प्राप्त हो सके व अंतरिक्ष रूपी जानकारी भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के लिए भी लाभदायक हाेे।

- Published/Last Modified on: January 10, 2017

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