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शराब बंदी (Stop Alcohol - Essay in Hindi) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: -एक ओर शराब के दुष्परिणामों को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में गाहे-बगाहे आंदोलन जोर पकड़ते दिखते हैं। दूसरी ओर कल्याणकारी राज्य होने का दम भरने वाली सरकारों के लिए शराब राजस्व जुटाने का बड़ा जरिया शराब बन गई है। इस बात की होड़ मची है कि कौन शराब कारोबार से कितना ज्यादा कमाता है। सबसे बड़ी चिंता यह भी है कि राजस्व जुटाने का यह माध्यम जानें लील रहा है। राजस्थान के पूर्व विधायक गुरुशरण डाबड़ा ने पूर्ण शराबंदी की मांग को लेकर अनशन करते हुए प्राण त्याग दिए। ऐसे ही कई आंदोलन पहले भी हुए हैं और शायद आगे भी होंगे। सत्ता में बैठे लोग इस अहम मुद्दे को लेकर कितने संवेदनशील है, क्या संभव है पूर्ण शराबबंदी और यदि नहीं तो कैसे रोकथाम हो सकती इस सामाजिक बुराई की।

संभव: - राजस्थान सरकार की संवेदनहीनता की हद है कि शराबबंदी के लिए शांतिपूर्ण लड़ाई लड़ रहे एक समाजसेवी के साथ सरकार इस तरह पेश आई। सामाजिक सुधार के लिए निस्वार्थ काम करने वाले व्यक्ति का चले जाना समाज के लिए दुखद होता है। गुरशरण छाबड़ा का निधन एक तरह से सरकारी अनदेखी में हत्या कहलाएगी। सरकार ने उनका अनशन तुड़वाने का प्रयास ही नहीं किया। कुछ तो विमर्श किया जाता, कोई रास्ता निकालने की पहल की जा सकती थी। छाबड़ा जी निधन सरकार का एक हिंसावादी कदम है। छाबड़ी जी सरल व्यक्ति थे। उनका विरोध करने करने का मार्ग भी सरल ही था। पर दुर्भाग्य यह है कि आज की सरकारें सरल रास्तों को नजरअंदाज करती हैं। सरकार छाबड़ा जी के साथ संवाद के पक्ष में ही नहीं दिखी। यह बताता है कि सरकार में जनशक्ति के आधार पर कोई बात नहीं मानी जाती। यह सही है कि शराब एकदम से राज्यभर में बंद नहीं की जा सकती पर सरकार एक स्तर पर शुरुआत तो कर सकती है।

तर्क: - सरकार का यह तर्क दिया जाना कि राजस्व के कारण शराबबंदी नहीं की जा सकती है। यह सरासर गलत है। क्या कमाई के लिए समाज में लोगों का जीवन बर्बाद करने की छूट होनी चाहिए? सरकारें ऐसे तर्क देकर गलत उदाहरण पेश करती हैं। दरअसल, शराब तो राजनेताओं की जरूरत में शामिल है। चुनाव से लेकर सरकार चलाने तक शराब ही नेताओं का मजबूत आधार होती है।

सरकार: - शराब के राजस्व के कई विकल्प होते हैं। अब तो सरकारें ज्यादा से ज्यादा निजीकरण कर रही हैं। उनके आय के साधन बढ़े हैं। शराब ही कमाई का जरिया नहीं रह गया है। सरकार कॉरपोरेट्‌स को लाखों करोड़ों की छूट दे रही हैं। उद्योगपतियों की तिजोरिया भरी जा रही हैं। वे शराबबंदी के लिए संसाधन खर्च क्यों नहीं कर सकतीं? पर सरकार के इरादे नेक नहीं हैं। संविधान के अनुच्छेद-47 में उल्लिखित है कि नागरिकों को अच्छा भोजन-आहार मिले, उनका स्वास्थ्य अच्छा रहे, यह सरकार की जिम्मेदारी है। इसमें शराब कहीं शामिल नहीं है। देश में पूर्णत शराबबंदी होनी चाहिए। शराब जीवन के लिए जरूरी नहीं है। किसी भी धर्म में इसका समर्थन नहीं किया गया है। छाबड़ा जी की ही तर्ज पर तमिलनाडु में शशि पेरूमल भी शराबबंदी के लिए संघर्षरत थे। उन्हें भी सरकार के अहंकार में जान गंवानी पड़ी। उनके परिवार के साथ जनसमर्थन उभरा। पहले उनका शव नहीं लिया गया। उन्होंने सरकार से तमिलनाडु में शराबबंदी लागू करने का वादा मांगा। तमिलनाडु में सत्ताधारी पार्टी को छोड़कर सभी पार्टियां शराबबंदी के पक्ष में आ गई हैं। तमिलनाडु में हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार ने शराब की दुकानें बंद नहीं कराई तो पेरूमल विरोध में उतरे थे। जितना राजस्व शराब से मिलता है, उसका एक हिस्सा इसकी रोकथाम और जागरूकता में प्रभावी ढंग से खर्च किया जाना चाहिए था।

कमाई: - शराब की कमाई का आबादी से खास वास्ता नहीं है। इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि 20 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश की शराब से होने वाली सालाना आय महज 12, 000 करोड़ रुपये की है, जबकि 7.5 करोड़ की जनसंख्या वाला तमिलनाडु शराब-ब्रिकी के जरिये 26, 000 करोड़ रुपये कमाता है। यह तो हुई कमाई की बात। दूसरा पहलू देखें तो एक रोचक आंकड़ा यह भी है कि तमिलनाडु में शराब की दुकानों की संख्या 6, 823 है, जबकि पुस्तकालयों की संख्या महज 4, 028 ही है।

उपभोग: - भारत में बनने वाली विदेशी शराब (आईएमएफएल) की देशभर में सबसे अधिक ब्रिकी आंध्रप्रदेश (तेलांगना भी शामिल) और तमिलनाडु में है। यह 21 - 21 फीसदी है। इसके बाद कर्नाटक का नंबर आता है, जहां इसकी ब्रिकी 18 फीसदी है। देश भर में आईएमएफएल की 60 प्रतिशत बिक्री इन्हीं प्रदेशों में होती है। देश में सबसे अधिक शराब केरल में पी जाती है। यहां इसकी प्रति व्यक्ति खपत सालाना 8.3 लीटर है जबकि राष्ट्रीय औसत 5.7 लीटर है। केरल में आगामी 10 साल में चरणबद्ध तरीके से पूर्ण शराबबंदी लागू की जानी है। अब केवल पांच सितारा होटलों में ही शराब परोसी जा सकेगी। केरल में शराब की खुदरा बिक्री सरकारी दुकानों के जरिए होती है। हर साल 10 फीसदी दुकानों को बंद करते हुए आगामी 10 साल में सभी को बंद कर दिया जाएगा। शराब की सबसे अधिक बिक्री के मामले में तमिलनाडु शीर्ष पर है, जबकि कर्नाटक ऐसा राज्य है, जहां बच्चों तक में एल्कोहल की लत भी चिंता का विषय बनी हुई है।

मांग: - राजस्थान में 1965 में सर्वोदयी नेता गोकुल भाई भटट ने शराबबंदी की मांग उठाई थी। तब 1969 में चार आदिवासी जिलों व इसके चार साल बाद छह और जिलों में शराबबंदी लागू की गई। भटट ने सम्पूर्ण शराबबंदी को लागू किया। भटट ने सम्पूर्ण शराबबंदी को लेकर 1 अप्रेल 1979 से फिर अनशन की चेतावनी दी। तब मुख्यमंत्री भैंरोसिंह शेखावत ने चरणबद्ध रूप से 1 अप्रेल 1980 से सम्पूर्ण शराबबंदी लागू करने का भरोसा दिया। ऐसा किया भी। विधायक बालकृष्ण आडवाणी ने 1 अप्रेल 1979 से लागू करने की मांग करते हुए 12 दिन अनशन किया और प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के दखल पर भी नहीं माने। पूर्ण शराबबंदी का शेखावत के शासन में किया गया फैसला राष्ट्रपति शासन के दौरान 1 अप्रेल 1980 से ही लागू हुआ। बाद में कांग्रेस ने इसे वापस ले लिया।

रोक-विकास: - गुजरात में वर्षों से शराबबंदी लागू है लेकिन इसके पड़ोसी राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में शराबबंदी लागू न होने के कारण बड़े पैमाने पर शराब बिक्री से आबकारी शुल्क से मोटी आय हो रही है। गुजरात में शराबबंदी के बावजूद पड़ोसी राज्यों से गुजरात में चोरी छिपे बड़ी मात्रा में अवैध रूप से शराब पहुंच रही है, इसकी बिक्री हो रही है लेकिन सरकार को राजस्व की प्राप्ति नहीं हो रही, इसके बावजूद राज्य की विकास दर डेढ़ दशक से लगातार दो अंको में चल रही है।

मॉडल: -शराबबंदी को लेकर देश में पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए जाते रहे है। शराबबंदी की घोषणा करना एक बात है और उसे लागू करना अलग बात है अर्थात कथनी व करनी में बहुत फर्क होता है। देश के राज्यों में गुजरात का नाम शराबबंदी के मामले में सबसे पहले लिया जाता है लेकिन व्यवहार रूप से गुजरात में शराब आसानी से उपलब्ध हो जाती है। हालात यह है कि गुजरात में यदि किसी को शराब पीनी है तो उसके घर तक यह आसानी से उपलब्ध हो जाती है। आपकों केवल एक फोन कॉल करना होता है। गुजरात में परमिट सिस्टम भी है। यदि कोई फाइव स्टार होटल में ठहरता है तो उसे केवल एक फॉर्म भर कर देना होता है और उसे शराब आसानी से मिल जाती है। इस स्थिति से निपटने के लिए ’सेल्फ रेग्यूलेशन’ की जरूरत है। समाज में जागरूकता लानी चाहिए। जो शराबी घरेलू हिंसा करते है उन पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। गुजरात से सटे राजस्थान दमन और दीव में शराब की अर्थव्यवस्था पनप चुकी है। इसे शराबबंदी का ’बाय प्रॉडक्ट कहा जा सकता है। देश के अन्य राज्यों में भी शराबबंदी का कमोबेश यही हाल है।

जुमलेबाजी: - शराबबंदी को लेकर कोरी राजनीतिक जुमलेबाजी होती रही है। हालिया उदाहरण नीतिश कुमार का है। उन्होंने सत्ता में आने पर रोक लगाने का वादा किया है। पर यही नीतिश हैं, जिन्होंने पहले कहा था कि जिन्हें पीना है, वे टैक्स देकर पीएं।

मुनाफा: -शराबबंदी से कुछ हासिल नहीं होता है। इसका परिणाम समाज में और विकृति लाता है। देखने में आया है कि शराबबंदी से एक समानांतर आपराधिक व्यवस्था पनपती है। अवैध शराब का धंधा पनपने लगता है। इन जरायम पेशा लोगों के लिए प्रतिबंध अथवा बैन किसी वरदान के समान हो जाता है शराबबंदी की स्थिति में इनका मुनाफा चौगुना हो जाता है। शराब तस्कर व अन्य अवैध कार्यो में लगे लोग शराबबंदी से कहीं अधिक मुनाफा कमाने लगते हें। शराब तस्करी स सरकारी अफसर, पुलिस और राजनेता का गठजोड़ काम करता है इस गठजोड़ को भेद पाना किसी भी व्यवस्था के बस की बात नहीं है। सभी मोटा मुनाफा कमाते है। यह गठजोड़ हर व्यवस्था में अपनी जड़े जमा ही लेता है। उदाहरण के लिए गुड़गांव में शराब पर प्रतिबंध है तो लोग शराब खरीदने के लिए सीमावर्ती राजस्थान अथवा दिल्ली जाते हैं।

समाज: -शराबबंदी में राज्यों की आबकारी शुल्क से बड़ा राजस्व प्राप्त होता है। साथ ही शराब ठेकों की नीलामी से राज्य सरकारों को काफी धन मिलता है। इस धनराशि से सरकार समाज कल्याण का काम कर सकती है। समाज के दुष्परिणामों के प्रति चेतना विकसित करने की काम राजस्व से हो सकता है स्कूलों व कॉलेजो में जागरूकता फेलाई जा सकती है प्रतिबंध के विपरीत प्रभाव भी होता है। लोग प्रतिबंध वस्तुओं की तरफ अधिक जाते है। एक और तथ्य यह है कि शराबबंदी के बारें में कि इसे या तो पूर्ण रूप से किया जाए अथवा नहीं।उपसंहार: - अभी देश में सिर्फ पांच राज्यों गुजरात, नागालैंड, मिजोरम, केरल और मणिपुर में ही कानूनन शराबबंदी लागू है। इनमें पूर्ण शराबंबदी वाला राज्य गुजरात ही है। शराब से उत्पन्न होने वाली बुराइयों से निपटने के लिए जागरूकता का प्रसार-प्रचार करना चाहिए। शराबबंदी की घोषणा को अमल में लाना काफी कठिन है भारत ही क्यों दुनिया के अन्य देश जैसे अमरीका में भी शराबबंदी की कोशिशे हो चुकी हैं लेकिन शराबबंदी के कारण उपजी अन्य बड़ी समस्याओं के कारण आखिरकार वहां की सरकारों को इसे वापस लेना पड़ा है। अपने देश में भी शराबबंदी को वापस लेने के उदाहरण है। प्रतिबंध की जगह शराब बिक्री का नियमन शराब के खिलाफ जागरूकता का विकास संभव हैं। आज देश में शराबबंदी के लिए जनता जागरूक हुई हैं। ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश के कई जिलों में शराबबंदी के खिलाफ अभियान रफ्तार पकड़ रहे हैं। छाबड़ा, पेरूमल जैसे व्यक्तियों की वजह से ही शराब जैसी सामाजिक बुराई को खत्म किया जा सकता है।

- Published on: January 22, 2016