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मक्का हादसा (The recent Mecca Tragedy 2015 - Essay in Hindi) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: - मक्का में हुआ हादसा कोई पहली घटना नहीं है जिसमें भीड़ अनियंत्रित हुई हो और भगदड़ के कारण सैकड़ों की जानें गई हों। अन्य देशों और भारत में भी ऐसी दुर्घटनाएं होती रहती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि घटनाओं से सबक लेकर भविष्य में ऐसी घटनाएं न हो इसके लिए पुख्ता इंतजाम किए जाते है लेकिन लगता है कि सउदी अरब की पूर्व की घटनाओं से सीख नहीं सका। कहां यह भूल हो जाती है? भीड़ नियंत्रण के किस तरह की व्यवस्था कि जाए जिससे ये हादसे न हो।

सऊदी अरब: - में पवित्र मक्का के निकट मीना में हज के दौरान मची भगदड़ में हुई मौंते बहुत ही दुखद हैं। मौतों का आंकड़ा भले ही बड़ा हो लेकिन बड़ी बात यह है कि वहां ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पहले भी वहां ऐसे हादसे होते रहे हैं। 1990 के दौरान पैदल चलन के लिए बनी टनल में वहां भगदड़ मची और 1426 लोगों की मौत हो गई। इसके बाद वहां तीन से चार साल के अंतर में इसी तरह के सात हादसे हुए लेकिन, समझ में नहीं आ रहा है कि पिछले हादसों से सऊदी अरब कुछ सीखता क्यों नहीं? पैसे की तो वहां कोई कमी नहीं है। सुरक्षा की व्यवस्था के साथ हादसे के बाद होने वाली परेशानियों से निपटने के इंतजाम तो पक्के होने चाहिए। दुर्भाग्य से वहां भीड़ को नियंत्रित करने के प्रबंधन की कमी साफ दिखाई दी।

हज के दौरान हादसे: - निम्न है -

  • 2 जुलाई 1990: टनल में भगदड़ 1426 लोगों की मौत हुई।
  • 23 मई 1994: 270 मरे।
  • 9 अप्रेल 1998: अनियिंत्रित भीड़ में भगदड़ मचने से 118 की मौत हुई।
  • 5 मार्च 2001: 35 मरे।
  • 11 फरवरी 2003: भीड़ फिर अनियिंत्रित भीड़ में भगदड़ मचने से 14 की मौत हुई।
  • 1 फरवरी 2004: भगदड़ हुई और 251 की मौत और 244 घायल हुए।
  • 12 जनवरी 2006: अनियंत्रित भीड़ में भगदड़ से 340 की मौत हुई।
  • 13 सितंबर 2015: हज तैयारी के दौरान क्रेन गिरने से 107 की मौते हुई।

सुरक्षाकर्मी: - हज के लिए मक्का में लगभग 20 लाख श्रद्धालु पहुंचे हुए थे और इतने श्रद्धालओं की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए एक लाख सुरक्षाकर्मी भी थे। संख्या के लिहाज से कहे तो उनकी सुख्या पर्याप्त ही नहीं बल्कि उससे भी बेहतर अच्छी थी। इसके बाद भी ऐसी दुर्घटना का होना इस बात की ओर संकेत करता है कि भीड़ नियंत्रण को लेकर कोई ठोस योजना नहीं बनाई थी। यदि होती भी तो उसमें किसी ने अमल नहीं किया है। कहा जाता है कि जिस तरफ से आने की मनाही थी उस ओर से अलजीरिया के लोग आ गए। इसलिए भीड़ अनियंत्रित हो गई हो गई। पर कोई यह क्यों नहीं सोचता की जिस तरफ से आने की मनाही थी उन्हें वहां से आने के लिए रोका क्यों नहीं गया? आखिर इतनी बड़ी संख्या सुरक्षाकर्मीयों ने क्या किया? इसलिए कि सुरक्षकर्मी को इस बारे में सही प्रशिक्षण न मिला हो।

सऊदी अरब में जहां बड़ी-बड़ी इमारतें विदेशी तकनीकी की सहायता से बनकर तैयार हो जाती हैं तो इस मामले में भी विदेश से प्रशिक्षण लिया जा सकता है।

व्यवस्था: - ऐसा नहीं कि भारत में भीड़ की भगदड़ या घटनाएं नहीं होती है होती है लेकिन यहां एक ही स्थान पर नियमित रूप से अंतराल में ऐसे हादसे नहीं होते। हम लोग हर बार हादसों से सीखते भी नहीं हैं। जरा विचार कीजिए हमारे यहां तो कुंभ जैसे मैलों पर नियंत्रण होता है। फिर भी कुछ हादसे वहां पर भी होते है लेकिन छोटे से ही हादसे होते ज्यादा बड़े नहीं होते है। वो भी भीड़ में नियंत्रण के कारण। सऊदी अरब में तो 20 लाख ही थे। हमारे यहां तो 60 से 70 लाख की भीड़ को कुंभ मेले में नियंत्रण किया गया है। यहां पर पर्याप्त इंतजाम होते है। इनके लिए ठोस तैयारियां होती हैं, योजनाएं बनती है। भीड़ कहां से आएगी व कहां पर जाएगी। यह सब पहले से पता होता है महिलाएं व पुरुष किस तरह से कतार में चलेंगे? साधु किस ओर चलेगे? इनकी पूरी व्यवस्था की जाती है। साथ में परंपराओं का भी ध्यान रखना पड़ता है। क्योंकि मक्का में शैतान को कंकड़ मारने की परंपरा है तो कुंभ के दौरान विशेष दिनों में हिंदुओं में स्नान करने की परंपरा है। मौनी अमावस को लाखों लोग नदी में स्नान करते हैं। सिपाही उन्हें नियंत्रित करने के लिए आध शरीर पानी में डूबे रहते हैं। एक से अधिक डूबकी किसी को लगाने नहीं देते। लोग विशेष परंपरा को पूरा करके, प्रसन्न होकर वापस जाते है। लेकिन व्यवस्था को बनाए रखने के लिए योजना और मेहनत लगती है। सऊदी अरब के सुरक्षाकर्मी को भारत से इस मामले में प्रशिक्षण लेना चाहिए।

सहयोंग : -यह हादसा अनियंत्रित भीड़ के कारण हुआ है। पहले भी हादसों का प्रमुख कारण यही रहा है। ऐसे में हमें भी वहां जाने वाली भीड़ को नियंत्रत करना ही चाहिए। खासतौर पर जब सऊदी अरब हज के दौरान भीड़ को नियंत्रण करने के लिए हर देश के कोटे में कटौती कर सकता है तो हमें भी इसके लिए प्रयास करने चाहिए। हमें वहां जाने वाले भीड़ को नियंत्रित करने में सहयोग करना चाहिए। जिसे हज पर जाना है वह अपनी इच्छा से अपने खर्च पर जाए। विशेष विमानों के संचालन की कोई भी आवश्यकता नहीं है। ऐसा करके हम वहां होने वाली भीड़ को नियंत्रित करने में सहयोग ही करेंगे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए एक तरीका वैष्णों देवी स्थल के प्रबंधन से भी सीखा जा सकता है। वहां भी निश्चित संख्या के बाद ऊपर मंदिर की ओर जाने की अनुमति नहीं दी जाती। यात्रियों की निर्धारित संख्या के आधार पर ही निर्धारित समय पर मंदिर की ओर जाने की अनुमति दी जाती है। इस तरह के प्रबंधन से हादसों को टालने में सहायता मिलती है।

प्रशासन: - उदाहरण के तौर पर मेहरानगढ़ किले में स्थित चामुण्डा देवी मंदिर में हुए हादसे का बड़ा कारण रास्ते का बहुत ही संकरा होना और दोनों तरफ ऊंची दीवारें होना रहा। सुबह-सुबह श्रद्धालुओं की तादाद बढ़ती गई और मंदिर के भीतर आने वाले लोग बाहर से बढ़ते दबाव के कारण दबते चले गए। उन्हें निकलने का रास्ता नहीं मिल पाया। मंदिर में नीचे और ऊपर भीड़ को नियंत्रित करने में लगे प्रशासन के लोगों में संवादहीनता थी। वे आपस में वायरलैस पर भी बात नहीं कर रहे थे कि भीतर लोग ज्यादा एकत्र हो रहे हैं। मंदिर में दोनों तरफ से भीड़ की तादाद बढ़ने के कारण अंदर के बेरिकेड में दबाव बढ़ने के कारण टूट गया, फिर ऐसी घटना हो गई। इसके कारण लोगों की तादाद अंदर बढ़ती चली गई और फिर मची भगदड़, जिसमें 216 लोगों को जान गंवानी पड़ी। इससे पहले हिमाचल में नैना देवी मंदिर में हुए हादसे में भी श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। अभी मक्का-मदीना में भगदड़ से 700 से ज्यादा को ंजंदगी गवानी पड़ी।

मुख्य दिशानिर्देश: - हर जगह जहां भीड़ का माहौल होता है जैसे मैले में, हज मे, तीर्थ यात्रा करने में (जगन्नाथ यात्रा, कैलाशपूरी यात्रा, वैष्णवों देवी यात्रा) आदि में कुछ जरूरी दिशानिर्देश होते है जिसको मानना हर प्रशासन को पड़ता हैं। ये निम्न है-

  • सर्पीले आकार में पंक्तियां बने।
  • अनावश्यक लोगों के प्रवेश को रोके।
  • अधिक भीड़ के लिए वैकल्पिक रास्ते भी बनाएं।
  • अति विशिष्ट लोगों के लिए अलग योजना हो।
  • सुरक्षा की गंभीर होती स्थिति में वीआईपी प्रवेश रोकें।
  • आपात निकासी द्वार निर्बाध हों लेकिन आपात स्थिति में काम में आए।
  • बिजली की सुचारु व्यवस्था हो, इनका नियंत्रण एकांत सुरक्षित क्षेत्र में हो।
  • पर्याप्त अग्निशामक की व्यवस्था हो।
  • सुरक्षा एजेंसी आयोजकों के साथ तैयारी से पहले ही संपर्क में रहे और बाद में भी संपर्क की पुख्ता व्यवस्था रखे। योजनाओं, भीड़ प्रबंधन, लोगों की पहचान के बारे में जानकारी हासिल करती रहे।
  • वाहानों, अकेले पैदल चलने वालों और समूह में चलने वालों के लिए अलग से व्यवस्था की जाए।
  • आपात परिस्थिति के लिए चिकित्सा सुविधाओं के पर्याप्त इंतजाम हों।

अन्य उपाय: - हर जगह हादसों के अलग-अलग कारण होते हैं। इनके पीछे कोई एक कारण नहीं होता है पर कुछ ऐसे उपाय होते है जो हर जगह अपनाएं जाते है इनमें सबसे पहला तो यही है कि श्रद्धालुओं एकत्रित होनें वाली जो भी जगह हो, वहां आयोजकों और प्रशासन के बीच पूरा तालमेल होना चाहिए। किसी भी बड़े आयोजन की पहले पुलिस और स्थानीय प्रशासन से इजाजत होनी चाहिए। आयोजन के समय प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी सुनिश्चित हो। इसके लिए पुलिस और प्रशासन को मिलकर एक मॉक ड्रिल भी कर लेनी चाहिए। जहां संकरा रास्ता हों या भीड़ जमा होने का संदेह हों, वहां खास ध्यान रखा जाए।

दूसरा उपाय है भीड़ को नियंत्रण करने के लिए पूरे इंतजाम होने चाहिए। जहां भी ऐसी भीड़ जमा हो वहां एक रेगुलेशन होना चाहिए। भीड़ का नियत प्रवाह बना रहना चाहिए। उसकी निगरानी जरूरी होती है। किसी भी सूरत में रास्ता जाम नहीं होना चाहिए।

भीड़ नियंत्रण का तीसरा तरीका यह है कि जितना बाहर निकलने का रास्ता हो उतने ही श्रद्धालु अंदर भेजने चाहिए।

उपंहार: - ऐसी भीड़ भाड़ इलाकों में विफलता प्रशासन की होती हैं। श्रद्धालु तो दर्शन करने के लिए श्रद्धा से ही आते है न की भगदड़ के इरादे से। प्रवेश का जितना चौड़ा रास्ता हो और बाहर निकलने का रास्ते के आकार के हिसाब से ही व्यवस्था करनी होती है। कुल मिलाकर सही तरीके से नियंत्रण हो और प्रवाह सही बना रहे तो भगदड़ नहीं मच सकती। प्रशासन के साथ-साथ जो लोग भीड़ में शामिल है उनको भी ऐसी घटनाओं से बचने के लिए अपना पूरा संहयोग देना चाहिए। इसमें चाहे भीड़ किसी मंदिर में दर्शन के हिसाब से हो या फिर किसी मेले के हिसाब से घटना कहीं पर भी हो सकती है। इसलिए जनता का संहयोग हर स्थिति में होना चाहिए। तभी ऐसी तीर्थ यात्राएं व मेलों का आयोजन सफल हो पाएगा।

- Published on: October 7, 2015