तीन तलाक पर सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला (Three Talaq Supreme Court Judgments on Divorce in Hindi) (Download PDF)

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प्रस्तावना: - सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ताजा फैसले में मुस्लिम समाज में प्रचलित तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया है। मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा का कारण रहे तीन तलाक की इस सामाजिक कुरीति को लेकर तर्क-वितर्कों का दौर चल रहा था। अब उम्मीद बंधी है कि मुस्लिम महिलाओं को उनका जायज हक मिल सकेगा।

सर्वोच्च न्यायालय: -विवाहित मुस्लिम महिलाओं के लिए लंबे समय से परेशानी का सबब रहे तीन तलाक पर हाल ही सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला आया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निणर्य में तीन तलाक को संवैधानिक दृष्टि से अवैध घोषित करार दिया है। पांच अलग-अलग धर्मो से संबंध रखने वाले जजों ने, जिसमें कोई भी महिला जज नहीं थी, मुस्लिम महिलाओं से जुड़े इस महत्वपूर्ण मसले पर अपना फैसला सुनाया। भारतीय मुस्लिम समाज में तीन तलाक का दंश भोगने वाली महिलाओं की दुर्दशा और उनके दर्द का अनुमान लगा पाना आसान नहीं। विश्व के अनेक इस्लामिक देशों सउदी अरब, मलेशिया आदि में तीन तलाक की पद्धति को बहुत पहले ही अवैध करार दिया जा चुका है। इसमें हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश भी शामिल हैं। आश्चर्य की बात है कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक देश में हमारी मुस्लिम बहनों को इतने लंबे समय तक इस लाचारी और प्रताड़ना से जूझना पड़ा। देश में सत्ता के कर्णधारों को मुस्लिम महिलाओं के दुख को समझने और उससे निजात दिलाने में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही, उनका उद्देश्य तो बस मुस्लिम समाज के वोट (मत) बैंक (अधिकोष) तक सीमित रहा। अन्तत: अपनी बेटियां बचाने के लिए खुद महिलाओ को आगे आना पड़ा और जब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा तो न्यायालय ने उनके दर्द को समझा और अमानवीय रीति को बंद करने की बात कही। अन्य धर्मों की महिलाओं की तरह एक मुस्लिम महिला को भी अपने परिवार में सुख और बराबरी से रहने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 प्रदान करता है, लेकिन धर्म के ठेकेदार अपने अंह की संतुष्टी और पुरुषवादी सोच के चलते उससे यह अधिकार छीन लेते हैं। कोई व्यक्ति अपने साधारण विवेक का प्रयोग भी करे तो पाएगा कि हिन्दू और अन्य धर्म की महिलाओं को तलाक के विषय में एक वृहद न्यायिक प्रक्रिया को अपनाने का अधिकार है तो इसी देश में रहने वाली एक मुस्लिम महिला को इस अधिकार से कैसे वंचित किया जा सकता है।

संविधान के निर्देशित तत्वों में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि देश में यूनिफार्म सिविल कोड यानि दीवानी मामलों में एक ही तरह का कानून सभी नागरिकों के लिए होगा। हमारी सरकारें पिछले 70 सालों से इस विसंगति पर अपनी राजनीतिक चल रही है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले ने इस दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति को दुरुस्त करने का काम किया है। वर्ष 1985 के शाहबानों प्रकरण के बाद से आज तक मुस्लिम महिलाओं को उनके जीवन के अधिकार के संदर्भ में सुना नहीं गया। मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की बहस पर पित्तृ सत्तात्मक विचारधारा के पुरुषों ने कब्जा जमा रखा था। और उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ (स्वीय विधि) में किसी भी सुधार के हर प्रयास को रोकने की कोशिशें की। मुस्लिम महिलाओं को हमेशा ही कुरान और संविधान से मिले अधिकारों से महरूम रखने की साजिशे होती रहीं। तीन तलाक की व्यवस्था कुरान की हिदायतों के विपरीत और गैर इस्लामिक थी। कुरान में तलाक को न करने लायक कृत्य बताते हुए इसकी प्रक्रिया को काफी कठिन बनाया गया है, जिसमें रिश्ते को बचाने के लिए आखिरी दम तक कोशिश, पति-पत्नी के बीच संवाद, दोनों के परिवारजनों के बीच बातचीत और रिश्ते को बचाने की कोशिशें और इस प्रक्रिया को तीन महीने के लंबे समय में बांधना शामिल है। लेकिन आज के दौर में इन तमाम बातों को दरकिनार करते हुए पुरुषों ने सीधा तरीका अपना लिया था और एक ही बार में तीन बार तलाक शब्द का उच्चारण करके वे इस रिश्ते को खत्म करने में लगे थे। दुर्भाग्यपूर्ण है कि मुस्लिम समाज के रहनुमा, मौलवियों आदि ने भी कभी इस पर आपत्ति दर्ज नहीं की और न इसे गलत बताया। मुस्लिम समाज में तीन तलाक और बहुविवाह की कुप्रथाएं मुस्लिम बहनों के लिए एक त्रासदी बन चुकी थी। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से कम से कम तीन तलाक समाप्त हो गया है लेकिन हलाला और बहुविवाह पर भी लगाम लगायी जानी अभी बाकी है। यह अगला विषय है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय को तथ्यों के आधार पर और कानून के आधार पर एक बार फिर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाना होगा। पुरुषों द्वारा केवल तलाक शब्द का जिक्र कर देने से तलाक को होना मान लिया जाना, सोशल (सामाजिक) मीडिया (संचार माध्यम) जैसे स्काइप, वॉट्‌सएप या एसएमएस (सरल गतिशील संदेश) द्वारा तलाक दे दिया जाना हाल के दिनों में बढ़ता ही जा रहा था। उनका वैवाहिक जीवन डर के साये में गुजर रहा था कि कब उनके शौहर का मन बदल जाए और वो तीन शब्द बोलकर उन्हें व उनके बच्चों को घर से निर्वासित कर दे। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से मुस्लिम महिलाएं अब राहत की सांस लेंगी। बराबरी का हक मिलने से वे भयमुक्त जीवन जी सकेगी। साथ ही इनमें यह भी विश्वास जागेगा कि भारत का संविधान उनका रक्षक है और कोई भी केवल तीन शब्द बोलकर उनकी पारिवारिक जिंदगी से खिलवाड़ नहीं कर सकेगा।

आभा सिंह, विधि विशेषज्ञ, सर्वोच्च न्यायालय में अधिक्ता, मानवाधिकार व महिला सशक्तिकरण के लिए कार्यरत

संविधान: -तीन तलाक पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला न सिर्फ ऐतिहासिक है बल्कि यह मुस्लिम महिलाओं के लिए स्वाभिमान पूर्वक जिंदगी जीने की एक शुरुआत भी है। शीर्ष अदालत की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने तीन-दो के बहुमत से तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर समाज में एक नई बहस का अवसर दिया है। इस फैसले को किसी एक की जीत अथवा हार के रूप में देखने की बजाए समाज में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन के रूप में देखने की जरूरत है। यह धर्म से जुड़ा मुद्दा नहीं है। देश ने सदियों तक बाल विवाह और सती प्रथा को देखा भी है और भुगता भी। आवाज उठी तो इन कुरीतियों के उन्मूलन की दिशा में प्रयास किए। देश आज सती प्रथा से मुक्त हो चुका है। चोरी छिपे बाल विवाह की घटनाएं आज भी होती हैं लेकिन इसमें सजा का प्रावधान भी है। लंबे समय से विवादित तीन तलाक के खिलाफ मुस्लिम महिलाएं न सिर्फ लामबंद हुईं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुंची। लंबी बहस और तर्क-वितर्क के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया। बहुत से इस्लामिक देश तीन तलाक प्रथा पर पहले ही रोक लगा चुके हैं। यही कारण है कि सरकार से लेकर प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस ने फैसले का स्वागत किया है। सरकार की तरफ से अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने सभी राजनीतिक दलों के साथ विचार-विमर्श कर कानून बनाने की बात कही है। सामाजिक बुराई के खात्मे के लिए सभी राजनीतिक दल और धार्मिक संगठन मिलकर कोई रास्ता निकाले तो समस्याओं के समाधान के लिए अदालतों को दरवाजा खटखटाने की कोई जरूरत ही नहीं। तीन तलाक का मामला अदालती आदेश के बाद समाप्त मान लेना चाहिए। साथ ही महिला उत्थान के रास्ते में आने वाली अन्य बाधाओं को दूर करने की दिशा में नए सिरे से पहल करनी चाहिए। कोशिश रहे कि समाधान बिना गतिरोध के निकले। लैंगिक समानता के मुद्दे पर हर दल आवाज तो उठाता है इसके बावजूद महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए अब भी संघर्ष करना पड़ता है। आल इंडिया (पूरे भारत) मुस्लिम लॉ (विधि) बोर्ड (परिषद) इस मामले पर 10 सितंबर को भोपाल में आगामी रणनीति पर विचार करेगा। उम्मीद की जाती है कि बोर्ड (परिषद) तमाम पहलुओं पर विचार के बाद दूसरे पक्षों की तरफ फैसले का सम्मान करेगा।

कर्पूर चन्द्र कुलिश, संस्थापक राजस्थान पत्रिका

आंदोलन: -निजी तौर पर 2002 में इस मुहिम को शुरू किया था। 2007 में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन इसमें जुड़ गया, फिर व्यक्तिगत तौर पर पीड़िताएं न्यायालय में आगे आईं और आज यह पहला मोर्चा न्याय ने जीता है। सियासत में अपनी सौदेबाजी के जरिये आश्वस्त हो चुके मौलाना इस बार चुक गए। सलमान खुर्शीद जैसे नामी-गिरामी मुसलमान वकील देखते रहे गए और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ज़फरयाब जीलानी तो अब भी मुस्लिम महिलाओं में गुनाह का बोध भरकर इस फैसले को निष्प्रभावी बना देना चाहते है। जीलानी वर्मा कह रहे हैं कि ’इस्लाम का पालन करने वाली महिलाएं अभी भी एक बैठक के तीन तलाक को मान्यता देंगी और अदालत के इस फैसले को नकार देंगी। वर्षों की गुलामी के चलते महिलाओं में पैठ चुके स्टॉकहोम (प्रतिष्ठा) सिंड्रोम (संलक्षण) पर बड़ा भरोसा है जीलानी जैसे पुरुषवादियों को, लेकिन अब इस्लामी नारीवाद जैसे डिस्कोर्स (प्रवचन) मुस्लिम महिलाओं को बराबरी का हक हासिल करने को, धर्म के अंदर से प्रेरित कर रहे हैं।

बोर्ड (परिषद) और दीगर मौलानाओं का ये आग्रह रहा है कि एक बैठक वाली तीन तलाक बहुत कम होता है लिहाजा इस पर कुछ करने की जरूरत नहीं, लेकिन हकीकत यह है की तीन तलाक खूब होता है, ज्यादा भयानक बात यह है कि तीन तलाक का डर मुसलमान महिलाओं के वैवाहिक जीवन में आतंक का हथियार बनकर सिर पर लटकता रहता है। गेट आउट (बाहर जाओ) का ये भय एक पत्नी को अपने अधिकारों के प्रति उदासीन करता है, वह अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं कर सकती, सही और गलत पर नैतिक रवैया नहीं अपना सकती, ऐसे में भले ही उसका तलाक न हो, लेकिन ऐसी डरी जिंदगी भी कोई जिदंगी हैं लंबे समय से चली आ रही तीन तलाक की प्रथा की शिकार महिलाओं की भी अच्छी-खासी तादाद है, उनके कल्याण के कदम का मसला भी सामने है। फैसले को सरकार कानून का रूप कैसे देती है और इसे लागू करने का तरीका क्या होगा, ये आगे के मसले हैं, लेकिन फैसले ने तारीख का पन्ना पलट दिया है। यहां से मुस्लिम महिला अब आगे की ओर ही देखेगी।

आज भारतीय मुसलमान महिलाओं ने देश के सामने ये नज़ीर पेश की है कि कैसे वे खुद अपनी लड़ाई लड़ भी सकती है और जीत भी सकती है। न्यायिक सुधार के जरिए समाज सुधार का रास्ता इस देश में पहले भी अपनाया गया है, लेकिन सरकार जिस तरह पुरुषवाद के आगे गुटने टेकती है उससे ये भ्रम बन चुका था कि महिलाओं की लड़ाई अनंत काल तक चलेगी। शाहबानों से शायरा बनों तक सिर्फ 30 साल की अवधि में मुस्लिम महिलाओं ने अपनी कमान संभाल ली है। वे पितृसत्ता को धार्मिक और लीगल (कानूनी) दोनो स्तरों पर चुनौती देने में सफल रही है।

पाँच न्यायधीशें की पीट का लगभग 400 पन्नों का जो फैसला आया है तीन तलांको पर जिसमें फैसले को त्रुटिरहित और सर्वमान्य बनाते हुए ना सिर्फ पवित्र कुयआन को ठीक से उद्धृत किया गया है बल्कि भारत के न्यायालयों के तलाक पर फैसले दूसरें मुस्लिम मुलकों के तीन तलाक पर फैसले अरब मुल्कों के कानून दर्क्षिण एशियाएँ मुस्लिम मुल्कों के कानून और संवैधानिक प्रावधान और उदृधृत किये गए हैं। न्यायिक और संवैधानिक नैतिकता का हवाला भी कई जगह दिया गया है कि कहीं कोई पहलू ढ़ीला ना छूट जाए। इतनी सतर्कता इसलिए बरती गई कि कठमुल्लवादी तत्व भारत में इस्लाम को खतरे में न घोषित कर दें। खुशी की बात यह है कि यह जजमेंट (निर्णय) कहता है कि तीन तलाक इस्लाम के विरुद्ध है लिहाजा ये मुस्लिम महिलाओंे के धार्मिक अधिकारों का भी उल्लंघन करता है। यानी बजाय यह कि पुरुषवादी यह कह पाते कि ये उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है, फैसला यह कहता है कि तीन तलाक की परंपरा तो ’मुस्लिम महिलाओं के धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है। ’यानी इस्लाम ही महिलाओं का सुरक्षा कवच बना।

इस तरह चारों तरफ से उद्धरण देकर फैसले को पुख्ता बनाने का एक फायदा यह हुआ है कि अपनी हद में सीमित मुस्लिम महिलाओं की बड़ी तादाद को इस मसले पर अपने मजहब का रुख व रवैया पता चलेगा। फैसले से कानूनी व सामाजिक रूप से जो भी लाभ हों सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि इसने सामाजिक स्तर पर जागरूकता की अलख जगाई हैं 2017 के साल में इससे अलग क्या हो सकता था। यह एक बड़ी मनोवैज्ञानिक राहत है। मुस्लिम महिलाओं के दिल पर से एक बड़ा बोझ दूर हो गया है। इसके अंदर की राहत परिवार में भी महसूस की जाएगी।

भारतीय मुस्लिम महिलाओं की जंग का यह पहला पड़ाव है, अभी कई मोर्चे जीतने हैं और वे तैयार हैं। पुरुषवादी तबका फिलहाल बगले झांक रहा है और फैसले का विस्तृत अध्ययन करने के बाद ही प्रतिक्रिया देने की बात कर रहा है, लेकिन आम मुसलमान और पुरुष इसका स्वागत कर रहे हैं।

शीबा असलम फ़हमी, नारीवादी मुस्लिम लेखिका एक्टिविस्ट (कार्यकर्ता) और पत्रकार

शुरुआत: -सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को रद्द करके मुस्लिम महिलाओं के हक में नए युग की शुरुआत की है। शाहबानों के फैसले की तरह राजनीति चिंगारी वाले इस निर्णय में पांच जजों की पीठ ने दो बनाम तीन जजों के बहुमत से फैसला दिया है। निश्चत तौर पर यह फैसला स्वागत योग्य है और मुस्लिम समाज की उन तमाम महिलाओं के हक में जाता है जिनका जीवन शरीयत की आड़ में पति के गुस्से और मनमानेपन का शिकार होकर तबाह हो जाता है। लेकिन, ऑल इंडिया (पूरे भारत) मुस्लिम पर्सनल लॉ (स्वीय विधि) बोर्ड (परिषद) न तो इस प्रथा को खत्म करने के लिए अदालती हस्तक्षेप के पक्ष में था और न ही संसद से कानून बनाए जाने को सही मानता है। उसने अदालती सुनवाई के दौरान यह जरूर स्वीकार किया कि तीन तलाक का इस्तेमाल करने वाले लोगों का बायकाट (बहिष्कार) होना चाहिए और इस बात को निकाहनामें में दर्ज होना चाहिए कि तीन तलाक नहीं दिया जाएगा। इस फैसले से मुस्लिम महिलाओं में आई जागरूकता को देखते हुए उम्मीद है कि मुस्लिम महिलाओं का संगठन आगे आए और इस्लामी कानून के भीतर दूसरे संशोधनों के लिए जनमत तैयार करे। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की रोशनी में अगर इस जरूरी सामाजिक सुधार को लागू करवाने के लिए अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज का बहुसंख्यक हिस्सा आगे आता है तो यह एक प्रगतिशील कदम साबित होगा और उन मुस्लिम देशों की तरह भारत भी अपनी इस्लामी महिलाओं को बड़ी राहत दे सकेगा जहां तीन तलाक -प्रतिबंधित हो चुका है। एक बार गुजारा भत्ते के मामले में शाहबानों के फैसले के विरोध में राजीव गांधी सरकार के कानून से बनी बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को यह देश झेल चुका है, लेकिन अब समय बदल चुका है। सोशल (सामाजिक) और इलेक्ट्रॉनिक (विद्युत) मीडिया (संचार माध्यम) के इस दौर में मुस्लिम महिलाओं के साथ ही पूरे समुदाय में काफी सकारात्मक मंथन हुआ है। यह पूरे भारतीय समाज के एकीकरण की दिशा में भी अच्छा कदम है। मीडिया (संचार माध्यम) को भी जश्न मनाने और नारेबाजी करने से बचना चाहिए और सामाजिक परिवर्तन में संवेदनशील हस्तक्षेप का सहभागी बनना चाहिए।

सरकार और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (स्वीय विधि परिषद) के बीच इन्तेहाई रस्साकशी और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद आज तीन तलाक पर ऐतिहासिक फैसला आया। इस्लामिक धर्मगुरु जिस 1400 वर्ष पुरानी प्रथा को शरिया कानून के अनुरूप मानते आ रहे थे, उसे असंवैधानिक करार देकर, न्यायालय ने यकीनन उन महिलाओं को राहत पहुंचाई है, जो इससे आजादी चाह रही होंगी।

अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि कानून का प्रारूप क्या हो और इसे अमल में लाने के लिए क्या खाका तैयार किया जाए। फिर प्रावधान ऐसे हों कि पुरुष और महिला दोनों के ही मौलिक अधिकारों का हनन हो। अब तक महिलाएं पीड़ित थीं, लेकिन अब यदि पुरुष को पीड़ित बनने की नौबत आ गई तो, इस काननू का सार्थक उद्देश्य प्राप्त नहीं होगा। सरकार यदि अब तक इस प्रथा से पीड़ित रही महिलाओं के कल्याण के लिए भी कदम उठाती है तो यह एक मुकम्मल जीत होगी। दूसरी ओर मुस्लिम समाज के लोगों को भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है। लोगों को समझना होगा कि एक ही झटके में तीन तलाक महिलाओं के जीवन को कितना चुनौतीपूर्ण बना देता है। बच्चों की परवरिश का बहुत बड़ा मसला मां के सामने खड़ा हो जाता है। इतना ही नहीं, तलाकशुदा महिला के पैतृक परिवार को भी सामाजिक रुसवाइयों का सामना करना पड़ता है। ज्ञात हो कि मोहम्मद साहब के दूसरे उत्तराधिकारी उमर फारूक ने एक ही समय में तीन तलाक कहने की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया था और ऐसा करने वालों को 100 कोड़े लगाने की सजा का प्रावधान था। इससे साफ संकेत मिलता है कि उमर फारूक इसके खिलाफ थे और जब हम उनके मानने वालें हैं तो तलाक के बारे में उनके नजरिये को अख्तियार करने से पीछे क्यों हटे? हमारे रहनुमाओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतवर्ष बदलते समय के साथ सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन का पक्षधर रहा है। पांच हजार वर्ष पुरानी संस्कृति वाले इस देश ने सती प्रथा जैसे रोग की जकड़न से भी खुद को बाहर निकाला था। फिर ’तीन तलाक’ की बेड़ियां हम महिलाओं के पैर में क्यों बांधे?

रिजवान अंसारी, जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली

विचार: -

  • तीन तलाक पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला मानवीयता की जीत है। जेंडर (लिंग) जस्टिस (न्याय) के साथ ही यह मुस्लिम महिलाओं से बराबरी का अधिकार नहीं छीना जा सकता। अब सरकार को इच्छा शक्ति दिखानी होगी। अब यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) पर बहस तेज होगी। हालांकि यह व्यापक विषय है फिर भी सियासी और सामाजिक चर्चा बढ़ेगी। हिन्दू समाज में फैली दहेज की कुप्रथा के खिलाफ भी ऐसी ही आवाज उठनी चाहिए।

केटीएस तुलसी, वरिष्ठ अधिवक्ता सर्वोच्च न्यायालय

  • सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला भले सिर्फ तीन तलाक पर आया हो लेकिन देश समान नागरिक संहिता की ओर बढ़ रहा है। हिन्दू मैरिज (विवाह) एक्ट (अधिनियम) में जो अधिकार महिलाओं को हैं वह आइडियल (आदर्श) है। कानून बनेगा तो सिर्फ तलाक ही नहीं कवर (आवरण) होगा बल्कि भरण-पोषण, संपत्ति, बहुविवाह भी दायरे में लाने होंगे।

अश्विनी दुबे, अधिवक्ता सर्वोच्च न्यायालय

  • सर्वोच्च न्यायालय का फैस्ला ऐतिहासिक है। मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार देता है। महिला सशक्तिकरण की दिशा में मजबूत कदम है।

नरेन्द्र मोदी, भारत प्रधानमंत्री

  • इस फैसले से मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय खत्म होंगे। फैसला पहले आना चाहिए था। देश ने भी मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने में देर की। अब मुस्लिम समुदाय में तलाक की प्रक्रिया का फैसला संसद को करना होगा। इस मुद्दे को कॉमन सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) से नहीं जोड़ना चाहिए। दोनों अलग है। देश का 90 फीसदी कानून कॉमन सिविल कोड के जरिये ही चल रहा है। पर्सनल (निजी) मामले ही इससे बाहर हैं।

सुभाष कश्यप, संविधान विशेषज्ञ

गोवा: - गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहां समान नागरिक संहिता लागू है। यहां धर्म, जाति, लिंग के आधार पर अलग-अलग कानून नहीं है। एक ही फैमिली (पारिवारिक) लॉ (विधि) भी हैं।

अब आगे क्या? : - छह महीने में कानून नहीं बना तो तीन तलाक पर न्यायालय का यही आदेश जारी रहेगा। जो रोक 6 महीने के लिए है, वो कानून नहीं बन पाने की स्थिति में आगे भी जारी रहेगी।

तलाक: - ऑल (पूरे) इंडिया (भारत) महिला मुस्लिम पर्सनल लॉ (स्वीय विधि) बोर्ड (परिषद) की अध्यक्ष शाहइस्त अंबर ने बताया कि तीन तलाक पर रोक के बाद शरई निकाहनामें को अपनाया जाएगा। इसकी कानूनी प्रक्रिया के तहत तलाक दिया जा सकेगा। इससे अब कोई भी व्हाट्‌सएप, फेसबुक और पत्र के जरिये तलाक नहीं दे सकेगा। तलाक के लिए पति और पत्नी को कई कानूनी नियमों का पालन करना होगा। इस आदेश के बाद अभी कोई भी तलाक देगा तो वह संवैधानिक नहीं होगा।

सरकार: - सूत्रों के मुताबिक केन्द्र सरकार इस पर तत्काल कोई कानून नहीं बनाने जा रही है। जानकारों के अनुसार 1935 के शरीयत कानून में संशोधन किए जाएंगे। यह कानून मुस्लिम निकाह कानून को कवर (आवरण) करता है।

ऐतिहासिक फैसला: -सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक बेंच ने 1400 साल से चली आ रही तीन तलाक व तलाक-ए-बिद्दत की परंपरा को असंवैधानिक करार दे दिया। 5 जजों की पीठ ने 3: 2 के बहुमत से यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। तीन जजो ने कहा, तीन तलाक की प्रथा कुरान के मूल सिद्धांत के खिलाफ है। कई इस्लामिक देशों में इस पर प्रतिबंध है तो क्या स्वतंत्र भारत इससे मुक्ति नहीं पा सकता? यह फैसला एक झटके में वैवाहिक जीवन खत्म होने के भय में जी रहीं महिलाओं के लिए बड़ी राहत है।

जज (न्यायाधीश) : -

  • दो जज बोले-जिसमें चीफ (मुख्य) जस्टिस (न्याय) जेएस केहर और जस्टिस एसए नजीर ने कहा, तलाक एक बिद्दत सुन्नी मुस्लिमों का धार्मिक मसला है। जो 1400 साल की परंपरा है। जस्टिस खेहर और जस्टिस नजीर ने कहा, सुन्नी हनफी वर्ग 3 तलाक को मान्यता देता है। अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में है। हम अनुच्छेद 142 के तहत सरकार को निर्देश देते हैं कि 6 माह में कानून बनाए। तब तक मुस्लिम पुरुषों को तलाक -ए- बिद्दत का इस्तेमाल करने से रोक रहे हैं।
  • तीन जज बोले- जिसमें जस्टिस (न्याय) जोसेफ, ने प्रधान न्यायाधीश से असहमत होते हुए लिखा कि कोई परंपरा पुरानी होने से वैध नहीं हो जाती। जस्टिस नरीमन और जस्टिस ललित ने भी इस तथ्य पर सहमति जताई।

फैसला में जस्टिस कुरियन जोसफ ने कहा, सर्वोच्च न्यायालय पहले भी शमीम आरा जजमेंट में 3 तलाक को कानूनन गलत करार दे चुका है। तब न्यायालय ने विस्तार से वजह नहीं बताई थी। अब विस्तार से बताने की जरूरत है। इस्लामी कानून के 4 स्रोत हैं। कुरान, हदीस, इज्मा और कियास। कुरान मौलिक है। जो बात कुरान में नहीं उसे मौलिक नहीं माना जा सकता। बाकी स्रोतों में कोई भी बात कुरान में लिखी बात के खिलाफ नहीं हो सकती। 1937 के शरीयत एप्लिकेशन एक्ट का मकसद मुस्लिम समाज से कुरान से बाहर की बातों को हटाना था। 3 तलाक को संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत संरक्षण नहीं हासिल है।

असमंजस: - तीन तलाक, यह प्रथा मानवीयता संविधान और इस्लाम तीनों के विरुद्ध है। इसलिए कोर्ट इस सवाल पर ऐसा फैसला दे जो तीन तलाक का दरवाजा जो बंद करने के साथ में व्यापाक सामाजिक और राजनीतिक सुधार का दरवाजा भी खोल दे। देर सवेर तीन तलाक को खारिज होना ही था सा हो गया। लेकिन कुछ लोगो को इस फैसले से तीन बड़ी उम्मीदे थीं। पहली इससे तीन तलाक ही नहीं देश में तमाम महिला विरोधी धार्मिक सामाजिक कुरितियों को अमान्य करने का रस्ता खुलेगा। दूसरी, इस बहाने मुस्लिम समाज में सुधार तेज होगा यह अपने कठमुल्ला नेतृत्व मुक्त करेगा। तीसरी, कानूनी धक्के से सैक्यूलर (धर्म निरपेक्ष) राजनीति अपने पाखंड में मुक्त होगी। लेकिन इस फैसले से काई एक उम्मीद भी पूरी नही होती। तीन तलो प्रथा मुख्यथ: एक प्रतिकात्मक सवाल है। संख्या की दृष्टि से देखें तो एक ही सांस में तलाक तलाक तलाक कहकर संबंध विच्छेद करने की घटनाएं इनी गिनी ही होती है। फिर भी शादी जैसे संबंध को तोड़ने का इतना अतार्कित और अमानवीय तरीका इस प्रथा को मुद्दा बनाता है। इसका डर एक औरत के सर पर तलवार की तरह लटका रहता है। कुरान शरीफ में तलाक के इस स्वरूप का कहीं जिक्र नही हैं। शरिया ने इन्हे वैधता ज़रूर दी लेकिन एक आदर्श के रूप में नहीं। यूं भी ऐसी नारी विरोधी प्रथा हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। इसलिए कभी न कभी इस प्रथा को कानूनी रूप से अवैध घोषित होना ही था। उम्मीद यह थी कि सर्वोच्च न्यायालय एक राय से बुलंद आवाज़ में बोलेगा लेकिन फैसला सिर्फ तीन दो के बहुमत से आया। जिन तीन जजों ने इस प्रथा को गैर कानूनी बताया वो भी असमंजस में दिखे। सिर्फ दो जजों जस्टिस (न्यायाधीश) नरीमन और जस्टिस ललित ने कहा और संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले पारिवारिक कानून और प्रथाएं गैर कानूनी मानी जाएगी। बाकी तीन जजों ने कहा कि शादी और तलाक के अलग अलग धर्म के कानूनों को संविधान के मौलिक अधिकार की कसौटी पर नही कसा जा सकता। संयोग से उनमें से एक जज (जस्टिस जोसव) ने तीन तलाक को इस आधार पर अवैध माना कि वह कुरान शरीफ़ के अनुसार नहीं है। अगर जस्टिस जोसफ भी जस्टिस खेहर और जस्टिस नजीर का यह तर्क मान लेते कि तीन तलाक एक पुरानी और मान्य प्रथा है तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट जाता।

इसलिए यह सामाजिक सुधार के लिए कोई बड़ी या शानदार जीत नहीं है। बस यूं समझिए कि बाल-बाल बच गए। एक मायने में इस फैसले ने नारी विरोधी सामाजिक प्रथा के खिलाफ कानूनी लड़ाई को पहले से भी मुश्किल बना दिया है। तीन तलाक तो अवैध हो गया, लेकिन सभी धर्मो में ऐसी अनेक महिला विरोधी प्रथाएं हैं जिन्हें रोकने की जरूरत है। आशा की किरण दिखाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट को फैसला इन सबके विरुद्ध संघर्ष करने वालों को सहारा नहीं देता। यह फैसला मुस्लिम समाज और उसके नेतृत्व में जरूरी बदलाव की शुरुआत भी नहीं करता। आज भारत के मुसलमान की सबसे बड़ी समस्या उनके धार्मिक अधिकार नहीं है। आज एक औसत मुसलमान अच्छी शिक्षा के अवसरों से वंचति है, नौकरी में भेदभाव का शिकार है। आज से ग्यारह साल पहले सच्चर कमेटी (आयोग) ने इस सच्चाई की ओर हमारी आंखे खोली थी। पिछले ग्यारह साल में मुसलमानों की हालत और बिगड़ी है। लेकिन मुस्लिम समाज का कठमुल्ला नेतृत्व इन सवालों को उठाने की बजाए सिर्फ ऐसे धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के सवालों को उठाता है जिससे औसत मुसलमान की भावनाओं को भड़काया जा सके। तीन तलाक जैसी कुप्रथा का समर्थन करना मुस्लिम नेतृत्व के दिवालिएपन का सबूत है। आज के माहौल में मुस्लिम समुदाय से इस नेतृत्व को चुनौती देने की उम्मीद करना मुश्किल है। आज किसी न किसी बहाने मुसलमान निशाने पर है। जान-माल की हिफाजत फिर मुसलमान के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गया है। जब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के पक्ष में मोदी बोलते हैं और अमित शाह प्रेस कॉन्फ्रेंस (पत्र सम्मेलन) करते है तो एक साधारण मुसलमान के मन में शक और डर पैदा हो जाता है। बस इतना जरूर हुआ है कि स्व. हमीद दलवई के नेतृत्व में शुरू हुए संघर्ष और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन जैसे हिम्मती संगठनों को कुछ ताकत मिल गई है। तो क्या सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश की सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) राजनीतिक का चरित्र बदलेगा? अगर सुप्रीम कोर्ट बुलंद आवाज में कहता कि संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ कोई सामाजिक धार्मिक प्रथा मान्य नहीं होगी, तो सेक्युलर राजनीति की हिम्मत भी बढ़ती। हो सकता था कि वे समान नागरिक संहिता के पक्ष में बोलने की हिम्मत जुटा पाती। लेकिन अगर कोर्ट की चारदीवारी में सुरक्षित जज भी असमंजस में हैं, तो सड़क पर मत ढूंढते राजनेताओं से भला क्या उम्मीद की जाए?

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही मुस्लिम समुदाय की तीन तलाक जैसी अमानवीय आर अतार्किक प्रथा को असंवैधानिक करार दे दिया। सवाल यह है कि क्या इस फैसले से मुस्लिम समाज कठमुल्लेपन और सामाजिक कुरीतियों से आजाद हो पाएगा? या फिर यह फैसला भी पहले की तरह महज एक अदालती फैसला ही बनकर रह जाएगा?

योगुन्द्र यादव, राजनीतिक विश्लेषक, स्वराज इंडिया (भारत) के राष्ट्रीष्य अध्यक्ष व जय किसान आंदोलन के संयोजक

उपसंहार: - आखिर कार लंबे समय से मुस्लिम महिलाएं जो तीन तलाक का दंश झेल रही है इस ऐतिहासिक फैसले से उन्हें काफी राहत मिली है। अब आगे की जिन्दगी वे बिना किसी डर के स्वतंत्रता पूर्वक आसानी से जी सकती हैं।

- Published/Last Modified on: September 13, 2017

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