टीपू सुल्तान (Tipu Sultan- Essay in Hindi) [ Current News (Concise) ]

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प्रस्तावना: - देश दुनियां के इतिहास के पन्ने नायकों और खलनायकों से भरे पड़े हैं। इतिहास में यूं तो बीती हुई बातें और तथ्य होते हैं लेकिन जब इतिहास में उल्लेखित तथ्यों पर सवाल खड़े होने लगें तो यह संदेह भी होता है कि कहीं किसी का महिमामंडन तो नहीं किया गया। इसलिए उस समय इतिहास के पुनर्लेखन की मांग भी उठने लगती है। यहां पर अभी ताजा विवाद टीपू सुल्तान को लेकर है जिसकी सरकारी स्तर पर जयंती मनाने को लेकर बहस छिड़ रही है। एक वर्ग टीपू को खलनायक साबित कर रहा है तो दूसरा वर्ग उसे हीरो साबित कर रहा है। क्या हमारे इतिहास में समय के अनुसार नायकों का महिमा मंडन किया गया है? अर्थात महापुरूषों की महिमा का खंडन किया गया हैं। कितनी जरूरत हैं नए सिरे से इतिहास के लिखने की? क्या यह सब विकास के मुद्दों से ध्यान भटकाने को लेकर उछाला जा रहा हैं।

प्रतिमान: - प्रतिमान स्थापित करना समाज के लिए बहुत ही अपरिहार्य प्रक्रिया है। हम प्रतिमान बनाते हैं और भी अपने प्रतिमान बनाते हैं। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू शिवाजी, राम, कृष्ण और महावीर। ये सब हमारे प्रतिमान हैं। अशफाकउल्ला, सुभाषचन्द्र बोस आदि सब हमारे आदर्श रहे हैं। इस प्रक्रिया में कई बार हम गलत प्रतिमान बनाते हैं तो कई बार अच्छे को छोड़ देते हैं। समाज कभी किन्हीं कारणों से फिसल रहा हो तो ये प्रतिमान उस खूटे की तरह से होते हैं जो फिसलने से रोकता है अर्थात गलत रास्तों पर जाने से रोकता हैं। हम अचानक नाथूराम गोडसे को प्रतिमान बनाते हैं तो बहुत बड़ी गलती करते हैं। राष्ट्रपिता के हत्यारे को प्रतिमान बनाने लगे तो हो सकता है कि कुछ लोग नाथूराम गोडसे से सहानुभूति रखते हों, लेकिन यह समाज में एक गलत संदेश देता है।

तथ्य: - टीपू सुल्तान से जुड़े तथ्यों को फिर देखने की जरूरत है। टीपू पर आरोप था कि मैसूर में टीपू ने धर्मान्तरण कराने की कोशिश की तो उसके डर के मारे तीन हजार ब्राह्यणों ने आत्महत्या कर ली। यह पाठयपुस्तकों में लंबे समय तक रहा। प्रो. वी. डी. पाण्डे बड़े इतिहासकार, राज्यपाल और राज्यसभा के सदस्य भी रहे हैं। उन्होंने 29 जुलाई 1977 को राज्यसभा में यह तथ्य रखा कि पाठयपुस्तकों में टीपू के बारे में जो पढ़ाया जा रहा है वह सही नहीं हैं। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय के इतिहास के उन व्याख्यता को पत्र भी लिखा जिनका आलेख किताबों में था। उन्होंने पत्र का जवाब नहीं दिया। इसके बाद उन्होंने हकीकत का पता लगवाया तो पता चला कि इस तरह का किस्सा मैसूर के कार्यालय में कहीं भी नहीं था। ताज्जुब करेंगे तत्काल में ये तथ्य कोर्स से हटा दिए गए। ये तब बंगाल, बिहार, उड़ीसा, यूपी तथा राजस्थान के उच्चविद्यालय में कोर्स में चल रहा था। हमारा तो यह कहना है कि इतिहास आपके सामने हैं। इसमें नायक भी हैं और खलनायक भी। कहीं गलती है तो उसका पुनर्लेखन करवाना चाहिए। इसे करने से किसने रोका है? समस्या यह है कि हम ओरंगजेब को तो हटा देते हैं लेकिन नाथूराम गोडसे का मंदिर बनाने की बात करने वाले को जेल नहीं भेजते हैं।

हकीकत: -टीपू के बारे में एक और हकीकत जाननी जरूरी है। उसका प्रधानमंत्री ब्राह्यण था जिसका नाम पुनैया था। उसका सेनापति भी ब्राह्यण था उसका नाम कृष्णैया था। यह भी एक सत्य है कि टीपू ने 156 मंदिरों के रखरखाव की व्यवस्था अपने खजाने से कर रखी थी। दरअसल एक बड़ी गलती आक्रामक हिन्दुत्व को लेकर हो रही है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को इसकी चिंता करनी चाहिए। दिक्कत यह है कि जो हिंदू मुसलमान की बात करता है उसे हम टिकट देकर मंत्री बना देते हैं। हम प्रतिमान राजनीति के हिसाब से बना रहे हैं और डर यह है कि हमारे प्रतिमानों से विश्वास उठता जा रहा है। यदि समाज में ऐसी ही भावना पैदा की जाती रही तो हम कहां जाएंगे इसकी हमें चिंता करनी चाहिए।

वाकयुद्ध: -निम्न विरोध या विवाद हैं-

  • यह विवाद 18वीं सदी में मैसूर के शासक रहे टीपू सुल्तान की कर्नाटक सरकार ने 265वीं जयंती मनाने का ऐलान किया तो भाजपा से जुड़े संगठन आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद आदि विरोध पर उतर आए। इन संगठनों ने टीपू को सबसे असहिष्णु शासक करार देते हुए आंदोलन छेड़ दिया। ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त नाटककार और फिल्म अभिनेता गिरीश कर्नाड ने कहा था कि 18वीं सदी के मैसूर के शासक टीपू सुल्तान अगर हिंदू होते तो उन्हें मराठा शासक छत्रपति शिवाजी के समान दर्जा मिलता। कर्नाड ने यह भी मांग की थी कि बेंगलुरु के अंतराष्ट्रीय हवाइअड्डा का नाम विजयनगर के शासक रहे कैम्पेगोड़ा के स्थान पर टीपू सुल्तान के नाम पर रखा जाए।
  • एक ट्‌वीट के जरिए गिरीश कर्नाड को धमकी दी गई कि उनका भी वहीं हाल होगा जो कन्नड लेखक एमएम कलबुर्गी का हुआ था हालांकि बाद में यह ट्‌वीट हटा लिया गया। एक बयान जारी कर कर्नाड ने कहा कि उन्होंने जो भी कहा उनकी निजी राय थी, इसके पीछे उनकी कोई दुर्भावना नहीं थी। अगर किसी को पीड़ा पहुंचती है तो मैं माफी मांगता हूं।
  • कर्नाटक के सीएम के सिद्दरमैया का मानना है कि टीपू सुल्तान एक धर्मनिरपेक्ष शासक थे। जयंती समारोह के संदर्भ में सांप्रदायिक संगठन विरोध में हैं। ज्यादातर लाेेग इस समारोह को लेकर खुश है तो किसी को दिक्कत क्यों होनी चाहिए। हमें मालूम था कि बीजेपी समारोह का बहिष्कार करेगी। ऐसे लोगों से और क्या उम्मीद की जा सकती हैं?
  • टीपू सुल्तान के वंशज अनवर शाह का आरोप है कि टीपू के इतिहास को खराब करने के लिए जानबूझकर विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। इस विवाद को खत्म करने के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से दखल की मांग की हैं। दूसरी और कानार्टक, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के आरएसएस नेता वी, नागराज का दावा है कि टीपू सुल्तान ऐसा शासक था जिससे कर्नाटक के लोग नफरत करते हैं। उसने चित्रदुर्गा, मंगलोर और मध्य कर्नाटक के लोगों पर जुल्म ढाया था।
  • यह पहली बार नहीं है जब भाजपा टीपू सुल्तान का विरोध कर रही है। इसी साल सितंबर में भाजपा ने कर्नाटक के डिंडीगुल जिले में टीपू सुल्तान और हैदर अली (टीपू के पिता) से जुड़े स्मारक के खिलाफ भी अभियान छेड़ा था। मैसूर के राजा रहे हैदर अली ने पहली बार टीपू को इसी जगह का शासक नियुक्त किया था। सितंबर में ही एक विवाद तब भी हुआ जब कन्नड फिल्म के प्रोड्‌यूसर अशोक खेनी ने घोषणा की कि वे टीपू सुल्तान के ऊपर एक फिल्म बनाना चाहते हैं और इसमें मुख्य भूमिका रजनीकांत निभाएंगे। तमिलनाडु में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता एल गणेशन ने इस फिल्म का विरोध करते हुए कहा कि टीपू ने हिंदुओं पर भारी अत्याचार किए थे।

इतिहास: - दोबारा लिखने की जरूरत हमेशा ही बनी रहती है। नये नजरिये से उसे हमेशा लिखा भी जाता है। संसार में सभी देशों के साथ ऐसा ही होता आया है। लेकिन, हमारे देश में दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि गलत इतिहास लिखा गया और गलत इतिहास को सही ठहराने की कोशिश की जाती रही। यहीं से समस्याएं शुरू हो गई।

जब कोई यह लिखें कि सोमनाथ मंदिर को गुजरात के सोलंकी हिंदू सम्राट ने लूटा था और मोहम्मद गौरी ने इस मामले में केवल अपनी अतिशयोक्तिपूर्ण वीरता का बखान किया था तो इस बात को स्वीकार करना तो बेहद कठिन है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हमने इतिहास की ओर से अपनी आंखे बंद कर रखी हैं। हमारे पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के अपनों के भारत और गांधी के सपनों के भारत में बड़ा फर्क था। गांधीजी तो जवाहरलाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी बना गए। उसके बाद से ही समस्याएं खड़ी होने लगीं। हमारे यहां एनसीईआरटी की स्थापना नेहरू परिवार की देन है और इसकी पाठयपुस्तकों से इतिहास पढ़ाना शुरू किया गया। लेकिन एनसीईआरटी की पाठ्‌यपुस्तको ने भारत वर्ष के इतिहास को कांग्रेस का इतिहास बना दिया। इस इतिहास में यदि आप यह पढ़ाएंगे कि भारत की आजादी में नेहरू के सिवाय किसी अन्य का योगदान था ही नहीं, तो इतिहास के पुनर्लेखन जैसे सवाल जरूर खड़े होंगे। कोई यह तो बताए कि इतिहास में आजादी के बाद भी किसी बड़े गैर कांग्रेसी नेता को उसका स्थान मिल गया? क्यों नेहरू का ही नायक के तौर पर महिमामंडन किया जाता रहा? दरअसल पाठ्‌यपुस्तकों से ही इतिहास की आधारभूत जानकारी शुरू होती है लेकिन वहीं पर जब ऐसे खेल शुरू होते हैं तो परेशानियां सामने आती हैं। जब किसी ने गुरुतेग बहादुर को लेकर कुछ नकारात्मक बात लिखी तो सिखों को बुरा लग जाएगा, यह मानकर वे बातें हटा दीं। हमने तो स्कूल में पढ़ा था कि टीपू सुल्तान ने फ्रांसिसियों की मदद ली थी और अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए शहीद हुआ। कैसे भुला दिया जाएगा शिवाजी के संघर्ष को? कैसे भुला दिया जाएगा कि वे आगरा के किले में कैद से निकल भागे। कैसे भुला सकते है इतिहास के इन नायकों कों? दुर्भाग्य की बात यह है कि शिवाजी हिंदू पदपादशाही की बात किया करते थे। ऐसे में आपको उनकी दोनों ही बातों को मानना भी पड़ेगा। दरअसल में हमने हकीकत को स्वीकार ही नहीं किया और सबक सीखने जैसी बातें इतिहास में लिखी ही नहीं गई। केवल मिथक गढ़े गए। हमें हर मतभेद, दंगों के बारे में पूरी सफाई के साथ लिखना चाहिए और उसे स्वीकारते हुए सबक लेने की बात सामने रखनी चाहिए थी। टीपू सुल्तान के बारे में भी दोनों ही बातें हो सकती हैं। हम सकारात्मक बातें रखना चाहें और नकारात्मक को छिपाएं यह ठीक नहीं है। जो भी तथ्य हों वे सामने आने चाहिए। वह कितना कट्टर था और कितना सहिष्णु ये सब बातें इतिहास के पन्नों में यदि हैं तो उनको भी सामने आना चाहिए।

संदेह: - इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि टीपू सुल्तान देश के ऐसे हीरों थे जिन्होंने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया। एक ओर उत्तर भारत में बहादुरशाह जफर, तांत्या टोपे व लक्ष्मीबाई सरीखी वीरांगना थी तो दक्षिण भारत में हैदर अली व टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों से मोर्चा ले रखा था। हम पाठयपुस्तकों में टीपू सुल्तान की वीरता के किस्से पढ़ते आए हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया कि कुछ लोंगो को टीपू अत्याचार शासक नजर आने लग गया।

समझौता: - यह सचमुच दुर्भाग्य का विषय है कि एक ऐसे व्यक्ति को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा किया जा रहा है जिसकी वीरता के किस्से हर स्तर पर पाठ्‌यपुस्तकों में शामिल किए जाते हैं। कोई किसी की जयंती मनाए अथवा नहीं मनाए, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है। हमारे देश में अभिव्यक्ति की आजादी को खत्म नहीं किया जा सकता। ओरंगजेब के बारे में तो इस बात को हर कोई स्वीकार करेगा कि वह एक अत्याचारी शासक था। लेकिन टीपू सुल्तान की इस तहर छवि बनाने का प्रयास ही है। लेकिन टीपू यदि ऐसा होता तो कब का ही अंग्रेजों से समझौता कर खुद तो चैन से राज करता होता।

विचारधारा: - तमाम विरोधाभासी बयानों के बीच जरूरी यह है कि हम इस बात को समझने की कोशिश करें कि इतिहास किसका है और किसके लिए लिखा जाता है? स्वतंत्र भारत में बंटवारे के बाद इतिहास लिखने की जो पंरपरा बनी है वो आज सवालों के घेरे में है। एक विषय विचारधारा को इतिहास दर्शन और लेखन परंपरा के तौर पर राजकीय संरक्षण मिला और उसी कारण इतिहास की किताबों में कई नायक बने और कई जननायक इतिहास के पन्नों से लूप्त हो गए। इतिहास लेखन जब विशिष्ट राजनीति विचारधारा से जुड़ जाता है तो बदलती विचारधारा के बहाव में उसे बदलने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि हम राजनीतिक संकीर्णताओं से हटकर इतिहास का पुनरावलोकन करें। यह बात भी सच है कि विचारधारा आधारित नायक स्थायी नहीं होते और यही वजह है कि आज बदलते परिवेश में इतिहास पर प्रशन उठ रहे हैं। दरअसल यह प्रश्न इतिहास पर नहीं उस विचारधारा पर उठ रहे है जिसने जनमत को समझे बिना अपनी सोच के आधार पर नायक तय कर लिये। कोई भी इतिहास तथ्यों को छुपाने से बदल नहीं सकता इसलिए राजनीतिक फायदे के लिए ऐतिहासिक तथ्यों को बदलने की कोशिश करना गलत होगा। बचपन मे पढ़ी किताबों के कई नायक आज नए रंग में दिखते हैं। कई व्यक्ति विशेष जिन्हें हमने राष्ट्र नायकों के रूप में पढ़ा आज के दौर में और आज की परिस्थतियों में अलग ही नजर आ रहे हैं। नेजाती सुभाष बोस जैसा नायक जो जन मानस में एक महान नेता के रूप में बसा हुआ था, इतिहास की किताबों में हाशिए पर चला गया। आज नये तथ्यों के सामने आने से उनके बारे में लिखा इतिहास तो बदलेगा ही उससे संबंधित अन्य लोगों के नजरिये में भी बदलाव आएगा। कई और भी होंगे जिन्हें या तो भुला दिया जाएगा। या स्थापित किया जाएगा।

उपसंहार: - हिंदुस्तान एक बड़ा और आगे बढ़ता हुआ देश है। काफी सालो बाद हमारे देश के ऐसे प्रधानमंत्री बने हैं जिनकी ओर न केवल देश बल्कि समुची दुनिया देख रही हैं। जरूरत बदलाव को समझने की हैं, उसका राजनीतिक मुद्द बनाने की नहीं। ऐसे विषय विकास के मुद्दों से ध्यान भटकाने के प्रयासों से ज्यादा कुछ नहीं है। हमारा असली काम यह होना चाहिए कि कहां सड़क, बिजली नहीं हैं और कहां लोगों को समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा है। सौहार्द बना रहे यह ज्यादा जरूरी हैं।

- Published/Last Modified on: March 25, 2016