उच्च पद्रंह समाचार (Top Fifteen News)

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मैक्सिको:- विदेश नीति के मामले में नए अमेरिकी राष्ट्रंपति ट्रंप के आक्रामक रुख का एक और मामला सामने आया है। इस मामले में ट्रंप ने मैक्सिकों को धमकी दी है। इससे पहले उन्होंने मैक्सिको और अमेरिका की सीमा पर दीवार बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। नए मामले में उन्होंने मैक्सिको के राष्ट्रपति को फोन कर कहा है कि अगर मैक्सिकों की सेना अपने देश के ‘गंदे लोगों’ को काबू में करने के लिए कुछ नहीं करेगी तो अमेरिका इस काम के लिए अपनी सेना भेजने के लिये तैयार है। ट्रंप ने अक्टूबर में हुई राष्ट्रपति पद की बहस में मैक्सकों के ‘मादक पदार्थ तस्करों और बुरे लोगों’ के लिये ‘बैड होम्बर्स’ मुहावरे का इस्तेमाल किया था। उन्होंने अमेरिका को इनसे छुटकारा दिलाने का संकल्प जताया था।

‘दी एसोसिएट प्रेस’ (सहयोगी समाचार-पत्र/दबाव) को ट्रंप और मैक्सिको को राष्ट्रपति एनरिक पेना नितो के बीच फोन पर हुई बातचीत के कुछ अंश मिले हैं। हालांकि इसमें इस बात का विस्तार से उल्लेख नहीं है कि ट्रंप ‘गंदे लोग’ शब्द का इस्तेमाल किन लोगों के लिए कर रहे हैं और ना इनमें उनकी इस टिप्पणी के लहजे और परिप्रेक्ष्य के बारे में स्पष्ट पता चलता है।

चीन:-

  • चीन ने किया 10 परमाणु हथियार दागने वाली मिसाइल प्रक्षेपास्त्र का परीक्षण-चीन ने एक नई मिसाइल का परीक्षण किया है जो दस परमाणु हथियारों से एक साथ अलग अलग निशानों पर मार करने में सक्षम है। माना जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन से तनाव के चलते अमेरिका से संभावित फौजी मुकाबले के लिए चीन अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।
  • चीन की पीपुल्स (आम लोग) लिबरेशन (मुक्ति) आर्मी (फौज/देश की सेना) (पीएलए) की ओर से हाल में गठित की गई रॉकेट फोर्स (अग्नि बाण फौज) ने एक हजार किलोमीटर से ज्यादा की मध्यम दूरी की अडवांस (प्रगति) बैलिस्टिक (प्राक्षेपिकी/अस्त्र विज्ञान) मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) डीएफ-16 के साथ अभ्यास किया। इस मिसाइल की जद में भारत, अमरीका और जापन समेत कई देश आते हैं। आमतौर पर अपनी सैन्य क्षमताओं को गुप्त रखने वाले चीन ने मिसाइल डीएफ-16 के साथ अभ्यास करते सैनिकों का एक वीडियो (चित्रमुद्रण) जारी किया। इस अभ्यास को भारत की हालिया सुरक्षा डीलों और अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप के चीन के खिलाफ दिए बयानों के प्रतिक्रिया के स्वरूप माना जा रहा है। इस वीडियों में इन डीएफ-16 मध्यम दूरी रेंज वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को दिखाया गया है।

रूस:-

  • मॉस्को, रूस फिर आर्कटिक पर छोड़ दिए गए अपने सैन्य, वायु और रडार केंद्रों को दोबारा शुरू करने में जुटा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की अगुवाई में आर्कटिक के वीरान दव्ीपों पर बसे इन केंद्रों को फिर से खोला जा रहा है।
  • रूस यहां पर नए परमाणु आइसब्रेकर जहाज बनाने और इन्हें तैनात करने के अभियान में जोर-शोर से लगा है। नए केंद्र भी बनाए जा रहे हैं। रूस आर्कटिक में करीब 5 लाख वर्ग मील पर अपना दावा करता है। यहां 412 अरब बैरल कच्चे तेल का भंडार है। दुनिया में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के अनुमानित भंडारों का 22 फीसदी भंडार आर्कटिक में है।
  • रूस यहां तीन न्यूक्लियर (नाभिकीय) आइसब्रेकर जहाज का निर्माण कर रहा है। इसमें से एक दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु क्षमता संपन्न जहाज भी है। रूस के पास 40 ब्रेकर्स का बेड़ा भी है। आर्कटिक में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों, नॉर्वें के अलावा चीन यहां काफी सक्रिय है। अनुमानों के मुताबिक, आर्कटिक में सऊदी अरब से भी कहीं ज्यादा हाइड्रोंकार्बन भंडार मौजूद है।
  • सोवियत संघ के दौर में न्यूक्लियर आइसब्रेकर जहाज ‘लेनिन’ रूस की शान हुआ करता था। अब इसे एक म्यूजियम (संग्रहालय) की शक्ल दे दी गई है। लेनिन की सेवा करीब तीस साल पहले खत्म हो गई थी। लेनिन उस समय दुनिया का पहला न्यूक्लियर जहाज था।

चीन मूवीज (सिनेमा) :-

  • 35 वर्षीय फैन चीन की सबसे बड़ी लोकप्रिय एक्ट्रेस हैं। सिनेमा के रूप में पहले पर्दे पर उनका दबदबा किशोर आयु से है। वे चीन के बाजार में लॉरियल, लुई वितों और कार्टियर सहित अन्य लग्जरी ब्रैंड की आर्दश है। फोर्ब्स के अनुसार फैन विश्व की पांचवी सबसे अधिक पैसा कमाने वाली एक्ट्रेस हैं। चीन के बाहर बहुत कम लोगों ने फैन के संबंध में सुना होगा। वे एक्स मैन और आयरन मैन-3 जैसी हॉलीवुड फिल्मों में मामूली भूमिकाएं कर चुकी हैं। फैन कहती है कि चीनी बाजार की संभावनाओं को देखते हुए मुझे भूमिकाएं मिली हैं।
  • चीन की आर्थिक सफलता 21 वीं सदी की प्रमुख घटना है। 2015 में चीन में हर दिन 22 नए सिनेमाघर खुले। उस वर्ष बॉक्स ऑफिस (रंगशाला, सिनेमा आदि में टिकट घर) पर आय 2014 की तुलना में 50 प्रतिशत बढ़ गई। अगले दो वर्षों में चीन की फिल्मों से आय विश्व में सबसे ज्यादा हो जाएगी। पश्चिम में विफल होने वाली हॉलीवुड फिल्में चीन में सफल रहती हैं। पिछले वर्ष वर्ल्ड ऑफ (विश्व के) वारक्राप्ट ने अमेरिका में बॉक्सऑफिस पर 170 करोड़ रुपए से कम कमाए थे। फिल्म की लागत 1000 करोड़ रुपए से अधिक थी। लेकिन, उसके वीडियों गेम (चित्रमुद्रण खेल) संस्करण ने चीनी सिनेमा में पहले पांच दिनो में 1060 करोड़ रुपए कमा लिए थे। चीनी कंपनियों (जनसमूहों) हॉलीवुड स्टूडियों, थिएटर (चित्रकार, फ़ोटोग्राफर आदि की कार्यशाला, सिनेमा) और प्रोडक्शन कंपनियां (उत्पादन प्रकिया जनसमूहों) खरीद रही हैं। पिछले वर्ष रीयल एस्टेट और एंटरटेनमेंट कंपनी (अचल संपत्ति और मनोरंजन जनसमूह) डेलियन वांडा ग्रुप (समूह) ने जुरासिक वर्ल्ड (विश्व) बनाने वाले लीजेंडरी मनोंरजन स्टूडियों को 238 अरब रुपए में खरीदने की घोषणा की थी। वह अमेरिकी सिनेमा चेन एएमसी मनोरंजन और यूरोप की सबसे बड़ी चेन ओडियन, यूसीआई खरीद चुकी है। चीन के सबसे अमीर व्यक्ति और वांडा के संस्थापक वांग जियालिन ने सोनी पिक्चर्स (चित्र, सिनेमा) से फिल्मों में धन लगाने का करार किया है। उन्होंने, गोल्डन (स्वर्ण -समान) ग्लोब्स (पृथ्वी) और अमेरिकन म्यूजिक अवाड्‌र्स (संगीत पुरस्कार) की प्रायोजक डिक क्लार्क प्रोडक्शन (उत्पादन प्रक्रिया) को 68 अरब रुपए में खरीदने में सहमति जताई है।
  • चीन के ई कॉमर्स (वाणिज्य) सम्राट अलीबाबा और गेमिंग कंपनी (खेलों जनसमूह) टेनसेंट हॉलीवुड के छोटे स्टूडियों और फिल्मों में धन लगा रही हैं। अलीबाबा ने हॉलीवुड के नामी निदेर्शेक स्टीवन स्पीलबर्ग के साथ फिल्मों के निर्माण और वितरण में भागीदारी की घोषणा की है। बॉक्स ऑफिस पर चीन के वजन ने हॉलीवुड फिल्मों के निर्माण को प्रभावित किया है। 2015 में आई फिल्म मार्षियन में चीनी स्पेस एजेन्सी (अंतरिक्ष कार्यस्थान) बचाव अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।
  • 2014 में चीनी बॉफस ऑफिस के रिकॉर्ड (दर्ज करना) तोड़ने वाली ट्रांसफारमर्स-4 अमेरिका से ज्यादा हॉन्गकॉन्ग में फिल्माई गई और उसमें चीनी प्रोडेक्ट (उत्पादन) का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ था। पिछले वर्ष मानसेवी ऑस्कर से सम्मानित जैकी चान कहते हैं, जब चीन बड़ा बाजार नहीं था तब सब कुछ अमेरीका तरीके से होता था। अब सभी लेखक, निदेर्शेक और प्रोड्‌यूसर (निर्माता) चीन के संबंध में सोचते हैं।
  • जापानी, मध्य पूर्व देशों और यूरोपीय कंपनियां हॉलीवुड में लंबे समय से पैसा लगा रही हैं। लेकिन चीन का मामला अलग है। वार्नर, ब्रदर्स, ड्रीमवर्क्स और इमेक्स जैसी कंपनियों (जनसमूहों) के साथ फिल्में बनाने वाली कंपनी चीनी मीडिया (संचार माध्यम) केपिटल (राजधानी) के प्रमुख ली रुईगेंग कहते हैं, चीन के पास हॉलीवुड में खर्च करने के लिए पैसा है और स्वदेश में विराट बाजार है। चीन-हॉलीवुड का संबंध वर्षों चलेगा।
  • बड़ा स्टूडियों- चीन के झेजियांग प्रांत के हेंगडियान शहर में कुछ समय पहले तक विश्व का सबसे बड़ा आउटडोर फिल्म स्टूडियों था। पिछले वर्ष पूर्वी बंदरगाह शहर क्चिंगदाओं में वांडा समूह ने 500 अरब रूपए से अधिक की लागत से स्टूडियों खेलकर हेंगडियान को इस श्रेय से वंचित कर दिया है। हेंगडियान में प्रतिदिन 30 शूटिंग होती हैं। 1990 के दशक में किसी समय किसान रहे शू रेनडांग ने स्टूडियों की स्थापना की थी।

कदम-

  • हॉलीवुड पर चीन के बढ़ते प्रभाव से अमेरिकी सांसद चिंतित है। 18 सांसदों ने सरकार से चीन के पूंजी निवेश की बारीकी से जांच करने की मांग की। चीनी फिल्म उद्योग का विस्तार होने से चीन में बॉक्स ऑफिस पर हॉलीवुड फिल्मों का हिस्सा 2012 के 49 प्रतिशत से घटकर आज 32 प्रतिशत रह गया है। पिछले वर्ष फरवरी में चीनी दर्शको ने 3700 करोड़ रुपए की टिकटें खरीदकर साप्ताहिक ग्लोबल बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड तोड़ दिया।
  • चीनी दर्शकों के दबाव में हॉलीवुड फिल्मों के स्वरूप में बदलाव हैं। चीनी कंपनियों ने कई अमेरिकी स्टूडियों और थिएटर चेन खरीदीं।

दुबई शॉपिंग फेस्टिवल (खरीददारी उत्सव) :-

  • दुबई में एक महीने से चल रहा शॉपिंग फेस्टिबल 28 जनवरी को खत्म हो गया, लेकिन खरीददारी का दौर अप्रैल तक जारी रहेगा। यहां खरीददारी करने के लिए हर व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ जरूर है। एक ही छत के नीचे डॉल्फिन (बहुत छोटा व्हेल की तरह का समुद्री जीव) के साथ खेल, वॉटर (पानी) -पार्क का मजा या स्कीइंग का लुत्फ लिया जा सकता है। इसके अलावा खरीददारी तो है ही साथ में हजारो दुकानों में डिस्काउंट्‌स (पुरस्कार) जारी किए गए और लकी (भाग्यशाली) ड्राॅ (पुरस्कार) में अभी भी इनाम दिए गए। इनाम भी छोटा-मोटा नहीं है। लेग्बोर्गिनी, बेंटले और इनफिनिटी जैसी गाड़ियों के अलावा अपार्टमेंट्‌स (एक बड़ी इमारत में एक फ्ल़ैट) और एक किलो तक का सोना भी है। यह है, दुनिया में मशहुर दुबई खरीददारी त्यौहार जिसका असर मॉल (विशाल ढका हुआ स्थान या भवन जहाँ बहुत सारी दुकानें हों।) तक ही सीमित नहीं रहता। शहर में आप कहीं भी चले जाइए, हर जगह फैमिली (परिवार) फन (मनोरंजन) इवेंट्‌स (महत्वपूर्ण घटना) आपका इंतजार करते मिलेंगे।
  • राइप बाजार में स्थानीय उगाई गईं ताजी सब्जियां और फल मिलते हैं। जो लोग सोचते हैं कि साग-सब्जी की ये मंडी शांंयद उनके लिए नहीं है, वे ही यहां सबसे ज्यादा मशगूल मिलेंगे। पास ही ग्लोबल (विश्व-संबंधी) विलेज (गाँव) है जिसे अंतरराष्ट्रीय विषय पर तैयार किया गया है। मनोरंजन के लिए यहां अरबी गानों पर मंच शो (कार्यक्रम) भी चलता रहता है। मॉल हों, बाजार या सूक, इस शहर में खरीददारी करने के मायने ही अलग हैं। यहां जरूरत पड़ने पर सामान नहीं खरीदा जाता है बल्कि खरीददारी यहां की जीवनशैली का हिस्सा है। यहां लगभग 100 खरीददारी मॉल हैं, जिनमें दुनिया का सबसे बड़ा मॉल (दुबई मॉल) भी शामिल हैं। इस मॉल में दुनिया के सभी अंतरराष्ट्रीय ब्रैंड्‌स देखे जा सकते हैं। यहां तक की एक दुकान से दूसरी तक जाते हुए गुम हो जाना बहुत सामान्य है। ‘मॉल आफॅ एमिरेट्‌स’ हाल में रेनोवेट (अच्छी अवस्था में लाना) हुआ है और यहां का दूसरा बड़ा मॉल माना जाता है। यहां दिन चढ़ते-चढ़ते भीड़ भी बढ़ती जाती है। शाम के समय तो भीड़ इतनी अधिक कि लगे इतने लोग कहां से आए। हर मालॅ के अंदर परिवार के परिवार दिखने लगते हैं। ये सभी देशों का मिक्स (मिश्रण करना) क्राउड (भीड़) होता है। क्योंकि कोई रूस से, तो कोई अमेरिका से, कुछ यूके से थे और कुछ अफ्रीका से। भारतीय चेहरे तो खैर हर जगह थे ही। दुबई में खरीददारी तभी पूरी मानी जाती है जब यहां के ट्रेडिशनल (परंपरागत) गोल्ड (सोना) , टेक्सटाइल और स्पाइस (मसाले) सूक भी देख लिए हों।
  • यहां केवल कुछ इलेक्ट्रॅानिक्स (विद्युत उपकरण) , टीवी और गैजेट्‌स (छोटा उपकरण/औजार) पर ही अच्छे डिस्काउंट्‌स (छूट/कटौती करना) दिखाई दिए। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय ब्रैंड्‌स में से केवल दो चार बड़े ब्रैंड्‌स कही डीएसएफ डिस्काउंट्‌स रखते हैं, बाकी इसमें शामिल नहीं होते हैं मैंकप (श्रंगृार का सामान पाउडर, क्रीम आदि) कॉस्मेटिक्स (सौंदर्य प्रसाधन) के स्टॉल (छोटी दुकान) पर भी कोई डिकाउंट नहीं था जबकि इस ब्रैंड (ट्रेडमार्क) पर ऑनलाइन डिकांउट आसानी से मिल जाता है। बाथ एंड बॉडी (नहाना और शरीर) वर्क्स (कर्मचारी) ने केवल कुछ लोशन (शरीर पर चिकित्सार्थ या सुन्दरता के लिए लगाया जाने वाला द्रव) और शावर (फुव्वारा) जेल (जेलि जैसा दिखने वाला गाढ़ा पदार्थ (बालों एवं त्वचा पर लगाया जाने वाला) पर ही छूट दी थी। दुबई टूरिज्म (यात्री) की सुमीथा लुइस का कहना है कि ‘इस फेस्टीवल (उत्सव) में सभी खुदरा ग्राहक को आकर्षित करने की भरसक कोशिश करते हैं लेकिन तभी जब उन्हें भी इसका कुछ फायदा मिल रहा हो। ज्यादातर मॉल्स और दुकानों पर इवेंट्‌स (महत्वपूर्ण घटना) इसलिए रखे जाते हैं कि शांंयद इनके लिए ही ग्राहक वापस आएंगे।’

रिपोर्ट (विवरण देना) दर्शना मिश्रा, दैनिक भास्कर की तरफ से।

  • समुद्री खाना:- दुनिया की आबादी तेजी से बढ़ रही है और इसके कारण खांंद्य समस्या पैदा हो गई है। एक अनुमान के मुताबिक, मौजूदा विश्व में करीब 2 अरब लोग या तो भुखमरी की चपेट में है, या जल्द ही इसकी जद में आने वाले हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि धरती का कुल खांंद्यान्न उत्पादन मौजूदा आबादी से डेढ़ गुना ज्यादा लोगों का पेट भरने के लिए काफी है। फिर भी लोग भुखमरी का शिकार हैं, तो इसकी वजह उत्पादन का असामान्य होना है। कई हिस्सों में उत्पादन ज्यादा है और आबदी कम, लेकिन जहां आबादी ज्यादा, वहां उत्पादन का संकट भी गहरा है। ऐसे में सीफूड यानी समुद्री खाने की ओर दुनिया उम्मीद भरी निगाहों से देख रही है। फिलहाल कुल खांंद्य में समुद्री खाने की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत है, जबकि दुनिया की 5 प्रतिशत आबादी पूरी तरह से समुद्री भोजन पर ही निर्भर हैं।
  • बाजार-सीफूड इंडस्ट्री (समुद्री खाना उद्योग) में लाखों लोग काम कर रहे हैं। इसका बाजार स्थानीय, क्षेत्रीय और वैश्विक तीन स्तर पर बंटा हुआ है। क्षेत्रीय और वैश्विक व्यापार से कई लाख लोगों को रोजगार मिला है। इसमें ज्यादातर लोग प्रोसेसिंग (प्रक्रिया) , पैकेजिंग ( (बिक्री या भेजने से पहले चीज़ों को लपटने के लिए प्रयुक्त सामान) , ट्रांसपोर्ट (परिवहन) , रिटेल (खुदरा) और रेस्टोरेंट से संबंधित काम करते है। द स्टेट ( (यह राज्य) ऑफ (के) वर्ल्ड (विश्व) शिरीज (वस्तुओं की श्रृंखला) एंड (और) एक्वाकल्चर (सोफिया) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक सीफूड का करोबार 170 बिलियन डॉलर (11560 अरब रुपए) से ज्यादा का हैं।

समुद्री खाने बाजार की प्रमुख बातें-

  1. दुनिया में आजीविका 12 प्रतिशत आबादी सीफूड कारोबार से चलाती है।
  2. 54 प्रतिशत सीफूड निर्यात में विकासशील देशों की हिस्सेदारी है।
  3. 63 प्रतिशत बड़े देशों ने इस साल सीफूड का ज्यादा आयात किया हैं।
  4. 21 प्रतिशत बढ़ी 1992 - 2002 के बीच दो दशक में वैश्विक सीफूड खपत
  • निर्यात-सोफिया की रिपोर्ट के मुताबिक विकाशील देशों में सीफूड का कुल निर्यात चावल, कॉफी, चीनी और चाय के संयुक्त निर्यात से भी ज्यादा है। दुनिया के 25 से ज्यादा विकासशील देशों में यह निर्यात आय का सबसे बड़ जरिया है।
  • खपत-समुद्री खाने की हिस्सेदारी अगले कुछ सालों में तेजी से बढ़ने के आसार हैं। 2021 तक दुनिया के खाने में सीफूड की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत होने की संभावना है। इसकी वजह है कि तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों में खांंद्यान्न उत्पादन आबादी के मुकाबले धीमी रफ्तार से बढ़ रहा है। इससे खाने का संकट गहरा रहा है। इसे समुद्री खाने से पूरा करना आसान होगा।
  • मांग-वर्ल्ड बैंक (विश्व अधिकोष) के मुताबिक, साल 2030 तक समुद्री खाने की मांग सबसे ज्यादा एशिया-पैसेफिक क्षेत्र में होगी। अगले डेढ़ दशक में इस क्षेत्र में सीफूड की कुल खपत का 70 प्रतिशत हिस्सा जाएगा। इसके अलावा अमरीका और यूरोप में भी तेजी से मांग बढ़ेगी।
  • धोखांंधड़ी-दुनिया में सीफूड फ्रॉड एक सामान्य समस्या है। एक एनजीओं (गैर सरकारी संस्था) ओसियाना की ओर से 55 देशों में 200 से ज्यादा अध्ययन करने पर सामने आया कि 20 प्रतिशत सीफूड की पैकिंग (पैक करने की प्रक्रिया) गलत नाम से होती है। 65 प्रतिशत मामलों में आर्थिक लाभ के लिए ऐसा किया जाता है। धोखांंधड़ी के तहत, जो बताया जाता है, असल में उससे सस्ता भोजन उपभोक्ता को उपलब्ध कराया जाता है। उत्तरी और दक्षिणी अमरीका के तटीय क्षेत्रों में ऐसी धोखांंधड़ी सबसे ज्यादा हैं।

खाद्य संकट कम-

  1. भूख से सबसे ज्यादा परेशान देशों में से ज्यादातर की सीमा समुद्र से मिलती है।
  2. दुनिया के तमाम देशों में सीफूड की मांग अगले कुछ सालों में दो गुनी हो जाएगी।
  3. मांग बढ़ने से इन देशों का सीफूड निर्यात बढ़ेगा।
  4. निर्यात से प्रत्यक्ष रोजगार में वृद्धि होगी।
  5. निर्यात मानदंडो पर खरा न उतरने वाला सीफूड स्थानीय बाजार में उपलब्ध होगा।
  6. इससे खांंद्य संकट फौरी तौर पर हल होगा।

2017 का बजट:-अर्थव्यवस्था के ठीक से चलने के संकेतो में से एक यह है कि सरकार के बजट का ज्यादा महत्व नहीं होना चाहिए। यह बात तो पक्की है कि सरकार के खर्च और कर योजना का अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा असर होता है। फिर भी सरकार की इस वार्षिक कवायद से अर्थव्यवस्था अथवा औद्योगिक क्षेत्र अत्यधिक बदले नहीं जाने चाहिए। ऐसा बदलाव नहीं होना चाहिए कि हर वर्ष अनिश्चितता बनी रहे।

कम से कम 2017 के बजट में तो हम यह सब टालने में कामयाब रहे। आखिरकार हमारे सामने ऐसा बजट है, जो बुनियादी बातों को लेकर वृहद चित्र पेश करता है। वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) की अपेक्षा में वित्तमंत्री ने एक्साइज और दर्जनों अन्य अप्रत्यक्ष कर दरों में बदलाव से बचना उचित समझा, जो अनिवार्य रूप से हर साल किया जाता है। इस तरह यह ऐसा भी बजट था कि जिसने वित्तमंत्री को सैंटा क्लॉज और कठोर हैडमास्टर के मिले-जुले रूप में प्रस्तुत नहीं किया। ये दो रूप इस बात पर निर्भर होते हैं कि आपको बजट से फायदा हुआ अथवा आपने कुछ गंवा दिया।

  • पहली बार भारत में जिस तरह से बिजनेस (कारोबार) किया जाता है, उसे लेकर अनुमान लगाए जा सकते हैं, क्योंकि दरें व शुल्क वार्षिक स्तर पर नहीं बदले। विभिन्न पहलुओं के बीच तीन पहलु स्पष्ट रूप से उभरते हैं- पहला, सरकार को अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) चाहिए और उसे इसके महत्व का अहसास हुआ है। नौकरियों निर्मित करने के लिए और आर्थिक वृद्धि के लिए भी। उन्हें स्थिर नियम, आकर्षक कर दरें, न्यनतम राजनीतिक जोखिम, वैश्विक स्पर्द्धा में टिकने की क्षमता और लालफीताशाही में कमी चाहिए। यदि उन्हें यह सब नहीं मिलता तो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किसी ओर जगह चला जाएगा। विदेशी निवेश प्रोत्साहन बोर्ड (एफआईपीबी) को खत्म करना लालफीताशाही हटने की दिशा में एक कदम है और स्पष्ट संकेत देता है कि हमें एफडीआई चाहिए तथा इसके लिए हम बहुत कुछ करने को तैयार हैं।
  • दूसरा, बजट ने 50 करोड़ रुपए से नीचे के टर्नओवर वाली कंपनियों (जनसमूहों) के लिए कर दर गिराकर 25 फीसदी कर दी। यह लघु और मध्यम उद्यमों के लिए स्वागत योग्य कदम हैं, क्योंकि ये ही हमारी अर्थव्यवस्था के छोटे इंजन (और सबसे बड़े कर अपवंचक भी) हैं। वित्तमंत्री को उम्मीद है कि इस कदम से ये उद्यम करारोपण प्रावधानों का अधिक पालन करेंगे और अपने मुनाफे और वृद्धि की संभावनाएं बढ़ा सकेंगे। यह कंपनियों को राहत के साथ कराधान बढ़ाने और कालाधन घटाने के कदम के रूप में भी देखा जा सकता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त करने के लिए तो हमेशा कॉर्पोरेट (एक अकेले बड़े समूह में संयुक्त) कर की दर के एशिया-प्रशांत क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा में टिकने के लायक रखनी चाहिए।
  • तीसरा, शायद यह सबसे महत्वपूर्ण कदम है, जिसके तहत चुनावी फंडिंग (ऋण प्रदान करना) की सफाई करने के उद्देश्य से ढेर सारे उपायों की घोषणा की गई है। राजनीतिक दलों को नकदी के रूप में चंदा देने की सीमा 20 हजार रुपए से घटाकर 2 हजार रुपए करना और राजनीति चंदे के लिए बॉन्ड (मार्का) लाना (ताकि दानदाता के राजनीतिक झुकाव को छिपाकर भी लेन-देन को वैध रखा जा सके) दो साहसी उपाय हैं। जहां इन कदमों का असर सीमित ही रहेगा लेकिन, फिर भी कहना होगा कि ये अप्रत्याक्षित हैं। किसी भी सरकार ने हाल के इतिहास में अपने ही हाथ बांध कर अपने राजनीतिक दल के लिए नकदी आसान राह रोकने जैसा कदम उठाया हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। नकदी में दो हजार रुपए का चंदा देने की छूट का भी दुरुप्रयोग किया जा सकता हे। फिर भी ये सुधार सही दिशा में उठाए गए कदम हैं। हमें चुनाव में धन लगाने की प्रणाली को पूरी तरह ठीक करने के लिए और भी बहुत कुछ करने की जरूरत लेकिन धीरे-धीरे बढ़ाए जा सकने वाले परिवर्तन, बिल्कुल ही बदलाव न लाने से तो बेहतर हैं। अब तक तो इस संबंध में कोई सरकार बात तक करने को राजी नहीं होती थी।

वित्तमंत्री अरूण जेटली यदि राजनीतिक चंदे के साथ आधार कार्ड की अनिवार्यता की घोषणा भी करते तो और पेनी नजर रखी जा सकती थी।

सारांश-

  • बजट ने अन्य आम पहलुओं को तो छुआ ही है-बुनियादी ढांचे का खर्च, ग्रामीण विकास के लिए कार्यक्रम और अन्य लोक कल्याणकारी योजनाएं। इससे वृद्धि दर बनाए ंरखने, नौकरियों निर्मित करने और उम्मीद बनाएं रखने में मदद मिलेगी। किन्तु कुल मिलाकर इस साल का बजट यहां-वहां छेड़छाड़ करने की बजाय नीति और रणनीति दिशा देने वाला अधिक है, जो बहुत अच्छी बात है। सबसे अच्छा बजट तो वही होता है, जिनमें कुछ अच्छी योजनाएं हों, चौंकाने वाले खतरनाक कदम न हो और जो बिजनेस (कारोबार) को पहले की तरह जारी रहने दे।
  • 2017 का बजट उन चंद बजटों में शुमार किया जाएगा, जो यह सब हासिल करने में कामयाब रहा। यह वह बजट है जो शायद यह संकेत देगा कि भारत आखिरकार परिपक्व और स्थिर अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित हो रहा है। जब अर्थव्यवस्था को लेकर नीतिगत अनिश्चतता खत्म होती है, तो वह परिवक्व नज़र आती है।
  • वित्तमंत्री ने विभन्न कर दरों में अधिक फेरबदल करने की बजाय नीतिगत दिशा पर ध्यान केंद्रित रखा।

चेतन भगत, अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार

  • किसान आंदोलनों की आशा थी कि इस बार किसानों की न्यूनतम आमदनी के बारे में कुछ घोषणा होगी। पिछले साल सरकार के अपने आर्थिक सर्वे ने माना था कि देश के 17 राज्यों में किसान परिवार की औसत आय 20 हजार रुपए से भी कम थी। सरकार खुद मानती है कि अधिकांश किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलता है। किसान आंदोलन कई साल से मांग कर रहे हैं कि किसान की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने का कानून बनाए। और कुछ नही ंतो किसान की आय तय करने के लिए कमीशन (आयोग) तो बना ही दे। वित्त मंत्री इस बड़े सवाल पर चुप्पी साध गए। बस पिछले साल का जुमला दोबारा उछाल दिया-अगले 5 साल में किसान की आमदनी दोगुनी कर दी जाएगी। कौन करेगा, कैसे होगा ये कुछ नहीं बताया। दूसरी उम्मीद थी कि कर्जे में डूबे किसान को कोई बड़ी राहत मिलेगी। 4 साल पहले भारत सरकार के सर्वे ने पाया था कि देश के 52 प्रतिशत किसान कर्ज के बोझ से दबे हैं। हर परिवार पर औसतन 47,000 रुपए का कर्ज था। कर्ज का बोझ किसान को आत्महत्या की तरफ धकेलता है।
  • सरकार चाहती तो 2007 की तरह कर्ज माफी की घोषणा कर सकती थी। संवदेनशील होती तो साहूकार के कर्ज को बैंको में स्थानातंरण करा सकती थी और कुछ नही ंतो कर्ज का ब्याज माफ कर सकती थी। प्राकृतिक आपदा की मार से किसान को बचाने की कोई व्यवस्था की जाएगी। पिछले 10 वर्षो में जलवायु परिवर्तन से बाढ़, सूखा और ओलावृष्टि बढ़ गई है। एक फसल खराब होने से किसान बर्बादी के कगार पर आ जाता है। इससे बचने की कोई पुख्ता व्यवस्था सुझाने के बजाय वित्त मंत्री ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के आंकड़े सुना दिए। कहा कि सरकार ने बजट की तुलना में दोगुने से ज्यादा खर्च किया। यह नहीं बताया कि इसमें से कितना पैसा किसानों के जेब में गया और कितना बीमा कंपनियों (जनसमूहों) के। सच ये है कि देश भर में किसानों का जबरदस्ती बीमा किया गया और बीमें में शर्त ऐसी थी कि किसान को जितनी राशि मिलनी चाहिए थी, नहीं मिली। प्राकृतिक आपदा छोड़िए, वित्त मंत्री ने उस आपदा से भी राहत नहीं दी जो उनकी सरकार ने बनाई थी। नोटबंदी के चलते किसानों की फसलों के दाम गिरे, रबी की फसल की बुआई में देरी से किसानों को हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। उस नुकसान की भरपाई सरकार का पहला धर्म था। वित्त मंत्री ने इसकी जरूरत नहीं समझी। अरूण जेटली का बजट समझते-समझते मुझे भारत की सत्ता का चरित्र भी समझ में आ गया। किसान आंदोलन की दशा और भविष्य की दिशा भी समझ आ गई।
  • लगता था कि नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री अपने आप को गरीब और किसान के हितैषी साबित करना चाहेंगे। किसी बड़ी ‘गरीबी हटाओ’ योजना की घोषणा करेंगे और उनका मत अपनी तरफ खींच लेंगे। ऐसा करने का आखिरी मौका 2017 का बजट था।

योगेन्द्र यादव, विरष्ठ टिप्पणीकार, राजनीतिक विश्लेषक तथा स्वराज इंडिया (भारत) व जय किसान आंदोलन राष्ट्रीय अध्यक्ष

अनिवार्य न्यूनतम आय:-

  • दुनियाभर में इन दिनों आय की अनिवार्य न्यूनतम सीमा पर बात हो रही है। इसके तहत नागरिकों को तय रकम हर महीने देने पर विचार हो रहा है। हालांकि, स्विट्‌जरलैंड की जनता ने इस विचार को सिरे से नकार दिया है और फिनलैंड में इस पर प्रयोग जारी है। भारत में अभी इस पर बातचीत शुरू हैं। अनिवार्य आय के दायरे म65 प्रतिशत कामकाजी आबादी आती है।
  • 2016 - 17 के आर्थिक सर्वेक्षण में एक पूरा अध्याय ‘सार्वभौमिक बेसिक इनकम (बुनियादी आय) : अ (एक) कन्वर्सेशन (रूपांतरण) विद एंड (और) विद (पक्ष में) इन (में) द (यह) महात्मा’ के विचार पर है। इस अध्याय में महात्मा गांधी के सामाजिक कल्याण संबंधी विचारों के माध्यम से कामकाजी आबादी और गरीबों के लिए सुरक्षित आर्थिक नीति की जरूरत पर बल दिया गया है। आर्थिक सर्वे में बेसिक इनकम (बुनियादी आय) की कोई साफ सीमा नहीं दी गई है, लेकिन यह 3 हजार रुपए से 12 हजार रुपए सालाना के बीच कुछ भी हो सकती है।
  • क्या है अनिवार्य न्यूनतम आय योजना-देश की कामकाजी आबादी को एक निश्चित रकम हर महीने देने की योजना। चाहे वह व्यक्ति काम करता हो, या न करता हो। कई विकसित देशों में इस तरह के उदाहरण हैं, और कई देश इस ओर कदम बढ़ा रहे है। योजना के तहत सभी व्यस्कों को बिना किसी शर्त के निश्चित भुगतान करने का प्रस्ताव होता है। चाहे वे काम करते हो, या बेरोजगार हो।
  • स्विट्‌जरलैंड-में बीते सप्ताह हुए रैफरेंडम (किसी विशिष्ट राजनीतिक मुद्दे पर जनमत संग्रह) में 77 फीसदी लोगों ने इस योजना का विरोध किया, जबकि महज 23 प्रतिशत ने ही पक्ष में मत दिए। स्विट्‌जरलैंड में हर व्यक्ति को प्रतिमाह 1.73 लाख रुपए देने का प्रस्ताव था। स्विस सरकार ने 43000 रुपए हर बच्चे को देने की योजना बनाई थी।
  • फिनलैंड-इस सप्ताह में फिनलैंड में भी अनिवार्य आय की योजना लागू हुई है। यह फिलहाल कुछ क्षेत्रों में दो साल के लिए लागू की गई है। फिलहाल योजना का लाभ 2000 बेरोजगार नागरिकों को दिया जा रहा है। 40000 रु. हर माह भुगतान 25 से 58 साल की उम्र के बेरोजगारों को।

5 मानदंडो पक्ष व विपक्ष में निम्न हैं-

नौकरी में पड़ेगा असर-

पक्ष-देश में फिलहाल नौकरियों की कमी। कई क्षेत्रों में छंटनी हो रही है। वजह है कामगारों की पुरानी तकनीक। वर्ल्ड इकॉनामिक (विश्व अर्थशास्त्र) फोरम (विशेष गठन) की ताजा रिपोर्ट (विवरण) के मुताबिक, भारत में छंटनी का दौर कुछ समय जारी रहेगा। इस समुदाय की सहायता के लिए अनिवार्य न्यूनतम आय अच्छा विचार हो सकता है।

विपक्ष- इस तरह की नीति से कामकाजी आबादी सुस्त होगी। कामगारों में काम के प्रति समर्पण की भावना कम होगी। यह आबादी न्यूनतम आय का लाभ लेने के लिए असंगठित क्षेत्रों में काम को तरजीह देगी। इससे अर्थव्यवस्था पर नकरात्मक असर पड़ेगा, जो लंबा भी हो सकता है।

  • क्रियान्वय की दिक्कत-

पक्ष- ताजा आर्थिक सर्वे बताता है कि 40 से 65 प्रतिशत लक्षित आबादी को खाद्य सब्सिडी (आर्थिक सहायता) और रोजगार गारंटी का लाभ नहीं मिलता। न्यूनतम अनिवार्य आय देश की 75 प्रतिशत आबादी के लिए क्रांतिकारी कदम होगा। यह सीधे बैंक खाते में पहुंचेगी। इसलिए गलत इस्तेमाल न्यूनतम होगा।

विपक्ष-इसे कामकाजी आबादी तक सीमित किया जाता है, तो कैसे लागू होगा? गर्भवती महिला, विधवा, वरिष्ठ नागरिक, मानसिक रूप से कमजोर तबको के मसले अलग है। इन्हें विशेष सुविधा की दरकार है। कामकाजी आबादी के उपसमूह सही क्रियान्वयन के अभाव में लाभ से वंचित होंगे।

  • सीधे पहुंच जनता तक-

पक्ष- क्रियान्वयन के स्तर पर मोबाइल, आधारकार्ड और जनधन योजना के जरिये इसका सीधा लाभ मिल सकता है। सीधा और बिना किसी बिचौलिये के लाभ अगर लोगों तक पहुंचेगा तो यह न्यूनतम आय की योजना जनता के लिए राहत भरी होगी। जाहिर है डिजिटल (अंको द्वारा संख्या) इंडिया (भारत) को भी बढ़ावा मिलेगा।

विपक्ष- आंकड़े बताते हैं कि पांच में से महज एक ही भारतीय के पास जनधन खाता है। इनमें से भी 60 प्रतिशत ही आधार से जुड़े है। यानी योजना का क्रियान्वयव फिलहाल नामुमकिन है। पहली बात तो लोगों तक पहुंचना ही मुश्किल काम होगा। इसके लिए एजेंसियों (कार्यस्थानों) की मदद भ्रष्टाचार बढ़ाएगी।

  • पैसे का इस्तेमाल और पहुंच-

पक्ष- डायरेक्ट कैश (सीधे नकद) स्थानान्तरण से लोग पैसे का इस्तेमाल अपनी मर्जी के मुताबिक कहीं भी कर सकेंगे। कुछ लोगों का तर्क है कि इसका इस्तेमाल खराब और तंबाकू पर होगा, लेकिन जमीनी सर्वे बताते हैं कि गांवों में अनिवार्य आय का इस्तेमाल स्वास्थ्य, नए उद्यम और बच्चों पर किया जाता है।

विपक्ष-देश के कई हिस्सों में पहले भी ऐसी योजनाओं का पैसा लोगों तक न पहुंचने के उदाहरण देखने को मिले है। एएलजे वार्टी एक्शन लैब की रिपोर्ट के मुताबिक चंडीगढ़ और पॉडिंचेरी में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत आधे से ज्यादा लोगों को योजना का लाभ नहीं मिला था।

  • एक और लोकलुभावन योजना-

पक्ष-वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सब्सिडी लोगों को सीधे चेक के माध्यम से देने की बात कही थी और इससे गरीबों को हुए फायदे के आंकड़े भी पेश किए थे। न्यूनतम अनिवार्य आय की योजना भी इसका एक और उदाहरण होगी। इससे निर्धन समुदाय को ज्यादा फायदा होगा।

विपक्ष- बजट के दिन ही जेटली ने कहा था कि भारतीय राजनीति अभी इतनी परिपक्व नहीं है कि सभी के लाभ के लिए एकजुट हो पाए। जाहिर है कि नई योजना पर भी राजनीति का असर दिखाई देगा। लागू होने से पहले भी और क्रियान्वयन में भी निचले स्तर तक राजनीति हावी होगी।

  • नई दिल्ली:- क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि दुनिया की सबसे अधिक जनसंख्या, सबसे ज्यादा क्षेत्रफल और ड्रग (दवा) की समस्या से लड़ने वाले देश के प्रमुखों के पास पढ़ने के लिए कितना समय होता होगा। लेकिन ऐसा नहीं है, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुर्तेते अपने कीमती समय में भी पढ़ने के शौक को पूरा करने के लिए समय निकाल ही लेते है।
  • चीन- चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को माओ से तुंग और देंग शियाओपिंग के साथ शक्तिशाली कम्युनिस्ट पार्टी (राजनीतिक दल) के कोर सदस्य के रूप में पदोन्नत किया गया है। फोर्ब्स ने 2016 में उन्हें चौथा सबसे शक्तिशाली व्यक्ति चुना गया।

किताब निम्न हैं-

‘यू फी मदर टैटूइंग ऑन हीज बैक’ 6 वर्ष की उम्र में जिनपिंग ने यह किताब पढ़ी। इसमें दक्षिणी सांग राजवंश के जनरल यू फी की कहानी है।

‘व्हाट इज टू बी डन’ 1863 में प्रकाशित किताब ने रूसी राजनीति और साहित्य में महत्वपूर्ण प्रभाव डाला था।

  • रूस-रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 1999 से रूस के राष्ट्रपति या पीएम के रूप में पदस्थ हैं। फोर्ब्स ने 2016 में उन्हें दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बताया था। वह जूडो में पांच डिग्री (उपाधि) ब्लैक बेल्ट (जूडो/कराटे में सर्वश्रेष्ठ विजेता द्वारा पहली जाने वाली काली कमरबंद) और कराटे में आठ डिग्री ब्लैक बेल्ट हैं।

किताब निम्न हैं-

‘द वाइन ऑफ विजडम’ किताब में फारसी कवि और दार्शनिक उमर खय्याम के जीवन और कृतियों का इतिहास है।

‘स्केच फ्राम ए हंटर एलबम’ किताब में 19वीं सदी में रूस में शिकार के सार का एक स्नैपशॉट है।

  • फिलीपींस- के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुर्तेते ड्रग तस्करों को मरवाने के लिए जाने जाते हैं।

किताब निम्न हैं-

‘एशिया कोलड्रन: द साउथ चाइना शी एंड द एंड ऑफ ए स्टेबल पैसिफिक’ किताब में मैप के जरिए बताया गया है कि कैसे सत्ता का केंद्र पश्चिम से एशिया में शिफ्ट (परिवर्तन) हो गया।

एल नारकोस: द ब्लडी राइज ऑफ मैक्सिकन ड्रग कार्टेल्स ′ मैक्सिको में ड्रग वार (दवा युद्ध) को कवर (आवरण) करने वाले एक पत्रकार ने लिखी है।

अमरीका पत्रकार:- वाल्टर लेलैंड क्रोनकिटे 19वीं शताब्दी में अमरीकी ब्रॉडकास्टिंग (प्रसारण) मीडिया (संचार माध्यम) के बड़े चेहरे के तौर पर उभरे। उन्होंने बतौर रेडियो प्रस्तोता कॅरियर (पेशे) की शुरुआत की और 1937 में अंतरराष्ट्रीय यूनाइटेड (संयुक्त, मिला हुआ) प्रेस (दबाव) से जुड़े। दूसरा विश्व युद्ध वियतनाम युद्ध, उत्तरी अफ्रीका और यूरोप के बीच के गृहयुद्ध को कवर (आवरण) करने वाले विश्व के शीर्ष पत्रकारों में शुमार हुए। रेडियो और टेलीविजन पत्रकारिता के लिए उन्हें ′ जॉर्ज पॉल्क अवॉडर् (पुरस्कार) , पॉल राइट अवॉर्ड से लेकर कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया।

जन्म-4 नवंबर 1916

मृत्यु- 17 जुलाई 2009

अमरीका पत्रकार वाल्टर लेलैंड क्रोनकिटे के विषय में मुख्य बाते निम्न हैं-

  • 1962 - 1981 - 19 सालों तक सीबीएस न्यूज (समाचार) में एकरिंग
  • 1937 - 1981- तक कई बड़ी घटनाओं को कवर (आवरण) किया
  • 1984-एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी (राज्य विश्वविद्यालय) ने पत्रकारिता कॉलेज (महाविद्यालय) का नाम क्रोनकिटे के नाम पर रखा।

इन ऐतिहासिक घटनाओं को किया कवर-

  • सेकंड वर्ल्ड वार (दव्तीय विश्व युद्ध)
  • वियतनाम वार (युद्ध)
  • डावसन हाइजैकिंग
  • वाटरगेटकांड
  • ईरान बंधन संकट
  • यूएस स्पेस प्रोग्राम (अंतरिक्ष कार्यक्रम)

वाल्टर लेलैंड ने ही दुनिया को सबसे पहले सीबीएस चैनल के जरिए अमरीका के 35वें राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी की हत्या की सूचना दी। उस समय टीवी पर केनेडी के काफिले पर गोलीबारी का बुलेटिन चल रहा था, तभी लेलैंड जोर से चिल्लाये और बुलेटिन को बीच में रोककर फटाफट कैमरा उनकी तरफ लाया गया और दुनिया कैनेडी की हत्या के बारे में जान पाई। ली हार्वी ऑस्वाल्ड नामक हत्यारे ने 22 नवंबर 1963 को डेलास शहर से गुजरते समस केनेडी के काफिले पर हमला कर उनकी हत्या कर दी थी।

  • मेमोरियल-4 नवंबर 2013 को सेंट जोसेफ में मिसौरी पश्चिमी स्टेट (राज्य) विश्वविद्यालय ने लेलैंड की याद में 6,000 वर्ग फीट का मेमोरियल (स्मारक) बनाया। इसमें लेलैंड की जिंदगी और पत्रकारिता के पहलुओं को उभारा गया। मेमोरियल में उनके 1960 से 70 के दशक के न्यूजरूम (समाचार कमरा) वीडियो (चित्रमुद्रण) , कवरेज (विषयवृत्तांत) के दौरान की तस्वीरों को सजाया गया।
  • पत्रकारिता की शुरूआत-लेलैंड ने विश्वविद्यालय ऑफ टेक्सास की पढ़ाई बीच में ही अधूरी छोड़कर पत्रकारिता में कदम रखा। उन्होंने ओक्लाहोमा सिटी और कैनसस सिटी में रेडियो प्रस्तोता का काम किया। कैनसस सिटी में ‘वाल्टर विनकॉक्स’ के नाम से रेडियों में काम किया और खेल की खबरों के प्रस्तोता बनें।
  • अफगानिस्तान:- भारत विरोधी अफगानिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री गुलबुद्दीन हिकमतयार का राजनीतिक रास्ता साफ हो गया है। संयुक्त राष्ट्र ने उसका नाम आईएसआईएस और अलकायदा प्रतिबंधित सूची से हटा दिया है। ऐसे में अब उनकी जब्त संपत्ति, यात्रा पर लगी रोक और हथियारों पर लगी पाबंदी हट जाएगी। जल्द ही गुलबुद्दीन 20 साल बाद अफगानिस्तान लौटकर सक्रिय राजनीति में भाग ले सकते हैं।

चर्चा में-

यूएन 14 साल बाद आतंकी लिस्ट (सूची) से हटाया नाम।

जन्म 26 जुलाई 1947- हिज्ब -ए इस्लामी पार्टी (राजनीतिक दल) के संस्थापक

अफगानिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री गुलबुद्दीन हिकमतयार के जीवन विषय में मुख्य बाते निम्न हैं-

  • 1973 -में सजा से बचने के लिए अफगानिस्तान से पाकिस्तान आया।
  • 1992 - 1996-गृह युद्ध में काबुल में 50,000 नागरिकों की मौत का आरोपी
  • 1993-में एक साल के लिए अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री बने।
  • 1970 - 1972- काबुल विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई अधूरी छोड़ी।

67 साल के हिकमतयार को 20 जनवरी 2003 को आतंकी सूची में शामिल किया गया था। वे 2011 तक अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में थे। उन्होंने पिछले साल सितंबर में अफगानिस्तान सरकार के साथ एक ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। ऐसे में अब वे कुछ सप्ताह बाद अफगानिस्तान लौट सकता हैं और फिर से राजनीति का रास्ता भी तैयार हो गया है। उन्हें काबुल का कसाई भी बुलाया जाता है।

  • घनिष्ठ संबंध- हिकमतयार 1997 से छिप कर रह रहा हैं माना जा रहा है कि वह इस समय पाकिस्तान में हैं। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (कार्यस्थान) आईएसआई से उनका घनिष्ठ संबंध है और भारत विरोधी अभियान में वह आईएसआई की मदद करता हैं। उन्होंने 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत संघ के कब्जे का विरोध किया। उस पर साल 1992 - 1996 तक चले गृह युद्ध में हजारों लोगों की जान लेना का आरोप हैं।

नागालैंड:-

  • नागालैंड में स्थानीय निकायों के चुनाव में भड़की हिंसा संविधान में आदिवासी इलाकों को दी गई स्वायत्ता और समाज सुधार के सरकारी प्रयास के बीच दव्ंदव् है। इसलिए इस मुद्दे को महज राजनीतिक कहकर नहीं टाल सकते। नागालैंड में महिलाएं लंबे समय से स्थानीय निकायों में आरक्षण की मांग कर रही हैं। अब जब दिसंबर 2016 में नागालैंड पीपुल्स (लोग) फ्रंट और भाजपा की गठबंधन की सरकार के मुख्यमंत्री टीआर जिलियांग ने महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया तो आदिवासी समाज का पारस्परिक संगठन भड़क उठा। उसका कहना है कि अनुच्छेद 234 (टी) के तहत दिया गया यह आरक्षण पूर्वोत्तर के आदिवासी क्षेत्र नागालैंड को संविधान के अनुच्छेद 371 (ए) के तहत दिए गए विशेषाधिकार का उल्लंघन है। पूर्वोत्तर के ये इलाके संविधान की छठी अनुसूची में आते हैं जहां पर राज्यपाल की मंजूरी के बिना केंद्र और राज्य सरकार का कोई कानून लागू नहीं किया जा सकता। इसके अलावा 371 (ए) आदिवासियों को अपनी परंपरा और रीति-रिवाज की हिफ़ाजत का भी अधिकार देता है। अब उनके कौन से अधिकार पारम्परिक हैं और कौन से रीति-रिवाज पुराने हैं, इसका फैसला वहां रह रही 18 आदिवासी जातियों के संगठन मिल-जुलकर करते हैं।
  • मुख्यमंत्री टीआर जिलयांग कह रहे हैं कि स्थानीय निकायों का गठन आधुनिक है इसलिए उन्हें आदिवासियों की परंपरा और प्रथा के दायरे में नहीं ला सकते। लेकिन नागालैंड के पारम्परिक आदिवासी संगठन को यह आरक्षण स्वीकार नहीं है। और इसके विरोध में उन्होंने कोहिता में नगर पालिका का कार्यालय फूंका और मुख्यमंत्री आवास पर भी हमला किया। विरोध का आलम यह है कि 1 फरवरी का चुनाव बारह घंटे के बंद के दौरान किया गया। इस समय पूर्वोत्तर का आदिवासी समाज ही नहीं भारत के अन्य समाज भी अजीब से दव्ंदव् में उलझे हुए हैं। एक तरफ उनकी महिलाएं अपना अधिकार मांग रही हैं तो दूसरी तरफ उनकी जातीय पंचायते अपने पारम्परिक हक के नाम पर उन्हें वह देने से इनकार कर रही हैं। हमारा संविधान विशेषधिकार और सामाजिक क्रांति के बीच उलझ गया है। उससे एक समझदारी भरा रास्ता निकालने के लिए गहरे राजनीतिक विवेक की जरूरत है और शांंयद उसे दर्शाने में राजनेता नाकाम रहे हैं। यही वजह है कि आज नागालैंड जल रहा है।

अमरीका कूटनीति:-

  • ट्रंप बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया को क्या दिखाना चाहते हैं, यह वे खुद ही जानते हैं। उन्हें आए एक महीना भी पूरा नहीं हुआ और अमेरिका के उन देशों से संबंध बिगड़ने लगे, जो उनके घनिष्ठ हैं और जो विपदा में उसके साथ खड़े रहे हैं। बराक ओबामा ने संबंधों को मजबूत बनाने का काम किया था, लेकिन अब ऐसा नहीं लगता। इसका बुरा असर उन राजनयिकों पर पड़ रहा है, जो विभिन्न देशों में तैनात हैं। ट्रंप ने कूटनीति को मजाक बना दिया है, जबकि उन्हें इसकी गंभीरता का जरा भी अनुभव नहीं है।
  • व्हाइट हाउस स्थित अपने ओवल कार्यालय में राष्ट्रपति ट्रंप फोन पर विश्व नेताओं से चर्चा करने लगे हैं। ऐसा करते हुए उन्हें कुछ ही सप्ताह हुए हैं और उनकी बातचीत से दुनिया परेशान होने लगी है। ऐसा इसलिए क्योंकि ट्रंप अपने सहयोगी देशों के शीर्ष नेताओं के सम्मान की भी परवाह नहीं करते हैं। फोन पर ही उनका अपमान करते हैं और मीडिया (संचार माध्यम) में उसकी जानकारी भेजते हैं। वे लगातार अचंभित करने वाली बातें कर रहे हैं, जो कहीं न कहीं सहयोगी देशों में गलत भावना का प्रसार कर रही है। बतौर राष्ट्रपति ट्रंप को यह समझना होगा कि उनके लिए सहयोगियों का साथ बहुत जरूरी है। वे लगातार फोन पर बातचीत करके उनका अपमान नहीं कर सकते हैं। ट्रंप को यह भी समझना जरूरी होगा कि उनका प्रशासन उन ‘कोर (गहराई तक) पोजीशन’ (स्थित) से यूं ही नहीं हट सकता, जहां ओबामा प्रशासन ने अमेरिका को रखा था।
  • उदाहरण के तौर पर पिछले सप्ताह ट्रंप प्रशासन ने रूस को इस बात के लिए सतर्क किया कि वह पूर्वी यूक्रेन में अपनी भूमिका निभाने में ढिलाई न बरते। इसके अतिरिक्त ट्रंप प्रशासन ने गाजा और फिलिस्तीनी क्षेत्र में इजरायली गतिविधियों (खासतौर बसाहट को लेकर) पर भी कम गौरे करने के संकेत दिए। अभी तक तो जो दिख रहा है, उससे पता चलता है कि विदेशी संबंध निभाने को लेकर ट्रंप झगड़ालू प्रवृत्ति के दिखाई देते हैं। उनके गलत फैसलों में सबसे ज्यादा पथभ्रष्ट फैसला सात मुस्लिम देशों के लोगों पर ‘पाबंदी’ लगाना का रहा है। इससे यह प्रदर्शित होता है। कि अमेरिका कहीं न कहीं कमजोर है।
  • राष्ट्रपति ट्रंप का अमेरिकी छवि पर क्या असर हो रहा है, यह जानने के लिए यूरोप में हो रहे विरोध प्रदर्शन काफी हैं। यह रैलियों के रूप में नहीं, बल्कि खबरों के प्रसारण के रूप में नजर आ रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के व्यवहार का खामियाजा उन राजनयिकों को भुगतना पड़ रहा है, जो विदेश में तैनात हैं। उनके पास कई ऐसे सवाल हैं, जिनके वे जवाब नहीं दे सकते हैं।

ट्रंप के दो फोन कॉल को समझना जरूरी है जिनसे सहयोगियों के साथ-संबंधों पर असर पड़ेगा-

  • पहला, राष्ट्रपति ट्रंप ने सबसे पहले मैक्सिको (तीसरा बड़ा कारोबारी सहयोगी) को निशाने पर लिया। वहां के राष्ट्रपति ने एनरिक निएतों ने ट्रंप प्रशासन से मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने के लिए बात करनी चाही तो व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने साफ कह दिया कि मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने के लिए पैसों की व्यवस्था का योजना लेकर ही आएं। यह बाद सुनने के बाद निएतो के लिए वाशिंगटन यात्रा रद्द करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं था। निएतो से बातीचीत में ट्रंप ने मैक्सिको सीमा पर ऐसी सेना तैनात करने की धमकी दे डाली थी, जो उधर से आने वाले ‘खराब लोगों’ से सीमा की रक्षं करेगी। बाद में ट्रंप के सहयोगियों ने कहा कि वह तो मात्र मजाक था।
  • दूसरा- ट्रंप ने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल को भी निशाने पर लिया। टर्नबुल और बराक ओबामा के बीच अच्छी बातचीत होती रही है और ऑस्ट्रेलिया भी अमेरिका के घनिष्ठ सहयोगियों में से एक है। टर्नबुल और ओबामा ने 20 जनवरी के पहले शरणार्थियों को ऐसे दव्ीप पर बसाने पर सहमति जताई थी, जिस पर ऑस्ट्रेलिया का नियंत्रण था। ट्रंप उन्हीं टर्नबुल पर फूट पड़े। इस बातचीत के अगले दिन कोई अफसोस नहीं जताया गया। यह ऐसे देश की बात थी, जिसने इराक, अफगानिस्तान युद्ध और खुफिया मामलों में बिना सवाल किए अमेरिकी की हर बात मानी। इस फोन कॉल के बारे में उन्होंने कहा - ‘क्या मैंने ज्यादा सख्ती दिखाई? इसकी बिल्कुल चिंता करने की जरूरत नहीं है।’

ट्रंप प्रशासन के अधिकारी उनकी भाषा बोलने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत निक्की हैली ने चेतावनी दी है कि उन सहयोगियों की सूची बन रही है, जिन्हें अमेरिका की जरूरत नहीं है।

  • सारांश-ट्रंप और उनके प्रशासन ने अगर ऐसा ही झगड़ालू रवैया अपनाना जारी रखा, तो बहुत जल्द घनिष्ठ एवं मित्र देशों के साथ रिश्ते कड़वाहठ में बदल जाएंगे। अमेरिका विरोधी नेताओं की संख्या बढ़ने लगेगी। जब समय आएगा, तब संभव है कि इन्हीं ट्रंप को अपने परंपरागत सहयोगियों और मित्र देशों को सहयोग देने के लिए आगह करना पड़े। इसमें उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वे उस लाइन (रेखा) के अंतिम छोर पर खड़े रह जाएं, जहां तक पहुंचते ही फोन कॉल (फ़ोन करना) अचानक बंद हो जाते हैं।

अमरीका में इमीग्रेशन बैन (अप्रवासी प्रतिबंध) :-

  • इमीग्रेशन बैन पर जारी विवाद के बीच अमेरिका की 97 कंपनियों ने राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ मुकदमा ठोक दिया। इनमें एपल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट शामिल हैं। इनमें से अधिकतर कंपनियों इमीग्रेंट्‌स (अप्रवासीयों) ने खड़ी की है। उन्होंने न्यायालय में दावा किया कि राष्ट्रपति का आदेश संविधान के खिलाफ है। फिर आंकड़ों का हवाला देकर जताया कि अगर इन कंपनियों को मुश्किल होती है तो अमेरिकी इकोनॉमी (अर्थशास्त्री) को 23 प्रतिशत तक झटका लग सकता हैं।
  • न्यायालय में पेश कागजात के मुताबिक फॉर्च्यून (भाग्य) -500 में शामिल 200 कंपनियों (जनसमूहों) इमीग्रेंट्‌ेस की हैं। ये मिलकर अमेरिकी जीडीपी (सकल घरेलु उत्पादन) में सालाना 282 लाख करोड़ रु. यानी, 23.3 प्रतिशत योगदान देती हैं। इस समय अमेरिकी जीडीपी करीब 1200 लाख करोड़ रु. है। इसमें इमीग्रेंट्‌स का योगदान भारत की पूरी इकोनॉमी (करीब 154 लाख करोड़) का करीब दोगुना है। एक रिपोर्ट (विवरण देना) के मुताबिक इमीग्रेंट्‌स के आने से अमेरिका को नुकसान नहीं हुआ। अगर यहां 1000 इमीग्रेंट्‌स आते हैं तो 1200 नए जॉब क्रिएट (नौकरी, उत्पन्न करना) होते हैं।

इमीग्रेंट्‌स-

  • अमेरिका में 4.3 करोड़ इमीग्रेंट्‌स हैं। इनमें से 1.11 करोड़ अवैध हैं। ट्रंप ने अवैध इमीग्रेंट्‌स को देश से निकालने की घोषणा कर रखी है। सात देशों के लोगों पर 120 दिन तक देश में आने पर रोक लगा दी है। उनके इसी आदेश को 97 कंपनियों ने चुनौती दी है। अमेरिकन एक्शन (गतिविधि/कार्यशैली) फोरम (तैयार, विशेष गठन) की रिपोर्ट के मुताबिक अगर अमेरिका सभी अवैध इमीग्रेंट्‌स को देश से निकालने की प्रक्रिया शुरू करता है तो इसमें 20 साल लग जाएंगे और 27 लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे।
  • इमीग्रेंट्‌स पर रोक का फैसला लेने वाले ट्रंप की पत्नी स्लोवेनिया से हैं। ट्रंप खुद स्कॉटिश महिला की संतान हैं। जबकि उनके पिता जर्मन नागरिक थे। ग्रैंडपैरेंट्‌स और मां का जन्म यूरोप में हुआ था। ट्रंप के परदादा जर्मनी से अमेरिका गए थे।

इमीग्रेंट्‌स कंपनियां (अप्रवासी जनसमूह) - 40 प्रतिशत कंपनियां इमीग्रेंट्‌स या उनकी अगली पीढ़ी ने खड़ी की हैं। जबकि, पूरे अमेरिका में ऐसे लोगों की संख्या सिर्फ 13 प्रतिशत है। फिर भी इनका कुल रेवेन्यू (राजस्व) करीब 282 लाख करोड़ रु. है। इनमें केवल दो कंपनियों एपल और गूगल का बाजार कैप 83.7 लाख करोड़ रु. है।

Table Showing the Immigrants՚ Top 10 Companies
इमीग्रेंट्‌स की उच्च 10 कंपिनयां
क्पंनीसंस्थापकम्लूा देशबजार कैप (रु. में)
एपलस्टीव जॉब्ससीरिया46.2 लाख करोड़
ग्गूलसर्गेई ब्रिनरूस37.5 लाख करोड़
पी एंड जीजे गैम्बल-वी प्रॉक्टरब्रिटेन15.2 लाख करोड़
टोरेकलबॉब माइनरईरान11.2 लाख करोड़
मैकडोनाल्डसरे क्रॉकच्के7.00 लाख करोड़
गोल्डमैन सैक्समार्कस गोल्डमैनजर्मनी6.77 लाख करोड़
कोलगेटविलियम कोलगेटइंग्लैंड3.93 लाख करोड़
फाइजरचार्ल्स फाइजरजर्मनी5.46 लाख करोड़
याहूजेरी यंगतइवान2.83 लाख करोड़
टेस्ला मोटर्सएलन मस्कद. अफ्रीका2.74 लाख करोड़
  • एलन मस्क ने स्पेस एक्सप्लोरेशन टेक्नोलॉजी कंपनी (अंतरिक्ष खोज यात्रा, तकनीकी विधियां जनसमूह) , -स्पेसएक्स भी बनाई।
  • याहू को खरीदने में लगी वेरिजॉन, क्राफ्ट फूड्‌स, मर्क इंटेल, एटीएंडटी, ड्‌यूपॉन्ट और क्वॉलकॉम जैसी कंपनियां भी प्रवासियों ने बनाई हैं।

योगदान-नेशनल एकेडमीज ऑफ साइंस, इंजीनियरिंग एंड मेडिसन की रिपोर्ट (राष्ट्रीय शैक्षिक, के, विज्ञान, अभिंयता और चिकित्सा संबंधी विवरण) के मुताबिक इमीग्रेंट्‌स और उनकी पीढ़ियों ने अमेरिका की आर्थिक वृद्धि, इनोवेशन (नवीन प्रक्रिया) और उद्यमों के विकास में अहम योगदान दिया है। इमीग्रेशन से अमेरिकी समाज का बुढ़ापा कम करने में मदद मिलती है। ऐसे में अगले 15 साल में श्रम शक्ति की वृद्धि पूरी तरह प्रवासियों और उनकी अगली पीढ़ी पर निर्भर होगी। 25 प्रतिशत कंपनियां परिवहन, आवास, मनोरंजन और सेवा-सत्कार क्षेत्र में प्रवासियों की ही हैं।

कानून- इमीग्रेंट्‌स हर क्षेत्र में हैं, सुरक्षा के लिए कानून भी, अमेरिकी आबादी में इमीग्रेंट्‌स का हिस्सा 13.3 प्रतिशत है। वे यहां हर क्षेत्र में दखल रखते हैं। राज्यों ने इसके लिए खास कानून बनाए हैं। यहां 300 ऐसे शहर हैं, जहां से अवैध प्रवासियों को भी जबरन नहीं निकाला जा सकता। इन्हें ′ सैंक्चुअरी सिटीज ′ (शहर) कहते हें।

Table Showing the Employee Percentage Sector
कर्मचारी प्रतिशत सेक्टर
सेक्टरप्रतिशत
प्रोफेशनल (व्यावसायिक)6.4 %
खनन3.1 %
कृषि वन16.1 %
प्रोडक्शन6.3 %
सूचना2.8 %
कंस्ट्रक्शन (निर्मित वस्तु)12.2 %
रीटेल (खुदरा)4.2 %
फाइनेंस (वित्तीय)2.3 %
सर्विस (सेवा)9.0 %
ट्रैफिक3.3 %
शिक्षा, स्वास्थ्य1.7 %

स्टार्टअप- अमेरिका मेें बिलियन डॉलर स्टार्टअप शुरू करने में भारतीय सबसे आगे है। अमेरिका में 100 करोड़ डॉलर (6722 करोड़ रुपए) से ज्यादा वैल्यूएशन (किसी वस्तु का मूल्य या कीमत निर्धारित करने की क्रिया) वाली स्टार्टअप शुरू करने वाले इमीग्रेंट्‌स में भारतीय सबसे आगे हैं। यहां की बिलियन डॉलर स्टार्टअप कही जाने वाली 87 कंपनियों में से 44 यानी 51 प्रतिशत इमीग्रेंट्‌स ने शुरू कीं। इनमें से 14 भारतीयें ने शुरू की हैं। ‘नेशनल फाउंडेशन फॉर (के लिए) अमेरिकन पॉलिसी’ (राष्ट्रीय नींव नीति) ने इन 44 स्टार्टअप का कुल वैल्यूएशन 11 लाख करोड़ रुपए किया है। अमेरिका में भारतीय मूल के 16 लाख से अधिक लोग रहते हैं।

चीन और भारत- अमेरिका में इमीग्रेंट्‌स भारतीयों ने चीन की तुलना में पांच गुना और ब्रिटेन की तुलना में दो गुना स्टार्टअप शुरू किए। चीन के लोगों ने 3 जबकि ब्रिटेन और कनाड़ा के लोगों ने 8 - 8 स्टार्टअप शुरू किए हैं।

Table Showing the Startup Company
इमीग्रेंट्‌सस्टार्टअप
भारत14
कनाडा8
ब्रिटेन8
इजरायल7
जर्मनी4
चीन3
फ्रांस2
आयरलैंड2

कहां कितने स्टार्टअप है-

  • इमीग्रेंट्‌स ने शुरू किए 44 स्टार्टअप में से सबसे ज्यादा 32 कैलिफोर्निया में।
  • न्यूयॉर्क में छह, मैसाचुसेट्‌स में चार और इलिनॉयस में इमीग्रेंट्‌स की दो स्टार्टअप हैं।
  • 1.5 लाख करोड़ के 11 स्टार्टअप भारतीयों के
  • अमेरिका में अप्रवासी भारतीयों की 11 स्टार्टअप की वैल्यू डेढ़ लाख करोड़ रु. से ज्यादा है। इन 14 भारतीयों में से 8 छात्र के तौर पर अमेरिका गए थे।
Table Showing the Company Founded by
क्पंनीसंस्थापकवैल्यूएशन (किसी वस्तु का मूल्य या कीमत निर्धारित करने की क्रिया) (रुपए में)
एक्टिफियोएश आशुतोष7,342 करोड़
एप डायनामिक्सज्योति बंसल12 हजार करोड़ (4)
ब्लूम एनर्जीके आर श्रीधर19,357 करोड़ (2)
इंस्टाकार्टअपूर्व मेहता13,350 करोड़
जैस्परजहांगीर मोहम्मद9,345 करोड़
मॉड मीडियासमीर अरोरा, राज नारायण6,675 करोड़
मयू सिग्माधीरज राजाराम10 हजार करोड़ (5)
न्यूटानिक्सधीरज पांडे, अजीत सिंह, मोहित ऐरन13,350 करोड़
स्प्रिंकलररैजी थॉमस13,350 करोड़ (3)
जेनेफिट्‌सलक्ष श्रीनि30 हजार करोड़ (1)
जेडस्केलरजय चौधरी6,675 करोड़

न्यायालय-

  • इमीग्रेशन बैन के फैसने के बाद ट्रंप प्रशासन को न्यायालय के कड़े सवालों का सामना करना पड़ रहा है। अमरीकी अपील न्यायालय ने पूछा कि आखिर किन सबूतों के आधार पर मुस्लिम बहुल देशों लोगों पर देश में आने पर प्रतिबंध लगाया गया? क्या वह असंवैधानिक नहीं है। तीनों जजों के पैनल और न्याय विभाग के वकील ऑगस्ट फ्लेत्जे के बीच एक घंटे तक बहस हुई। एक जज ने पूछा कि क्या इस फैसले को मुस्लिम-विरोधी नहीं मानना चाहिए। जबकि ऑगस्ट ने बैन फिर से बहाल करने की अपील की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति को यह तय करने का अधिकार हैं कि देश में कौन आए और कौन नहीं। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशियों के अमेरिका आने के सिलसिले के बीच संतुलन बनाया है। लेकिन बैन पर रोक लगाने के न्यायालय के फैसले से संतुलन बिगड़ रहा है।
  • वॉशिंगटन के वकील नोआह पर्सेल ने बैन का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इमीग्रेशन बैन से उनके प्रांत के हजारों निवासी प्रभावित होंगे। जो छात्र वॉशिंगटन आने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें भी देरी का सामना करना होगा।
  • इस बात पर भी बहस हुई कि अगर यह प्रतिबंध मुस्लिमों को रोकने के लिए है तो यह असंवैधानिक होगा। जज रिचर्ड क्लिफ्टन ने दोनों पक्षों से इस मुद्दे पर पूछा कि क्या इससे दुनिया के केवल 15 प्रतिशत मुसलमान प्रभावित होंगे। इससे पहले जस्टिज (न्यायमूर्ति) डिपार्टमेंट (जिम्मेदारी का क्षेत्र) ने कहा था कि ट्र्रंप का आदेश निष्पक्ष है। इसका किसी खास धर्म से कोई संबंध नहीं है।

लंदन-

  • ज्यादातर यूरोपियन चाहते हैं कि उनके देशों में भी मुस्लिम देशों से लोगों के आने पर ठीक वैसी ही रोक लगे जैसी राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका में लगाई। ब्रिटेन के रॉयल इंस्टीट्‌यूट ऑफ इंटरनेशनल रिसर्च (राजकीय, संस्थान, के लिए, अंतरराष्ट्रीय, खोज) ने यूरोप में यह सर्वे किया है। 10 देशों में हुए सर्वे में 55 प्रतिशत लोगों ने कहा मुस्लिम देशों से आने वालों पर रोक लगनी चाहिए। किसी भी देश ने 32 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने रोक लगने पर असहमति नहीं जताई।
  • सात देशों से आने वालों पर रोक संबंधी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के आदेश के खिलाफ अब 16 राज्यों के एटॉर्नी जनरल भी आ गए हैं। इससे पहले फेसबुक, गूगल, एपल, माइक्रोसॉफ्ट समेत 127 कंपनियां ट्रंप के खिलाफ न्यायालय पहुंच गई। सिएटल न्यायालय ने ट्रंंप के आदेश पर रोक लगा दी थी जिसके खिलाफ ट्रंप प्रशासन ने नाइंथ सर्किट न्यायालय में अपील की थी। इस न्यायालय ने भी ट्रंप प्रशासन को कोई तात्कालिक राहत देने से मना कर दिया था।
  • राष्ट्रपति चुनाव में बुरी तरह हारी डेमोक्रेटिक (लोकतंत्र) पार्टी (राजनीतिक दल) के शासन वाले 16 राज्यों ने ट्रंप के खिलाफ याचिका दायर की है। इन राज्यों में ट्रंप का गृहराज्य न्यूयॉर्क भी शामिल है क्योंकि वह हिलेरी का भी गृहराज्य है।
  • इनका कहना है कि विभिन्न समुदायों को सुरक्षित रखने और अर्थव्यवस्था की रक्षा के लिए ट्रंप के आदेश को चुनौती देना जरूरी है। एटॉर्नी जनरल जोश शापिरो ने कहा है कि पेंसिलवेनिया राज्य की स्थापना ही स्वतंत्रता के आश्वासन पर हुई थी। कोई राष्ट्रपति हमारे संविधान और कानून से ज्यादा ताकतवर नहीं है। एटॉर्नी जनरलों ने कहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप के आदेश से देशभर के शैक्षणिक संस्थानों पर बुरा असर पड़ा है। इलिनॉय की एटॉर्नी जनरल लिसा मेडिगन ने कहा, इलिनॉय करीब 20 लाख इमीग्रेंट्‌स वाला राज्य है। ये लोग राज्य के विकास में अतुलनीय योगदान दे रहे हैं। मैं उनके सुरक्षित बने रहने तथा अन्य इमीग्रेंट्‌स के आने के लिए लड़ाई लडूंगी।
  • मुस्लिम संगठन- उधर, करीब आधा दर्जन मुस्लिम संगठनों ने न्यायालय से आग्रह किया है कि राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा जारी आदेश खारिज कर दे। इन संगठनो में अमेरिकन मुस्लिम कम्यूनिटी और अमेरिकन मुस्लिम प्रोफेशनल्स (व्यावसायिक) , मुस्लिम एडवोकेट्‌स (अधिवक्ता) , नेशनल (राष्ट्रीय) अरब अमेरिकन मेडिकल (चिकित्सा -शास्त्र से संबंध) एसोसिएशन (संभा) शामिल हैं।

‘फ्रैंसिस्को फर्नांडेज’ की सुरक्षा:-

  • ‘फ्रैंसिस्को फर्नांडेज’ इन्हें कम ही लोग जानते हैं। लेकिन दुनिया के करोड़ों लोगों के पैसों की सुरक्षा इन्हीं के हाथों में है। लाखों बैंक खातों की सुरक्षा की जिम्मेदारी फ्रैंसिस्को की कंपनी एवलॉक ने ले रखी है। दुनिया भर के 450 से ज्यादा बड़े बैंकों में एवलॉक का ही सुरक्षा व्यवस्था उपयोग किया जा रहा है। इन बैंको में करीब 270 लाख करोड़ रुपए जमा हैं। ये रकम भारत की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की दोगुनी है।
  • 53 साल के फ्रैंसिस्को ने 1985 में पांच कर्मचारियों के साथ मिलकर एवलॉक की शुरुआत की थी। पहला सुरक्षा प्रबंध विकास करने में 5 साल लगे थे। आज इसके पास 2,500 कर्मचारी हैं और रेवेन्यू (राजस्व) करीब 3,400 करोड़ रुपए है। फ्रैंसिस्को बताते हैं ‘लोग कहते थे कि हमारे सॉफ्टवेयर (कार्यक्रम, जिनसे कंप्यूटर पर काम किया जाता है) को खरीददार नहीं मिलेंगे। एक दिन मैंने अपने सॉफ्टवेयर का डेमो (सार्वजनिक सभा अथवा जुलूस) स्विट्‌जरलैंड के केंद्रीय बैंक स्विस नेशनल बैंक (राष्ट्रीय अधिकोष) के सामने दिया। यह बैंक एवलॉक का पहला खरीददार बना। 6 महीने में स्विट्‌जरलैंड के पांच और बैंक हमारे ग्राहक बने। कुछ समय में विदेशी बैंको को हमारा सुरक्षा सॉफ्टवेयर पसंद आने लगा और खरीदार बढ़ते गए। हर साल हमारे प्रबंध पर हजारों हमले होते हैं। लेकिन अब तक कोई साइबर क्रिमिनल (अपराध संबंधी) इसे तोड़ने में कामयाब नहीं हो पाया है। लेकिन ये जरूर सीखा है कि जब दुनिया आपके काम की आलोचना करे, आपको हतोत्साहित करने की कोशिश करे तो आप उस काम में और तेजी से जुट जाइए। सफलता तभी मिलेगी।’
  • फ्रैंसिस्को-की कंपनी (जनसमूह) बैंको को साइबर अटैक से बचाती है। सॉफ्टवेयर कितना सुरक्षित है, यह जांचने के लिए इसने अनोखा तरीका अपनाया है। यह इजरायल की तकनीकी विधियां कंपनियों को हैकिंग के लिए पैसे देती है। अगर प्रबंध हैक (काटना) कर लिया गया तो उसकी कमी ढूंढकर उसे दोबारा विकास किया जाता है। फ्रैंसिस्को का मानना है कि इजरायल के हैकर्स दुनिया में बेस्ट (अच्छे) हैं। खासकर सैन्य सेवा से निकले युवा।
  • भारत- गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में बताया कि बीते 4 वर्षो में केंद्र और राज्य सरकारों की 707 वेबसाइट्‌स हैेक हुई हैं। हैकिंग का सबसे ज्यादा खतरा बैंको पर रहता है। सरकार द्वारा डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा देने की मुहिम के साथ बैंक खाते की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

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