उच्च चौदह समाचार (Top Fourteen News in Hindi) (Download PDF)

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उत्तराखंड:- के काशीपुर में बायोइथेनॉल उत्पादन संयंत्र शुरू हो गया है। यह भारत का पहला ऐसा संयत्र है, जिसकी गिनती दूसरी पीढ़ी के संयत्रों में होती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह स्वदेश में विकसित तकनीकी से बना है जिसे डीबीटी-आईसीटी सेंटर फॉर (व्यक्ति या वस्तु या समय के लिए) बायोसाइंसेस (केंद्र जीवविज्ञान) ने विकसित किया गया है और जो दुनिया की किसी भी तकनीकी से स्पर्द्धा करने में सक्षम है। जैविक ऊर्जा को समर्पित इस सेंटर (केंद्र) की स्थापना केंद्रीय जैव प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 2008 में मुंबई के इंस्ट्‌ीटयूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी (संस्थान की रसायन तकनीकी) में की थी। प्लांट किसी विश्वविद्यालय के शोध केंद्र में विकसित प्रौद्योगिकी को सफलतापूर्वक जमीनी रूप देने का सफल उदाहरण है। निश्चित ही यह भारत के तीन आयामी अभियान, मेक इन इंडिया, (भारत में बनाना) स्वच्छ भारत और स्टार्टअप इंडिया की दिशा में अहम कदम साबित होगा।

परिवहन की बात करें तो दूसरी श्रेणी के ऊर्जा साधनों की भारत की जरूरत 150 गीगा वॉट के करीब है, जो 7000 करोड़ लीटर पेट्रोल-डीजल से प्राप्त ऊर्जा के बराबर होती है। खेद है कि इसकी 80 फीसदी पूर्ति कच्चे तेल के आयात से होती है। भारत ने कार्बन उत्सर्जन घटाने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने का दा आयामी लक्ष्य सामने रखा है। इस दिशा में कृषि से निकले उत्पाद और अन्य ऊर्जा स्रोत आंशिक या पूर्ण रूप से पेट्रोल ईंधनों की जगह लेकर देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं। हमने 2009 की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति में पेट्रोल -डीजल में 5 फीसदी हरित जैव-ईंधन मिलाना अनिवार्य तो कर दिया, लेकिन डीजल के लिए तो हमारे पास कोई विकल्प नहीं है और पेट्रोल में बायोइथेनॉल मिलाने से बमुश्किल 3 फीसदी लक्ष्य पूरा होता है। अड़चन यह है कि एक तो हमारे पास पर्याप्त उत्पादन क्षमता नहीं है और दूसरा बायो इथेनॉल के लिए पर्याप्त मोलसेस या शीरा (गन्ने के इस्तेमाल के बाद बचा उत्पाद) नहीं है तो बायो डीजल के लिए आवश्यक अखाद्य वनस्पति तेल नहीं है। फिर यह भी सही है कि बायो इथेनॉल और वनस्पति तेल अक्षय ऊर्जा देने वाले ईंधन तो हैं, वे ऊर्जा अनुपात व कार्बन उत्सर्जन घटाने के मामले में कमजोर हैं। संयोग से उनकी सीमित उपलब्धलता से 2017 तक 20 फीसदी उपयोग के सरकारी लक्ष्य की तो बात क्या 5 फीसदी मिश्रण लक्ष्य भी पूरी नहीं हो पा रहा है।

यह सब इसलिए बताया कि इसी वजह से दूसरी पीढ़ी ( 2जी) के बायो ईंधन विकल्प खोजने इतने जरूरी हैं ताकि निकट भविष्य में पेट्रो ईंधन में 10 फीसदी ऐसे विकल्प मिश्रित किए जा सके। 2-जी बायो ईंधन वे होते हैं, जिन्हें ऐसे अपशिष्ट पदार्थ से निकाला जाता है जो मानव या पशु खाद्य श्रृंखला पर प्रभाव नहीं डालते, जिसका परिणाम पेट्रो ईंधन की तुलना में 60 फीसदी से ज्यादा कार्बन कटौती में होता है। इस दिशा में भारत की संभावनाएं काफी उजली हैं, क्योंकि बढ़ती युवा आबादी के बावजूद हमने खाद्य आत्म निर्भरता हासिल की है। इससे गैर-पशु आहार वेरायटी (विविधता) के कृषि अपशिष्ट पदार्थ काफी मात्रा में उपलब्ध हैं। फिर म्यूनिसिपल (नगरपालिका) सॉलिड (ठोस) वेस्ट (बेकार) जैसे विकल्प भी हैं। दोनों को मिलाएं तो इतनी क्षमता है कि यह देश की पेट्रोल में धन का भूसा, गुजरात व महाराष्ट्र में कपास व अरंडी के डंठल, उत्तरप्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में गन्ने का कचरा और असम, बंगाल और उड़ीया में बांस को मिला ले तो हर साल 2.50 करोड़ टन अतिरिक्त कृषि निकला बायो सामग्री मिलती है। इससे 7.50 करोड़ टन जैव-ईंधन बनाया जा सकता है, जो पूरे देश की पेट्रोल खपत से चार गुना अधिक है। फिर बड़े-छोटे शहरों में 1.50 करोड़ टन कचरा एकत्रित किया जाता है, जिसमें 4 करोड़ टन बायो ईंधन के इस्तेमाल का लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता है। बशर्ते व्यावहारिक तकनीकी उपलब्ध हो। अत्यानुधिक तकनीक के विकास के साथ मरीन एग्रीकल्चरल (कृषि शास्त्र) फॉर्मिंग (कृष) और बेकार पड़ी भूमि के इस्तेमाल से नेपियर घास जैसी अधिक ऊर्जा देने वाली फसलों का उत्पादन बढ़ाकार देश की जैव-ईंधन बनाने की क्षमता को और भी बढ़ाया जा सकता है। इस प्रकार भारत दक्षिण-पूर्वी एशिया की तरह 2जी बायो ईंधन का प्रमुख सप्लायर बन सकता है।

भारत ने 2008 में बड़ी छलांग लगाकर मुंबई के इंस्टीट्‌यूट ऑफ केमिकल (संस्थान की रसायन) तकनीकी में 25 करोड़ रुपए की लागत से पहला जैव ईंधन शोध केंद्र स्थापित किया। इसका काम था कि 2 जी बायो तकनीकी को विकसित कर जमीनी इस्तेमाल लायक बनाकर उद्योग जगत को सौंपना। डीपीटी-आईसीटी सेंटर ऐसी अत्याधुनिक शोध सुविधा है, जो दुनिया के श्रेष्ठतम का मुकाबला कर सकती है। यहां 100 वैज्ञानिक लगातार जैव ऊर्जा प्रौद्योगिकी पर काम कर रहे हैं। इस केंद्र ने वह अद्भुत 2 जी इथेनॉल तकनीकी का विकास किया है, जिसे उत्तराखंड के डिमॉन्ट्रेशन प्लांट (पौधा) में साकार किया गया है। इस तकनीकी की खासियत यह है कि इसकी क्षमता आसानी से बढ़ाई जा सकती है, इसमें किसी भी तरह के कृषि अपशिष्ट पदार्थ का इस्तेमाल किया जा सकता है और न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया के किसी भी भाग में बखूबी इसतेमाल की जा सकती है। काशीपूर प्लांट में प्रतिवर्ष 7.50 लाख लीटर अल्कोहल का उत्पादन किया जा सकता है।

शुरुआत में लगने वाली कम पूंजी, किसी भी कृषि पदार्थ को इस्तेमाल करने की सुविधा और कनर्वेशन (रूप परिवर्तन) की प्रभावी क्षमता के कारण यह दुनियाभर में लोकप्रिय होगी। यह भारत के लिए विशेष महत्वपूर्ण है, जहां किसानों के पास छोटे खेत हैं। और भौगोलिक स्थिति व मौसम के मुताबिक कृषि उत्पाद बदलता जाता है। इस मामले में तकनीकी बहुतल लचीली है यानी लकड़ी की झिल्पियों से लेकर कपास के पौधे के डंठल और चावल के भूसे तक किसी भी जैव पदार्थ का इस्तेमाल कर जैव ईंधन तैयार किया जाता सकता है। यह तकनीकी बायोमॉस से 24 घंटे में अल्कोहल बना देती है, जबकि विकसित देशों की तकनीकी को भी इसमें 3 से 5 दिन का समय लगता है। फिर इसकी क्षमता 100 टन बायोमास प्रतिदिन से लेकर 500 टन प्रतिदिन तक घटाई-बढ़ाई जा सकती है। यह किसान की आमदनी भी बढ़ाएगी। इसके अलावा नौकरियों, कच्चे तेल के आयात में कमी और पर्यावरण प्रदूषण पर लगाम जैसे फायदे तो है ही।

                                                  अरविंद लाली, हेड सेंटर (मुख्य केंद्र) फॉर एनर्जी (में शक्ति), बायोसांइसेस (जीवविज्ञान), आईसीटी, मुंबई

चीन:-

  • भारत गलतफहमी में रहता है कि जब भी हम पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हैं तो चीन प्रतिक्रिया करता है। वास्तव में चीन का भारत के प्रति नजरिया दुश्मनी भरा रहा है। अतीत में गौर करे तो चीन भारत के खिलाफ सामान्यीकरण, सुधार, दोस्ताना संबंध नहीं रहे। कभी वीजा (एक देश से दूसरे में जाने की अनमुति पत्र) नत्थी करके देता है। कभी हुर्रियत नेताओं को आमंत्रण देता है तो कभी भारत के लोगों का वीजा अस्वीकार कर देता है इसके अलावा भारत के प्रधानमंत्रियों को अरुणाचल प्रदेश का दौरा न करने की चेतावनी देता है। दलाई लामा को कठघरे में खड़ा करता है। चीन निरंतर हमारी सीमा में दखल देता है। हमारा रक्षा मंत्रालय लाचारी जताकर कह देता है कि सीमा निर्धारण न होने की वजह से ऐसा होता है। हम छिपाने की कोशिश करते हैं, चीन सिक्किम, लद्दाख में भारत पर दबाव बनाने की लगातार कोशिश करता है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत को तिरस्कृत करने की कोशिश करता है। भारत में चीन की पक्षधर एक ऐसी लॉबी (प्रवेशकक्ष) है, जो दिखाने की कोशिश करती है, हमें चीन से परेशान नहीं होना चाहिए। वे कहते हैं, चीन भारत को आजमा कर देख रहा है। मेरे विचार से सबसे बड़ी गलती हमारी यह रही है कि पिछले 10 वर्षों में मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हमने चीन को बड़ा व्यापारिक साझेदार बना लिया। भारत का व्यापार 70-80 अरब डॉलर प्रतिवर्ष है, जिसमें से 30 प्रतिशत व्यापार हमारे हितों के विरुद्ध है। मनमोहन सिंह तो कहते थे कि आपसी व्यापार को देखते हुए सीमा विवाद ठंडे बस्ते में डाल देना चाहिए। कुल मिलाकर चीन-पाकिस्तान धुरी में मेरा मानना है कि पाकिस्तान से भी बड़ी चुनौती हमारे सामने चीन है। भारत का जो हिस्सा पाकिस्तान ने नाजायज कब्जाया था, उसके न सुलझने का कारण भी चीन है। यदि भारत-पाक के रिश्ते सामान्य रहते, तो हो सकता है कि भारत पाकिस्तान से अपने हिस्से वापस ले लता। लेकिन गिलगित का हिस्सा पाकिस्तान चीन को सौंप चुका है। यहीं से व्यापारिक रास्ते के जरिए वह मध्य एशिया, खाड़ी देशों और अफ्रीका के पूर्वी तटों तक अपनी व्यापारिक पहुंच बनाना चाह रहा है। चीन ने इन इलाकों में जो गतिविधियां चला रखी हैं, वह भारत विरोधी तो हैं ही बल्कि भारत के खिलाफ यह उसके लिए अनिवार्यता सी हो गई है। भारत से कब्जाए अक्साई चिन इलाके में चीन अपना एटमी कचरा डालता है। पाकिस्तान ने जो परमाणु तस्करी की और जिसके जरिए वह भारत को ब्लैकमेल (भयादोहन/दबाव से धमकाकर किसी से कुछ करवाना या मजबूर करना) करता है, उसकी वजह तो चीन ही है।
  • चीन ने भारत को झांसा देने में सफलता हासिल की है कि वह हमें एशिया में मदद कर सकता है। पर ऐसा हो ही नहीं सकता। चीन और भारत में से कोई एक ही प्रमुख शक्ति हो सकता है। दोनों की प्रतिदव्ंदव्ता जाहिर करते है। फिर ये खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संरक्षण, अफ्रीका या साइबेरिया में तेल उत्खनन के मसले हों। भारत के बुनियादी राष्ट्रीय हितों का टकराव चीन के साथ है, जो खत्म हो ही नहीं सकता। जब चीनी राष्ट्रपति भारत आते हैं और प्रधानमंत्री मोदी जी ने साबरमती के किनारे उनका स्वागत करते हैं तो हमें ऐसा लगता है कि चीन का भारत के प्रति नजरिया बदल गया। चीन ने ऐसा दिखाया कि मोदी सशक्त नेता हैं और वह उनके साथ दोस्ताना रिश्ते रखेंगे। लेकिन हमें इस झांसे में नहीं आना चाहिए। हम चीन को लेकर पं. नेहरू से इंदिरा गांधी और मनमोहन सिंह तक गलतियां करते रहे हैं। नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका या मालदीव के मामलों में भी चीन का प्रयत्न रहा है कि इन देशों में दखल देकर भारत के गले में जहरीली मोतियों की माला पहना दी जाए। चीन के साथ हमारे संबंधों में वर्ष 1962 के बाद से ही दरार आ गई थी पर उसके बाद जब भी हमारे प्रतिनिधिमंडल वहां जाते हैं या व्यापारिक रिश्ते बढ़ते हैं तो लगता है कि रिश्ते सामान्य हो गए। लेकिन चीन का दुश्मनी भरा रवैया जारी रहता है। पाकिस्तान का उपयोग भारत के खिलाफ चीन वर्ष 1962 से करता आ रहा है। दोस्ती की ठोस पहल चीन की ओर से कभी नहीं हुई। उलटे भारत के लिए चीन चुनौती ही बनकर उभरा है। चाहे ब्रह्यपुत्र की सहायक नदी का पानी रोकने का मसला हो, मसूद अजहर को सयुंक्त राष्ट्र से आतंकी घोषित कराने पर वीटों करने का रवैया हो या न्यूक्लियर (परमाणु शस्त्र) सप्लायर समूह में हमारी सदस्यता रोकने का मसला हो। लेकिन इन सबके बीच आश्चर्य की बात है कि फिर भी चीन हमारा इतना बड़ा व्यापारिक साझेदार कैसे हो गया? न तो हम चीन से तेल, हथियार का आयात करते है न खाद्यान्न आयात करते हैं। कैसे हमारा व्यापार चीन से खाड़ी देशों और अमरीका से भी ज्यादा हो गया। कुल मिलाकर चीन ने हमें इस भ्रम का शिकार बनाया। हम लापरवाही से चीनी बाजार नीति के जाल में फंसते रहे। बड़ी देर से चीन के खिलाफ हमने वियतनाम से साझेदारी का प्रयास किया है। भारत को चीन को काउंटर (विरोध) करने की नीति सिर्फ पाकिस्तान के संदर्भ में नहीं बनानी चाहिए। हमें नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका जैसे पड़ोसियों के साथ मिलकर चीन को चुनौती देनी होगी।

         प्रो. पुष्पेश पंत, विश्लेषक, पदमश्री से सम्मानित, भारत-चीन मामलों के विशेषज्ञ, अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्यापान का लंबा अनुभव

कैरेबियाई:-

  • देश हैती में मैथ्यू तूफान ने तबाही मचाई है। 800 लोग मारे गए हैं। लाखों बेघर हुए है। यह अटलांटिक क्षेत्र में 53 साल का सबसे शक्तिशाली तूफान है। हैती, क्यूबा, जमैका, डोमिकन रिपब्लिक, बहामास और अमरीका में इमरजेंसी (आपातकालीन) लग गई है। करीब 1.7 लाख करोड़ रुपए के नुकसान की आशंका है। हैती का अहम शहर जेरेमी के 80 प्रतिशत मकान ढह गए। वहीं सूद प्रांत में 30 हजार घर जमींदोज हो गए।
  • यह तीसरी श्रेणी का तूफान है। इसमें 165-207 किमी/ घंटे की गति से हवा चलती हैं। ज्यादातर लोग पेड़ों और ईमारतों के नीचे आने से मारे गए हैं। हैती में करीब साढ़े तीन लाख लोगों को मदद की जरूरत है। अमेरिका मेें कुछ इलाकों में 38 सेमी तक बारिश हुई। करीब 12 फीट ऊंची लहरें उठ रही हैं।

कंपनी (जनसमूह) :-

  • मल्टीनेशनल कंपनियों (एक से अधिक राष्ट्रीय जनसमूहों) में काम के तौर-तरीके और उनके कर्मचारियों के लिए बेहतर होने के बारे में रिसर्च (खोज) करने वाली एजेंसी (कार्यस्थान)’ग्रेट (महान) प्लेस टू वर्क’ (स्थान, दिशा की ओर, कार्य) ने नौकरी के लिए बेहतर दुनिया की 25 मल्टीनेशनल कंपनियों की लिस्ट (एक से अधिक जनसमूहों की सूची) जारी की है। इनमें से 11 का कारोबार भारत में भी है। आईटी कंपनी गूगल लगातार चौथे साल काम करने के लिए दुनिया की सबसे बेहतर कंपनी के तौर पर उभरी है। एजेंसी (कार्यस्थान) के सवालों के जवाब में इन कंपनियों के करीब 80 प्रतिशत कर्मचारियों ने कहा कि वे काम और परिवार के बीच संतुलन की वजह से खुश हैं।
  • इसके लिए दुनिया भर की 6 हजार से ज्यादा मल्टीनेशनल कंपनियों (एक से अधिक राष्ट्रीय जनसमूहों) के कर्मचारियों के बीच सर्वे किया गया। इन कंपनियों के करीब 91 लाख कर्मचारियों से कंपनी और काम के माहौल से जुड़े सवाल पूछे गए। सर्वे में शामिल होने के लिए कंपनियों को आवेदन करना पड़ता है।
  • नौकरी के मामले में टॉप-5 कंपनियों में से 4 का मुख्यालय अमेरिका में है। जबकि एक जर्मनी की है, जो पांचवें नंबर पर है। इनमें सिर्फ डेल ईएमसी के कर्मचारियों की संख्या गूगल से ज्यादा है।

Top 5 companies in terms of job

Table showing the Top 5 companies in terms of job

रैंक कंपनी

मुख्यालय

कर्मचारी

गूगल

अमेरिका

56,300

एसएएस इंस्टीट्‌यूट (संस्थान)

अमेरिका

13,741

डब्ल्यू एल गोर

अमेरिका

10,428

डेल ईएमसी

अमेरिका

70,000

डेमलर फाइनेंशियल (वित्तीय)

जर्मनी

8,388

25 में से 16 कंपनियों का मुख्यालय अमेरिका में। इनमें से 5 का अमेरिका में कारोबार नहीं।

ट्रस्ट इंडेक्स (दान/न्यास संस्था सूची) में 70 प्रतिशत कर्मचारियों ने कहा कि इन कंपनियों ने कहा कि योग्यता के हिसाब से प्रमोशन (पदोन्नति) मिलता है। जबकि 80 प्रतिशत कर्मचारियों ने काम और जीवन के बीच संतुलन के लिए इन्हें बेहतर जगह बताया है।

कर्मचारियों में खासियत निम्न हैं-

  • 84.7 प्रतिशत आयोजनों को सेलिब्रेट करते हैं।
  • 81.1 प्रतिशत भावनात्मक तौर पर स्वस्थ जगह है।
  • 79.4 प्रतिशत काम और जीवन में बेहतर संतुलन है।
  • 73.7 प्रतिशत राजनीति या चुगली का माहौल नहीं हैं।
  • 69.6 प्रतिशत योग्यता के आधार पर प्रमोशन होता हैं
  • 95 प्रतिशत कर्मियों ने सुरक्षा, पारदर्शिता को अहम माना है।

कर्मचारी को क्यों पसंद है कंपनी-

95.5 प्रतिशत लैंगिक भेदभाव नहीं है।

94.8 प्रतिशत व्यक्तिगत तौर पर सुरक्षित हैं।

91.3 प्रतिशत यहां काम करने पर गर्व है।

90.04 प्रतिशत काम का दोस्ताना माहौल है।

89.9 प्रतिशत उम्र, पद में भेदभाव नहीं।

इन 25 कंपनियों में 11 भारत में भी कारोबार कर रही हैं, जो इनका 3 प्रतिशत सब्सिडियरीज ब्रिटेन में, जबकि सबसे कम लक्जमबर्ग और सऊदी अरब में हैं।

Table showing the country and stake

Table showing the country and stake

देश

हिस्सेदारी

ब्रिटेन

7 %

मेक्सिको

6 %

जर्मनी

5 %

इटली

5 %

अमेरिका

4 %

कनाडा

4 %

चीन

4 %

भारत

3 %

पेरू

3 %

अन्य

55 %

विवरण के अनुसार दुनिया भर की मल्टीनेशनल कंपनियों में काम का माहौल लगातार बेहतर हो रहा है। कर्मचारी लगातार इन कंपनियों के प्रति भरोसा जता रहे हैं। पिछले चार साल से उनका स्कोर (सफलता पाना) भी लगातार बढ़ रहा है।

Table showing the years and Score

Table showing the years and Score

वर्ष

स्कोर (100 में से)

2012

82.55

2013

82.46

2014

82.60

2015

82.98

2016

83.04

इन पैमानों पर हुआ सर्वे-कम से कम, 5,000 कर्मचारी हों। न्यूनतम 40 % कर्मचारी विदेशी हों। ट्रस्ट इंडेक्स दान संस्था सूची) में बेहतर प्रदर्शन करने वाले मलटीनेशनल कंपनियों को बोनस अंक भी दिए गए।

एनजीओ (गैर कानूनी संस्था) फंडिग (वाणिज्य, ऋण प्रदान करना):-

  • 51,000 करोड़ की विदेशी मदद रोकी। हाल ही में सरकार ने 11 हजार से ज्यादा गैर-सरकारी संस्थाओं पर विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के तहत विदेशी धन लेने पर रोक लगा दी है। इनमें रामकृषण मिशन से जुड़ी संस्थाओं के अलावा कोलकाता का प्रतिष्ठित भारतीय सांख्यिकी संस्थान और एमनेस्टी (अपराधों के लिए सार्वजनिक क्षमादान/आम माफ़ी) इंटरनेशनल (अंतरराष्ट्रीय) भी शामिल हैं। इससे पहले दो साल में मोदी सरकार ने 22 हजार से ज्यादा लाइसेंस (अनुमति) रद्द कर दिए। जून में इन संस्थाओं को लाइसेंस (अनुमति) रिन्यू (नवीनीकरण करना) कराने के लिए 31 अक्टूबर का समय दिया। देश भर में कुल 33 हजार से ज्यादा संस्थाएं एफसीआरए के तहत विदेशी धन लेने के लिए अधिकृत है, जिनमें से केंद्र ने 2016 में 6 नवंबर को 11319 के एनजीओ के एफसीआरए के तहत लाइसेंस रद्द किए गए थे।
  • विदेशी पैसे की निगरानी के लिए पहली बार 1976 में इमरजेंसी (आपातकालीन) के दौरान कदम उठाया गया। फॉरेन कंट्रीब्यूशन (चंदा/योगदान) रेगुलेशन (नियमानुकूल) एक्ट (कानून) का मुख्य उद्देश्य विदेशी चंदे के रूप में व्यक्तिगत और संस्थाओं को मिलने वाले धन की निगरानी था, ताकि यह धन राष्ट्रीय हित के खिलाफ इस्तेमाल न हो।

कैसे रद्द होता है लाइसेंस-

तीन साल तक वार्षिक रिटर्न (वापस लौटने की क्रिया) का ब्योरा नहीं देने वाले एनजीओं को सरकार चार महीने पहले नोटिस (अधिसूचना/चेतावनी) देती है। इन चार महीनों के दौरान भी एनजीओ की ओर से जरूरी कार्रवाई पूरी नहीं की जाती है, तो एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है।

50944 करोड़ का फंड- एफसीआरए के तहत 1993-94 में 1865 करोड़ रुपए धन आया, जो 2007-08 में 9,663 करोड़ रुपए हो गया। बीते 3 साल में एफसीआरए के तहत 50 हजार 944 करोड़ रुपए की धनराशि एनजीओ को मिली। इनमें दिल्ली और तमिलनाडु के 400 से ज्यादा एनजीओ को 1 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि मिली, जो अन्य राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा है।

2010 में एफसीआरए के तहत 42,500 एनजीओ रजिस्टडर् (पंजीकृत) थे। 2015 में एक्ट में बदलाव के बाद 20,500 एनजीओ की विदेशी चंदे की वैधता खत्म की गई। जुलाई 2016 में रजिस्टर्ड एनजीओं की संख्या 33,091 थी। 11319 की मान्यता खत्म होने के बाद 21772 एनजीओ एफसीआरए अधिकृत हैं।

गृह मंत्रालय ने 2014 से 2016 के बीच 103 एनजीओ पर 1.6 करोड़ का जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना बिना लाइसेंस और इजाजत के विदेशी फंड (कार्य या संस्थान के लिए धन उपलब कराना) लेने के लिए लगाया गया।

दस्तावेज-गृह मंत्रालय ने 1736 एनजीओ के लाइसेंस नवीनीकरण के आवेदनों को रद्द कर दिया है। इसके पीछे दस्तावेज की कमी का हवाला दिया गया है। इन 1736 एनजीओ में रामकृष्ण मिशन की कुछ शाखाएं, आजादी के पहले से गरीबों के लिए काम करने वाली संस्था और 1987 से भारत के स्वच्छता मिशन (किसी विशेष कार्य के लिए भेजा गया दल शिष्टमंडल) के लिए रामकृष्ण मिशन के मॉडल (नमूना) पर काम कर रही संस्था भी शामिल है।

विवरण- एक विवरण के अनुसार, देश में कुल 31 लाख एनजीओ (गैर-सरकारी संस्था) हैं। यह संख्या विद्यालयों की संख्या से दोगुनी और सरकारी अस्पतालों से 250 गुना ज्यादा है। देश में 400 नागरिकों पर एक एनजीओ है, जबकि देश में 750 नागरिको पर एक पुलिसकर्मी है।

अमरीकी फंडिंग- 2009-10 में मिले 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के चंदे में से ज्यादातर रकम अमरीका और यूरोप से आई। बड़ा हिस्सा करीब 1815.91 करोड़ रुपए दिल्ली के एनजीओ को मिला। एनजीओ के पास जो रकम विदेशों से आती है, उसमें अमरीका की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। फिर जर्मनी और ब्रिटेन का नंबर आता है। भारतीय एनजीओ को दान देने में रॉकफेलर और फोर्ड फाउंडेशन (नींव) सबसे आगे हैं। गेट्‌स फांउडेशन ने भी हाल में कई एनजीओ को पैसा दिया हैं।

नई दिल्ली-

  • केंद्र सरकार ने 33,000 गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) में से करीब 20,000 संगठनों के एफसीआरए यानी विदेशी चंदा नियमन कानून लाइसेंस रद्द कर दिए हैं। यह कार्रवाई तब की गई जब इन एनजीओ की एफसीआरए प्रक्रिया में खामियां पाई गई। जांच में पाया गया है कि यह एनजीओ एफसीआरए के विभिन्न प्रावधानों का कथित तौर उल्लंघन कर रहे हैं। जिन एनजीओ का एफसीआरए लाइसेंस रद्द किया गया है, वे अब विदेशी चंदा नहीं ले सकेंगे।
  • केंद्रीय गृह मंत्रालय के विदेशी प्रभाग की समीक्षा बैठक के दौरान गृह मंत्री राजनाथ सिंह को यह जानकारी दी गई। मंत्रालय के अधिकारियों ने राजनाथ को बताया कि इन एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंसे रद्द किए जाने के बाद अब देश में नवीनीकरण के आवेदन दिए करीब 13,000 एनजीओ कानूनी तौर पर मान्य हैं।
  • गृह मंत्रालय ने ’ऑटोमेटिक’ (स्वयंचालित) रूट के तहत करीब 16 एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंसो का नवीनीकरण किया है। इसके लिए सारे मामलों की गहन समीक्षा की गई है। दो मामलों को छोड़कर 14 एनजीओ को पूर्व अनुमित श्रेणी में रखा गया है जबकि दो एनजीओ के दस्तावेजों की जांच जारी है।
  • 2015 में एक्ट में बदलाव के बाद 20,500 एनजीओ विदेशी चंदे की वैधता खत्म की गई थी। गृह मंत्रालय को एफसीआरए के तहत पंजीकरण के लिए 2,000 नए आवेदन मिले हैं ।
  • भारतीय एनजीओ को सबसे ज्यादा अमरीकी फंडिंग होती हैं। फंडिंग में दूसरे और तीसरे नंबर पर जर्मनी और ब्रिटेन हैं।

भारत और ब्रिटेन:-

  • ब्रिटेन और भारत के संबंधों की हम अन्य देशों के साथ संबंधों के मापदंडो से तुलना नहीं कर सकते। यह सब जानते हैं कि ब्रिटेन के साथ हमारे संबंध सदियों से हैं और इसलिए वे गहन और गहरे भी हैं। यूं कहना चाहिए कि ब्रिटेन के साथ संबंध मुश्किल हालात में भी नहीं है। यही वजह रही है कि यूरोप से बाहर किसी देश की पहली यात्रा के तौर पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा ने भारत को चुना। यह ध्यान देने योग्य बात है कि वर्तमान में करीब 14 लाख भारतीय ब्रिटेन में रहते हैं जो वहां की आबादी का 2.3 फीसदी हैं। हम कह सकते हैं कि भारतीय वहां बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। ब्रिटेन में निवेश करने वालों में भारत तीसरा सबसे बड़ा देश है। यदि समृद्धि के लिहाज से बात करें तो ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय वहां के गोरे लोगों के बाद दूसरा सबसे बड़ा अमीर समुदाय भी है। इस सारी बातों के मद्देनजर ब्रिटेन भारत और भारतीयों की उपेक्षा कर ही नहीं सकता बल्कि वहां के राजनेता तो इस स्थित का लाभ ही उठाने के बारे में सोचते हैं।
  • हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब ब्रिटेन गए थे तो उन्होंने वहां पर करीब 25 हजार भारतीयों को संबोधित किया था। आश्चर्यजनक रूप से इस कार्यक्रम में स्टेज (मंच) पर ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड केमरून ने ही उन्हें औपचारिक रूप से आमंत्रित किया। यह घटना ब्रिटेन की नजर में भारत की अहमियत की परिचायक थी। दुनिया में भारत का दबदबा बढ़ा है। इस बात को तो सभी मान रहे है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था है। इसका लाभ दुनिया के अन्य देश उठाना चाहते हैं इस आधार पर देखें तो ब्रिटेन में निवेश और तकनीक के मामले में उस पर निर्भर है। इसके अलावा सुरक्षा उपकरणों के मामलों में ब्रिटेन का हमेशा से हमारे लिए बड़ा योगदान रहा है। इस लिहाज से थेरेसा की इस यात्रा से भारतीयों की उम्मीदों का बढ़ना स्वाभाविक ही है। विशेष रूप से भारतीयों की अपेक्षा रही है कि यहां के विद्यार्थियों, विदव्ानों, उद्यमियों और पर्यटकों के लिए वीजा (एक देश से दूसरे देश में भेजे जाने की अनुमति पत्र) नियमों सरल बनाया जाए। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री बनने से पूर्व थेरेसा में ब्रिटेन की गृहमंत्री रह चुकी हैं। और वे अप्रवासियों के मामले में कड़ी नीति की पक्षधर रही है। लेकिन, ब्रिटेन ने जब से यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला लिया है, उसके बाद से यह उम्मीद बढ़ गई है कि ब्रिटेन इस मामले मेे कुछ ढील देगा। ऐसा इसलिए क्योंकि यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद ब्रिटेन के सामने अन्य देशों से अलग रिश्ते बनाने की चुनौती हैं।
  • चूंकि भारत राष्ट्रमंडल देशों का सदस्य देश है तो इस नाते भारतीय लोग अपने लिए कड़े वीजा नियमों में ढील चाहते हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या थेरेसा में वह सब कुछ भारतीयों को दे सकती हैं, जो वे चाहते हैं। तो इसका जवाब यही है कि पूरा-पता तो नहीं लेकिन वे आंशिक लाभ दे सकती हैं। यद्यपि उन्होंने भारतीयों को वीजा देने में विशेष राहत या रियायत देने से मना कर दिया है लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा है कि हजारों भारतीय ब्रिटेन में वर्क (कार्य) वीजा पर हैं वे पर्यटक वीजा के लिए पंजीकृत हो सकते हैं। इसका अर्थ है कि उन्होंने फिलहाल नियमों को ढीला करने की शुरुआत की है। हो सकता है कि अगले दो वर्षो के बाद भारत के लिए विशेष राहतें मिलती दिखें। हमें यह तो समझना ही होगा कि भारत के साथ ब्रिटेन के रिश्तों को फिलहाल किसी प्रकार की चुनौती नहीं है। थेरेसा में के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यूरोपीय संघ से सफलतापूर्वक बाहर होने की है क्योंकि ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला ब्रिटेन की जनता नहीं बल्कि वहां की संसद ही कर सकती है। इस काम के लिए थेरेसा में को काफी मशक्कत करनी होगी। इन हालात में वे भारत ही नहीं किसी अन्य देश से भी कोई बड़े समझौते कर पाने की स्थिति में नहीं है। वे तो पुराने समझौतों में सुधार जैसी बात ही कर सकती है।
  • दूसरी बड़ी बात यह भी है क्या ब्रिटेन के यूरोपीय संघ को छोड़ने से भारत को क्या कोई परेशानी होगी। तो इसका जवाब भी है नहीं, क्योंकि पूर्व में जरूर कहा जाता था कि यूरोप में प्रवेश पाना हो तो ब्रिटेन दव्ार का काम करता था। लेकिन, अब स्थित बदली हुई है। भारत के अन्य देशों के साथ अपने संबंध हैं। यूरोपीय देशों में ब्रिटेन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार नहीं है। जर्मनी, भारत के लिए सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। यूरोपीय संघ से अलग होने पर केवल शर्तो में जो बदलाव होगा, उसके लिए कागजी कार्रवाई ही बढ़ने वाली है। अलबत्ता अब भारत के साथ जिस किस्म के छिटपुट समझौते के मामलों में मॉडल (नमूना) की भूमिका निभाएंगे। फिलहाल थेरेसा में के साथ 40 उद्यमियों का समूह आया है। ब्रिटेन का फोकस फिलहाल लघु और मध्यम दर्जे के उद्योगों पर है और वही उद्यमी भारत के साथ समझौते भी कर सकते हैं। दीर्घकालीन रियायतों और समझौता के लिए उस समय तक इंतजार करना होगा जब तक ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से अलग होने की औपचारिकता पूरी करनी है।

भारत जापान और चीन:-

  • भारत के पीएम मोदी जी के संभावित जापान दौरे को लेकर चीन ने भारत को चेतावनी दी है। चीनी मीडिया (संचार माध्यम) में छपी एक रिपोर्ट (विवरण) में कहा गया है कि ’अगर भारत ने जापान के साथ मिलकर दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर हस्तक्षेप किया और चीन को अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल (विशेष न्यायालय) का आदेश मानने को बाध्य करने की कोशिश की, तो उसे बड़ा नुकसान हो सकता है। सागर पर भारत दावेदार नहीं है। लेकिन जब से मोदी आए हैं, भारत ने ’लुक ईस्ट’ (अभिव्यक्ति/देखना, पूर्व दिशा) विदेश नीति अपना रखी है।
  • चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने अपने आर्टिकल (लेख) में कहा है कि ’ दक्षिण चीन सागर के विवाद में शामिल होने से भारत अमेरिका का सिर्फ एक मोहरा बनकर रह जाएगा। साथ ही चीन के साथ व्यापारिक नुकसान कर खामियां भी भुगतना पड़ेगी। इस विवाद में पड़ने से भारत का कोई फायदा नहीं होगा, बल्कि नई दिल्ली व बीजिंग के बीच भरोसा टूटेगा।
  • चीन ने एनएसजी सदस्या को लेकर भी भारत को धमकाया है। कहा गया है कि भारत जानता है कि नियमों के अनुसार अब तक वह एनएसजी सदस्या के लिए उत्तीर्ण नहीं है। इस पर चीन का फैसला महज अंतरराष्ट्रीय कर्तव्यों को पूरा करने के लिए आया।
  • बता दें कि मोदी के जापान दौरे के बारे में कयास लगाए जा रहे हैं कि वे दक्षिण चीन सागर मसले पर चीन को अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल का आदेश मानने के लिए एक संयुक्त बयान जारी किया जा सकता है। चीन सागर पर अपना हक जताता आया है, जबकि ट्रिब्यूनल (विशेष न्यायालय) ने चीन के दावे को खारिज कर दिया है।
  • ग्लोबल टाइम्स के ही दूसरे आर्टिकल (वस्तु/लेख) में चीन ने भारत व जापान के बीच बढ़ रहे रिश्ते पर भी आपत्ति जताई है। जापान के साथ भारत के सिविल न्यूक्लियर डील (नागरिक, परमाणु शस्त्र, व्यापारिक समझौता) के बारे में चीन ने कहा कि जापान ने अपने नियमों में ढील की। चीन ने बुलेट ट्रेन पर भी सवाल उठाए। कहा कि जापान की महंगी हाई-स्पीड (उच्च गति) तकनीक और भारत की अविकसित अर्थव्यवस्था से इस रेल प्रोजेक्ट (योजना) को फायदा होगा भी, यह कहा नहीं जा सकता। गौरतलब है कि चीन भी भारत में अपनी हाई-स्पीड ट्रेन नेटवर्क बिछाना चाहता हैं। इसके लिए वह दिल्ली-चेन्नई के बीच रेलवे कॉरिडोर (गलियारा) की संभावनाओं की स्टडी (जाँच करना) भी कर रहा है।

                                                                                                                                                                                 एजेंसी बीजिंग

भारत और जापान:-

  • ने ऐतिहासिक असैन्य परमाणु करार पर हस्ताक्षर किए। मोदी जी और उनके जापानी समकक्ष शिंजों आबे की मौजदूगी में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। एटमी डील (व्यापारिक समझौता) पर कई सालों से बात चल रही थी, लेकिन 2011 में फुकुशिमा न्यूक्लियर पावर प्लांट (परमाणु अस्त्र संबंधित) शक्ति पौधा) में हुए हादसे के बाद अब ताकत बनी है। इस करार से दोनों देशों के बीच दव्पक्षीय आर्थिक और सुरक्षा संबंधों में गति लाने व अमरीका स्थित कंपनियों (जनसमूहों) को भारत में परमाणु संयंत्र लगाने में सहायता मिलेगी। इसके अलावा रेलवे में जापानी निवेश बढ़ाने व अंतरिक्ष एवं कृषि जैसे क्षेत्रों में आपसी सहयोग के 10 नए समझौतों पर हस्ताक्षर किए। एक करार भारत रेलवे एवं परिवहन क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास, बंदरगाहों, हवाई अड्‌डों के निर्माण और शहरी विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग व निवेश बढ़ाने के लिए है।
  • मोदी के इस दौरे से जापान के साथ अटकी सिविल न्यूक्लियर डील पर भी हस्ताक्षर हो गए हैं।
  • जापान ने पहली बार किसी ऐसे देश से न्यूक्लियर डील की है, जिसने नॉन प्रॉलिफरेशन ट्रीटी (एनपीटी) के टोक्यों के एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने ट्‌वीट कर इसकी जानकारी दी।

एम्फीबियन के विषय में कुछ अहम बाते निम्न हैं-

  • इस दौरे में एम्फीबियन प्लेन यूएस-2 आई की डील भी हो सकती है।
  • जापान से 10 हजार करोड़ के 12 एम्फीबियन प्लेन (हवाई जहाज) की खरीद संभव है।
  • ये ऐस प्लेन हैं जो हवा के साथ-साथ पानी पर भी चल सकते हैं।
  • एयरक्राफ्ट (अपरिवर्तित हवाई जहाज) की ये डील ज्यादा पैसों के चलते 2013 से अटकी हुई है। इसे देखते हुए जापान ने 720 करोड़ कम कर दिए हैं।

दोनों देशों के बीच यह डील चीन के बढ़ते असर को रोकने के लिए है।

अब दोनों देशों के बीच आर्थिक व सुरक्षा संबंध और मजबूत होंगे। साथ ही जापानी इन्वेस्टमेंट (निवेश) वाले अमेरिका के न्यूक्लियर प्लांट मेकर्स भारत में एटॉमिक प्लांट लगा सकेंगे। इस डील के तहत जापान भारत को अपनी न्यूक्लियर डील के लिए पिछले करीब छह सालों से बातचीत चल रही थी। लेकिन 2011 में जापान के फुकुशिमा न्यूक्लियर पावर प्लांट आपदा के बाद यह राजनीतिक कारणों से बाधित हो गई थी।

न्यूक्लियर डील के बारे में आबे ने कहा कि न्यूक्लियर एनर्जी का शांतिपूर्ण उपयोग करना भारत की जिम्मेदारी है, भले ही वह एनपीटी का हिस्सा न हो। यह समझौता विश्व को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने के जापान के उद्देश्य का ही हिस्सा है। यह समझौता जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मदद करेगा।

अन्य समझौते-

सिविल न्यूक्लियर डील के अलावा दव्पक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों के बीच अलग-अलग क्षेत्रों में 9 अन्य समझौते हुए-

  • इसमें व्यापार बढ़ाने।
  • क्लीन एनर्जी, (साफ शक्ति)
  • इंफ्रास्टक्चर (बुनियादी ढांचा)
  • स्किल डेवलपमेंट (कौशल विकास) में सहयोग,
  • मैनुफैक्चरिंग (उत्पादन करना)
  • इन्वेस्टमेंट (निवेश) जैसी चीजें शामिल हैं।
  • जापान का निजी क्षेत्र भारत में एक संस्था स्थापित करेगा जो अगले 10 सालों में 30 हजार लोगों को प्रशिक्षित करेगा, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
  • नई दिल्ली में जापान एक टूरिज्म ब्यूरों (सूचना और तथ्यों की जानकारी प्रदान करने वाला कार्यालय) स्थापित करेगा, जो दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाएगा।
  • आबे ने मुंबई से अहमदाबाद के बीच जापान के हाई स्पीड ट्रेन, (उच्च गति रेल) योजना के बारे में कहा कि इस साल के अंत तक इसकी डिजाइनिंग (रूपरेखा) शुरू हो जाएगी। 2018 में निर्माण शुरू होगा और 2023 में पूरा हो जाएगा।

पीएम मोदी जापानी चैंबर ऑफ कॉमर्स (कोई विशिष्ट प्रकार के कमरा का वाणिज्य) व जापान इंडिया बिजनेस (भारत व्यापार) फोरम (अंतर/आकार) के कार्यक्रम में जापानी कंपनियों को भारत में निवेश बढ़ाने का न्योता दिया। कहा कि मेक इन इंडिया (भारत में बनना) और मेड (बनना) बाय (पास) जापान एक दूसरे के साथ खूब जंचते हैं। भारत के विकास की जरूरतें काफी ज्यादा हैं। इसलिए वह भारत को दुनिया की सबसे खुली अर्थव्यवस्था बनाना चाहते हैं।

मोदी जी को जापान के 82 वर्षीय सम्राट आकिहितो से मिले। दोनों के बीच भारत-जापान के बीच के संबंधों के अलावा एशिया के भविष्य पर चर्चा हुई।

भारत-की इन देशों के साथ भी सिविल न्यूक्लियर डील हैं- अमेरिका, रूस, दक्षिण कोरिया, मंगोलिया, फ्रांस, नामीबिया, अर्जेटीना, कनाडा, कजाकिस्तान व ऑस्ट्रेलिया।

बिहार:- के मुजफ्फरपुर में श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (चिकित्सा-शास्त्र महाविद्यालय और चिकित्सालय) (एसकेएमसीएच) में लावारिस देह का सौदा होता है। अंतिम संस्कार के लिए रखे गए सफाईकर्मी ही लाश से मांस नोंच कर कंकाल बेचने का काम करते हैं। यह तब हो रहा है जब लावारिस लाशों की अंत्येष्टि के लिए कमेटी (समिति) बनी हुई है। अंतिम संस्कार के वक्त एक पुलिसकर्मी की मौजदूगी भी जरूरी है। ताकि कोई गड़बड़ न हो। पर, एसकेएमसीएच में सब सेट (विशेष -स्थिति में रखना) है। लावारिस शव मोर्चरी से ही सफाईकर्मियों के कब्जें में चला जाता है। वे इसे कंकाल में बदलकर राज्य या बाहर के मेडिकल कॉलेजों (चिकित्सा-शास्त्र महाविद्यालय) के छात्रों को 8 से 10 हजार रु. में बेच देते हैं। कागजों में खानापूर्ति कर पैसा भी हड़प लेते हैं। दैनिक भास्कर की स्टिंग में इसका खुलासा हुआ है। भास्कर दल ने ग्राहक बन कर सफाईकर्मियों से तीन कंकाल खरीदने की बात की। इसके लिए 500 रु. पेशगी दी तो सफाईकर्मी ने फौरन एक कंकाल सामने लाकर रख दिया।

नई दिल्ली:-

  • केंद्र ने पाक की और बहने वाली नदियों का समुचित इस्तेमाल अपने हक में करने की तैयारी शुरू कर दी है। सूत्र बताते है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने केद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीइए) को 31 दिसंबर तक उन छह से ज्यादा जलविद्युत परियोजनाओं के बारे में तकनीकी और आर्थिक अध्ययन पूरा कर विस्तृत विवरण देने के लिए कहा है कि जिन्हें चिनाब नदी पर बनाया जाना है पीएमओ ने सीईए से कहा है कि चिनाब नदी पर बनने वाले 6 से ज्यादा जलविद्युत परियोजनाओं के बारे में तकनीकी और आर्थिक मूल्यांकन का मसला एक साल से लंबित है और अब इसमें तेजी से काम करने की आवश्यकता है। पीएमओ के अधिकारी की माने तो सरकार 56 साल पुराने सिंधु नदी जल समझौते के दायरे में ही इस पर आगे बढ़ेगी। 1960 में हुई जल संधि को दुनिया का सबसे उदार जल समझौता माना जाता है। इसके तहत व्यास, रावी व सतलज के ज्यादातर पानी का इस्तेमाल करने का अधिकार भारत को है, जबकि पश्चिम की ओर बहने वाली सिंधु, चिनाब व झेलम के पानी का अधिकांश इस्तेमाल पाक करता है।
  • समझौते के तहत भारत इन नदियों के पानी से 13.4 लाख एकड़ क्षेत्र में सिंचाई भी कर सकता है। लेकिन इन नदियों से भारत अब तक 8 लाख एकड़ कृषि क्षेत्र में सिंचाई का लाभ उठा पा रहा है। सालाना 13.3 करोड़ एकड़ फीट पानी इन तीनों नदियों से होकर बहता है। समझौते के तहत इसमें 36 लाख एकड़ फीट पानी भारत अपने पास बांध बनाकर संग्रहीत कर सकता है। केन्द्र का आकलन है कि इससे देश को 5,000 मेगावॉट बिजली मिल सकती है।

रूस:- दूसरे विश्व युद्ध के बाद वीरान पड़े अपने सभी मिलिट्री (फौज, विशेषत: थल सेना) बेस (नींव/ आधार बनाना) को रूस ने फिर से खोलना शुरू कर दिया है। अमरीकी मीडिया (संचार माध्यम) में आई खबरों के मुताबिक रूस इन सैन्य अड्‌डों पर अपनी अत्यानुधिक न्यूक्लियर (नाभकीय परमाणु अस्त्र सं संबंधित) मिसाइल (प्रक्षेपास्त्र) भी तैनात कर रहा है। रूस से आई इन खबरों से अमरीकी मीडिया में आई इन खबरों से अमरीका और नाटो देश तीसरे विश्व युद्ध के डर से दहशत में दिखाई दे रहे हैं। नाटो को डर है कि रूस इन अडों से वॉशिंगटन, कैलिफोर्निया, साउथ दकोटा और अलास्का को अपने निशाने पर लेने की तैयारी में है। दव्तीय विश्व युद्ध के समय ये सभी रूस के अहम आर्मी बेस हुआ करते थे। हालाकि, साल 1960 के बाद से ये बेस एकदम वीरान थे और वीरान शहर में तब्दील हो गए थे।

पुराने बंद पड़े निम्न बेस रूस ने फिर खोलना शुरू कर दिए-

  • ब्लाकलावा सबमरीन बेस भी खोला-अमरीका मीडिया के मुताबिक रूस ने ब्लैक (काला) सी के नजदीक सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बलाकलावा सबमरीन बेस को फिर से खोल दिया है और यहां अपनी न्यूक्लियर मिसाइल तैनात कर रहा है। ये पहले रूस का सबमरीन रिपेयर सेंटर (मरम्मत केंद्र) हुआ करता था, जिसे साल 1995 में बंदकर दिया गया था। इसकी सेफ्टी (सुरक्षा) के लिए रूसी सेना की एक स्पेशल (खास) टुकड़ी हमेशा यहां तैनात रहती हैं।
  • गुडिम बेस- रूस ने सबसे खुफिया और अत्याधुनिक गुडिम बेस मिलिट्री बेस को भी एक बार फिर प्रयोग में लाना शुरू कर दिया है। रूसी सरकार ने साल 2002 में इसे अचानक पूरी तरह से बंद कर दिया था। यहां करीब 5000 लोग रहा करते थे, जो इस जगह को छोड़कर चले गए, जिससे ये खंडहर में तब्दील हो गया था।
  • रामेन्की बंकर- सीआईए की फाइलों में इसे जमीन के 30 फीट नीचे मौजूद एक बेहद सुरक्षित बंकर बताया गया है। ये रामेन्की डिस्ट्रिक्ट (विशिष्टता वाला क्षेत्र) में मौजूद है और इसका निर्माण दव्तीय विश्व युद्ध के एकदम बाद साल 1950 में किया था। इसे हमले या संकट के समय रूस के टॉप लीडर्स (सर्वश्रेष्ठ नेता)के परिवारों को सुरक्षित रखा जा सके। यह जमीन से 30 फीट अंदर करीब 500 एकड़ में फैला हुआ हैं।
  • झितकुर अंडरग्राउंड(भूमि के अंदर) बेस- ये दुनिया के टॉप (सर्वश्रेष्ठ)-10 अंडरग्राउंड (भूमि के अंदर) मिलिट्री बेस में दूसरे नंबर पर रखा जाता है। ढितकुर रूस के कपुस्तिन यार में स्थित है और जानकारी के मुताबिक जमीन से 400 मीटर नीचे मौजूद है। सीआईए इसे रूस का एरिया 51 कहती है, क्योंकि यहां असल में क्या होता है, इसकी आज तक किसी को कोई जानकारी नहीं है। सोवियत यूनियन ने मशहुर स्पूतनिक सैटेलाइट (उपग्रह) भी यहां से लॉन्च (शुरू) किया था। इस बेस के आस-पास तक भी नहीं पहुंचा जा सकता है।

अमृतसर:-

  • अफगानिस्तान के पुनर्गठन, आर्थिक विकास व सुरक्षा को लेकर बने संगठन ’हार्ट (प्रेम और भावनाओं का केंद्र) ऑफ (के) एशिया इस्तांबुल प्रोसेस’ (प्रक्रिया) की 7वीं बैठक अमृतसर में हुई। अफगानिस्तान ने तो आतंक के मुद्दे पर पाकिस्तान को खरी-खोटी सुनाई ही और भारत ने भी मौके का लाभ उठाकर पाकिस्तान को घेरा।
  • अफगानिस्तान लंबे समय से युद्धग्रस्त देश रहा है और इसके साथ आतंकवाद की मार भी झेल रहा है। अफगानिस्तान के आर्थिक विकास, सुरक्षा और पुनर्गठन के लिए संयुक्त सहयोग की जरूरत महसूस करते हुए नवंबर 2011 में तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में भारत, पाकिस्तान, चीन, रूस, तुर्की, ईरान आदि सहित 14 देशों ने मिलकर एक संगठन बनाया था। सभी सदस्य देशों ने अफगानिस्तान को एशिया का दिल माना और चूंकि इस प्रक्रिया की शुरुआत इस्तांबुल में हुई इसलिए इस सहयोग संगठन का नाम ’हार्ट ऑफ एशिया-इंस्ताबुल प्रोसेस’ रखा गया था। इस संगठन का ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, अमरीका सहित 7 देशों का सहयोग व समर्थन भी हासिल है। अफगानिस्तान के विकास और पुनर्गठन को लेकर इस बार भारत के अमृतसर में बैठक रखी गई। इस बैठक में 14 सदस्य देशों, 17 सहयोगी देशों के मंत्री और 12 संगठनों के सदस्यों ने भाग लिया। इस बैठक में मुख्य मुद्दा अफगानिस्तान का पुनर्गठन, आर्थिक विकास और सुरक्षा पर ही केंद्रित रहा। हालांकि, सभी जानते हैं कि यह तभी संभव हो सकता है, जबकि अफगानिस्तान और इसके आसपास के देश आतंक के साए से भी दूर रहें। शायद यही वजह रही कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने सम्मेलन में पाकिस्तान को जमकर खरी-खोटी सुनाई।
  • सम्मेलन के माध्यम से गनी ने सीधे-सीधे पाकिस्तान और दुनिया को कड़ा संदेश भी दिया कि जब तक क्षेत्र में शांति नहीं होती हम 500 मिलियन डॉलर की पाकिस्तानी सहायता से अफगानिस्तान के विकास की उम्मीद नहीं कर सकते। उन्होंने सम्मेलन में मौजूद पाकिस्तान के प्रतिनिधि व विदेश मामलों में पाक प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अजीज का नाम लेकर कहा कि बेहतर यही होता है कि यह राशि आतंकवाद के खात्मे के लिए खर्च की जाती। उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान के पुनर्गठन और विकास के उद्देश्य से पाकिस्तान ने 500 मिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता की घोषणा की है। यह राशि अफगानिस्तान में आधारभूत सुविधाओं पर खर्च की जानी है। उधर, उम्मीद के मुताबिक भारत ने भी इस सम्मेलन का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान को घेरने की कोशिश की और उसे एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने बेनकाब किया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा कि आतंकवाद को समाप्त किए बिना विकास की बात नहीं हो सकती। भला चुप्पी साधकर आतंकवाद से कोई कैसे लड़ेगा? इसके लिए सक्रियता तो दिखानी ही होगी। आतंकवाद और इससे पनप रही दूसरी समस्याओं को सुलझाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। इस सम्मेलन में भारत की ओर से अफगानिस्तान के साथ आपसी समझौतो पर भी हस्ताक्षर हुए। दोनों देशों के बीच दव्पक्षीय वार्ता तो होनी ही थी। आवागमन के लिहाज से अफगानिस्तान और भारत के बीच पाकिस्तान एक दीवार बनकर खड़ा है। इसलिए दोनों देशों के बीच कारोबार के लिए हवाई रूट पर काम करने की बात हुई।
  • इसके अलावा दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग और व्यापार के लिए ईरान के चाबहार एयरपोर्ट (हवाई अड्डा) का इस्तेमाल करने पर सहमति हुई। हमें यह समझना चाहिए कि अफगानिस्तान इस्लामिक देश है। और आतंक से लड़ने के मामले में वह भारत के लिए अहम सहयोगी देश साबित हो सकता है। यह आतंकवाद से लड़ने के मामले में भारत को ऑक्सीजन देता है। चीन और पाकिस्तान से लगती सीमा के कारण अफगानिस्तान भारत के लिए भू-रणनीतिक ही नहीं आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। सम्मेलन में इन सारी बातों के मध्य निगाह इस बात पर भी थी कि क्या भारत और पाकिस्तान के बीच भी किसी दव्पक्षीय वार्ता की शुरुआत हो सकती है। फिलहाल ऐसा नहीं हुआ। हालांकि, पाकिस्तान की ओर से इसका प्रयास किया गया और कहा गया कि भारत रास्ते खोले तो बातचीत संभव है लेकिन तनाव के माहौल के बीच भारत ने फिलहाल इस प्रयास को टाल दिया। दरअसल, पाकिस्तान को अंदर ही अंदर डर सता रहा था कि भारत ’हार्ट ऑफ एशिया’ सम्मेलन का इस्तेमाल पठानकोर्ट, उरी व नगरोटा हमले को लेकर घेरने में इस्तेमाल करने वाला है। और, ऐसा हुआ भी। भारत, सम्मेलन को अफगानिस्तान में सुरक्षा के मुद्दे के नाम पर आतंकवाद के इर्द-गिर्द केंद्रित रखने में कामयाब रहा। इस पाकिस्तान को अमरीका की ओर से 90 करोड़ डॉलर की सशर्त सहायता के लिए एक विधेयक वहां की प्रतिनिधि सभा ने पारित कर दिया। कभी-कभी यह बात बहुत अजीब भी लगती है कि एक तरफ भारत, आतंकवाद को पनाह देने वाले देश के रूप् में पाक को घेरने की कवायद करता है और दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाक को आर्थिक सहायता मुहैया कराता है। वास्तविकता यह भी है कि भले ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर में पाकिस्तान आतंकवाद को पनाह देने वाला देश है लेकिन पाकिस्तान को विश्वास में लिए बिना आतंकवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि अमरीका या अन्य देश पाक को घेरने में भले ही भारत का साथ दे लेकिन वे पाकिस्तान को आर्थिक सहायता भी देते हें।

प्रो. संजय भारदव्ाज, दक्षिण एशिया मामलों के जानकर, जेएनयू नई दिल्ली में अध्यापन का 16 वर्ष का अनुभव, अंतरराष्ट्रीय मसलों पर शोध कार्य

  • अमृतसर में आयोजित हुई ’हार्ट ऑफ एशिया कॉन्फ्रेंस 2016’ में सभी 14 क्षेत्रीय सदस्य देशों ने आतंकवाद और उसे मिल रही आर्थिक मदद को फौरन खत्म करने के लिए एक घोषणा पत्र स्वीकार किया। सभी देश अफगानिस्तान में तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, अलकायदा, टीटीपी, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान आदि आतंकी संगठनों दव्ारा पैदा की गई सुरक्षा चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया। लंबे समय से आतंक का दंश झेल रहे मुल्क के लिए आगामी कुछ वर्ष वाकई निर्णायक साबित होंगे। गौरतलब है कि अफगान सेना और नागरिकों पर हमले बढ़े हैं, जिसे इस कॉन्फ्रेंस (सम्मेलन) में स्वीकारा गया। फिर से बढ़ते तालिबानीकरण के खिलाफ सभी क्षेत्रीय ताकतों को एकजुट होना होगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अपने वादों को निभाए। इस समय आतंकवाद तो समस्या है ही पर इसके साथ-साथ अफगानिस्तान में ’रूल ऑफ लॉ’ स्थापित करना भी बड़ी चुनौती है। इसलिए पूरी कोशिश होनी चाहिए कि एक आम अफगान को बेहतर लोकतंत्र मिल सके।

उ. कोरिया:-

  • दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री हान मिन कू ने इस बात का खुलासा कर सबको चौंका दिया है कि सिओल के पास उ. कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन की हत्या का रहस्य प्लान (योजना) है। उन्होंने ये बात अपने देश के संसदीय सत्र के दौरान सांसदो के सवालों का जवाब देते हुए कही।
  • कू ने यहां तक बता दिया है कि सरकार इस योजना पर विचार कर रही है कि किम जोंग उन की हत्या कराने के लिए क्यों न दक्षिण कोरियाई सेना की एक विशेष यूनिट (ईकाइ) अलग से तैयार कर दी जाए। लेकिन, उन्होंने साफ किया कि दक्षिण कोरिया यह कदम तभी उठाएगा, जब उसे अपने देश की संप्रभुता को खतरा नजर आएगा। या फिर उ. कोरिया दव्ारा परमाणु शस्त्रों का इस मकसद से प्रयोग किया जाएगा, ताकि वो दक्षिण कोरिया को दबा सके।
  • दूसरी तरफ यह भी खबर है कि उ. कोरिया ने दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री को जान से मरवाने की चेतावनी दी है। इन विवादों के बीच उ. कोरिया के विदेश मंत्री री योंग हो ने कहा कि अगर अमरीका ने उ. कोरिया के सुरक्षा को खतरा में डाला तो वह कुछ भी कर सकता है। यूएन महासभा में बोलते हुए योंग ने कहा कि हमारे पास परमाणु बम की क्षमता को बढ़ाने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है। ऐसा हम अपनी देश की सुरक्षा को हर हाल में बनाए रखने के लिए करेंगे।

भारत अमरीका:- भारत ने फ्रांस से राफेल सौदा करने के बाद अब अमरीकी हारपून सौदे को अंतिम रूप देकर दुश्मन पर कहर बरपाने की पूरी तैयारी कर ली है। फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद का सौदा होने के बाद भारत ने हर स्थिति से निपटने की दिशा में एक और प्रभावी कदम उठाया है। अमरीकी बोइंग कंपनी (जनसमूह) से करोड़ों डॉलर (अमेरिका आदि में प्रचलित मुद्रा) के समझौते को अंतिम रूप देकर भारत के लिए संहारक क्षमता से भरपूर एंटी शिप अमरीकी हारपून मिसाइल हासिल करने का रास्ता साफ हो गया है।

समझौते में प्रमुख बात निम्न हैं-

  • जनसमूह बोइंग से 8 करोड़ 10 लाख डॉलर का करार।
  • 89 हारपून मिसाइलों (प्रक्षेपास्त्र) के लिए हुआ करार।
  • 2018 में बनकर तैयार होने की उम्मीद।

खासियत निम्न हैं-

  • यह सभी मौसम में मार करने की क्षमता से युक्त एंटी शिप मिसाइल हैं।
  • यह सतह, हवा और समुद्री सबमैरिन के जरिये मार करने में भी सक्षम है।
  • इसे अमरीका ने सोवियत संघ के खिलाफ शीत युद्ध के दौरान तैयार किया था।
  • हारपून की मदद से भारत पाक और चीन को जवाब एक साथ दे सकता है और समुद्री सीमाओ में दोनों देश को धूल चटा सकता है।

अमरीकी रक्षा विभाग ने जारी बयान में बताया है कि भारत को पोत भेदी हारपून मिसाइलों की आपूर्ति करने के लिए बोइंग ने आठ करोड़ 10 लाख डॉलर से अधिक की राशि का करार किया है। करार के अनुसार विदेश सैन्य बिक्री कार्यक्रम के तहत भारत सरकार के लिए बोइंग को 89 हारपून मिसाइलों, कंटेनरों और उपकरणों की 22 खेप के लिए आठ करोड़ डॉलर का करार दिया गया है।

फ्रांस:-

  • फ्रांस दुनिया का वह पहला देश बन गया है जिसने वर्ष 2020 तक प्लास्टिक के प्लेट्‌स, कप और बर्तन पूरी तरह बैन (बंद) करने का फैसला लिया है। हाल ही में फ्रांस में इससे जुड़ा कानून पास किया गया है। 2020 तक वहां प्लास्टिक के बर्तनों के विकल्प के तौर पर ऐसा बायोलॉजिकल (जैविक) मैटेरियल (कच्चा माल) बनाना होगा जिसे बाद में खाद के रूप में उपयोग किया जा सके। फ्रांस के इस नए ’एनर्जी ट्रांसिट फॉर ग्रीन ग्रॉथ एक्ट’ (ऊर्जा, एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने की प्रक्रिया, का हरा विस्तार) कानून के अनुसार अगले साल जुलाई तक यहां प्लास्टिक के शॉपिंग (खरीददारी) बैग पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिए जाएंगे।
  • इस कानून से फ्रांस दुनिया भर के लिए पर्यावरण अनुकुल पद्धतियों को अपनाने वाला अगुवा बनना चाहता है। इससे ग्रीन हाउस (हरा घर) गैसों के उत्सर्जन में भी भारी कमी आएगी। वर्ष 2015 में अकेले फ्रांस में 4.73 बिलियन प्लास्टिक के कटोरे फेंके गए, जबकि देशभर के सुपरमार्केट्‌स (असामान्य बाजार) में प्रतिवर्ष लगभग 17 बिलियन प्लास्टिक बैगों का इस्तेमाल होगा है। इस नए कानून के अनुसार 1 जनवरी, 2017 से सब्जियों और फलों के लिए प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल बंद होगा।

- Published/Last Modified on: January 10, 2017

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